Thursday, 9 July 2015

Fanse O mama

बचपन में महेंद्र को ननिहाल से बड़ा प्यार मिला था।  उसका ननिहाल अपने गांव से तीन-चार किलोमीटर की ही दूरी पर था और स्कूल गांव व नानी के घर के बीच। अधिकतर, वह शनिवार को विद्यालय से सीधे नानी के यहां चला जाता और सोमवार को स्कूल पूरा करके घर आता था।  नानी तो प्यार करती ही थीं मामा मामी भी कुछ कम नहीं ।
उसके पहुंचते ही नानी बेकल हो जाती थीं।  क्या खिला दूँ, क्या पिला दूँ । मामी को आवाज लगातीं -
'अरे कुछ खाने को है, देख नाती आया है, लाओ कुछ। कहाँ सब मर गयीं,  देखो मिठाई पड़ी होगी, ले आओ और चावल दाल भी रखा होगा गरम करके दे देना, अभी स्कूल से आया है, भूखा होगा। '
'नहीं नानी, मिठाई ले लेता हूँ और कुछ अभी नहीं खाऊंगा। ' 
'कैसे नहीं खायेगा! सीधे स्कूल से आया है, भूख लगी होगी। '
नहीं मानतीं, महेंद्र को कुछ खाना ही पड़ता।
मामा भी रविवार को प्रातः साथ ले लेते और लेकर खेत की ओर घुमाने चले जाते । महेंद्र, कौन सी फसल कब होती है, कितने दिन में होती है आदि प्रश्न पूछता रहता, मामा उत्तर देते रहते।

महेंद्र, पढने में तेज था, बड़ा हुआ, इंजीनियर बन गया। उसके साथ पढ़े एक लडके सत्येन्द्र का भाई कनाडा रहता था, अतः वह भी नौकरी करने वहीं चला गया। सत्येन्द्र एक बार जब कनाडा से आया तो वहां के रहन सहन के बारे में महेंद्र से चर्चा किया। थोड़ा बहुत तो वहां के शानदार जीवन के बारे में महेंद्र सुन रखा था जब सत्येन्द्र के मुख से सुना तो बहुत अच्छा लगा। उसे और जानने की उत्सुकता होती और एक बार कनाडा देखने की जिज्ञासा। सत्येन्द्र ने उसे वहां के बारे में सब बताया।  वहां का रहन सहन, वहां की सुख सुविधा, वहां का खान पान आदि सब। और साथ भरोसा भी दिया की वह वहां आने में जो हो सकेगा मदद करेगा ।आखिर बचपन का मित्र जो ठहरा। भाग्य ने साथ दिया, महेंद्र कनाडा चला गया और कुछ वर्ष में वह वहां का स्थाई निवासी भी हो गया। जब वह छुट्टियों में इंडिया आया तो ननिहाल भी गया।  कनाडा की सुंदरता और वहां के विलासपूर्ण जीवन के बारे में जिससे भी बताता उसके मन में वहां एक बार जाने की इच्छा अवश्य उतपन्न हो जाती । उसने मामा से कहा 'मामा आपको एक बार तो कनाडा चलना ही चाहिए । आपने इतना प्यार दिया है, अब एक बार कनाडा घुमाने का मुझे अवसर अवश्य दें। '
'ठीक है, अगली बार जब आओगे तो चलेंगे। '  

धीरे धीरे समय बीता। कुछ वर्ष पश्चात महेंद्र पुनः भारत आया और मामा जी को कनाडा जाने का अवसर मिल ही गया। मामा जी एक महीने के लिए कनाडा पहुँच गए। मामी का स्वास्थ ठीक नहीं रहने के कारण साथ नहीं जा पाईं। वहां का अनुशासन, साफ सफाई और सब कुछ व्यस्थित देख कर मामा का मन मुग्ध हो गया। महेंद्र को जब जब समय मिलता दर्शनीय स्थल दिखा देता। बस सप्ताह के अंत में ही दो दिन का समय होता।  शेष दिन तो काम पर जाना होता।  वहां पर काम के बीच में समय निकालना लगभग असंभव ही होता है।

