Friday, 22 December 2017

Neev ki int

नींव की ईंट

 'ये लो साहब! नींव खुदकर बिल्कुल तैयार है, लेकिन पंडित जी तो अभी तक नहीं आये,' बिरजू बोला।
'बस आते ही होंगे, ग्यारह बजे का समय दिया था, अभी पांच मिनट ही ऊपर हुए हैं। दस पांच मिनट इधर उधर तो हो ही जाते हैं। जा, चट्टे से पांच नयी इंटें उठाकर यहाँ ले आ। नींव की पूजा हो जाने के बाद मेरे हिस्से में आई  पुरानी ईंटों से नींव भर देंगे।' झबरू पांडेय बोले।
'पुरानी ईंट क्यों साहब? नया मकान बन रहा है तो ईंट भी नयी लगाइये।'
'अरे नया कहाँ, पुराना मकान ही तो गिरवाकर दुबारा बना रहे हैं। जा जल्दी ले आ।'
बगल में खड़ा राज मिस्त्री बोल पड़ा, 'पांड़े बाबा ठीक ही तो कह रहे हैं, वैसी ईंट अब कहां बन रही हैं।  देख कितनी लाल हैं और अभी तक कहीं से एक झिर्री तक नहीं निकली, और वो तो नींव में लगनी हैं।'

'अरे, पंडित जी आ गए। मोहन बेटा, जरा जाओ चाची से पूजा का सब सामान मांग के ले आओ।  उनको बता देना चांदी का नाग अलमारी में रखा है। ...
और विवेक तू जरा आम का पल्लव तोड़ ला ...
आईये पंडित जी, यहाँ सब तैयार है, बस आपकी ही प्रतीक्षा थी।'
'हां, एक और जगह पूजा करनी थी, थोड़ी देर हो गयी।  सब सामान मंगाइये, पूजा आरम्भ करें। '
'बस पंडित जी मोहन लेकर आ ही रहा है।  तब तक आप आसन वगैरह बनाइये।'

'आज से लगभग पच्चीस वर्ष पहले भी मैंने ही यहाँ नींव की स्थापना कराई थी। तब आपके बाबा भी जीवित थे।'
वहीँ खड़े ठाकुर देवनाथ बीच में ही बोल पड़े, 'पंडित जी इस बार जरा ठीक से नींव की स्थापना करना। फिर से न उजड़े।'
पंडित जी भौचक्के ठाकुर देवनाथ का मुंह ताकने लगे, 'हां, मगर यह सब हुआ कैसे ? इतना मजबूत और सुन्दर मकान बना था, कैसे उजाड़ गया ?'
'बस पूछिए मत। कहते हैं न, भाईयों के झगड़े में नींव की ईंट भी फोड़ कर बंटती है। समझिये, ऐसा कुछ यहाँ भी हुआ है।'
'तो बताईये! भला, नींव की पूजा से भाइयों के कुविचार कैसे बदल देंगे।  इसके लिए तो, उन्हें भी मन को शुद्ध और साफ़ रखना होगा, न।'

पंडित जी की और जानने की जिज्ञासा ने, देवनाथ से पूरी कहानी कहलवा दिया ....

'पांड़े बाबा तो सरकारी नौकरी में रहने के कारण, घर कम ही आ पाते थे। उनके सगे भाई, सदानन्द ने विवाह नहीं किया और साधु के जैसा जिंदगी बिताया। वह साधुओं की टोली में इधर उधर घूमता रहता था। झबरू पांडेय जी की पत्नी व  तीनों बेटियां गांव में उनके चचेरे भाइयों गोकुल और मुकुल के परिवार के साथ ही रहती थीं।
पूरे परिवार में, केवल वे ही पढ़े लिखे थे, उस ज़माने में उन्होंने मैट्रिक पास कर लिया था। मैट्रिक होने के कारण उन्हें आसानी से सरकारी नौकरी मिल गयी। दोनों चचेरे भाइयों में से गोकुल पांचवीं तक पढ़ पाया और मुकुल तो दूसरी भी पास नहीं किया। हाँ, कूटनीति की विद्या में दोनों ही झबरू से कहीं बहुत आगे थे। झबरू, परिवार में सबसे बड़े होने और नौकरी करने के कारण, परिवार का पूरा बोझ उठाये रखते थे। नौकरी में होने से, परिवार को उनसे रुपये-पैसों की भी बहुत अधिक अपेक्षा रहती। जब उनके पिता जी जीवित थे, तभी से उनका घर पर नियमित पैसे भेजने का क्रम चला आ रहा था। गोकुल और मुकुल खेती में मंजे हुए थे। उस समय खाद पानी की समस्या तो थी ही, खाने भर अनाज तो पैदा तो हो जाता पर उसमें से बेच भी लें, इतना नहीं होता। घर में नकदी की सभी आवश्यकताएं झबरू ही पूरी करते। झबरू के भेजे पैसे के कारण पुरे परिवार का जीवन स्तर गांव के अन्य लोगों से बढ़िया था। उनके कारण, उस ज़माने में भी इन लोगों का अपना नलकूप और घर पर ट्रैक्टर था।
झबरू, पढाई का महत्त्व समझते थे, इसलिए लड़कियों और भाइयों के बच्चों की पढ़ाई पर जोर देते। वे बेटियों को खूब पढ़ाना लिखाना चाहते थे। मगर, उनके वे चचेरे भाई अपने पुत्रों को तो पढ़ाना चाहते थे, पर यह नहीं चाहते कि लड़कियां पढ़ें लिखें। झबरू के भेजे हुए पैसे, वे घर बनाने और उसके रख रखाव में खर्च कर देते। गोकुल और मुकुल के पुत्र भी पढ़ने में अधिक रूचि नहीं रखते। दोनों के दो दो पुत्र थे। कई प्रयासों के पश्चात्, गोकुल का बड़ा बेटा माध्यमिक परीक्षा पास कर पाया। बाकी सभी तो मैट्रिक भी पास नहीं कर पाए और सभी के सभी बच्चे खेती में ही रह गए।
झबरू ने बड़ी बेटी का विवाह अल्पावस्था में ही कर दिया, किन्तु दोनों छोटी बेटियों को पढ़ाने के लिए साथ शहर ले गए। वे चाहते थे कि उनकी बेटियां आत्मनिर्भर हो जायं। पढ़ लिख लेने से, विवाह के बाद भी ससुराल में उन्हें मान मर्यादा मिलती रहेगी। और हुआ भी वही, बेटियों का विवाह संपन्न परिवार में कर दिया और वे अपने अपने ससुराल में सुखपूर्वक रह रही थीं। इधर बच्चों के बड़े होने के साथ, गोकुल और मुकुल की आवश्यकताएं बढ़ती गयीं, और बात बात पर तकरार होने लगी। दोनों में मनमुटाव निरंतर बढ़ता गया। हमेशा किसी न किसी बात पर खट-पट होती रहती थी, और कई बार तो झगड़े का रूप ले लेती। झगड़े में उनकी पत्नियों की भूमिका भी कम न थी। दोनों खूब बढ़ चढ़ के लड़ लेतीं। उनके बीच झगड़ा होने पर, बड़ी पडाईन तटस्थ रहती थीं। उन्हें दोनों देवरानियों का सम्मान समान रूप से मिलता रहता।'
'लेकिन घर कैसे उजड़ा ?' पंडित जी ने फिर पूछा।
'वही,  चचेरे भाइयों के झगड़ों ने बंटवारा करा दिया। एक दिन दोनों में खूब झगड़ा हुआ और झबरू को खबर भिजवा दिया गया, जल्दी से जल्दी आ जाओ, घर का बंटवारा होना है। झबरू तो संतोषी व्यक्ति थे और उन्हें अधिक की आवश्यकता भी नहीं थी। तब तक बेटियों का विवाह  कर चुके थे, खुद का क्या? मियां-बीबी कहीं भी रह लेंगे। सरकारी नौकरी में थे ही, बुढ़ापे में पेंशन मिलेगी, जिसके साथ रहेंगे, वही सिर पर उठाये रखेगा। उन्होंने वहीँ से सन्देश भिजवा दिया कि गोकुल और मुकुल खेत और घर बांट लें तथा उनका हिस्सा छोड़ दें, जब आएंगे तो देखेंगे।

बंटवारे में गोकुल और मुकुल की बुद्धि समान स्तर पर कार्य करने लगी। अच्छी जमीन तथा नया वाला घर वे अपने हिस्से में ले लिए और दूर के खेत तथा संकरी गली में स्थित पुराना मकान झबरू के हिस्से में आया। नया घर बहुत छोटा था, पर खुल्ले में था और यहाँ बहुत सी जमीन थी। पांड़े बाबा को गली के अंदर वाला मकान यह कहकर दिया कि तुम्हारे पैसे से बना है। यह सुनकर बाबा को इस बात से संतोष हुआ, चलो मेरे दिए पैसे को तो इन्होने महत्त्व तो दिया।
तीनों बेटियां अपने-अपने घर में सुखी थीं। न तो पांड़े बाबा को न ही उनकी पत्नी को अपने हिस्से को लेकर कोई खास दिलचस्पी थी। उन्हें पता था, सेवानिवृत्ति के पश्चात्, गोकुल या मुकुल में से ही किसी के साथ रहना है। जो कुछ हिस्से में आएगा वह सब जिसके साथ रहेंगे, उसे ही सौंप देंगे। वैसे तो सरकारी नौकरी है, पेंशन मिलेगी; उसी से उनका सब काम चल जायेगा। बस ये है, जन्मभूमि छोड़कर, बेटियों के यहां रहने नहीं जायेंगे।'

'लेकिन यह तो सरासर अन्याय है। जो गांव में घर पर नहीं रहता, उसके साथ घर वाले भी बेईमानी करने से नहीं चूकते। जमीन जायदाद का मामला ही ऐसा है। वैसे तो पुस्तैनी जमीन में बेटियों का भी हक़ होता है। उनमें से किसी ने आपत्ति नहीं जताई।' पंडित जी ने पूछा।
'हाँ, बेटियां अपने ससुराल में ही व्यस्त थीं। उन्हें इधर ये सब देखने की फुरसत कहाँ थी। और तब भी इन्हें कहाँ संतोष हुआ। नये मकान में केवल दो ही कमरे बने थे और पुराने दो मंजिले मकान में सात-आठ कमरे थे। गोकुल और मुकुल ने यह कहकर की बहुओं के लिए, अंदर वाला मकान अधिक उचित है; एक-एक कमरा उसमें भी कब्जिया लिया। झबरू को इसमें भी कोई आपत्ति नहीं हुई। वैसे भी मकान में कोई नहीं रहेगा तो भूत का डेरा हो जायेगा। अच्छा ही है, ये लोग रहेंगे तो कम से कम चहल-पहल रहेगी और साफ़ सफाई होती रहेगी। बेटियों में से भी कोई आयेगा तो घर में चहल पहल रहेगी।'
'अच्छा! भला बताओ!'
'अब झबरू के सेवानिवृत्ति का समय समीप आ गया। गोकुल और मुकुल को चिंता सताने लगी कि कहीं झबरू घर वापस आयें तो पुराना घर छोड़ने को कह दें।  और तो और, उन्हें यह भी डर था कि कहीं आगे चलकर, झबरू अपना मकान बेटियों को न दे दें। गोकुल ने चाल चली और बोला, पुराने मकान में बहुत अधिक ईंटें लगी हैं।  नए वाले मकान से लगभग छः-सात गुना, इसलिए आधे मकान की ईंट उखाड़ ली जायें और उन्हीं ईंटों से अपने हिस्से के मकान में कुछ और निर्माण कार्य करवा लें। गोकुल और मुकुल ने मिलकर, यह प्रस्ताव झबरू के समक्ष रखा। झबरू इस प्रस्ताव से बहुत खिन्न हुए। उन्होंने कहा, यही करना था तो तुम लोग वो पुराना मकान भी अपने पास ही रखते। मैं बाहर सहन में अपने लिए एक कमरा बनवा लेता। हमें तो बस दो मुर्गी को रहना था, इतना बड़ा मकान क्या करना था। खैर, वो दो भाई और भरा पूरा परिवार और इधर पांड़े बाबा अकेले, उनको साथ रखे बिना इनका काम कैसे चलता। वो जो कहते गए, ये हाँ करते गए।

अंततः, इन सब बातों से क्षुब्ध, झबरू ने कह दिया पूरा मकान ही उजाड़ दो, वे अपने रहने के लिए गांव से सटे अपने खेत में मकान बनवा लेंगे। फिर क्या था शेर और ऊंट वाली कहानी हो गयी। वे दोनों भाई घर उजाड़ने के लिए टूट पड़े। देखते ही देखते वह आलीशान मकान खंडहर में बदल गया। घर में लगी आधी से भी अधिक ईंटे उखड़ कर बाहर आ गयीं। सारा गांव तमाशा देख रहा था। घर को उजड़ते दुःख तो सभी को हो रहा था पर किसी को समझाने बुझाने, आगे कोई नहीं आया। गोकुल और मुकुल के ससुराल वालों को पता चला तो वो भी बड़े दुखी हुए। वे लोग रिश्तेदारी करने आते थे तो उन्हें इतना बड़ा मकान देखकर बड़ा गुमान होता था और इसमें उठ बैठ कर बहुत आनंद आता था। वे अपने-अपने गांव में भी अपनी बहनों के घर की प्रशंसा करते नहीं अघाते थे कि उनकी बहन का विवाह कितने बड़े घर में हुआ है। वे चाह कर भी कुछ नहीं बोल पा रहे थे, क्योंकि यह उनके ही बहन के हित की बात थी; उन्हें अपना मकान बनाने के लिए ईंट जो मिल रही थी।
पांड़े बाबा सेवानिवृत्त होकर, गांव से सटे खेत में, अलग घर बनवा कर रहने लगे। भीतर वाले खंडहर में तो वे झांकने भी नहीं जाते। बची खुची ईंटे वहीं रखवा दिए थे। अपने नए मकान में उसमें से एक ईंट भी नहीं लगवाए। इनका खाना पीना गोकुल के ही साथ होने लगा। इनके लिए गोकुल के यहाँ से भोजन बनकर आ जाता। अब गोकुल के परिवार से पांड़े बाबा का प्रेम बढ़ गया था। धीरे-धीरे अंदर वाले मकान पर गोकुल के परिवार का पूरा अधिपत्य हो चुका था।
अब गोकुल के दूसरे बेटे का विवाह होने वाला है। नए घर में स्थान कम होने के कारण, बड़ी वाली बहू पहले ही त्रासदी सह रही है। गोकुल ने सोचा कि अंदर वाले मकान को थोड़ा ठीक करा लिया जाय और चारों ओर  चारदीवारी खड़ी कर दी जाय तो कम से कम, बहुएं वहीँ रह लेंगी। अब गोकुल बहुत पछता रहा था, काश! वो घर उजड़ा नहीं होता तो बहुएं कितने सुख से रह रही होतीं। यह सब उसी के कारण हुआ। उसे क्या पता था, बड़े भइया उसी के साथ रहेंगे और यह सब उसे ही मिल जायेगा।

पांड़े बाबा, गोकुल के छोटे बेटे सोनू को बहुत प्यार करते हैं। सोनू भी इनकी बहुत सेवा करता है। उनके चारपाई, विस्तर से लेकर, पैर दबाने तक का काम भी नियमित रूप से करता है। इसकी शादी को लेकर, झबरू जी बहुत उत्साहित हैं। उनकी प्रबल इच्छा है कि शादी से पहले यह मकान नए सिरे से बन जाय। नये सम्बन्धी देखें तो कहें कि किस घर में हमने बेटी दी है और नई दुल्हन की डोली भी इसी घर में उतरेगी। उन्होंने देर किये बिना ईंटे गिरवा दी हैं। पांड़े बाबा की छोटी बेटी ने कहा भी, जब वहां रहना ही नहीं तो पापा नए सिरे मकान क्यों बनवाने जा रहे हैं। पांड़े बाबा ने उसे समझा लिया, बेटा! हमें रहना इनके ही साथ है, ये सुख से रहेंगे तो हमें भी सुख मिलेगा। गोकुल सोचता अवश्य है, पर वश की कहाँ  कि वह मकान बनवा ले। अब तो वह मन ही मन बहुत पछताता है, कि उसी के कारण इतना बड़ा और सुंदर मकान उजाड़ दिया गया।  उसे पता होता कि यह उसी के काम आना है तो एक ईंट भी टस से मस नहीं होने देता।
अब तो यही देखना है की यह नींव की ईंट कितनी मजबूत है और इस पर खड़ी ईमारत कितना आलीशान होगी।'
'हाँ, सही कह रहे हैं ठाकुर साहब ! भाई तो अगली पीढ़ी में भी होंगे। उनकी कैसी बुद्धि होगी, यह तो इसी पर निर्भर करेगा न।'







Friday, 27 October 2017

Naani ke desh

नानी के देश

कोयी कासिम की तीसरी पीढ़ी है। कोयी की एक नन्हीं सी बेटी है। उसे जब वह देश दुनिया के बारे में बताती है तो यही कहती है, 'यू नेवर गो टू इंडिया, मॉन्स्टर्स रेसाईड देयर।' जब कि उसे हिंदी गीत संगीत और इंडिया की संस्कृत के बारे में सुनकर, बड़ा अच्छा लगता था।
नाना कासिम और नानी अनीसा सौ साल पहले, इंडिया से स्वीडन आये और यहीं के होकर रह गए। उनकी बेटी,
खैर, वहीँ पैदा हुई और बड़ी होकर इब्राहम से शादी कर ली।
कोयी भी बड़ी हो चुकी थी और उसने किम से विवाह कर लिया।
कोयी ने अभी तक इंडिया देखा भी नहीं था।
जब वह चार पांच साल की थी तो एक बार मां के साथ मुंबई गयी जरूर थी, पर उस समय की बात का कहाँ ख्याल था। उसका बार बार मन होता कि वह एक बार अपनी नानी  के देश, इंडिया घूम  कर आये। उसे ताजमहल और काशी में गंगा घाट देखने का बड़ा जुनून था। उसने मन ही मन इंडिया जाने की योजना बननी शुरू कर दी थी। एक दिन कोयी ने किम के सामने इंडिया जाने का प्रस्ताव रख दिया, 'किम! चलो इस बार की छुट्टियां इंडिया में मनाते हैं।'
वैसे तो किम का भी मन एक बार इंडिया घूमने का था, खास तौर से ताजमहल देखने का। मगर उसने उत्तर दिया, 'नो डॉर्लिंग, इस बार नहीं, इन छुट्टियों में अफ्रीका चलते हैं। इंडिया फिर कभी चल पड़ेंगे।'
'मगर, मेरा इंडिया जाने का बड़ा मन है, यू नो मेरे एन्सेस्ट्राल वहीँ के हैं (तुम्हें पता है मेरे पूर्वज वहीँ के हैं )। अब तक एक बार भी इंडिया ठीक से नहीं देखा। इंडिया जाना मेरा एक सपना है। चलो वहीँ चलते हैं, अफ्रीका अगली बार चल पड़ेंगे। ओ. के. डॉर्लिंग!'
एक बार फिर से किम ने कहा, 'इन्डिया में ऐसा क्या रखा है, अभी अफ्रीका भी कहाँ घूमा है, चलो इन छुट्टियों में अफ्रीका चलते हैं। अगली बार इंडिया चल पड़ेंगे। पता नहीं क्यों! अभी इंडिया जाने को मेरा मन नहीं मान रहा।'

