Tuesday, 24 November 2015

Udaka dal

उड़ाका दल

शशांक एक कुशाग्र छात्र होने के साथ आज्ञाकारी भी था। वह अपनी पढ़ाई और विद्यालय द्वारा सौंपे कार्यों के प्रति बहुत सजग रहता। डॉक्टर या  इंजीनियर बनने का सपना संजोये, अपनी कक्षा में प्रथम पांच-छः छात्रों में स्थान रखता। सरकारी स्कूल गांव से कुछ दूरी पर था, इसलिए पढ़ने हेतु एक निजी विद्यालय में जाना पड़ा। वैसे भी पढ़ाई के मामले में सरकारी स्कूल पर भरोसा कुछ कम ही था। सरकारी स्कूल में कभी सुविधाओं का अभाव  तो कभी कक्षा से शिक्षक नदारद, यदि उपस्थित भी हों तो अपने कर्तव्य निर्वाह में कोताही। वहीँ आम निजी स्कूलों में कम वेतन के कारण, योग्य शिक्षक नहीं होते। मगर शशांक की लगन के आगे ये सब नतमस्तक थे। उसके संपर्क में कोई भी योग्य आता, उससे अपने प्रश्नों का निराकरण कर लेता और अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए सदैव तत्पर रहता ।

वह अब दसवीं कक्षा का छात्र था।  इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा होने के कारण, अच्छे अंक लाने हेतु पढ़ाई में जी जान से जुटा था। परीक्षा की तिथि समीप आ चुकी थी, परंतु शशांक के मन में तनाव बिलकुल भी नहीं था।  बल्कि वह उत्साह से परिपूर्ण था क्योंकि तैयारी में उसने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। उच्चतर माध्यमिक में उसे जनपद के एक अच्छे स्कूल में विज्ञानं विषय से दाखिला लेने की योजना थी, ताकि आगे चलकर इंजीनियर या डॉक्टर की पढ़ाई कर सके। बोर्ड की परीक्षा होने के कारण इस बार उसका परीक्षा केंद्र दूसरे गांव, यादव सिंह के स्कूल में पड़ा था। परीक्षा का आज पहला दिन था, अतः वह समय से पहले ही केंद्र पर पहुँच गया ताकि अपनी सीट आदि की व्यवस्था भली प्रकार से देख ले, और परीक्षा का समय नष्ट न हो ।

परीक्षा हॉल में प्रवेश करके शशांक ने अपनी सीट ग्रहण कर लिया। उत्तर पुस्तिका पर रोल नंबर, विषय आदि लिखने के बाद प्रश्न पत्र मिला, उसे वह बड़ी तन्मयता से पढ़ डाला। प्रश्न पत्र आकाँक्षाओं के अनुरूप ही था। बहुत सारे प्रश्न उसे ठीक से आते थे, बस एक दो प्रश्नों में ही संशय था। हां, प्रश्न पत्र थोड़ा लम्बा अवश्य था। तनिक भी देर किये बिना, उसने उत्तर लिखना प्रारम्भ कर दिया। उसके लिखने की गति देखकर ऐसा लग रहा था कि विषय के सभी पाठ, उसे कंठस्थ हों।

यह क्या, थोड़ी देर बाद उसे परीक्षा कक्ष में एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला। परीक्षा में भाग ले रहे अधिकतर बच्चों का किताब खोलकर नकल प्रारम्भ। शशांक के तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। एक दो बच्चे तो किताब से भी ठीक ढंग से नहीं लिख पा रहे थे और निरीक्षक बना अध्यापक उनकी मदद कर रहा था। कुछ ही क्षण पश्चात्, एक अन्य अध्यापक कक्ष में प्रवेश किया और छात्रों से पैसे वसूलना आरम्भ कर दिया। सभी परीक्षार्थी छः-छः सौ रुपये देना प्रारम्भ कर दिए। एक छात्र ने यह कह कर पांच सौ रुपये ही दिया कि  'पापा ने इतना ही दिया है।'
'अबे, यह पिछले साल का रेट है। इस साल छः सौ समझे! कल सौ रुपये और लेकर आना। '

जो छात्र पैसे नहीं देता - या तो उसकी उत्तर पुस्तिका छीन ली जाती या उसे थप्पड़ जड़ दिया जाता।
शशांक यह सब देखकर हत प्रभ था । परिक्षा कक्ष का यह दृश्य ऐसा लग रहा था, मानो आतंकवादियों के चंगुल में फंसे किसी जहाज के यात्री।
अब तो शशांक का भी नंबर आ ही गया। अध्यापक उसके पास आ पहुंचा - 'निकालो छः सौ रुपये। '
'किस बात के, सर ? मैं तो नहीं लाया। '
'अरे, परीक्षा का सुविधा शुल्क।'
'सर, परीक्षा शुल्क तो फॉर्म के साथ ही जमा करा दिया। '
' अरे भाई वो नहीं, यहाँ पर जो नकल करने की सुविधा दी जा रही है।'
'सर, मैं तो नहीं लाया हूँ, न ही मुझे नकल करनी है।'
'नक़ल करो या न करो, तुम्हारी इच्छा। शुल्क भरो या बाहर जाओ।'
 यह कहते हुए अध्यापक ने उत्तर पुस्तिका छीन लिया। शशांक अभी लगभग आधे प्रश्न ही कर पाया था। उसकी ऑंखें डबडबा गयीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। कभी सोचा नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। छः सौ रुपये के लिए, उसका सपना, सपना ही रह जायेगा। एकाध बार मन में आया कि पैसे देकर जान छुड़ाए क्योंकि उसका भविष्य पैसे से अधिक महत्वपूर्ण था। परन्तु उसके पास इतने पैसे भी तो नहीं थे। उधार के लिए पता नहीं अध्यापक माने या न माने।  फिर सोचता है यह तो अत्याचार है, बर्बर अत्याचार। इस अन्याय से उसे लड़ना होगा। किसी को तो पहल करनी ही पड़ेगी, पर इसका सामना कैसे करे? यहाँ पर कौन सुनेगा ? सभी छात्र तो दे ही रहे हैं। उसके मन में यह सब मंथन चल ही रहा था कि एक लड़का दौड़ता हुआ आया और चिल्लाकर बोला,  'सर,  उड़ाका दल, उड़ाका दल।''
इस लडके को स्कूल वालों ने, मुख्य सड़क से स्कूल की ऒर आने वाले मार्ग पर, इस निर्देश के साथ खड़ा कर रखा था कि जैसे ही 'उड़ाका दल' की गाड़ी आती दिखाई दे अबिलम्ब विद्यालय को सूचित करे।
अध्यापक ने तुरंत ही सभी परीक्षार्थियों को आदेश दिया, 'सब लोग अपनी अपनी किताब, पर्चे, फर्रे जो कुछ भी है बाहर फेंक दो। उड़ाका दल  चले जाने के बाद ही पुनः प्रयोग करना है, समझे! '
'शशांक बोला, सर मेरी कापी ?'
'वह नहीं मिलेगी। अभी मैं जा रहा हूँ। उड़ाका दल आया है। '
'तो, मैं उड़ाका दल से बोल दूं?'
अध्यापक आग बबूला हो गया।
'अगर ऐसा किया तो नकल करने के आरोप में आगे की भी परीक्षा से जाओगे।  तुम्हे पता है यह सब तुम लोगों के लिए ही करना पड़ता है, इतने सब स्कूल के खर्चे कहाँ से आएंगे। तुम लोगों को पास भी तो कराना है।'
अध्यापक का यह भी रूप हो सकता है, शशांक कभी सोचा भी न था। वह एक सीधा सादा लड़का था और अपने परिवार से उसको आदर्श और नीतिगत बातें ही संस्कार में मिली थीं। वह सोच नहीं पा रहा था, इन नकल मार कर पास हुए बच्चों का आखिर क्या भविष्य होगा।
तत्पल, सभी बच्चे अपनी अपनी नकल सामग्री कक्षा के बाहर रख दिए ।
उड़ाका दल विद्यालय में दाखिल हो हुआ। प्रधानाध्यापक और अध्यापकों की एक टीम उसके स्वागत में जुट गयी। आव भगत के लिए इस निरीक्षक अध्यापक को भी जाना पड़ा । प्रधानाध्यापक के कार्यालय में चाय नाश्ता का दौर चल रहा था । शशांक साहस बटोर कर, अपनी उत्तर पुस्तिका छीने जाने की शिकायत करने चला। इसी बीच, किसी सहानुभूति रखने वाले छात्र ने शशांक को संकेत कर दिया कि जब तक निरीक्षक आता है, वह मेज पर पड़ी उत्तर पुस्तिका उठाकर कुछ लिख ले और उसके आने तक वापस रख दे, जो ही कुछ प्रश्न हो जायेंगे । शशांक को बात जंची, इस अवसर का लाभ उठाकर बिना समय गंवाए, मेज पर पड़ी अपनी उत्तर पुस्तिका उठा लिया और जितनी तीव्र गति से हो सका, लिखना प्रारम्भ कर दिया ।
अब तो मात्र शशांक की ही कलम चल रही थी। कक्षा में बैठे शेष छात्रों की कलम विश्राम पर थीं।
लगभग आधे घंटे पश्चात निरीक्षक महोदय लौट कर आये। एक परीक्षार्थी ने शशांक को बता दिया कि अध्यापक आ रहा है और वह अपनी उत्तर पुस्तिका वापस मेज पर रख दे । शशांक सभी प्रश्न तो नहीं हल कर पाया पर अब तक कई महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर लिख चुका था ।
उड़ाका दल चाय नाश्ता करके और अपनी भेंट लेकर चला गया ।
गर्व से भरा निरीक्षक, मुख पर विजय की मुद्रा लिए कक्ष में प्रवेश किया।
'हाँ अब तुम लोग नकल की प्रक्रिया चालू रख सकते हो।'
उसने शशांक की कापी भी यह कहते हुए लौटा दिया, 'ये लो, अगली परीक्षा में पैसे लेकर आना। '
अब तो समय थोड़ा ही बचा था, पर डूबते को तिनके का सहारा।  जितनी शीघ्रता से हो सका शशांक ने बाकी प्रश्न भी हल कर लिया । बस नाम मात्र के ही प्रश्न छूटे।
परीक्षा के बाद जब शशांक घर पहुंचा तो उसका उदास चेहरा देखकर अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि उसका पेपर ठीक नहीं हुआ है । पिता के पूछने पर, उसने सब साफ साफ बता दिया।

उसके पिता ने ढाढ़स दिया, 'कोई बात नहीं अगली परीक्षा में छः सौ रुपये ले जाना। '
इस बात ने शशांक को अति उद्वेलित किया, 'लेकिन पिता जी, मैंने आपसे यह तो नहीं सीखा है।  यही करना था तो वह पहले ही कर लेता, पहली परीक्षा भी खराब न होती। पिताजी, मुझे तो नकल ही नहीं करनी है और ऐसी व्यवस्था से लड़ना है। '
'पर बेटा ! क्या करोगे? तुम अकेले तो नहीं हो न, जब सभी दे रहे हैं तो तुम्हें वो क्यों छोड़ेंगे! और जरा सी बात के लिए अपना परिणाम खराब करोगे।'
शशांक को अपने पिता की यह बात अटपटी लगी, मगर अपने भविष्य के बारे में भी सोचना था। एक बाऱ तो सोचा कि वह अकेले क्या कर लेगा, पर वह हार भी नहीं मानना चाहता था। उसने पिता से आग्रह किया कि अगली परीक्षा में वे भी साथ चलें, अन्यथा वह प्रधानाध्यापक से अपनी बात कहेगा। परिणाम चाहे कुछ भी हो। और साथ ही नकल न करने का प्रण लिया । अगली परीक्षा में उसने प्रधानाध्यापक से दो टूक शब्दों में कह दिया न तो वह नक़ल करेगा, ना नक़ल के पैसे देगा। प्रधानाध्यापक वस्तुस्थिति को भांप कर, और बात के आगे बढ़ने के डर से, उसके निर्धन होने की बात कहकर, निरीक्षक से पैसे न लेने का निर्देश दे दिया। यद्यपि परीक्षा के समय में उसकी गहन जाँच के बहाने तंग किया जाता रहा और समय नष्ट किया जाता रहा, पर यह सब कुछ सहन करते हुए भी वह शील भाव से अपनी परीक्षा देता रहा। उसे इस बात का संतोष था कि उसने भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध एक लड़ाई छेड़ दी है।  
  
अब परिणाम का समय आ चुका  था। घर के सभी लोग डरे हुए थे, साथ ही शशांक। अगर कम अंक आये तो मनचाहे विषय में प्रवेश नहीं पा सकेगा। और हुआ भी वही, वह उत्तीर्ण तो हो गया पर प्राप्तांक उसकी आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं थे। उच्चतर माध्यमिक में विज्ञान विषय में प्रवेश पाने के लिए कुछ अंक कम रह गए। उसका नाम विज्ञानं विषय की प्रतीक्षा सूची में रह गया। शशांक के तो अफसोस का ठिकाना नहीं था। उसे आर्ट विषय लेने के लिए वाध्य होना पड़ा। मरता क्या न करता। वह कला विषय में दाखिला ले लिया। पर कहते हैं बहादुरों का भाग्य भी साथ देता है। कुछ दिनों पश्चात ही उसके भाग्य ने साथ दिया। विज्ञान विषय के एक छात्र को किसी कारणवश विद्यालय छोड़ कर अन्यत्र जाना पड़ा । शशांक का नाम पहले से ही प्रतीक्षा सूची में था, उसे विज्ञान विषय में प्रवेश पाने का अवसर मिल गया। अब उसने इस भ्रष्ट तंत्र से लड़ने के लिए स्वयं को समर्पित करने के लिए ठान लिया। विज्ञान विषय पढ़कर वह इंजीनियर तो बन गया, परन्तु अब उसकी जिंदगी का लक्ष्य भ्रष्टाचार से लड़ना था, वह प्रशासनिक सेवा की तयारी में जुट गया। 

       
  - एस० डी० तिवारी

Tuesday, 17 November 2015

Parcha dakhil


परचा दाखिल

नेता लोगों की मौज बहार देख, श्यामल का भी पढ़ाई लिखाई से अधिक नेतागिरी में चाव था। वह कॉलेज से ही छात्र नेता के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने लगा था। पढ़ाई पूरी होने के पश्चात नौकरी ढूंढने का कोई खास प्रयास नहीं किया और न ही अपनी खेती बारी में मन लगाया।  हाँ, अपना समय समाज सेवा और जन-संपर्क में अधिक व्यतीत करता था। मित्रों के प्रोत्साहन स्वरुप चुनाव लड़ने की प्रबल इच्छा उतपन्न होती, परन्तु, एक साधारण परिवार से होने के कारण धन के अभाव का सामना करना पड़ता और इस कारण चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा पाता।
धीरे धीरे समय बीतता गया, लोग उसके साथ जुड़ते गए और जन संपर्क बढ़ता गया, मगर धनाभाव के चलते चुनाव लड़ पाना उसके लिए अभी भी संभव नहीं था। श्यामल अपने क्षेत्र की बिजली, पानी आदि से सम्बंधित समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाता रहता तथा लोगों की सरकारी कार्यालयों में फंसे कार्यों में उनकी मदद करता रहता। कई लोग कार्य हो जाने  से प्रसन्न होकर, उसे चंदा भी दे देते और साथ ही चुनाव में खड़ा होने के लिए प्रेरित करते । चंदे की राशि को श्यामल संचित कर रख लेता ताकि जब भी उचित समय आएगा चुनाव के लिए परचा दाखिल कर देगा।
दो चार मित्र उसे हमेशा घेरे रहते और चुनाव में खड़ा होने को उकसाते रहते।
एक दिन उल्लास में भरा रामधन अख़बार लहराता दौड़ा हुआ आया।
'अरे श्यामल! देख, पंचायत चुनावों की घोषणा हो गयी। बस डेढ़ महीने में चुनाव होने हैं, इस बार तो तुझे खड़ा होना ही है।  प्रचार की चिंता मत कर, हम दोस्त सब किस काम आएंगे ! '
'और पैसा कहाँ से आएगा ?'
' हम लोग चंदा एकत्र करेंगे । तेरे काम की चर्चा दूर दूर तक हो रही है, तू अवश्य ही जीतेगा। '
'परन्तु किसी पार्टी का टिकट मिल जाता तो अच्छा होता, कुछ खर्च बर्च का पैसा मिल जाता और प्रचार भी हो जाता। एक पार्टी से बात किया था, पर पता चला कि सुरेश कुमार ने पैसे देकर उस पार्टी का टिकट ले लिया है। अपने पास कहाँ पैसे कि पार्टी को दें।  हाँ पार्टी कोई पैसे खर्च करे तो चुनाव लड़ लेंगे। '
'तू चिंता मत कर, सब हो जायेगा। तू स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में खड़ा  हो जा।  हम जी जान लगा देंगे।  तुझे जीतना ही है।' 
'चल ठीक है। '
सभी मित्र जुट गए।  निर्वाचन आयोग के कार्यालय से फॉर्म आया। पहले चुनाव लड़ चुके उम्मीदवारों से सलाह ली गयी और बड़ी सावधानी से फॉर्म भरा गया।  आज फॉर्म भरने का अंतिम दिन है।  भरपूर जज्बे के साथ श्यामल की मित्र मंडली परचा दाखिल करने चल पड़ी। निर्वाचन कार्यालय पहुंचते ही 'श्यामल जिंदाबाद' के नारे से वातावरण गूँज उठा। निर्वाचन अधिकारी के समक्ष परचा दाखिल हो गया। 
 अब चुनावी गणित शुरू हो गयी। मित्र चंदा जुटाने में लग गए। सम्बन्धी, सलाहकार आने लगे।
किस किस क्षेत्र में अपने पक्ष के कितने लोग हैं, अपनी जाति के कितने वोट हैं, और  जातियों का समर्थन मिल सकता है, विरोध में रहने वाले कौन से लोग होंगे, कहाँ के वोट पक्ष में नहीं आने वाले हैं, रिश्तेदारियां कहाँ कहां हैं, रिश्तेदारों की रिश्तेदारियां कहाँ कहाँ हैं, उन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव है या नहीं, नहीं तो उन्हें कैसे जोड़ा जाय। तरह तरह का जोड़ तोड़ प्रारम्भ हो गया।
परचा भरने की अंतिम तिथि बीत जाती है तभी निर्वाचन अधिकारी का फोन आता है कि श्यामल के पर्चे में कुछ कमियां हैं अतः नामांकन निरस्त हो सकता है। शयामल यह सुन कर भौचक्का रह जाता है।  वह अपना दल बल लेकर निर्वाचन कार्यालय पहुँच जाता है।  जाने पर ज्ञात होता है कि फॉर्म में जन्म तिथि गलत लिखी गयी है। श्यामल फॉर्म देखता है तो पता चलता है की जन्मतिथि के ऊपर किसी ने पुनः कुछ लिखा है, स्याही भी पहले वाली स्याही से मेल नहीं खा रही थी।  फॉर्म के साथ संलग्न प्रमाण पत्र से सही जन्म तिथि की पुष्टि हो रही थी।  समझाने बुझाने पर परचे को  स्वीकार कर लिया जाता है।