कहीं घूमने फिरने जाते तो मामा को खाने पीने की बड़ी दिक्कत होती थी। वे शुद्ध शाकाहारी थे, अतः महेंद्र और उसकी पत्नी उषा घर से ही खाना बना कर ले जाते।  एक दिन घर से दूर एक पर्यटन स्थल देखने जाना था।  दूर होने के कारण सुबह जल्दी ही घर से निकलना था।  उषा इतनी सुबह खाना बना नहीं पाई।  फिर ये हुआ कि बाहर ही कहीं इंडियन रेस्तरां में कुछ खा पी लेंगे। कुछ इस तरह के हालात बने, रास्ते में कहीं इंडियन रेस्तरां नहीं मिला। बस मैक्डॉनल्ड या पिज्जा हट ही मिलते थे। कुछ खाना तो था ही, वे मैकडोनाल्ड में घुस गए।  मामा जी का दुर्भाग्य, वहां शाकाहारी बर्गर, पिज्जा भी नहीं मिला अंततः उन्हें फ्रेंच फ्राइज यानि तले हुये आलू की फांकें खा कर दिन बिताना पड़ा। 
घर आकर मामाजी का कनाडा के आलोचना का दौर शुरू हुआ।
'बताओ यहाँ कुछ खाने लायक भी नहीं मिलता, हम लोग तो यहाँ रह ही नहीं सकते। सबकुछ मांसाहारी, आलू के चिप्स खाकर गुजर करना पड़ा। '
उषा बोल पड़ी ' मामा जी, यहाँ स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं, मांसाहार में अधिक पौष्टिक तत्व होते हैं। '
मामाजी विदक गये ' कौन कहता है ? मैं तो कहता हूँ, शाकाहार अधिक पौष्टिक होता है।  इंडिया में कौन सा लोग अस्वस्थ होते हैं, हमारे मसालों में कितने गुण होते हैं इनको तो पता भी नहीं होगा।  कई रोगों का मसाले स्वतः ही निदान कर देते हैं। '
'यहाँ शाकाहार के नाम पर, तले आलू बस!'
उषा खुद को रोक नहीं पाई, बोल पड़ी, ' वह भी क्या गारंटी कि उसी तेल में न तले हों जिसमे मछली व चिकन तलते हों। '
महेंद्र - हाँ वैसे तो ये मांसाहारी रेस्तरां ही हैं, तेल बदलते थोड़े ही होंगे।
अब तो मामा जी के काटो तो खून नहीं। भड़क उठे।
'तू जरूर मेरा धर्म भ्रष्ट करायेगा। अब से बाहर का कुछ भी नहीं खिलाना। '
बड़ी मुश्किल से महेंद्र ने मामा को मनाया।     

मामा जी दिन भर घर में अकेले रहते।  महेंद्र ने टी.वी. पर हिंदी चॅनेल ले रखा था, उनका समाचार देखते काफी समय निकल जाता। कनाडा के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था, अतः अकेले घूम भी नहीं सकते थे।  घर में ही इधर उधर चहल कदमी कर लिए, चाय बनाकर पी लिए, थोड़ा सो लिए और महेंद्र तथा गीता के आने की प्रतीक्षा करते रहते। कभी कभी घर से निकल जाते  और पास के पार्क तक हो आते।  राह में भवन और उन पर टंगे बोर्ड, गर्दन घुमा घुमा कर देखते रहते।  उन्हें देख कर कोई भी सरलता से समझ सकता था कि वे इस देश में पहली बार आये हैं।

मामा को भारत में कई जगह घूमने का अनुभव था, थोड़ी बहुत अंग्रेजी बोलना जानते थे।  सोचे, चल कर कहीं घूम आते हैं।  महेंद्र ने उन्हें क्रडिट कार्ड दे रखा था जो रेल, बस आदि में किराया देने के लिए प्रयोग किया जा सकता था और उन्हें समझा रखा था उसका कैसे प्रयोग करना है। मामा जी घर से निकले। महेंद्र ओटावा नगर के कार्ला एवेन्यू में रहता था। मामा ने रिडो कैनाल जाने का निर्णय लिया। कार्ला एवेन्यू से कैनाल तक सीधी बस सुविधा थी। मामा, कोई पांच छ मिनट पैदल चल कर बस स्टॉप पहुंचे और बस में सवार हुए। वहां बस में कोई कंडक्टर नहीं होता। चालक की निगरानी में लोग कार्ड पंच कर देते हैं। जिसके पास कार्ड नहीं होते चालक को ही पैसे देकर टिकट ले लेता है । मामा के पास तो कार्ड था ही वे पंच करके आराम से सीट पर बैठ गए। बस में कोई भीड़ भाड़ नहीं थी न ही कोई ट्रैफिक जाम मिला। वे कैनाल पहुँच गए पर उतरते समय दुबारा कार्ड पांच नहीं किया।  

वहां पर मामा जी को शौच जाने की आवश्यकता पड़ गयी।  कनाडा में शौचालयों की कमी नहीं है, जगह जगह सार्वजानिक शौचालय बने हैं।  इसके अतिरिक्त मैक्डॉनल्ड आदि रेस्तरां में भी शौचालय उपलब्ध होते हैं। यहाँ मामा जी को एक बात बड़ी अटपटी लगी, शौचालय में फ्लश के अतिरिक्त पेपर रोल तो रखे हैं पर कोम्बोट के पास कोई नल नहीं है। हाँ, वाश बेसिन और वहां साबुन का घोल अवश्य है और गीले हाथ सुखाने के मशीन भी लगी है। मगर शौच के बाद टॉयलेट पेपर से वे संतुष्ट नहीं थे।  वहां पर कोई मग  या बर्तन भी नहीं था अतः वे जो पीने के पानी की बोतल ले गए थे उसका प्रयोग कर समस्या का हल ढूंढ लिया । वापस आने पर महेंद्र से घूमने का वृतांत बताये तो महेंद्र माथा पीट लिया।  मामा, उतरते समय भी कार्ड पंच करना होता है अब तो अंतिम गंतव्य तक का किराया कट चुका होगा। 

