बचपन में महेंद्र को ननिहाल से बड़ा प्यार मिला था। उसका ननिहाल अपने गांव से तीन-चार किलोमीटर की ही दूरी पर था और स्कूल गांव व नानी के घर के बीच। अधिकतर, वह शनिवार को विद्यालय से सीधे नानी के यहां चला जाता और सोमवार को स्कूल पूरा करके घर आता था। नानी तो प्यार करती ही थीं मामा मामी भी कुछ कम नहीं ।
उसके पहुंचते ही नानी बेकल हो जाती थीं। क्या खिला दूँ, क्या पिला दूँ । मामी को आवाज लगातीं -
'अरे कुछ खाने को है, देख नाती आया है, लाओ कुछ। कहाँ सब मर गयीं, देखो मिठाई पड़ी होगी, ले आओ और चावल दाल भी रखा होगा गरम करके दे देना, अभी स्कूल से आया है, भूखा होगा। ''नहीं नानी, मिठाई ले लेता हूँ और कुछ अभी नहीं खाऊंगा। '
'कैसे नहीं खायेगा! सीधे स्कूल से आया है, भूख लगी होगी। '
नहीं मानतीं, महेंद्र को कुछ खाना ही पड़ता।
मामा भी रविवार को प्रातः साथ ले लेते और लेकर खेत की ओर घुमाने चले जाते । महेंद्र, कौन सी फसल कब होती है, कितने दिन में होती है आदि प्रश्न पूछता रहता, मामा उत्तर देते रहते।
महेंद्र, पढने में तेज था, बड़ा हुआ, इंजीनियर बन गया। उसके साथ पढ़े एक लडके सत्येन्द्र का भाई कनाडा रहता था, अतः वह भी नौकरी करने वहीं चला गया। सत्येन्द्र एक बार जब कनाडा से आया तो वहां के रहन सहन के बारे में महेंद्र से चर्चा किया। थोड़ा बहुत तो वहां के शानदार जीवन के बारे में महेंद्र सुन रखा था जब सत्येन्द्र के मुख से सुना तो बहुत अच्छा लगा। उसे और जानने की उत्सुकता होती और एक बार कनाडा देखने की जिज्ञासा। सत्येन्द्र ने उसे वहां के बारे में सब बताया। वहां का रहन सहन, वहां की सुख सुविधा, वहां का खान पान आदि सब। और साथ भरोसा भी दिया की वह वहां आने में जो हो सकेगा मदद करेगा ।आखिर बचपन का मित्र जो ठहरा। भाग्य ने साथ दिया, महेंद्र कनाडा चला गया और कुछ वर्ष में वह वहां का स्थाई निवासी भी हो गया। जब वह छुट्टियों में इंडिया आया तो ननिहाल भी गया। कनाडा की सुंदरता और वहां के विलासपूर्ण जीवन के बारे में जिससे भी बताता उसके मन में वहां एक बार जाने की इच्छा अवश्य उतपन्न हो जाती । उसने मामा से कहा 'मामा आपको एक बार तो कनाडा चलना ही चाहिए । आपने इतना प्यार दिया है, अब एक बार कनाडा घुमाने का मुझे अवसर अवश्य दें। '
'ठीक है, अगली बार जब आओगे तो चलेंगे। '
धीरे धीरे समय बीता। कुछ वर्ष पश्चात महेंद्र पुनः भारत आया और मामा जी को कनाडा जाने का अवसर मिल ही गया। मामा जी एक महीने के लिए कनाडा पहुँच गए। मामी का स्वास्थ ठीक नहीं रहने के कारण साथ नहीं जा पाईं। वहां का अनुशासन, साफ सफाई और सब कुछ व्यस्थित देख कर मामा का मन मुग्ध हो गया। महेंद्र को जब जब समय मिलता दर्शनीय स्थल दिखा देता। बस सप्ताह के अंत में ही दो दिन का समय होता। शेष दिन तो काम पर जाना होता। वहां पर काम के बीच में समय निकालना लगभग असंभव ही होता है।