परन्तु कोयी के मन में तो इंडिया बसा हुआ था, उसका ननिहाल जो था। उसने ताजमहल के बारे में बहुत सुन रखा था, इंडिया जाने और ताजमहल देखने का सपना वह बचपन से पाले थी। इंडिया के लोगों के बारे में सुना था वे बड़े सीधे सादे होते हैं, वहां की कलाकृतियां पूरे विश्व में बेजोड़ हैं। संयोग ही था, उसे वहां जाने का अब तक अवसर नहीं मिल पाया। वह पहले भी इंडिया जाने की कई बार सोची, बस किसी न किसी कारण वश, उसका कार्यक्रम टल जाता था। इस बार तो ठान ही लिया कि इंडिया जाना है। उसने दोहराया -
' नहीं किम, अफ्रीका फिर कभी हो आएंगे। इस बार इंडिया चलते हैं। किम! तुम्हें इंडिया के बारे में पता नहीं है। कितना सुन्दर मुल्क है। वहां की वेश भूषा, कल्चर और खाना पीना देखने लायक है। ताजमहल का तो तुम्हें पता ही है, दुनिया के आश्चर्यों में से एक है। जानते हो ताजमहल को वहां के एक बादशाह, शाहजहां ने अपनी बीबी की याद में बनवाया था। देख लोगे तो तुम भी मुझसे और ज्यादा प्यार करोगे न। और इंडियन कुजीन का मजा, इंडिया जाकर लेंगे। पता है वहां सब कुछ कितना सस्ता है; रहना, खाना तो यहाँ से एक तिहाई दाम पर।''

कोयी को अपनी नानी के हाथों बने इंडियन व्यंजन अभी तक याद हैं। इण्डिया के बारे में नानी ने जो कहानियां बताई थीं, कोयी के मन में बस गयी थीं। भारतीय व्यंजन की तो वह दीवानी थी। स्वीडन में भी वह इंडियन कुजीन, अक्सर जाया करती थी। कोयी की माँ को तो भारतीय खाना बनाना विरासत में मिला था, मगर कोयी ने खाना बनाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं ली। उसे अपनी पढ़ाई और खेल कूद में ज्यादा अच्छा लगता था। बस एकाध भारतीय व्यंजन ही बनाना जानती थी। बनाने में और बर्तन धोने में उसे झंझट लगता था। वो लोग तो वही सॉसेज, नगेट्स, सैंडविच, बर्गर आदि बना बनाया, खाकर ही काम चलाते थे। वैसे किम को भी भारतीय खाना पसंद था। बस थोड़ा मिर्च, मसालों से उसे परहेज था। कम मसाले वाली सब्जी बड़े चाव से खाता था। राजमा राइस भी उसका फेवरिट (पसंदीदा) था।

इंडिया हो या यूरोप, जोरू के आगे तो सभी को झुकना पड़ता है।  ना चाहते हुए भी किम को 'हाँ' बोलना पड़ा।   
कार्यक्रम फाइनल हो गया, स्टॉकहोम से मुंबई का टिकट बुक हो गया।

धीरे धीरे यात्रा का दिन आ गया। उनके वायुयान ने उड़ान भरी और कुछ घंटों में वे मुंबई पहुँच गए। मुंबई में होटल का कमरा और वहां की आव भगत से वे बड़े प्रसन्न थे। जगह का भरपूर आनंद उठाने के ध्येय से उन्होंने सोचा कि एकाध बार, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी प्रयोग किया जाय। उन्होंने सोचा कि किसी स्थल का सही माने में अनुभव करना हो तो वहां के सार्वजानिक यातायात का प्रयोग करना उत्तम रहेगा। एक बार उन्होंने मुंबई का नक्शा लिया और लोकल ट्रैन में चढ़ गए। चढ़ तो गए, उन्हें ट्रैन की भीड़ के बारे में अंदाजा था नहीं, लग रहा था कि दम ही घुट जायेगा। भीड़ के बीच दबे किसी तरह चर्चगेट पहुंचे। शाम का समय था, चढ़ने वालों की भीड़ पहले ही जमा थी; उनके उतरने से पहले ही लोग चढ़ने लगे। वे उतरने की कोशिश करते रहे, परन्तु भीड़ ने ढकेल कर उन्हें भीतर कर दिया और ट्रेन चल दी। अब वे क्या करते, किसी तरह अगले स्टेशन पर उतर कर, फिर टैक्सी करके नरीमन पॉइन्ट आये। इसके बाद तो वे लोकल ट्रांसपोर्ट से हाथ जोड़ लिए।  

मुंबई के बाद वे दिल्ली पहुंचे। यहाँ उन्होंने पब्लिक ट्रांसपोर्ट का झंझट नहीं रखा। दिल्ली घूमने के बाद, वे आगरा के लिए टैक्सी बुक कराये। दुनिया का सातवां आश्चर्य देखने के लिए किम और कोयी बहुत रोमांचित थे। ताजमहल देखकर उन दोनों वर्षों का सपना पूरा हुआ। जाने कितने ही साल से, वे यह सपना संजोये हुए थे।इतनी सुन्दर ईमारत और वो भी प्रेम की निशानी। क्या कोई अपनी महबूबा की याद में इतनी सुन्दर ईमारत बनवा सकता है, और उसी में उसकी कब्र! यह सोचकर, दोनों बड़े हैरान थे।
कोयी, किम हाथ पकड़ कर बोली, 'तुम भी मेरे नाम का ऐसा ही महल बनवाओगे न !'
किम भी हाजिरजवाब था। बोला, 'इसी को तुम्हारे नाम कर देता हूँ और इसका नाम रख देता हूँ 'कोयीमहल'। 
'मुझे पता है, तुम इसके अलावा और कर भी क्या सकते हो। चलो बनवा नहीं सकते तो यहाँ से ताजमहल का मॉडल तो ले सकते हो।'    
उन्होंने यादगार स्वरुप, अपने देश ले जाने के लिए ताजमहल का छोटा सा मॉडल खरीद लिया। अब उन्होंने मन ही मन सोच लिया जब उनके बच्चे बड़े होंगे तो, एक बार पुनः उनको साथ लेकर, वे ताजमहल देखने अवश्य आएंगे।  अब उनकी टैक्सी वापस दिल्ली के लिए चल दी। राह में टैक्सी ड्राइवर ने उन्हें सीकरी के बुलंद दरवाजा के बारे में बताया तो उन्होंने उसे भी देखने का मन बना लिया।

टैक्सी ड्राइवर उन्हें बुलंद दरवाजा ले गया। इतना बड़ा गेट देखकर, वे दोनों बड़े अचंभित थे। फ़तेह पुर सीकरी का बुलंद दरवाजा देखकर वापस आने में अँधेरा होने लगा था। किम को पेशाब लगी। आस पास कोई मूत्रालय नहीं दिखा। जहाँ लोग कार पार्क किये हुए थे, थोड़ा हटकर एक व्यक्ति खुले में पेशाब कर रहा था। किम ने भी वही क्रिया अपनाना उचित समझा। वह पेशाब करने लगा और कोयी धीरे धीरे टैक्सी की ओर आगे बढ़ती चली गयी। तभी सामने से एक युवक आया और बोला, मैडम! आपकी गाड़ी उधर खड़ी है। जब कोयी उधर को बढ़ी तो देखा काफी सुनसान सा था। उधर दो और लडके खड़े थे। वे दोनों कोयी के समीप आ गए। 'वैरी ब्यूटीफुल, आज हम लोगों के साथ रुक जाओ।'

कोयी कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वे क्या कह रहे हैं। इतने में एक ने कोयी का हाथ पकड़ लिया और दूसरा चुम्बन लेने के लिए उसके गाल की ओर मुंह बढ़ाया। अब तो कोयी हतप्रभ थी, उसने जोर से दोनों को झटक दिया और चिल्लाने लगी, ''किम! किम! कम सून।'
किम ने आवाज सुन लिया और उधर को दौड़ा।
इतने में तीनों कोयी को पकड़कर खेत में खींचने लगे। वह चिल्लाती रही बचाओ, बचाओ। किम आते ही उन पर टूट पड़ा। किम के आ जाने से कोयी की भी हिम्मत बढ़ गयी। अब दोनों मिलकर, उनसे मुकाबला करने लगे। तभी आवाज सुनकर टैक्सी ड्राइवर भी रॉड लेकर दौड़ा। और लोगों को आते देख वे लड़के भाग गए, मगर इतने में कोयी के वस्त्र कई जगह से फट गए थे, और दोनों को कुछ चोट भी लग चुकी थी। अब वे रिपोर्ट लिखवाने थाने पहुंचे। थाना में वही ढुलमुल वाली निति। पहले तो उन्हें यह कहा गया कि कोई खास नुकसान नहीं है, बेकार में रिपोर्ट लिखवाकर क्या फायदा। पर जब किम ने एफ. आई. आर. लिखने पर जोर डाला तो पुलिस वाले कहने लगे आप लोगों ने १०० नंबर पर फोन क्यों नहीं किया?
ड्राइवर ने समझाया, 'बदमाश तो भाग गए, थाना पास था, सोचे सीधे थाने में  रिपोर्ट लिखवा देते हैं। कहिये तो अबसे १०० नंबर पर फोन कर देते हैं।
'ठीक है, वे कैसे कपड़े पहने थे ?'
'एक नीली टी शर्ट और सलेटी पेंट और एक पिली शर्ट और नीली जींस पैंट पहने था, तीसरे का ध्यान नहीं।'
'क्या आप उन्हें पहचान सकते हैं ?'
'वे खौफनाक चेहरे तो कभी भूल ही नहीं सकते। सामने होंगे तो अवश्य।'
'लेकिन आप लोग तो अपने देश चले जाओगे, उन्हें पहचानने कोर्ट में आना पड़ेगा।'
'पहले उन्हें पकड़ो तो! तब की तब देखी जाएगी।'
खैर रिपोर्ट लिखी गयी, मामला विदेशियों का था। पुलिस को भी पता था, इसमें अधिक टाल मटोल नहीं कर सकते, यह मीडिया न्यूज़ भी बन सकती है।  किम और कोयी वापस दिल्ली आ गए। अगले दिन, समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ पर उनका नाम था। यहाँ तक कि उनके देश तक के अख़बारों में यह समाचार छप गया,
'कोयी के साथ बलात्कार की नाकाम कोशिश।'
 एक बुरा सपना लेकर, किम और कोई स्वदेश लौटे। कुछ समय बीते आगरा कोर्ट से ईमेल द्वारा सम्मन आया, अपराधियों की  पहहचान के लिए निर्दिष्ट तिथि को वे आगरा जिला सत्र न्यायलय में उपस्थित हों।
सम्मन पढ़कर, कोयी का दुःस्वप्न फिर से ताजा हो गया। अब तो वह इंडिया आने के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती थी। अपने बच्चों को भी बार बार यही कहती, 'तुम लोग कभी इंडिया घूमने नहीं जाना। वहाँ हैवान रहते हैं।'

Tuesday, 3 October 2017

Producer


वृक्षेश का फोन आया तो अर्निका को बड़ा आश्चर्य हुआ
दोनों ने फिल्म इंस्टिट्यूट से साथ ही डिग्री किया था लेकिन बस दुआ सलाम ही थी। उतनी घनिष्ठता नहीं थी।
'और कैसे है वृक्षेष ? कहीं कोई फिल्म मिली ?'
प्रोफाइल का खर्च
कल क्या कर रहा है? इंडिया पैलेस आ जा।  साथ काफी पिएंगे।
वृक्षेष को तो जैसे मन की मुराद मिल गयी
अगले दिन काफी हाउस में कॉलेज की पुराणी बातें
बता तेरे जैसे इतने अच्छे मेरिटोरियस कलाकारों को भी काम नहीं मिल रहा है तो हमें कौन देगा
वैसे एक प्रोडूसर ने एक साइड रोल के लिए मुझे बुलाया है। अगर मेरी बात बनती है तो तेरे लिए भी बात करुँगी। याद है तुझे एक बार मैंने तुझे कॉलेज से बाहर निकलवा दिया था।
तुझे मैं सचमुच की ही भिखारी समझ बैठी थी।

2
सिन समझने के लिए कमरे में बुलाया है
उसने इनकी व्यभिचार की इतनी कहानियां सुन रखीं थीं कि उसे कदम कदम पर डर लगता था।
आज कल तो रेप सीन के बिना कोई फिल्म ही नहीं पूरी होती। 
 जैसे तैसे फिल्म बानी

३. पहले ही मना किया था।  इस लाइन में फिल्म वालों के बच्चे ही रहेंगे। इसे हेरोइन बनाना था।
इतना तो पढ़ाई का खर्च।  पढ़ लिख लो तो ऊपर से शोषण।

४.
बीमारी का बहाना


५ मेरा बेटा है।  मेरिट  एकाध लाख दे भी दूंगा



Monday, 2 October 2017

Yah din bhi ana tha

यह दिन भी आना था ,

प्रतीक और लीला अपनी बेटी, शेषा के साथ बड़े हंसी ख़ुशी कैनबेरा में जीवन बिता रहे थे। लीला के पापा-मम्मी के कैनबेरा आ जाने पर, उनकी ख़ुशी चार गुना बढ़ गयी। उनके आने से, अब शेषा को अकेलापन नहीं लग रहा था। स्कूल से आने के बाद वह नाना, नानी की अंगुली पकड़ आस पास घूम आती, कभी कहानी सुनाने का आग्रह करती। वह इतनी बातूनी थी कि उसके साथ रामचंद्रन और उनकी पत्नी का भी खूब जी लग रहा था। स्कूल से आते ही, एक एक बात नाना-नानी को बताती , फिर वे हेमंत व लता को ड्यूटी से आने पर हंस हंस कर बताते।

एक बार शेषा को एग्जिमा की शिकायत हुई। लीला ने घरेलू उपचार से ही काम चलना चाहा। एग्जिमा बढ़ता जा रहा था, पर वे डॉक्टर के यहाँ जाने का समय नहीं निकाल पा रहे थे। धीरे धीरे जब काफी बढ़ गया तो वे समीप के चिकित्सा केंद्र ले गए, वहां डॉक्टर ने एग्जिमा को गंभीर बता दिया और विशेषज्ञ को दिखाने के लिए बड़े अस्पताल को रेफर कर दिया। फिर समयाभाव के कारण वे कई दिन तक उसे अस्पताल नहीं ले जा पाये।
रामचंद्रन होमियोपैथी के डॉक्टर थे। उन्होंने सोचा कि वे ही इसका उपचार कर दें । उनके विचार के अनुसार होमियोपैथी में एग्जिमा का अच्छा उपचार उपलब्ध था। वे शेषा को विशेषज्ञ के पास ले जाने की जगह घर पर होमियोपैथी उपचार करने लगे।
रामचंद्रन उपचार करते रहे दो तीन महीने बीत गए और कोई लाभ नहीं मिला। अपितु एग्जिमा का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था। वहां पर सही होमियोपैथी दवाइयां भी नहीं मिल पा रही थीं।  कुछ दवाई उन्होंने अपने के मित्र के द्वारा माँगा लिया था, पर वह समाप्त हो चुकी थी। अब प्रतीक व लीला उसे अस्पताल ले जाने में भी झिझक रहे थे कि इतना समय हो गया अब तो अस्पताल से भी सुननी पड़ेगी।
इधर चिकित्सा केंद्र ने शेषा की फाइल ऑनलाइन बड़े अस्पताल को भेज दी थी। इतने समय तक नहीं दिखाने पर, अस्पताल से पत्र आ गया, जिसमें प्रतीक से अनुरोध किया गया था कि वह शेषा को शीघ्रातिशीघ्र वहां दिखाए।  यदि उसकी उचित चिकित्सा चल रही है तो उसकी सूचना भेजे। प्रतीक शेषा को न तो वहाँ ले ही गया न ही उस पत्र का उत्तर भेजा।
इसी बीच पूरे परिवार को  समारोह में भाग लेने इंडिया जाना था। तभी रामचंद्रन ने सलाह दिया कि इंडिया जा ही रहे हैं, वहां होमियोपैथी के और बड़े डॉक्टर हैं और दवाइयां सरलता से मिल जाएँगी। और तो और हैदराबाद में उनके गुरु डॉ. बनर्जी भी हैं, कोई चिंता की बात नहीं है वहां, ठीक हो जायेगा।
सभी लोग इंडिया चले आये, डॉ. बनर्जी से समय लेकर दिखाया गया उनकी दवा से कुछ लाभ होना आरम्भ तो हुआ पर इतने में वापस कैनबेरा जाने का समय हो चला। प्रतीक लम्बी अवधि की दवा लेकर वापसी की तैयारी करने लगा। इसी बीच शेषा को इंडिया में कोई और इन्फेक्शन हो गया। उसकी तवियत निरंतर ख़राब रहने लगी। डॉक्टर को दिखाया तो उसने कहा, एक्जिमा के अतिरिक्त कोई और इन्फेक्शन है, इसकी गहन जांच करनी पड़ेगी और कई टेस्ट कराने होंगे, तभी बीमारी का सही कारण पता चल पायेगा। अब कैनबेरा जाने में दो तीन दिन का ही समय रह गया था। प्रतीक के लिए सारे जाँच कराना संभव नहीं था। उसने सोचा कि अब कैनबेरा ही जाकर पूरा इलाज कराएगा।

जब वह वापस कैनबेरा आया तो देखा कि इस बीच अस्पताल के दो और पत्र आये हुए हैं। ऐसा लग रहा था कि माँ बाप से अधिक चिंता अस्पताल को ही है। अब तो हालात ऐसे हो चुके थे, अबिलम्ब अस्पताल जाना पड़ा।प्रतीक अस्पताल पहुंचा, तब तक शेषा की हालत काफी बिगड़ चुकी थी।  अस्पताल ने बहुत कोशिश किया, पर शेषा को बचाया नहीं जा सका।
प्रतीक और लीला अपनी बेटी के शोक में डूबे थे तभी उनके घर पुलिस आ गयी। शेषा की चिकित्सा में लापरवाही के कारण, प्रतीक को गिरफ्तार कर लिया गया। घर का डॉक्टर उन्हें बहुत मंहगा पड़ा।


Monday, 21 August 2017

Bibi Pakistan

बीबी पाकिस्तान
Daulat kam karna bhul gaye
Sahan shakti karane ki kshamata

Pattar jode n laa sakate n chhod ke aa aakate

Videshi me love yahan wali wahan wali

देश के बंटवारे में आधे रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए। और तो और मामा मुस्तफा भी चले गए। उस समय मामा अभी अब मामा से मिलने बार बार पाकिस्तान जाना होता

वो मेरी जन्मभूमि है मेरा वतन है वहां मेरी खेली हुई गलियां हैं सखियाँ हैं ते हैं
सीमा पर रो गोलियां चल रही हैं
हम तो समझ रहे थे शायद अमन हो जाये
ये भी तो मेरा वतन है
अल्ला का शुक्र है सलीम का वीसा ख़त्म हो गया था।

