अनिवासी
आज, हर्ष का नाम दुनिया के धनाढ्य लोगों में शुमार होता है। पूरी दुनिया में फैला कारोबार, देश विदेश में कई बड़े कारखाने, करोड़ों का आयात निर्यात, हर्ष के व्यापार का साम्राज्य कई बड़े बड़े देशों में पंख पसारे हुए है। लोहा, तेल, केमिकल और कई क्षेत्रों में, उसका अरबों रुपये का कारोबार, निरंतर प्रगति पर है। देश ही नहीं, विदेशों में भी उसके कई इंजीनियरिंग और प्रबंधकीय संस्थान चलते हैं। अब तो देश की सरकार भी निवेश के लिए उसका मुंह ताकती है। अरबों का स्वामी होने के बावजूद भी, उसे अपनी बीती कहानी बताने में कोई संकोच नहीं होता। वह कहीं भी किसी सम्मलेन आदि में जाता, अपनी कहानी बताकर लोगों को प्रेरणा देता रहता।
हर्ष पढ़ाई में तो फिसड्डी ही था। किसी तरह से वह ग्रेजुएट हो गया। नौकरी के लिए बहुत धक्के खाया पर कई वर्षों तक कोई ठीक ठाक काम नहीं मिल पाया। उसने फिर कबाड़ खरीदने और बेचने का काम प्रारम्भ किया। लोहा-लंगड़ आदि खरीद कर कारखानों में बेच देता, वहां पर गलाकर, उससे अन्य सामान तैयार किया जाता। इसमें उसे, अच्छा खासा लाभ होने लगा। धीरे धीरे, उसने लोहा गलाने की भट्ठी लगा ली और अब वह कबाड़ सीधे बेचने की जगह, लोहे की रॉड बनाकर बेचने लगा। यह काम पहले से अधिक लाभप्रद और सम्मान जनक भी था। बेचने के लिये जगह जगह जाने की छुट्टी हो गयी और वह स्वयं कबाड़ी की जगह एक छोटे मोटे कारखाने का मालिक बन गया। नोएडा में उसका कारखाना चलने लगा और उसने काम करने के लिए कुछ कर्मचारी भी रख लिये।
कुछ समय के बाद, उसके पास ताम्बा का भी कबाड़ आने लगा। हर्ष ने सोचा, बजाय इसे सीधा बेचने के, तार बनाकर बेचा जाय तो अच्छी कमाई भी होगी और एक कबाड़ीवाला से उद्योगपति हो जायेगा। परन्तु इसके लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता थी। अपना घर और गांव की जमीन बेचकर भी, उतनी पूंजी नहीं जुटा सकता था। उसने ऋण के लिए बैंकों से बात किया, पर कबाड़ के काम और छोटी सी भट्टी पर, बैंक ऋण देने को तैयार नहीं थे। कर्ज के लिए कोई जमानत लेने को भी तैयार नहीं था। ऋण नहीं मिलने से हर्ष बहुत मायूस था पर वह एक साहसी उद्यमी था। इतनी सरलता से हार मानने वाला नहीं था। उसने अपनी जमीन गिरवी रखकर, अपने गांव के ही साहूकार से कुछ रुपये उधार ले लिए। उसको अपनी आवश्यकता भर धन तो नहीं मिला पर गाड़ी को थोड़ी और गति मिल गयी। इसी बीच हर्ष की मुलाकात एक केबल निर्माता, विजय कुमार गुप्ता से हुई। जब हर्ष ने गुप्ता जी को अपनी योजना बताई तो वे उसकी उद्यमता से प्रभावित हुए और उसे सहयोग देने का भरोसा दिया। उन्होंने एक निजी बैंक से, उसे कुछ कर्ज दिलवा दिया। यही नहीं हर्ष के कारखाने में बने तार को भी अपने केबल के लिए खरीदने का करार कर लिया।
हर्ष का काम ठीक ठाक चलने लगा। वह एक महान उद्यमी था, अपने काम में निरंतर प्रगति देखना चाहता था। उसका काम तो ठीक चल रहा था, पर उसे आये दिन सरकारी एजेंसियों के उत्पीडन का सामना करना पड़ता था। कभी श्रम विभाग वाले, कभी बिजली वाले, कभी बिक्री कर, कभी उत्पाद शुल्क सभी से निपटना पड़ता था। इन सबसे हार मानने की बजाय, किसी न किसी तरह सब का प्रबंध कर लेता।