कहीं घूमने फिरने जाते तो मामा को खाने पीने की बड़ी दिक्कत होती थी। वे शुद्ध शाकाहारी थे, अतः महेंद्र और उसकी पत्नी उषा घर से ही खाना बना कर ले जाते। एक दिन घर से दूर एक पर्यटन स्थल देखने जाना था। दूर होने के कारण सुबह जल्दी ही घर से निकलना था। उषा इतनी सुबह खाना बना नहीं पाई। फिर ये हुआ कि बाहर ही कहीं इंडियन रेस्तरां में कुछ खा पी लेंगे। कुछ इस तरह के हालात बने, रास्ते में कहीं इंडियन रेस्तरां नहीं मिला। बस मैक्डॉनल्ड या पिज्जा हट ही मिलते थे। कुछ खाना तो था ही, वे मैकडोनाल्ड में घुस गए। मामा जी का दुर्भाग्य, वहां शाकाहारी बर्गर, पिज्जा भी नहीं मिला अंततः उन्हें फ्रेंच फ्राइज यानि तले हुये आलू की फांकें खा कर दिन बिताना पड़ा।
घर आकर मामाजी का कनाडा के आलोचना का दौर शुरू हुआ।
'बताओ यहाँ कुछ खाने लायक भी नहीं मिलता, हम लोग तो यहाँ रह ही नहीं सकते। सबकुछ मांसाहारी, आलू के चिप्स खाकर गुजर करना पड़ा। '
उषा बोल पड़ी ' मामा जी, यहाँ स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं, मांसाहार में अधिक पौष्टिक तत्व होते हैं। '
मामाजी विदक गये ' कौन कहता है ? मैं तो कहता हूँ, शाकाहार अधिक पौष्टिक होता है। इंडिया में कौन सा लोग अस्वस्थ होते हैं, हमारे मसालों में कितने गुण होते हैं इनको तो पता भी नहीं होगा। कई रोगों का मसाले स्वतः ही निदान कर देते हैं। '
'यहाँ शाकाहार के नाम पर, तले आलू बस!'
उषा खुद को रोक नहीं पाई, बोल पड़ी, ' वह भी क्या गारंटी कि उसी तेल में न तले हों जिसमे मछली व चिकन तलते हों। '
महेंद्र - हाँ वैसे तो ये मांसाहारी रेस्तरां ही हैं, तेल बदलते थोड़े ही होंगे।
अब तो मामा जी के काटो तो खून नहीं। भड़क उठे।
'तू जरूर मेरा धर्म भ्रष्ट करायेगा। अब से बाहर का कुछ भी नहीं खिलाना। '
बड़ी मुश्किल से महेंद्र ने मामा को मनाया।
जब महेंद्र उन्हें बर्फीले पर्वत दिखने ले गया। वहां की ठण्ड साधारण गरम कपड़ों से जाने वाली नहीं थी। उनके लिए एक भारी भरकम जैकेट जिसमे टोपी भी लगी थी, गरम पायजामा और दस्ताना खरीद दिया। शुरू में जैकेट में लगी टोपी उन्हें अजीब सी लगी। बार बार कहते, यह पहन कर कैसा लगूंगा। मगर जब वहां पहुंचे तो सबसे पहले वे टोपी लगाये दिखे।
'बताओ यहाँ कुछ खाने लायक भी नहीं मिलता, हम लोग तो यहाँ रह ही नहीं सकते। सबकुछ मांसाहारी, आलू के चिप्स खाकर गुजर करना पड़ा। '
उषा बोल पड़ी ' मामा जी, यहाँ स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं, मांसाहार में अधिक पौष्टिक तत्व होते हैं। '
मामाजी विदक गये ' कौन कहता है ? मैं तो कहता हूँ, शाकाहार अधिक पौष्टिक होता है। इंडिया में कौन सा लोग अस्वस्थ होते हैं, हमारे मसालों में कितने गुण होते हैं इनको तो पता भी नहीं होगा। कई रोगों का मसाले स्वतः ही निदान कर देते हैं। '
'यहाँ शाकाहार के नाम पर, तले आलू बस!'
