मुफ्त की काफी
दीपक अकेला ही रहता था। शाम को अकेले घर पर समय काटना बड़ा कठिन हो जाता। सिडनी में अधिकतर ऑफिस समय पर ही बंद हो जाते हैं। इस कारण वह वहां भी देर तक समय नहीं बिता सकता था। ऑफिस के सहकर्मी तो छुट्टी के पश्चात पब आदि में चले जाते और सप्ताहांत की छुट्टी घर से बाहर कहीं समुद्र तट या खेल आदि में बिताते। सबका अपना अपना तरीका था। दीपक को पब जाने से परहेज था क्योंकि वह मंहगा था। जो मित्र बन पाये थे वे दूर रहते थे अतः रोज मिल पाना संभव नहीं था। अब शाम का समय बिताने का जो तरीका बचता था या तो टेलीविज़न देखे या साथ शराब पिए। टेलीविज़न भी अकेले देखने में क्या मजा। पुस्तक पढ़ना तो अब बोझ जैसा था, पढ़ाई में बहुत पढ़ चुका।
उसे पता चला कि वहां समीप में ही एक क्लब है जिसकी सदस्यता शुल्क नाम मात्र की है। एक दिन वह वहां गया
और उसकी भव्यता देख चकित रह गया। वातानुकूलित भवन, साफ सुथरा अंदर का वातावरण, तरह- तरह के कैसिनो के खेल। सदस्य्ता शुल्क सुनकर तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा मात्र १० डॉलर प्रति वर्ष और कोई प्रवेश शुल्क नहीं। बस फिर क्या बात थी झट १० डॉलर निकला और शुल्क देकर क्लब का सदस्य बन गया। सदस्य बनने में बस कोई एक मिनट लगे होंगे। अंदर भांति भांति की गेमिंग मशीन लगी हैं। किसी मशीन पर बैठ जाओ और जब तक मन करे, खेलो और भाग्य प्रबल हो तो डॉलर भी कमाओ। और तो और निशुल्क चाय काफी की भी व्यवस्था थी। समय बिताने को और क्या चाहिए। अब तो शाम को वह समीप के क्लब में चला जाता और निशुल्क चाय, काफी का आनंद उठाता। बस नाश्ता या खाने के सामान का पैसा देना होता। क्लब के भवन में ही दो तीन अच्छे रेस्तरां और बार भी थे। ड्यूटी से आने के बाद चाय नाश्ता बनाने के चक्कर में कौन पड़े। वह क्लब चला जाता ; चाय, नाश्ता मिल जाता कभी कभी गेमिंग मशीन पर खेलने से कमाई भी हो जाती। उसके लिए यह सोने में सुहागा सा लगा।
क्लब आने जाने की निशुल्क बस सुविधा भी थी। इतना कुछ बिना पैसे के। किसका जी नहीं चाहेगा वहीँ जमा रहे और वातानुकूलित भवन में में बैठे गरम चाय काफी का आनंद ले।
एक दिन क्लब में मशीन पर खेलते हुए उसे एक युवक दिखा जो भारतीय लग रहा था। उसके पास जाकर उसने पूछ लिया क्या आप भारत से हैं ? उत्तर मिला 'हाँ' ।
'कहाँ से ?'
'चंडीगढ़ से। और भी दो तीन भारतीय यहाँ खेलने आते हैं।'
'चलिए, मिलके बहुत अच्छा लगा। अकेले बोर होता था। आपका नाम ?'
'राजीव'
'यहाँ रोज आते हैं'
'कभी, कभी। अभी परिवार भारत गया है इसलिए कभी कभी आ जाता हूँ। समय अच्छा कट जाता है।'
'कुछ कमाया इन मशीनों से ? सुना है लोग यहाँ गँवा कर ही जाते हैं।'
किन्तु दीपक का भाग्य साथ दे रहा था वह कुछ पैसे बना चूका था। बोला -
'कभी कभी कुछ मिल जाता है । मैं तो समय बिताने के लिए थोड़े पैसे से खेलता हूँ। ज्यादा लगाओ तो तो कमाई के अवसर भी अधिक हो जायेंगे। अभी थोड़ा अनुभव ले लूँ।'
'और आप कहाँ से ? राजीव ने दीपक से पूछा।'
'दिल्ली से, अभी कुछ महीने पहले ही आया हूँ।'
'अरे, फिर तो पडोसी है ठहरे। बहुत अच्छा। किसी दिन घर आना। अपने लोग मिलते हैं तो कितना अच्छा लगता है। और कहाँ काम करते हो ?'