एक बार अख़बार में उसकी नजर लन्दन की एक कंपनी के टेंडर पर पड़ी। एक मोटर कंपनी को तांबे के तार निर्यात करने का टेंडर था। हर्ष ने सोचा, क्यों न इसमें किस्मत आजमाई जाय। उसे निर्यात का कोई अनुभव नहीं था, मगर उसके मन में जो आता उसे पूरा करने के लिए, पूरा जोर लगा देता। उसने निर्यात प्रबंध (एक्सपोर्ट मैनेजमेंट) की एक किताब खरीदी और निर्यात के बारे में अध्ययन करने लगा। साथ ही अपने एक कर्मचारी को पूर्ण रूप से इसी काम में लगा दिया। उसने अपनी कंपनी का नाम आयात निर्यात के लिए पंजीकृत करवाया। अब उसे एक बार फिर से ऋण और टेंडर के नियमों के अनुसार, बैंक गारंटी की आवश्यकता पड़ी। उसके पास काम बड़ा था और पूंजी बहुत छोटी। कोई भी बैंक उसके काम के लिए ऋण और गारंटी देने को तैयार नहीं था।
बड़ी मुश्किल से एक बैंक उसकी पूंजी के बराबर ऋण देने को तैयार हो गया। हर्ष की बुद्धि काम की, उसने बैंक से आग्रह किया कि वह टेंडर के हिसाब से ऋण की स्वीकृत दे दे और वास्तविक ऋण, पूंजी के ही बराबर जारी करे। जब वह ऋण पूरा हो जाये तो आगे के काम के लिए दूसरी किस्त दे। हो सकता है, उसी पैसे को घुमाकर वह आगे का काम चला ले। बैंक ने उसकी यह बात मान ली। हर्ष ने टेंडर भरा और उसकी किस्मत ने साथ दिया, कीमत सबसे कम होने के कारण, वह आर्डर उसे ही मिल गया। हर्ष के पास पूंजी तो थी नहीं कि वह सारा माल एक बार में भेज पाए, उसने आयातक से बहाना बनाया कि पहली खेप थोड़ा कम ही भेजेगा, ताकि माल के गुणवत्ता के बारे में वह आश्वस्त हो ले और आर्डर का शेष माल की यथाशीघ्र पूर्ति कर देगा। उसकी यह रणनीति काम आ गयी। उसकी पहली खेप पास हो गयी और पहली ही खेप में अच्छा ख़ासा लाभ मिल गया। फिर क्या था, पहली खेप का जो पैसा आया दूसरी खेप में, उसके दूना माल भेज दिया और तीसरी बार में सारा काम सफलता पूर्वक संपन्न कर दिया। अब हर्ष के व्यापार को पर लग चुके थे। बैंक का पैसा समय पर लौटा देने के कारण, उसे और ऋण लेने का आग्रह करने लगा।
इधर हर्ष को भी निर्यात का और बड़ा काम मिलने लगा। अब तो उसके पौ बारह थे। देखते ही देखते वह करोड़ों में खेलने लगा। कुछ ही वर्षों बाद वह लोहे और ताम्बा का एक बहुत बड़ा निर्यातक बन गया। हर्ष जिस चीज को हाथ लगाता सोना बन जाता। उसकी गिनती देश के धनाढ्य व्यक्तियों में होने लगी। उसका कारोबार इंगलैंड से अधिक सम्बंधित था, इस कारण लंदन आना जाना बहुत होता। कई बार तो महीनों लंदन में ही बीत जाते। धीरे धीरे उसे लंदन ही भाने लगा और वहां अपना स्थाई निवास बना लिया। अब तो स्वदेश कभी कभी आता।
एक बार हर्ष भारत आया हुआ था, वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज में एक सेमीनार में गया तो वहां एक व्यक्ति जो सेमीनार के प्रबंध में लगा था, जाना पहचाना सा लगा। हर्ष ने उससे पूछा, 'तुषार!'
