Wednesday, 28 December 2016

Maa ki diary

मम्मी की डायरी

अंजलि अब बड़ी हो गयी थी। बचपन से ही अपनी माँ को संघर्ष करते और पापा को पीकर लड़ते देखा था। कुन्ती ने जीवन में इतना कुछ सहा, सोच कर अंजलि का मन करुणा से भर जाता। किशनपाल अपनी कमाई का एक हिस्सा तो पीने में ही उड़ा  देता। वह जो कुछ कुंती को देता, उसमें शौक पूरा करना तो संभव नहीं था, पर घर का काम काज चल जाता।  जीवन की अनेकों विसंगतियां सह कर भी, कुंती अपने घर को बड़े सुव्यवस्थित ढंग से चला रही थी। उसके मन में बस यही था कि अंजलि पढ़ लिख जाय, और अपने पैरों पर खड़ी हो जाय तो उसके सभी कष्ट दूर हो जायेंगे। खुद तो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, पर बेटी को पढ़ाने का भरपूर जज्बा था। वह अंजलि को पूरा प्यार देती और सही मार्ग पर चलने की नसीहत। वह बेटी की जिंदगी में किसी प्रकार का दुःख नहीं आने देगी, मन में संकल्प लिये थी।
मम्मी की संघर्ष भरी जिंदगी देख कर, अंजलि के मन में जिज्ञासा रहती कि वह एक दिन पढ़ लिख कर, कुछ बनेगी, और मम्मी की शेष जिंदगी खुशहाल बनाने में हर संभव मदद करेगी। धीरे धीरे अंजलि बड़ी हो गयी, और उसका ग्रेजुएशन पूरा हो गया। अपना खर्च वह स्वयं निकाल ले और  माँ के हाथ में कुछ पैसा आये, सोचकर, दो तीन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी।
एक दिन अंजलि घर में अकेली थी। वह अलमारी में अपना कुछ सामान ढूंढ रही थी, तभी उसके हाथ एक डायरी लगी। समय था ही, वह बैठ कर उसे पढ़ने में लग गयी। डायरी में जो कहानी लिखी थी, उसे बहुत रोचक लगी, जिस कारण उसे पूरा पढ़ने का मन हो चला। कहानी के करुण प्रसंग पढ़कर, कई बार अंजलि की आँखों से आंसू छलक आये।
'एक गांव की लड़की, जिसका गरीबी के कारण बेमेल विवाह हो गया। दूल्हे की उम्र  पिता के बराबर की थी। जब कुंती को पता चला कि लड़का एक विधुर है और सिर पर आधे बाल हैं तो वह दबी जबान से अपनी माँ से पूछी कि और कोई लड़का नहीं है क्या, माँ? माँ ने समझाया कि लडके हैं तो दहेज़ कहाँ से लाएंगे। आजकल लडके वालों का कितना मुंह खुला हुआ है; समझते हैं कि लड़की वालों के घर, पेड़ पर पैसा उगता है। देवदत्त भी क्या बुरा है, अच्छा कमा लेता है। खाली उम्र ही तो कुछ ज्यादा है, रुपये पैसे की तुझे तंगी नहीं होगी  ....  ।  धीरे धीरे, वह दिन आ गया जब द्वार पर बारात आई। औरतों में कानाफूसी हो रही थी, लड़का ठीक तो है पर उम्रदराज है। सुनकर कुंती की छाती पर साँप लोट जाता। वह खिड़की से झांक कर देखने का प्रयत्न करती, पर भीड़ में घिरे होने के कारण लडके तक नजर नहीं पहुँच पाती। कई बार तो मन में आता, जाकर सीधे कह दे, मुझे यह विवाह नहीं करना। किन्तु माँ बाप के मान मर्यादा का ख्याल मन में रख कर, हिम्मत नहीं जुटा सकी। शादी हो गयी। जिस बात का डर था, वही हुआ। अधेड़ उम्र के मर्द से विवाह कर, कुंती वैवाहिक सुख से वंचित रहने लगी। अधिक उम्र होने के कारण देवदत्त का घूमने फिरने का शौक भी मर गया था। वह तो बस उसकी नौकरानी बन कर रह गयी थी।

