Wednesday, 8 April 2015

Muft ki coffee

मुफ्त की काफी

दीपक अकेला ही रहता था। शाम को अकेले घर पर समय काटना बड़ा कठिन हो जाता। सिडनी में अधिकतर ऑफिस समय पर ही बंद हो जाते हैं।  इस कारण वह वहां भी देर तक समय नहीं बिता सकता था। ऑफिस के सहकर्मी तो छुट्टी के पश्चात पब आदि में चले जाते और सप्ताहांत की छुट्टी घर से बाहर कहीं समुद्र तट या खेल आदि में बिताते।  सबका अपना अपना तरीका था।  दीपक को पब जाने से परहेज था क्योंकि वह मंहगा था। जो मित्र बन पाये थे वे दूर रहते थे अतः रोज मिल पाना संभव नहीं था। अब शाम का समय बिताने का जो तरीका बचता था या तो टेलीविज़न देखे या साथ शराब पिए।  टेलीविज़न भी अकेले देखने में क्या मजा। पुस्तक पढ़ना तो अब बोझ जैसा था, पढ़ाई में बहुत पढ़ चुका।

उसे पता चला कि वहां समीप में ही एक क्लब है जिसकी सदस्यता शुल्क नाम मात्र की है।  एक दिन वह वहां गया
और उसकी भव्यता देख चकित रह गया। वातानुकूलित भवन,  साफ सुथरा अंदर का वातावरण, तरह- तरह के कैसिनो के खेल। सदस्य्ता शुल्क सुनकर तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा मात्र १० डॉलर प्रति वर्ष और कोई प्रवेश शुल्क नहीं। बस फिर क्या बात थी झट १० डॉलर निकला और शुल्क देकर क्लब का सदस्य बन गया। सदस्य बनने में बस कोई एक मिनट लगे होंगे।   अंदर भांति भांति की गेमिंग मशीन लगी हैं।  किसी मशीन पर बैठ जाओ और जब तक मन करे, खेलो और भाग्य प्रबल हो तो डॉलर भी कमाओ। और तो और निशुल्क चाय काफी की भी व्यवस्था थी। समय बिताने को और क्या चाहिए। अब तो शाम को वह समीप के क्लब में चला जाता और निशुल्क चाय, काफी का आनंद उठाता।  बस नाश्ता या खाने के सामान का पैसा देना होता।  क्लब के भवन में ही दो तीन अच्छे रेस्तरां और बार भी थे।  ड्यूटी से आने  के बाद चाय नाश्ता बनाने के चक्कर में कौन पड़े।  वह क्लब चला जाता ; चाय, नाश्ता मिल जाता कभी कभी गेमिंग मशीन पर खेलने से कमाई भी हो जाती। उसके लिए यह सोने में सुहागा सा लगा।  
क्लब आने जाने की निशुल्क बस सुविधा भी थी। इतना कुछ बिना पैसे के।  किसका जी नहीं चाहेगा वहीँ जमा रहे और वातानुकूलित  भवन में में बैठे गरम चाय काफी का आनंद  ले।
एक दिन क्लब में मशीन पर खेलते हुए उसे एक युवक दिखा जो भारतीय लग रहा था।  उसके पास जाकर उसने पूछ लिया क्या आप भारत से हैं ? उत्तर मिला 'हाँ' ।
'कहाँ से ?'
'चंडीगढ़ से। और भी दो तीन भारतीय यहाँ खेलने आते हैं।'
'चलिए, मिलके बहुत अच्छा लगा।  अकेले बोर होता था।  आपका नाम ?'
'राजीव'
'यहाँ रोज आते हैं'
'कभी, कभी।  अभी परिवार भारत गया है इसलिए कभी कभी आ जाता हूँ। समय अच्छा कट जाता है।'
'कुछ कमाया इन मशीनों से ? सुना है लोग यहाँ गँवा कर ही जाते हैं।'
किन्तु दीपक का भाग्य साथ दे रहा था वह कुछ पैसे बना चूका था।  बोला -
'कभी कभी कुछ मिल जाता है । मैं तो समय बिताने के लिए थोड़े पैसे से खेलता हूँ। ज्यादा लगाओ तो तो कमाई के अवसर भी अधिक हो जायेंगे। अभी थोड़ा अनुभव ले लूँ।'
'और आप कहाँ से ? राजीव ने दीपक से पूछा।'
'दिल्ली से, अभी कुछ महीने पहले ही आया हूँ।'
'अरे, फिर तो पडोसी है ठहरे।  बहुत अच्छा।  किसी दिन घर आना।  अपने लोग मिलते हैं तो कितना अच्छा लगता है।  और कहाँ काम करते हो ?'
'सिटी में एक आई टी कंपनी है। '
'और अभी अकेले हो '
'हां'
'ठीक है, देखना, बस इसका चश्का मत लगा लेना।'
अब तो साथ मिल गया, कभी कभार बार में बियर, व्हिस्की का दौर भी चल जाता था। दीपक को यहाँ से कमाई होने लगी और खेलने का चश्का भी बढ़ता गया। काम से आने के बाद सीधे क्लब। पहले कभी कभी छुट्टी के दिन दोस्त मित्रों से मिलने उनके घर या उनके साथ कहीं घूमने चला जाता था। अब तो क्लब गए बिना एक दिन भी नहीं रहता। धीरे धीरे कुछ पैसे जोड़ लिए। अब सोचा थोड़ा बड़े दाव खेल कर कुछ अधिक पैसे बन जायँ  तो एक फ्लैट भी खरीद लेगा और मकान का किराया देने से छुटकारा मिल जायेगा। भारी भरकम किराया देना बहुत कहलाता था। अगर रुपये में देखें तो एक लाख रुपये प्रति माह।
इधर राजीव कुछ दिनों से नहीं आ रहा था। लगता है उसका परिवार आ चुका। अब दीपक अकेले ही खेलने लगा। इंटरनेट से औरों के अनुभव पढ़कर उसका आत्मविस्वास  भी बढ़ गया था। कुछ कमाई बढ़ी और साथ दीपक का लोभ। अब तो कैसिनो को वह काफी समय देता, कभी कभी काम से छुट्टी करके भी वहां चला जाता। उसका फ्लैट खरीदने का सपना सच होने के समीप आने लगा था।
राजीव से मिले अब दो वर्ष हो चुके थे। एक दिन सिटी मॉल में कुछ सामान खरीदने गया वहीँ राजीव मिल गया।
'अरे, दीपक! कहाँ हो भाई, इतने दिन से न कभी मिले न फ़ोन किया।  और सब कैसे है ? मकान वगैरह खरीद लिया कि नहीं।  मैं तो एक और मकान देख रहा हूँ।  सोचा इसी बहाने कुछ इन्वेस्टमेंट हो जाएगी और किराये से आमदनी भी बढ़ जायेगी।'