उत्तर मिला 'हां, और कैसे हैं सर, आपने पहचान लिया! कितने वर्षों बाद मिले हैं। '
'अरे, क्यों नहीं पहचानेंगे, चलो सेमीनार के ब्रेक में मिलना। '
तुषार प्राथमिक कक्षा में, हर्ष के साथ पढ़ा था। उसे देखकर हर्ष को अपना बचपन याद आ गया। बात चीत से पता चला कि तुषार उसी कॉलेज में कार्यालय अधीक्षक है। हर्ष का उससे बात करने का मन हो आया और तुषार को अगले दिन होटल में आमंत्रित कर लिया, 'कल शाम मेरे होटल आ जाओ, खाना साथ खाते हैं, हां समय का ख्याल रखना, शाम ठीक सात बजे होटल पहुँच जाना। उसके बाद और किसी से भी मिलना है। '
तुषार घर जाकर हर्ष की तारीफ के पुल बांध दिया। अपनी माँ और पत्नी से बार बार कहता, 'देखो कितना बड़ा आदमी है, अरबपति और मुझ जैसे को फाइव स्टार होटल में खाने पर बुलाया है। '
तुषार पहली बार फाइव स्टार होटल में खाना खाने पहुंचा। मेज पर पड़े मेन्यू को उठाकर पलटने लगा। मेन्यू में खाने का रेट देखकर, उसके तोते उड़े हुए थे।
'बोलो क्या लोगे?' हर्ष ने पूछा।
'आप ही अपनी मर्जी से आर्डर कर दीजिये। मुझे तो यहाँ कुछ समझ ही नहीं आ रहा। '
'ड्रिंक-व्रिंक लेते हो न ?'
'कभी कभार, बियर ले लेता हूँ। '
'वेटर! एक बियर और एक लार्ज स्कॉच, साथ ये ये स्नैक्स। बाकी खाने का उसके बाद बताते हैं।'
बातचीत प्रारम्भ हुई। पुरानी यादें ताजा करके, हर्ष को बड़ा आनंद आ रहा था। तुषार एक एक कर सब बातें उसे बताता तो हर्ष हां में हाँ मिलाता। हर्ष तो अपने काम में इतना व्यस्त रहता था, अब तक इतनी सब बातें उसे कहाँ याद रहेंगी। छुटपुट एकाध बात उसे याद थी, बीच बीच में दाग देता।
उसने तुषार से पूछा, 'कभी लंदन गए हो ?'