उषा खुद को रोक नहीं पाई, बोल पड़ी, ' वह भी क्या गारंटी कि उसी तेल में न तले हों जिसमे मछली व चिकन तलते हों। '
महेंद्र - हाँ वैसे तो ये मांसाहारी रेस्तरां ही हैं, तेल बदलते थोड़े ही होंगे।
अब तो मामा जी के काटो तो खून नहीं। भड़क उठे।
'तू जरूर मेरा धर्म भ्रष्ट करायेगा। अब से बाहर का कुछ भी नहीं खिलाना। '
बड़ी मुश्किल से महेंद्र ने मामा को मनाया।
मामा जी दिन भर घर में अकेले रहते। महेंद्र ने टी.वी. पर हिंदी चॅनेल ले रखा था, उनका समाचार देखते काफी समय निकल जाता। कनाडा के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था, अतः अकेले घूम भी नहीं सकते थे। घर में ही इधर उधर चहल कदमी कर लिए, चाय बनाकर पी लिए, थोड़ा सो लिए और महेंद्र तथा गीता के आने की प्रतीक्षा करते रहते। कभी कभी घर से निकल जाते और पास के पार्क तक हो आते। राह में भवन और उन पर टंगे बोर्ड, गर्दन घुमा घुमा कर देखते रहते। उन्हें देख कर कोई भी सरलता से समझ सकता था कि वे इस देश में पहली बार आये हैं।
मामा को भारत में कई जगह घूमने का अनुभव था, थोड़ी बहुत अंग्रेजी बोलना जानते थे। सोचे, चल कर कहीं घूम आते हैं। महेंद्र ने उन्हें क्रडिट कार्ड दे रखा था जो रेल, बस आदि में किराया देने के लिए प्रयोग किया जा सकता था और उन्हें समझा रखा था उसका कैसे प्रयोग करना है। मामा जी घर से निकले। महेंद्र ओटावा नगर के कार्ला एवेन्यू में रहता था। मामा ने रिडो कैनाल जाने का निर्णय लिया। कार्ला एवेन्यू से कैनाल तक सीधी बस सुविधा थी। मामा, कोई पांच छ मिनट पैदल चल कर बस स्टॉप पहुंचे और बस में सवार हुए। वहां बस में कोई कंडक्टर नहीं होता। चालक की निगरानी में लोग कार्ड पंच कर देते हैं। जिसके पास कार्ड नहीं होते चालक को ही पैसे देकर टिकट ले लेता है । मामा के पास तो कार्ड था ही वे पंच करके आराम से सीट पर बैठ गए। बस में कोई भीड़ भाड़ नहीं थी न ही कोई ट्रैफिक जाम मिला। वे कैनाल पहुँच गए पर उतरते समय दुबारा कार्ड पांच नहीं किया।
वहां पर मामा जी को शौच जाने की आवश्यकता पड़ गयी। कनाडा में शौचालयों की कमी नहीं है, जगह जगह सार्वजानिक शौचालय बने हैं। इसके अतिरिक्त मैक्डॉनल्ड आदि रेस्तरां में भी शौचालय उपलब्ध होते हैं। यहाँ मामा जी को एक बात बड़ी अटपटी लगी, शौचालय में फ्लश के अतिरिक्त पेपर रोल तो रखे हैं पर कोम्बोट के पास कोई नल नहीं है। हाँ, वाश बेसिन और वहां साबुन का घोल अवश्य है और गीले हाथ सुखाने के मशीन भी लगी है। मगर शौच के बाद टॉयलेट पेपर से वे संतुष्ट नहीं थे। वहां पर कोई मग या बर्तन भी नहीं था अतः वे जो पीने के पानी की बोतल ले गए थे उसका प्रयोग कर समस्या का हल ढूंढ लिया । वापस आने पर महेंद्र से घूमने का वृतांत बताये तो महेंद्र माथा पीट लिया। मामा, उतरते समय भी कार्ड पंच करना होता है अब तो अंतिम गंतव्य तक का किराया कट चुका होगा।
एक बार वे स्मार्ट कार्ड नहीं ले गए। ड्राइवर ने उन्हें पेंशनर टिकट दे दिया। पेंशनर टिकट पूरे दिन के लिए नाम मात्र किराये पर मिल जाता था। वे घूम कर आ तो गए पर महेंद्र ने आगे से ऐसा न करने की चेतावनी भी दिया। अगर जाँच में पेंशनर कार्ड मांग दिया होता और नहीं दिखा पाते तो भारी जुरमाना देना पड़ सकता था।
एक दिन दोपहर के बाद खा पीकर वे पार्क में चले गए। थोड़ा समय बिताकर वापस आये तो पता चला कि वे चाभी घर पर ही छोड़ गए थे। महेंद्र जिस फ्लैट में रहता है जिसमे दो ताले खोल कर फ्लैट में प्रवेश करना होता है। एक भवन का मुख्य द्वार और दूसरा फ्लैट का द्वार। दोनों ही ताले खुलते तो चाभी से थे, बंद अपने आप ही हो जाते । मामा जी अब क्या करें, महेंद्र व उषा के काम से आने में अभी काफी समय था। उन्हें सूझा कि मुख्य द्वार पर लगी किसी और की घंटी का बटन दबा के द्वार खुलवा ले पर भाषा की समस्या और उससे भी क्या हल होगा। यहाँ तो कोई अपने यहाँ कुछ देर बिठाता भी नहीं। और यह भी गारंटी नहीं कि दिन में घर में कोई हो भी। दूसरा उपाय था गैराज के द्वार पर खड़े हो जाएँ और किसी गाड़ी के आने की प्रतीक्षा करें। जैसे गाड़ी वाला गैराज खोले उसमे से होकर फ्लैट तक पहुँच जाएँ। मगर फिर वही होगा - आकाश से गिरे खजूर में अटके। पूरी माथा पच्ची करने के पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक डेढ़ घंटे और आस पास घूम ले तब तक महेंद्र गीता आ ही जायेंगे। मामाजी भवन के पास वाली गली में घूम ही रहे थे कि समीप ही दूसरे भवन में रहने वाला मोहित वहां से गुजरा। वह मामाजी को पहले भी उधर चहलकदमी करते देख चुका था । उसने गाड़ी रोक कर पूछ लिया, 'भारत से, अंकल जी ?'