उदास बैठी थी अब्दुल दिख गया।

झुम्मन मियां नमक से हिंदुस्तान पाकिस्तान को जोड़ने में लगे हुए हैं। सब दो दो हैं  दोनों देशों की नागरिकता
एक मकान लखनऊ एक लाहौर 

Pakhadu ka ekka


पखड़ू का एक्का

जिसने एक्का की सवारी नहीं की, उसकी हवाई जहाज और मंहगी से मंहगी कर की यात्रा भी व्यर्थ। मैं तो उन भाग्यशाली लोगों में से एक हूँ, जिन्हें पखड़ू के एक्का में सवारी करने का अवसर मिल चुका है। यह सुनहरा अवसर मुझे उसी के गांव में ससुराल होने के कारण मिल सका। पचास साल के पखड़ू का एक्का कितना पुराना था, सही अनुमान लगाना तो कठिन था, परन्तु देख कर लगता था, उसे अपने पिता से विरासत में मिला होगा। हाँ घोड़ी एकदम नई नवेली, बदन से चुस्त दुरुस्त, तंदुरुस्त युवती थी, जिसका नाम था 'जुगनी'।  वह गले में घुंघरू का हार, सिर से लटकी दो दो रंगीन चोटी, माथे पर कौड़ियों की माला पहने सजी रहती थी। आँखों में काजल तो नहीं लगाती पर नयनों के दोनों ओर नक्काशी किये हुए चमड़े के दो आवरण ताकि उसकी दृग दृष्टि इधर उधर न भटके। सुतली का बनी, लाल रंगी लगाम पकड़े, पखड़ू फूले नहीं समाता।

किसी गाड़ी या कार में, जब जोर का ब्रेक लगता है, तो झटका लगता है। परन्तु पखड़ू का एक्का इसके ठीक उलट जब चालू होता था, तब झटका देता था। फिर तो हल्के झटकों की कड़ी, पहले कमर, फिर गर्दन को हिला कर, घोड़ी के खुरों की ताल पर, कत्थकली नृत्य का रूप ले लेती। उसके खुरों की धुन को, किसी अच्छे शायर की गाई गजल पर, श्रोताओं के स्थान पर  'वाह, शाबाश, क्या खूब, कमाल है, क्या चाल है, तेरी तो बात ही कुछ और है आदि शब्दों से और फिल्मी हेरोइनों की संज्ञा देकर, पखड़ू जुगनी  का उत्साह बनाये रखता। पखड़ू हाथ में चाबुक तो रखता था, पर वह जुगनी की पीठ पर नहीं पड़ता, हवा में ही लहराता था। चाबुक कभी अधिक ऊपर तक उठ जाता तो जुगनी समझ जाती उसे क्या करना है और उसे पीठ तक आने से पहले, पखड़ू को या तो अपना हाथ रोकना पड़ता या उसकी दिशा बदलनी पड़ती।

पखड़ू के एक्का के यात्रा का रोमांच तो एक्का पर चढ़ते समय ही आरम्भ हो जाता। एक्का के पीछे लगे छोटे से बांस के पायदान पर पांव रखकर एक ही छलांग में ऊपर तख़्त पर चढ़ना होता और पांव बटोर कर उस पर बैठना होता। तख़्त उसके पहियों से, जो लगभग पांच फुट व्यास के थे, थोड़ा सा ऊपर होता और उस पर टाट की गद्दी बिछी होती। एक्का के चलते ही, सभी यात्री हिलने डुलने लगते और कंधे से कन्धा मिलने लगता। जब किसी का पैर दूसरे यात्री को छूता तो तुरंत चेतावनी मिल जाती। अगल बगल किसी महिला सवारी के होने पर थोड़ी सतर्कता रखनी होती। जंगीपुर से मानपुर तक की, पूरी यात्रा भर, सवारी, कमर के ऊपर से हिलती रहती। अधपक्की सड़क थी, बीच बीच में गड्ढे और धूल भी। गढ्ढा देखते ही पखड़ू सवारियों को चेतावनी दे देता, 'आगे गड्ढा है, इक्का को कस के पकड़े रखना।' अब सवारी, कुछ पकड़ने का हिस्सा ढूंढने लगतीं। पकड़ने के लिए पीछे की ओर दो खूंटी भर थीं, जिसका लाभ पीछे बैठे लोगों को ही मिल पाता। इक्का पर किनारे बैठी सवारी, बैठने वाले तख्त को ही किनारे से पकड़ लेतीं; बीच की सवारियों को पकड़ने के लिये कुछ नहीं होता। जिनके हाथ लम्बे होते, बढ़ाकर वे भी तख़्त का किनारा थाम लेते, अन्यथा एक दूसरे को पकड़ कर, सहारा ले लेते। गड्ढे में पहिया पड़ते ही सबकी खामोशी टूट जाती, हलकी हंसी की फूलझड़ी के साथ रोमांचित करने वाली  सबकी चीख निकल पड़ती। उसके बाद परस्पर बातचीत का सिलसिला आरम्भ हो जाता। पहले तो गड्ढे के कारण हचकी की चर्चा होती, फिर कौन कहां से आ रहा, कहाँ जा रहा, आदि । इक्का पर कोई अपरिचित सवारी होती तो उससे उसके गंतव्य गांव का नाम और उसका परिचय पूछ लिया जाता और उसे वहां तक पहुंचने की राह बता दी जाती।

इक्का के यात्रा का रोमांच, आगे आने वाले पुलिया पर और बढ़ जाता। चढ़ाई आते ही पखड़ू आवाज लगाता, 'सभी लोग थोड़ा थोड़ा आगे खिसक जाना।' इक्के का तख़्त चार फुट के वर्गाकार आकार में था और उस पर सात आठ सवारी आसीन, सवारियों को खिसकने के लिए स्थान ढूंढना बड़ा कठिन कार्य हो जाता। किसी तरह एकाध इंच की जगह बनाकर खिसकने का प्रयत्न करतीं या आगे झुककर, अपने गुरुत्व को कुछ आगे कर लेतीं। पुलिया के दूसरी ओर ढलान शुरू होते ही पखड़ू फिर आवाज लगाता, ' हाँ, अब पीछे हो जाना।'

पखड़ू को अपने तो अपने, आस पास के गांव की अनेकों दुल्हनों को मायके से ससुराल और ससुराल से मायका पहुँचाने का गौरव प्राप्त था। जब दुल्हन ले जाने की बात आती तो उसका एक्का, चार्टर्ड एक्का हो जाता। दुल्हन लाने ले जाने में उसे कुछ अतिरिक्त आय हो जाती और घोड़ी के लिए चने का प्रबंध। पखड़ू दुल्हनों की सवारी के वृतांत सुनाता रहता। उसके सुनाने की रोचक शैली के कारण, सुनने वालों को किसी फ़िल्मी कथा से कम नहीं लगता। फिर अपनी घोड़ी की प्रशंसा करने लगता, 'अरे भइया, जुगनी को भी बड़ी समझ है। वैसे तो कभी कभी विदक जाती है, पर जब एक्का पर दुल्हन बैठती है तो बिना किसी झटके के, इतने आराम से चलती है कि मानो इसकी कोई सखी-सहेली हो।' फिर तो सवारी अपने अनुभव का बखान करने लगतीं। सवारियों में, हर बार कोई न कोई मिल ही जाता, जो सुदामी चाची को जुगनी के एक्के से पटकने की चर्चा कर देता।

आज ठाकुर साहब की बेटी कोमल को आना था। ठाकुर साहब की मोटर साइकिल बड़ा बेटा अमर सिंह लेकर परीक्षा देने गया था। गांव में और किसी सवारी का साधन नहीं था, बस पखड़ू के इक्के का ही सहारा था। कोमल के मायके से जंगीपुर तक तो बस थी। बस जंगीपुर से घर तक की ही समस्या थी। कोमल को लाने के लिए ठाकुर साहब ने छोटे बेटे, बिक्रम सिंह को भेज दिया था और पखड़ू को बोल दिया था, 'कोमल आ रही है, जरा जंगीपुर में देख लेना और इक्का आराम से लाना। वह इक्का पर बैठने से बहुत डरती है। अगर हो सके तो और सवारी मत बैठाना। तुम्हारी घोड़ी के लिए अलग से भूसा और सेर भर चना दे दिया जायेगा।'
पहले भी कोमल इक्का पर बैठने से, पैदल ही चलना पसंद करती थी। कई बार जंगीपुर से पैदल चलकर आ चुकी थी। पर तब अभी कुंवारी थी, अब शादी  शुदा है, पैदल कैसे आएगी। वैसे ठाकुर साहब आस्वश्त थे कि विक्रम साथ है, कोई चिंता की बात नहीं है। मगर ठकुराइन चिंतित होने लगीं, 'देखो सूरज ऊपर चढ़ चुका है, कोमल अभी तक नहीं आई।' ठकुराइन छोटी बेटी चंदा के साथ मिलकर पूड़ी, खीर आदि सब, सुबह ही बना चुकी थीं। वे चंदा से बोलीं, 'जाकर बाहर देखती, पखड़ू का इक्का आ रहा होगा, दोपहर होने को आ गयी।'

जैसे ही चंदा बाहर निकली, कोमल आती दिखाई दे गयी। 'दीदी, दीदी' बोलती चंदा, कोमल की ओर दौड़ी। यह क्या ? कोमल धूल में सनी हुई थी। उसे देखते ही सबके होश उड़ गए। ठाकुर साहब देखते ही गुर्राए, पखड़ू ने कहीं पटक दिया, क्या रे ?'
'हाँ, पापा! एक गड्ढे में घोड़े का पैर मुड़ गया था। इक्का आगे को ओलार हो गया। विक्रम तो कूद कर अलग हो गया, मैं और दत्तापुर वाली चाची धूल में जा गिरे।'
'चोट वोट तो नहीं लगी ?'
'नहीं पापा चोट नहीं लगी, धूल थी न !'
'अभी देखता हूं, ससुरा पखड़ू को। विक्रम लाठी तो लेकर आ, चल मेरे साथ।'
कोमल और उसकी माँ तो डर ही गयीं। वे ठाकुर साहब से कहने लगीं, 'इसमें पाखड़ू की क्या गलती है! घोडा है विदक गया। कहाँ बेमतलब जा रहे हो।'
पर ठाकुर साहब कहाँ मानने वाले थे। पखड़ू के यहाँ पहुंचते ही उस पर बरस पड़े। 'तुझे मैंने बोला था, इक्का संभाल कर लाना और कोमल के अलावा कोई सवारी नहीं  बैठाना, तू खाली पैसे के चक्कर में रहता है। बिटिया को पटक दिया! बता, लगाऊं दो डंडा !'

'क्या करें मालिक, गांव की सड़क तो आप देख ही रहे हैं। गड्ढा थोड़ा बड़ा था, जुगनी संभल नहीं पायी। हम तो सम्हाल के ही चलते हैं।'
ठाकुर साहब का क्रोध सातवें आसमान पर था। पखड़ू को गाली तक सुना डाले। 'अब तुझे न तो पैसे मिलेंगे न ही चना। '
'जैसी आपकी मर्जी, मालिक! आखिर ये तो जानवर ही है न। जुगनी कच्चे में चलती है, कई बार पहिया डांवाडोल हो जाता है। आज यह खुद को संभाल नहीं पायी। साहब मैं तो उपरवाले का शुक्र करता हूँ, यह इक्का था, बहन को खाली धूल लगी। नहा लेगी, ठीक हो जाएगी। यही, अगर मोटर गाड़ी होती तो अस्पताल जाना पड़ जाता।'
इस बात ने ठाकुर साहब को सोच में डाल दिया और वे शांत होकर घर लौटे। उनके आने पर कोमल ने बताया, 'घोड़ी का पैर जैसे ही मुड़ा,पखड़ू चाचा ने खुद को चोट लगने की परवाह नहीं की और इक्का से झट कूद कर घोड़ी नाधने वाले बांस को कंधे पर थाम लिया, वरना तो हमें काफी चोट लग जाती।'
ठाकुर साहब पूरी कहानी सुनकर, ठकुराइन की ओर ताककर बोले, 'मैंने पखड़ू को सेर भर चना के लिए बोला था, ढाई सेर दे देना। '

समय बदला, मगर न पखड़ू बदला न ही उसका एक्का। पखड़ू का एक्का विगत पचास वर्षों से अनवरत सेवा में जुटा रहा। मैंने तो अपने पोते को भी पखड़ू के एक्का के रोमांच का अनुभव करा दिया। पखड़ू अपने एक्का का रख रखाव और मरम्मत का पूरा ध्यान रखता है। जुगनी तो मर चुकी थी, दूसरी घोड़ी भी धीरे धीरे बूढ़ी हो चली थी। इसे भी अपनी राह का एक एक पग याद था। सवारी बैठाकर, पखड़ू बस बैठ भर जाता, घोड़ी अपने आप एक्का को गंतव्य तक पहुंचा देती। जब कभी पखड़ू किसी कारण से एक्का नहीं ला पाता, प्रतीक्षा में सवारियां इधर उधर भटकती नजर आतीं। कई लोग तो पैदल ही चल देते। अब सड़क पहले से कुछ ठीक हो चुकी थी। उसपर मोटर गाड़ी फर्राटे से दौड़ने लगी थी। एक्का के बगल से हार्न बजाती सर्र से जीप या बस निकलती तो कभी कभी घोड़ी चिहुंक जाती। फर्राटेदार गाड़ियां चलने के पश्चात् भी बहुत से लोगों का पखड़ू के एक्के से मोह भांग नहीं हुआ था। कारण था कि जीप आदि में ठूस ठूस कर सवारी भरी जाती थी, साँस तक लेना दूभर हो जाता। एक्का पर थोड़ा समय तो लगता, पर खुली हवा में सांस लेते, कुछ अपनी कहते-सुनते, सवारियां गंतव्य तक पहुँच जाती थीं।
पखड़ू का बेटा बड़ा हो चुका है। उसने एक पुराना ऑटो रिक्शा खरीद लिया है और जंगीपुर से ग़ाज़ीपुर की सवारी ढोता है। वह अपने बूढ़े पिता से बार बार कहता कि अब एक्का चलाना बंद कर दें; पर, पखड़ू को अपने एक्का से बहुत प्यार था और साथ में उसका स्वाभिमान। सत्तर का होकर भी पुत्र पर आश्रित नहीं होना चाहता था। वह कहता, 'जब तक हाथ पैर चलेगा तब तक एक्का चलेगा। मेरे ही सहारे (घोड़ी की ओर देखते हुए) यह जीव भी तो पल रहा है। इतने दिन तक, इसने मुझे, अन्न दाना दिया है, मैं इसकी जिंदगी मझधार में कैसे छोड़ सकता हूँ। हम दोनों में से जब तक एक बैठक नहीं हो जाता, एक्का बंद नहीं हो सकता।'




Monday, 24 July 2017

Baap deshi beta videshi / chhataka beej


छटका बीज

मंत्री जी ने बहुत प्रयत्न कर लिया, पर अमलताश है कि स्वदेश वापस आने का नाम ही नहीं लेता। अब तो वे खुद को ही कोसते हैं  कि आखिर उसे लंदन पढ़ने भेजा ही क्यों ?  ये भी नहीं कि किसी गोरी के चक्कर में हो, विवाह तो यहीं अपने संप्रदाय की ही लड़की से करके गया है।

मंत्री जी ने खूब पैसा कमाया और खूब लुटाया भी। उनके क्षेत्र का शायद ही कोई प्रधान होगा कि चुनाव में उनसे पैसे न लिया हो। वे अपने लोगों को  खिला पिला कर और पैसे देकर खुश रखते थे। कई लोग तो उनके बड़े आभारी थे, मंत्री जी ने नियमों ताख पर रख के भी उनकी मदद की थी। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी थे, जरूरत पड़ने पर मंत्री जी  के लिए  कुछ भी कर सकते थे।
अमलताश, मंत्री जी का इकलौता बेटा था। उसको भी मंत्री जी के छोटे मोटे चमचे घेरे ही रहते थे। जो मंत्री जी तक सीधे नहीं पहुँच पाते, वे अमलताश के द्वारा सिफारिश करवाते और अपना उल्लू सीधा करते। बदले में अमलताश को बड़े बड़े सौगात मिलते। वैसे अमलताश शांतिप्रिय लड़का था, और उसे किसी से कुछ लेना पसंद नहीं था। एकाध बार तो उसने ले लिया, पर इन सब के पीछे की पूरी बात की, उसे समझ नहीं थी। उसे ऐसा लग रहा था कि उसके पिता लोक प्रतिनिधि हैं और लोगों की मदद करना उनका कर्तव्य है। केवल अपने निकटतम लोगों की ही सहायता करें, उसे अच्छा नहीं लगता। राजनीति एक व्यापार भी है, और लोगों के काम करवाने के पैसे लिए जाते हैं; यह सोचकर, उसे बड़ा अजीब लगता। वैसे भी मंत्री जी ने अकूत धन कमा रखा था।  कहते हैं कि उनके विदेश में भी खाते थे। देश के बाहर के ठेकेदारों को कोई काम दिया जाता तो, ठेकेदार से बोल दिया जाता कमीशन की राशि बाहर ही स्विस बैंक में जमा करा दे। आवश्यकता पड़ने पर उसमें से आवश्यक राशि, मंत्री जी कभी घूमने जाते तो ले आते, या फिर किसी विश्वासपात्र से मंगवा लेते।