'मेरे नसीब में कहां सर, बहुत से लोग पैसे कमाने के लिए विदेश चले जाते हैं और आप जैसे लोग अधिक पैसे कमा लेने के कारण चले गए। मैं तो किसी भी श्रेणी में नहीं आता। ग्रेजुएशन के बाद मैंने भी सोचा, अमेरिका चला जाऊं, वहां ज्यादा कमा सकूंगा। मगर, उसके लिए भी पैसे की जरूरत थी, जुगाड़ नहीं हो पाया। यहीं एक इंजीनियरिंग कॉलेज में क्लर्क की नौकरी मिल गयी, प्रमोशन के बाद सुपरिन्टेन्डेन्ट बन गया हूँ। मुझे तो अपना ही देश सबसे अच्छा लगता है। देखेंगे कभी नसीब हुआ तो घूम फिर आएंगे। '
'बिल्कुल सही कह रहे हो तुषार। मातृभूमि तो अच्छी लगती ही है। देखो, पेड़ की शाखायें चाहे कितनी ही दूर तक फैली हों लेकिन महत्त्व जड़ का अधिक होता है। क्योंकि पेड़ उसी स्थान पर उगता है, जहां बीज गड़ा होता है।
ये लो मेरा कार्ड, जब कभी घूमने आना हो मैसेज कर देना, तुम्हारा टिकट मैं अपनी कंपनी से करवा दूंगा। और हाँ, भाभी को भी साथ लाना। तुमसे बात करके बहुत अच्छा लगा, बचपन की बातें एक बार फिर ताजा हो आयीं। ठीक है चलो; अभी साढ़े नौ बजे, मेरा किसी से अपॉइंटमेंट है।'
आज के आधुनिक और व्यस्तम जीवन में भी साहित्य के प्रति लोगों की रूचि देखते ही बनती है। साहित्य में काव्य का अपना एक अलग ही महत्त्व है। कविता अनंत काल से अपना स्थान बनाये हुए है। कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज जब कठिन और जटिल परिस्थितियों में होता है कवि या लेखक अपनी लेखनी के द्वारा, उसे उबारने में बड़ी भूमिका निभाता है। समय और समाज परिवर्तनशील हैं। तदनुसार हिंदी कविता भी अपना स्वरुप बदलती रही है, परन्तु हर रूप में उसका उद्देश्य एक ही रहा है, समाज को सजग और जागृत रखना। हिंदी काव्य विधा के अनेकों रूप हैं और सभी अत्यंत रुचिकर तथा लोकप्रिय होने के साथ सामाजिक चेतना हेतु सशक्त हैं। काव्य की कई विधाओं में सुर और तुक के अनिवार्य नियम होने के फलस्वरूप, अनेकों कवि बहुत अच्छे भाव होते हुए भी अपनी बात को काव्य में नहीं ढाल पाते। इस कारण बहुत से कवियों ने अतुकांत कविता का सहारा लिया और अनेकों कवितायेँ मर गयीं।
हाइकु भी अतुकांत कविता का एक सूक्षतम रूप है, अपितु कह सकते हैं अब तक की अपनाई जाने वाली किसी भी विधा का सबसे सूक्ष्म रूप है। हाइकु की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह एक जापानी विधा होने के बावजूद, संसार के कोने कोने तक पहुंच चुका है और हर भाषा में खूब बढ़ चढ़ कर लिखा जा रहा है। संचार क्रान्ति ने इसके प्रचार प्रसार में और भी अधिक योगदान दिया।
अब्दुल समद राही जी, एक कवि और प्रकाशक दोनों ही रूप में अद्वितीय और सराहनीय कार्य में रत हैं। उनके साथ मैं काफी समय से फेसबुक पर जुड़ा हुआ हूँ। उनकी रचनाओं समाज, राजनीति, प्रकृति, जीवन, सिद्धान्त आदि सभी विषय समाहित हैं। उनके हाइकु रचनाओं में भी इन विषयों का अनुभव किया जा सकता है। उनके रची कुछ हाइकु निम्न हैं -
प्रेम और मित्रता से सम्बंधित -
याद तुम्हारी
हंसती मुस्कराती
साथ रहती
दीपक के माध्यम से मानव व्यव्हार पर आघात
तोड़ता भ्रम
घने अंधेरों का भी
एक दीपक
प्रकृति से सम्बंधित -
उदास उडी