एक बार वे स्मार्ट कार्ड नहीं ले गए।  ड्राइवर ने उन्हें पेंशनर टिकट दे दिया।  पेंशनर टिकट पूरे दिन के लिए नाम मात्र किराये पर मिल जाता था।  वे घूम कर आ तो गए पर महेंद्र ने आगे से ऐसा न करने की चेतावनी भी दिया। अगर जाँच में पेंशनर कार्ड मांग दिया होता और नहीं  दिखा पाते तो भारी जुरमाना देना पड़ सकता था।  

जब महेंद्र उन्हें बर्फीले पर्वत दिखने ले गया।  वहां की ठण्ड साधारण गरम कपड़ों से जाने वाली नहीं थी।  उनके लिए एक भारी भरकम जैकेट जिसमे टोपी भी लगी थी, गरम पायजामा और दस्ताना खरीद दिया। शुरू में जैकेट में लगी टोपी उन्हें अजीब सी लगी। बार बार कहते, यह पहन कर कैसा लगूंगा।  मगर जब वहां पहुंचे तो सबसे पहले वे टोपी लगाये दिखे।  

एक दिन दोपहर के बाद खा पीकर वे पार्क में चले गए।  थोड़ा समय बिताकर वापस आये तो पता चला कि वे चाभी घर पर ही छोड़ गए थे। महेंद्र जिस फ्लैट में रहता है जिसमे दो ताले खोल कर फ्लैट में प्रवेश करना होता है। एक भवन का मुख्य द्वार और दूसरा फ्लैट का द्वार।  दोनों ही ताले खुलते तो चाभी से थे, बंद अपने आप ही हो जाते । मामा जी अब क्या करें, महेंद्र व उषा  के काम से आने में अभी काफी समय था। उन्हें सूझा कि मुख्य द्वार पर लगी किसी और की घंटी का बटन दबा के द्वार खुलवा ले पर भाषा की समस्या और उससे भी क्या हल होगा। यहाँ तो कोई अपने यहाँ कुछ देर बिठाता भी नहीं। और यह भी गारंटी नहीं कि  दिन में घर में कोई हो भी। दूसरा उपाय था गैराज के द्वार पर खड़े हो जाएँ और किसी गाड़ी के आने की प्रतीक्षा करें।  जैसे गाड़ी वाला गैराज खोले उसमे से होकर फ्लैट तक पहुँच जाएँ।  मगर फिर वही होगा - आकाश से गिरे खजूर में अटके। पूरी माथा पच्ची करने के पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक डेढ़ घंटे और आस पास घूम ले तब तक महेंद्र गीता आ ही जायेंगे। मामाजी भवन के पास वाली गली में घूम ही रहे थे कि समीप ही दूसरे भवन में रहने वाला मोहित वहां से गुजरा। वह मामाजी को पहले भी उधर चहलकदमी करते देख चुका था । उसने गाड़ी रोक कर पूछ लिया, 'भारत से, अंकल जी ?'
मामा ने उत्तर दिया 'हाँ '
'टहल रहे हैं ?'
मामाजी ने पूरी कहानी बताई।
मोहित - 'यह तो जानता हूँ यहाँ  कोई भारतीय ही रहता है पर अभी तक महेंद्र से सीधे परिचय नहीं हुआ इस कारण मेरे पास उसका फोन नंबर भी नहीं है। अंकल जी, मैं भी पास में ही रहता हूँ, आ जाओ वहां बैठो, चाय पानी पियो तब तक वह आ ही जायेगा। मोहित मामाजी को लेकर अपने घर चला गया।

इधर महेंद्र घर पर फोन कर रहा था, कोई उत्तर नहीं मिल रहा था । सोचा, आज जल्दी निकल चलते है, मां जी को लेकर किसी मॉल में कुछ खरीददारी कर लेंगे । गीता को भी जल्दी निकलने को कह दिया। घर आया तो देखा मामाजी नदारद। जल्दी से पार्क की ओर गया, पास के बाजार में दुकानो में ढूँढा मामाजी का कोई पता नहीं। हताश होकर घर लौट आया।  देखा तो घर की दूसरी चाभी भी खूंटी पर ही टंगी है।  दोनों चिंतिति होने लगे। आखिर मामाजी बिना बताये कहाँ चले गए? कहीं भूल भुला गए तो बड़ी समस्या हो जाएगी। उन्हें यहाँ के बारे में ज्यादा कुछ पता भी नहीं है और हम कहाँ ढूंढेंगे। मगर ऐसे वे जाएंगे कहाँ ! उसने पूछने के लिए कई दोस्तों को भी फोन कर दिया। घर के बाहर खड़े होकर इधर उधर देख रहा था कि मामाजी मोहित के साथ चले आ रहे हैं।  अब महेंद्र के जान में जान  आई।  

