मम्मी की डायरी
अंजलि अब बड़ी हो गयी थी। बचपन से ही अपनी माँ को संघर्ष करते और पापा को पीकर लड़ते देखा था। कुन्ती ने जीवन में इतना कुछ सहा, सोच कर अंजलि का मन करुणा से भर जाता। किशनपाल अपनी कमाई का एक हिस्सा तो पीने में ही उड़ा देता। वह जो कुछ कुंती को देता, उसमें शौक पूरा करना तो संभव नहीं था, पर घर का काम काज चल जाता। जीवन की अनेकों विसंगतियां सह कर भी, कुंती अपने घर को बड़े सुव्यवस्थित ढंग से चला रही थी। उसके मन में बस यही था कि अंजलि पढ़ लिख जाय, और अपने पैरों पर खड़ी हो जाय तो उसके सभी कष्ट दूर हो जायेंगे। खुद तो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, पर बेटी को पढ़ाने का भरपूर जज्बा था। वह अंजलि को पूरा प्यार देती और सही मार्ग पर चलने की नसीहत। वह बेटी की जिंदगी में किसी प्रकार का दुःख नहीं आने देगी, मन में संकल्प लिये थी।
मम्मी की संघर्ष भरी जिंदगी देख कर, अंजलि के मन में जिज्ञासा रहती कि वह एक दिन पढ़ लिख कर, कुछ बनेगी, और मम्मी की शेष जिंदगी खुशहाल बनाने में हर संभव मदद करेगी। धीरे धीरे अंजलि बड़ी हो गयी, और उसका ग्रेजुएशन पूरा हो गया। अपना खर्च वह स्वयं निकाल ले और माँ के हाथ में कुछ पैसा आये, सोचकर, दो तीन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी।
एक दिन अंजलि घर में अकेली थी। वह अलमारी में अपना कुछ सामान ढूंढ रही थी, तभी उसके हाथ एक डायरी लगी। समय था ही, वह बैठ कर उसे पढ़ने में लग गयी। डायरी में जो कहानी लिखी थी, उसे बहुत रोचक लगी, जिस कारण उसे पूरा पढ़ने का मन हो चला। कहानी के करुण प्रसंग पढ़कर, कई बार अंजलि की आँखों से आंसू छलक आये।
'एक गांव की लड़की, जिसका गरीबी के कारण बेमेल विवाह हो गया। दूल्हे की उम्र पिता के बराबर की थी। जब कुंती को पता चला कि लड़का एक विधुर है और सिर पर आधे बाल हैं तो वह दबी जबान से अपनी माँ से पूछी कि और कोई लड़का नहीं है क्या, माँ? माँ ने समझाया कि लडके हैं तो दहेज़ कहाँ से लाएंगे। आजकल लडके वालों का कितना मुंह खुला हुआ है; समझते हैं कि लड़की वालों के घर, पेड़ पर पैसा उगता है। देवदत्त भी क्या बुरा है, अच्छा कमा लेता है। खाली उम्र ही तो कुछ ज्यादा है, रुपये पैसे की तुझे तंगी नहीं होगी .... । धीरे धीरे, वह दिन आ गया जब द्वार पर बारात आई। औरतों में कानाफूसी हो रही थी, लड़का ठीक तो है पर उम्रदराज है। सुनकर कुंती की छाती पर साँप लोट जाता। वह खिड़की से झांक कर देखने का प्रयत्न करती, पर भीड़ में घिरे होने के कारण लडके तक नजर नहीं पहुँच पाती। कई बार तो मन में आता, जाकर सीधे कह दे, मुझे यह विवाह नहीं करना। किन्तु माँ बाप के मान मर्यादा का ख्याल मन में रख कर, हिम्मत नहीं जुटा सकी। शादी हो गयी। जिस बात का डर था, वही हुआ। अधेड़ उम्र के मर्द से विवाह कर, कुंती वैवाहिक सुख से वंचित रहने लगी। अधिक उम्र होने के कारण देवदत्त का घूमने फिरने का शौक भी मर गया था। वह तो बस उसकी नौकरानी बन कर रह गयी थी।