इस बीच पड़ोस की एक हम-उम्र लड़की सुमित्रा से कुंती की मित्रता हो गयी। सुमित्रा कुंती के यहाँ आती जाती, उससे बातों में जी लग जाता। एक बार कुंती ने सुमित्रा को केक बनाना सिखाया। सुमित्रा ने जब केक बनाने का अभ्यास किया तो थोड़ा सा केक, चखने के लिए अपने भाई मदन के हाथों, कुंती के पास भिजवा दिया। मदन जब कुंती को देखा तो देखता रह गया। कुंती की सुंदरता थी ही ऐसी। यह तो उसकी बदकिस्मती थी कि माँ बाप गरीबी का अभिशाप लिए, अच्छी शादी का प्रयास ही नहीं किये।  अन्यथा कोई भी युवक उसे एक बार देख कर शादी के लिये ना, नहीं कर सकता था। अब तो मदन किसी न किसी बहाने कुंती के यहाँ आने जाने लगा। कुंती को भी उससे बात कर बड़ा शकुन मिलता। एक दिन मदन ने कुंती से बोल दिया 'आई लव यू'। कुंती के दिल में तो तूफान सा आ गया। जिस मान मर्यादा को लेकर वह अधेड़ से शादी की, अब क्या पति के रहते किसी से प्यार करके उसे मिटा देगी। उस समय तो वह अवाक् रह गयी। पर मदन की बात उसके मन को उद्वेलित करती रही। यह बात उसे मरुभूमि में हरियाली सी लग रही थी। अब तो दिन-रात, सोते-जागते, उसके मन में मदन की बात गूंजती रही। धीरे धीरे उसने मन बना लिया कि आखिर जीवन जीना है तो इतना घुटन क्यों सहे। अगली बार मदन कुंती के लिए उपहार लेकर आया तो कुंती ने उसे स्वीकार कर लिया। धीरे धीरे दोनों का मिलना जुलना प्यार में बदलने लगा।

एक दिन मदन कुंती के यहाँ गया तो वह घर में अकेली थी। देवदत्त कहीं बाहर गया हुआ था। अब तक मदन उस पर अपना अधिकार समझने लगा था। वह उसे पकड़ कर गले से लगाना चाहा, पर कुंती तब तक सम्हल चुकी थी, उसे एहसास हो चुका था कि वह किसी की पत्नी है। अपने मन के दोनों के पक्ष के द्वन्द पर निर्णय लेने के लिए उसे स्वयं ही न्यायाधीश बनना था। एक ओर जिंदगी का प्रश्न तो दूसरी ओर मर्यादा। उसने मदन से बोला, मैं अपने पति को छोड़ देती हूँ, चलो विवाह कर लेते हैं।  मदन ने झट पल्ला झाड़ लिया, 'तुम तो विवाहित हो।'
'तो, यह पहले पता नहीं था? प्यार का ढोंग क्यों रच रहे थे? '
अब मदन के ख्वाबों का किला ढह चुका था। उसके बाद कुंती के यहाँ आना जाना छोड़ दिया।
 
कुंती तो देवदत्त के पास एक सेवादार के रूप में जीवन बिता रही थी। उसे विवाह का तनिक भी सुख नहीं मिला, जिंदगी घुटन भरी लग रही थी। जीवन के दो साल शून्य में बीत चुके थे। पर अब कुंती की सहनशक्ति बोल चुकी थी। उसके भीतर छुपी नारी जाग गयी और एक दिन जब देवदत्त काम पर गया था तो वह अदम्य साहस का परिचय देते हुए, एक पत्र लिखकर, उसके विस्तर पर रख दी। और ससुराल छोड़ कर अपने पिता के घर आ गयी।  पहले तो माँ बाप ने समझाया कि बेटी विवाह के बाद लड़की का घर ससुराल होता है। तुझे इस तरह नहीं आना चाहिए था। पर कुंती अब दुनिया के प्रपंच जान चुकी थी। उसने अपनी माँ से पूछ लिया अगर मजदूरी ही करनी है तो किसी की बंधुआ मजदूर बनकर क्यों ? मैं यहीं रहकर कुछ काम कर लूंगी, तेरी भी मदद करुँगी। कुंती की बात उन्हें समझ आ गयी, और वह अपने माँ बाप के साथ रहने लगी।