उस समय तो मंत्री जी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा भी, अभी से गन्दी राजनीति के दलदल में गिर जाय। वे चाहते थे, पहले ठीक से पढ़ाई कर ले, फिर राजनीति में आये। वैसे राजनीति से ऊपर इस देश में और कुछ था भी क्या ! प्रतिष्ठा और पैसा दोनों। एक बार हाथ में पैसा आ गया तो पैसे के बल पर जो चाहे कर लो। वे चाहते तो, अपने प्रभाव और धन के बल, छोटी उम्र में भी उसे विधायक बनवा सकते थे। मगर, अमलताश को उन्होंने पढ़ने के लिए लंदन भिजवा दिया। बेटे के लन्दन जाने से उनकी एक और समस्या हल हो गयी। स्विस बैंक का खाता का भी प्रबंध भी सरलता से हो जाता। अमलताश, जहां पढ़ाई में यहाँ फिसड्डी होने लगा था, लंदन जाकर उसका दिमाग खुल गया और सही संगत पाकर, ठीक से पढ़ने लगा। एम० बी० ए० कर लेने के बाद, एक वित्तीय कंपनी में, उसे वहीँ जॉब मिल गयी।
इधर मंत्री जी ने रेवड़ियां बांटकर अपने लोगों को तो खुश किया था, मगर क्षेत्र में सार्वजनिक कार्यों में विशेष प्रगति नहीं होने के कारण, अगले चुनाव में हार गए। और, एक बार क्या हारे कि फिर उसके बाद, दुबारा कभी जीत न सके। दूसरी पार्टी की सरकारों ने उनके भ्रष्टाचार का पोल खोलना शुरू कर दिया। अब वे अपनी जिंदगी से दुखी रहने लगे। सिर पर भ्रष्टाचार का कलंक, उन्हें भारी लगने लगा था। कई प्रकार के जांच का भी सामना करना पड़ रहा था। अब वे चाहते थे, अमलताश को वापस बुला लें और उसे अपना राजनितिक उत्तराधिकारी बना दें। अमलताश को लंदन इतना भा गया था कि उसे वापस अपने वतन आना गवारा नहीं था। अपनी माँ की बात मानकर, शादी तो यहां आकर कर लिया था, पर बहू को साथ लेकर वहीं चला गया।
मंत्री जी ने कितनी ही बार कहा, 'बेटा आ जा तुझे किसी न किसी पार्टी में घुसाकर, मंत्री नहीं तो कम से कम विधायक तो बनवा ही दूंगा। यहाँ पर मान मर्यादा है, धन दौलत है, चार लोग जानते हैं; वहां इतनी दूर अकेला कहां पड़ा  है !'
मगर अमलताश कहता, 'पापा मैं शांति का जीवन बिता रहा हूँ। मैंने, अपनी एक वित्तीय कंपनी खोल ली है। वहां पर सब काम बिना किसी मंत्री के सिफारिश के हो जाते हैं।  बस नियमों का ज्ञान होना चाहिए। मैं तो कहता हूं, आप भी वहीँ चलिए और शान्ति से जीवन बिताइए। वहां दूसरों के बीच कोई टांग नहीं अड़ाता, बस अपने काम से काम।'
''मुझे सब पता है, ऐसे कह रहा है, जैसे कि मैंने लन्दन देखा ही नहीं। वहां कोई एक दूसरे से बात करके राजी नहीं। न पास, न पड़ोस, बस घर में बैठे रहो। न तो कोई हाल चाल लेने वाला होता न ही कोई सुख दुःख में किसी के साथ होता।'
'नहीं पापा वहां सरकार ने सब व्यवस्था कर रखी है और बिना किसी भेदभाव के। और, कोई जरूरत पड़ने पर, अपने इंडियन लोग तो हैं ही। '
अमलताश अब पूरी तरह लंदन में जम चुका था। जितनी सुख सुविधा से, मंत्री जी यहाँ रह रहे थे, उससे कम वहां अमलताश के पास भी नहीं थी।  बस अंतर यह था कि पैसा होने के बावजूद भी उसे अपना काम खुद करना पड़ता। उसके पास न तो चमचे थे, न बेगारी करने वाले। उसके पास भी बड़ा सा बंगला था, मर्सिडीज कार थी। हाँ कार पर लाल बत्ती नहीं थी। और तो और, नियमों का उलंघन करने पर, चालान भी भरना पड़ता। मगर उसे वहीं की जिंदगी अच्छी लगती थी। यहां जबरदस्ती के चार लोगों के घेरे में रहना, और इनकी उनकी चुगली करना व सुनना उसे पसंद नहीं था। अमलताश के मन में कहीं न कहीं यह भी डर था कि गलत तरीके से कमाया धन का आगे की पीढ़ी उपभोग भी कर पायेगी या वही उसके संकट का कारण भी बन जाएगी। पापा पर तो जांच चल ही  रही है।

मंत्री जी ने उसे हर तरह से समझा लिया, जन्म भूमि का भी वास्ता दिया, पर अमलताश को राजनीति का दलदल बिल्कुल भी पसंद नहीं था। राजनीति में बस तिकड़म करते रहो। हमेशा अनिश्चितता का माहौल। दूसरों के लिए चक्रव्यूह रचते रहो। अपने पद का दुरुपयोग और गलत तरीके से पैसे कमाओ, यह सब उसे बिलकुल भी रास नहीं आ रहा था। उसे अपने पिता के कमाये धन का कोई लोभ नहीं था, वह परिश्रम से कमाकर कुछ बनना चाहता था। सभी सम्बन्धी और मित्र उसके सीधे सादे आचरण की प्रशंसा तो करते, मगर उसके वापस अपने देश आने का आग्रह भी करते। उसके सत्ता में बने रहने से, उन लोगों को जिस प्रकार मंत्री जी से लाभ मिलता था, आगे भी चलते रहने का क्रम सुनिश्चित हो जाता।  
इस बार जब अमलताश घर आया तो मंत्री जी ने फिर आग्रह किया, ' बेटा तू लौट आ, हमारे पास इतना है कि चार पीढ़ी बैठ कर खायेगी तो भी समाप्त नहीं होगा। यहाँ पर अन्य लोग हमारा खा रहे हैं और तुझे वहां काम करना पड़ रहा है।'
'पिताजी मैं तो यही कहता हूँ, आप भी वहीँ चलो। आपका ग्रीन कार्ड बनवा देता हूँ। अब आपकी पार्टी की सरकार बनेगी नहीं और आप जाँच ही झेलते रह जायेंगे।'
अब तो मंत्री जी बार बार यही सोचते, 'आखिर मेरा माथा क्यों फिर गया कि इसे लन्दन पढ़ने के लिए भेजा। यहीं रहा होता तो, बेशक पढ़ता लिखता नहीं, पर यहाँ के माहौल में मंज गया होता।'
कहते हैं न, बेटे की जिद्द के आगे कौन जीता है। लाख समझाया बुझाया पर अमलताश की बुद्धि पर धूल पड़ी थी, उसे किसी की बात समझ नहीं आ रही थी। अंततः यही तय हुआ कि अमलताश तो छुट्टियों में आएगा ही, बीच बीच में मंत्री जी भी आते जाते रहेंगे। कोई समस्या होगी तो लंदन कौन सा दूर है, अमलताश छः सात घंटे में उड़ कर आ जायेगा।
एक बार मंत्री जी की तबियत कुछ बिगड़ी, तो अमलताश, रंजना के साथ तुरंत घर आ गया। लगभग एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहने के बाद उन्हें छुट्टी मिली। डाक्टर ने दो माह तक पूर्ण विश्राम की सलाह दी। अमलताश इतनी लम्बी छुट्टी नहीं ले सकता था, इसलिए मंत्री जी को साथ लन्दन ले जाने की सोचा। टिकट वगैरह करवा दिया। मंत्री जी का लम्बी अवधी का वीसा पहले ही बना हुआ था। अमलताश और मंत्री जी के जाने में अब तीन चार दिन का ही समय रह गया था। वे जाने कि तैयारी में लगे ही थे कि अचानक जाँच ब्यूरो का सम्मान आ गया। मंत्री जी को एक सप्ताह के अंदर, जाँच आयोग के समक्ष प्रस्तुत होना था। जब मंत्री जी जाँच आयोग के समक्ष पेश हुए तो उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया, और जाँच पूरी होने तक उनके विदेश जाने पर रोक लग गयी।
अब तो, अमलताश फंस गया और उसके पास, अपनी छुट्टी बढ़ाने के अतिरिक्त, कोई चारा नहीं था। मंत्री जी के स्वस्थ होते ही वे लंदन चले गए। बेटा बहू के विदेश में रहने के कारण, घर में मंत्री जी और उनकी पत्नी के अतिरिक्त और कोई भी नहीं था। इतना बड़ा घर, अकेले काटने को दौड़ता। सहारे के लिए, उन्हें किसी न किसी को पाल के तो रखना ही था। अब नौकरों का ही सहारा रह गया था। मंत्री जी बार बार यही सोचते जिसके लिए इतना कुछ कमाया, भ्रष्टाचार का कलंक लिया, वही इस धन को नकार रहा है। पहले जितने आराम का जीवन बिताया, अब उससे भी बड़ा कष्ट ढोना पड़ रहा है। बुढ़ापे का बदन, जांच की चिंता, अकेलेपन का दंस, कमाया धन दूसरे ही खा रहे थे। मंत्री जी का लगाया बाग, वीरान सा हो रहा था। अब तो वे यही सोचते, कब विदेश जाने से रोक हटे और वे अमलताश के पास चले जांय।

Door ke dhol


दूर के ढोल

राकेश परीक्षा में सदा अच्छे परिणाम लाता।  इस कारण माता पिता को भी उससे बहुत अच्छी उम्मीद रहती थी।  १० वीं १२ वीं सभी परीक्षा अव्वल दर्जे से पास किया। उसके बाद मिश्र जी ने इंजीनियरिंग करवा दिया। मिश्रा जी अच्छे स्तर के अधिकारी थे।  वे चाहते थे की पुत्र भी कोई सरकारी अधिकारी बने।  परन्तु अपने यहाँ तो इतनी कठिन प्रतियोगिता है और हर कदम पर अनिश्चितता बनी रहती है। कहीं पैसे के बल तो कहीं सिफारिश के बल अयोग्य लोग नौकरी पा जाते हैं और योग्यता धरी रह जाती हैं। एकाध जगह प्रतियोगिता में परीक्षा दिया पर सफलता नहीं मिली। सरकारी नौकरी में आधी  सीट तो आरक्षित हो जाती हैं। आधे में ही भाग्य अजमाना था।

कितना भी पढ़ लिख लो, उच्च अधिकारी बन जाओ, मगर अनपढ़ नेताओं के आगे झुकना पड़ता है। स्वयं को विषय का ज्ञान न होने पर भी उन्हीं की चलती है।  यहाँ तक कि कई बार अपमान का भी सामना करना पड़ता है। एकाध बार असफल होने के कारण राकेश कुछ उदास रहने लगा।  इन बातों से क्षुब्ध मिश्रा जी को यही निर्णय सही लगा कि  राकेश को और आगे की पढ़ाई करने लिए विदेश भेज दिया जाय। वहां कम से कम कानून व्यवस्था तो ठीक है और मानवाधिकार का सम्मान है। एक दिन उन्होंने राकेश की मम्मी के समक्ष यह बात रख दी।  उसे तो लगा की सांप सूंघ गया।
'इकलौता बेटा है वो भी दूर रहेगा ? विदेश क्यों भेजना ? यहाँ क्या रोटी नहीं मिलेगी ? और भी सभी तो इस देश में ही कमा खा रहे हैं ?' उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
'देखो जी हमने तो तंगी में जिंदगी काट ली, अगर बच्चे कुछ करना चाहते हैं तो उन्हें प्रोत्साहन देने में क्या जाता है। हाँ, जाने के लिए रुपये पैसे की जरूरत किसी तरह पूरा कर लेंगे।'
उस समय तो मिश्रा जी चुप हो गए पर बीच बीच में राकेश की मम्मी से इस विषय पर चर्चा करते रहते। उनकी नौकरी में आई तरह तरह की परेशानियों से वह परिचित थी। बार बार तबादला, राजनीतिज्ञों का गलत काम करने का दबाव, किसी राजनीतिज्ञ के प्रसन्न न होने पर हंगामा, गलती होने पर फंसने का डर अनेकों अनिश्चितताओं से घिरे, सदा भय में ही नौकरी करनी पड़ती थी। उसने अमेरिका व यूरोप के कई देशों में साफ सुथरा प्रशासन के बारे में सुन रखा था।  सभी बड़े नेताओं, उद्योगपतियों, बड़े अधिकारीयों के बच्चे विदेश पढने जाते हैं। यह सब देख कर उसका भी मन राकेश को विदेश भेजने के लिए चुगला रहा था मगर यही बात सता रही थी की एक बार विदेश गया तो वापिस नहीं आएगा।
'देखो जी भेज तो दें पर सुना है जो बच्चे विदेश पढने गए वहीँ के होकर रह गए।  हम लोग बुढ़ापे में अकेले कैसे रहेंगे?'
'अरे, अकेले क्या ? आते जाते रहेंगे और आजकल  यहाँ रहके भी  कोई क्या करता है? सब अपने अपने में व्यस्त हैं।  बीबी आई नहीं की बच्चे बीबी के हो  जाते हैं, माँ बाप की कौन सुनता है। '
तभी राकेश आ जाता है।  अमेरिका के बारे में तो मित्रों से वह पहले ही सुन रखा था और उसका भी मन अमेरिका जाने के लिए लालायित था।  मम्मी पापा के तर्क वितर्क सुन कर बीच में कूद पड़ता है -
'क्यों मम्मी, आप लोग भी साथ चलना, सब वहीँ रहेंगे। '
'इसका अर्थ कि तू भी हमें छोड़ कर जाना चाहता है। '
'मम्मी, वहां बड़ी अच्छी लाइफ है।  वृजेश, आदित्य, आलोक वहां गए, सब वहीँ सेटल हो गए। वहां की लाइफ इतनी अच्छी है, अब वे वापस आना ही नहीं चाहते। वहां उत्तम आय के साथ रोजगार के बड़े अच्छे अवसर हैं। '
'अच्छा ठीक है, जाना ही चाहता है तो हमें क्या।  हम तो यही चाहते हैं कि तू सुखी रह। '
फिर क्या, राकेश प्रसन्न हो जाता है।  दोस्त मित्रों से काना फूसी शुरू कर देता है।  दोस्तों से बात करने पर पता लगता है अमेरिका जाना इतना सरल नहीं है। बहुत पैसा लगता है, हाँ. एक बार चले गए तो वसूल भी हो जाता है।  वहां पढ़ाई चलते, पार्ट टाइम छोटा मोटा काम भी मिल जाता है।  समझदार बच्चे कुछ करके अपना खर्च निकाल लेते हैं। यह जानकर राकेश का उत्साह और बढ़ जाता है। मन में विचार करता है मैं मम्मी पापा पर अधिक बोझ नहीं डालूँगा, मेहनत करके खर्च निकाल लूँगा। फिर पढने के बाद जॉब मिल जाएगी तो इतना पैसा भेजूंगा कि इन लोगों को पैसे की कमी कभी नहीं खलेगी।
मिश्रा जी भी राकेश को पढ़ाने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। उन्होंने पहले ही सोच रखा था राकेश जहाँ तक पढ़ेगा, पढ़ाएंगे। वह चाहेगा तो अमेरिका, इंग्लैंड भी भेज देंगे। तैयारी प्रारम्भ हो जाती है, मिश्रा जी अपने निवेश का हिसाब लगाना शुरू कर देते हैं। कौन से सावधि जमा (एफ डी ) कब पूरी होगी, कितनी राशि मिलेगी। सब मिला के जो राशि बन पा रही है अमेरिका जाने के लिए भारी भरकम आवश्यकता के लिए कम पड़ रही थी। मिश्रा जी चिन्तित थे बाकी पैसे कहाँ से लायें। बैंक भी पता नहीं कितना ऋण देगा। राकेश की मम्मी कोई नौकरी वगैरह तो करती नहीं थी, पर इधर उधर से बचा कर एक लाख रुपये एकत्र कर लिए थे उसे देने का प्रस्ताव रख दिया। इधर राकेश जीआरई और टोफेल करने में जुटा था, जिसे वह पास कर लिया।  

मिश्रा जी ने एक बैंक से बात किया। उनके सरकारी नौकरी होने के कारण ऋण मिलने अधिक परेशानी नहीं हुई। एक दिन राकेश अमेरिका के लिए उड़ गया।

     

Friday, 14 July 2017

Assmaan ki khoj

आसमान की खोज / छोटा  आकाश

आकाश बचपन से ही बहुत होनहार और प्रतिभाशाली था। अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आता। कोई हवाई जहाज उड़ता देखता तो अपने पापा से पूछता, 'इतना बड़ा जहाज हवा में कैसे उड़ जाता है ?'
बनर्जी साहब इसका सही उत्तर तो नहीं दे पाते, पर जब उसे बताते कि जहाज, खाली उड़ता ही नहीं बल्कि अपने भीतर सैकड़ों लोगों को बिठाकर उड़ता है, तो वह बहुत रोमांचित हो जाता।
'मैं भी उसमें बैठ पाउँगा, पापा !'
'हां, क्यों नहीं।  तुम हवाई जहाज में जरूर बैठोगे। '
'कब ?'
'बस थोड़ा और बड़े हो जाओ, कुछ पढ़ लिख लो। पढ़ लोगे तो तुम्हें अच्छी सी नौकरी मिल जाएगी, तुम अफसर बन जाओगे फिर तो जहाज में देश, विदेश घूमोगे।'
आकाश अपने पापा की बात से संतुष्ट हो जाता और उन्हें खूब पढ़ने का आश्वासन देता।
'मैं आपको भी हवाई जहाज में घुमाऊंगा।'
'हां मैं भी चलूँगा, और तुम्हारी मम्मी भी चलेगी।'
'हाँ'
आकाश की जिज्ञासा बढ़ती गयी। वह कोई भी मशीन या उपकरण देखता उसके बारे में गहराई से सोचता, वह किस प्रकार बना होगा, कैसे काम करता है, क्या इससे भी अधिक उपयुक्त हो सकता है, आदि आदि। आकाश के गवेषणापूर्ण प्रश्नों को सुनकर बनर्जी साहब कहते, 'लगता है तू बड़ा होकर वैज्ञानिक बनेगा।'
धीरे धीरे, आकाश बड़ा हुआ, उच्चतर माध्यमिक में उसने विज्ञानं विषय लेकर पढ़ाई की। विज्ञानं में उसकी बहुत रूचि थी और परीक्षा में अच्छे अंक लाता। एक बार स्कूल में विज्ञान की एक प्रदर्शनी लगी। विज्ञान विषय पढ़ने वाले सभी छात्रों को प्रदर्शनी में भाग लेना था कर मॉडल बनाकर रखना था। आकाश ने सबसे कुछ अलग ही सोचा। वह सौर्य ऊर्जा से चलने वाला, छोटा सा विमान बनाना चाहता था । उसने हवाई जहाज के उड़ने की तकनिकी के बारे में अध्ययन किया और सामग्री जुटाने में लग गया। सोलर पैनल और कुछ सामान तो वह ले आया मगर और सामान के लिए काफी पैसे की आवश्यकता थी। उसे न तो घर से उतना पैसा मिल पा रहा था न ही विद्यालय ने उपलब्ध कराया। उसने अपने प्रोजेक्ट के लिए अपने एक मित्र को सहयोगी बनाने की सोचा ताकि कुछ वित्तीय मदद मिल सके। परन्तु पैसे के नाम पर वह भी विदक गया। आकाश, निराश हो गया।

फिर भी, उसकी लगन और साहस उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। वह हार मानने वाला नहीं था। यह तो जान ही चुका था अपने पास उपलब्ध साधन से वह विमान का मॉडल नहीं बना सकता था। मगर उस दिशा में उसे कुछ प्रयोग अवश्य करने थे। अब वह विमान बनाने की जगह सोलर रिक्शा बनाने में लग गया। कई विशेषताओं से परिपूर्ण, प्रदर्शनी तक उसने अपना रिक्शा तैयार भी कर लिया। थोड़ी देर धूप में रखने के बाद, बटन दबाते ही रिक्शा दौड़ पड़ता और रिमोट कण्ट्रोल से उसकी दिशा और गति नियंत्रित कर ली जाती। पूरी प्रदर्शनी में उसका वह मॉडल आकर्षण का केंद्र बन गया।  उसके बाद भी आकाश तरह तरह के प्रयोग करना चाहता, पर पैसे की जगह उसे झिड़की ही मिलती।