मामा जी कनाडा में महीने भर रहे। महेंद्र ने उन्हें खूब घुमाया और वे भरपूर आनंद उठाये। महेंद्र ने उनके लिये और मामी के लिए कई सामान खरीद दिया था। मामा को जो भी सामान पसंद आता, महेंद्र उसे खरीद देता।  महेंद्र का यह सम्मान देख कर मामा जी गदगद थे । वे प्रसन्नता पूर्वक विदा हो गए। महेंद्र एयरपोर्ट उन्हें छोड़ने गया। मामा जी हाथ के बैग के अलावा उड़ान में केवल २० किलोग्राम सामान ही ले जा सकते थे।  महेंद्र ने काफी सामान खरीद रखा था और गरम कपडे भी थे अतः उनका सामान २ किलो अधिक निकला।  अब बड़ी उलझन पड़ी उसमे से क्या निकाल कर कम करें। क्योंकि उसका किराया सामान की कीमत से भी अधिक था।  बामशक्कत एक दो सामान निकल एक किलो वजन कम किये, अनुनय करने पर एक किलो के लिए एयरलाइन्स वाले मान गए। मामा जी सकुशल वापस घर पहुंचे। 
वे वहां कनाडा की आलोचना बेशक कर लेते हों मगर इंडिया आकर तारीफ करते नहीं अघाते।      



    

Friday, 3 July 2015

Paalatoo beta


पालतू बेटा 

सीमा, काम वाली की प्रतीक्षा कर रही थी।  बताओ, ये टाइम हो गया और वह अभी तक नहीं आई।  बड़बड़ाते हुए घर के गेट से, दाएं बाएं झांकने लगी। कामवाली कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहीं थी। सोची कि लगे हाथ पड़ोस से पूछ कर आये, वहां भी यही काम करती है। तभी किसी के सिसकियों की आवाज आयी। देखी तो घर के चारदीवारी पास रखे गमलों के बीच बैठा एक बच्चा रो रहा है। उससे पूछी, 'क्यों रो रहे हो?' कोई उत्तर नहीं मिला। कहाँ से आये हो, क्या नाम है; किसी भी बात का उत्तर नहीं मिल रहा था। वह बस रोये जा रहा था।  इतने में कामवाली दिख गयी।
'अरे, कुसुमा! जल्दी आ, देख तो यह पता नहीं कौन है, यहाँ बैठ कर रो रहा है। चल अंदर बुला ले, अंदर ही पूछते हैं। '
कुसुमा उसे लेकर घर के अंदर आई। उससे बार बार पूछा, कहां से आया है? नाम क्या है? पिता का नाम क्या है? किसी बात का उत्तर नहीं दे रहा था। भूख लगी है? उसने हाँ में सिर हिला दिया।
कुसुमा, 'देख रोटी सब्जी पड़ी है, लाकर इसे खिला दे।' 
कुसुमा ने रोटी सब्जी लेकर दिया, वह चुप चाप, बड़े मगन से खा लिया। दो रोटी खाने के बाद पूछा, 'और खाओगे?' बच्चे ने हां में सिर हिला दिया। कुसुमा ने एक रोटी और दिया, जिसे वह खा लिया।
सीमा, कुसुमा से कहने लगी, 'इतना छोटा बच्चा! लगता है, माँ बाप से बिछुड़ गया है।'
'मुझे  तो लगता है डांट खाकर घर से भाग गया होगा। जब कहीं खाने को नहीं मिला होगा तो भूख से तड़पकर कर रो रहा था।'
'चल अभी इसे सामान्य होने दे फिर पूछते हैं, क्या बात है। जा, तब तक फ्रिज में से एक गुलाब जामुन ले आ और इसे खिला दे।'

गुलाब जामुन खाकर उसका मन पुलकित हो गया। इससे पहले, न जाने कब ऐसा स्वादिष्ट व्यंजन खाया होगा। उसे बैठक में छोड़कर सीमा और कुसुमा अपने अपने काम में व्यस्त हो गयीं। वह बच्चा फर्श पर पड़ा ही सो गया। लगभग एक घंटे के बाद सीमा ने उसे जगाकर फिर पूछा, 'कुछ खाओगे?'
इस बार उसने बोल दिया, 'नहीं।'    
'कहाँ से आये हो?'
'चाचा के घर से।'
'चाचा कहाँ  रहते हैं?'
'बहुत दूर'
'चलो तुम्हें तुम्हारे चाचा के घर छुड़वा देते हैं।'
यह सुनकर वह फिर रोने लगता है। अब तो सीमा बड़े संकट में पड़ गयी, आखिर उसे घर से निकाले कैसे? कुसुमा ने कहा, 'मेम साहब, इसे अपने यहाँ रख लीजिए। इसके माँ बाप एकाध दिन में आएंगे तो ले जायेंगे। नहीं तो नौ दस साल का तो होगा ही, घर का कुछ काम कर लिया करेगा।
'अरे, अभी छोटा बच्चा है, ये क्या काम करेगा!'
'नहीं मेम साहब, इतनी ही बड़ी मेरी बेटी है, घर के कई सारे काम कर लेती है। इसको भी सिखा देंगे।'