इस बीच पड़ोस की एक हम-उम्र लड़की सुमित्रा से कुंती की मित्रता हो गयी। सुमित्रा कुंती के यहाँ आती जाती, उससे बातों में जी लग जाता। एक बार कुंती ने सुमित्रा को केक बनाना सिखाया। सुमित्रा ने जब केक बनाने का अभ्यास किया तो थोड़ा सा केक, चखने के लिए अपने भाई मदन के हाथों, कुंती के पास भिजवा दिया। मदन जब कुंती को देखा तो देखता रह गया। कुंती की सुंदरता थी ही ऐसी। यह तो उसकी बदकिस्मती थी कि माँ बाप गरीबी का अभिशाप लिए, अच्छी शादी का प्रयास ही नहीं किये। अन्यथा कोई भी युवक उसे एक बार देख कर शादी के लिये ना, नहीं कर सकता था। अब तो मदन किसी न किसी बहाने कुंती के यहाँ आने जाने लगा। कुंती को भी उससे बात कर बड़ा शकुन मिलता। एक दिन मदन ने कुंती से बोल दिया 'आई लव यू'। कुंती के दिल में तो तूफान सा आ गया। जिस मान मर्यादा को लेकर वह अधेड़ से शादी की, अब क्या पति के रहते किसी से प्यार करके उसे मिटा देगी। उस समय तो वह अवाक् रह गयी। पर मदन की बात उसके मन को उद्वेलित करती रही। यह बात उसे मरुभूमि में हरियाली सी लग रही थी। अब तो दिन-रात, सोते-जागते, उसके मन में मदन की बात गूंजती रही। धीरे धीरे उसने मन बना लिया कि आखिर जीवन जीना है तो इतना घुटन क्यों सहे। अगली बार मदन कुंती के लिए उपहार लेकर आया तो कुंती ने उसे स्वीकार कर लिया। धीरे धीरे दोनों का मिलना जुलना प्यार में बदलने लगा।
एक दिन मदन कुंती के यहाँ गया तो वह घर में अकेली थी। देवदत्त कहीं बाहर गया हुआ था। अब तक मदन उस पर अपना अधिकार समझने लगा था। वह उसे पकड़ कर गले से लगाना चाहा, पर कुंती तब तक सम्हल चुकी थी, उसे एहसास हो चुका था कि वह किसी की पत्नी है। अपने मन के दोनों के पक्ष के द्वन्द पर निर्णय लेने के लिए उसे स्वयं ही न्यायाधीश बनना था। एक ओर जिंदगी का प्रश्न तो दूसरी ओर मर्यादा। उसने मदन से बोला, मैं अपने पति को छोड़ देती हूँ, चलो विवाह कर लेते हैं। मदन ने झट पल्ला झाड़ लिया, 'तुम तो विवाहित हो।'
'तो, यह पहले पता नहीं था? प्यार का ढोंग क्यों रच रहे थे? '
अब मदन के ख्वाबों का किला ढह चुका था। उसके बाद कुंती के यहाँ आना जाना छोड़ दिया।
कुंती तो देवदत्त के पास एक सेवादार के रूप में जीवन बिता रही थी। उसे विवाह का तनिक भी सुख नहीं मिला, जिंदगी घुटन भरी लग रही थी। जीवन के दो साल शून्य में बीत चुके थे। पर अब कुंती की सहनशक्ति बोल चुकी थी। उसके भीतर छुपी नारी जाग गयी और एक दिन जब देवदत्त काम पर गया था तो वह अदम्य साहस का परिचय देते हुए, एक पत्र लिखकर, उसके विस्तर पर रख दी। और ससुराल छोड़ कर अपने पिता के घर आ गयी। पहले तो माँ बाप ने समझाया कि बेटी विवाह के बाद लड़की का घर ससुराल होता है। तुझे इस तरह नहीं आना चाहिए था। पर कुंती अब दुनिया के प्रपंच जान चुकी थी। उसने अपनी माँ से पूछ लिया अगर मजदूरी ही करनी है तो किसी की बंधुआ मजदूर बनकर क्यों ? मैं यहीं रहकर कुछ काम कर लूंगी, तेरी भी मदद करुँगी। कुंती की बात उन्हें समझ आ गयी, और वह अपने माँ बाप के साथ रहने लगी।