'सिटी में एक आई टी कंपनी है। '
'और अभी अकेले हो '
'हां'
'ठीक है, देखना, बस इसका चश्का मत लगा लेना।'
अब तो साथ मिल गया, कभी कभार बार में बियर, व्हिस्की का दौर भी चल जाता था। दीपक को यहाँ से कमाई होने लगी और खेलने का चश्का भी बढ़ता गया। काम से आने के बाद सीधे क्लब। पहले कभी कभी छुट्टी के दिन दोस्त मित्रों से मिलने उनके घर या उनके साथ कहीं घूमने चला जाता था। अब तो क्लब गए बिना एक दिन भी नहीं रहता। धीरे धीरे कुछ पैसे जोड़ लिए। अब सोचा थोड़ा बड़े दाव खेल कर कुछ अधिक पैसे बन जायँ तो एक फ्लैट भी खरीद लेगा और मकान का किराया देने से छुटकारा मिल जायेगा। भारी भरकम किराया देना बहुत कहलाता था। अगर रुपये में देखें तो एक लाख रुपये प्रति माह।
इधर राजीव कुछ दिनों से नहीं आ रहा था। लगता है उसका परिवार आ चुका। अब दीपक अकेले ही खेलने लगा। इंटरनेट से औरों के अनुभव पढ़कर उसका आत्मविस्वास भी बढ़ गया था। कुछ कमाई बढ़ी और साथ दीपक का लोभ। अब तो कैसिनो को वह काफी समय देता, कभी कभी काम से छुट्टी करके भी वहां चला जाता। उसका फ्लैट खरीदने का सपना सच होने के समीप आने लगा था।
राजीव से मिले अब दो वर्ष हो चुके थे। एक दिन सिटी मॉल में कुछ सामान खरीदने गया वहीँ राजीव मिल गया।
'अरे, दीपक! कहाँ हो भाई, इतने दिन से न कभी मिले न फ़ोन किया। और सब कैसे है ? मकान वगैरह खरीद लिया कि नहीं। मैं तो एक और मकान देख रहा हूँ। सोचा इसी बहाने कुछ इन्वेस्टमेंट हो जाएगी और किराये से आमदनी भी बढ़ जायेगी।'
'अभी कहाँ लिया यार। कुछ पैसे कमाये थे। एक दिन मैंने रोलेट में जयादा पैसे लगा दिये सब चले गये। फिर गंवाए पैसे फिर से कमाने के लिए मैं लगाता गया, मशीन खाती गयी। नुकसान इतना हो गया कि काम से छुट्टी ले लेकर खेलने लगा, मगर भाग्य ने बिलकुल भी साथ नहीं दिया। पैसे तो बने नहीं, अधिक छुट्टी करने के कारण नौकरी से और निकाल दिया। अब दूसरी जॉब ढूंढ रहा हूँ। जो सेविंग की थी सब समाप्त हो चुकी है। शीघ्र जॉब नहीं मिली तो घर से पैसे मंगाने पड़ेंगे। '
'ओ हो, यह तो बहुत बुरा हुआ। मैंने पहले ही कहा था, यह गेमिंग का चश्का, है ही ऐसा है। चल कोई बात नहीं, अब से संभल जा। '
'हाँ, अब तो कान पकड़ लिया है। कैसिनो भूल कर भी नहीं जाऊंगा। '
'अरे, मेरी कंपनी में आई.टी. में एक जगह खाली है तू एप्लीकेशन डाल दे। जी. एम. से मेरी अच्छी पटती है, मैं बात कर लूँगा।'
इस बात से दीपक के जान जान में जान आ जाती है।