अब प्रचार का सिलसिला बड़े जोर शोर से शुरू हो गया। श्यामल के युवा नेता होने के कारण युवाओं में बहुत उत्साह था।  उसके शील और मिलनसार स्वाभाव के कारण सभी पसंद करते थे। प्रचार अभियान में लोगों से बड़ा समर्थन मिल रहा था।  वह घर घर जाता, सभी बड़े बुजुर्ग से आशीर्वाद लेता। श्यामल जहाँ भी जाता वोट मिलने का भरोसा मिल जाता। अब तो लोग श्यामल को अन्य उम्मीदवारों से बहुत आगे आंक रहे थे। बस मनवीर से थोड़ी टक्कर की उम्मीद थी। क्योंकि वह पहले भी प्रधान का चुनाव लड़ चुका था। प्रदेश के मंत्री यादव जी का बेटा तो कहीं और पीछे ठहर रहा था।
धीरे धीरे चुनाव का दिन आ ही गया, मतदान प्रारम्भ हुआ। रुझान श्यामल के पक्ष में स्पष्ट रूप से दिख रहा था।
मतों की गणना शुरू हुई। परिणाम आशाओं के अनुरूप ही था। श्यामल काफी आगे चल रहा था।  अब तक लगभग तीन चौथाई वोटों की गड़ना हो चुकी थी । अब तो उसकी विजय निश्चित ही थी । श्यामल के खेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी, उत्सव मनाने की तयारी भी शुरू हो गयी।  इधर मंत्री जी का बेटा जो दूसरे क्रम पर था चिंतित होने लगा था।  क्षेत्र का थानाध्यक्ष जो उसी की जाति का था उसका परम मित्र भी था। वह यादव जी के बेटे के पास जाकर चिंता जताने लगा। उसको पुलिस की नौकरी मंत्री जी ही दिलाये थे।  तभी मंत्री जी का ताजा हाल जानने के लिए फोन आ जाता है । बेटे ने उन्हें हालात से अवगत कराया।  मंत्री जी ने थानाध्यक्ष को फ़ोन देने को कहा।  फोन थामते ही थानाध्यक्ष कांपने लगा।
'तुमने कुछ नहीं किया। तुम इस थाने पर रहने लायक नहीं हो।'
'नहीं सर, हमने जो भी हो सका, किया।  सारे स्टाफ को इनको जीतने के लिए लगा रखा था। मैं तो आपका बड़ा एहसान मंद हूँ, सर!, आप के कृपा से ही मैं पुलिस में भर्ती हुआ था।  इतनी कोशिश की मगर इस बार तो उसकी हवा ही बनी हुई थी '    
'मुझे कुछ नहीं पता' यह कहते हुए मंत्री जी ने फोन  रख दिया। थानाध्यक्ष का मुंह बन गया।
थोड़ी ही देर के बाद चुनाव के परिणाम की घोषणा भी हो गयी।  श्यामल नौ सौ मतों से विजयी हो गया। मंत्री का बेटा झुंझला गया।  वह निर्वाचन अधिकारी से पुनर्गणना का आग्रह करने लगा । निर्वाचन अधिकारी ने असहमति जताई क्योंकि विजय का अंतर पर्याप्त मतों से था। थोड़ा बहुत अंतर होता तो करवा भी देते।  उपस्थित लोगों ने भी पुनर्गणना का विरोध किया।  मगर तभी सारा दृश्य एकदम बदल जाता है । उपस्थित भीड़ पर लाठी चार्ज हो जाती है ।  भगदड़ मच जाती है और लाठी चार्ज के बीच ही पुनः मतगणना शुरू हो जाती है ।  बहुत ही अल्पकाल में दुबारा मतगणना हो जाती है और मंत्री जी का बेटा दो सौ मतों से विजयी होता है ।
मंत्री जी के घर पटाखे, फूलझड़ी छूटने लगे । अगले दिन के समाचार पत्र में मुख पृष्ठ पर छपा है 'पंचायत चुनावों में धांधली '
पूरे जनपद में इस बात पर चर्चा है। बताओ सत्ता का कितना दुरुप्रयोग । समाचार पत्र पढ़कर रद्दी में फेंक दिया जाता है। एक दो दिन काना फूसी के बाद सब कुछ सामान्य।
बेचारा श्यामल .....  

Tuesday, 13 October 2015

do bahane


जुड़वां बहनें

मंजुला और मृदुला, दोनों एक ही कोख से और एक ही समय पर हुईं, परंतु दोनों की किस्मत और स्वाभाव में जमीन आसमान का अंतर था।  जहाँ मंजुला गंभीर लड़की थी, वहीं मृदुला नटखट। मंजुला घर की जिम्मेदारियों पर अधिक ध्यान रखती, और अपनी माँ के काम में हाथ बंटाती, मगर मृदुला को अपनी सहेलियों से गपशप में अधिक मन लगता। दोनों साथ साथ खेलीं, साथ साथ पढ़ीं और साथ साथ बढ़ीं। दोनों का एक ही घर, एक ही बिस्तर और यहाँ तक उदय नारायण उनके लिए कपडे भी एक जैसे ही लाते।  यह तो उन्हें पता ही था बेशक एक साथ जन्मी हों पर बड़ी होने पर अलग अलग घर में जाना होगा और किसके भाग्य में क्या लिखा है, किसको पता।
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धीरे धीरे दोनों बड़ी हो गयीं। उदय नारायण को उनके विवाह की चिंता सताने लगी। उन्हें अपने एक पुराने मित्र पारसनाथ की याद आयी। उनका पुत्र अतुल, इनकी बेटियों से एक वर्ष ही बड़ा था। पारसनाथ का गाँव उनके गांव से लगभग बीस किलोमीटर की ही दुरी पर था। उदय ने अपनी पत्नी से मंजुला उनके यहाँ रिश्ता करने की राय बात की तो उसे भी अच्छा लगा। मंजुला का मृदुला की अपेक्षा थोड़ा भरा पूरा देह था इसलिए वे पहले उसी का विवाह करना चाहते थे। उदयनारायण एक दिन पारस के घर जा धमके। पुराने मित्र को अचानक अपने द्वार पर पाकर पारसनाथ की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। उनका बड़ा ही आदर सत्कार हुआ। उदय ने जब मंजुला का विवाह का प्रस्ताव रखा तो तो पारसनाथ का उत्तर मिला -
'तुम्हारे यहाँ सम्बन्ध करने में तो मुझे प्रसन्नता ही है। तुम्हारी बेटियां सुन्दर हैं, पुराने मित्र हो, मित्रता सम्बन्ध में बदल जाय तो इससे बड़ी बात क्या होगी ! किन्तु अतुल अभी आगे पढना चाहता है। अभी तो वह  बी०सी०ए० के अंतिम सत्र की परीक्षा दे रहा है। बस दो साल रुक जाओ।'

वापस आकर उदय ने अपनी पत्नी से सारी बात बताई तो उसने कहा, 'दो साल तो बहुत अधिक समय है, इसके बाद मृदुला की भी करनी है। उनको समझा बुझा लो कि शादी कर लें, लड़का शादी के बाद भी पढ़ सकता है। वह होनहार है, पढ़ कर, कहीं अच्छी जगह लग जायेगा। नौकरी वाला लड़का ढूंढो तो, दहेज़ के लिए मुंह बाये रखते हैं। यही जब नौकरी पर लग जायेगा तो वे हमें अपने दरवाजे पर कहाँ बैठने देंगे। उदय नारायण ने फिर से जाकर पारसनाथ के सामने प्रस्ताव रखा तो उनका वही उत्तर था। अधिक कहने पर, उन्होंने यह कह कर टाल दिया कि अतुल से बात करके बताएँगे। इतने में उनकी पत्नी शीला भी आ गयी। यह सब सुनकर भुनक पडी, 'मंजुला को मैंने एक बार देखा है, वह बहुत ही सुन्दर और सुशील लड़की है। मुझे तो बहुत पसंद है। व्याह कर के भी अतुल पढ़ाई कर लेगा, वो कौन सी पढने से रोक देगी। ' शीला को यह भी डर सता रहा था, अतुल पढने के लिए शहर में रहेगा, किसी को फंसा ही लाया तो क्या करेंगे। विवाह के लिए 'हाँ' हो गयी। अब अतुल को मनाना था । अतुल ने भी वही बात दोहराई। उसका कहना था, अभी कोई कमाई-धमायी है नहीं, वह पत्नी की आवश्यकताएं कैसे पूरी करेगा।  माँ बाप के समझाने पर वह मान गया। शीला ने उसे आश्वस्त किया कि विवाह, उसकी पढ़ाई में कोई व्यवधान नहीं बनेगी। और जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता उसकी पढ़ाई और बहू दोनों की ही जिम्मेदारी पारसनाथ और शीला की है। मंजुला का अतुल से विवाह तय हो गया।

अतुल, एम० सी०ए० में प्रवेश की परीक्षा दिया था, उसका चयन हो गया। अब यह निश्चय  हुआ कि दिसंबर में पहला सत्र पूरा हो जायेगा और जनवरी में विवाह संपन्न होगा।  अतुल का एम० सी०ए० में प्रवेश होने से
घर के सभी लोग मंजुला को भाग्यशाली मानने लगे। समय बीतते देर नहीं लगी, जनवरी आ गयी और दोनों विवाह सूत्र में बंध गए।

 मंजुला बहुत ही गंभीर और सुशील लड़की थी। ससुराल में जाकर, अपने व्यवहार और काम धाम से, उसने सबका दिल जीत लिया। अतुल भी उसके व्यवहार से बहुत प्रसन्न था और उसे खूब प्यार करने लगा। अभी कोई काम नहीं करने के कारण अतुल अपनी पत्नी को न तो ठीक से घुमा फिरा पाता न ही उसके लिए कोई अच्छा गिफ्ट ला पाता। मंजुला को इस बात की कोई म्लानि नहीं थी। वह चाहती थी, अतुल और पढ़े ताकि सास ससुर के साथ उसे भी अच्छी जिंदगी दे सके। अतुल को भी आभास था कि ठीक से पढ़ाई करके ही मंजुला  को अच्छी जिंदगी दे पाएगा। अब एम० सी० ए० के अगले सत्र की पढ़ाई करने के लिए अतुल को शहर जाना था। मंजुला ने उसे खूब समझाया, उसका ध्यान छोड़कर पढ़ाई में ध्यान लगाना। उसे यहाँ घर में कोई कठिनाई नहीं है और वह बहुत प्रसन्न है। अतुल ने पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। मंजुला ने  भी इसमें उसका भरपूर साथ दिया, और कभी अवसर मिलता तो भी, वह घूमने फिरने या सिनेमा आदि देखने को ना ही कहती। यह नहीं था कि मंजुला को घूमना फिरना अच्छा नहीं लगता, अपितु, वह अपने आज को, भविष्य के लिए निवेश कर रही थी। अतुल छुट्टियों में आता तो भी अपनी किताब लेकर पढता रहता, मंजुला कभी उसकी किताब की ओर देखती, कभी छत पर टहल आती। कभी कोई पकवान बनाने में व्यस्त हो जाती, कभी घर की साफ सफाई में, और जैसे तैसे अपना समय काट लेती। इसी बीच मंजुला के बी० ए० का एक साल रह गया था, पूरा कर डाली। मंजुला ने अपने विवाह या ससुराल के विषय में उदय नारायण से कभी भी कुछ नहीं कहा, परंतु उसकी स्थिति से वे संतुष्ट नहीं थे और अपने निर्णय पर पश्चाताप कर रहे थे।

मंजुला  की परेशानियों से सबक लेकर, उदय नारायण ने निश्चय कर लिया था कि भले ही देर हो, किन्तु मृदुला का विवाह वे संपन्न परिवार में करेंगे। पहले, भली भांति जांच परख लेंगे कि लड़का ठीक ठाक कमाता है या नहीं। अब मृदुला के साथ ऐसा नहीं होने देंगे कि हर चीज के लिए मुंह ताके। उन्होंने वर की खोज प्रारम्भ की, कई घर परिवार देखा, अंततः सुयोग्य वर मिल ही गया। दीनानाथ एक संपन्न वयापारी हैं, उनका बेटा हेमंत ज्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं है पर दीनानाथ का इकलौता पुत्र है। बारहवीं पास करके उन्हीं के काम में लग गया है, फिर दीनानाथ के बाद तो सब कुछ उसी का है। उदय नारायण की दीनानाथ की सम्पन्नता देख कर, उनके यहां जाने की हिम्मत तो नहीं थी, मगर मृदुला के सुन्दर होने और पढ़ी लिखी होने के कारण, साहस बटोर ही लिया। उन्होंने, दीनानाथ से विवाह की बात चलायी। मृदुला सुन्दर लड़की थी और बी०ए० पास थी, दीनानाथ के परिवार को भा गयी और विवाह तय हो गया। उदयनारायण ने पहले ही बता दिया था, उनके पास अधिक कुछ लेने देने के लिए नहीं है।  हां, बारात की अच्छी सेवा सत्कार कर देंगे। अच्छी बहू पाने के लिए दीनानाथ ने समझौता कर लिया, और विवाह में खुद बढ़ चढ़कर खर्च किया। और तो और, दीनानाथ ने दुल्हन का लहंगा अपने यहाँ से भिजवाया था, वैसा लहंगा पूरे क्षेत्र की किसी दुल्हन ने अब तक नहीं पहना होगा। उसके अलावा मृदुला को गहने और कपड़ों से लाद दिया था। मृदुला का विवाह बड़ी धूम धाम से हुआ। सभी रिश्तेदार और मित्र, यही कह रहे थे, उदय ने अपने से काफी ऊँचा रिश्ता ढूंढा है।

ससुराल आते ही मृदुला के ठाट बाट देखने लायक थे। अच्छे-अच्छे कपडे पहनना, घूमना फिरना, रेस्तरां में खाना, घर में कामवाली, खाना बनाने वाली। वह जब, यह सब मंजुला को बताती, तो वह बहुत प्रसन्न होती। मृदुला के बताने के ढंग से लग जाता कि उसे अपनी किस्मत पर बड़ा गरूर है और वह एक बहुत संपन्न परिवार में है। वह कहां कहां घूमी, किस रेस्तरां में खाया, घर में क्या नया सामान आया, यहां तक काम वाली को कुछ देती उसे भी बताती। उसकी बातें सुन कर, मंजुला ईर्ष्या नहीं करती, अपितु प्रसन्न होती। मंजुला के चकित और प्रसन्न होने पर, मृदुला अपने ससुराल की एक एक बात याद करके बताती। आज सालगिरह पर सास ने कान का दिया है, तो जन्मदिन पर हेमंत ने सोने की चेन बनवाई इत्यादि। इतना कुछ होते हुए भी मृदुला, कभी मंजुला के मदद की बात नहीं करती।

इधर अतुल की परिश्रम और मंजुला का त्याग रंग लाया और अतुल ने एम० सी० ए० भी अच्छे अंकों से कर लिया। उसके बाद, उसे एक कंपनी में अस्थायी जॉब भी मिल गयी थी। वह इस नौकरी से संतुष्ट नहीं था, और कैरियर की चिन्ता लगी रहती थी। वह सरकारी नौकरी के लिए कई प्रतियोगिताओं में बैठा मगर सफल नहीं हो पाया। मगर इन प्रतियोगितओं ने उसका अनुभव और ज्ञान काफी बढ़ा दिया था। अंततः उसे एक बहुत बड़ी अंतराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी मिल गयी। अब अतुल अपने लक्ष्य को पा चुका था। घर में मंजुला का मान सम्मान और बढ़ गया था। पारसनाथ भी कभी कभी बोल देते, 'हमारे घर के लिए मंजुला बड़ी भाग्यशाली है। जबसे आई है, अतुल आगे ही आगे बढ़ रहा  है।' यह सुनकर वह फूले नहीं समाती।

अपनी कंपनी में बड़ी ईमानदारी और लगन से काम करके उसने अपनी धाक जमा लिया। उस कंपनी के कुछ प्रोजेक्ट विदेशों में भी चल रहे थे। कुछ ही समय के बाद अतुल को एक प्रोजेक्ट पर, अमेरिका जाना हुआ। पहले तो वह तीन महीने के लिए गया, पर, वहां भी उसके प्रशंसनीय कार्य के कारण और अधिक समय तक रोक लिया गया। बाद में चलकर उसे अमेरिका की ही एक अन्य कंपनी में नियुक्ति मिल गयी। अब तो मंजुला के भी दिन बहुर गए थे। अमेरिका से डालर आने लगे।  प्रसन्न तो  होती, पर मंजुला पर इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। वह संतोषी प्रकृति की थी. थोड़े में भी खुश रह लेती, अब तो उसके पास भी बहुत कुछ था। कुछ ही अंतराल पर, अतुल को अमेरिका का ग्रीन कार्ड मिल गया। धीरे धीरे समय आया, मंजुला को भी अमेरिका जाने का अवसर मिल गया। मंजुला को भी वहां एक जगह जॉब मिल गयी। अब तो दोनों ने मिलकर खूब डॉलर कमाने लगे। थोड़े ही समय में अतुल ने कार और वहां घर खरीद भी लिया। दोनों की जिंदगी, बहुत अच्छी बीत रही थी। मंजुला अपने पिछले सब कष्ट भूल चुकी थी। अतुल कुछ पैसे बचाकर अपने पिताजी के पास, इंडिया भी भेज देता। अब उनके घर का भी कायाकल्प हो चुका था।

अतुल के मम्मी पापा अमेरिका घूम आये थे। मंजुला की इच्छा थी कि उसके मम्मी पापा भी एक बार घूम लें।  उन्होंने इतनी तंगी में रहकर भी उसके लिए कितना कुछ किया। दबी जबान से उसने, अपने मन की बात अतुल से कह दिया। अतुल बोल दिया इसमें पूछने की क्या बात है। उनसे बात कर लो, मैं उनका टिकट और वीसा के लिए कागजात भेज देता हूँ।  इस बात से मंजुला बहुत प्रसन्न हुई और मम्मी पापा से बात करके टिकट भेज दी।
जब उदय नारायण अमेरिका पहुंचे तो अपनी बेटी का रहन सहन देख कर फूले न समाये। मंजुला से वे अकेले में बोले -
'देख बेटा! योग्यता, धन से अधिक मूल्यवान होती है। योग्यता हो तो धन कमाया जा सकता है, धन से योग्यता नहीं खरीदी जा सकती। मैंने तो अतुल की योग्यता देखकर ही तेरी शादी की थी। तूने वहां कष्ट उठाये मगर ईश्वर ने सुन ली, आज तुझे देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।'
मंजुला ने उनकी कृतज्ञता व्यक्त की, 'नहीं पापा ! मुझे कभी कोई कष्ट नहीं हुआ। अतुल जी बहुत अच्छे हैं। ससुराल के सभी लोग कितने अच्छे हैं। '