उच्चतर माध्यमिक परीक्षा में भौतिक शास्त्र में, उसके शत प्रतिशत अंक थे। बारहवीं के बाद, परिवार वालों ने उसे इंजीनियरिंग कराना चाहा, पर आकाश वैज्ञानिक बनने की ठान चुका था। वह बी० एससी० और उसके उपरांत एम० एससी० करना चाहता था, ताकि आगे चलकर कोई शोध कार्य करे। उसका मन अभी से कोई नया अविष्कार करने का था।  भौतिकी से स्नातक करने के बाद, उसकी पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी हुई और साथ ही, कनिष्ठ वैज्ञानिक के पद के लिए, उसका चयन हो गया।

राष्ट्र के अंतरिक्ष अनुसन्धान केंद्र में आकाश को नियुक्ति मिली तो उसे लगा कि मन  की मुराद मिल गयी। वह स्वयं को विज्ञान के लिए समर्पित कर देना चाहता था। उसके मन में था कि देश के लिये ऐसे ऐसे अविष्कार करे कि दुनिया मुंह ताके। कुछ समय तक सब ठीक चलता रहा । अनुसन्धान केंद्र में उसकी प्रतिभा को काफी सम्मान मिला और काफी कुछ सीखने को मिला। उसने अंतरिक्ष और अंतरिक्ष यान के बारे में बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वह और नए नए प्रयोग करना चाहता था पर यहां भी वही बजट का प्रश्न था। शोध व प्रयोग के लिए, आवश्यक सामग्री नहीं मिल पाती। शोध के नाम पर विदेशों से उपकरण मंगाए जाते तो उन्हें खोल खाल कर रख दिया जाता और उसके पुर्जों का विवरण नोट करने के अतिरिक्त कुछ नहीं  होता। आकाश के प्रस्ताव भी लालफीता शाही के शिकार होने लगे। कुछ समय के बाद, वह अनुसन्धान केंद्र, सरकार का एक सफ़ेद हाथी लगने लगा। हर साल बजट आता, विदेशों से कुछ उपकरण मंगाया जाता और उसे खोल खाल कर रख दिया जाता।
केंद्र में राजनीति पूरी थी। वह कोई नया प्रयोग करने की सोचता तो वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा हतोत्साहित कर दिया जाता। एक बार ने अंतरिक्ष राकेट के इंजन में सुधार के लिए एक शोध किया। उसका यह शोध कार्य, अनुसन्धान केंद्र की बुलेटिन में प्रमुख वैज्ञानिक के नाम से छापा गया, उसमें आकाश का नाम मात्र सहयोग देने भर के लिए दर्शाया गया। आकाश को राजनीति की समझ नहीं थी। वह अपनी बात सीधे तरीके से कहता जिसका लाभ और लोग उठा लेते। इस तरह की बातों से वह क्षुब्ध रहने लगा। केंद्र में जातीय समीकरण के चलते उसका स्थान्तरण एक महत्वहीन परियोजना में कर दिया गया। अब उसे लगने लगा कि यह उसके लिए उपयुक्त स्थान नहीं है।

आकाश को अपनी जगह तलाशनी थी। उसे वैज्ञानिक का तमगा नहीं चाहिए था, अपितु वास्तव में वैज्ञानिक बनना था। वह अपने रास्ते ढूंढने लगा। उसे यही लगा कि वह अमेरिका चला जाये और वहां जाकर पी०एच०डी० कर ले। यहाँ के माहौल में वह जो चाहता था, नहीं कर पा रहा था। उसने अमेरिका जाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी। न्यूयार्क के एक विश्वविद्यालय ने अंतरिक्ष विज्ञानं में पी०एच०डी० करने के लिए प्रवेश दे दिया। पी०एच०डी० करने के क्रम में उसने एक ऐसी खोज की जिससे राकेट की गति बढ़ने के साथ उसकी दिशा भी बिलकुल सटीक होती। उसके इस शोध को वहां के राष्ट्रीय विमानन और अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) ने पेटेंट करा लिया तथा उसके बदले आकाश को लाखों डालर मिले। पी०एच०डी० पूरी होने पर आकाश बनर्जी उसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो गए और साथ ही नासा के निर्माण सलाहकार।
अब प्रो. आकाश बनेर्जी को धन की कमी नहीं थी। वे कमाये हुए पैसों से एक शोध संसथान खोल लिये, जिसका नाम रखा, 'आकाश बनर्जी अंतरिक्ष अनुसन्धान केंद्र'। वे चाहते थे उनके जैसे धन के अभाव में प्रतिभाशाली छात्र  आगे बढ़ने से वंचित न रह जायें। वे भारतीय प्रतिभाशाली बच्चों का बहुत ध्यान देते।
तभी नासा ने एक राकेट यान अंतरिक्ष में भेजने की परियोजना बनाई। इस यान में शोध कार्य के लिए तीन वैज्ञानिकों को भी जाना था। राकेट के निर्माण का कार्य भार प्रो. बनर्जी को सौंपा गया। प्रो. बनर्जी और उनकी टीम अपने कार्य में जुट गयी। प्रोफेसर साहब चाहते थे उनका यह यान सभी आवश्यक आधुनिक उपकरणों से युक्त हो ताकि अच्छे से अच्छा परिणाम लेकर आये। यान तैयार हुआ तो नासा की निरिक्षण टीम उसकी परीक्षा के लिये आई। टीम ने यान को फेल कर दिया। प्रोफेसर साहब ने यान में कुछ नए फीचर जोड़ दिए थे जिसके अनुसार वैज्ञानिक यान से बाहर जिधर देखते यान का एक कैमरा उसे भांप कर उधर को घूम जाता और पलक झपकते ही वह दृश्य कैमरे में कैद हो जाता। इस विशेषता के बारे में निरीक्षण समिति को पता नहीं था। जब इस विशेषता के बारे में बताया गया और दिखाया गया तो राकेट यान को उड़ने की अनुमति मिल गयी। प्रोफेसर साहब अपनी इस सफलता से बहुत प्रसन्न हुए।  
प्रोफेसर साहब के मन में एक और सपना जागृत हुआ कि वे अपने बनाये राकेट में उड़ कर अंतरिक्ष की सैर कर के आयें। उन्होंने अपनी यह इच्छा नासा प्रशासन के समक्ष व्यक्त किया, परन्तु नासा ने उनकी उम्र के कारण इसकी अनुमति दी।
प्रोफेसर बनर्जी की बेटी, मीता अब बड़ी हो गयी थी, और अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान से ग्रेजुएट भी। प्रो. बनर्जी के अंतरिक्ष में, खुद के उड़ने का सपना तो ध्वस्त हो चुका था, अब वे मीता को इसके लिए तैयार करने में जुट गए। मीता, अंतरिक्ष में उड़ने की आवश्यक प्रशिक्षण, एक अच्छे अंतरिक्ष संस्थान से पहले ही ले रही थी। इधर प्रोफेसर साहब का मार्गदर्शन मिला तो  उसे और निपुणता प्राप्त हो गयी। मीता की लगन और तन्मयता रंग लाई। नासा के उस अंतरिक्ष अभियान में उसका चयन हो गया। मीता और प्रो. बनर्जी इस बात से बड़े प्रसन्न और उत्साहित थे। कुल छः सदस्यों की टीम का चयन हुआ था जिनमे से केवल तीन सदस्यों को ही यान में स्थान मिलना था, और मीता उन छः में से एक थी।

धीरे धीरे अंतिम उड़ान का समय आ गया। मीता अपने को बिल्कुल चुस्त, तंदरुस्त और उत्साह से भरे हुए थी। अब उसका अंतरिक्ष में उड़ने का सपना पूरा होने में कुछ दिन का ही समय था। एक दिन वह अपनी उड़ान के बारे में सोचकर प्रो. बनर्जी से पूछ बैठी, 'डैड! अगर मैं, अंतरिक्ष से वापस नहीं लौट पायी तो क्या आप रोयेंगे?'
'ऐसा कुछ नहीं होगा, बेटी। तेरा यान अपना लक्ष्य पूरा करके, जरूर वापस आएगा।'
'अगर मैं नहीं भी आउंगी तो आप रोना नहीं, और मेरे बलिदान को, आप अपना काम और आगे बढ़ने में लगाना।'
'मैं कह रहा हूँ न, ऐसा कुछ नहीं होने वाला। बड़ी मेहनत से ये राकेट यान बनाया गया है, एक एक बात का बड़ी बारीकी से ध्यान  रखा गया है। बस एक महीने की बात है। किसी प्रकार की चिंता मन से निकाल दे, हम अंतरिक्ष केंद्र के द्वारा संपर्क में रहेंगे। और इतना महान काम करने वाला, कभी मरता है क्या ?'
तभी एक टेलीफोन आया जो मीता और प्रो. बनर्जी को हिला दिया। अंतरिक्ष केंद्र से फ़ोन आ गया कि मीता का नाम अंतिम तीन सदस्यों में नहीं है, किन्तु उड़ान के समय उसे पूरे समय अंतरिक्ष केंद्र पर उपस्थित रहना है। इस बात ने प्रोफेसर साहब को बहुत आहत कर दिया।  वे सोचने लगे इंडिया में तो जाति और राजनीति का भेदभाव झेलना ही होता है, लगता है अमेरिका भी इससे अछूता नहीं। संभवतः यहाँ भी गोरे और मूल निवासियों को वरीयता दी जा रही है। मगर वे प्रशासन के निर्णय के आगे, कर भी क्या सकते थे। उनकी वह रात अफ़सोस करते ही बीती। अगले दिन मीता, मुंह लटकाकर अंतरिक्ष केंद्र पहुंची तो उसके घाव पर नमक छिड़का जाने लगा।
'व्हाट हैपेंड मीता? व्हाई हैव यू बीन ड्रॉपड? ( क्या हुआ मीता, तुम्हें ड्राप क्यों कर दिया गया?)' एक एक कर सभी पूछने लगे।
'आई डोंट नो  (मुझे नहीं पता)।' मुंह बनाकर बोलती।
 शाम होते होते एक बार फिर मीता के भाग्य ने पलटी मारा, और अचानक उसे नासा के प्रमुख ने बुला लिया। मीता उदास मन से प्रमुख के पास पहुंची।
'आर यु रेडी टू फ्लाई, मीता? (मीता तुम उड़ने के लिए तैयार हो?' प्रमुख ने पूछा।
'बट आई एम ड्रॉप्ड, सर (किन्तु मुझे रोक दिया गया है, सर)। '
'नो, यू आर इन फाइनल लिस्ट (नहीं, तुम अंतिम सूची में हो।)
उड़ने वाले सदस्यों की सूची को अंतिम रूप देते समय, पता चला कि निर्धारित सदस्यों में से एक का वजन कुछ बढ़ गया था, और ऊपर से प्रशासन ने यह भी निर्णय ले लिया था कि उड़ान भरने वाली टीम में एक महिला सदस्य अवश्य होगी। मीता का चेहरा इस समाचार से खिल उठा। उसे बधाईयां मिलनी शुरू हो गयीं। इधर प्रसन्न प्रोफेसर बनर्जी  ने चाहा कि बेटी के अंतरिक्ष यान का नियंत्रण वे नासा के अंतरिक्ष केंद्र से स्वयं करें मगर उनका यह भी सपना पूरा न हो सका। जिस दिन मीता को उड़ान भरना था उसी दिन प्रो. बनर्जी को सेवा से निवृत्त भी होना था।
निर्धारित दिन, यान अंतरिक्ष के लिए उड़ा, प्रो. बनर्जी ख़ुशी और गर्व से झूम उठे। अमेरिका और भारत के सभी अख़बारों के पहले पृष्ठ की पहली पंक्ति बनी -
'भारत की बेटी अंतरिक्ष में'

Wednesday, 12 July 2017

Beghar


किम अब बड़ा हो गया था और एम्ब्रो को चाहने लगा था। जैसे ही बड़ा हो गया उसके पिता ने साफ कह दिया अब तुम अलग अपना ठिकाना ढूंढ लो या  तुम्हें
मकान का किराया देना होगा
एम्ब्रो बार बार कहती घर तो ले लो
वेटर की नौकरी में मकान लेना बड़ा मुश्किल काम था

घर महंगा
शादी

सरकार



इंडिया में घर क्या होगा बेटा ने बेच दिया 

Monday, 3 April 2017

Laghu katha 2


निमंत्रण

ब्रह्मभोज देर रात तक चलता रहा। सैकड़ों लोग निमंत्रित थे और लगभग सभी आये, नहीं आये तो बस देवचंद और गंगा, जो मात्र दो घर छोड़कर रहते थे। भीड़-भाड़ में  किसी ने ध्यान भी नहीं दिया कि वे नहीं आये। सुबह जब मिठाई और बची हुई पूड़ी लेकर विवेक पहुंचा तो गंगा खाना बना रही थी।
'क्या हुआ चाची? इतनी जल्दी खाना!'
'हाँ, तुम्हारे चाचा रात भी ऐसे ही सो गए थे।'
'पर क्यों ? बाबा की तेरहवीं में खाने नहीं गए थे क्या ?'
'नहीं, काफी देर तक न्यौता का प्रतीक्षा करते रहे। कोई निमंत्रण नहीं आया तो मैं खिचड़ी बनाने चली। वे बनाने से मना कर दिए, दिन का थोड़ा चावल पड़ा था, वही दूध से खाकर सो गए।'
'अरे ऐसा कैसे हो गया! मैं अभी जाकर पापा से बोलता हूँ। ये तो रख लीजिये।'
'पर खाना तो लगभग बन ही गया है, रखकर क्या करूंगी ?'
'मुझे नहीं पता। ये रख देता हूँ, और पापा को भेजता हूँ।'
विवेक जाते ही योगेंद्र को सब बताया।
'हूँ, कैसे कह रहे हैं न्यौता नहीं दिया। मैं खुद सुरेश को बोल कर आया था। अभी जाता हूँ।' कहकर, सारा काम छोड़, योगेंद्र तुरंत देवचंद के घर गया।
'देवचंद भाई! क्या हो गया? पता चला है आप लोग कल खाने नहीं आये।'
'हाँ, बिना बुलाये कैसे आते। '
'मैं तो खुद सुरेश को बोल कर गया था।  तुम लोग खेत पर गये थे। उसने बताया नहीं? '
'ना, उसने तो नहीं बताया। सुरेश  .. सुरेश  .. '
सुरेश के आते ही योगेंद्र  पूछा, 'बेटा! कल मैं आया था तो तुमने ही कहा था न, मम्मी-पापा घर पर नहीं हैं, और मैं तुम्हें बोल कर गया था, शाम को पूरे परिवार का खाना है।'
'हाँ। '
इतने में देवचंद बरस पड़ा, 'तो बताया क्यों नहीं? बता! ऐसे ही तो रिश्ते ख़राब होते हैं।'
'भूल गया था।'
'हाँ खेलना थोड़े ही भूला होगा।'
'क्षमा करना, देवचंद भाई! गलती हमारी ही है। मैंने तुम्हें हलवाई के पास देखा तो समझा कि न्यौता मिल ही गया होगा।'
'नहीं योगेंद्र, पड़ोसी होने के नाते, मैंने अपना धर्म निभाया। तुम्हारी व्यवस्था पर एक नजर मार के आ गया, लेकिन न्यौता के बिना खाने कैसे आता!'
'अपनी जगह तुम भी सही हो। अब क्षमा के अलावा कुछ भी नहीं कर सकते।'
'चलो कोई बात नहीं, मगर आगे से ध्यान रखना।  बच्चों की बात पर इतना भरोसा मत करना।'
'हां, अवश्य,  गलती से भी सबक न ले तो इंसान कैसा!'



ऐसी साड़ी पहनती हूँ ?
उत्सव समाप्त हुआ, सब कुछ ठीक ठाक निपट गया। अब रिश्तेदारों की विदाई होने लगी। उत्सव में रिश्तेदारियों की जितनी महिलाएं आई थीं, उमा ने सबके विदाई के लिए साड़ी और ब्लॉउज का सेट खरीद रखा था। संजना भी चलने को तैयार हुई। बड़ी बहन, उमा, दौड़ी कमरे में गयी और साड़ी ब्लॉउज का सेट लेकर आई, उस पर पांच सौ एक रूपये रखकर, उसे विदाई में देने लगी। संजना ने झटक कर साड़ी फेंक दिया, 'तू देखती है! मैं ऐसी ही साड़ी पहनती हूँ !'
'वाह बहन! मैं जैसी पहनती हूं, तू तो मुझे वैसी ही देती है; पर जैसी तू पहनती है, मैं इतनी महँगी साड़ी कैसे दे पाऊँगी। मेरे इनकी आमदनी तो देख। हां, मैं जैसी पहनती हूँ, उससे अच्छा ही तेरे लिए रखती हूँ। मेरी आमदनी के हिसाब से जो मेरे वश में है, मैं कहाँ कमी रखती हूँ।'
'अच्छा ठीक है, तो मैं कौंन सा तेरे से मांग रही हूँ, मेरी तरफ से किसी और को दे देना।'  संजना नाक चढ़ा के बोली, और चल दी।
उमा देखती रह गयी। उमा के पास अब रोने के सिवा कुछ न था।
मुकुल ने माँ को रोते देखा तो बहुत दुखी हुआ। वह माँ को समझाने लगा, 'मौसी पता नहीं क्या समझती है, हम थोड़े कम में हैं, पर इतने भी गए गुजरे नहीं, कल ही महँगी से महँगी साड़ी लेकर मौसी को दे आऊंगा। चुप हो जा।'
'अरे नहीं बेटा! उसे साड़ी ओड़ी कुछ नहीं चाहिए, उसकी आदत है। वो इसी तरह से जताती है कि अमीर घर में व्याही है। मैं रो कहाँ रही हूँ, ये तो मेरी ख़ुशी के आंसू हैं, मेरी छोटी बहन सुखी और संपन्न घर में है।'




पुस्तक के विमोचन समारोह में सर्वेश चंदौसवी जी भी आये थे। महान गजलकारों के लिए अलग से आरक्षित पंक्ति थी और पहचान के लिए, उस पंक्ति में बैठने वालों को बिल्ला लगाया गया था।  उस समारोह में चंदौसवीं जी के परम मित्र मदन मोहन भी आये थे जो एक उभरते लेखक और गजलकार भी थे। चंदौसवी जी मित्र मदन मोहन को वहां अचानक पाकर बड़े प्रसन्न हुये। प्रसन्नता पूर्वक वे मदन का हाथ पकड़े साथ ले गए और अपने बगल वाली कुर्सी पर बैठने का आग्रह करने लगे। मदन मोहन जी ने चुटकी लेते हुए बोला 'यह सीट विशिष्ट लोगों के लिए है, मैं तो एक आम आदमी की भाँति आमंत्रित हूँ, मुझे पीछे ही बैठने दीजिये।'
'अरे ऐसा कुछ नहीं, यहां मेरे पास बैठो, आज नहीं तो कल तुम भी विशिष्ट हो जाओगे।'
नहीं, नहीं, आप बैठिये, देखिए आप के बिल्ला भी लगा है।
चंदौसवी जी अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए और अपना बिल्ला उतार कर मदन मोहन के ऊपर लगा दिया, 'चलो जहाँ तुम बैठोगे, मैं भी वहीँ बैठूंगा। मेरे हाथ में तो बस यही है, वरना इस देश में तो सत्ताधारी लोग अपने मित्रों को कौन सी कुर्सी और क्या क्या पद नहीं दे देते। '
यह कहते हुए दोनों जाकर पीछे वाली पंक्ति में बैठ गए। तभी आयोजकों में से एक नजर चंदौसवी जी पर पड़ गयी। उनका हाथ पकड़ कर, 'अरे चंदौसवी जी आप यहाँ कैसे! चलिए आगे वाली पंक्ति में बैठिये। ये लीजिये एक और बिल्ला।'
चंदौसवी जी ने तब भी मदन मोहन का हाथ नहीं छोड़ा।