दिन निकल गया, शाम तक उसके किसी परिजन का कोई सूत्र नहीं मिला। ये लोग, अटकल लगाते रहे कि घर से भाग गया होगा, कहीं माँ बाप से बिछुड़ गया होगा, कोई अपहरण करने के बाद छोड़ दिया होगा। कारण कुछ भी हो, सीमा और उसके पति साहू जी ने यही निर्णय लिया कि वह अनाथ है, और उसे अपने यहाँ शरण देना ही उचित रहेगा। धीरे धीरे घर के काम सीख लेगा तो उन्हें ही आराम रहेगा। अपना बेटा सुमेर तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके कहाँ काम करेगा, क्या पता! यह रहेगा तो छोटे मोटे काम में मदद करेगा ही। साथ ही यस भी डर सता रहा था, पता नहीं कौन है, इसके यहाँ आने के पीछे किसी की कोई चाल न हो, या अपहरण करके बाद में कोई छोड़ गया हो और हम पुलिस के झमेले में पड़ें। सावधानी बरतते हुए साहू जी ने पास पड़ोस को बता दिया कि उनको एक लावारिस बच्चा मिला है, यदि कोई ढूंढें तो बता देंगे। साहू जी और सीमा उसे रामफेर कहकर बुलाने लगे।

साहू जी के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी, साथ ही वे पति पत्नी दोनों बड़े अच्छे स्वाभाव के थे। वे उस बच्चे के खाने पीने का ध्यान देने लगे। उसके लिए नए कपडे भी खरीद लाये। एक सप्ताह में तो उसकी रंगत ही बदल गयी। एक सप्ताह के पश्चात साहू जी के घर एक व्यक्ति आ टपका। घंटी की आवाज सुनकर जैसे ही सीमा ने दरवाजा खोला; उसने पूछा, 'घूरन यहीं रहता है।'
'भईया ये तो पता नहीं घूरन है कि कौन है। हाँ, एक आठ नौ वर्ष का लड़का एक हफ्ते पहले आया था, तबसे वह यहीं है। वह अपना अता पता ठीक से नहीं बता रहा है नहीं तो उसे उसके घर भिजवा देते। बुलाती हूँ, खुद ही देख लो कौन है।'
सीमा ने बुलाया 'रामफेर।'
वह दौड़ा आया।  जैसे ही उस व्यक्ति को देखा, चिल्लाता अंदर भाग गया 'मुझे नहीं जाना इनके साथ।' बात-चीत से पता चला कि वह व्यक्ति घूरन का चाचा था। घूरन के माता पिता दोनों की मृत्यु हो चुकी थी।  इसलिये उसके पालन पोषण की जिम्मेदारी चाचा पर आ गयी थी। घूरन के साथ चाचा चाची का वर्ताव अच्छा नहीं था। बात बात पर वे उसे मारते पीटते थे, इसीलिए वह घर से भाग गया था। उन्होंने उसे बहुत ढूंढा, तब जाकर पता चला कि वह यहाँ है। सीमा ने रामफेर को समझाया कि वह अपने चाचा के साथ चला जाय पर वह जाने को तैयार ही नहीं था। वह चिल्ला चिल्लाकर कहने लगा, 'मुझे नहीं जाना ये मुझे मारते हैं।' शायद घूरन के मन में यही चल रहा था, उसके चाचा चाची उससे काम भी लेते हैं और भर पेट भोजन तक नहीं देते, उस पर भी प्रताड़ना। इससे अच्छा तो इन लोगों के यहाँ रहना है, इतना अच्छा खाना पीना, जब  से आया है एक बार भी मार नहीं पड़ी। चाचा ने भी स्थिति को भांप लिया। मन ही मन सोचा, अच्छा मौका है, घूरन को यहीं छोड़ देते हैं, अच्छा घर द्वार है, अच्छे लोग हैं। इसकी जिंदगी चैन से कटेगी और खुद की भी पालने पोषने से जान छूटेगी। चाचा ने कह दिया, 'अगर यहाँ खुश है तो यहीं रख लीजिए। आपके घर का थोड़ा बहुत काम भी कर देगा। इसके काम के पैसे मुझे दे दिया करना।'
सीमा के मन में भी यही चल रहा था। किन्तु पैसे देने की बात वह नहीं मानी। 'भैया अभी यह काम करने लायक कहाँ है, अभी इसे सिखाएंगे तो हो तो काम करेगा। अभी तो खाना कपड़ा ही देंगे। साल, दो साल बाद पैसे की बात सोचेंगे। पैसे देने की जगह इसे पढ़ाने की कोशिश करेंगे। खैर, घूरन का चाचा लौट गया। फिर दुबारा किराया भाड़ा लगाकर आना उसके लिए आना कठिन था। 
इधर साहू जी ने उसका नाम सरकारी स्कूल में लिखवा दिया, मगर रामफेर का पढ़ने में जी नहीं लगा। पढ़ने पर वे जोर न दें, इसलिए घर का काम दौड़ दौड़ कर करता। साहू जी के यहाँ का खाना-पीना, सुख-सुविधा देखकर तो उसे स्वर्ग सा लग रहा था। इतना सब तो सपने में भी नहीं सोच सकता था। वहां वह बहुत प्रसन्नता से रहने लगा। वह साहू जी और उनकी पत्नी को पापा मम्मी ही कहता। कुछ और बड़ा हो गया तो उसे इस बात का तनिक भी एहसास नहीं था वह कहीं बाहर से आया है। सीमा और साहू जी भी उसे प्यार करने लगे और अपने बेटे की तरह ही मानने लगे। पांच छः वर्ष ही बीते थे कि घूरन के चाचा चाची भी चल बसे थे। अब तो घूरन की खोज खबर लेने वाला कोई भी नहीं था।  