कुछ ही समय बीता था, दूर की रिश्तेदारी के मोहन लाल, कुंती के घर आये हुए थे। उन्हें एकाएक याद आ गया कि उनके गांव का किशनपाल अभी तक अविवाहित है और मोहनलाल के कहे को टालेगा नहीं। वह कुंती के लिए योग्य वर रहेगा। किशनपाल का गांव में खेत वगैरह तो कुछ खास नहीं है, पर वह शहर में रहता है और ठीक ठाक कमा लेता है। सारी स्थिति को समझते हुए मोहन लाल ने, किशनपाल से विवाह की बात चला दी। कुंती के पास सुंदरता की संपत्ति तो थी ही, एक नजर डालने के बाद किसी को भी ना करना असंभव था। मोहनलाल ने किशनपाल से विवाह करवा दिया। कुंती उसे पाकर बहुत प्रसन्न थी। सुमित एक खूबसूरत नौजवान था और कुंती को बहुत प्यार करता। कुंती ने जो साहस दिखाया उसे उसका प्रतिफल मिल गया। सुमित कमा तो ठीक ठाक लेता था, पर उसे कुछ ऐसे लोगों की संगति मिल गयी कि कभी कभी शराब भी पी लेता। किशनपाल कभी कभार पीता था, पर अपनी जिम्मेदारियों पर आंच नहीं आने देता था। वह कुंती को बहुत प्यार करता व उसका भरपूर ख्याल भी। कुंती उसके साथ प्रसन्न रहने लगी।
शादी के पश्चात् सुन्दर सी लड़की पैदा हो गयी। अब कुंती को जिंदगी का कारण और सहारा, बेटी के रूप में दोनों ही मिल गए थे। अपनी जिंदगी से अब वह पूर्णतया संतुष्ट थी, उसे और कुछ भी नहीं चाहिए था। उसकी बस यही चाह थी कि बेटी को खूब प्यार दे और पढाये लिखाये। एक बार फिर समय ने करवट बदला। कई वर्षों बाद, मदन फिर से प्रकट हो गया। पता नहीं कहाँ से मदन को कुंती का फ़ोन नंबर मिल गया था। फोन पर कुंती से प्यार की बात फिर से दोहराने लगा, और दोस्ती का हाथ बढ़ने लगा। उसे लगा कि किशनपाल शराब पीता है तो कुंती उससे घृणा करती होगी जिसे वह उससे दोस्ती करने के अवसर के रूप में देख रहा था। अबकी भी, कुंती ने अपने पांव लड़खड़ाने नहीं दिया और दो टूक शब्दों में उसे कह दिया, 'अब इस गली में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है, यहाँ किसी और का घर बन चुका है।'
कुंती एक बार फिर अपने अतीत को देखती है, एक तो बीबी बनाकर नौकरानी का काम लेना चाहता था, दूसरा प्यार का ढोंग रचकर साथ समय बिताने के चक्कर में। निर्धन होना कितना बड़ा अभिशाप है। थोड़ा और पढ़ लिख गयी होती तो इतना कुछ नहीं देखना पड़ता। फिर भी ईश्वर का दिया विवेक तो है न, संयम और साहस से भी बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है । किशनपाल कभी-कभी बेशक पी लेता है, पर प्यार तो करता है न, और परिवार की जिम्मेदारी भी निभा रहा है। नशा करता है फिर भी वह मेरे बारे में सोचता है, परिवार के बारे में सोचता है, अंजलि से कितना प्यार करता है। मुझे तो इसने एक नयी जिंदगी दे दी, वरना एक नौकरानी बन कर ही रह जाती।
यह करुण गाथा पढ़कर, अंजलि के आँखों से आंसू नीचे की ओर ढुलक ही रहे थे कि बाहर से कुंती आ गयी। अंजलि के हाथ में डायरी और ऑंखें नम देख कर, वह चौंक गयी। झट से, उसके हाथ से डायरी छीन ली।
'यह तुझे कहाँ से मिली। '
'अलमारी में '
'चल छोड़, खाना वगैरह बनाने की तैयारी करते हैं।'
'मम्मी कहीं यह आपकी कहानी तो नहीं?' अंजलि ने पूछ लिया।
वैसे अंजलि को आभास तो होता था कि कुंती दिल में कोई गहरी पीड़ा रखे हुए है, पर उसे वास्तविक कहानी का पता नहीं था। बार बार हठ करने पर कुंती सच बोलने से अपने को रोक न सकी। फिर तो दोनों की आँखों से गंगा यमुना की धार बह निकली।
'माँ जीवन में तूने कितनी व्यथा सही, और हमारे ऊपर आंच तक नहीं आने दी ! तू धन्य है, माँ।'