मसीहा

'रज्जाक बहुत बड़ा नेता है। वह जाति धर्म नहीं देखता, सबकी मदद करता है। किसी के यहाँ भी लड़की की शादी-विवाह पड़ जाय, कुछ न कुछ जरूर देता है। किसी को पांच तो किसी को दस हजार; किसी किसी की शादी में बीस हजार तक खर्च कर देता है। अगले चुनाव में विधायक के लिए खड़ा होगा। उसकी जीत तो पक्की है।' सुदामा, अरविन्द को समझाने लगा।
'मगर इतना पैसा, उसके पास आता कहां से है ?'
'उसके कई ठेके चलते हैं। इस क्षेत्र के सरकारी सड़क, पुल जो भी बनता है, उन सबका ठेका वही लेता है। क्या मजाल उसके आगे किसी और को ठेका मिल जाय। हाँ, उसके अंतर्गत छोटे ठेके लेकर या फिर उसको उसका हिस्सा देकर ही कोई ठेका ले सकता है।'
'तो, ये तो वही बात हुई जनता का धन लूट कर जनता में बाँट रहा है और समाजसेवी भी बना हुआ है। उसका एकाधिकार है और बाँट भी रहा है तो सड़कें भी वैसी ही होंगी।'
'हां, ये तो है। बस बिल पास होने तक ही ठीक रहती हैं। एक साल के बाद ही मरम्मत की जरूरत पड़ जाती है।'
'वही तो कह रहा हूँ। जनता को अपना अधिकार भी भीख के रूप में मिल रहा है। जो काम सरकार को करना चाहिए वो ठेकेदार करते हैं और फिर ये खुद सरकार में शामिल हो जाते हैं। जो पैसा जहाँ लगना चाहिए, वहां नहीं लग रहा है। वह जो बाँट रहा है, वो भी तो अपना घर भरने के बाद ही कर रहा होगा। लोग समझते हैं उनकी मदद कर रहा है, क्योंकि उन्हें अपना अधिकार पता नहीं है। ख़राब सडकों के चलते जन धन का जो नुकसान होता है, उसका आंकलन करें तो लोगों को समझ आ जायेगा और इस तरह की मदद नहीं लेंगे। बल्कि सही काम चाहेंगे।'


बड़ा ठेकेदार

सुमेर सिंह अब बड़ा ठेकेदार हो चुका था। उसे सड़क बनाने के कई ठेके मिले हुए थे। एक दिन सुमेर सिंह निगम के जूनियर इंजीनियर के सामने गिड़गिड़ा रहा था।
'सर, बड़ा नुकसान हो जायेगा, सब आपके हाथ में है। पास कर दीजिये। मैं तो लुट जाऊंगा।'
जूनियर इंजीनियर था कि झिड़की पर झिड़की दिए जा रहा था, 'इतना ख़राब काम करते हो। फोकट का पैसा लेना चाहते हो? क्या समझते हो सरकार अंधी है? हम लोग फालतू में बैठे हैं ! इसे दुबारा से बनाना होगा।'
सुमेर सिंह ने बोल दिया 'गलती तो हो ही गयी है, आप नहीं सुनेंगे तो चीफ इंजीनियर से बात कर लेता हूँ। '
जूनियर इंजीनियर और चिढ गया, 'ठेकेदार जी! तुम चाहे जिससे बात कर लो, काम दुबारा ही करना पड़ेगा, अंधेरगर्दी नहीं है। चीफ इंजीनियर भी क्या तुम्हारे लिए मानक बदल देंगे। अभी तो सोच रहा था कोई रास्ता निकालें जिससे तुम्हारा कम नुकसान हो पर जाओ चीफ साहब ही देखेंगे। '
मुंह बनाकर सुमेर सिंह जेइ के कमरे से बाहर निकले। मोतीलाल गांव की सड़क टूटने की शिकायत लेकर जूनियर इंजीनियर से मिलने गया था। कक्ष के द्वार पर खड़े वह भीतर जाने की प्रतीक्षा कर रहा था।
मोतीलाल को वहां खड़े देख, सुमेरसिंह शर्म से पानी पानी हो गया। सुमेर सिंह को मोतीलाल की वह बात याद आ गयी।

एक बार सुमेर सिंह का ड्राइवर छुट्टी पर था, तो उन्होंने मोती लाल को बोल दिया कि उन्हें कहीं जाना है, एक दिन के लिए गाड़ी चला देना। पर मोती लाल ने पहले ही व्यस्तता की बात  कर दी।
सुमेर सिंह नाराज हो गए, 'तुम्हारा बेटा इंजीनियर क्या बन गया, तुम्हारा दिमाग आसमान पर चढ़ गया है। उसके जैसे इंजीनियर हमारे यहाँ नौकर हैं।
'नौकर काहे के मालिक! यह तो उनकी योग्यता है जिसकी बदौलत आपका काम चल रहा है।'


गुरु जी

'आईये पंडित जी बैठिये कैसे आना हुआ।' अधिकारी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया। और उन्हें बैठने का अनुरोध किया। पंडित जी सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए किन्तु अधिकारी के इस प्रकार परिचित जैसी बात सुनकर, हतप्रभ थे। 'आखिर यह अधिकारी मुझे कैसे जानता है !' अपनी बात रखते हुए बोले -
'जी सर, मेरे चकबंदी के कागज में मेरा नाम गलत लिख दिया है, उसे ठीक कराना है। '
'कोई बात नहीं एक एप्लीकेशन लिख कर दीजिये, अभी हो जायेगा।'
पंडित रामधन प्रार्थना पत्र पहले ही तैयार रखे थे, थमा दिए।
अधिकारी ने बाबू को बुलाया और बोला, 'ये एप्लिकेशन लो और इसे अभी ठीक कर दो। '
'सर इनका पहचान पत्र?'
अधिकारी ने पंडित जी की ओर देखते हुए कहा, 'सर लाये हैं तो कापी दे दीजिये, नहीं तो मैं प्रमाणित कर देता हूँ। तब तक चकबंदी अधिकारी ने चाय भी माँगा लिया था। अधिकारी के इस सत्कार ने पंडित जी को और भी अचंभित कर दिया था। सरकारी कर्यालय में इस तरह का व्यवहार, पंडित जी के गले नहीं उतर रहा था। अभी सोच ही रहे थे कि पूछूं, क्या मुझे जानते हो ? तब तक आरिफ ही बोल दिया,
'सर, आप पहचान नहीं रहे होंगे। प्राथमिक कक्षा में आपने मुझे पढ़ाया था। प्राथमिक शिक्षा के पश्चात् मैं गांव से शहर चला गया और आगे कि पढ़ाई लिखाई वहीँ से हुई। आप लोगों का आशीर्वाद ही था कि आज मैं इस कुर्सी पर बैठा हूँ।'
पंडित जी यह सुनकर गद्गद थे।


गिफ्ट का डिब्बा

कूड़े वाली के आते ही सोनम पूछने लगी, 'अरे, कल का कूड़ा तूने कहाँ फेंका था।'
'वहीँ मेम साहब! कूड़े घर में और कहाँ !'
'तब तो उसमें मिलना अब मुश्किल होगा।'
'हाँ मेम साहब, कई दिनों से कूड़े वाली गाड़ी नहीं आयी थी, हो सकता है आज सुबह उठा ले गयी हो। किन्तु कूड़े में ऐसा क्या चला गया, जिसके लिए आप इतना परेशान हैं?'
'अरे क्या बताऊँ, उसमें एक गत्ते का डिब्बा था।'
'हाँ मेम साहब ! एक गत्ते का बड़ा सा डिब्बा था, उसे निकाल कर मैंने रख लिया है। उसी में मैंने गिफ्ट पैक कर के रख दिया है। आज शाम को एक शादी में जाना है। मुझे वह डिब्बा बड़ा अच्छा लगा था, सोची कूड़े में फेंकने से अच्छा, उसी में गिफ्ट पैक कर दें। जब आप को पसंद था तो फेंका ही क्यों ?'
'अरे क्या बताऊँ! उसे मेरे जीजा ने मेरे जन्म दिन पर सौगात में दिया था। वे एक बेहतरीन चित्रकार हैं। उन्होंने मेरी एक तस्वीर बनाई और मुझे अचंभित करने के ध्येय से उसी डिब्बे में उलटा कर के रख दिया। मैं समझी कि मजाक स्वरुप उन्होंने मुझे खाली डिब्बा दे दिया है और मैं फेक डाली। अब तो तू अपना गिफ्ट किसी और डिब्बे में पैक कर ले उसे मुझे वापस कर दे। जब वे फोन पर पूछे कि तस्वीर कैसी लगी, उसके बारे में तब पता चला।'



डॉक्टर बहू

बहू दवाई खा ली।
नहीं मम्मी जी! अभी दूसरी दवा खाई हूँ, थोड़ा गैप देकर खा लूंगी।' कुसुम बोली
'अरे, असली दवा तो यही है, कई बार टॉयलेट जा चुकी, खा लेती तो आराम मिल जाता। दूसरी बाद में खा लेती।'
 बीच पिंकी बोल पड़ी 'मम्मी क्या समझा रही हो, भाभी डॉक्टर हैं, उन्हें नहीं पता कौन सी दवा कब लेनी है !'
जगन सेंगर सब सुन रहे थे, बोले 'अरे बहू तो डॉक्टर ही है न, सास तो ये ही हैं।'
कुसुम मन ही मन हँसते हुए कोकिला के पास गयी, नहीं मम्मी जी आप सही कह रही हैं, बस खाने ही जा रही हूँ।





Saturday, 11 March 2017

Aniwasi

अनिवासी 

आज, हर्ष का नाम दुनिया के धनाढ्य लोगों में शुमार होता है। पूरी दुनिया में फैला कारोबार, देश विदेश में कई बड़े कारखाने, करोड़ों  का आयात निर्यात, हर्ष के व्यापार का साम्राज्य कई बड़े बड़े देशों में पंख पसारे हुए है। लोहा, तेल, केमिकल और कई क्षेत्रों में, उसका अरबों रुपये का कारोबार, निरंतर प्रगति पर है। देश ही नहीं, विदेशों में भी उसके कई इंजीनियरिंग और प्रबंधकीय संस्थान चलते हैं। अब तो देश की सरकार भी निवेश के लिए उसका मुंह ताकती है। अरबों का स्वामी होने के बावजूद भी, उसे अपनी बीती कहानी बताने में कोई संकोच नहीं होता। वह कहीं भी किसी  सम्मलेन आदि में जाता, अपनी कहानी बताकर लोगों को प्रेरणा देता रहता।

हर्ष पढ़ाई में तो फिसड्डी ही था। किसी तरह से वह ग्रेजुएट हो गया। नौकरी के लिए बहुत धक्के खाया पर कई वर्षों तक कोई ठीक ठाक काम नहीं मिल पाया। उसने फिर कबाड़ खरीदने और बेचने का काम प्रारम्भ किया। लोहा-लंगड़ आदि खरीद कर कारखानों में बेच देता, वहां पर गलाकर, उससे अन्य सामान तैयार किया जाता। इसमें उसे, अच्छा खासा लाभ होने लगा। धीरे धीरे, उसने लोहा गलाने की भट्ठी लगा ली और अब वह कबाड़ सीधे बेचने की जगह, लोहे की रॉड बनाकर बेचने लगा। यह काम पहले से अधिक लाभप्रद और  सम्मान जनक भी था। बेचने के लिये जगह जगह जाने की छुट्टी हो गयी और वह स्वयं कबाड़ी की जगह एक छोटे मोटे कारखाने का मालिक बन गया। नोएडा में उसका कारखाना चलने लगा और उसने काम करने के लिए कुछ कर्मचारी भी रख लिये।

कुछ समय के बाद, उसके पास ताम्बा का भी कबाड़ आने लगा। हर्ष ने सोचा, बजाय इसे सीधा बेचने के, तार बनाकर बेचा जाय तो अच्छी कमाई भी होगी और एक कबाड़ीवाला से उद्योगपति हो जायेगा। परन्तु इसके लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता थी। अपना घर और गांव की जमीन बेचकर भी, उतनी पूंजी नहीं जुटा सकता था। उसने ऋण के लिए बैंकों से बात किया, पर कबाड़ के काम और छोटी सी भट्टी पर, बैंक ऋण देने को तैयार नहीं थे। कर्ज के लिए कोई जमानत लेने को भी तैयार नहीं था। ऋण नहीं मिलने से हर्ष बहुत मायूस था पर वह एक साहसी उद्यमी था। इतनी सरलता से हार मानने वाला नहीं था। उसने अपनी जमीन गिरवी रखकर, अपने गांव के ही साहूकार से कुछ रुपये उधार ले लिए। उसको अपनी आवश्यकता भर धन तो नहीं मिला पर गाड़ी को थोड़ी और गति मिल गयी। इसी बीच हर्ष की मुलाकात एक केबल निर्माता, विजय कुमार गुप्ता से हुई। जब हर्ष ने गुप्ता जी को अपनी योजना बताई तो वे उसकी उद्यमता से प्रभावित हुए और उसे सहयोग देने का भरोसा दिया। उन्होंने एक निजी बैंक से, उसे कुछ कर्ज दिलवा दिया। यही नहीं हर्ष के कारखाने में बने तार को भी अपने केबल के लिए खरीदने का करार कर लिया।

हर्ष का काम ठीक ठाक चलने लगा। वह एक महान उद्यमी था, अपने काम में निरंतर प्रगति देखना चाहता था। उसका काम तो ठीक चल रहा था, पर उसे आये दिन सरकारी एजेंसियों के उत्पीडन का सामना करना पड़ता था। कभी श्रम विभाग वाले, कभी बिजली वाले, कभी बिक्री कर, कभी उत्पाद  शुल्क सभी से निपटना पड़ता था। इन सबसे हार मानने की बजाय, किसी न किसी तरह सब का प्रबंध कर लेता।

एक बार अख़बार में उसकी नजर लन्दन की एक कंपनी के टेंडर पर पड़ी। एक मोटर कंपनी को तांबे के तार निर्यात करने का टेंडर था। हर्ष ने सोचा, क्यों न इसमें किस्मत आजमाई जाय। उसे निर्यात का कोई अनुभव नहीं था, मगर उसके मन में जो आता उसे  पूरा करने के लिए, पूरा जोर लगा देता। उसने निर्यात प्रबंध (एक्सपोर्ट मैनेजमेंट) की एक  किताब खरीदी और निर्यात के बारे में अध्ययन करने लगा।  साथ ही अपने एक कर्मचारी को पूर्ण रूप से इसी काम में लगा दिया। उसने अपनी कंपनी का नाम आयात निर्यात के लिए पंजीकृत करवाया। अब उसे एक बार फिर से ऋण और टेंडर के नियमों के अनुसार, बैंक गारंटी की आवश्यकता पड़ी। उसके पास काम बड़ा था और पूंजी बहुत छोटी। कोई भी बैंक उसके काम के लिए ऋण और गारंटी देने को तैयार नहीं था।
बड़ी मुश्किल से एक बैंक उसकी पूंजी के बराबर ऋण देने को तैयार हो गया। हर्ष की बुद्धि काम की, उसने बैंक से आग्रह किया कि वह टेंडर के हिसाब से ऋण की स्वीकृत दे दे और वास्तविक ऋण, पूंजी के ही बराबर जारी करे। जब वह ऋण पूरा हो जाये तो आगे के काम के लिए दूसरी किस्त दे। हो सकता है, उसी पैसे को घुमाकर वह आगे का काम चला ले। बैंक ने उसकी यह बात मान ली। हर्ष ने टेंडर भरा और उसकी किस्मत ने साथ दिया, कीमत सबसे कम होने के कारण, वह आर्डर उसे ही मिल गया। हर्ष के पास पूंजी तो थी नहीं कि वह सारा माल एक बार में भेज पाए, उसने आयातक से बहाना बनाया कि पहली खेप थोड़ा कम ही भेजेगा, ताकि माल के गुणवत्ता के बारे में वह आश्वस्त हो ले और आर्डर का शेष माल की यथाशीघ्र पूर्ति कर देगा। उसकी यह रणनीति काम आ गयी। उसकी पहली खेप पास हो गयी और पहली ही खेप में अच्छा ख़ासा लाभ मिल गया। फिर क्या था, पहली खेप का जो पैसा आया दूसरी खेप में, उसके दूना माल भेज दिया और तीसरी बार में सारा काम  सफलता पूर्वक संपन्न कर दिया। अब हर्ष के व्यापार को पर लग चुके थे। बैंक का पैसा समय पर लौटा देने के कारण, उसे और ऋण लेने का आग्रह करने लगा।