कुछ ही समय बीता था, दूर की रिश्तेदारी के मोहन लाल, कुंती के घर आये हुए थे। उन्हें एकाएक याद आ गया कि उनके गांव का किशनपाल अभी तक अविवाहित है और मोहनलाल के कहे को टालेगा नहीं। वह कुंती के लिए योग्य वर रहेगा। किशनपाल का गांव में खेत वगैरह तो कुछ खास नहीं है, पर वह शहर में रहता है और ठीक ठाक कमा लेता है। सारी स्थिति को समझते हुए मोहन लाल ने, किशनपाल से विवाह की बात चला दी। कुंती के पास सुंदरता की संपत्ति तो थी ही, एक नजर डालने के बाद किसी को भी ना करना  असंभव था। मोहनलाल ने किशनपाल से विवाह करवा दिया। कुंती उसे पाकर बहुत प्रसन्न थी। सुमित एक खूबसूरत नौजवान था और कुंती को बहुत प्यार करता।  कुंती ने जो साहस दिखाया उसे उसका प्रतिफल मिल गया। सुमित कमा तो ठीक ठाक लेता था, पर उसे कुछ ऐसे लोगों की संगति मिल गयी कि कभी कभी शराब भी पी लेता। किशनपाल कभी कभार पीता था, पर अपनी जिम्मेदारियों पर आंच नहीं आने देता था। वह कुंती को बहुत प्यार करता व उसका भरपूर ख्याल भी। कुंती उसके साथ प्रसन्न रहने लगी।

शादी के पश्चात् सुन्दर सी लड़की पैदा हो गयी। अब कुंती को जिंदगी का कारण और सहारा, बेटी के रूप में दोनों ही मिल गए थे। अपनी जिंदगी से अब वह पूर्णतया संतुष्ट थी, उसे और कुछ भी नहीं चाहिए था। उसकी बस यही चाह थी कि बेटी को खूब प्यार दे और पढाये लिखाये। एक बार फिर समय ने करवट बदला। कई वर्षों बाद, मदन फिर से प्रकट हो गया। पता नहीं कहाँ से मदन को कुंती का फ़ोन नंबर मिल गया था। फोन पर कुंती से प्यार की बात फिर से दोहराने लगा, और दोस्ती का हाथ बढ़ने लगा। उसे लगा कि किशनपाल शराब पीता है तो कुंती उससे घृणा करती होगी जिसे वह उससे दोस्ती करने के अवसर के रूप में देख रहा था। अबकी भी, कुंती ने अपने पांव लड़खड़ाने नहीं दिया और दो टूक शब्दों में उसे कह दिया, 'अब इस गली में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है, यहाँ किसी और का घर बन चुका है।'

कुंती एक बार फिर अपने अतीत को देखती है, एक तो बीबी बनाकर नौकरानी का काम लेना चाहता था, दूसरा प्यार का ढोंग रचकर साथ समय बिताने के चक्कर में। निर्धन होना कितना बड़ा अभिशाप है। थोड़ा और पढ़ लिख गयी होती तो इतना कुछ नहीं देखना पड़ता। फिर भी ईश्वर का दिया विवेक तो है न, संयम और साहस से भी बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है । किशनपाल कभी-कभी बेशक पी लेता है, पर प्यार तो करता है न, और परिवार की जिम्मेदारी भी निभा रहा है। नशा करता है फिर भी वह मेरे बारे में सोचता है, परिवार के बारे में सोचता है, अंजलि से कितना प्यार करता है। मुझे तो इसने एक नयी जिंदगी दे दी, वरना एक नौकरानी बन कर ही रह जाती।

यह करुण गाथा पढ़कर, अंजलि के आँखों से आंसू नीचे की ओर ढुलक ही रहे थे कि बाहर से कुंती आ गयी। अंजलि के हाथ में डायरी और ऑंखें नम देख कर, वह चौंक गयी। झट से, उसके हाथ से डायरी छीन ली।
'यह तुझे कहाँ से मिली। '
'अलमारी में '
'चल छोड़, खाना वगैरह बनाने की तैयारी करते हैं।'
'मम्मी कहीं यह आपकी कहानी तो नहीं?' अंजलि ने पूछ लिया।
वैसे अंजलि को आभास तो होता था कि कुंती दिल में कोई गहरी पीड़ा रखे हुए है, पर उसे वास्तविक कहानी का पता नहीं था। बार बार हठ करने पर कुंती सच बोलने से अपने को रोक न सकी। फिर तो दोनों की आँखों से गंगा यमुना की धार बह निकली।