'अभी कहाँ लिया यार।  कुछ पैसे कमाये थे।  एक दिन मैंने रोलेट में जयादा पैसे लगा दिये सब चले गये।  फिर गंवाए पैसे फिर से कमाने के लिए मैं लगाता गया, मशीन खाती गयी।  नुकसान इतना हो गया कि काम से छुट्टी ले लेकर खेलने लगा, मगर भाग्य ने बिलकुल भी साथ नहीं दिया।  पैसे तो बने नहीं, अधिक छुट्टी करने के कारण नौकरी से और निकाल दिया।  अब दूसरी जॉब ढूंढ रहा हूँ।  जो सेविंग की थी सब समाप्त हो चुकी है। शीघ्र जॉब नहीं मिली तो घर से पैसे मंगाने पड़ेंगे। '

'ओ हो, यह तो बहुत बुरा हुआ। मैंने पहले ही कहा था, यह गेमिंग का चश्का, है ही ऐसा है। चल कोई बात नहीं, अब से संभल जा। '
'हाँ, अब तो कान पकड़ लिया है। कैसिनो भूल कर भी नहीं जाऊंगा। '
 'अरे, मेरी कंपनी में आई.टी. में एक जगह खाली है तू एप्लीकेशन डाल दे। जी. एम.  से मेरी अच्छी पटती है, मैं बात कर लूँगा।'
इस बात से दीपक के जान जान में जान आ जाती है।




  


  