चमन से तितली
टूटा गुलाब
जीवन संबंधी -
नारी बुनती
खुशियों की चादर
दर्द सहती
जीवन और पर्यावरण से सम्बंधित
खड़ा है ठूंठ
बतियाते हैं लोग
देता था छाँव
उनके हाइकु संकलन के प्रकाशन पर, उन्हें हार्दिक शुभकामनायें देता हूँ और सफलता की कामना करता हूँ।
एस० डी० तिवारी
आज, हर्ष का नाम दुनिया के धनाढ्य लोगों में शुमार होता है। पूरी दुनिया में फैला कारोबार, देश विदेश में कई बड़े कारखाने, करोड़ों का आयात निर्यात, हर्ष के व्यापार का साम्राज्य कई बड़े बड़े देशों में पंख पसारे हुए है। लोहा, तेल, केमिकल और कई क्षेत्रों में, उसका अरबों रुपये का कारोबार, निरंतर प्रगति पर है। देश ही नहीं, विदेशों में भी उसके कई इंजीनियरिंग और प्रबंधकीय संस्थान चलते हैं। अब तो देश की सरकार भी निवेश के लिए उसका मुंह ताकती है। अरबों का स्वामी होने के बावजूद भी, उसे अपनी बीती कहानी बताने में कोई संकोच नहीं होता। वह कहीं भी किसी सम्मलेन आदि में जाता, अपनी कहानी बताकर लोगों को प्रेरणा देता रहता।
हर्ष पढ़ाई में तो फिसड्डी ही था। किसी तरह से वह ग्रेजुएट हो गया। नौकरी के लिए बहुत धक्के खाया पर कई वर्षों तक कोई ठीक ठाक काम नहीं मिल पाया। उसने फिर कबाड़ खरीदने और बेचने का काम प्रारम्भ किया। लोहा-लंगड़ आदि खरीद कर कारखानों में बेच देता, वहां पर गलाकर, उससे अन्य सामान तैयार किया जाता। इसमें उसे, अच्छा खासा लाभ होने लगा। धीरे धीरे, उसने लोहा गलाने की भट्ठी लगा ली और अब वह कबाड़ सीधे बेचने की जगह, लोहे की रॉड बनाकर बेचने लगा। यह काम पहले से अधिक लाभप्रद और सम्मान जनक भी था। बेचने के लिये जगह जगह जाने की छुट्टी हो गयी और वह स्वयं कबाड़ी की जगह एक छोटे मोटे कारखाने का मालिक बन गया। नोएडा में उसका कारखाना चलने लगा और उसने काम करने के लिए कुछ कर्मचारी भी रख लिये।
कुछ समय के बाद, उसके पास ताम्बा का भी कबाड़ आने लगा। हर्ष ने सोचा, बजाय इसे सीधा बेचने के, तार बनाकर बेचा जाय तो अच्छी कमाई भी होगी और एक कबाड़ीवाला से उद्योगपति हो जायेगा। परन्तु इसके लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता थी। अपना घर और गांव की जमीन बेचकर भी, उतनी पूंजी नहीं जुटा सकता था। उसने ऋण के लिए बैंकों से बात किया, पर कबाड़ के काम और छोटी सी भट्टी पर, बैंक ऋण देने को तैयार नहीं थे। कर्ज के लिए कोई जमानत लेने को भी तैयार नहीं था। ऋण नहीं मिलने से हर्ष बहुत मायूस था पर वह एक साहसी उद्यमी था। इतनी सरलता से हार मानने वाला नहीं था। उसने अपनी जमीन गिरवी रखकर, अपने गांव के ही साहूकार से कुछ रुपये उधार ले लिए। उसको अपनी आवश्यकता भर धन तो नहीं मिला पर गाड़ी को थोड़ी और गति मिल गयी। इसी बीच हर्ष की मुलाकात एक केबल निर्माता, विजय कुमार गुप्ता से हुई। जब हर्ष ने गुप्ता जी को अपनी योजना बताई तो वे उसकी उद्यमता से प्रभावित हुए और उसे सहयोग देने का भरोसा दिया। उन्होंने एक निजी बैंक से, उसे कुछ कर्ज दिलवा दिया। यही नहीं हर्ष के कारखाने में बने तार को भी अपने केबल के लिए खरीदने का करार कर लिया।