'माँ जीवन में तूने कितनी व्यथा सही, और हमारे ऊपर आंच तक नहीं आने दी ! तू धन्य है, माँ।'

एस० डी० तिवारी

Sunday, 18 December 2016

Do bibi ka pati

दो बीबी का शौहर

रसिक लाल  की शादी के पांच साल से भी अधिक हो गए थे। अभी तक गोद सूनी रहने से सीमा और वे दोनों ही हताश थे, और उपर से  रोज ही लोग पूछते रहते, अभी कुछ है तो नहीं ?
शीला ताई ने अभी कल ही पूछा था, आज फिर -
'अरे रसिक बहू के कुछ है तो नहीं ?'
'ताई एक दिन का जांचने की अभी कोई मशीन भी ना आई। '
 तब तक उनके साथ बैठी शकुंतला भाभी बोल बैठीं, 'किसी बड़े डाक्टर को दिखा लो। ना हो तो दोनों बाला जी मंदिर जाकर, झाड़ फूंक करवा लो। सुलेखा को वहीँ जाकर लाभ मिला था।'

रसिक लाल की जहां तक पहुँच थी, जाँच कराया, पर कोई लाभ नहीं मिला। अब तो लोगों की सलाह ताने का रूप ले चुकी थी। रसिक लाल की संतान पाने की प्रबल इच्छा थी। इसी चाह में वे दूसरी शादी के लिए मन बना बैठा।

रसिक लाल की शादी का जामा जोड़ा, अभी तक रखा था, उसके भाग्य जगे और ड्राई क्लीनिंग के लिए भेज दिया गया। रसिक लाल उन भाग्यशाली लोगों में से निकले जिन्हें अपनी शादी का जामा जोड़ा एक बार फिर पहनने का अवसर मिला, वरना शादी के जोड़े का तो बस यही हस्र होता है, कि या तो रखा रह जाय या किसी को दे दिया जाय।  स्त्रियों को तो फिर भी कभी कभार उत्सव आदि में अपनी शादी का लहंगा पहनने का मौका मिल जाता है। अधिक समय नहीं बीता, रेशमा नई दुल्हन बनकर आ गयी।

रेशमा के आ जाने पर रसिक लाल के दोनों हाथ में लड्डू थे। सीमा और रेशमा दोनों में रसिक लाल की सेवा करने और उसे प्रसन्न रखने के प्रतियोगी भाव होते।  दोनों पत्नियां चाहतीं कि उसे सिर पर बिठा कर रखें। एक पकौड़ी बनाकर रसोई से हटती तो दूसरी हलवा बनाने लगती। दोनों अपनी तरह के बढ़िया से बढ़िया पकवान बनाकर खिलाने का प्रयत्न करतीं। कभी कभी शादी लाल को अपनी इच्छा से अधिक खाना पड़ जाता।

दोनों कुछ न कुछ विशेष पकवान बनाना जानती थीं। सीमा छोले बटूरे अच्छा बनाती तो रेशमा सांभर डोसा और चाउमिन। वे अपना कच्चा मॉल चुपके से तैयार करतीं कि कहीं दूसरी न सीख जाय। उनके हाथ के बने पकवान के स्वाद की चर्चा रसिक के मित्रों में भी होती। कभी कोई मित्र किसी चीज की प्रशंसा करता तो रसिक जी उसे छुट्टी के दिन निमंत्रित कर लेते। उनकी पत्नियां भी प्रशंसा से फूले न समातीं।