मामा ने उत्तर दिया 'हाँ '
'टहल रहे हैं ?'मामाजी ने पूरी कहानी बताई।
मोहित - 'यह तो जानता हूँ यहाँ कोई भारतीय ही रहता है पर अभी तक महेंद्र से सीधे परिचय नहीं हुआ इस कारण मेरे पास उसका फोन नंबर भी नहीं है। अंकल जी, मैं भी पास में ही रहता हूँ, आ जाओ वहां बैठो, चाय पानी पियो तब तक वह आ ही जायेगा। मोहित मामाजी को लेकर अपने घर चला गया।
इधर महेंद्र घर पर फोन कर रहा था, कोई उत्तर नहीं मिल रहा था । सोचा, आज जल्दी निकल चलते है, मां जी को लेकर किसी मॉल में कुछ खरीददारी कर लेंगे । गीता को भी जल्दी निकलने को कह दिया। घर आया तो देखा मामाजी नदारद। जल्दी से पार्क की ओर गया, पास के बाजार में दुकानो में ढूँढा मामाजी का कोई पता नहीं। हताश होकर घर लौट आया। देखा तो घर की दूसरी चाभी भी खूंटी पर ही टंगी है। दोनों चिंतिति होने लगे। आखिर मामाजी बिना बताये कहाँ चले गए? कहीं भूल भुला गए तो बड़ी समस्या हो जाएगी। उन्हें यहाँ के बारे में ज्यादा कुछ पता भी नहीं है और हम कहाँ ढूंढेंगे। मगर ऐसे वे जाएंगे कहाँ ! उसने पूछने के लिए कई दोस्तों को भी फोन कर दिया। घर के बाहर खड़े होकर इधर उधर देख रहा था कि मामाजी मोहित के साथ चले आ रहे हैं। अब महेंद्र के जान में जान आई।
मामा जी कनाडा में महीने भर रहे। महेंद्र ने उन्हें खूब घुमाया और वे भरपूर आनंद उठाये। महेंद्र ने उनके लिये और मामी के लिए कई सामान खरीद दिया था। मामा को जो भी सामान पसंद आता, महेंद्र उसे खरीद देता। महेंद्र का यह सम्मान देख कर मामा जी गदगद थे । वे प्रसन्नता पूर्वक विदा हो गए। महेंद्र एयरपोर्ट उन्हें छोड़ने गया। मामा जी हाथ के बैग के अलावा उड़ान में केवल २० किलोग्राम सामान ही ले जा सकते थे। महेंद्र ने काफी सामान खरीद रखा था और गरम कपडे भी थे अतः उनका सामान २ किलो अधिक निकला। अब बड़ी उलझन पड़ी उसमे से क्या निकाल कर कम करें। क्योंकि उसका किराया सामान की कीमत से भी अधिक था। बामशक्कत एक दो सामान निकल एक किलो वजन कम किये, अनुनय करने पर एक किलो के लिए एयरलाइन्स वाले मान गए। मामा जी सकुशल वापस घर पहुंचे।
वे वहां कनाडा की आलोचना बेशक कर लेते हों मगर इंडिया आकर तारीफ करते नहीं अघाते।