Sunday, 5 April 2015

Chacha Ashik Ali ki holi


आशिक अली, इतने मजाकिया किस्म के इंसान थे कि उनकी चुटकुलेदार बातें सुनकर, हंसने के लिए बच्चे उनके आगे पीछे घूमते रहते।  नूरा अपने माँ बाप की इकलौती बेटी थी। जुम्मन मियां के अंतकाल के बाद, आशिक अली, ससुराल में ही आन बसे।  ससुराल में रहने के नाते वे सबसे हंसी मजाक कर लिया करते, और गांव वाले भी उनसे चिकारी करते रहते। उनकी किसी बात का कोई भी बुरा नहीं मानता। वे रहते तो ससुराल में थे, पर गांव के बच्चे उन्हें चाचा ही कहते। बालों के साथ वे खुद भी पके हुए इंसान बन गए थे, मगर उनके साथ गुजारा समय कत्तई पकाऊ नहीं होता। कई बार तो उनके मजाकिया कटाक्ष ऐसे होते कि आगे वाला सोचता ही रह जाता।
एक बार एक युवक ने कह दिया, 'चाचा जब मर जाओगे तो पूरा गांव बहुत उदास हो जायेगा। '
तो उन्होंने तपाक से उत्तर दिया, 'लड़की ढूंढे रखना, अगले जन्म में भी इसी गांव में ससुराल बनाऊंगा, वैसे जन्नत से भी तुम लोगों को देखता रहूँगा। '

 उनकी कई बातों का लोग तोड़, नहीं ढूंढ पाते। जहाँ कहीं भी गांव में वे दिखते, लड़के कुछ ना कुछ कहकर, छेड़ देते, और बदले में उन्हें ढेर सी सुननी पड़ती, उनको क्या! हा.. हा.. हा करते भाग जाते। उनसे मिलकर लड़कों के आनंद का कोई ठिकाना नहीं रहता। दिन में अगर एक बार, आशिक चाचा नहीं मिले तो लगता था कि वह दिन ही बेकार गया। हंसी मजाक में भी उनके सम्मान व मर्यादा का पूरा ख्याल रखा जाता।  क्या मजाल कि उनसे कोई अभद्र व्यवहार कर दे।
पूरे गांव में उनका इकलौता गैर हिन्दू परिवार था।  जितने उत्साह से वे ईद मनाते, होली, दीवाली पर उनका उत्साह उससे कम नहीं होता। उनके त्यौहार में तो गिने चुने लोग ही सम्मिलित होते परन्तु वे हिन्दुओं के हर पर्व में खुलकर सरीक होते। होली में तो उनका रंग देखते ही बनता।
'इतने कम पटाखे और मिठाई, भाई क्या दिवाली मनाई।'
वे जुमला कस देते, बच्चे सुन कर हंस देते, 'तो चाचा, आप की तरफ से ही कुछ हो जाय। '
'वाह, भई! वाह, उलटी गंगा हिमालय की ओर।'
इसी प्रकार उनका होली का जुमला था, 'खाली चेहरा रंगा तो क्या होली मनी, मुझे देखो मन भी रंगा है. भंग का गोला-ओला खाया कि नहीं!'
'ही ही, चाचा, सदानन्द अंकल के छन रही है, जाऊं एक गोला ला दूँ?'
'नहीं, वहीँ चला जाऊंगा। '
जैसा उनका नाम था, आशिकी की बातें भी कर लेते, युवा लड़कों को सुनकर मजा आ जाता।
बाबू कैश नहीं तो ऐश नहीं।
बिना कॉलेज के नॉलेज कहाँ।
नो लाइफ विदाउट वाइफ। 
इश्क न किया तो क्या खाक जिया। 
उनके ये कुछ जुमले, गांव के लडके बार बार सुनना चाहते। उनको याद भी दिलाते रहते चाचा जरा वो वाला...
 