एक बार सीमा ने रसिक लाल की पसंद, चोखा बाटी बनाया और साथ धनिया टमाटर की चटनी, तो उन्होंने छक कर खा लिया। रेशमा को चोखा बाटी इतना पसंद नहीं था, वह चुपके से बेसन का चीला बना लाई। रसिक लाल के पेट में बिल्कुल भी जगह नहीं थी पर नई बीबी का तिरस्कार कैसे कर सकते थे। जब उसने आग्रह किया तो उन्होंने खा लिया। अब तो भरा पेट बहुत भारी हो गया, और पानी पाकर पेट में बाटी और फूल गयी। वे अपच के मारे परेशान हो गए। डाइजीन की गोली भी खाई पर स्थिति नियंत्रण में नहीं हुई। रात में कई बार उठ कर टहलना पड़ा और पूरी रात यूँ जाग कर ही बितानी पड़ी ।

सोने की समस्या बड़ी थी।  दो बेड रूम का फ्लैट था। दोनों बीबियों ने एक एक कमरा हथिया लिया था।  रसिक लाल को यह तय करना बड़ा कठिन होता कि किसके कमरे में सोयें। उनका किसी एक के कमरे में सोने का मन होता तो शाम से ही उसी के कमरे में अड्डा जमा लेते।  वहीँ पर शाम की चाय, वहीँ खाना और जल्दी नींद आने का बहाना। कभी रेशमा के कमरे में लेटे होते तो सीमा अवसर पाकर जाती और बोल देती, 'यहाँ क्यों सोये हो? जाकर उधर सो जाओ, आज ही चद्दर बदली हूँ।

पहले रसिक लाल की सीमा से कभी कभी नोक झोंक हो जाया करती थी, अब वे बड़ी शांति की बंशी बजा रहे थे। उनका जीवन अच्छे से बीत रहा था। उनकी दोनों पत्नियां परस्पर लड़ झगड़ कर अपनी शक्ति का संतुलन बनाये रखतीं तथा अपनी जिह्वा की खाज मिटा लेती थीं। जब दोनों में तकरार होती तो रसिकलाल स्वयं को किसी काम में व्यस्त कर लेते या बाजार से कोई सामान लाने के बहाने बाहर चले जाते।

टेलीविज़न पर सीमा को फिल्में और पुराने गाने देखना अधिक पसंद था और रेशमा को टी वी  धारावाहिक।  इस बात पर दोनों मेँ खिंचाव रहता था। जब एक अपनी पसंद का कार्यक्रम देखती और दूसरी चैनेल बदल देती तो वह झल्ला जाती। रेशमा अपनी धारावाहिक छोड़ने को कत्तई तैयार नहीं होती। एक दिन उसके धारावाहिक के बीच में ही सीमा ने आकर, चैनेल बदल दिया, वह क्रोध में वहां से उठकर चली गयी और कैकेयी की भांति कोपभवन में पुहंच गयी।  शाम को जब राजा दशरथ आये तो अगले ही दिन, उसके लिए अलग नया टेलीविज़न लाने का वर दे दिए। नया टेलीविज़न आ गया और रेशमा उसे अपने कमरे में लगाकर अपना धारावाहिक देखती। अब तो धारावाहिक देखने में कभी सब्जी जलती तो कभी दूध उफन कर गिर जाता। सीमा को ही सब ध्यान रखना पड़ता।

रसिक लाल तुष्टिकरण की नीति भली भांति जानते थे। दोनों में से कोई नाराज न हो जाय कपड़े गहने आदि जोड़े से ही खरीदते थे। शादी की वर्षगांठ पर दोनों को एक सी सौगात देते और तो और दोनों में से किसी का जन्मदिन आता तो दूसरी का जन्मदिन भी उन्हें ख्याल रखना पड़ता, जो सौगात एक को दिया दूसरी को उससे अधिक सस्ता या मंहगा न हो जाय।  कितने की सौगात लाये थे रसिक लाल को याद रहे या न रहे, उनकी पत्नियों को अवश्य रहता था।