एस० डी० तिवारी
अंजलि अब बड़ी हो गयी थी। बचपन से ही अपनी माँ को संघर्ष करते और पापा को पीकर लड़ते देखा था। कुन्ती ने जीवन में इतना कुछ सहा, सोच कर अंजलि का मन करुणा से भर जाता। किशनपाल अपनी कमाई का एक हिस्सा तो पीने में ही उड़ा देता। वह जो कुछ कुंती को देता, उसमें शौक पूरा करना तो संभव नहीं था, पर घर का काम काज चल जाता। जीवन की अनेकों विसंगतियां सह कर भी, कुंती अपने घर को बड़े सुव्यवस्थित ढंग से चला रही थी। उसके मन में बस यही था कि अंजलि पढ़ लिख जाय, और अपने पैरों पर खड़ी हो जाय तो उसके सभी कष्ट दूर हो जायेंगे। खुद तो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, पर बेटी को पढ़ाने का भरपूर जज्बा था। वह अंजलि को पूरा प्यार देती और सही मार्ग पर चलने की नसीहत। वह बेटी की जिंदगी में किसी प्रकार का दुःख नहीं आने देगी, मन में संकल्प लिये थी।
मम्मी की संघर्ष भरी जिंदगी देख कर, अंजलि के मन में जिज्ञासा रहती कि वह एक दिन पढ़ लिख कर, कुछ बनेगी, और मम्मी की शेष जिंदगी खुशहाल बनाने में हर संभव मदद करेगी। धीरे धीरे अंजलि बड़ी हो गयी, और उसका ग्रेजुएशन पूरा हो गया। अपना खर्च वह स्वयं निकाल ले और माँ के हाथ में कुछ पैसा आये, सोचकर, दो तीन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी।
एक दिन अंजलि घर में अकेली थी। वह अलमारी में अपना कुछ सामान ढूंढ रही थी, तभी उसके हाथ एक डायरी लगी। समय था ही, वह बैठ कर उसे पढ़ने में लग गयी। डायरी में जो कहानी लिखी थी, उसे बहुत रोचक लगी, जिस कारण उसे पूरा पढ़ने का मन हो चला। कहानी के करुण प्रसंग पढ़कर, कई बार अंजलि की आँखों से आंसू छलक आये।
'एक गांव की लड़की, जिसका गरीबी के कारण बेमेल विवाह हो गया। दूल्हे की उम्र पिता के बराबर की थी। जब कुंती को पता चला कि लड़का एक विधुर है और सिर पर आधे बाल हैं तो वह दबी जबान से अपनी माँ से पूछी कि और कोई लड़का नहीं है क्या, माँ? माँ ने समझाया कि लडके हैं तो दहेज़ कहाँ से लाएंगे। आजकल लडके वालों का कितना मुंह खुला हुआ है; समझते हैं कि लड़की वालों के घर, पेड़ पर पैसा उगता है। देवदत्त भी क्या बुरा है, अच्छा कमा लेता है। खाली उम्र ही तो कुछ ज्यादा है, रुपये पैसे की तुझे तंगी नहीं होगी .... । धीरे धीरे, वह दिन आ गया जब द्वार पर बारात आई। औरतों में कानाफूसी हो रही थी, लड़का ठीक तो है पर उम्रदराज है। सुनकर कुंती की छाती पर साँप लोट जाता। वह खिड़की से झांक कर देखने का प्रयत्न करती, पर भीड़ में घिरे होने के कारण लडके तक नजर नहीं पहुँच पाती। कई बार तो मन में आता, जाकर सीधे कह दे, मुझे यह विवाह नहीं करना। किन्तु माँ बाप के मान मर्यादा का ख्याल मन में रख कर, हिम्मत नहीं जुटा सकी। शादी हो गयी। जिस बात का डर था, वही हुआ। अधेड़ उम्र के मर्द से विवाह कर, कुंती वैवाहिक सुख से वंचित रहने लगी। अधिक उम्र होने के कारण देवदत्त का घूमने फिरने का शौक भी मर गया था। वह तो बस उसकी नौकरानी बन कर रह गयी थी।