इधर मृदुला, जब मंजुला की प्रगति के बारे में सुनती तो ईर्ष्या से जलने लगती। उसके मम्मी पापा भी कभी मंजुला की बात करते तो, मृदुला अधिक रूचि नहीं दिखाती। लेकिन किसी की स्थिति सदैव एक समान नहीं रहती। अगले पल किसके भाग्य में क्या होना है, क्या पता! मृदुला जहां कभी धन के गर्व में चूर रहती और सबको जताती रहती, समय ने करवट बदला और भाग्य ने साथ देना छोड़ दिया। उसके पति का कारोबार अब मंदा हो चला था, वह कर्ज के बोझ में दब गया था। पहले वाला ठाट, अब नहीं रह गया था। एक एक पैसा बड़ा सोच समझ कर खर्च करना होता था। मृदुला का एक बेटा था, वह भी बड़ा हो गया था और उसकी पढ़ाई लिखाई का खर्च भी सिर पर। वह उसे इंजीनियरिंग करवाना चाहती थी, पर किसी सरकारी कालेज में प्रवेश नहीं मिल पाया। प्राइवेट कॉलेजों की फीस, वश से बाहर की बात लग रही थी। पहले तो सोची की अपने कुछ गहने बेच दे, पर किसी को पता चला तो बेइज्जती की बात होगी। सच्चाई को कोई कितना छुपा सकता है। स्थिति के बारे में, उदय नारायण को पता चला तो मृदुला की यथा संभव मदद करते रहते।

उदय नारायण ने मंजुला को मृदुला की स्थिति के बारे में बताया तो वह द्रवित हो गयी। उसने मृदुला से आग्रह किया कि इंजीनियरिंग करने के लिए अंकित को अमेरिका भेज दे। मोहित के साथ रहकर वह भी पढ़ लेगा। पढ़ाई के खर्च की चिंता न करे, वह सम्हाल लेगी। यह मृदुला के शान के विरुद्ध लग रहा था, पर अंकित के भविष्य की बात थी। थोड़ा ना नुकुर करके उसे भेजने को मान गयी। मगर अमेरिका जाने में तकनिकी समस्या सामने आ गयी। आगे की पढ़ाई करने के लिए कम से कम १५ साल की पढ़ाई स्वदेश में होनी आवश्यक थी। तब मंजुला ने उसे इंडिया से बी० टेक० करके मास्टर्स करने के लिए वहां आने को कहा और उसका खर्च उठाने को तैयार हो गयी। इंजीनियरिंग पूरा होने के बाद, अंकित मास्टर्स कोर्स करने के लिए, अमेरिका चला गया। अंकित पढ़ाई के साथ, पार्ट टाइम जॉब भी करने लगा। कोर्स पूरा होते ही उसे अच्छी जॉब मिल गयी। अब तो मृदुला के दिन फिर से बहुर आये। मुरझाई बगिया फिर से खिल गयी। अंकित वहां से कुछ पैसा भेजा तो उसके पति के कारोबार में भी जान आ गयी। कहते हैं, रस्सी जल जाय पर बट नहीं जाता। मृदुला अभी भी मंजुला का एहसान कम मानती और अंकित की काबिलियत को अधिक। खैर मंजुला और मृदुला दोनों का परिवार सुख पूर्वक रह रहा था ।



एक के बच्चे विदेश
कैंसर गुर्दा 

Tuesday, 11 August 2015

Mini ki chay

मिनी की चाय

दीनानाथ जी, शाम को रिसोर्ट के आस पास चहल कदमी कर रहे थे ।  छोटी पहाड़ियों के मध्य कई एकड़ में फैला, हरा भरा पार्क, अत्यंत रमणीय स्थल, एक उसी पार्क के एक और सुन्दर प्रकृति की गोद में स्थित सुन्दर सा भवन, यहीं पर दीनानाथ व उनका परिवार ठहरा था। पार्क में आकर घास चरते कंगारू, उसकी शोभा को चरम पर पंहुचा रहे थे ।  पर्यटन के लिए गए सदस्यों का वहां से जाने का जी ही नहीं होता था। दीनानाथ टहल कर, रिसोर्ट के हॉल में पहुंचे तो लोग चाय पी रहे थे।  लड़कियां चिल्लाने लगीं, अरे, अंकल आ गए, अंकल को चाय लाओ।
चाय की सभी प्रशंशा कर रहे थे, मिनी बहुत अच्छी चाय बनाई है। पीछे  से  उनकी पत्नी की आवाज आई -
चाय तो समाप्त हो गयी। रूको, मैं  अभी बना देती हूँ।
इतने में मिनी भी अपने कमरे से बाहर आ गयी। आते ही पूछी, अंकल चाय पी लिया ?
'मुझे कहां मिली, तुम्हारी ऑन्टी बना रही हैं।' उन्होंने बोला ।
'हा!' मिनी अफसोस करने लगी।
'अरे! अंकल को चाय नहीं मिली, अब तो ऑन्टी ने बना भी दिया।  अच्छा अंकल, सवेरे, आप की चाय मैं बनाउंगी।'
'ठीक है', उन्होंने भी बोल दिया।
सुबह हुई, समूह में पांच छ लोग ऐसे भी थे जो उम्र की तीसरी अवस्था में प्रवेश पा चुके थे, वो जल्दी उठ गए थे।दीनानाथ भी अपनी स्वर्ण जयंती ५ वर्ष पूर्व मन चुके थे। सात बजे तक चाय बन कर तैयार थी। दीनानाथ मुंह धोकर चाय की प्रतीक्षा करने लगे । कुछ देर तक चाय नहीं आई तो वे अपने कक्ष से निकलकर हॉल में चले गए ।  तब तक मिनी की मम्मी चाय लेकर आ ही रही थीं   -
'लीजिये, भाई साहब! चाय।'
'अरे, भाभी जी ! आप ! मिनी कहाँ है?'
'अभी सो रही है, रात को बच्चे सब देर से सोये थे  न।'
'हा, हा,  वो बोली थी, सुबह की चाय मैं बनाउंगी। ठीक है, सोने दीजिये।'
जब सोकर मिनी उठी तो देखते ही पूछी, 'अंकल चाय पी लिया ?'
दीनानाथ बोलें, उससे पहले ही उसकी मम्मी ने उत्तर दे दिया, हाँ पी चुके, वो केतली में पड़ी है तू भी ले के पी ले।
अत्यंत ही खुशनुमा महौल में पिकनिक समाप्त हुयी।  सभी ने दृश्यावलोकन से खाने पीने तक, सब चीज में बड़ा ही आनंद उठाया।  सब वापस घर को चले, मिनी को पुनः  चाय बनाने का अवसर ही नहीं मिला। और दीनानाथ को  मौका मिल गया मिनी को छेड़ने का। चलते चलते मिनी को बोल ही बैठे - 'तुमने तो चाय पिलाई ही नहीं।'
'हाँ अंकल, आपकी चाय उधार रही।  आपको, अपने घर पर चाय पिलाऊंगी।'
'चलो ठीक है।' बोलते हुए अपनी कार की और बढ़ गए ।
लगभग महीना भर बीता था दीनानाथ को मिनी के घर जाने का अवसर मिला।  उसने कई मित्र परिवारों को रात्रि के भोजन पर बुला रखा था।  बेटे- बहू के साथ वे भी सपत्नी उसके घर पहुंचे। मिनी के स्वागत की शैली मन मुग्ध कर देने वाली थी।  ऐसा लगा कि कोई अपना सगा बहुत समय बिछुड़े रहने के पश्चात मिला हो।

'अरे, अंकल! आ गये', आकर पैर छूई और बगल में सट के खड़ी हो गई।  दीनानाथ ने अपना हाथ उसके कंधे  पर रख दिया।  ऐसा प्रतीत हुआ कि उससे कितना पुराना और घनिष्ठ सम्बन्ध है।  उसके आव-भाव और व्यव्हार ने, एक दो सम्पर्क में ही उन्हें अपना बना लिया था।
'अंकल आईये।'
वह हाथ पकड़ कर घर के पीछे वाले लॉन में ले गयी जहाँ सभी लोग बैठे थे। वहां ड्रिंक का कार्यक्रम पहले ही शुरू हो चुका था। जाते ही लड़के चिल्ला पड़े, आईये अंकल! आईये! कौन सा ड्रिंक लेंगे ?  पिंकी के मम्मी पापा अलग सोफे पर बैठे हुए थे, दीनानाथ को बुला लिए। भाई साहब मेरे साथ ज्वाइन  करेंगे।  खाना पीना देर रात तक चला।
मिनी दीनानाथ से आग्रह की - 'अंकल, अंशु को जाने दीजिये, आप आज यहीं रूकिये और कल सुबह चाय नाश्ता करके जाईये।  मैं आप को घर छोड़ आउंगी। '
'नहीं बेटा, चला ही जाता हूँ। '
मिनी बाहर छोड़ने आई। 'अच्छा अंकल बाय! आपकी चाय उधार रही।'
'कोई बात नहीं बेटा, कभी भी आकर पी लूँगा।'
उसके थोड़े ही दिन पश्चात दीक्षा ने सभी मित्र परिवारों को डिनर पर बुलाया। मिनी का परिवार भी वहां आया। मिनी देखते ही शीघ्रता से समीप आई पैर छुई और अपना वादा दोहरा दिया -
'अंकल आप की चाय उधार है।'
'अरे, चाय हो गयी या जाने कोई बहुत बड़े ऋण का भार हो गया।  चाय तो कभी भी तुमसे बनवा कर, पी लेंगे।'
उसके बाद भी मिनी कई बार किसी के घर, अथवा बाहर किसी अवसर पर उनसे मिली और अपनी चाय के दायित्व का स्मरण कराती रही । अब तक लगभग छ महीने बीत चुके थे, अंततः मिनी का निश्चित निमंत्रण लिए फोन आ ही गया -
'अंशु ! कल अंकल और  आंटी को लेकर, चाय पीने आ जा।'
'कल सुबह तो पापा मम्मी की इंडिया की फ्लाइट है।'
अब मिनी के पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी, उसके अफसोस का ठिकाना ही न रहा।  'बताओ इतने दिन हो गए अंकल को मैं चाय भी नहीं पिला पाई।  अच्छा अंकल से बात करा। '
अंशु ने दीनानाथ को फोन थमा दिया।
'सॉरी अंकल, आप की चाय तो ड्यू ही रह गयी।  इतने दिन हो गए, मैं आप को अपने हाथ की चाय भी नहीं पिला सकी ।'
'कोई बात नहीं बेटा इतना कुछ तुम्हारा खाया पिया, कितनी बार तो तुमने भोजन कराया, सब तुम्हारा ही तो खा पी रहे हैं। वैसे भी दो महीने के बाद फिर वापस आना है तब पी लूँगा।'
मिनी प्रसन्न हो गयी, अच्छा वापस आ रहे हैं! चलिए ठीक है, फिर तो एक नहीं दो चार बार पिलाऊंगी।

दो महीने बाद दीनानाथ इंडिया से वापस पुनः सिडनी आये।  और कुछ दिन के बाद मिनी का जन्म दिन था। उसने अपने जन्म दिन पर सभी मित्र परिवारों को डिनर पर आमंत्रित किया।  डिनर सिडनी के एक बहुत अच्छे रेस्तरां में था।  अच्छा स्वादिष्ट भारतीय व्यंजन, सबने ही भोजन की प्रशंशा की ।  उसके पश्चात केक काटने का कार्यक्रम चला। मिनी एक प्लेट में केक का टुकड़ा लेकर आई  और अपने हाथ से उठाकर दीनानाथ के मुंह की ओर बढ़ाया। केक मुंह में लेते ही, उनका ह्रदय विह्वल हो आया। लगा आँखों से अश्रु छलक आएंगे। अपने भावनाओं को छुपाने के लिए वे बोले -
'और मेरी चाय!' हा, हा, हा
मिनी भी हंस पड़ी, जैसे लगा फूल झड़ रहे हों -
'हाँ अंकल, आप की चाय ड्यू है।'
वे भी विनोदपूर्ण भाव में बोले - 'चाय फिर देखेंगे, अभी केक का स्वाद लेने दो।'
समय बीतता गया।  मिनी कई बार मिली, कभी किसी के घर पार्टियों में या पिकनिक पर। यहाँ सिडनी में भारतीय मूल के लोगों ने बड़ी सुन्दर व्यवस्था बना रखी है कि वे सप्ताहांत समूह में कहीं परस्पर मिल लेते हैं ।
इससे परस्पर प्रेम और सहयोग की भावना बनी रहती है। मिनी जब भी दीनानाथ को देखती, चाय के उधार होने की बात अवश्य कहती। उधार चाय की बात उसके मन में इतनी घर कर गयी थी की कोई बैंक के ऋण की किश्त भी इतनी तन्मयता से नहीं याद रखेगा ।

धीरे धीरे दीनानाथ के वीसा का समय समाप्त होने को आया और इंडिया वापस जाने का समय समीप।  जब मिनी को पता लगा कि वे वापस इंडिया जाने वाले हैं तो उसने आने वाले रविवार को विशेष तौर से चाय पर आमंत्रित किया।  उनकके साथ दो और भी परिवार आमंत्रित थे।
रविवार आ गया लेकिन मिनी की चाय अभी दीनानाथ से दूर थी। उसी दिन अचानक उनकी तवियत बिगड़ गयी जिस कारण चाय पार्टी में वे जा ही नहीं सके । चुकि कार्यक्रम पहले से तय था और दो अन्य अंकल औंटी भी आने वाले थे, दीनानाथ की पत्नी व बेटे-बहु उन्हें घर पर ही छोड़ कर मिनी के यहाँ गए । 
उनके वहाँ पहुंचते ही मिनी का फ़ोन आया - 'अंकल आप के लिए ही मैंने चाय की पार्टी रखी और आप ही नहीं आये।'
'क्या करें बेटा, लगता है तुम्हारी चाय अभी भाग्य में नहीं है। मगर चाय की आड़ में जो कुछ मुझे मिल रहा है, उसका कोई मोल नहीं है।'
दीनानाथ अब बेटी होने के माधुर्य व सुख का एहसास करने लगे थे। वापस आने पर उनकी  श्रीमती जी ने बताया, जितनी बार चाय का कप मुंह लगाने के लिए उठाया होगा, मिनी अंकल को याद की होगी।
अब तो वापस इंडिया जाने का समय आ गया और मिनी की चाय पीने का संयोग नहीं बन पाया।
जाने से पहले मिनी, परिवार के साथ मिलने आई। कुछ देर में ही उसे चाय की बात याद आई -
'अंकल आप की चाय!' हे राम ! मैं इस जन्म में पिला पाऊँगी कि नहीं। '
'अच्छा, अभी यहीं बना देती हूँ। कितने दिन तक यह कर्ज अपने सिर पर रखूंगी !'
तभी दीनानाथ की बहू बोल पड़ी, 'ये क्या अपनी चाय पिलाओ तब तो।  हमारी ही चाय हमें पिलाओगी ! यह तो उचित नहीं।' फिर तो मिनी का मुंह छोटा सा हो गया।   
'अंकल अब कब आएंगे?'
'अब क्या पता पुनः कब आना ईश्वर ने तय किया है। अब तो एकाध वर्ष बाद ही हो पायेगा।  इतनी दूर बार बार कहाँ आना होता है।  वहां भी कई काम देखने हैं।'

इस बात ने तो मिनी को हिलाकर रख दिया, वह बहुत उदास हो गयी। इतना समय बीत गया, आप मेरे परिवार के सगे जैसे लगे और मैं आपको चाय तक नहीं पिला सकी, कहते वह भाव विभोर हो गयी। उसकी आंखें भर आईं ।
'मगर आप को एक बार पुनः ऑस्ट्रेलिया अवश्य आना है।  मैं अगले जन्म के लिए आपकी चाय उधार नहीं रखूंगी।  आप बतायेगा, आपका टिकट मैं भेज दूँगी। '
दीनानाथ की आंखें भी नम हो आईं और उन्होंने उसे गले लगा लिया ।
'बेटी, तेरी उधार चाय में मैं तेरा ढेर सारा प्यार, तेरी बहुत बड़ी याद और जीवन की एक महत्वपूर्ण कड़ी लेकर जा रहा हूँ।  यह मेरे लिए अनमोल है।  चाय न पीकर जो कुछ मैंने पा लिया, पीकर कहाँ मिलता। सब तुम्ही लोगों का ही तो खा पी रहे थे। तुमने इतना खिलाया पिलाया, इतना प्यार दिया, मान-सम्मान दिया, तुम्हें हम कभी भूल ही नहीं सकते। तुम्हारी चाय पीकर इतना आनंद कहाँ आता जितना उसके उधार होने में है। तुम्हारी चाय ने तो 'उधार प्रेम की कैंची है' वाली कहावत को झुठला दिया। इस उधार चाय ने तो प्रेम का विशाल वृक्ष खड़ा कर किया है। और जब जब चाय पिएंगें, तुम अवश्य याद आओगी।  हाँ, अपनी मम्मी का फोन नंबर दे दो, अहमदाबाद जायेंगे तो उनसे मिलेंगे।    
'हाँ अंकल! जरूर जाना, वो बहुत खुश होंगी।'

इण्डिया लौटने के बाद दीनानाथ जी का द्वारकाधीश जाने का कार्यक्रम बना।  गांधी नगर भी दो दिन रूकना था। सोचे, मिनी की मम्मी से भी मिल लेंगे। फोन पर मिनी की मम्मी को अपने कार्यक्रम से अवगत कराया। उन्होंने झट बोला आप गांधीनगर आएंगे तो हमारे यहाँ ही रूकेंगे। उनका आग्रह देखकर, उन्हें भी हाँ बोलना पड़ा।
समय बीता, वे गांधीनगर पहुंचे।  स्टेशन पर, लेने के लिए मिनी के पापा ने गाड़ी भिजवा दिया था ।
घर पहुंचकर सामान उनके कमरे में भिजवा दिया। और वे बैठक में सोफे पर बैठे।
मिनी के मम्मी, पापा आये -
चाय नाश्ता कर लीजिये, फिर अपने कमरे में थोड़ा विश्राम करिये, उसके पश्चात खाना पीना करते हैं।
सामने वाले सोफे पर वे भी बैठ गये।
उनकी नौकरानी नमकीन, नाश्ता लाकर मेज पर रख दी।  मिनी की मम्मी उन्हें  देने के लिए प्लेट में डालने लगी। नौकरानी की और देखकर, 'और चाय ?'
'आ रही है', मैडम।
यह क्या ?
दीनानाथ के आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा । वे देखकर चौंक गए।
चाय की तश्तरी मेज पर रखकर पैर छूने आई। वह कोई और नहीं, मिनी थी।
वे विस्मित सोफे से उठ गए।
'अरे यह कैसा सुखद आश्चर्य, तुम कब आई '
'कल ही आई हूँ, अंकल!'
'मम्मी ने एक पूजा रखा था। सोची मैं भी इंडिया घूम आती हूँ। अंकल कम से कम सप्ताह भर तो रूकेंगे न।'
'नहीं बेटा! दो दिन यहाँ रूकेंगे फिर द्वारका जाना है।'
'अगले सप्ताह मम्मी ने पूजा रखा है, तब तक रूकते तो अच्छा होता।'
'मगर हमारा कार्यक्रम पहले से तय है और इतने कम समय में टिकट का आरक्षण कठिन हो जाता है।
'अच्छा तो आप और आंटी को गांधी नगर मैं घुमाऊँगी।'
'हाँ, ये लाख रूपये की बात है।  लेकिन तुमने मेरे करोड़ों छीन लिए।'
'वो कैसे अंकल !'
'चाय पिलाकर, मेरा तो तकादा ही समाप्त कर दिया। हा, हा  …
'नहीं अंकल! आपको तो चाय मैं रोज पिलाऊंगी, खाना भी खिलाऊँगी।'
'तुम्हारी चाय तो मेरे लिए अमृत बन चुकी है । इस चाय में मैंने जो कुछ पा लिया उसका शब्दों में वर्णन करना भी कठिन है । ईश्वर तुम्हे सुखी रखे, दीर्घायु करे,  तुम्हारा दमन खुशियों से भरा रखे । फिर हम सिडनी आएंगे तो अवश्य मुलाकात होगी।'
'हां अंकल, वहां भी आप का ही सब कुछ है। जल्दी से जल्दी आना। ' 