दूसरी होने के कारण रसिक लाल का लगाव तो रेशमा से ही अधिक था परंतु उन्हें कुछ विशेष  खाने  पीने का मन होता तो सीमा को ही याद करते, क्योंकि खाने पकाने में सीमा के आगे रेशमा बहुत पीछे थी। एक दिन रसिक लाल अरबी के पत्ते ले आये और सीमा को अपनी फरमाइश बता दिए। सीमा ने उसमें बेसन लपेट कर पकौड़ी बना लिया।  रेशमा को भी खिलाया रेशमा को वह बहुत पसंद आया। रसिक लाल के लिए सीमा ने फ्रिज में रख दिया। शाम को रसिक लाल के आते ही, सीमा प्रफुल्ल होकर बोली 'आज आपके लिए अरबी के विशेष पकौड़े बनाई हूँ' फ्रेश हो जाओ गरम करके अभी लाती हूँ। वह गयी तो फ्रिज में पकौड़े नादारद। मुंह बना कर वापस आई। ' वो तो फ्रिज में है ही नहीं, सीमा ...  फ्रीज में पकौड़े पड़े थे..... । '
'हाँ, गौरव आया था न, वह खा गया। बड़ी तारीफ कर रहा था।' दोपहर को रेशमा का भाई, गौरव आ गया और रेशमा ने सीमा को बिना बताये ही उसे खिला दिया।
सीमा मन मसोस कर रह गयी। अब उसे रसिक के कान भरने का अवसर मिल गया। पर रेशमा के विरुद्ध कुछ कहने पर उनके कान पर जूं कहाँ रेंगने वाली थी। बोले 'जाने दो, जिसके नसीब की थी, खा गया। '

एक दिन रसिक को अपने किसी सहकर्मी की पार्टी में जाना था। वह सीमा को एक दिन पहले ही बता दिया। सीमा ने पूछ लिया, ' क्या पहनोगे?
'ब्राउन वाला सूट'
'सीमा ने उनके आने से पहले ही अलमारी में से सूट निकाल कर ब्रश मार दी थी। '
रसिक लाल ऑफिस से आया। चाय वगैरह पीकर पार्टी में जाने के लिए तैयार होने लगा, 'सीमा, जरा अलमारी से सूट निकाल देना। '
'वो तो मैंने पहले ही ब्रश मार कर रखा है' कहते लेने चली गयी। देखी तो वहां से सूट गायब।
'अरे मैंने तो यहीं रखी थी, घर में से कौन ले जायेगा?'
 रेशमा ने सीमा को परेशान देखकर पूछ लिया, क्या ढूंढ रही हो दीदी ?'
'सूट'
'वो तो मैंने ड्राई क्लीनिंग के लिए दे दिया। यहाँ पड़ा था मैं समझी धुलवाना है, मुझे भी अपनी साड़ी देनी थी साथ में सूट भी दे आई। '
रसिक लाल चाहते थे इस बार बदल कर पहनें, हर बार एक ही सूट पहन कर ऑफिस वालों की पार्टी में जाते थे। फिर वही मत्थे पड़ा।

सीमा की उससे एक बड़ी बहन थी जो अपनी गृहस्थी में व्यस्त होने के कारण बहुत कम ही उसके घर आ पाती। हाँ, उसका बेटा सोमेश मौसी से मिलने कभी कभी आ जाया करता था। सीमा सोमेश को बहुत प्यार करती थी। उधर रेशमा का भाई गौरव भी अक्सर आता जाता था। रेशमा का भाई आता तो वह चाहती कि उसे क्या क्या खिला पिला दें। कई बार सीमा की सम्हाल कर रखी चीज भी गायब हो जाती, सीमा जब रेशमा से पूछती तो पता चलता गौरव आया था, खा गया।
'क्या रे ! उसे अपने घर कुछ नहीं मिलता क्या ! इस पर रेशमा तिलमिला जाती और बाद में रसिक लाल का सिर नोचती। धीरे धीरे दोनों में विवाद बढ़ता गया। रसिक लाल सीमा को ही शांत रहने के लिए समझाता, 'देखो रेशमा तुम्हारी छोटी बहन सी है, प्यार से रखोगी तो तुम्हारी भी सेवा करेगी। '
'कर ली, सेवा! सौत भी बहन हो सकती है क्या ?'