साहू जी और सीमा सबसे कहते, मेरे तो दो बेटे है सुमेर और रामफेर।   सुमेर तो बड़ा था ही और ऊपर से असली बेटा, वह मटरगस्ती करता रहता।  घर का कोई भी काम होता, रामफेर को सौंप दिया जाता। रामफेर को इस बात का एहसास था कि वह काम की बादौलत ही यहाँ है, इसलिए उसे यह सब भार सा नहीं लगता। वह मगन होकर सब काम करता। उसे तो इतना ही बहुत था, सबके जैसा खाना, पहनना और रहना मिल रहा था। साहू जी बातों से, उसे बार बार एहसास दिलाते रहते कि रामफेर को सुमेर से तनिक भी कम प्यार नहीं करते।  वैसे तो सुमेर के पुराने कपड़ों से भी उसका काम चल जाता, पर साहू जी समय समय पर उसे भी नए कपडे खरीद देते ताकि उसे किसी प्रकार से अलग व्यवहार का एहसास न हो। उनकी पास पड़ोस, सगे-सम्बन्धी सब जगह प्रशंसा होने लगी। देखो कहां का किसका लड़का, उन्होंने अपने बेटे के जैसा रखा है। 

रामफेर के रहने से साहू जी और सीमा को बड़ा सुख मिलता। और तो और सुमेर भी कभी घर आता तो अपने काम में उसे लगा देता। बाजार आदि से कोई सामान लाना होता, उसे दौड़ा दिया जाता। सब्जी वगैरह साफ करके काट देता, कपड़े धोने, सुखाने का काम उसी का था। जहाँ साहू जी के परिवार को आराम था, ये सब काम करने में रामफेर को भी मजा आता ताकि कोई पढ़ने के लिए न कहे। इधर, सुमेर पढ़ लिख कर, नौकरी करने लगा और उसकी शादी हो गयी। जवान तो रामफेर भी था, सीमा ने सोचा उसकी भी शादी कर दें ताकि घर के भीतर का काम उसकी पत्नी कर दिया करे और बाहर का स्वयं रामफेर। एक दिन सीमा ने साहू जी के समक्ष यह प्रस्ताव रख दिया कि रामफेर की भी किसी गरीब दुखिया की लड़की से शादी कर देते हैं। शाहू जी ने उसे समझा दिया, उसकी बीबी आएगी तो उसे भी अपने घर में ही रखना पड़ेगा। अभी तो रामफेर कहीं भी कैसे भी रह लेता है जब उसका परिवार हो जायेगा तो उसके लिए रहने का अलग से स्थान देना पड़ेगा और इसका भी ध्यान अपने परिवार में ही रहेगा। रामफेर ने यह बात सुन लिया। वह मन ही मन एक लड़की को चाहता भी था, सोचा अच्छा हुआ बात अभी ज्यादा आगे नहीं बढ़ी है। रामफेर के लिए हर चीज से ऊपर मम्मी पापा की इच्छा थी।

एक बार  फिर से साहू जी का पुराना रोग अचानक उभर आया। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, बीमारी गम्भीर थी, उन्हें खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ गयी। सुमेर इतनी छुट्टी कैसे लेता। जाँच की गयी तो रामफेर के खून का ग्रुप साहू जी से मेल खा गया। रामफेर ने अपना खून दिया, साहू जी उस समय तो ठीक हो गए, पर डॉक्टर ने साहू साहब की विस्तृत जाँच के लिए बोल दिया और साथ ही ऑपरेशन की आशंका भी व्यक्त की। जब उनकी विस्तृत जाँच हुई तो साहू जी पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। पता चला कि साहू जी बीमारी ने गंभीर रूप ले लिया है, और उसका आपरेशन यथाशीघ्र करना पड़ेगा। अब साहू परिवार की और से रामफेर के प्रति प्यार और आदर बढ़ गया था। सभी लोग कहते, 'रामफेर तो साहू जी के लिए भगवान बनकर आया है, ये था तभी उनकी जान बची, वरना जाने क्या होता। सुमेर तो नालायक है, उसे पिता की बीमारी में भी छुट्टी नहीं मिलती। अब तो वह बीबी को छोड़कर माँ बाप की देखभाल कहाँ करने वाला।' यह सब बातें रामफेर को खुश कर देतीं और साहू परिवार के लिए सब कुछ लुटा देने के लिए उमंग भर देतीं।