इधर हर्ष को भी निर्यात का और बड़ा काम मिलने लगा। अब तो उसके पौ बारह थे। देखते ही देखते वह करोड़ों में खेलने लगा। कुछ ही वर्षों बाद वह लोहे और ताम्बा का एक बहुत बड़ा निर्यातक बन गया। हर्ष जिस चीज को हाथ लगाता सोना बन जाता। उसकी गिनती देश के धनाढ्य व्यक्तियों में होने लगी। उसका कारोबार इंगलैंड से अधिक सम्बंधित था, इस कारण लंदन आना जाना बहुत होता। कई बार तो महीनों लंदन में ही बीत जाते। धीरे धीरे उसे लंदन ही भाने लगा और वहां अपना स्थाई निवास बना लिया।  अब तो स्वदेश कभी कभी आता।
एक बार हर्ष भारत आया हुआ था, वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज में एक सेमीनार में गया तो वहां एक व्यक्ति जो सेमीनार के प्रबंध में लगा था, जाना पहचाना सा लगा। हर्ष ने उससे पूछा, 'तुषार!'
उत्तर मिला 'हां, और कैसे हैं सर, आपने पहचान लिया! कितने वर्षों बाद मिले हैं। '
'अरे, क्यों  नहीं पहचानेंगे, चलो सेमीनार के ब्रेक में मिलना। '
तुषार प्राथमिक कक्षा में, हर्ष के साथ पढ़ा था। उसे देखकर हर्ष को अपना बचपन याद आ गया। बात चीत से पता चला कि तुषार उसी कॉलेज में कार्यालय अधीक्षक है। हर्ष का उससे बात करने का मन हो आया और तुषार को अगले दिन होटल में आमंत्रित कर लिया, 'कल शाम मेरे होटल आ जाओ, खाना साथ खाते हैं, हां समय का ख्याल रखना, शाम ठीक सात बजे होटल पहुँच जाना।  उसके बाद और किसी से भी मिलना है। '
 तुषार घर जाकर हर्ष की तारीफ के पुल बांध दिया। अपनी माँ और पत्नी से बार बार कहता, 'देखो कितना बड़ा आदमी है, अरबपति और मुझ जैसे को फाइव स्टार होटल में खाने पर बुलाया है। '
तुषार पहली बार फाइव स्टार होटल में खाना खाने पहुंचा। मेज पर पड़े मेन्यू को उठाकर पलटने लगा। मेन्यू में खाने का रेट देखकर, उसके तोते उड़े हुए थे।
'बोलो क्या लोगे?' हर्ष ने पूछा।
'आप ही अपनी मर्जी से आर्डर कर दीजिये। मुझे तो यहाँ कुछ समझ ही नहीं आ रहा। '
'ड्रिंक-व्रिंक लेते हो न ?'
'कभी कभार, बियर ले लेता हूँ। '
'वेटर! एक बियर और एक लार्ज स्कॉच, साथ ये ये स्नैक्स। बाकी खाने का उसके बाद बताते हैं।'
बातचीत प्रारम्भ हुई। पुरानी यादें ताजा करके, हर्ष को बड़ा आनंद आ रहा था। तुषार एक एक कर सब बातें उसे बताता तो हर्ष हां में हाँ मिलाता। हर्ष तो अपने काम में इतना व्यस्त रहता था, अब तक इतनी सब बातें उसे कहाँ याद रहेंगी।  छुटपुट एकाध बात उसे याद थी, बीच बीच में दाग देता।
उसने तुषार से पूछा, 'कभी लंदन  गए हो ?'
'मेरे नसीब में कहां सर, बहुत से लोग पैसे कमाने के लिए विदेश चले जाते हैं और आप जैसे लोग अधिक पैसे कमा लेने के कारण चले गए। मैं  तो किसी भी श्रेणी में नहीं आता। ग्रेजुएशन के बाद मैंने भी सोचा, अमेरिका चला जाऊं, वहां ज्यादा कमा सकूंगा। मगर, उसके लिए भी पैसे की जरूरत थी, जुगाड़ नहीं हो पाया। यहीं एक इंजीनियरिंग कॉलेज में क्लर्क की नौकरी मिल गयी, प्रमोशन के बाद सुपरिन्टेन्डेन्ट बन गया हूँ। मुझे तो अपना ही देश सबसे अच्छा लगता है। देखेंगे कभी नसीब हुआ तो घूम फिर आएंगे। '
'बिल्कुल सही कह रहे हो तुषार। मातृभूमि तो अच्छी लगती ही है। देखो, पेड़ की शाखायें चाहे कितनी ही दूर तक फैली हों लेकिन महत्त्व जड़ का अधिक होता है।  क्योंकि पेड़ उसी स्थान पर उगता है, जहां बीज गड़ा होता है।  
ये लो मेरा कार्ड, जब कभी घूमने आना हो मैसेज कर देना, तुम्हारा टिकट मैं अपनी कंपनी से करवा दूंगा। और हाँ, भाभी को भी साथ लाना। तुमसे बात करके बहुत अच्छा लगा, बचपन की बातें एक बार फिर ताजा हो आयीं। ठीक है चलो; अभी साढ़े नौ बजे, मेरा किसी से अपॉइंटमेंट है।'









आज के आधुनिक और व्यस्तम जीवन में भी साहित्य के प्रति लोगों की रूचि देखते ही बनती है। साहित्य में काव्य का अपना एक अलग ही महत्त्व है। कविता अनंत काल से अपना स्थान बनाये हुए है। कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज जब कठिन और जटिल परिस्थितियों में होता है कवि या लेखक अपनी लेखनी के द्वारा, उसे उबारने में बड़ी भूमिका निभाता है। समय और समाज परिवर्तनशील हैं। तदनुसार हिंदी कविता भी अपना स्वरुप बदलती रही है, परन्तु हर रूप में उसका उद्देश्य एक ही रहा है, समाज को सजग और जागृत रखना। हिंदी काव्य विधा के अनेकों रूप हैं और सभी अत्यंत रुचिकर तथा लोकप्रिय होने के साथ सामाजिक चेतना हेतु सशक्त हैं। काव्य की कई विधाओं में सुर और तुक के अनिवार्य नियम होने के फलस्वरूप,  अनेकों कवि बहुत अच्छे भाव होते हुए भी अपनी बात को काव्य में नहीं ढाल पाते। इस कारण बहुत से कवियों ने अतुकांत कविता का सहारा लिया और अनेकों कवितायेँ मर गयीं।

हाइकु भी अतुकांत कविता का एक सूक्षतम रूप है, अपितु कह सकते हैं अब तक की अपनाई जाने वाली किसी भी  विधा का सबसे सूक्ष्म रूप है। हाइकु की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह एक जापानी विधा होने के बावजूद, संसार के कोने कोने तक पहुंच चुका है और हर भाषा में खूब बढ़ चढ़ कर लिखा जा रहा है। संचार क्रान्ति ने इसके प्रचार प्रसार में और भी अधिक योगदान दिया।

अब्दुल समद राही जी, एक कवि और प्रकाशक दोनों ही रूप में अद्वितीय और सराहनीय कार्य में रत हैं। उनके साथ मैं काफी समय से फेसबुक पर जुड़ा हुआ हूँ। उनकी रचनाओं समाज, राजनीति, प्रकृति, जीवन, सिद्धान्त आदि सभी विषय समाहित हैं। उनके हाइकु रचनाओं में भी इन विषयों का अनुभव किया जा सकता है।  उनके रची कुछ हाइकु निम्न हैं -

प्रेम और मित्रता से सम्बंधित -
याद तुम्हारी
हंसती मुस्कराती
साथ रहती
दीपक के माध्यम से मानव व्यव्हार पर आघात   
तोड़ता भ्रम
घने अंधेरों का भी
एक दीपक
प्रकृति से सम्बंधित -
उदास उडी
चमन से तितली
टूटा गुलाब
जीवन संबंधी - 
नारी बुनती
खुशियों की चादर
दर्द सहती
जीवन और पर्यावरण से सम्बंधित 
खड़ा है ठूंठ
बतियाते हैं लोग
देता था छाँव

उनके हाइकु संकलन के प्रकाशन पर, उन्हें हार्दिक शुभकामनायें देता हूँ और सफलता की कामना करता हूँ।

एस० डी० तिवारी 

Thursday, 9 February 2017

Ek school ki kahani

स्कूल यहीं चलेगा

वंश नारायण जी ने सारी उम्र दिल्ली में बिताई, मगर जन्मभूमि से उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ। उनका पूरा परिवार और कई रिश्तेदार भी दिल्ली ही चले गए थे, इस कारण उनका गांव आना जाना कम हो गया था। फिर भी, साल दो साल में एकाध बार गांव का चक्कर लग ही जाता। उनके एक छोटे भाई का परिवार गांव में ही रहता था। अब वे सेवानिवृत्त हो चुके थे और पचहत्तर पार कर चुके थे। इस बार तो वे पूरे पांच साल के पश्चात् वे अपने गांव घूमने आये थे और साथ में तीनों छोटे भाई भी। वे गांव आते तो अपने बचपन की चीजें ढूंढने लगते। सब कुछ अतीत में खो चुका था। पुरानी चीजों को देखने और पुराने लोगों से मिलने में उन्हें बड़े आनंद की अनुभूति होती, मगर अपने समय की कोई भी चीज नहीं दिखती थी। सब बदल गया था, यहाँ तक कि अपना खुद का घर भी। उनके समय का बस गांव का एक पोखरा और दो तीन पेड़ बचे थे। वैसे पोखरा का रूप भी काफी कुछ बदल चुका था। पोखरा के चारों ओर, तटों पर अनेकों वृक्ष होते थे और बीच बीच में पलास की झाड़। वो सब जमीन अब खेत हो चुकी थी। जब वे पोखरा पर जाते तो देखकर मन बहुत उदास हो जाता। कभी जब पलास के टेसू दहकते थे तो देखते ही बनता था। आज लगभग सभी पेड़ कट चुके हैं, पलास नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है। तट को पोखरे के पानी के पास तक जोत लिया गया है। बचपन में रविवार के दिन, बंशनारायण, अधिकतर मित्रों के साथ, इसी पोखरे में नहाने आते और तरण ताल का भरपूर आनंद उठाते थे। लगभग सौ मीटर लंबे पोखरे को वे तैर कर, पार हो जाते थे। तटों पर छोटे मोटे कई टीले होते थे, शाम को उन्हीं टीलों पर बैठ पोखरा को निहारते घंटों बीत जाते, आज कहीं बैठने की जगह ही नहीं है।

उनके ज़माने के, गांव में अब एक दो लोग ही बचे हैं। उनके समय का कोई मिल जाता तो पुरानी यादें ताजा हो आतीं, और अपने ज़माने के किस्से सुनने सुनाने लगते। एक दिन गांव के बरगद के पेड़ के नीचे आकर, एक हाथी खड़ा हो गया और महावत पेड़ पर चढ़कर उसके लिए टहनियां काटने लगा। उसे देखकर, वंशनारायण को भगवान सिंह की याद आ गयी। उस समय दो चार कोस में केवल भगवान सिंह का ही हाथी था और यहाँ गांव में पीपल और बरगद के पत्ते लेने आया करता था। उन्होंने महावत से पूछा, 'भैया यह किसका हाथी है ?'
'वीरेंदर सिंह का। ' 
'हमारे समय में यहाँ कई कोस में मलिकपुरा के केवल भगवान् सिंह का हाथी हुआ करता था। '
'हाँ, उन्हीं का है। वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनका बेटा है, अपनी इज्जत बनाये रखने को अभी तक हाथी रखे हुए है।'
'और वो स्कूल। '
'साहब, ये कहां समय दे पाते हैं। एक संस्था बना रखी है, वही सब सम्भालती है। '
वंशनारायण  के मन में एक बार स्कूल देखने की जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने कमलापति को साथ चलने के लिए पूछा, मगर उन्हें किसी रिश्तेदारी में जाना था। अतः वे अपने भतीजे को लेकर मलिकपुरा जाने के लिए तैयार हो गए। भतीजे ने अपनी मोटरसाइकिल कसी और ताऊ जी को पीछे बिठाकर मलिकपुरा के लिए चल दिया। तब तो ढाई कोस चलकर, वे पैदल ही जाते थे।

मलिकपुरा पहुंचते ही मुख्य सड़क पर बड़ा सा बोर्ड लगा था, 'मलिकपुरा स्नातकोत्तर महाविद्यालय'। अब महाविद्यालय के गेट तक पक्की सड़क है। अपने समय में वे खेतों के बीच, मेड़ों से होकर विद्यालय तक आते जाते थे। वे महाविद्यालय के गेट पर पहुंचे, गार्ड ने रुकने का संकेत दिया और मोटरसाइकिल रुक गयी।
'क्या काम है? साहब!'
वंशनारायण कुछ बोले बिना, कॉलेज के सामने ध्यानमग्न खड़े हो गए। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे या तो किंकर्तव्यविमूढ हो गए हों या विद्यालय की भव्यता में खो गए हों। विद्यालय के भवन को दृष्टि भर निहार लेने के पश्चात्, गार्ड से बोले, 'प्रिंसिपल साहब से मिलना है। '
'लेकिन वे अभी नहीं मिल सकते, किसी मीटिंग में हैं।'
बंशनारायण सोच में पड़ गए। पहले तो सोचा, कुछ देर प्रतीक्षा करके मिलकर जाऊं। उन्हें उम्मीद थी जब वे प्रिंसिपल से मिलेंगे और उन्हें पता चलेगा कि इस विद्यालय के सूत्रधार वे ही हैं तो वे आश्चर्य से भर जायेंगे। प्रिंसिपल के इस प्रकार मिलने से वे स्वयं गौरवान्वित होंगे। पर दूसरे ही क्षण आशंकित हुये, जमाना बीत गया, पता नहीं प्रिंसिपल उनकी बात पर विस्वास भी करे कि नहीं। उनके पास इस बात का प्रमाण भी क्या है। छोडो, चलो, वापस चलते हैं। 
गार्ड ने थोड़ा सहमते हुए बोला, 'साहब! एक बात पूछूँ ?'
'हां, बोलो। '
'आपकी उम्र देखकर तो लगता है, आप यहाँ पढ़े नहीं होंगे। क्योंकि आपसे इस कॉलेज की उम्र कुछ छोटी लग रही है। मगर, न जाने क्यों लग रहा है कि आपका कोई न कोई इस कॉलेज से गहरा सम्बन्ध है।
क्या आपके बच्चे यहीं पढ़े हैं? '
'हाँ, बहुत गहरा सम्बन्ध है। वैसे मेरे छोटे भाई और बेटे, भतीजे सब यहीं से पढ़े हैं। खैर चलते हैं। फिर कभी दुबारा आ जायेंगे।'
वापस जाते समय, महाविद्यालय के पास ही मधुबन की चट्टी पर, वंशनारायण की दृष्टि, एक चाय की दुकान पर बैठे वृद्ध पर पड़ी। चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था। वंशनारायण की घूरती नज़रों ने, उसके मन में यह जानने के लिए प्रश्न खड़ा कर दिया 'आखिर यह कौन है! इतने ध्यान से देख रहा है। ' फिर एकाएक बोल पड़ा -
'वंशनारायण  ...! '
'मातबर! वाह भाई, क्या बात है ! तुम्हारी यादाश्त तो कमाल की है, पहचान लिया। '
'अरे, इतने पुराने मित्र हो, तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ। वैसे, बुढ़ापे में तो पुरानी बातें और भी ताजा हो जाती हैं। और, तुम तो दिल्ली में बस गए हो न! यहाँ कब आये ?'
'बस एक सप्ताह ही हुआ। साथ के काफी लोग तो निकल चुके, बस एकाध लोग ही बचे हैं। उन्हीं की याद यहाँ खींच लाती है। सोचा, चलें एक बार अपने पुराने स्कूल की याद ताजा कर आयें।'
'और कमला, हरिद्वार, हरिहर कैसे हैं ? शिवशंकर के स्वर्गवास के बारे में तो पता चला था। '
'हाँ, बाकी सभी ठीक हैं। बस शिवशंकर थोड़ा पहले ही साथ छोड़ गया। '

'पूरे पचास वर्षों के बाद मिले हो, ये लो पहले यहाँ पर चाय पियो, फिर घर चलते हैं; तुम्हारी भाभी से मिलवाता हूँ और बहू के हाथ की चाय पिलवाउंगा।'
घर पहुंचते ही मातबर चिल्लाने लगे, 'कामिनी! कामिनी! देखो कौन आया है। कुछ नाश्ता पानी का प्रबंध करो। वंशनारायण मेरे बचपन के साथी हैं। आज चालीस वर्ष के पश्चात मिले हैं। पानी ले आओ, फिर पूरी कहानी बताता हूँ। '

'मंगई के सन छप्पन की बाढ़ ने क्षेत्र को दो भागों में बाँट दिया था।  नदी पार कर पाना कठिन हो गया था। छपरी विद्यालय के प्रांगण में जल भर गया था। विद्यालय की कक्षाओं में, पानी में से ही होकर जाया जा सकता था। नदी के दूसरी ओर के छात्रों का विद्यालय आना असंभव हो गया था। मंगई नदी पर बना छोटा सा पुल बहुत नीचे था और पुल के ऊपर से पानी बह रहा था। जल भराव का यह तांडव महीने भर से भी ऊपर चला। पूरे क्षेत्र में पूर्व माध्यमिक स्तर का एक ही विद्यालय था। मैं और वंशनारायण दोनों ही उस विद्यालय में अध्यापक थे। छात्रों के शिक्षा के संकट को देख, वंशनारायण ने नदी के इस पार के छात्रों को एकत्र कर के, मलिकपुरा में, एक मंदिर के प्रांगण में बने एक कमरे में पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। उनके इस अभियान में, मैं और इनके भाई कमलापति भी सम्मिलित हो गए। प्रारम्भ में तो दस बारह छात्र ही थे, जिनमें से आधे इन्हीं लोगों के गांव के थे, दो तो इनके भाई ही थे, हरिहर छठी में और हरिद्वार सातवीं में। महीने भर में ही यह संख्या पचास तक हो गयी। इस बात ने हम लोगों का उत्साह बढ़ा दिया। मलिकपुरा और मधुबन के निवासियों का समर्थन मिला और नदी के इस पार के सभी छात्र इस नए विद्यालय में आने लगे। धीरे धीरे बाढ़ समाप्त हुई, नदी का जल सूखा। तब तक मलिकपुरा में छात्रों की संख्या काफी बढ़ गयी थी। इस पार  के छात्र अब छपरी नहीं जा रहे थे। क्षेत्र के सभी लोग यही जानते हैं कि मेरे पिता जी के कारण इस विद्यालय की स्थापना हुई पर इसके वास्तविक सूत्रधार तो ये वंशनारायण जी हैं।'

मातबर की बात को बीच में काटते हुए वंशनारायण बोल पड़े, 'अगर आप के पिता फौजदार तिवारी नहीं होते तो यह विद्यालय कहाँ चल पाता। मलिकपुरा के विद्यालय की सफलता देख, छपरी विद्यालय का प्रबंधन चिंतित होने लगा था और इसकी सफलता के रथ को रोकने में जुट गया। मुझे तो फिर से छपरी आने की चेतावनी दी जाने लगी। मेरे नहीं कहने पर स्कूल को बंद करवाने की धमकियां मिलने लगीं। कुछ समय के लिए तो मैं भी डर गया था, किन्तु तुम्हारा साथ और तुम्हारे पिताजी के समर्थन में खड़े हो जाने से जो साहस मिला, उसके परिणाम स्वरुप स्कूल को कोई हिला नहीं पाया। हमारे पढ़ाये बच्चों के परिणाम देखकर, नदी की दूसरी ओर के भी कई छात्र नए विद्यालय में आने लगे थे। मुझे तो देख लेने की धमकी तक मिल चुकी थी, पर तुम्हारे पिता जी ने बोला, कोई आंख उठाकर तो देखे। उसके बाद तो मेरा डर समाप्त हो गया।'

'तुम्हे पता है! छपरी वाले मुझे दूने वेतन का प्रलोभन भी दिए थे। स्कूल तोड़ने  के लिए क्या क्या चाल नहीं चले। उस बंजर भूमि को खाली कराने के लिए, कुछ लोगों ने भगवान् सिंह को भड़काना प्रारम्भ कर दिया था। सीधे नहीं माने तो उनके साले के द्वारा भी कहलवाए कि वे मलिकपुरा में विद्यालय को न चलने दें।  किन्तु इस पूरे क्षेत्र में वे ही सबसे अधिक पढ़े लिखे थे और शिक्षा के महत्त्व को भली जानते थे। अपने गांव में चल रहे स्कूल को कैसे बंद करवा देते। और तो और, उनके शिक्षा विभाग में कार्यरत होने का विद्यालय को भरपूर लाभ मिला। वे, न ही केवल दृढ़ होकर बोले 'स्कूल यहीं चलेगा', अपितु इसको मान्यता भी दिलवा दिये। यह विद्यालय तो कालांतर में डिग्री कालेज हो गया और छपरी का विद्यालय बंद ही हो गया। तुम तो दिल्ली चले गए, मैं यहीं लगा रहा और उप प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत्त होकर पेंशन ले रहा हूँ।'