दीपक अकेला ही रहता था। शाम को अकेले घर पर समय काटना बड़ा कठिन हो जाता। सिडनी में अधिकतर ऑफिस समय पर ही बंद हो जाते हैं। इस कारण वह वहां भी देर तक समय नहीं बिता सकता था। ऑफिस के सहकर्मी तो छुट्टी के पश्चात पब आदि में चले जाते और सप्ताहांत की छुट्टी घर से बाहर कहीं समुद्र तट या खेल आदि में बिताते। सबका अपना अपना तरीका था। दीपक को पब जाने से परहेज था क्योंकि वह मंहगा था। जो मित्र बन पाये थे वे दूर रहते थे अतः रोज मिल पाना संभव नहीं था। अब शाम का समय बिताने का जो तरीका बचता था या तो टेलीविज़न देखे या साथ शराब पिए। टेलीविज़न भी अकेले देखने में क्या मजा। पुस्तक पढ़ना तो अब बोझ जैसा था, पढ़ाई में बहुत पढ़ चुका।
उसे पता चला कि वहां समीप में ही एक क्लब है जिसकी सदस्यता शुल्क नाम मात्र की है। एक दिन वह वहां गया
और उसकी भव्यता देख चकित रह गया। वातानुकूलित भवन, साफ सुथरा अंदर का वातावरण, तरह- तरह के कैसिनो के खेल। सदस्य्ता शुल्क सुनकर तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा मात्र १० डॉलर प्रति वर्ष और कोई प्रवेश शुल्क नहीं। बस फिर क्या बात थी झट १० डॉलर निकला और शुल्क देकर क्लब का सदस्य बन गया। सदस्य बनने में बस कोई एक मिनट लगे होंगे। अंदर भांति भांति की गेमिंग मशीन लगी हैं। किसी मशीन पर बैठ जाओ और जब तक मन करे, खेलो और भाग्य प्रबल हो तो डॉलर भी कमाओ। और तो और निशुल्क चाय काफी की भी व्यवस्था थी। समय बिताने को और क्या चाहिए। अब तो शाम को वह समीप के क्लब में चला जाता और निशुल्क चाय, काफी का आनंद उठाता। बस नाश्ता या खाने के सामान का पैसा देना होता। क्लब के भवन में ही दो तीन अच्छे रेस्तरां और बार भी थे। ड्यूटी से आने के बाद चाय नाश्ता बनाने के चक्कर में कौन पड़े। वह क्लब चला जाता ; चाय, नाश्ता मिल जाता कभी कभी गेमिंग मशीन पर खेलने से कमाई भी हो जाती। उसके लिए यह सोने में सुहागा सा लगा।
क्लब आने जाने की निशुल्क बस सुविधा भी थी। इतना कुछ बिना पैसे के। किसका जी नहीं चाहेगा वहीँ जमा रहे और वातानुकूलित भवन में में बैठे गरम चाय काफी का आनंद ले।
एक दिन क्लब में मशीन पर खेलते हुए उसे एक युवक दिखा जो भारतीय लग रहा था। उसके पास जाकर उसने पूछ लिया क्या आप भारत से हैं ? उत्तर मिला 'हाँ' ।
'कहाँ से ?'
'चंडीगढ़ से। और भी दो तीन भारतीय यहाँ खेलने आते हैं।'
'चलिए, मिलके बहुत अच्छा लगा। अकेले बोर होता था। आपका नाम ?'
'राजीव'
'यहाँ रोज आते हैं'
'कभी, कभी। अभी परिवार भारत गया है इसलिए कभी कभी आ जाता हूँ। समय अच्छा कट जाता है।'
'कुछ कमाया इन मशीनों से ? सुना है लोग यहाँ गँवा कर ही जाते हैं।'
किन्तु दीपक का भाग्य साथ दे रहा था वह कुछ पैसे बना चूका था। बोला -
'कभी कभी कुछ मिल जाता है । मैं तो समय बिताने के लिए थोड़े पैसे से खेलता हूँ। ज्यादा लगाओ तो तो कमाई के अवसर भी अधिक हो जायेंगे। अभी थोड़ा अनुभव ले लूँ।'
'और आप कहाँ से ? राजीव ने दीपक से पूछा।'
'दिल्ली से, अभी कुछ महीने पहले ही आया हूँ।'
'अरे, फिर तो पडोसी है ठहरे। बहुत अच्छा। किसी दिन घर आना। अपने लोग मिलते हैं तो कितना अच्छा लगता है। और कहाँ काम करते हो ?'