साहू जी को पता था कि आपरेशन के समय रामफेर ही काम आएगा। ऑपरेशन की बात होने के बाद, रामफेर के लिए प्यार बढ़ जाना स्वाभाविक था। उसके जन्म दिन पर सौगात के रूप में मोटरसाइकिल पहले ही मिल गयी थी, वैसे उसका उपयोग घर के काम निबटाने में अधिक होता था। वह सामान वगैरह लाने के लिए, परिवार के ही काम आती। रामफेर मोटरसाइकिल का क्या करता, उसे घूमने फिरने के लिए समय ही कहाँ मिल पाता। अब खाने पीने में साहू जी व उनकी पत्नी अपनी पसंद को छोड़, रामफेर की पसंद पूछते। इतना प्यार संभवतः उसके सगे माँ बाप होते तो भी कभी नहीं मिलता। रामफेर की मान मर्यादा बहुत बढ़ गयी थी। घर के हर काम में उससे सलाह ले जाती।  रामफेर को पूर्णतः एहसास हो चुका था कि वह सुमेर का छोटा भाई है। 

अब आपरेशन का समय आ चुका था। बस एक सप्ताह बाद ही आपरेशन होना था। बीमारी का भेद खोला गया। घर में चर्चा होने लगी, साहू जी का एक गुर्दा ख़राब है, और उसे बदलना पड़ेगा। गुर्दा कहाँ से लाएं? नियमानुसार कोई सगा सम्बन्धी ही गुर्दा दे सकता था। गुर्दा कौन देगा, कहाँ से आएगा। सुमेर की पत्नी तो उसे पहले ही कह चुकी थी, 'कहीं गुर्दा देने के लिए हां नहीं कर देना।'
फिर भी दिखावे के लिए सुमेर ने अपना गुर्दा देने को बोल दिया। उसकी माँ तुरंत बरस पड़ी, 'तुझे नौकरी करनी है, इतनी छुट्टी कहाँ मिलेगी, अभी नई नई शादी हुई है। इसी उम्र में गुर्दा निकलवाएगा, अभी पूरी जिंदगी पड़ी है।' उसको समझा बुझा कर शांत कर दिया। आगे बोली, 'सुना है अस्पताल में दलाल होते हैं, पैसे से जुगाड़ हो जाता है। पैसे ही तो लगेंगे। चल खोज बीन कर, दलाल का पता लगा।'  
'मगर इसके लिए काफी पैसे लगेंगे, आखिर दानी भी ऐसा लाना है कि फेल न हो।'
'कितने लग जायेंगे। ' सीमा ने पूछा। 
'यही कोई आठ दस लाख तो लग ही जायेंगे। वो भी गारंटी नहीं को स्वीकार भी हो जाय। केवल सगा संबंधी ही गुर्दा, दान कर सकता है।'
सीमा थोड़ी एक्टिंग करते हुए बोली, 'बताओ आठ दस लाख गुर्दे का, और उसके ऊपर ऑपरेशन का खर्च होगा। मगर यहाँ पापा के जान का सवाल है। कुछ तो करना ही पड़ेगा। मैं अपने जेवर बेच दूंगी, देखते हैं उसका क्या मिलता है। '
फिर रामफेर की ओर देखते हुए, 'रामफेर भी तो हमारा सगा बेटा ही है! हम्हीं ने तो पाल पोष कर इसे बड़ा किया है, आखिर किस दिन काम आएगा । ये अपना खून तो दे ही चुका है।'

रामफेर को इस स्थिति का पहले से ही अनुमान था। वह आगे बढ़कर बोला, 'मम्मी, अपने ने तो मेरे मुंह की बात छीन ली।' रामफेर तो साहू परिवार के लिए प्राण तक देने को तैयार था। मगर उसे ऑपरेशन के नाम से बहुत डर  लगता था। फिर भी उसने इस बात को अपना सौभाग्य  ही समझा और स्वयं को समर्पित कर दिया। 


Second hand bed

पुराना पलंग
'और विवेक कैसे  हाल हैं।  इधर कैसे ? कहाँ बिजी हो गए ? काफी समय हो गया, मिले ही नहीं।'
'बस, ऐसे ही, कोई खास नहीं।  अभी कुछ मेहमान सिडनी आये हुए हैं।  थोड़ा उन्हें घुमाना फिराना है। अभी एक बेड रूम में मैट्रेस नीचे ही रखा है, आइकिया जा रहा था, सोचा एक बेड डाल दूँ।  वो लोग भी सोच रहे होंगे, नीचे सुला रहा है ।'

'अरे मेरा एक मित्र अपना डबल बेड निकालना चाह रहा है, उसे ही क्यों नहीं ले लेता, एक तिहाई से भी कम दाम  में मिल जायेगा। मेरे परिचित का ही है, मैंने उसे देखा है बहुत अच्छा और मजबूत है। वही एजेंसी वाले ले जायेंगे, पोलिश वालिश करके नया बनाकर बेच देंगे।  कहे तो बात कर लू।'  पंकज ने कहा।