(C ) एस० डी० तिवारी




Thursday, 9 July 2015

Fanse O mama

बचपन में महेंद्र को ननिहाल से बड़ा प्यार मिला था।  उसका ननिहाल अपने गांव से तीन-चार किलोमीटर की ही दूरी पर था और स्कूल गांव व नानी के घर के बीच। अधिकतर, वह शनिवार को विद्यालय से सीधे नानी के यहां चला जाता और सोमवार को स्कूल पूरा करके घर आता था।  नानी तो प्यार करती ही थीं मामा मामी भी कुछ कम नहीं ।
उसके पहुंचते ही नानी बेकल हो जाती थीं।  क्या खिला दूँ, क्या पिला दूँ । मामी को आवाज लगातीं -
'अरे कुछ खाने को है, देख नाती आया है, लाओ कुछ। कहाँ सब मर गयीं,  देखो मिठाई पड़ी होगी, ले आओ और चावल दाल भी रखा होगा गरम करके दे देना, अभी स्कूल से आया है, भूखा होगा। '
'नहीं नानी, मिठाई ले लेता हूँ और कुछ अभी नहीं खाऊंगा। ' 
'कैसे नहीं खायेगा! सीधे स्कूल से आया है, भूख लगी होगी। '
नहीं मानतीं, महेंद्र को कुछ खाना ही पड़ता।
मामा भी रविवार को प्रातः साथ ले लेते और लेकर खेत की ओर घुमाने चले जाते । महेंद्र, कौन सी फसल कब होती है, कितने दिन में होती है आदि प्रश्न पूछता रहता, मामा उत्तर देते रहते।

महेंद्र, पढने में तेज था, बड़ा हुआ, इंजीनियर बन गया। उसके साथ पढ़े एक लडके सत्येन्द्र का भाई कनाडा रहता था, अतः वह भी नौकरी करने वहीं चला गया। सत्येन्द्र एक बार जब कनाडा से आया तो वहां के रहन सहन के बारे में महेंद्र से चर्चा किया। थोड़ा बहुत तो वहां के शानदार जीवन के बारे में महेंद्र सुन रखा था जब सत्येन्द्र के मुख से सुना तो बहुत अच्छा लगा। उसे और जानने की उत्सुकता होती और एक बार कनाडा देखने की जिज्ञासा। सत्येन्द्र ने उसे वहां के बारे में सब बताया।  वहां का रहन सहन, वहां की सुख सुविधा, वहां का खान पान आदि सब। और साथ भरोसा भी दिया की वह वहां आने में जो हो सकेगा मदद करेगा ।आखिर बचपन का मित्र जो ठहरा। भाग्य ने साथ दिया, महेंद्र कनाडा चला गया और कुछ वर्ष में वह वहां का स्थाई निवासी भी हो गया। जब वह छुट्टियों में इंडिया आया तो ननिहाल भी गया।  कनाडा की सुंदरता और वहां के विलासपूर्ण जीवन के बारे में जिससे भी बताता उसके मन में वहां एक बार जाने की इच्छा अवश्य उतपन्न हो जाती । उसने मामा से कहा 'मामा आपको एक बार तो कनाडा चलना ही चाहिए । आपने इतना प्यार दिया है, अब एक बार कनाडा घुमाने का मुझे अवसर अवश्य दें। '
'ठीक है, अगली बार जब आओगे तो चलेंगे। '  

धीरे धीरे समय बीता। कुछ वर्ष पश्चात महेंद्र पुनः भारत आया और मामा जी को कनाडा जाने का अवसर मिल ही गया। मामा जी एक महीने के लिए कनाडा पहुँच गए। मामी का स्वास्थ ठीक नहीं रहने के कारण साथ नहीं जा पाईं। वहां का अनुशासन, साफ सफाई और सब कुछ व्यस्थित देख कर मामा का मन मुग्ध हो गया। महेंद्र को जब जब समय मिलता दर्शनीय स्थल दिखा देता। बस सप्ताह के अंत में ही दो दिन का समय होता।  शेष दिन तो काम पर जाना होता।  वहां पर काम के बीच में समय निकालना लगभग असंभव ही होता है।

कहीं घूमने फिरने जाते तो मामा को खाने पीने की बड़ी दिक्कत होती थी। वे शुद्ध शाकाहारी थे, अतः महेंद्र और उसकी पत्नी उषा घर से ही खाना बना कर ले जाते।  एक दिन घर से दूर एक पर्यटन स्थल देखने जाना था।  दूर होने के कारण सुबह जल्दी ही घर से निकलना था।  उषा इतनी सुबह खाना बना नहीं पाई।  फिर ये हुआ कि बाहर ही कहीं इंडियन रेस्तरां में कुछ खा पी लेंगे। कुछ इस तरह के हालात बने, रास्ते में कहीं इंडियन रेस्तरां नहीं मिला। बस मैक्डॉनल्ड या पिज्जा हट ही मिलते थे। कुछ खाना तो था ही, वे मैकडोनाल्ड में घुस गए।  मामा जी का दुर्भाग्य, वहां शाकाहारी बर्गर, पिज्जा भी नहीं मिला अंततः उन्हें फ्रेंच फ्राइज यानि तले हुये आलू की फांकें खा कर दिन बिताना पड़ा। 
घर आकर मामाजी का कनाडा के आलोचना का दौर शुरू हुआ।
'बताओ यहाँ कुछ खाने लायक भी नहीं मिलता, हम लोग तो यहाँ रह ही नहीं सकते। सबकुछ मांसाहारी, आलू के चिप्स खाकर गुजर करना पड़ा। '
उषा बोल पड़ी ' मामा जी, यहाँ स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं, मांसाहार में अधिक पौष्टिक तत्व होते हैं। '
मामाजी विदक गये ' कौन कहता है ? मैं तो कहता हूँ, शाकाहार अधिक पौष्टिक होता है।  इंडिया में कौन सा लोग अस्वस्थ होते हैं, हमारे मसालों में कितने गुण होते हैं इनको तो पता भी नहीं होगा।  कई रोगों का मसाले स्वतः ही निदान कर देते हैं। '
'यहाँ शाकाहार के नाम पर, तले आलू बस!'
उषा खुद को रोक नहीं पाई, बोल पड़ी, ' वह भी क्या गारंटी कि उसी तेल में न तले हों जिसमे मछली व चिकन तलते हों। '
महेंद्र - हाँ वैसे तो ये मांसाहारी रेस्तरां ही हैं, तेल बदलते थोड़े ही होंगे।
अब तो मामा जी के काटो तो खून नहीं। भड़क उठे।
'तू जरूर मेरा धर्म भ्रष्ट करायेगा। अब से बाहर का कुछ भी नहीं खिलाना। '
बड़ी मुश्किल से महेंद्र ने मामा को मनाया।     

मामा जी दिन भर घर में अकेले रहते।  महेंद्र ने टी.वी. पर हिंदी चॅनेल ले रखा था, उनका समाचार देखते काफी समय निकल जाता। कनाडा के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था, अतः अकेले घूम भी नहीं सकते थे।  घर में ही इधर उधर चहल कदमी कर लिए, चाय बनाकर पी लिए, थोड़ा सो लिए और महेंद्र तथा गीता के आने की प्रतीक्षा करते रहते। कभी कभी घर से निकल जाते  और पास के पार्क तक हो आते।  राह में भवन और उन पर टंगे बोर्ड, गर्दन घुमा घुमा कर देखते रहते।  उन्हें देख कर कोई भी सरलता से समझ सकता था कि वे इस देश में पहली बार आये हैं।

मामा को भारत में कई जगह घूमने का अनुभव था, थोड़ी बहुत अंग्रेजी बोलना जानते थे।  सोचे, चल कर कहीं घूम आते हैं।  महेंद्र ने उन्हें क्रडिट कार्ड दे रखा था जो रेल, बस आदि में किराया देने के लिए प्रयोग किया जा सकता था और उन्हें समझा रखा था उसका कैसे प्रयोग करना है। मामा जी घर से निकले। महेंद्र ओटावा नगर के कार्ला एवेन्यू में रहता था। मामा ने रिडो कैनाल जाने का निर्णय लिया। कार्ला एवेन्यू से कैनाल तक सीधी बस सुविधा थी। मामा, कोई पांच छ मिनट पैदल चल कर बस स्टॉप पहुंचे और बस में सवार हुए। वहां बस में कोई कंडक्टर नहीं होता। चालक की निगरानी में लोग कार्ड पंच कर देते हैं। जिसके पास कार्ड नहीं होते चालक को ही पैसे देकर टिकट ले लेता है । मामा के पास तो कार्ड था ही वे पंच करके आराम से सीट पर बैठ गए। बस में कोई भीड़ भाड़ नहीं थी न ही कोई ट्रैफिक जाम मिला। वे कैनाल पहुँच गए पर उतरते समय दुबारा कार्ड पांच नहीं किया।  

वहां पर मामा जी को शौच जाने की आवश्यकता पड़ गयी।  कनाडा में शौचालयों की कमी नहीं है, जगह जगह सार्वजानिक शौचालय बने हैं।  इसके अतिरिक्त मैक्डॉनल्ड आदि रेस्तरां में भी शौचालय उपलब्ध होते हैं। यहाँ मामा जी को एक बात बड़ी अटपटी लगी, शौचालय में फ्लश के अतिरिक्त पेपर रोल तो रखे हैं पर कोम्बोट के पास कोई नल नहीं है। हाँ, वाश बेसिन और वहां साबुन का घोल अवश्य है और गीले हाथ सुखाने के मशीन भी लगी है। मगर शौच के बाद टॉयलेट पेपर से वे संतुष्ट नहीं थे।  वहां पर कोई मग  या बर्तन भी नहीं था अतः वे जो पीने के पानी की बोतल ले गए थे उसका प्रयोग कर समस्या का हल ढूंढ लिया । वापस आने पर महेंद्र से घूमने का वृतांत बताये तो महेंद्र माथा पीट लिया।  मामा, उतरते समय भी कार्ड पंच करना होता है अब तो अंतिम गंतव्य तक का किराया कट चुका होगा। 

एक बार वे स्मार्ट कार्ड नहीं ले गए।  ड्राइवर ने उन्हें पेंशनर टिकट दे दिया।  पेंशनर टिकट पूरे दिन के लिए नाम मात्र किराये पर मिल जाता था।  वे घूम कर आ तो गए पर महेंद्र ने आगे से ऐसा न करने की चेतावनी भी दिया। अगर जाँच में पेंशनर कार्ड मांग दिया होता और नहीं  दिखा पाते तो भारी जुरमाना देना पड़ सकता था।  

जब महेंद्र उन्हें बर्फीले पर्वत दिखने ले गया।  वहां की ठण्ड साधारण गरम कपड़ों से जाने वाली नहीं थी।  उनके लिए एक भारी भरकम जैकेट जिसमे टोपी भी लगी थी, गरम पायजामा और दस्ताना खरीद दिया। शुरू में जैकेट में लगी टोपी उन्हें अजीब सी लगी। बार बार कहते, यह पहन कर कैसा लगूंगा।  मगर जब वहां पहुंचे तो सबसे पहले वे टोपी लगाये दिखे।  

एक दिन दोपहर के बाद खा पीकर वे पार्क में चले गए।  थोड़ा समय बिताकर वापस आये तो पता चला कि वे चाभी घर पर ही छोड़ गए थे। महेंद्र जिस फ्लैट में रहता है जिसमे दो ताले खोल कर फ्लैट में प्रवेश करना होता है। एक भवन का मुख्य द्वार और दूसरा फ्लैट का द्वार।  दोनों ही ताले खुलते तो चाभी से थे, बंद अपने आप ही हो जाते । मामा जी अब क्या करें, महेंद्र व उषा  के काम से आने में अभी काफी समय था। उन्हें सूझा कि मुख्य द्वार पर लगी किसी और की घंटी का बटन दबा के द्वार खुलवा ले पर भाषा की समस्या और उससे भी क्या हल होगा। यहाँ तो कोई अपने यहाँ कुछ देर बिठाता भी नहीं। और यह भी गारंटी नहीं कि  दिन में घर में कोई हो भी। दूसरा उपाय था गैराज के द्वार पर खड़े हो जाएँ और किसी गाड़ी के आने की प्रतीक्षा करें।  जैसे गाड़ी वाला गैराज खोले उसमे से होकर फ्लैट तक पहुँच जाएँ।  मगर फिर वही होगा - आकाश से गिरे खजूर में अटके। पूरी माथा पच्ची करने के पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक डेढ़ घंटे और आस पास घूम ले तब तक महेंद्र गीता आ ही जायेंगे। मामाजी भवन के पास वाली गली में घूम ही रहे थे कि समीप ही दूसरे भवन में रहने वाला मोहित वहां से गुजरा। वह मामाजी को पहले भी उधर चहलकदमी करते देख चुका था । उसने गाड़ी रोक कर पूछ लिया, 'भारत से, अंकल जी ?'
मामा ने उत्तर दिया 'हाँ '
'टहल रहे हैं ?'
मामाजी ने पूरी कहानी बताई।
मोहित - 'यह तो जानता हूँ यहाँ  कोई भारतीय ही रहता है पर अभी तक महेंद्र से सीधे परिचय नहीं हुआ इस कारण मेरे पास उसका फोन नंबर भी नहीं है। अंकल जी, मैं भी पास में ही रहता हूँ, आ जाओ वहां बैठो, चाय पानी पियो तब तक वह आ ही जायेगा। मोहित मामाजी को लेकर अपने घर चला गया।

इधर महेंद्र घर पर फोन कर रहा था, कोई उत्तर नहीं मिल रहा था । सोचा, आज जल्दी निकल चलते है, मां जी को लेकर किसी मॉल में कुछ खरीददारी कर लेंगे । गीता को भी जल्दी निकलने को कह दिया। घर आया तो देखा मामाजी नदारद। जल्दी से पार्क की ओर गया, पास के बाजार में दुकानो में ढूँढा मामाजी का कोई पता नहीं। हताश होकर घर लौट आया।  देखा तो घर की दूसरी चाभी भी खूंटी पर ही टंगी है।  दोनों चिंतिति होने लगे। आखिर मामाजी बिना बताये कहाँ चले गए? कहीं भूल भुला गए तो बड़ी समस्या हो जाएगी। उन्हें यहाँ के बारे में ज्यादा कुछ पता भी नहीं है और हम कहाँ ढूंढेंगे। मगर ऐसे वे जाएंगे कहाँ ! उसने पूछने के लिए कई दोस्तों को भी फोन कर दिया। घर के बाहर खड़े होकर इधर उधर देख रहा था कि मामाजी मोहित के साथ चले आ रहे हैं।  अब महेंद्र के जान में जान  आई।  

मामा जी कनाडा में महीने भर रहे। महेंद्र ने उन्हें खूब घुमाया और वे भरपूर आनंद उठाये। महेंद्र ने उनके लिये और मामी के लिए कई सामान खरीद दिया था। मामा को जो भी सामान पसंद आता, महेंद्र उसे खरीद देता।  महेंद्र का यह सम्मान देख कर मामा जी गदगद थे । वे प्रसन्नता पूर्वक विदा हो गए। महेंद्र एयरपोर्ट उन्हें छोड़ने गया। मामा जी हाथ के बैग के अलावा उड़ान में केवल २० किलोग्राम सामान ही ले जा सकते थे।  महेंद्र ने काफी सामान खरीद रखा था और गरम कपडे भी थे अतः उनका सामान २ किलो अधिक निकला।  अब बड़ी उलझन पड़ी उसमे से क्या निकाल कर कम करें। क्योंकि उसका किराया सामान की कीमत से भी अधिक था।  बामशक्कत एक दो सामान निकल एक किलो वजन कम किये, अनुनय करने पर एक किलो के लिए एयरलाइन्स वाले मान गए। मामा जी सकुशल वापस घर पहुंचे। 
वे वहां कनाडा की आलोचना बेशक कर लेते हों मगर इंडिया आकर तारीफ करते नहीं अघाते।      



    

Friday, 3 July 2015

Paalatoo beta


पालतू बेटा 

सीमा, काम वाली की प्रतीक्षा कर रही थी।  बताओ, ये टाइम हो गया और वह अभी तक नहीं आई।  बड़बड़ाते हुए घर के गेट से, दाएं बाएं झांकने लगी। कामवाली कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहीं थी। सोची कि लगे हाथ पड़ोस से पूछ कर आये, वहां भी यही काम करती है। तभी किसी के सिसकियों की आवाज आयी। देखी तो घर के चारदीवारी पास रखे गमलों के बीच बैठा एक बच्चा रो रहा है। उससे पूछी, 'क्यों रो रहे हो?' कोई उत्तर नहीं मिला। कहाँ से आये हो, क्या नाम है; किसी भी बात का उत्तर नहीं मिल रहा था। वह बस रोये जा रहा था।  इतने में कामवाली दिख गयी।
'अरे, कुसुमा! जल्दी आ, देख तो यह पता नहीं कौन है, यहाँ बैठ कर रो रहा है। चल अंदर बुला ले, अंदर ही पूछते हैं। '
कुसुमा उसे लेकर घर के अंदर आई। उससे बार बार पूछा, कहां से आया है? नाम क्या है? पिता का नाम क्या है? किसी बात का उत्तर नहीं दे रहा था। भूख लगी है? उसने हाँ में सिर हिला दिया।
कुसुमा, 'देख रोटी सब्जी पड़ी है, लाकर इसे खिला दे।' 
कुसुमा ने रोटी सब्जी लेकर दिया, वह चुप चाप, बड़े मगन से खा लिया। दो रोटी खाने के बाद पूछा, 'और खाओगे?' बच्चे ने हां में सिर हिला दिया। कुसुमा ने एक रोटी और दिया, जिसे वह खा लिया।
सीमा, कुसुमा से कहने लगी, 'इतना छोटा बच्चा! लगता है, माँ बाप से बिछुड़ गया है।'
'मुझे  तो लगता है डांट खाकर घर से भाग गया होगा। जब कहीं खाने को नहीं मिला होगा तो भूख से तड़पकर कर रो रहा था।'
'चल अभी इसे सामान्य होने दे फिर पूछते हैं, क्या बात है। जा, तब तक फ्रिज में से एक गुलाब जामुन ले आ और इसे खिला दे।'