 अभी दस भी नहीं बजे थे, किसी ने दरवाजा खटखटाया ..
'कौन है ! आज तो होली का दिन है,'  कहते हुए, शब्बो चाची ने दरवाजा खोला। देखा तो गली में आठ दस युवक रंग में सराबोर खड़े हैं।
'अरे बेटा रमेश! कैसे हो ? आओ गुलगुले बनाई हूँ, खा लो।' चाची, बनाने में अधिक झंझट के कारण, होली पर गुजिया तो नहीं बना पाती, पर गुलगुले और दही-बड़े जरूर बनाती।
'नहीं चाची, बहुत खा लिया है, घर पर भी बना है। होली खेलने जाना है, चाचा कहाँ हैं।'
'अरे बेटा घर में हैं, उनकी तवियत थोड़ी ठीक नहीं है।'
'चाची! उन्हें बाहर भेजो, आज होली है।'
'बेटा, तुम्हे पता ही है वे होली के कितने शौक़ीन हैं।  ठीक होते तो खुद ही जाते।'
युवक जिद्द करने लगे। आवाज सुनकर मियां बाहर आ गए। वे सारी कहानी पहले ही समझ चुके थे।
साथ लेकर आये मुट्ठी भर गुलाल युवकों के ऊपर उड़ा दिया, फिर क्या था पूरी गली हो-हल्ले से गूँज गयी। एक उल्लास सा भर गया। लडके जिद्द करने लगे, चलो चाचा! टोली में हमारे साथ रंग खेलने। चाचा बोले, 'नहीं, तुम लोग जाओ, मैं थक जाऊंगा। मगर लड़कों ने एक न सुनी, ' चाचा! कौन सी रोज होली आती है। '
आवाज सुनकर, आसपास के और लडके निकल आये।  'चलो भाई, चाचा की होली की सवारी निकलेगी।  चाचा ने और अधिक आनाकानी नहीं की, और टोली के साथ चल दिए। गली में थोड़ा ही आगे निकले थे, नौबत का गदहा बंधा दिख गया। एक हुड़दंगी लड़का दौड़ा गया, और उसे खोल ले आया।
'चाचा! इस पर बैठ जाओ।'
चाचा भी पूरी तरह होली के जोश में आ चुके थे, और बड़े आराम से उस गधे पर बैठ गए। फिर तो लोग जुटते गए और चाचा का जुलुस बड़ा होता गया। ढोल, झाल भी टोली में शामिल हो गयी।
'केकरा हाथे कनक पिचकारी, केकरा हाथे अबीरा, होली खेलें रघुबीरा अवध में, होली खेलें रघुबीरा'
गीत गूंजने लगा।
जुलुस में संग बह रहे आनंद में खुद को भी बहा देने से, कोई नहीं रोक पा रहा था। चाचा का जुलुस देखकर, लग रहा था, जैसे किसी बहुत बड़े विजयी नेता का जुलुस जा रहा हो। किसी किसी के घर से कुछ खाने पीने का भी सामान आ जाता, चाचा गदहे पर बैठे ही खा पी लेते। गांव की गलियों से घूमता, जलूस पंचायत भवन के प्रांगण में एकत्रित हुआ। फिर तो पूरा प्रांगण एक रंगमंच बन गया। नाच गाने का सिलसिला चला, गुलाल उड़ा, गुजिया नमकीन चली, भंग छनी और आखिर में चाचा ने अपने शेरों से सबको चित्त कर दिया।
फगुआ के गान में लोग झूम उठे, और खामोशियों में चाचा के शेर दहाड़ते रहे। वहां उपस्थित हरेक जन चाहने लगा कि यह दिन समाप्त ही ना हो।
फगुआ के गीत जो नहीं सुना, वह संगीत का मजा क्या जान पाया। फिल्मो में तो एकाध ही होली के गीत होते हैं, होली के रोचक व संजीदगी भरे गीत तो लोक गीतों में ही सुनने को मिलते हैं।
कुछ लोगों को लग रहा था कि गदहे पर बिठा के चाचा के साथ ज्यादती हो रही है, पर चाचा इसका भरपूर आनंद ले रहे थे। और तो और पैदल नहीं चलना पड़ रहा था। उन्होंने यहाँ तक भी कह दिया -
'ससुराल वालों! तुमने फिर से मुझे घोड़ी पर बिठा दिया। घोड़ी पर ही घुमाओगे या दुल्हनिया भी दिलाओगे?'