हर्ष का काम ठीक ठाक चलने लगा। वह एक महान उद्यमी था, अपने काम में निरंतर प्रगति देखना चाहता था। उसका काम तो ठीक चल रहा था, पर उसे आये दिन सरकारी एजेंसियों के उत्पीडन का सामना करना पड़ता था। कभी श्रम विभाग वाले, कभी बिजली वाले, कभी बिक्री कर, कभी उत्पाद शुल्क सभी से निपटना पड़ता था। इन सबसे हार मानने की बजाय, किसी न किसी तरह सब का प्रबंध कर लेता।
एक बार अख़बार में उसकी नजर लन्दन की एक कंपनी के टेंडर पर पड़ी। एक मोटर कंपनी को तांबे के तार निर्यात करने का टेंडर था। हर्ष ने सोचा, क्यों न इसमें किस्मत आजमाई जाय। उसे निर्यात का कोई अनुभव नहीं था, मगर उसके मन में जो आता उसे पूरा करने के लिए, पूरा जोर लगा देता। उसने निर्यात प्रबंध (एक्सपोर्ट मैनेजमेंट) की एक किताब खरीदी और निर्यात के बारे में अध्ययन करने लगा। साथ ही अपने एक कर्मचारी को पूर्ण रूप से इसी काम में लगा दिया। उसने अपनी कंपनी का नाम आयात निर्यात के लिए पंजीकृत करवाया। अब उसे एक बार फिर से ऋण और टेंडर के नियमों के अनुसार, बैंक गारंटी की आवश्यकता पड़ी। उसके पास काम बड़ा था और पूंजी बहुत छोटी। कोई भी बैंक उसके काम के लिए ऋण और गारंटी देने को तैयार नहीं था।
बड़ी मुश्किल से एक बैंक उसकी पूंजी के बराबर ऋण देने को तैयार हो गया। हर्ष की बुद्धि काम की, उसने बैंक से आग्रह किया कि वह टेंडर के हिसाब से ऋण की स्वीकृत दे दे और वास्तविक ऋण, पूंजी के ही बराबर जारी करे। जब वह ऋण पूरा हो जाये तो आगे के काम के लिए दूसरी किस्त दे। हो सकता है, उसी पैसे को घुमाकर वह आगे का काम चला ले। बैंक ने उसकी यह बात मान ली। हर्ष ने टेंडर भरा और उसकी किस्मत ने साथ दिया, कीमत सबसे कम होने के कारण, वह आर्डर उसे ही मिल गया। हर्ष के पास पूंजी तो थी नहीं कि वह सारा माल एक बार में भेज पाए, उसने आयातक से बहाना बनाया कि पहली खेप थोड़ा कम ही भेजेगा, ताकि माल के गुणवत्ता के बारे में वह आश्वस्त हो ले और आर्डर का शेष माल की यथाशीघ्र पूर्ति कर देगा। उसकी यह रणनीति काम आ गयी। उसकी पहली खेप पास हो गयी और पहली ही खेप में अच्छा ख़ासा लाभ मिल गया। फिर क्या था, पहली खेप का जो पैसा आया दूसरी खेप में, उसके दूना माल भेज दिया और तीसरी बार में सारा काम सफलता पूर्वक संपन्न कर दिया। अब हर्ष के व्यापार को पर लग चुके थे। बैंक का पैसा समय पर लौटा देने के कारण, उसे और ऋण लेने का आग्रह करने लगा।
इधर हर्ष को भी निर्यात का और बड़ा काम मिलने लगा। अब तो उसके पौ बारह थे। देखते ही देखते वह करोड़ों में खेलने लगा। कुछ ही वर्षों बाद वह लोहे और ताम्बा का एक बहुत बड़ा निर्यातक बन गया। हर्ष जिस चीज को हाथ लगाता सोना बन जाता। उसकी गिनती देश के धनाढ्य व्यक्तियों में होने लगी। उसका कारोबार इंगलैंड से अधिक सम्बंधित था, इस कारण लंदन आना जाना बहुत होता। कई बार तो महीनों लंदन में ही बीत जाते। धीरे धीरे उसे लंदन ही भाने लगा और वहां अपना स्थाई निवास बना लिया। अब तो स्वदेश कभी कभी आता।
एक बार हर्ष भारत आया हुआ था, वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज में एक सेमीनार में गया तो वहां एक व्यक्ति जो सेमीनार के प्रबंध में लगा था, जाना पहचाना सा लगा। हर्ष ने उससे पूछा, 'तुषार!'