गुलाब जामुन खाकर उसका मन पुलकित हो गया। इससे पहले, न जाने कब ऐसा स्वादिष्ट व्यंजन खाया होगा। उसे बैठक में छोड़कर सीमा और कुसुमा अपने अपने काम में व्यस्त हो गयीं। वह बच्चा फर्श पर पड़ा ही सो गया। लगभग एक घंटे के बाद सीमा ने उसे जगाकर फिर पूछा, 'कुछ खाओगे?'
इस बार उसने बोल दिया, 'नहीं।'    
'कहाँ से आये हो?'
'चाचा के घर से।'
'चाचा कहाँ  रहते हैं?'
'बहुत दूर'
'चलो तुम्हें तुम्हारे चाचा के घर छुड़वा देते हैं।'
यह सुनकर वह फिर रोने लगता है। अब तो सीमा बड़े संकट में पड़ गयी, आखिर उसे घर से निकाले कैसे? कुसुमा ने कहा, 'मेम साहब, इसे अपने यहाँ रख लीजिए। इसके माँ बाप एकाध दिन में आएंगे तो ले जायेंगे। नहीं तो नौ दस साल का तो होगा ही, घर का कुछ काम कर लिया करेगा।
'अरे, अभी छोटा बच्चा है, ये क्या काम करेगा!'
'नहीं मेम साहब, इतनी ही बड़ी मेरी बेटी है, घर के कई सारे काम कर लेती है। इसको भी सिखा देंगे।'

दिन निकल गया, शाम तक उसके किसी परिजन का कोई सूत्र नहीं मिला। ये लोग, अटकल लगाते रहे कि घर से भाग गया होगा, कहीं माँ बाप से बिछुड़ गया होगा, कोई अपहरण करने के बाद छोड़ दिया होगा। कारण कुछ भी हो, सीमा और उसके पति साहू जी ने यही निर्णय लिया कि वह अनाथ है, और उसे अपने यहाँ शरण देना ही उचित रहेगा। धीरे धीरे घर के काम सीख लेगा तो उन्हें ही आराम रहेगा। अपना बेटा सुमेर तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके कहाँ काम करेगा, क्या पता! यह रहेगा तो छोटे मोटे काम में मदद करेगा ही। साथ ही यस भी डर सता रहा था, पता नहीं कौन है, इसके यहाँ आने के पीछे किसी की कोई चाल न हो, या अपहरण करके बाद में कोई छोड़ गया हो और हम पुलिस के झमेले में पड़ें। सावधानी बरतते हुए साहू जी ने पास पड़ोस को बता दिया कि उनको एक लावारिस बच्चा मिला है, यदि कोई ढूंढें तो बता देंगे। साहू जी और सीमा उसे रामफेर कहकर बुलाने लगे।

साहू जी के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी, साथ ही वे पति पत्नी दोनों बड़े अच्छे स्वाभाव के थे। वे उस बच्चे के खाने पीने का ध्यान देने लगे। उसके लिए नए कपडे भी खरीद लाये। एक सप्ताह में तो उसकी रंगत ही बदल गयी। एक सप्ताह के पश्चात साहू जी के घर एक व्यक्ति आ टपका। घंटी की आवाज सुनकर जैसे ही सीमा ने दरवाजा खोला; उसने पूछा, 'घूरन यहीं रहता है।'
'भईया ये तो पता नहीं घूरन है कि कौन है। हाँ, एक आठ नौ वर्ष का लड़का एक हफ्ते पहले आया था, तबसे वह यहीं है। वह अपना अता पता ठीक से नहीं बता रहा है नहीं तो उसे उसके घर भिजवा देते। बुलाती हूँ, खुद ही देख लो कौन है।'
सीमा ने बुलाया 'रामफेर।'
वह दौड़ा आया।  जैसे ही उस व्यक्ति को देखा, चिल्लाता अंदर भाग गया 'मुझे नहीं जाना इनके साथ।' बात-चीत से पता चला कि वह व्यक्ति घूरन का चाचा था। घूरन के माता पिता दोनों की मृत्यु हो चुकी थी।  इसलिये उसके पालन पोषण की जिम्मेदारी चाचा पर आ गयी थी। घूरन के साथ चाचा चाची का वर्ताव अच्छा नहीं था। बात बात पर वे उसे मारते पीटते थे, इसीलिए वह घर से भाग गया था। उन्होंने उसे बहुत ढूंढा, तब जाकर पता चला कि वह यहाँ है। सीमा ने रामफेर को समझाया कि वह अपने चाचा के साथ चला जाय पर वह जाने को तैयार ही नहीं था। वह चिल्ला चिल्लाकर कहने लगा, 'मुझे नहीं जाना ये मुझे मारते हैं।' शायद घूरन के मन में यही चल रहा था, उसके चाचा चाची उससे काम भी लेते हैं और भर पेट भोजन तक नहीं देते, उस पर भी प्रताड़ना। इससे अच्छा तो इन लोगों के यहाँ रहना है, इतना अच्छा खाना पीना, जब  से आया है एक बार भी मार नहीं पड़ी। चाचा ने भी स्थिति को भांप लिया। मन ही मन सोचा, अच्छा मौका है, घूरन को यहीं छोड़ देते हैं, अच्छा घर द्वार है, अच्छे लोग हैं। इसकी जिंदगी चैन से कटेगी और खुद की भी पालने पोषने से जान छूटेगी। चाचा ने कह दिया, 'अगर यहाँ खुश है तो यहीं रख लीजिए। आपके घर का थोड़ा बहुत काम भी कर देगा। इसके काम के पैसे मुझे दे दिया करना।'
सीमा के मन में भी यही चल रहा था। किन्तु पैसे देने की बात वह नहीं मानी। 'भैया अभी यह काम करने लायक कहाँ है, अभी इसे सिखाएंगे तो हो तो काम करेगा। अभी तो खाना कपड़ा ही देंगे। साल, दो साल बाद पैसे की बात सोचेंगे। पैसे देने की जगह इसे पढ़ाने की कोशिश करेंगे। खैर, घूरन का चाचा लौट गया। फिर दुबारा किराया भाड़ा लगाकर आना उसके लिए आना कठिन था। 
इधर साहू जी ने उसका नाम सरकारी स्कूल में लिखवा दिया, मगर रामफेर का पढ़ने में जी नहीं लगा। पढ़ने पर वे जोर न दें, इसलिए घर का काम दौड़ दौड़ कर करता। साहू जी के यहाँ का खाना-पीना, सुख-सुविधा देखकर तो उसे स्वर्ग सा लग रहा था। इतना सब तो सपने में भी नहीं सोच सकता था। वहां वह बहुत प्रसन्नता से रहने लगा। वह साहू जी और उनकी पत्नी को पापा मम्मी ही कहता। कुछ और बड़ा हो गया तो उसे इस बात का तनिक भी एहसास नहीं था वह कहीं बाहर से आया है। सीमा और साहू जी भी उसे प्यार करने लगे और अपने बेटे की तरह ही मानने लगे। पांच छः वर्ष ही बीते थे कि घूरन के चाचा चाची भी चल बसे थे। अब तो घूरन की खोज खबर लेने वाला कोई भी नहीं था।  

साहू जी और सीमा सबसे कहते, मेरे तो दो बेटे है सुमेर और रामफेर।   सुमेर तो बड़ा था ही और ऊपर से असली बेटा, वह मटरगस्ती करता रहता।  घर का कोई भी काम होता, रामफेर को सौंप दिया जाता। रामफेर को इस बात का एहसास था कि वह काम की बादौलत ही यहाँ है, इसलिए उसे यह सब भार सा नहीं लगता। वह मगन होकर सब काम करता। उसे तो इतना ही बहुत था, सबके जैसा खाना, पहनना और रहना मिल रहा था। साहू जी बातों से, उसे बार बार एहसास दिलाते रहते कि रामफेर को सुमेर से तनिक भी कम प्यार नहीं करते।  वैसे तो सुमेर के पुराने कपड़ों से भी उसका काम चल जाता, पर साहू जी समय समय पर उसे भी नए कपडे खरीद देते ताकि उसे किसी प्रकार से अलग व्यवहार का एहसास न हो। उनकी पास पड़ोस, सगे-सम्बन्धी सब जगह प्रशंसा होने लगी। देखो कहां का किसका लड़का, उन्होंने अपने बेटे के जैसा रखा है। 

रामफेर के रहने से साहू जी और सीमा को बड़ा सुख मिलता। और तो और सुमेर भी कभी घर आता तो अपने काम में उसे लगा देता। बाजार आदि से कोई सामान लाना होता, उसे दौड़ा दिया जाता। सब्जी वगैरह साफ करके काट देता, कपड़े धोने, सुखाने का काम उसी का था। जहाँ साहू जी के परिवार को आराम था, ये सब काम करने में रामफेर को भी मजा आता ताकि कोई पढ़ने के लिए न कहे। इधर, सुमेर पढ़ लिख कर, नौकरी करने लगा और उसकी शादी हो गयी। जवान तो रामफेर भी था, सीमा ने सोचा उसकी भी शादी कर दें ताकि घर के भीतर का काम उसकी पत्नी कर दिया करे और बाहर का स्वयं रामफेर। एक दिन सीमा ने साहू जी के समक्ष यह प्रस्ताव रख दिया कि रामफेर की भी किसी गरीब दुखिया की लड़की से शादी कर देते हैं। शाहू जी ने उसे समझा दिया, उसकी बीबी आएगी तो उसे भी अपने घर में ही रखना पड़ेगा। अभी तो रामफेर कहीं भी कैसे भी रह लेता है जब उसका परिवार हो जायेगा तो उसके लिए रहने का अलग से स्थान देना पड़ेगा और इसका भी ध्यान अपने परिवार में ही रहेगा। रामफेर ने यह बात सुन लिया। वह मन ही मन एक लड़की को चाहता भी था, सोचा अच्छा हुआ बात अभी ज्यादा आगे नहीं बढ़ी है। रामफेर के लिए हर चीज से ऊपर मम्मी पापा की इच्छा थी।

एक बार  फिर से साहू जी का पुराना रोग अचानक उभर आया। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, बीमारी गम्भीर थी, उन्हें खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ गयी। सुमेर इतनी छुट्टी कैसे लेता। जाँच की गयी तो रामफेर के खून का ग्रुप साहू जी से मेल खा गया। रामफेर ने अपना खून दिया, साहू जी उस समय तो ठीक हो गए, पर डॉक्टर ने साहू साहब की विस्तृत जाँच के लिए बोल दिया और साथ ही ऑपरेशन की आशंका भी व्यक्त की। जब उनकी विस्तृत जाँच हुई तो साहू जी पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। पता चला कि साहू जी बीमारी ने गंभीर रूप ले लिया है, और उसका आपरेशन यथाशीघ्र करना पड़ेगा। अब साहू परिवार की और से रामफेर के प्रति प्यार और आदर बढ़ गया था। सभी लोग कहते, 'रामफेर तो साहू जी के लिए भगवान बनकर आया है, ये था तभी उनकी जान बची, वरना जाने क्या होता। सुमेर तो नालायक है, उसे पिता की बीमारी में भी छुट्टी नहीं मिलती। अब तो वह बीबी को छोड़कर माँ बाप की देखभाल कहाँ करने वाला।' यह सब बातें रामफेर को खुश कर देतीं और साहू परिवार के लिए सब कुछ लुटा देने के लिए उमंग भर देतीं।

साहू जी को पता था कि आपरेशन के समय रामफेर ही काम आएगा। ऑपरेशन की बात होने के बाद, रामफेर के लिए प्यार बढ़ जाना स्वाभाविक था। उसके जन्म दिन पर सौगात के रूप में मोटरसाइकिल पहले ही मिल गयी थी, वैसे उसका उपयोग घर के काम निबटाने में अधिक होता था। वह सामान वगैरह लाने के लिए, परिवार के ही काम आती। रामफेर मोटरसाइकिल का क्या करता, उसे घूमने फिरने के लिए समय ही कहाँ मिल पाता। अब खाने पीने में साहू जी व उनकी पत्नी अपनी पसंद को छोड़, रामफेर की पसंद पूछते। इतना प्यार संभवतः उसके सगे माँ बाप होते तो भी कभी नहीं मिलता। रामफेर की मान मर्यादा बहुत बढ़ गयी थी। घर के हर काम में उससे सलाह ले जाती।  रामफेर को पूर्णतः एहसास हो चुका था कि वह सुमेर का छोटा भाई है। 

अब आपरेशन का समय आ चुका था। बस एक सप्ताह बाद ही आपरेशन होना था। बीमारी का भेद खोला गया। घर में चर्चा होने लगी, साहू जी का एक गुर्दा ख़राब है, और उसे बदलना पड़ेगा। गुर्दा कहाँ से लाएं? नियमानुसार कोई सगा सम्बन्धी ही गुर्दा दे सकता था। गुर्दा कौन देगा, कहाँ से आएगा। सुमेर की पत्नी तो उसे पहले ही कह चुकी थी, 'कहीं गुर्दा देने के लिए हां नहीं कर देना।'
फिर भी दिखावे के लिए सुमेर ने अपना गुर्दा देने को बोल दिया। उसकी माँ तुरंत बरस पड़ी, 'तुझे नौकरी करनी है, इतनी छुट्टी कहाँ मिलेगी, अभी नई नई शादी हुई है। इसी उम्र में गुर्दा निकलवाएगा, अभी पूरी जिंदगी पड़ी है।' उसको समझा बुझा कर शांत कर दिया। आगे बोली, 'सुना है अस्पताल में दलाल होते हैं, पैसे से जुगाड़ हो जाता है। पैसे ही तो लगेंगे। चल खोज बीन कर, दलाल का पता लगा।'  
'मगर इसके लिए काफी पैसे लगेंगे, आखिर दानी भी ऐसा लाना है कि फेल न हो।'
'कितने लग जायेंगे। ' सीमा ने पूछा। 
'यही कोई आठ दस लाख तो लग ही जायेंगे। वो भी गारंटी नहीं को स्वीकार भी हो जाय। केवल सगा संबंधी ही गुर्दा, दान कर सकता है।'
सीमा थोड़ी एक्टिंग करते हुए बोली, 'बताओ आठ दस लाख गुर्दे का, और उसके ऊपर ऑपरेशन का खर्च होगा। मगर यहाँ पापा के जान का सवाल है। कुछ तो करना ही पड़ेगा। मैं अपने जेवर बेच दूंगी, देखते हैं उसका क्या मिलता है। '
फिर रामफेर की ओर देखते हुए, 'रामफेर भी तो हमारा सगा बेटा ही है! हम्हीं ने तो पाल पोष कर इसे बड़ा किया है, आखिर किस दिन काम आएगा । ये अपना खून तो दे ही चुका है।'

रामफेर को इस स्थिति का पहले से ही अनुमान था। वह आगे बढ़कर बोला, 'मम्मी, अपने ने तो मेरे मुंह की बात छीन ली।' रामफेर तो साहू परिवार के लिए प्राण तक देने को तैयार था। मगर उसे ऑपरेशन के नाम से बहुत डर  लगता था। फिर भी उसने इस बात को अपना सौभाग्य  ही समझा और स्वयं को समर्पित कर दिया। 


Second hand bed

पुराना पलंग
'और विवेक कैसे  हाल हैं।  इधर कैसे ? कहाँ बिजी हो गए ? काफी समय हो गया, मिले ही नहीं।'
'बस, ऐसे ही, कोई खास नहीं।  अभी कुछ मेहमान सिडनी आये हुए हैं।  थोड़ा उन्हें घुमाना फिराना है। अभी एक बेड रूम में मैट्रेस नीचे ही रखा है, आइकिया जा रहा था, सोचा एक बेड डाल दूँ।  वो लोग भी सोच रहे होंगे, नीचे सुला रहा है ।'

'अरे मेरा एक मित्र अपना डबल बेड निकालना चाह रहा है, उसे ही क्यों नहीं ले लेता, एक तिहाई से भी कम दाम  में मिल जायेगा। मेरे परिचित का ही है, मैंने उसे देखा है बहुत अच्छा और मजबूत है। वही एजेंसी वाले ले जायेंगे, पोलिश वालिश करके नया बनाकर बेच देंगे।  कहे तो बात कर लू।'  पंकज ने कहा।

विवेक को बात कुछ अटपटी लगी।  पुरानी ही खरीदनी हो तो शहर का एक चक्कर लगाएं, कहीं न कहीं पटरी पर रखी वैसे ही मिल जाएगी।  यहाँ पुरानी वस्तुएं बिकती तो हैं नहीं, वैसे ही घर के बाहर छोड़ना पड़ता है, म्युनिसिपालिटी की गाड़ी आती है उठा ले जाती है। उसे यह बात अपमान वाली लगी।

पंकज ने समझाया, 'वह बेड उसके किसी बहुत घनिष्ठ मित्र का ही है।  लेन देन की बात का किसी के कानोकान तक खबर नहीं होगी।'
विवेक की पत्नी ने भी इस बात का समर्थन दे दिया, चलो अभी उसे ही लेकर काम चला लेते है, फिर थोड़ा फुर्सत से अच्छा सा बेड खरीदेंगे। 

विवेक बोला, 'ठीक है बात कर ले, पर एक दो दिन में ही लेना है। और हाँ एक शर्त है मै उसके पास नहीं जाऊंगा और किसी को पता भी नहीं लगना चाहिए कि सेकंड हैंड बेड खरीदा हूँ।'

'अच्छा, कल मेरी छुट्टी है, तुम पैसे दे देना, मै लेकर तुम्हारे यहाँ भिजवा दूंगा।'

'हाँ, उसके यहाँ से उठाकर सीधे कारपेंटर शॉप ले जाना है, वहां थोड़ा पोलिश करवा लेंगे नया जैसा हो जायेगा।'

'बिलकुल ठीक, वहां से लेकर मैं फ़ोन करूंगा।  तुम कारपेंटर शॉप पर मिल जाना।'

अगले दिन पंकज का फ़ोन आता है। विवेक, मैंने वो बेड ले लिया है।  एक घंटे बाद कारपेंटर शॉप पर आ जाना।
विवेक अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंचा। बेड डिस्मेन्टल और काफी अच्छी कंडीशन में था। विवेक ने शॉप के मालिक से उस पर पोलिश करने के लिए बोला।  उसने अगले दिन देने के लिए कहा तो विवेक ने उससे रिक्वेस्ट किया थोड़ा जल्दी करके एक दो घंटे में इस पर पोलिश मार के तैयार करवा दो। मेरे घर मेहमान आये हैं, उन्हें नीचे सोना पड़ रहा है।  मुझे आज शाम तक इसे घर ले जाना है।
घर लाकर रात ही रात उसे अस्सेम्बल करके तैयार कर लिया।  पोलिश के बाद तो एकदम नया सा ही लग रहा था। कोई नहीं कह सकता था कि वह सेकंड हैंड बेड होगा।
विवेक की पत्नी ने उसमे एक चिन्ह देखकर विस्मित रह गयी।
विवेक, विवेक! देखो, यह निशान।  याद है ऐसा ही निशान उस बेड में था जो हमने आशु को दिया था।
मुझे तो  ठीक से याद नहीं, हो सकता संयोग वश उस तरह का चिन्ह हो।  पर उस बेड का रंग इतना गहरा तो नहीं था।  संभवतः इसने भी उसी कंपनी से खरीदा होगा।  हाँ, देखो आईकिया का लेबल लगा है।

आशु जब इंडिया से ऑस्ट्रेलिया में नया नया आया था तो विवेक ने उसकी बहुत मदद की थी।  घर में पड़ी कुछ अतिरिक्त वस्तुएं उसे ऐसे ही दे दिया था।  उसके पास एक बेड भी अतिरिक्त रखा था जिसे वह आशु को दे दिया था। तब उसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।

वीक एंड पर आशु भी विवेक के घर आ धमका। अधिकतर वीक एंड पर  समूह के सभी मित्र किसी न किसी बहाने मिल लेते थे।  कभी कहीं आउटिंग पर निकल गए, कभी किसी ने खाने पर बुला लिया वरना वैसे ही किसी के घर आ धमके । इन सब क्रियाओं से प्रेम परस्पर खूब बढ़ चढ़ कर था।
हाल चाल हुआ।
विवेक  - 'मैंने नया बेड लिया है '
आशु - 'अच्छा, कौन से रूम में है'
 आ देख
सभी बेड रूम में घुसे
आशु की पत्नी - अरे, यह तो वही बेड है जो हमने तीन चार दिन पहले बेचा था
विवेक - 'किसको बेचा था'
आशु की पत्नी - यह तो पता नहीं, खरीदने वाला तो सामने नहीं आया पर पंकज ने लेकर किसी को दिया था।
विवेक - हा, हा हमने भी नया नहीं खरीदा, सेकंड हैंड ही खरीदा और वह भी पंकज के ही द्वारा ।  हाँ, उसे पोलिश जरूर करवा दिया था।
सुनकर तो आशु को जैसे काठ मार गया।  वह शर्म से पानी पानी हो गया।
यह तो वही बेड है जो तूने मुझे दिया था, मुझे क्या पता पंकज यहीं के लिए यह सब कर रहा है।
तू अपने पैसे वापस ले लेना।
विवेक बोला जाने दे, कोई बात नहीं, जो हो गया, सो हो गया। चल चाय पीते हैं।


Friday, 26 June 2015

Samachar


आपने न्यूज देखा !