'सिटी में एक आई टी कंपनी है। '
'और अभी अकेले हो '
'हां'
'ठीक है, देखना, बस इसका चश्का मत लगा लेना।'
अब तो साथ मिल गया, कभी कभार बार में बियर, व्हिस्की का दौर भी चल जाता था। दीपक को यहाँ से कमाई होने लगी और खेलने का चश्का भी बढ़ता गया। काम से आने के बाद सीधे क्लब। पहले कभी कभी छुट्टी के दिन दोस्त मित्रों से मिलने उनके घर या उनके साथ कहीं घूमने चला जाता था। अब तो क्लब गए बिना एक दिन भी नहीं रहता। धीरे धीरे कुछ पैसे जोड़ लिए। अब सोचा थोड़ा बड़े दाव खेल कर कुछ अधिक पैसे बन जायँ तो एक फ्लैट भी खरीद लेगा और मकान का किराया देने से छुटकारा मिल जायेगा। भारी भरकम किराया देना बहुत कहलाता था। अगर रुपये में देखें तो एक लाख रुपये प्रति माह।
इधर राजीव कुछ दिनों से नहीं आ रहा था। लगता है उसका परिवार आ चुका। अब दीपक अकेले ही खेलने लगा। इंटरनेट से औरों के अनुभव पढ़कर उसका आत्मविस्वास भी बढ़ गया था। कुछ कमाई बढ़ी और साथ दीपक का लोभ। अब तो कैसिनो को वह काफी समय देता, कभी कभी काम से छुट्टी करके भी वहां चला जाता। उसका फ्लैट खरीदने का सपना सच होने के समीप आने लगा था।
राजीव से मिले अब दो वर्ष हो चुके थे। एक दिन सिटी मॉल में कुछ सामान खरीदने गया वहीँ राजीव मिल गया।
'अरे, दीपक! कहाँ हो भाई, इतने दिन से न कभी मिले न फ़ोन किया। और सब कैसे है ? मकान वगैरह खरीद लिया कि नहीं। मैं तो एक और मकान देख रहा हूँ। सोचा इसी बहाने कुछ इन्वेस्टमेंट हो जाएगी और किराये से आमदनी भी बढ़ जायेगी।'
'अभी कहाँ लिया यार। कुछ पैसे कमाये थे। एक दिन मैंने रोलेट में जयादा पैसे लगा दिये सब चले गये। फिर गंवाए पैसे फिर से कमाने के लिए मैं लगाता गया, मशीन खाती गयी। नुकसान इतना हो गया कि काम से छुट्टी ले लेकर खेलने लगा, मगर भाग्य ने बिलकुल भी साथ नहीं दिया। पैसे तो बने नहीं, अधिक छुट्टी करने के कारण नौकरी से और निकाल दिया। अब दूसरी जॉब ढूंढ रहा हूँ। जो सेविंग की थी सब समाप्त हो चुकी है। शीघ्र जॉब नहीं मिली तो घर से पैसे मंगाने पड़ेंगे। '
'ओ हो, यह तो बहुत बुरा हुआ। मैंने पहले ही कहा था, यह गेमिंग का चश्का, है ही ऐसा है। चल कोई बात नहीं, अब से संभल जा। '
'हाँ, अब तो कान पकड़ लिया है। कैसिनो भूल कर भी नहीं जाऊंगा। '
'अरे, मेरी कंपनी में आई.टी. में एक जगह खाली है तू एप्लीकेशन डाल दे। जी. एम. से मेरी अच्छी पटती है, मैं बात कर लूँगा।'
इस बात से दीपक के जान जान में जान आ जाती है।