उत्तर मिला 'हां, और कैसे हैं सर, आपने पहचान लिया! कितने वर्षों बाद मिले हैं। '
'अरे, क्यों नहीं पहचानेंगे, चलो सेमीनार के ब्रेक में मिलना। '
तुषार प्राथमिक कक्षा में, हर्ष के साथ पढ़ा था। उसे देखकर हर्ष को अपना बचपन याद आ गया। बात चीत से पता चला कि तुषार उसी कॉलेज में कार्यालय अधीक्षक है। हर्ष का उससे बात करने का मन हो आया और तुषार को अगले दिन होटल में आमंत्रित कर लिया, 'कल शाम मेरे होटल आ जाओ, खाना साथ खाते हैं, हां समय का ख्याल रखना, शाम ठीक सात बजे होटल पहुँच जाना। उसके बाद और किसी से भी मिलना है। '
तुषार घर जाकर हर्ष की तारीफ के पुल बांध दिया। अपनी माँ और पत्नी से बार बार कहता, 'देखो कितना बड़ा आदमी है, अरबपति और मुझ जैसे को फाइव स्टार होटल में खाने पर बुलाया है। '
तुषार पहली बार फाइव स्टार होटल में खाना खाने पहुंचा। मेज पर पड़े मेन्यू को उठाकर पलटने लगा। मेन्यू में खाने का रेट देखकर, उसके तोते उड़े हुए थे।
'बोलो क्या लोगे?' हर्ष ने पूछा।
'आप ही अपनी मर्जी से आर्डर कर दीजिये। मुझे तो यहाँ कुछ समझ ही नहीं आ रहा। '
'ड्रिंक-व्रिंक लेते हो न ?'
'कभी कभार, बियर ले लेता हूँ। '
'वेटर! एक बियर और एक लार्ज स्कॉच, साथ ये ये स्नैक्स। बाकी खाने का उसके बाद बताते हैं।'
बातचीत प्रारम्भ हुई। पुरानी यादें ताजा करके, हर्ष को बड़ा आनंद आ रहा था। तुषार एक एक कर सब बातें उसे बताता तो हर्ष हां में हाँ मिलाता। हर्ष तो अपने काम में इतना व्यस्त रहता था, अब तक इतनी सब बातें उसे कहाँ याद रहेंगी। छुटपुट एकाध बात उसे याद थी, बीच बीच में दाग देता।
उसने तुषार से पूछा, 'कभी लंदन गए हो ?'