घंटी बजी, मनोहर लाल ने दरवाजा खोला। 'आईये ठाकुर साहब, और क्या हाल है। '
'अरे मनोहर जी, आपने न्यूज़ देखा ! पता लगा है दंगा हो गया।  ऑस्ट्रेलिया में भारतियों को पीट रहे हैं। सब ठीक तो है न, शम्भू का फ़ोन आया कि नहीं, भई! हमें तो बड़ी चिंता हो रही थी , टी वी पर जैसे ही समाचार देखा, सीधे चला आया। ' कहते, ठाकुर साहब सोफे पर बैठ गए।
'बैठिए ठाकुर साहब ! यह सब होता ही रहता है। चलिए चाय पीते हैं।'
'अरे, कमाल है, आप का बेटा वहां रहता है और आप को चिंता ही नहीं। भई, हमने जबसे समाचार सुना बड़ी चिंता हो रही थी, सोचा चलें मनोहर लाल जी से ही पूरा समाचार ले लें। '
'अरे, बच्चों की चिंता क्यों नहीं होगी, अभी थोड़ी देर पहले ही शम्भू का फ़ोन आया था,  उसने बताया मेलबोर्न में कोई आपसी झगड़ा हुआ था। शम्भू दूसरे शहर में रहता है। वह ठीक ठाक है। '
मनोहर लाल ने टी वी खोला तो वही समाचार आ रहा था । ठाकुर साहब का जोश  और बढ़ गया, 'देखो वही आ रहा है, मैं कह रहा था न। ' 
मनोहर लाल ने फिर से शम्भू को  फ़ोन मिलाया, ' बेटा, सब ठीक है न। '
'हां, क्या हुआ ?' शम्भू ने पूछा।
'ठाकुर अंकल आये थे, बता रहे थे वहां कोई झगड़ा वगैरह हुआ है। '
'नहीं पापा, यहाँ  कोई ऐसी बात नहीं। मेलबोर्न  में कुछ लोगों में झगड़ा हो गया था, अब सब शांत है।  यहाँ इतना ये सब नहीं होता। ' शम्भू ने बताया।
ऑस्ट्रेलिया का जब  भी कोई समाचार आता तो कभी ठाकुर साहब, तो कभी जोशी जी, शर्मा जी तो कभी दूसरे मोहल्ले के भी लोग आ जाते। मनोहर लाल से विस्तृत जानकारी मांगते जैसे की समाचार एजेंसी इन्हीँ के घर से कार्य कर रही हो। मनोहर लाल जी अनायास ही परेशान होते और इतने लोगों को चाय पिलानी पड़ती तो इनकी पत्नी अलग से परेशान होतीं। पता नहीं, पड़ोसियों को उनकी वास्तविक चिंता ही इनके घर ले आती या उनकी ईर्ष्या और मजे लेने की प्रवृत्ति, खींच कर लाती। 
परेशान होकर, मनोहर लाल ने उन्हें चुप करने का तरीका ढूंढ लिया। उनके घर समाचार पत्र तो आता ही था, वे अपराधिक समाचारों को चिन्हित करके रखते।  आगंतुक जैसे ही ऑस्ट्रेलिया की बात शुरू करता, वे  अख़बार का पन्ना दिखाने लगते।  ये देखिये - दिल्ली में बलात्कार, मुजफ्फर नगर में अपहरण, मुंबई में हत्या, बंगलुरु में  ठगी, इटावा में एटीएम उठा ले गए, चलती महिला का चेन छीना, अलीगढ में लाठी चार्ज, बिहार में चलती ट्रेन से फेंका, नन्हीं बच्ची से कुकर्म, बंगाल में जहरीली शराब से सैकड़ों बीमार, उड़ीसा में भूमि के झगड़े में कई घायल, भीड़ ने पीट कर मार डाला, एक साथ सात घर के ताले टूटे, नदी में डूबा, मोबाइल पर गाना सुनते रेल से कटा, बस पलटने से पंद्रह मरे, संपत्ति विवाद में भाई ने भाई को मारा, विवाह में गोली चली, नवजात को कूड़े में फेंका, असफल प्रेमी ने तेजाब फेंका,  वाहन  ने कइयों को कुचला, वृद्ध को लूट लिया, रिश्वत लेते पकड़ा, नेता जी ने सार्वजनिक जमीन पर कब्जा जमाया आदि आदि। 
अब तो पडोसी शर्माने लगे, और उन्हें यह बात समझ आ गयी कि इन सब का हल मनोहर लाल के घर में नहीं है और न ही ऑस्ट्रेलिया में। 

Saturday, 2 May 2015

Taran taal ka maran

तरण ताल का मरण 

एक बार पहले भी मैं कुस्सू जी के घर गया था। जाते ही हाथ पकड़ कर भीतर ले गए चलो अपना मकान  दिखाता  हूँ। क्या आलीशान बंगला है उनका। देखो तो देखते रह जाओ।  ड्राइंग रूम जैसे किसी होटल का स्वागत कक्ष हो दो दो बड़े व सुन्दर सोफ़ा सेट, खाने की बड़ी मेज, छत से लटकी झूमर, पांच बड़े शयन कक्ष, तीन के साथ सलग्न स्नान घर जिनमे स्नान टब लगे तथा शीशे की कोठरी में फव्वारा साथ ही प्रत्येक नल से गरम, ठन्डे पानी की व्यवस्था।  इनके अतिरिक्त एक और स्नान गृह व लॉण्डरी अलग जिसमे स्वचालित धुलाई व सुखाने की मशीन लगी थी।  ड्राइंग रूम के एक भाग में बार बना रखा था।  देश, विदेश की अनेकों ब्रांड की बोतलें सजी थी।  मुझसे पूछा, "स्कॉच लोगे या व्हिस्की? कौन सा ब्रांड?" 
मैंने कहा, "नहीं, जूस ठीक है।" 
"अच्छा चलो अपना स्विमिंग पूल दिखाता हूँ। "    
घर के पीछे सुन्दर उद्यान बना रखा था और बीच में तरण ताल।  तट पर बेंत वाले सोफे रखे थे।  आभा देखकर मैं स्वयं को रोक नहीं पाया, सोफे पर बैठ गया।  कुस्सू जी भी बगल में बैठे। 
"चलो, यहीं जलपान करते हैं। " मैंने भी हामी भर दी। 
नौकरी पेशे वाले का इतना बड़ा ठाट।  देख कर मैं तो दंग  रह गया।  भारत में तो बड़े पैसे वाले ही इस तरह की सुविधा का उपभोग कर सकते हैं।
तरण ताल देख कर मेरा मन भी ललच गया।  काश! हम भी थोड़ी देर इसमे छपक, छपक कर लेते, मगर मेहमान बन कर गए थे अतः मन का भाव मन में छुपा के ही रखना पड़ा। कुस्सू जी बड़े उत्साह से सब बताते रहे।  क्या भारत में आप लोग सोच सकते हैं घर के प्रांगण में स्विमिंग पूल।  यह तो अभी छोटा है यहाँ लोग इससे बड़े बड़े स्विमिंग पूल भी रखते हैं, मैंने इतना ही बड़ा बनवाया था क्योंकि इसका रख रखाव सरल नहीं है। पानी बदलना, रसायन डालना आदि नियमित रूप से करना पड़ता है। स्विमिंग पूल रखना थोड़ा झंझट वाला काम है।

यह सब देख कर थोड़ी देर तो मन सपनों में घूमने लगा, काश! मेरे भी घर में स्विमिंग पूल होता तो घंटों उसी में समय बिताता। वास्तव में मुझे कभी स्विमिंग पूल में प्रवेश का अवसर नहीं मिला था। हाँ, कभी कभार गांव के तालाब में या फिर गंगा जी में डूबकी अवश्य लगाई थी। शीघ्र ही मन को समझा लिया जो आनंद मैंने ट्यूबवेल में स्नान करके उठा लिया इन लोगों के लिए कहाँ संभव। नलकूप के हौद में बैठे और ऊपर से जल की मोटी धार, खुले वातावरण में मानो बहता झरना ऊपर गिर रहा हो, स्वर्ग में स्नान करने की अनुभूति।  जब भी मुझे गांव जाने का अवसर प्राप्त होता था मैं चांपा कल (हैंड पंप) पर नहीं बल्कि ट्यूबवैल पर ही स्नान करना पसंद करता था। न पानी बदलने का झंझट, न रसायन डालने का।  हर बार बिना शुल्क के ताजे पानी से स्नान। सिंचाई के लिए तो टुबवेल चलना ही होता है।  
  
इस बार कुस्सू जी सहज अनुभव नहीं कर रहे थे। अभी बैठे ही थे की उनका फ़ोन आ गया, वे उठकर बात करने एक और चले गए।  थोड़ी देर में जब आये तो उनके मुख पर चिंता की रेखाएं झलक रही थीं। चाय पानी का दौर समाप्त हुआ।  मैंने उनसे आग्रह किया,  "चलो आपका स्विमिंग पूल देखें। "
"क्या देखेंगे स्विमिंग पूल!" वे बोले।  
वे लेकर गए तो पर अनमने ही  देखा तो उनका तरण ताल अकाल के समय प्यासी धरती की भांति सूखा पड़ा था। जो उद्यान हरी भरी घास व पुष्प के पौधों से सजा होता था अब टाईलों से ढका पड़ा है।  बस कहीं कहीं एकाध सजावट के पौधे रह गए थे। 
    
"यह क्या हुआ कुस्सू जी! स्विमिंग पूल सूखा ?" मैंने पूछा।

"अरे क्या बताएं यहाँ के नियम इतने सख्त हैं की झेलना बहुत कठिन है।  लॉन की घास बढ़ गयी तो अर्थ दंड, स्विमिंग पूल का पानी न बदला तो जुर्माना, नमक व रसायन न डाला तो जुर्माना। रख रखाव में ही कई सौ डॉलर हर महीने डकार जाता है। इतना परिश्रम व खर्च करते हैं  और ऊपर से कई बार जुर्माना भरना पड़ चुका है। अभी हाल ही में एक हजार डॉलर का जुर्माना आया था।  अब तो सोच रहा हूँ कि स्विमिंग पूल को पटवा ही दूँ। इससे अच्छा तो किसी क्लब के स्विमिंग पूल चले जाया करेंगे।  कौन सा की प्रतिदिन स्विमिंग पूल में तैरते हैं।  वही, ठेकेदार का फ़ोन आया था।  उससे पाटने के लिए बात किया था।  १२ हजार डॉलर मांग रहा है (भारत के हिसाब से लगभग ७ लाख रुपये) । बताईये पाटने के लिए इतना पैसा, इतना तो बनवाने में भी नहीं लगा। "

कुस्सू जी की चिंता को मैं भली तरह से अनुभव कर रहा था, मैंने भी उनकी बात को हाँ करके समर्थन दे दिया।  
  

       

Wednesday, 8 April 2015

Muft ki coffee

मुफ्त की काफी

दीपक अकेला ही रहता था। शाम को अकेले घर पर समय काटना बड़ा कठिन हो जाता। सिडनी में अधिकतर ऑफिस समय पर ही बंद हो जाते हैं।  इस कारण वह वहां भी देर तक समय नहीं बिता सकता था। ऑफिस के सहकर्मी तो छुट्टी के पश्चात पब आदि में चले जाते और सप्ताहांत की छुट्टी घर से बाहर कहीं समुद्र तट या खेल आदि में बिताते।  सबका अपना अपना तरीका था।  दीपक को पब जाने से परहेज था क्योंकि वह मंहगा था। जो मित्र बन पाये थे वे दूर रहते थे अतः रोज मिल पाना संभव नहीं था। अब शाम का समय बिताने का जो तरीका बचता था या तो टेलीविज़न देखे या साथ शराब पिए।  टेलीविज़न भी अकेले देखने में क्या मजा। पुस्तक पढ़ना तो अब बोझ जैसा था, पढ़ाई में बहुत पढ़ चुका।

उसे पता चला कि वहां समीप में ही एक क्लब है जिसकी सदस्यता शुल्क नाम मात्र की है।  एक दिन वह वहां गया
और उसकी भव्यता देख चकित रह गया। वातानुकूलित भवन,  साफ सुथरा अंदर का वातावरण, तरह- तरह के कैसिनो के खेल। सदस्य्ता शुल्क सुनकर तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा मात्र १० डॉलर प्रति वर्ष और कोई प्रवेश शुल्क नहीं। बस फिर क्या बात थी झट १० डॉलर निकला और शुल्क देकर क्लब का सदस्य बन गया। सदस्य बनने में बस कोई एक मिनट लगे होंगे।   अंदर भांति भांति की गेमिंग मशीन लगी हैं।  किसी मशीन पर बैठ जाओ और जब तक मन करे, खेलो और भाग्य प्रबल हो तो डॉलर भी कमाओ। और तो और निशुल्क चाय काफी की भी व्यवस्था थी। समय बिताने को और क्या चाहिए। अब तो शाम को वह समीप के क्लब में चला जाता और निशुल्क चाय, काफी का आनंद उठाता।  बस नाश्ता या खाने के सामान का पैसा देना होता।  क्लब के भवन में ही दो तीन अच्छे रेस्तरां और बार भी थे।  ड्यूटी से आने  के बाद चाय नाश्ता बनाने के चक्कर में कौन पड़े।  वह क्लब चला जाता ; चाय, नाश्ता मिल जाता कभी कभी गेमिंग मशीन पर खेलने से कमाई भी हो जाती। उसके लिए यह सोने में सुहागा सा लगा।  
क्लब आने जाने की निशुल्क बस सुविधा भी थी। इतना कुछ बिना पैसे के।  किसका जी नहीं चाहेगा वहीँ जमा रहे और वातानुकूलित  भवन में में बैठे गरम चाय काफी का आनंद  ले।
एक दिन क्लब में मशीन पर खेलते हुए उसे एक युवक दिखा जो भारतीय लग रहा था।  उसके पास जाकर उसने पूछ लिया क्या आप भारत से हैं ? उत्तर मिला 'हाँ' ।
'कहाँ से ?'
'चंडीगढ़ से। और भी दो तीन भारतीय यहाँ खेलने आते हैं।'
'चलिए, मिलके बहुत अच्छा लगा।  अकेले बोर होता था।  आपका नाम ?'
'राजीव'
'यहाँ रोज आते हैं'
'कभी, कभी।  अभी परिवार भारत गया है इसलिए कभी कभी आ जाता हूँ। समय अच्छा कट जाता है।'
'कुछ कमाया इन मशीनों से ? सुना है लोग यहाँ गँवा कर ही जाते हैं।'
किन्तु दीपक का भाग्य साथ दे रहा था वह कुछ पैसे बना चूका था।  बोला -
'कभी कभी कुछ मिल जाता है । मैं तो समय बिताने के लिए थोड़े पैसे से खेलता हूँ। ज्यादा लगाओ तो तो कमाई के अवसर भी अधिक हो जायेंगे। अभी थोड़ा अनुभव ले लूँ।'
'और आप कहाँ से ? राजीव ने दीपक से पूछा।'
'दिल्ली से, अभी कुछ महीने पहले ही आया हूँ।'
'अरे, फिर तो पडोसी है ठहरे।  बहुत अच्छा।  किसी दिन घर आना।  अपने लोग मिलते हैं तो कितना अच्छा लगता है।  और कहाँ काम करते हो ?'
'सिटी में एक आई टी कंपनी है। '
'और अभी अकेले हो '
'हां'
'ठीक है, देखना, बस इसका चश्का मत लगा लेना।'
अब तो साथ मिल गया, कभी कभार बार में बियर, व्हिस्की का दौर भी चल जाता था। दीपक को यहाँ से कमाई होने लगी और खेलने का चश्का भी बढ़ता गया। काम से आने के बाद सीधे क्लब। पहले कभी कभी छुट्टी के दिन दोस्त मित्रों से मिलने उनके घर या उनके साथ कहीं घूमने चला जाता था। अब तो क्लब गए बिना एक दिन भी नहीं रहता। धीरे धीरे कुछ पैसे जोड़ लिए। अब सोचा थोड़ा बड़े दाव खेल कर कुछ अधिक पैसे बन जायँ  तो एक फ्लैट भी खरीद लेगा और मकान का किराया देने से छुटकारा मिल जायेगा। भारी भरकम किराया देना बहुत कहलाता था। अगर रुपये में देखें तो एक लाख रुपये प्रति माह।
इधर राजीव कुछ दिनों से नहीं आ रहा था। लगता है उसका परिवार आ चुका। अब दीपक अकेले ही खेलने लगा। इंटरनेट से औरों के अनुभव पढ़कर उसका आत्मविस्वास  भी बढ़ गया था। कुछ कमाई बढ़ी और साथ दीपक का लोभ। अब तो कैसिनो को वह काफी समय देता, कभी कभी काम से छुट्टी करके भी वहां चला जाता। उसका फ्लैट खरीदने का सपना सच होने के समीप आने लगा था।
राजीव से मिले अब दो वर्ष हो चुके थे। एक दिन सिटी मॉल में कुछ सामान खरीदने गया वहीँ राजीव मिल गया।
'अरे, दीपक! कहाँ हो भाई, इतने दिन से न कभी मिले न फ़ोन किया।  और सब कैसे है ? मकान वगैरह खरीद लिया कि नहीं।  मैं तो एक और मकान देख रहा हूँ।  सोचा इसी बहाने कुछ इन्वेस्टमेंट हो जाएगी और किराये से आमदनी भी बढ़ जायेगी।'