'सुनते हो जी! परसों हमारी शादी की साल गिरह है, थोड़ी अच्छी सी पार्टी वार्टी कर लेते हैं। ' रेशमा ने रसिक लाल से कहा।
'अभी  इसी महीने तो पार्टी किया था। हम तीनों चलकर किसी अच्छे रेस्तरां में खा पी लेंगे। क्यों फालतू खर्च करना ?'
'हम तीनों क्यों ? गौरव और मम्मी पापा को भी बुला लेंगे। '
'खामोख़ाह खर्च बढ़ा रही हो, तुम्हारे लिए गिफ्ट भी तो लाना है। '
'वाह! दीदी की शादी की साल गिरह में उनके मम्मी पापा को बुलाया, हमारी साल गिरह में मेरे मम्मी पापा को नहीं बुलाओगे तो, क्या सोचेंगे। '
'अच्छा चलो, जैसा चाहोगी, हो जायेगा। '

एक दिन रसिक लाल को दफ्तर से आते ही, बन्दर बनकर, दो बिल्लियों का झगड़ा निबटाना पड़ा। दोनों आपस में लड़ झगड़ कर रूठी बैठी थीं, आपस की बोल चाल बंद।  रसिक जी को चाय स्वयं ही बनानी पड़ी और बनाकर उन दोनों को भी पिलाये। भोजन का भी कोई ठिकाना नहीं था।  पहले तो सोचा ब्रेड खा कर काम चला लें मगर बीबियों का भी ख्याल था इसलिए होटल से मंगा लिया। चूकि खाना होटल से आया था और भोजन से उनका कोई झगड़ा नहीं था, सीमा और रेशमा दोनों ही अपने अपने हिस्से का खाना लेकर अपने कमरे में चली गयीं। रसिक लाल के लिए उन्होंने  जो छोड़ा, खा लिया। जब सोने के लिए सीमा के कक्ष में घुसे तो साफ बोली यहां क्या करने आये हो? जाओ उसी के कमरे में। रेशमा के कमरे में गए तो वहां भी यही सुनने को मिला। रसिक लाल को डॉइंग रूम में ही सोना पड़ा। रेशमा आई थी तो जहाँ शुरू में शांति हुआ करती थी अब तो बात बात पर कचाईन।

एक बार रसिक ने सोचा कि दोनों को बाहर की सैर करा दें। सीमा से पूछे, ' बाहर खाने चलना है।'  सीमा बोली 'सिर में दर्द है, रेशमा को ले जाओ।' रसिक लाल की इतनी हिम्मत कहाँ थी। ले तो जांय, अगले दिन का कलह कौन झेले। पिछली बार की बात उन्हें याद थी, जब सीमा मायके गयी थी तो रेशमा को सिनेमा दिखाने ले गए। आते ही घर में कचाईन, ' तुम्हारे लिए तो बस वही प्यारी है, मैं रहूंगी तब थोड़े ही सिनेमा जाओगे। '  पिछली बात याद करके रसिक लाल ठिठके और बिलंब होते देख, सीमा ने खिचड़ी बना डाली। 'क्या हुआ, नहीं गए।  ये लो खिचड़ी खाओ। तुम लोग बाहर जाओगे यह सोच कर  मैं अपने लिए खिचड़ी रख दी थी, इसी में तुम भी खा लो।'

रसिक लाल को तीन तीन ठिकानों की खबर रखनी पड़ती।  अपना घर तो था ही दोनों ससुराल का भी।  सीमा जब कभी भी अपने माता पिता के तबियत ख़राब होने की बात सुनती तो रसिक लाल को तुरंत भेजती। इधर रेशमा का झुकाव मायके की तरफ अधिक था, रसिक लाल को भी उसे खुश रखने के लिए नयी ससुराल का अधिक ध्यान रखना पड़ता। अपना जन्म दिन उन्हें याद रहे या न रहे, सोमेश का अवश्य याद रखना पड़ता। सोमेश अभी कमाता तो था नहीं, उसके जन्म दिन की पार्टी भी रसिक को ही देनी पड़ती।

सबसे राहत की बात थी कि रसिक लाल के पास कोई कार नहीं थी। वे मोटर साइकिल से ही कहीं आते जाते थे। चुकि मोटरसाइकिल पर दोनों को एक साथ बिठा नहीं सकते थे, कहीं जाना होता तो बारी बारी से ही लेकर जा पाते।  यह उनके लिए सुनहरा क्षण होता क्योंकि पत्नी से अकेले में प्यार भरी दो बातें करने अवसर मिल जाता।  घर में एक  से बात करते तो दूसरी निरीक्षक की भांति सिर पर खड़ी हो जाती। रसिक लाल कभी भी दोनों बीबियों को साथ लेकर नहीं जा पाते। कभी एकाध बार साथ ले जाने का मौका मिला तो  दोस्त मित्र छेड़ने से बाज नहीं आये। वाह भाई मजे हैं तो बस रसिक लाल के, 'हम लोगों की किस्मत कहाँ कि जुडवा बीबी के साथ घूमें'।