'मेरे नसीब में कहां सर, बहुत से लोग पैसे कमाने के लिए विदेश चले जाते हैं और आप जैसे लोग अधिक पैसे कमा लेने के कारण चले गए। मैं तो किसी भी श्रेणी में नहीं आता। ग्रेजुएशन के बाद मैंने भी सोचा, अमेरिका चला जाऊं, वहां ज्यादा कमा सकूंगा। मगर, उसके लिए भी पैसे की जरूरत थी, जुगाड़ नहीं हो पाया। यहीं एक इंजीनियरिंग कॉलेज में क्लर्क की नौकरी मिल गयी, प्रमोशन के बाद सुपरिन्टेन्डेन्ट बन गया हूँ। मुझे तो अपना ही देश सबसे अच्छा लगता है। देखेंगे कभी नसीब हुआ तो घूम फिर आएंगे। '
'बिल्कुल सही कह रहे हो तुषार। मातृभूमि तो अच्छी लगती ही है। देखो, पेड़ की शाखायें चाहे कितनी ही दूर तक फैली हों लेकिन महत्त्व जड़ का अधिक होता है। क्योंकि पेड़ उसी स्थान पर उगता है, जहां बीज गड़ा होता है।
ये लो मेरा कार्ड, जब कभी घूमने आना हो मैसेज कर देना, तुम्हारा टिकट मैं अपनी कंपनी से करवा दूंगा। और हाँ, भाभी को भी साथ लाना। तुमसे बात करके बहुत अच्छा लगा, बचपन की बातें एक बार फिर ताजा हो आयीं। ठीक है चलो; अभी साढ़े नौ बजे, मेरा किसी से अपॉइंटमेंट है।'
आज के आधुनिक और व्यस्तम जीवन में भी साहित्य के प्रति लोगों की रूचि देखते ही बनती है। साहित्य में काव्य का अपना एक अलग ही महत्त्व है। कविता अनंत काल से अपना स्थान बनाये हुए है। कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज जब कठिन और जटिल परिस्थितियों में होता है कवि या लेखक अपनी लेखनी के द्वारा, उसे उबारने में बड़ी भूमिका निभाता है। समय और समाज परिवर्तनशील हैं। तदनुसार हिंदी कविता भी अपना स्वरुप बदलती रही है, परन्तु हर रूप में उसका उद्देश्य एक ही रहा है, समाज को सजग और जागृत रखना। हिंदी काव्य विधा के अनेकों रूप हैं और सभी अत्यंत रुचिकर तथा लोकप्रिय होने के साथ सामाजिक चेतना हेतु सशक्त हैं। काव्य की कई विधाओं में सुर और तुक के अनिवार्य नियम होने के फलस्वरूप, अनेकों कवि बहुत अच्छे भाव होते हुए भी अपनी बात को काव्य में नहीं ढाल पाते। इस कारण बहुत से कवियों ने अतुकांत कविता का सहारा लिया और अनेकों कवितायेँ मर गयीं।
हाइकु भी अतुकांत कविता का एक सूक्षतम रूप है, अपितु कह सकते हैं अब तक की अपनाई जाने वाली किसी भी विधा का सबसे सूक्ष्म रूप है। हाइकु की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह एक जापानी विधा होने के बावजूद, संसार के कोने कोने तक पहुंच चुका है और हर भाषा में खूब बढ़ चढ़ कर लिखा जा रहा है। संचार क्रान्ति ने इसके प्रचार प्रसार में और भी अधिक योगदान दिया।
अब्दुल समद राही जी, एक कवि और प्रकाशक दोनों ही रूप में अद्वितीय और सराहनीय कार्य में रत हैं। उनके साथ मैं काफी समय से फेसबुक पर जुड़ा हुआ हूँ। उनकी रचनाओं समाज, राजनीति, प्रकृति, जीवन, सिद्धान्त आदि सभी विषय समाहित हैं। उनके हाइकु रचनाओं में भी इन विषयों का अनुभव किया जा सकता है। उनके रची कुछ हाइकु निम्न हैं -
प्रेम और मित्रता से सम्बंधित -
याद तुम्हारी
हंसती मुस्कराती
साथ रहती
दीपक के माध्यम से मानव व्यव्हार पर आघात
तोड़ता भ्रम
घने अंधेरों का भी
एक दीपक
प्रकृति से सम्बंधित -
उदास उडी
चमन से तितली
टूटा गुलाब
जीवन संबंधी -
नारी बुनती
खुशियों की चादर
दर्द सहती
जीवन और पर्यावरण से सम्बंधित
खड़ा है ठूंठ
बतियाते हैं लोग
देता था छाँव
उनके हाइकु संकलन के प्रकाशन पर, उन्हें हार्दिक शुभकामनायें देता हूँ और सफलता की कामना करता हूँ।
एस० डी० तिवारी