'अभी कहाँ लिया यार।  कुछ पैसे कमाये थे।  एक दिन मैंने रोलेट में जयादा पैसे लगा दिये सब चले गये।  फिर गंवाए पैसे फिर से कमाने के लिए मैं लगाता गया, मशीन खाती गयी।  नुकसान इतना हो गया कि काम से छुट्टी ले लेकर खेलने लगा, मगर भाग्य ने बिलकुल भी साथ नहीं दिया।  पैसे तो बने नहीं, अधिक छुट्टी करने के कारण नौकरी से और निकाल दिया।  अब दूसरी जॉब ढूंढ रहा हूँ।  जो सेविंग की थी सब समाप्त हो चुकी है। शीघ्र जॉब नहीं मिली तो घर से पैसे मंगाने पड़ेंगे। '

'ओ हो, यह तो बहुत बुरा हुआ। मैंने पहले ही कहा था, यह गेमिंग का चश्का, है ही ऐसा है। चल कोई बात नहीं, अब से संभल जा। '
'हाँ, अब तो कान पकड़ लिया है। कैसिनो भूल कर भी नहीं जाऊंगा। '
 'अरे, मेरी कंपनी में आई.टी. में एक जगह खाली है तू एप्लीकेशन डाल दे। जी. एम.  से मेरी अच्छी पटती है, मैं बात कर लूँगा।'
इस बात से दीपक के जान जान में जान आ जाती है।




  


  

Sunday, 5 April 2015

Chacha Ashik Ali ki holi


आशिक अली, इतने मजाकिया किस्म के इंसान थे कि उनकी चुटकुलेदार बातें सुनकर, हंसने के लिए बच्चे उनके आगे पीछे घूमते रहते।  नूरा अपने माँ बाप की इकलौती बेटी थी। जुम्मन मियां के अंतकाल के बाद, आशिक अली, ससुराल में ही आन बसे।  ससुराल में रहने के नाते वे सबसे हंसी मजाक कर लिया करते, और गांव वाले भी उनसे चिकारी करते रहते। उनकी किसी बात का कोई भी बुरा नहीं मानता। वे रहते तो ससुराल में थे, पर गांव के बच्चे उन्हें चाचा ही कहते। बालों के साथ वे खुद भी पके हुए इंसान बन गए थे, मगर उनके साथ गुजारा समय कत्तई पकाऊ नहीं होता। कई बार तो उनके मजाकिया कटाक्ष ऐसे होते कि आगे वाला सोचता ही रह जाता।
एक बार एक युवक ने कह दिया, 'चाचा जब मर जाओगे तो पूरा गांव बहुत उदास हो जायेगा। '
तो उन्होंने तपाक से उत्तर दिया, 'लड़की ढूंढे रखना, अगले जन्म में भी इसी गांव में ससुराल बनाऊंगा, वैसे जन्नत से भी तुम लोगों को देखता रहूँगा। '

 उनकी कई बातों का लोग तोड़, नहीं ढूंढ पाते। जहाँ कहीं भी गांव में वे दिखते, लड़के कुछ ना कुछ कहकर, छेड़ देते, और बदले में उन्हें ढेर सी सुननी पड़ती, उनको क्या! हा.. हा.. हा करते भाग जाते। उनसे मिलकर लड़कों के आनंद का कोई ठिकाना नहीं रहता। दिन में अगर एक बार, आशिक चाचा नहीं मिले तो लगता था कि वह दिन ही बेकार गया। हंसी मजाक में भी उनके सम्मान व मर्यादा का पूरा ख्याल रखा जाता।  क्या मजाल कि उनसे कोई अभद्र व्यवहार कर दे।
पूरे गांव में उनका इकलौता गैर हिन्दू परिवार था।  जितने उत्साह से वे ईद मनाते, होली, दीवाली पर उनका उत्साह उससे कम नहीं होता। उनके त्यौहार में तो गिने चुने लोग ही सम्मिलित होते परन्तु वे हिन्दुओं के हर पर्व में खुलकर सरीक होते। होली में तो उनका रंग देखते ही बनता।
'इतने कम पटाखे और मिठाई, भाई क्या दिवाली मनाई।'
वे जुमला कस देते, बच्चे सुन कर हंस देते, 'तो चाचा, आप की तरफ से ही कुछ हो जाय। '
'वाह, भई! वाह, उलटी गंगा हिमालय की ओर।'
इसी प्रकार उनका होली का जुमला था, 'खाली चेहरा रंगा तो क्या होली मनी, मुझे देखो मन भी रंगा है. भंग का गोला-ओला खाया कि नहीं!'
'ही ही, चाचा, सदानन्द अंकल के छन रही है, जाऊं एक गोला ला दूँ?'
'नहीं, वहीँ चला जाऊंगा। '
जैसा उनका नाम था, आशिकी की बातें भी कर लेते, युवा लड़कों को सुनकर मजा आ जाता।
बाबू कैश नहीं तो ऐश नहीं।
बिना कॉलेज के नॉलेज कहाँ।
नो लाइफ विदाउट वाइफ। 
इश्क न किया तो क्या खाक जिया। 
उनके ये कुछ जुमले, गांव के लडके बार बार सुनना चाहते। उनको याद भी दिलाते रहते चाचा जरा वो वाला...
 
 अभी दस भी नहीं बजे थे, किसी ने दरवाजा खटखटाया ..
'कौन है ! आज तो होली का दिन है,'  कहते हुए, शब्बो चाची ने दरवाजा खोला। देखा तो गली में आठ दस युवक रंग में सराबोर खड़े हैं।
'अरे बेटा रमेश! कैसे हो ? आओ गुलगुले बनाई हूँ, खा लो।' चाची, बनाने में अधिक झंझट के कारण, होली पर गुजिया तो नहीं बना पाती, पर गुलगुले और दही-बड़े जरूर बनाती।
'नहीं चाची, बहुत खा लिया है, घर पर भी बना है। होली खेलने जाना है, चाचा कहाँ हैं।'
'अरे बेटा घर में हैं, उनकी तवियत थोड़ी ठीक नहीं है।'
'चाची! उन्हें बाहर भेजो, आज होली है।'
'बेटा, तुम्हे पता ही है वे होली के कितने शौक़ीन हैं।  ठीक होते तो खुद ही जाते।'
युवक जिद्द करने लगे। आवाज सुनकर मियां बाहर आ गए। वे सारी कहानी पहले ही समझ चुके थे।
साथ लेकर आये मुट्ठी भर गुलाल युवकों के ऊपर उड़ा दिया, फिर क्या था पूरी गली हो-हल्ले से गूँज गयी। एक उल्लास सा भर गया। लडके जिद्द करने लगे, चलो चाचा! टोली में हमारे साथ रंग खेलने। चाचा बोले, 'नहीं, तुम लोग जाओ, मैं थक जाऊंगा। मगर लड़कों ने एक न सुनी, ' चाचा! कौन सी रोज होली आती है। '
आवाज सुनकर, आसपास के और लडके निकल आये।  'चलो भाई, चाचा की होली की सवारी निकलेगी।  चाचा ने और अधिक आनाकानी नहीं की, और टोली के साथ चल दिए। गली में थोड़ा ही आगे निकले थे, नौबत का गदहा बंधा दिख गया। एक हुड़दंगी लड़का दौड़ा गया, और उसे खोल ले आया।
'चाचा! इस पर बैठ जाओ।'
चाचा भी पूरी तरह होली के जोश में आ चुके थे, और बड़े आराम से उस गधे पर बैठ गए। फिर तो लोग जुटते गए और चाचा का जुलुस बड़ा होता गया। ढोल, झाल भी टोली में शामिल हो गयी।
'केकरा हाथे कनक पिचकारी, केकरा हाथे अबीरा, होली खेलें रघुबीरा अवध में, होली खेलें रघुबीरा'
गीत गूंजने लगा।
जुलुस में संग बह रहे आनंद में खुद को भी बहा देने से, कोई नहीं रोक पा रहा था। चाचा का जुलुस देखकर, लग रहा था, जैसे किसी बहुत बड़े विजयी नेता का जुलुस जा रहा हो। किसी किसी के घर से कुछ खाने पीने का भी सामान आ जाता, चाचा गदहे पर बैठे ही खा पी लेते। गांव की गलियों से घूमता, जलूस पंचायत भवन के प्रांगण में एकत्रित हुआ। फिर तो पूरा प्रांगण एक रंगमंच बन गया। नाच गाने का सिलसिला चला, गुलाल उड़ा, गुजिया नमकीन चली, भंग छनी और आखिर में चाचा ने अपने शेरों से सबको चित्त कर दिया।
फगुआ के गान में लोग झूम उठे, और खामोशियों में चाचा के शेर दहाड़ते रहे। वहां उपस्थित हरेक जन चाहने लगा कि यह दिन समाप्त ही ना हो।
फगुआ के गीत जो नहीं सुना, वह संगीत का मजा क्या जान पाया। फिल्मो में तो एकाध ही होली के गीत होते हैं, होली के रोचक व संजीदगी भरे गीत तो लोक गीतों में ही सुनने को मिलते हैं।
कुछ लोगों को लग रहा था कि गदहे पर बिठा के चाचा के साथ ज्यादती हो रही है, पर चाचा इसका भरपूर आनंद ले रहे थे। और तो और पैदल नहीं चलना पड़ रहा था। उन्होंने यहाँ तक भी कह दिया -
'ससुराल वालों! तुमने फिर से मुझे घोड़ी पर बिठा दिया। घोड़ी पर ही घुमाओगे या दुल्हनिया भी दिलाओगे?'

तीसरे पहर तक जलसा चला,  गाने बजाने का दौर ख़त्म हुआ. खाने पीने का वहीँ अच्छा प्रबंध था। कुछ लोगों ने पैसे एकत्र कर, चाचा को कुर्ता पाजामा और चाची के लिए साड़ी तथा बचे हुए पैसे नकद देकर बिदाई की। चाचा को बड़े मान सम्मान के साथ उनके घर तक छोड़ा। चाचा अपने आदर और अपनेपन से गदगद हो गए। दिन की सारी थकान मिट गयी। उन्हें एक अनोखे मुहब्बत का एहसास हुआ। किसी को गधे पर बैठना अजीब लगे तो लगता रहे, चाचा को तो बड़ा आनंद आया और वे अपने इस क्रिया के कारण सैकड़ों लोगों को आनंदित देख, जीवन की एक बहुत बड़ी संतुष्टि को प्राप्त कर रहे थे।

उस जुलुस की कई दिनों तक चर्चा होती रही। जुलुस में सम्मिलित होने वाले को चलते फिरते जो भी मिल जाता, 'इस बार होली में, चाचा के जुलुस में थे कि नहीं!' सामने वाला गर्व भरी भरी मुस्कान फेंकता और बोल पड़ता, भई! बड़ा मजा आया। अब तो हर बार ही ऐसी होली होनी चाहिए।' जो नहीं शामिल हो पाया, अपनी किस्मत को कोसता, और जलसे की बातें सुनकर ही संतोष करता रहा।

अब तो यह सिलसिला ही चल पड़ा, हर होली को सुबह ही चाचा के दरवाजे पर गदहा खड़ा हो जाता, वे उस पर बैठ जाते और कारवां चल देता,  पीछे-पीछे छोटे, बड़े, बच्चे, बूढ़े व युवकों की टोली और बीच में ढोल मजीरा बजाती मंडली। ऐसा लगता कि वे दूल्हा बनकर घोड़ी पर बैठे हों, और पीछे पीछे उनकी बारात चल रही हो। शाम को उन्हें होली का तोहफा दिया जाता।
चाचा की होली की टोली में, जो एक बार शामिल हो जाता, वह सदैव के लिए उसका अभिन्न अंग बन जाता। उसे उस जुलुस के बिना होली नहीं भाती। कई बार, गांव वालों की कई रिश्तेदारियों से भी लोग, होली का पर्व मनाने वहां आ जाते।
अब तो वर्षों बीत चुके थे। गदहे पर सवार, दूल्हा बने चाचा की बारात, होली पर हर साल निकलती, और वे अपनी शादी की बारात को याद करके उसका भरपूर लुत्फ़ लेते। ढोल, झाल, नगाड़ा भी बजता बस मंगल गीत के स्थान पर होली गीत व फगुआ गाये जाते। 

आज होली का दिन है,
सुबह ही चाचा अपने काम से फारिक होकर, नमाज वगैरह पढ़कर, तैयार बैठ गए है। चाची भी गुलगुले बना चुकी है।
'ये लो गुलगुले खा लो, अभी गरम हैं।'
'अभी नहीं, मेरा शाम के लिए रख दो।  घर पर ही सब खा लूंगा, तो टोली में क्या खाऊंगा!'
चाचा अब होली की टोली का इन्तजार करते दोपहर होने को आ गयी, मगर उन्हें होली के लिए बुलाने अभी तक  कोई नहीं आया। धीरे धीरे चाचा का मन व्याकुल होने लगा, और भांति भांति की आशंकाओं से भर गया। लगता है, पिछली होली में कोई गलती हो गयी। वे याद करने लगे, परन्तु ऐसा कुछ नहीं दिख रहा था। उनका दिल उदास और हताश होता जा रहा था।
तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, चाचा ने लपक कर खोला।
पडोसी की लड़की बोली, 'चाची कहाँ हैं? माँ ने सेवई बनाने वाली मशीन माँगा है।'
चाचा मुंह बनाकर अपने स्थान पर लौट आये। 'चाची अंदर हैं, चली जाओ।'
जरा सी भी आहट होती, चाचा दरवाजे की ओर झांक लेते। कई बार तो दरवाजा खोलकर बाहर देखा भी, मगर ना गदहा ना ही कोई आदमी। बारह से ऊपर हो गए, मगर कोई नहीं आया। चाचा मायूस हो चुके थे। अब उनकी चिंता विस्वास में बदलने लगी थी, अवश्य ही कोई न कोई गलती हुई है, जिसके कारण, गांव के लोग मुझसे नाराज हो गए हैं। हंसी मजाक तो सबसे करते ही रहते थे, कहीं किसी को कोई अभद्र बात तो नहीं कह दिया! आखिर इस बार, कोई क्यों नहीं आया। भांति भांति की भ्रान्ति मन में आने लगी। यदि उन्हें पता चले क्या त्रुटि हुई  है तो क्षमा मांगने में तनिक भी देर नहीं लगाएंगे।
दोपहर होने तक, वे इस कदर उदास हो गये कि चाची के मायके जाने पर भी, कभी इतना उदास नहीं हुए होंगे।  अभी तक कुछ खाया पिया भी नहीं था। चूकि जगह- जगह गुजिया, पुआ, पकौड़े खाना पड़ता, वे बिना खाए ही घर से निकलते। इंतजार करते पहर लटक गयी, तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। अब तो, चाचा का द्वार की ओर देखने को भी मन भी नहीं हो रहा था।
'चाची बोली देखो जी! कोई है। '
'कोई नहीं है, हवा होगी।'
खटखटाने की फिर आवाज आई, चाची उठकर दरवाजा खोली -
अरे बेटा! आज कहाँ रह गये तुम लोग? देखो, तुम्हारे चाचा कैसे मुंह लटका के बैठे हैं, लग रहा है मातम छा गया है। अब तक होली नहीं खेली, लग रहा है इनका सब कुछ लुट गया है।'
'चाची, क्या करें! चाचा के लिए सवारी का बंदोबस्त नहीं हो पाया। गांव तो गांव, दूसरे गांव तक भी हम गये पर कोई गदहा नहीं मिला। मुंह माँगा किराया देने को तैयार थे। नौबत के मरने के बाद. उनके लड़के ने अपना काम बदल लिया, और 'भोलू' को बेच दिया। अब तो हम सब मिल कर, चाचा को अपने कंधे पर घुमाएंगे।'
अब था कि भोलू के बिना, चाचा जाने को तैयार नहीं थे। अब तक उनका मन वैसे ही टूट चुका था। बड़ी मिन्नत करने पर चाचा चले तो, मगर पैदल ही। लग ही नहीं रहा था कि यह चाचा की होली की टोली है। टोली में न तो वो रौनक थी, न ही झाल-मजीरे में वो तान। चाचा का जुलुस आगे बढ़ तो रहा था, मगर किसी को मजा नहीं आ रहा था। उनके जुलुस की जान तो 'भोलू' ही था, उसके साथ चाचा की जोड़ी जमती थी। आज वे अधूरे लग रहे थे। एक तो वैसे ही वक्त ज्यादा हो चुका था, ऊपर से लोग भी मुरझाये से लग रहे थे। यह किसी उत्सव का जुलुस नहीं लग रहा था, बल्कि लग रहा था जैसे कोई मय्यत जा रही हो।
जुलुस थोड़ा और आगे बढ़ा ही था कि एक हुड़दंगी लड़के को करन का तांगा दिख गया। तांगा दो साल से एक ही जगह पड़ा, मरम्मत का इंतजार कर रहा था। करन के पास उसके मरम्मत का इंतजाम नहीं हो पा रहा था। फिर क्या था, दो तीन लडके लपके और उसे ही खिंच लाये, अब चाचा का उस पर बिठा दिया गया। होली की टोली का काम कुछ आसान हो गया और चाचा भी थकान से बच गए। चाचा की रथ यात्रा चल पड़ी।  इस बार समय कम रह जाने के कारण, उतनी अधिक रौनक तो नहीं रह गयी थी, मगर चाचा के लिए आने वाली होलियों के लिए रथ का इंतजाम हो गया था।

चाचा आशिक अली, अब तो नहीं रहे; मगर उनके साथ जिये लोगों को, होली चाहे भूल जायं, चाचा को भूल पाना असंभव है।