तीसरे पहर तक जलसा चला,  गाने बजाने का दौर ख़त्म हुआ. खाने पीने का वहीँ अच्छा प्रबंध था। कुछ लोगों ने पैसे एकत्र कर, चाचा को कुर्ता पाजामा और चाची के लिए साड़ी तथा बचे हुए पैसे नकद देकर बिदाई की। चाचा को बड़े मान सम्मान के साथ उनके घर तक छोड़ा। चाचा अपने आदर और अपनेपन से गदगद हो गए। दिन की सारी थकान मिट गयी। उन्हें एक अनोखे मुहब्बत का एहसास हुआ। किसी को गधे पर बैठना अजीब लगे तो लगता रहे, चाचा को तो बड़ा आनंद आया और वे अपने इस क्रिया के कारण सैकड़ों लोगों को आनंदित देख, जीवन की एक बहुत बड़ी संतुष्टि को प्राप्त कर रहे थे।

उस जुलुस की कई दिनों तक चर्चा होती रही। जुलुस में सम्मिलित होने वाले को चलते फिरते जो भी मिल जाता, 'इस बार होली में, चाचा के जुलुस में थे कि नहीं!' सामने वाला गर्व भरी भरी मुस्कान फेंकता और बोल पड़ता, भई! बड़ा मजा आया। अब तो हर बार ही ऐसी होली होनी चाहिए।' जो नहीं शामिल हो पाया, अपनी किस्मत को कोसता, और जलसे की बातें सुनकर ही संतोष करता रहा।

अब तो यह सिलसिला ही चल पड़ा, हर होली को सुबह ही चाचा के दरवाजे पर गदहा खड़ा हो जाता, वे उस पर बैठ जाते और कारवां चल देता,  पीछे-पीछे छोटे, बड़े, बच्चे, बूढ़े व युवकों की टोली और बीच में ढोल मजीरा बजाती मंडली। ऐसा लगता कि वे दूल्हा बनकर घोड़ी पर बैठे हों, और पीछे पीछे उनकी बारात चल रही हो। शाम को उन्हें होली का तोहफा दिया जाता।
चाचा की होली की टोली में, जो एक बार शामिल हो जाता, वह सदैव के लिए उसका अभिन्न अंग बन जाता। उसे उस जुलुस के बिना होली नहीं भाती। कई बार, गांव वालों की कई रिश्तेदारियों से भी लोग, होली का पर्व मनाने वहां आ जाते।
अब तो वर्षों बीत चुके थे। गदहे पर सवार, दूल्हा बने चाचा की बारात, होली पर हर साल निकलती, और वे अपनी शादी की बारात को याद करके उसका भरपूर लुत्फ़ लेते। ढोल, झाल, नगाड़ा भी बजता बस मंगल गीत के स्थान पर होली गीत व फगुआ गाये जाते। 