'क्या करता, उस समय मात्र बारह रुपये का तो वेतन मिलता था, और उस बारह रुपये वेतन के लिए ढाई कोस पैदल चलकर आना पड़ता। हमारे पास साइकिल तक नहीं थी। बच्चों से दो दो आना फीस ली जाती और उसी में से अध्यापकों का वेतन दिया जाता। मेरी बहन दिल्ली में थी, उसने बुलवा कर पचास रुपये की नौकरी दिलवा दी। फिर मैंने वहां जाकर, कमला को भी बुलवा लिया। कमला को भगवान सिंह ने बहुत रोका, पर अधिक कमाने की ललक नहीं रोक पाई। वैसे भगवान सिंह ने बहुत कहा, आगे चलकर वेतन बढ़वा देंगे और यहाँ मुख्याध्यापक बनने का भी अवसर है। पर मैंने ही वहां अधिक वेतन होने के कारण दिल्ली आने पर जोर दिया। कुल मिलाकर जिंदगी तो अच्छी रही, पर इस बात का मलाल रहा कि अपने लगाए पौधे को सींच नहीं पाए।'

'वैसे रुक जाते तो बुरा नहीं था। बाद में तो यहाँ भी अच्छा वेतन हो गया था। भगवान सिंह के सहयोग से विद्यालय को सरकारी अनुदान मिल गया और भवन भी बन गया। भगवान सिंह के शिक्षा विभाग में होने के कारण विद्यालय ने मुड़ कर वापस नहीं देखा। सरकार की मदद से, पूर्व माध्यमिक से माध्यमिक, माध्यमिक से डिग्री कॉलेज और फिर पोस्ट ग्रेजुएट, आगे बढ़ता ही गया। और आज कम से कम भी तो कुल चार हजार बच्चे इस संस्थान से प्रति वर्ष शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यहाँ के पढ़े छात्र कई जगह ऊँचे पदों पर भी जा पहुंचे हैं। '

'यही होता है, पेड़ लगाने वाला, खुद कहाँ फल खाता है। अभी आई।' कहते हुए मातबर की पत्नी उठकर चल दीं
और तुरंत ही कटोरे में पकौड़े लेकर आ गयी।
'अरे, वाह भाभी, अभी गयी और इतनी जल्दी पकौड़े!' वंशनारायण ने बड़े आश्चर्य से पूछा।
'हाँ, हम यहाँ बैठे थे तो अंदर बहू  बना रही थी। आज, पुराने ज़माने के दो शिक्षक मिले हैं, वो भी मलिकपुरा स्नातकोत्तर महाविद्यालय के संस्थापक, उनका मैं, और किस वस्तु से स्वागत करूँ। तब तक पकौड़े खाइये, अभी हलवा लेकर आती हूँ। हमारी और इनकी तो अभी नहीं हुई है, आप दोनों के मिलने की स्वर्ण जयंती भी हो चुकी है।'
एक दूसरे से मिलकर बंशनारायण और मातबर दोनों ही बहुत भाव विभोर थे।

Dukh ki maari Rajkumari

मसली फुलवा / सुलगती जिंदगी / जिंदगी सुलगती रही

नाम तो फुलवा था, मगर विवश थी, मसली हुई जिंदगी बिताने को। उसके साथ जो कुछ भी घटित होता, विधि का विधान समझ, सह लेती। उसने खुद को इतना साध लिया था कि उसके आगे दुःख बौना लगने लग गया था। दुखों में रहने की ऐसी आदत पड़ गयी थी कि सुख की कभी चाहत ही नहीं होती। श्रीमद भागवत गीता का अध्ययन तो नहीं की थी, मगर मूल मन्त्र उसके मानस पटल पर अंकित था।  उसे पूरा भरोसा था, देने वाला वही है और उतना ही देगा, जितना उसे देना है, अन्यथा परिश्रम में किसी से कम कहाँ थी। लगभग पूरी उम्र, जिंदगी का लाश ही ढोई। फुलवा को जीती जागती जिंदगी जीने का तो अवसर ही नहीं मिला।

यूँ तो बचपन में सब ठीक ठाक था। एक साधारण परिवार में ही पैदा हुयी, पर माँ बाप के प्यार में कोई कमी नहीं थी। फुलवा के माँ बाप पढ़े लिखे नहीं थे और स्कूल गांव से दूर था, बेटी को भी नहीं पढ़ा पाये। अभी तो अठारह भी पूरे नहीं हुए थे कि माँ बाप ने एक लड़का ढूंढ कर विवाह कर दिया। ससुराल की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं थी, अपितु मायके से निम्नतर ही थी। फुलवा का ससुर सुमेरचंद, फेरी लगाकर कुछ सामान बेचता और उसी से परिवार चलाता। उसका पति देवचंद भी पांचवी से ऊपर नहीं पढ़ा था, और छोटे पर से ही, अपने पिता के काम में लग गया था। सुमेर के स्वर्गवास के बाद, घर का पूरा कार्यभार देवचंद पर ही आ गया। गांव गांव घूमने में परिश्रम अधिक था और लाभ बहुत कम। किसी प्रकार से परिवार का भरण पोषण हो पाता। फुलवा के मायके का एक व्यक्ति, मुम्बई रहता था, उससे बात करके देवचंद को भी मुम्बई भिजवा दी। वहां जाकर, वह चना और मूंगफली बेचने लगा। मुम्बई में गांव से अधिक कमाई हो रही थी, मगर वहां का खर्च भी उसी तरह का था, खोली का ही कितना भाड़ा लग जाता। फिर भी कुछ न कुछ बचाकर, घर भेज देता। देवचंद अपने घर को पक्का बनवाना चाहता था। जब तक वह मुम्बई में रहा, उसके भेजे पैसे से पक्के घर की नींव डाल दी गयी और एक कमरे की दीवार भी चुन ली गयी, मगर उस पर छत पड़ने का योग नहीं हो पाया। गांव वालों से घास फूस मांग कर, किसी तरह से ऊपर छप्पर ही पड़ पाया।

इधर फुलवा बड़ी कठिनाई से अकेले जीवन काट रही थी। उसे बस पड़ोस की सीता चाची का ही सहारा था। अपना सुख दुःख  वह सीता चाची से कह लेती। समय बीता उसने एक पुत्री को जन्म दिया; सीता चाची के सहारे सब ठीक ठाक हो गया। तीन वर्ष बीते, उसने पुनः गर्भ धारण किया। देवचंद तो मुम्बई में ही था, इसलिए इस बार वह मायके चली गयी, और वहां एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। मुम्बई में देवचंद अस्वस्थ रहने लगा और फुलवा के बच्चों के साथ अकेले रहने की चिंता भी सता रही थी। इस कारण, कुछ वर्षों में काम धाम छोड़ कर वापस अपने गांव आ गया। आखिर फुलवा को भी पास पड़ोस पर कब तक छोड़ता। देवचंद की बीमारी ने गंभीर रूप धारण कर लिया। अभी बेटी शीला तेरह वर्ष की ही थी, देवचंद दुनिया छोड़, चल बसा। अब तो फुलवा की जिंदगी में केवल अंधकार ही था। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि वह क्या करे ? उसका एक एक पल,  गीली लकड़ी की तरह सुलग रहा था। अब कमाई का कोई साधन भी नहीं था, और दो दो बच्चे साथ। देवचंद ने कोई बीमा तक नहीं करवा रखा था, ताकि उसके मरने पर, फुलवा को कुछ मिल पाता। अब, फुलवा को एक एक पैसे के लिए जूझना पड़ रहा था। मज़बूरी क्या न करवा दे। फुलवा ने पंडित शिवशंकर के घर बर्तन मांजना शुरू कर दिया। पंडित जी के यहाँ काम करने से उसका गुजर होने लगा।  कभी कभी बचा खुचा खाना भी मिल जाता, जिसे खाकर बच्चे खुश हो जाते। पंडितानी उदार थीं, त्यौहार वगैरह पर साड़ी लुग्गा भी दे देती थीं।

शीला अभी अट्ठारह की भी नहीं थी कि फुलवा के मायके से सन्देश आया, कोई लड़का देख रखा है, विवाह कर दे। शीला तो अभी नासमझ थी ही, फुलवा के पास भी, ना नुकुर करने का कोई कारण नहीं था। मायके वालों की बात से  लगा कि लडके वाले ठीक ठाक हैं तो फुलवा सोचने लगी, वे शीला से शादी करेंगे भी या नहीं। रुपये पैसे तो थे नहीं, मगर लडके वाले फुलवा के भाई के दबाव में थे और शीला बहुत सुन्दर थी। उन्होंने शीला की सुंदरता पर, बिना किसी लेन देन के शादी कर लिया। फुलवा को लगा कि वह एक बहुत बड़े दायित्व से मुक्त हो गयी। अब बस लड़का है, बर्तन भांडे मांज कर पाल ही लेगी। थोड़ा बड़ा हो जायेगा तो वह उसका सहारा भी बन जायेगा।

एक दिन सुबह की किरणें आते ही, उसकी जिंदगी में आग लगा दीं। अभी वह सूरज को जल चढ़ाने की तैयारी कर रही थी कि शीला के ससुराल से समाचार आया, वह पिछली रात खाना बनाते हुए जल गयी, और घर पर ही दम तोड़ दी। फुलवा के तो सिर पर पहाड़ टूट पड़ा। हे भगवान ! आज यह दिन देखने के लिए जिन्दा ही क्यों रखा था! मगर, वह रोने धोने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती थी। बेटी के ससुराल वालों के कहे का उसे विश्वास करना ही था। पुलिस से जाँच करवाने की न तो उसके पास ज्ञान था, न ही हिम्मत। उसके अपने ही कष्ट कुछ कम नहीं थे। यूँ तो उसके मन में तरह तरह के प्रश्न उठते, आखिर वह खाना बनाते समय कैसे जली होगी ? खाना बनाना तो छोटे पर से ही सिखा दिया था। कहीं उसके ससुराल वालों ने त्रास तो नहीं दिया ? अथवा वे जलाकर मार डाले हों कि और अच्छी, दान दहेज़ वाली बहू मिल जाएगी। बेटी की मृत्यु के रहस्य को वह जिंदगी भर ढोती रही। उस संकट की घड़ी में भी उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। दुखों का एक एक पल, वह पी गयी।

फुलवा बहुत सुन्दर थी, पर पढ़ी लिखी नहीं होना उसे पग पग पर चुभ रहा था। विधवा होने के कारण वह सदा सशंकित रहती कि दामन में कहीं कोई दाग न लग जाय।  इसीलिए किसी से कोई मदद के लिए भी नहीं कहती।
एक बार ठाकुर बलदेव सिंह ने उसकी ओर सौ रुपये का नोट बढ़ाया तो लेने से साफ मना कर दी। 'साहब कोई काम दे दीजिये, जाने कौन से कर्म किये, ऊपर वाले ने इस जन्म में इतने दुःख दिए, अगला जन्म भी क्यों बिगड़वाना चाहते हैं। इस तरह खैरात लेकर मैं चैन से कैसे मरूँगी।'

एक दो लोग और उसकी मदद तो करना चाहते थे मगर डरते थे, कहीं कोई आक्षेप न लग जाये। फुलवा  भी आंख उठाकर किसी की ओर नहीं देखती। पड़ोस की एक दो औरतों से बात करके, अपना मन कुछ हल्का कर लेती। इक्कीसवीं शताब्दी में भी फुलवा को इस प्रकार की जिंदगी बितानी पड़ रही थी। उसके पास न तो कोई नेता फटकता न ही कोई समाज सेवी। कहते हैं न, गरीबी में अपना साया भी साथ छोड़ देता है। पंडित शिव शंकर के घर से उसे जो कुछ सहारा मिलता था वह भी जाता रहा। पँ शिवशंकर के मरने के पश्चात बर्तन मांजने का काम उनकी बहुओं ने अपने हाथ में ले लिया और फुलवा फिर से बिना काम के हो गयी। अब तो वह दाने दाने को तरसने लगी। किसी से कुछ मांगना उसके आत्मसम्मान के विरुद्ध था।

उसके बाद तो फुलवा को ऐसा काम करना पड़ा जो न तो किसी ने देखा होगा न ही सुना होगा। गांव में कई भूमिहीन लोग किसी की जमीन लेकर अधिया पर खेती कर लेते हैं, परंतु स्त्री होने के कारण वह यह भी नहीं कर सकती थी। पंडित जी के यहाँ दो भैंसे थीं, फुलवा ने उनके बेटे पुन्नर को प्रस्ताव दिया की भैंसों का गोबर उठाकर वह उपले पाथ देगी और आधा उसे दे देगी। यह बात उसे पसंद आई, मुफ्त में ईंधन का काम जो चलना था। सौदा तय हो गया।  इसके बाद वह उपले बेचकर अपना बसर करने लगी। उसे अब ईंधन का कोई अकाज नहीं है। वह दिन अभी तक याद है, जब एक दिन घर में ईंधन नहीं होने के कारण चूल्हा नहीं जला था। अब तो ईंधन के लिए पहले रख लेती है, उसके ऊपर का ही बेचती है। भाग्य ने एक बार और तमाचा मारा। पंडित जी की एक भैंस बीमार हो गयी, खाना पीना बंद कर दिया और साथ ही गोबर भी। अब मिलने वाला गोबर आधा हो गया। उसने उपले पाथा तो घनघोर घटा घिर आई। उसे बड़ी चिंता होने लगी, घर में ईंधन समाप्त हो गया था। उसने ढूंढ ढूंढ कर, टाट बोरों से उपलों को ढक दिया ताकि उपले का गोबर कहीं बारिश में बह न जाय। उपले सूख नहीं पाए। आखिरकार पंडित जी के घर से उधार मांग कर लाई। पर मुसीबत पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। जब चूल्हा जला तो पता चला, आटा समाप्त था। अब क्या करती, चाची के घर से मांग कर रोहित को दाल चावल खिला दी और अपने लिए, घर में थोड़ा चना पड़ा था, तवे पर भून कर खाई। ईश्वर ने भी किस प्रकार से भाग्य बांटे, नागफनी में भी फूल खिलते हैं पर फुलवा की जिंदगी में, बस कांटे ही कांटे।

सरकारी योजनाओं का उसे कोई ज्ञान नहीं था। एक दिन पुन्नर के यहाँ गांव का प्रधान आया था। पुन्नर ने प्रधान से बात करके विधवा पेंशन के लिए फॉर्म भरवा दिया। डूबते को तिनके का सहारा, उसे तीन सौ रुपये महीना पेंशन मिलने लगी, इससे रोहित की पढ़ाई का खर्च निकल जाता। बेटा अब कुछ समझदार हो चुका था। माँ का गोबर पाथना, उसे अच्छा नहीं लगता। उसने जिद्द करके, माँ से यह काम छुडवा दिया और गांव के पास चट्टी पर, चाय की दुकान खुलवा दी। सड़क की पटरी पर बैठ, माँ बेटे दोनों चाय बेचने लगे। इस काम में भी बस खाने भर को ही मिल पाता। धीरे धीरे रोहित बारहवीं पास कर चुका था। फुलवा ने उसे मुम्बई भिजवा दिया । उसे छोटी मोटी नौकरी तो मिल गयी, पर पगार बहुत कम थी। फुलवा अब घर में अकेले रहती। अकेले का खाना बनाने का भी जी नहीं होता। कभी गांव में किसी के यहां जाती, पूछ देता तो खा लेती, कभी भूखे भी सो जाती। कोई भी खाने को पूछता तो बदले में कुछ न कुछ काम अवश्य कर देती। वह किसी का  मुफ्त का नहीं खाना चाहती थी।

रोहित, मुम्बई की चमक धमक देखकर बहुत प्रभावित था। उसने गरीबी को बहुत समीप से देखा था। अतः इस स्थिति से निकलने के लिए संकल्पित था। माँ को खर्च के लिए पैसे भेजने के बाद, कुछ अपनी पढ़ाई में लगा देता। उसने दूरवर्ती शिक्षा योजना के अंतर्गत बी० ए० कर लिया। उसके बाद किसी अन्य कंपनी में, उसे अच्छी नौकरी मिल गयी। इधर शीला अब बूढी हो चुकी थी, बीमार थी। बेटे की कमाई से घर की छत पड़ गयी थी। अब उसे अपनी जरूरतों के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ता था। जो कुछ पैसा वह भेजता, उसमें बड़े आराम से काम चल जाता। अब उसका काम केवल अपने घर को संवारना और राम राम जपना रह गया था। 

एक दिन बेटे का फोन आया,  'माँ, मैं अगले सप्ताह आ रहा हूँ, तेरे खाते  में मैंने बीस हजार रुपये डाल दिया है। इस बार तेरे लिए गैस का कनेक्शन और नल लगवा दूंगा, और तुझे मुम्बई घुमाने ले चलूंगा।' फुलवा पास पड़ोस को बड़ी खुश होकर, रोहित के फ़ोन की बात बताती। पूरे गांव में ढिंढोरा पिट गया था कि फुलवा मुम्बई जा रही है। अभी तीन दिन ही बीते थे, फुलवा की  तबियत अचानक  बिगड़ गयी। पड़ोसियों ने डॉक्टर को बुलाया, हजारों रुपये की दवा आई, मगर कोई लाभ नहीं हुआ। पड़ोस की महिलाएं बार बार आकर उससे हाल चाल पूछ जातीं, वह यही कहती 'अब कोई चिंता नहीं बस दो दिन में रोहित आ जायेगा। सब सम्हाल लेगा।' उसकी नाजुक हालत देखकर सीता चाची की बहू, आज फुलवा के ही घर सोयी। उसे रात में भी कई बार दवा देनी थी। कल रोहित को भी आना था। सुबह होते ही फुलवा की जोर जोर से सांसें चलने लगी। बहू ने अपने घर से सबको बुला लिया। देखते ही देखते पास पड़ोस के कई लोग एकत्र हो गए। डॉक्टर को तुरंत ही बुलाया गया। मगर फुलवा किसी का एहसान अपने सिर पर नहीं लेने वाली थी। रोहित के आने तक, उसकी लाश घर के बाहर निकाल दी गयी थी।

पूरे गांव ने उसकी जिंदगी को तिल तिल सुलगते देखा था। उसका सब्र, उसकी सहनशक्ति, उसकी सादगी, उसके सात्विक विचार, ईश्वर में अटूट विस्वास, सभी के लिए उदारहण बन गए थे। कहते हैं, गरीब की भी कोई जिंदगी होती है! परंतु मौत तो सभी की होती है। अब पूरे गांव की सहानुभूति उसके साथ थी। आज सारा गांव, उसके यहां उमड़ पड़ा था। उसके शव पर लोग फूल और चादर चढाने लगे।  शव पर चादरों का अम्बार लग गया। लग रहा था उसकी जिंदगी अब शुरू हुई है। उसकी शव यात्रा के लिए पचासों लोग एकत्र हो गए। पुन्नर ने शव यात्रा के लिए अपने खर्चे पर बैंड बाजा भी बुलवा लिया। सभी कह रह रहे थे, इतनी भव्य शव यात्रा तो अभी तक यहाँ के कई गांव के लोगों की नहीं निकली होगी। और उसके चिता की लौ तो इतनी ऊँची कि जैसे आसमान छू रही हो।  फुलवा, जिंदगी से तो कुछ नहीं पाई, परंतु जो मौत पाई, दुनिया ने देखा।