(C) एस० डी० तिवारी    

Saturday, 28 March 2015

Bachche ki pooja


बच्चे की पूजा

दादा को आये दो महीने बीत चुके थे। चार साल का सचिन दादा से घुल मिल गया था। जब वह शिशु सदन से आता तो दादा से इंडिया की बातें करता और सुन कर बड़ा रोमांचित होता। दादा प्रातः नहा धो कर पूजा पर बैठते तो वह भी साथ बैठ जाता। विजय ने घर में पूजा के लिए अलग स्थान बना रखा था। सचिन को पूजा स्थल पर रखे, सभी देवताओं की पहचान भली भांति थी। दादा को सबके नाम बताता रहता, ये गणेश भगवान हैं, ये शंकर भगवान हैं, ये हनुमान जी हैं; तो दादा और चित्रों को दिखाकर पूछ लेते, ये कौन हैं? वो भी बता देता। तुम्हें कौन से भगवान सबसे अच्छे लगते हैं ? 'हनुमान जी। '
'हनुमान जी क्यों ?'
'वो सुपरमैन से भी ताकत वाले हैं और भगवन जी हैं। '
एक दिन दादा जी पूजा आरम्भ किये ही थे कि वह भी साथ बैठ गया और बड़ी उत्सुकता से पूजा की एक एक बात पूछने लगा।
'दीप क्यों जला रहे हैं ?'
'इससे भगवान् प्रसन्न होते हैं। '
जब अगरबत्ती जलाने लगते तो 'व्हाट आर यू डूइंग बाबा, यू आर गोइंग टु ब्रेथ द स्मोक (ये क्या कर रहे हैं बाबा, सांसों में धुंआ जायेगा)'
'हाँ, पर भगवान जी को सुगंध अच्छा लगता है। '
'ओ. के. (ठीक), पर स्मोक से तो अलार्म बज जायेगा और फायर वाले आ जायेंगे। '
दादा छत की ओर देखते हैं तो स्मोक डिटेक्टर (धुआं सूचक यन्त्र) लगा हुआ है। 'नीलम देखो तो बेटा, जरा इसे बंद कर दो। '
नीलम सारी खिड़कियां खोल देती है और एग्जॉस्ट चला देती है। 'ठीक है इतने से नहीं बोलेगा। '
'बाबा, पूजा से क्या होता है ?'
'भगवान जी खुश होते हैं, बुद्धि देते हैं, तुम भी हाथ जोड़ कर प्रार्थना करो और बुद्धि मांगो।'

सचिन ने नवरात्रों में बाबा को दुर्गा शप्तशती का पाठ करते देखा। उसे भी उत्सुकता होती कि वह किताब पढ़े, किताब में झांकता तो कोई चित्र आदि नहीं देख पीछे हट जाता। एक दिन नीलम खड़े खड़े ही पूजा स्थान पर दीप  जलाकर, हाथ जोड़े प्रार्थना कर रही थी। सचिन मम्मी का कुर्ता खींच कर कहने लगा - 'मम्मी वैसे करो जैसे बाबा करते है। '
'बाबा कैसे करते हैं ?'
'किताब से।'
'नहीं वैसे बड़े लोग करते हैं ' कह कर बात को टाला। सचिन जिद्द करने लगा नहीं किताब पढ़ो और मुझे भी पढ़ना सिखाओ। '
नीलम चक्कर में पड़ी, उसे मन ही मन हंसी भी आ रही थी।  दुर्गा शप्तशती आज तक तो कभी पढ़ी नहीं तो वह बच्चे को कैसे समझाए।  'अभी बाबा टहलने गए हैं। आएंगे तो तुम बाबा के साथ पढ़ लेना। '
बाबा के आते ही सचिन जोर से उन्हें पकड़ लिया। 'बाबा बाबा मुझे पूजा करनी है। '
'मम्मी के साथ कर लो।'
'नहीं आप के साथ करनी है, किताब से। '
यह सुनकर दादा गदगद हो गए, 'अच्छा ठीक है, जब मैं  करूंगा तो मेरे साथ कर लेना। '
दादा जी नीलम से कह रहे थे कि पार्क की ओर गया था, कहीं फूल नहीं दिखा। सचिन तपाक से बोला, 'मेरे शिशु सदन के लान में बहुत से फूल हैं, मगर मैडम बोलती हैं फूल तोड़ना गलत है। '
अगले दिन सचिन शिशु सदन से एक गुलाब का फूल लेकर आया और दादा जी को दे दिया। दादा जी चौंके, यह क्या? क्यों तोड़ लाये ? तुम्ही कह रहे थे न फूल तोड़ना गलत है। '
'बट आई आस्कड मैडम, टोल्ड हर आई नीड अ फ्लावर फॉर माय ग्रैंडपा एंड शी गेव वन' (मैंने मैडम से बोला, मेरे बाबा को फूल चाहिए तो उन्होंने तोड़कर ये दे दिया।) 
कुछ दिनों में दादाजी ने श्री दुर्गा शप्तशती का मुख्य मंत्र व गायत्री मंत्र सचिन को सिखा दिया। सचिन का जन्म अमेरिका में ही हुआ था अतः वह विदेशी नागरिक हो गया था। दादा जी उसे अपने ये मंत्र सिखाकर बड़े गौरवान्वित अनुभव कर रहे थे। विजय और नीलम भी जब किसी भारतीय के यहाँ जाते या कोई उनके यहाँ आता तो वे सचिन को गायत्री मंत्र सुनाने को अवश्य कहते और सचिन स्पष्ट व शुद्ध उच्चारण के साथ मंत्र सुना देता तो वे सभी चंभित होते और मम्मी पापा गर्वित।   

फूल 

Videshi bahu

विदेशी बहू

पीटर को इंडिया से आये चार पांच वर्ष हो चुके थे। मोना उसके ऑफिस में ही काम करती थी। दोनों की सीट अगल बगल थी, अतः प्रायः आपस में बात होती रहती थी। पीटर जब काम में कहीं अटकता तो मोना उसकी मदद कर दिया करती। पीटर जब अपने लिए काफी लाता तो मोना के लिए भी ले आता। दोनों ही अक्सर काफी साथ पिया करते। धीरे धीरे दोनों में अच्छी दोस्ती हो गयी। पीटर गोर रंग का मोहा तो इन्डिया से ही लेकर गया था, मोना के रंग रूप पर मुग्ध था। भाग्य वश गोरी अंगरेजन उसके बगल में ही बैठती थी, मोना को वह मन ही मन प्यार करने लगा। पीटर के मन में कई बार आया कि वह उससे कहा दे, 'आई लव यू। ' किन्तु  उसके मन में डर भी था कि मोना उसके काला होने के कारण ना न कर दे।  मोना तो गोरी चिट्टी लड़की थी, भला वह काले को क्यों चाहती।  यह सब उधेड़ बुन करते महीनों बीत गए। मोना धीरे धीरे, पीटर के दिल में उतरती जा रही थी। एक बार पीटर ने सोचा, मोना से 'आयी लव यू' बोल देना ही उचित रहेगा। क्या होगा, अधिक से अधिक ना ही तो कर देगी, नहीं कहने से भी 'ना' ही है। अगर बात बन गयी तो गोरी अपनी। एक दिन पीटर ने मोना से कहा, 'चलो आज पैंट्री में काफी पीते हैं। '
मोना 'गुड आईडिया' कहकर साथ चल दी।
पैंट्री में जाकर पीटर काफी बनाने लगा। 'मोना तुम क्या लोगी कपचीनो या मौका?'
'आई लव मौका। '
'एंड आई लव यू। '
 पीटर के मुंह से यह कैसे निकल गया, यह उसे समझ ही नहीं आया।
  मोना को इस बात से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस बात का अनुमान तो उसे पहले से ही था। उसने भी मन में सोच रखा था, यहां की सारी लड़कियां गोरों के पीछे ही भागती हैं, उनसे वह कुछ अलग करेगी। उठने किताबों में पढ़ रखा था काले लोग दृढ इच्छा शक्ति के होते हैं और उनके शरीर की रोग रोधक क्षमता अधिक होती है । पीटर काला था तो क्या! उसका व्यक्तित्व आकर्षक था, और ऊपर से इंडियन। मोना को पता था इंडियन लोग परिवार के लिए समर्पित होते हैं और पति के रूप में उन पर पूरा विस्वास किया जा सकता है। उसने भी बिना और सोचे, 'आई लव यू टू' कहकर, पीटर के होंठ चूम ली।  बस फिर क्या था, अब तो काम के बाद मिलना जुलना और साथ घूमना फिरना शुरू हो गया।

पीटर ने सोचा अब तो अमेरिका में ही रहना है, धर्म भी दोनों का एक ही है, मोना से शादी करने में कोई हर्ज नहीं। मोना के गोरी और स्मार्ट लड़की होने के कारण, पीटर उस पर मरता था। अब तो खुद के काला होने के कारण, मोना द्वारा तिरस्कृति होने का डर निकल चुका था। एक बार उसके मन में विचार आया, इन अंग्रेज लोगों से बिना शादी के भी साथ में समय बिताते रहो कोई अंतर तो पड़ता नहीं, एक बार अपने भारतीय मित्रों से बात कर ले तो अच्छा रहेगा। एक दिन अपने मन की बात उसने नितिन से कर दी। नितिन ने मोना को कभी देखा नहीं था, उसने बताया कि मोना के व्यवहार और विवेक के बारे में उसे कुछ पता नहीं, फिर भी इंडिया से विवाह करके इंडियन बहू लाये तो अच्छा है। वहां की लड़कियां संस्कारी होती हैं। इंडियन पत्नी जितनी समर्पित रहेगी, अमेरिका की लड़की नहीं होगी। वह कब तक साथ रहे, कब पिनक कर तलाक ले ले, कोई गारंटी नहीं। मगर पीटर तो मोना के रंग का दीवाना हो चुका था। उसने सलाह ले भर ली, करना तो उसे अपने मन का ही था। उसने नितिन की बात पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया और एक दिन मोना से शादी का प्रस्ताव रख दिया। मोना को भी हाँ करने में कोई भी हिचक नहीं हुई। दोनों ने एक चर्च में शादी कर ली, और रजिस्टर करा लिया। दोनों को साथ रहना, बड़ा अच्छा लगा। कई मामलों में दोनों की खूब पटती थी। पब और क्लब दोनों को ही रास आ रहा था, इसके अलावा डांस के भी दोनों शौक़ीन थे । 

पीटर बड़ा मिलनसार लड़का था, उसके कई इंडियन मित्र थे, जो पीटर के यहाँ मिलने जुलने आते थे। मोना को उसके यहाँ किसी इंडियन का आना, ज्यादा पसन्द नहीं आता। हां, कहीं बाहर घूमने फिरने चलो तो कोई बात नहीं। किसी के आने पर कुछ जलपान की व्यवस्था करना तो उसे बहुत बड़ा भार लगता। अधिकतर काम पीटर को ही करना पड़ता। पीटर पहले कभी कभी, घर पर भारतीय व्यंजन बना लेता था, परन्तु अब घूमने फिरने के कारण समय कम मिल पाता। भारतीय व्यंजन का स्वाद, बस इंडियन रेस्टोरेंट में ही जाकर मिलता। घर पर खाने के लिए रेडीमेड ही होता, पिज्जा, बर्गर, सौसेज या होट डॉग। मोना खाना पकाने के नाम पर  केवल  माइक्रोवेव या फिर चूल्हे पर, बना बनाया खाना गरम करना जानती थी। अंडे का ऑमलेट उसे बहुत पसंद था, वो पीटर को ही बनाकर खिलाना पड़ता।

धीरे धीरे समय बीता, एक बार पीटर, अपनी मम्मी को अमेरिका ले आया। सोचा कुछ समय वो रहेंगी तो घर का इंडियन खाना, खाने को मिलेगा और एकाध चीज बनाना, मोना भी सीख लेगी। मां के आने से, पीटर के मन में ख़ुशी भर गयी। काम से आते ही, मां कुछ न कुछ देशी नाश्ता बना कर रखती। माँ के हाथ का देशी स्वाद, पीटर को आनंद से भर देता। मोना को एकाध चीजें पसंद आतीं, वरना वही पाई, सौसेज और हॉट डॉग।

सास बहू का ताल मेल बैठना तो मुश्किल था ही। मोना को भारतीय भाषा बिलकुल भी नहीं आती थी और पीटर की माँ को बस टूटी फूटी अंग्रेजी ही आती थी। कई बार बातों को वे कुछ का कुछ समझ लेतीं, फिर यदि पीटर वहां होता तो समझाता, वरना जो समझ आता वही करतीं। एक बार पीटर की माँ अगले दिन एक पार्टी में जाने के लिए गिफ्ट पैक कर रही थीं, तभी मोना वहां आ गयी और ध्यान से देखने लगी। पीटर की माँ ने अपने साथ शामिल करने के लिए कहा, 'ओपन द टेप।' मोना गई बाथ टब का नल खोल आयी। वह समझी शायद ये टब में नहायेंगी। पीटर की माँ सारी बात समझ गयीं, वो टॉयलेट जाने के बहाने जाकर बंद कर आयीं। फिर मोना ने खाने का इशारा करते हुए पूछा, 'माँ हॉट डॉग।' पीटर की माँ ने उत्तर दिया, 'तुम्हीं लोगों को मुबारक हो। बताओ गोर डॉग भी नहीं छोड़ते।'  

विवाह के अभी छः महीने ही बीते थे, मोना के व्यव्हार में बहुत परिवर्तन आ चुका था। वह पीटर को अपनी माँ को प्यार और इतना सम्मान करते देखती तो उसे लगता कि उसकी माँ का भी ऐसे ही सम्मान होना चाहिए। पीटर की माँ को वहां के ठण्ड के बारे में अनुमान नहीं था, इसलिए वह गर्म कपड़े, कोई खाई नहीं ले गयी थी।पीटर ने माँ के लिए वहां के मौसम के हिसाब से गरम कपड़े वगैरह खरीद दिया। मोना बोली  'मेरी माँ के लिए तो कभी ये सब खरीदा नहीं, केवल अपनी माँ लिए ही  खरीद रहे हो।' तब पीटर ने मुश्किल से समझाया, 'तुम्हारी माँ के पास तो ये सब है ही। इंडिया में इतनी ठण्ड नहीं पड़ती, इसलिए लोग ज्यादा गरम कपडे नहीं रखते।'

मोना को तो रेडी मेड खाना पसंद आता, लेकिन पीटर की मम्मी को वहां का खाना पसंद नहीं था। वे इंडियन खाना बनातीं तो बर्तन अधिक जूठे होते, जिन्हे साफ करने को मोना तैयार नहीं होती। बेचारी बूढी माँ को ही साफ करना पड़ता। पीटर कभी कभी मदद करा देता या डिश वाशर का प्रयोग करता। घर की सफाई में भी वही झंझट होता, मोना तो वैक्यूम क्लीनर से घर साफ़ करती, पीटर की मम्मी ने एक बार सोचा कि सैनिटाइजर छिड़क कर  पोंछा लगा दे, ताकि फर्श कीटाणुरहित हो जाय और चिपके हुए धूल के कण भी निकल जाएँ। पोंछा लगाकर, साबुन से हाथ धोयी और फिर खाना परोस दिया। मोना ने वह खाना खाया ही नहीं। वह अपने लिए अलग इंतजाम करने लगी। जब पीटर ने पूछा, 'आखिर क्या बात है? तुम तो यह डिश पसंद से खाती हो। '
वह बोली, 'ओल्ड मदर ने हाथों में बिना ग्लोब्स (दस्ताने) पहने ही पोंछा लगाया था और उसी हाथ से खाना सर्व किया (परोसा)।'
'धो तो लिया था। '
'नो, नो; ग्लोब्स नहीं लगाया था।  उसके हाथ में जर्म्स होंगे।'

पीटर की माँ सोचतीं, अगर इसका यही रवैया रहा तो पोता, पोती होने पर हाथ भी नहीं लगाने देगी। उनको हम खिलाएंगे कैसे !

पीटर की मम्मी जब छौंक या तड़का लगातीं तो मोना परेशान हो जाती। उसे छौंक का उठा धुआं बिल्कुल भी बर्दास्त नहीं होता। छींक से उसकी हालत खराब हो जाती और अंग्रेजी में बुदबुदाने लगती।

कभी कभी शाम को पीटर और मोना पब वगैरह चले जाते; और कभी ऐसा भी होता कि मोना घर में ही बियर खोल कर बैठ जाती और खीरा, छुरी पीटर की माँ को पकड़ा देती, 'मदर सलाद'। यह सब पीटर की माँ को अच्छा तो नहीं लगता पर कर भी क्या सकती थी। अमेरिका में रहना है तो सब करना ही पड़ेगा। कुछ ही दिनों में वह ददुःखी हो गयी।

एक दिन पीटर की माँ के सिर में दर्द हो रहा था। उसने पीटर को बता दिया। पीटर बोला, 'लाओ पहले सिर में तेल लगा देता हूँ, फिर दवाई का इंतजाम करता हूँ।' पीटर तेल लेकर माँ के सिर में मालिश करने लगा। मोना ने पूछा, 'ये क्या कर रहे हो ?'
पीटर ने बताया 'मसाज, तेल मालिश।'
'मसाज सेंटर क्यों नहीं ले जाते? ओ. के. मसाज भी करते हो ! मेरा और मेरी मां का तो कभी नहीं किया। '

धीरे धीरे, दोनों में बात बात पर नोक झोंक होने लगी और आपस की खट-पट बढ़ती गयी, और नौबत यह आ गयी कि मोना अपने माँ बाप के यहाँ चली गयी। अब पीटर का भी गोरी चमड़ी से मोह भंग हो चुका था। फिर भी फोन करके मोना को एडजस्ट करने के लिए बहुत समझाया, पर सब बेकार। मोना इंडियन माहौल से सामंजस्य नहीं रख पा रही थी। पीटर को भी मोना से विवाह करके गोरी चमड़ी के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला। मोना जब मन होता अपने माँ बाप के यहाँ चली जाती और पीटर व उसकी माँ घर अकेले रह जाते। पीटर की माँ को तो उसके जाने से अच्छा ही लगता, कम से कम घर में शांति तो हो जाती। पीटर के पास अब एक ही विकल्प था 'तलाक'। 
दोनों की खटपट की बात जब भारतीय मित्रों को चली तो वो भी बहुत दुखी हुए। नितिन ने कहा, पहले ही समझाया था पर यही गोरी चमड़ी का दीवाना था। कितना भी ये गोर भेद भाव तो रखते ही हैं। अब हो भी क्या सकता था। पीटर ने मन बनाया मोना को तलाक करके इंडिया से दूसरी दुल्हन लाये। यह सब सोचकर उसने तलाक का अनुरोध पत्र दाखिल कर दिया। मोना भी कौन सी कम थी, हर्जाने के रूप में उसने एक भारी भरकम राशि की मांग रख दी तो पीटर के होश उड़ गए। फिर भी जिंदगी की शांति से वह रकम देनी उसे सस्ती लग रही थी। आपसी बातचीत और कोर्ट की मध्यस्थता से समझौता हुआ तथा पीटर और मोना का तलाक हो गया।  

कुछ महीनों में पीटर की मां का वीसा समाप्त हुआ और वह वापस इंडिया आ गयी। बेचारे पीटर को फिर से अब अकेले समय बिताना था। अब उसने ठान लिया था, बेशक कुंआरा रह जाय किन्तु गोरी यानी अंग्रेजन से शादी नहीं करेगा। दो वर्ष अकेले काटने के बाद जब वह इंडिया आया तो उसकी में ने भारतीय परिवारों के तौर तरीकों से चलने वाली व्यवहार कुशल बहू पहले ही तलाश रखी थी। पीटर उसके साथ विवाह करके अमेरिका ले गया। उसके साथ पीटर चैन की जिंदगी जीने लगा। अब उसकी मां को भी अमेरिका आने जाने में कोई परेशानी नहीं थी।