आज होली का दिन है,
सुबह ही चाचा अपने काम से फारिक होकर, नमाज वगैरह पढ़कर, तैयार बैठ गए है। चाची भी गुलगुले बना चुकी है।
'ये लो गुलगुले खा लो, अभी गरम हैं।'
'अभी नहीं, मेरा शाम के लिए रख दो।  घर पर ही सब खा लूंगा, तो टोली में क्या खाऊंगा!'
चाचा अब होली की टोली का इन्तजार करते दोपहर होने को आ गयी, मगर उन्हें होली के लिए बुलाने अभी तक  कोई नहीं आया। धीरे धीरे चाचा का मन व्याकुल होने लगा, और भांति भांति की आशंकाओं से भर गया। लगता है, पिछली होली में कोई गलती हो गयी। वे याद करने लगे, परन्तु ऐसा कुछ नहीं दिख रहा था। उनका दिल उदास और हताश होता जा रहा था।
तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, चाचा ने लपक कर खोला।
पडोसी की लड़की बोली, 'चाची कहाँ हैं? माँ ने सेवई बनाने वाली मशीन माँगा है।'
चाचा मुंह बनाकर अपने स्थान पर लौट आये। 'चाची अंदर हैं, चली जाओ।'
जरा सी भी आहट होती, चाचा दरवाजे की ओर झांक लेते। कई बार तो दरवाजा खोलकर बाहर देखा भी, मगर ना गदहा ना ही कोई आदमी। बारह से ऊपर हो गए, मगर कोई नहीं आया। चाचा मायूस हो चुके थे। अब उनकी चिंता विस्वास में बदलने लगी थी, अवश्य ही कोई न कोई गलती हुई है, जिसके कारण, गांव के लोग मुझसे नाराज हो गए हैं। हंसी मजाक तो सबसे करते ही रहते थे, कहीं किसी को कोई अभद्र बात तो नहीं कह दिया! आखिर इस बार, कोई क्यों नहीं आया। भांति भांति की भ्रान्ति मन में आने लगी। यदि उन्हें पता चले क्या त्रुटि हुई  है तो क्षमा मांगने में तनिक भी देर नहीं लगाएंगे।
दोपहर होने तक, वे इस कदर उदास हो गये कि चाची के मायके जाने पर भी, कभी इतना उदास नहीं हुए होंगे।  अभी तक कुछ खाया पिया भी नहीं था। चूकि जगह- जगह गुजिया, पुआ, पकौड़े खाना पड़ता, वे बिना खाए ही घर से निकलते। इंतजार करते पहर लटक गयी, तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। अब तो, चाचा का द्वार की ओर देखने को भी मन भी नहीं हो रहा था।
'चाची बोली देखो जी! कोई है। '
'कोई नहीं है, हवा होगी।'
खटखटाने की फिर आवाज आई, चाची उठकर दरवाजा खोली -
अरे बेटा! आज कहाँ रह गये तुम लोग? देखो, तुम्हारे चाचा कैसे मुंह लटका के बैठे हैं, लग रहा है मातम छा गया है। अब तक होली नहीं खेली, लग रहा है इनका सब कुछ लुट गया है।'
'चाची, क्या करें! चाचा के लिए सवारी का बंदोबस्त नहीं हो पाया। गांव तो गांव, दूसरे गांव तक भी हम गये पर कोई गदहा नहीं मिला। मुंह माँगा किराया देने को तैयार थे। नौबत के मरने के बाद. उनके लड़के ने अपना काम बदल लिया, और 'भोलू' को बेच दिया। अब तो हम सब मिल कर, चाचा को अपने कंधे पर घुमाएंगे।'
अब था कि भोलू के बिना, चाचा जाने को तैयार नहीं थे। अब तक उनका मन वैसे ही टूट चुका था। बड़ी मिन्नत करने पर चाचा चले तो, मगर पैदल ही। लग ही नहीं रहा था कि यह चाचा की होली की टोली है। टोली में न तो वो रौनक थी, न ही झाल-मजीरे में वो तान। चाचा का जुलुस आगे बढ़ तो रहा था, मगर किसी को मजा नहीं आ रहा था। उनके जुलुस की जान तो 'भोलू' ही था, उसके साथ चाचा की जोड़ी जमती थी। आज वे अधूरे लग रहे थे। एक तो वैसे ही वक्त ज्यादा हो चुका था, ऊपर से लोग भी मुरझाये से लग रहे थे। यह किसी उत्सव का जुलुस नहीं लग रहा था, बल्कि लग रहा था जैसे कोई मय्यत जा रही हो।
जुलुस थोड़ा और आगे बढ़ा ही था कि एक हुड़दंगी लड़के को करन का तांगा दिख गया। तांगा दो साल से एक ही जगह पड़ा, मरम्मत का इंतजार कर रहा था। करन के पास उसके मरम्मत का इंतजाम नहीं हो पा रहा था। फिर क्या था, दो तीन लडके लपके और उसे ही खिंच लाये, अब चाचा का उस पर बिठा दिया गया। होली की टोली का काम कुछ आसान हो गया और चाचा भी थकान से बच गए। चाचा की रथ यात्रा चल पड़ी।  इस बार समय कम रह जाने के कारण, उतनी अधिक रौनक तो नहीं रह गयी थी, मगर चाचा के लिए आने वाली होलियों के लिए रथ का इंतजाम हो गया था।

चाचा आशिक अली, अब तो नहीं रहे; मगर उनके साथ जिये लोगों को, होली चाहे भूल जायं, चाचा को भूल पाना असंभव है।

(C) एस० डी० तिवारी