विवेक को बात कुछ अटपटी लगी।  पुरानी ही खरीदनी हो तो शहर का एक चक्कर लगाएं, कहीं न कहीं पटरी पर रखी वैसे ही मिल जाएगी।  यहाँ पुरानी वस्तुएं बिकती तो हैं नहीं, वैसे ही घर के बाहर छोड़ना पड़ता है, म्युनिसिपालिटी की गाड़ी आती है उठा ले जाती है। उसे यह बात अपमान वाली लगी।

पंकज ने समझाया, 'वह बेड उसके किसी बहुत घनिष्ठ मित्र का ही है।  लेन देन की बात का किसी के कानोकान तक खबर नहीं होगी।'
विवेक की पत्नी ने भी इस बात का समर्थन दे दिया, चलो अभी उसे ही लेकर काम चला लेते है, फिर थोड़ा फुर्सत से अच्छा सा बेड खरीदेंगे। 

विवेक बोला, 'ठीक है बात कर ले, पर एक दो दिन में ही लेना है। और हाँ एक शर्त है मै उसके पास नहीं जाऊंगा और किसी को पता भी नहीं लगना चाहिए कि सेकंड हैंड बेड खरीदा हूँ।'

'अच्छा, कल मेरी छुट्टी है, तुम पैसे दे देना, मै लेकर तुम्हारे यहाँ भिजवा दूंगा।'

'हाँ, उसके यहाँ से उठाकर सीधे कारपेंटर शॉप ले जाना है, वहां थोड़ा पोलिश करवा लेंगे नया जैसा हो जायेगा।'

'बिलकुल ठीक, वहां से लेकर मैं फ़ोन करूंगा।  तुम कारपेंटर शॉप पर मिल जाना।'

अगले दिन पंकज का फ़ोन आता है। विवेक, मैंने वो बेड ले लिया है।  एक घंटे बाद कारपेंटर शॉप पर आ जाना।
विवेक अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंचा। बेड डिस्मेन्टल और काफी अच्छी कंडीशन में था। विवेक ने शॉप के मालिक से उस पर पोलिश करने के लिए बोला।  उसने अगले दिन देने के लिए कहा तो विवेक ने उससे रिक्वेस्ट किया थोड़ा जल्दी करके एक दो घंटे में इस पर पोलिश मार के तैयार करवा दो। मेरे घर मेहमान आये हैं, उन्हें नीचे सोना पड़ रहा है।  मुझे आज शाम तक इसे घर ले जाना है।
घर लाकर रात ही रात उसे अस्सेम्बल करके तैयार कर लिया।  पोलिश के बाद तो एकदम नया सा ही लग रहा था। कोई नहीं कह सकता था कि वह सेकंड हैंड बेड होगा।
विवेक की पत्नी ने उसमे एक चिन्ह देखकर विस्मित रह गयी।
विवेक, विवेक! देखो, यह निशान।  याद है ऐसा ही निशान उस बेड में था जो हमने आशु को दिया था।
मुझे तो  ठीक से याद नहीं, हो सकता संयोग वश उस तरह का चिन्ह हो।  पर उस बेड का रंग इतना गहरा तो नहीं था।  संभवतः इसने भी उसी कंपनी से खरीदा होगा।  हाँ, देखो आईकिया का लेबल लगा है।

आशु जब इंडिया से ऑस्ट्रेलिया में नया नया आया था तो विवेक ने उसकी बहुत मदद की थी।  घर में पड़ी कुछ अतिरिक्त वस्तुएं उसे ऐसे ही दे दिया था।  उसके पास एक बेड भी अतिरिक्त रखा था जिसे वह आशु को दे दिया था। तब उसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।

वीक एंड पर आशु भी विवेक के घर आ धमका। अधिकतर वीक एंड पर  समूह के सभी मित्र किसी न किसी बहाने मिल लेते थे।  कभी कहीं आउटिंग पर निकल गए, कभी किसी ने खाने पर बुला लिया वरना वैसे ही किसी के घर आ धमके । इन सब क्रियाओं से प्रेम परस्पर खूब बढ़ चढ़ कर था।
हाल चाल हुआ।
विवेक  - 'मैंने नया बेड लिया है '
आशु - 'अच्छा, कौन से रूम में है'
 आ देख
सभी बेड रूम में घुसे
आशु की पत्नी - अरे, यह तो वही बेड है जो हमने तीन चार दिन पहले बेचा था
विवेक - 'किसको बेचा था'
आशु की पत्नी - यह तो पता नहीं, खरीदने वाला तो सामने नहीं आया पर पंकज ने लेकर किसी को दिया था।
विवेक - हा, हा हमने भी नया नहीं खरीदा, सेकंड हैंड ही खरीदा और वह भी पंकज के ही द्वारा ।  हाँ, उसे पोलिश जरूर करवा दिया था।
सुनकर तो आशु को जैसे काठ मार गया।  वह शर्म से पानी पानी हो गया।
यह तो वही बेड है जो तूने मुझे दिया था, मुझे क्या पता पंकज यहीं के लिए यह सब कर रहा है।
तू अपने पैसे वापस ले लेना।
विवेक बोला जाने दे, कोई बात नहीं, जो हो गया, सो हो गया। चल चाय पीते हैं।