इस बीच पड़ोस की एक हम-उम्र लड़की सुमित्रा से कुंती की मित्रता हो गयी। सुमित्रा कुंती के यहाँ आती जाती, उससे बातों में जी लग जाता। एक बार कुंती ने सुमित्रा को केक बनाना सिखाया। सुमित्रा ने जब केक बनाने का अभ्यास किया तो थोड़ा सा केक, चखने के लिए अपने भाई मदन के हाथों, कुंती के पास भिजवा दिया। मदन जब कुंती को देखा तो देखता रह गया। कुंती की सुंदरता थी ही ऐसी। यह तो उसकी बदकिस्मती थी कि माँ बाप गरीबी का अभिशाप लिए, अच्छी शादी का प्रयास ही नहीं किये। अन्यथा कोई भी युवक उसे एक बार देख कर शादी के लिये ना, नहीं कर सकता था। अब तो मदन किसी न किसी बहाने कुंती के यहाँ आने जाने लगा। कुंती को भी उससे बात कर बड़ा शकुन मिलता। एक दिन मदन ने कुंती से बोल दिया 'आई लव यू'। कुंती के दिल में तो तूफान सा आ गया। जिस मान मर्यादा को लेकर वह अधेड़ से शादी की, अब क्या पति के रहते किसी से प्यार करके उसे मिटा देगी। उस समय तो वह अवाक् रह गयी। पर मदन की बात उसके मन को उद्वेलित करती रही। यह बात उसे मरुभूमि में हरियाली सी लग रही थी। अब तो दिन-रात, सोते-जागते, उसके मन में मदन की बात गूंजती रही। धीरे धीरे उसने मन बना लिया कि आखिर जीवन जीना है तो इतना घुटन क्यों सहे। अगली बार मदन कुंती के लिए उपहार लेकर आया तो कुंती ने उसे स्वीकार कर लिया। धीरे धीरे दोनों का मिलना जुलना प्यार में बदलने लगा।
एक दिन मदन कुंती के यहाँ गया तो वह घर में अकेली थी। देवदत्त कहीं बाहर गया हुआ था। अब तक मदन उस पर अपना अधिकार समझने लगा था। वह उसे पकड़ कर गले से लगाना चाहा, पर कुंती तब तक सम्हल चुकी थी, उसे एहसास हो चुका था कि वह किसी की पत्नी है। अपने मन के दोनों के पक्ष के द्वन्द पर निर्णय लेने के लिए उसे स्वयं ही न्यायाधीश बनना था। एक ओर जिंदगी का प्रश्न तो दूसरी ओर मर्यादा। उसने मदन से बोला, मैं अपने पति को छोड़ देती हूँ, चलो विवाह कर लेते हैं। मदन ने झट पल्ला झाड़ लिया, 'तुम तो विवाहित हो।'
'तो, यह पहले पता नहीं था? प्यार का ढोंग क्यों रच रहे थे? '
अब मदन के ख्वाबों का किला ढह चुका था। उसके बाद कुंती के यहाँ आना जाना छोड़ दिया।
कुंती तो देवदत्त के पास एक सेवादार के रूप में जीवन बिता रही थी। उसे विवाह का तनिक भी सुख नहीं मिला, जिंदगी घुटन भरी लग रही थी। जीवन के दो साल शून्य में बीत चुके थे। पर अब कुंती की सहनशक्ति बोल चुकी थी। उसके भीतर छुपी नारी जाग गयी और एक दिन जब देवदत्त काम पर गया था तो वह अदम्य साहस का परिचय देते हुए, एक पत्र लिखकर, उसके विस्तर पर रख दी। और ससुराल छोड़ कर अपने पिता के घर आ गयी। पहले तो माँ बाप ने समझाया कि बेटी विवाह के बाद लड़की का घर ससुराल होता है। तुझे इस तरह नहीं आना चाहिए था। पर कुंती अब दुनिया के प्रपंच जान चुकी थी। उसने अपनी माँ से पूछ लिया अगर मजदूरी ही करनी है तो किसी की बंधुआ मजदूर बनकर क्यों ? मैं यहीं रहकर कुछ काम कर लूंगी, तेरी भी मदद करुँगी। कुंती की बात उन्हें समझ आ गयी, और वह अपने माँ बाप के साथ रहने लगी।
कुछ ही समय बीता था, दूर की रिश्तेदारी के मोहन लाल, कुंती के घर आये हुए थे। उन्हें एकाएक याद आ गया कि उनके गांव का किशनपाल अभी तक अविवाहित है और मोहनलाल के कहे को टालेगा नहीं। वह कुंती के लिए योग्य वर रहेगा। किशनपाल का गांव में खेत वगैरह तो कुछ खास नहीं है, पर वह शहर में रहता है और ठीक ठाक कमा लेता है। सारी स्थिति को समझते हुए मोहन लाल ने, किशनपाल से विवाह की बात चला दी। कुंती के पास सुंदरता की संपत्ति तो थी ही, एक नजर डालने के बाद किसी को भी ना करना असंभव था। मोहनलाल ने किशनपाल से विवाह करवा दिया। कुंती उसे पाकर बहुत प्रसन्न थी। सुमित एक खूबसूरत नौजवान था और कुंती को बहुत प्यार करता। कुंती ने जो साहस दिखाया उसे उसका प्रतिफल मिल गया। सुमित कमा तो ठीक ठाक लेता था, पर उसे कुछ ऐसे लोगों की संगति मिल गयी कि कभी कभी शराब भी पी लेता। किशनपाल कभी कभार पीता था, पर अपनी जिम्मेदारियों पर आंच नहीं आने देता था। वह कुंती को बहुत प्यार करता व उसका भरपूर ख्याल भी। कुंती उसके साथ प्रसन्न रहने लगी।
शादी के पश्चात् सुन्दर सी लड़की पैदा हो गयी। अब कुंती को जिंदगी का कारण और सहारा, बेटी के रूप में दोनों ही मिल गए थे। अपनी जिंदगी से अब वह पूर्णतया संतुष्ट थी, उसे और कुछ भी नहीं चाहिए था। उसकी बस यही चाह थी कि बेटी को खूब प्यार दे और पढाये लिखाये। एक बार फिर समय ने करवट बदला। कई वर्षों बाद, मदन फिर से प्रकट हो गया। पता नहीं कहाँ से मदन को कुंती का फ़ोन नंबर मिल गया था। फोन पर कुंती से प्यार की बात फिर से दोहराने लगा, और दोस्ती का हाथ बढ़ने लगा। उसे लगा कि किशनपाल शराब पीता है तो कुंती उससे घृणा करती होगी जिसे वह उससे दोस्ती करने के अवसर के रूप में देख रहा था। अबकी भी, कुंती ने अपने पांव लड़खड़ाने नहीं दिया और दो टूक शब्दों में उसे कह दिया, 'अब इस गली में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है, यहाँ किसी और का घर बन चुका है।'
कुंती एक बार फिर अपने अतीत को देखती है, एक तो बीबी बनाकर नौकरानी का काम लेना चाहता था, दूसरा प्यार का ढोंग रचकर साथ समय बिताने के चक्कर में। निर्धन होना कितना बड़ा अभिशाप है। थोड़ा और पढ़ लिख गयी होती तो इतना कुछ नहीं देखना पड़ता। फिर भी ईश्वर का दिया विवेक तो है न, संयम और साहस से भी बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है । किशनपाल कभी-कभी बेशक पी लेता है, पर प्यार तो करता है न, और परिवार की जिम्मेदारी भी निभा रहा है। नशा करता है फिर भी वह मेरे बारे में सोचता है, परिवार के बारे में सोचता है, अंजलि से कितना प्यार करता है। मुझे तो इसने एक नयी जिंदगी दे दी, वरना एक नौकरानी बन कर ही रह जाती।
यह करुण गाथा पढ़कर, अंजलि के आँखों से आंसू नीचे की ओर ढुलक ही रहे थे कि बाहर से कुंती आ गयी। अंजलि के हाथ में डायरी और ऑंखें नम देख कर, वह चौंक गयी। झट से, उसके हाथ से डायरी छीन ली।
'यह तुझे कहाँ से मिली। '
'अलमारी में '
'चल छोड़, खाना वगैरह बनाने की तैयारी करते हैं।'
'मम्मी कहीं यह आपकी कहानी तो नहीं?' अंजलि ने पूछ लिया।
वैसे अंजलि को आभास तो होता था कि कुंती दिल में कोई गहरी पीड़ा रखे हुए है, पर उसे वास्तविक कहानी का पता नहीं था। बार बार हठ करने पर कुंती सच बोलने से अपने को रोक न सकी। फिर तो दोनों की आँखों से गंगा यमुना की धार बह निकली।
'माँ जीवन में तूने कितनी व्यथा सही, और हमारे ऊपर आंच तक नहीं आने दी ! तू धन्य है, माँ।'
एस० डी० तिवारी