पहले सीमा कभी मायके चली जाती तो रसिक लाल खाने पीने की परेशानी के कारण, जल्दी से जल्दी ले आते थे। अब तो वे चाहते हैं, दोनों  नहीं तो कम से कम एक मायके चली जाय ताकि कुछ शांति मिले। मगर दोनो में से कोई मायके जाने को तैयार नहीं होती। दोनों को डर था कि उसकी अनुपस्थिति में रसिक लाल दूसरे को अधिक प्यार न करने लगे।

समय बीता रेशमा गर्भवती हो गयी।  गर्भ धारण करने के कारण सीमा रसिकलाल को छोड़ उसका ध्यान रखने लगी। एक सुन्दर सा पुत्र उत्पन्न हो गया। पुत्र पाने से रेशमा से अधिक सीमा प्रसन्न हुई।  उसने शिशु का नाम सौम्य रख दिया पर बुलाती सोम कहकर ही। अब दोनों का ध्यान शिशु पर केंद्रित हो गया । बच्चे को दोनों माँ का भरपूर  प्यार मिलता। बच्चे में व्यस्त रहने के कारण अब दोनों में झगड़ा बहुत कम हो गया था। अब तो लगता था कि मैदान में दोनों टीमों का एक ही गोल है।  रसिक लाल की तो रेफरी की भी भूमिका जाती रही। अब सीमा कभी रेशमा से नाराज होती तो बच्चे को माध्यम बनाकर मन की कह डालती, 'देख तेरी छोटी मम्मी ने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया। मैं न रहूँ तो तेरा ख्याल भी कोई न करे।' और रेशमा भी जब उसकी देख भाल से थक जाती, 'तू तो बड़ी माँ का बेटा है, जा, उन्हीं के पास जा। '

बच्चे के लिए कुछ कम ज्यादा होता तो रसिक की शामत आ जाती। उसके लिए दूध, टॉनिक, खिलौने, कपड़ा आदि की शीघ्र और समुचित व्यवस्था करनी पड़ती। बच्चे के प्यार ने दोनों माताओं को एक कर दिया था। दोनों की प्रतियोगिता अब एक संगठन में बदल चुकी थी। रसिक लाल का काम बहुत बढ़ गया था, पर बालक की ख़ुशी में कोई भी बोझ उन्हें थोड़ा ही लगता।

एक कुछ सामान मंगाती तो थोड़ी देर में दूसरी की फरमाइश आ जाती।  'अरे, बच्चे की नैपी ख़त्म हो गयी है।' परेशान होकर रसिक लाल कहते, 'दोनों एक बार में क्यों नहीं बता देती, तुम दोनों के लिए अलग अलग चक्कर लगाना पड़ता है।' फिर झख मारकर बाजार जाते। कभी कभार बीबी को साथ लेकर शॉपिंग करने के लिए चलने को टाल देते। अब बच्चे के साथ सभी व्यस्त हो गए थे, और रसिक लाल शकुन की जिंदगी बिताने लगे थे।


कपड़ा पजामा छोटा



Saturday, 10 December 2016

Shadilal ki shadi

शादीलाल की शादी

पढ़ लिख कर खेती करें, यह शादीलाल को गवारा नहीं था। ग्रेजुएशन करने के बाद वे नौकरी ढूंढने लगे। पहले तो प्रशासनिक परीक्षा का भूत सवार हुआ, पर सफलता नहीं मिली तो सहायक की परीक्षा में बैठे। दो तीन बार प्रयास करने के बाद वहां भी हताशा ही हाथ लगी। अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफल नहीं हुए तो सोचे बी० एड०  करके अध्यापक बन जाएँ, मगर गांव में पहले ही कई लोग अध्यापक थे, वे कुछ अलग बनना चाहते थे। धीरे धीरे तीन वर्ष बीत गए। नौकरी नहीं मिलने के कारण शादी  भी नहीं कर रहे थे। माँ बार बार कहती पच्चीस का हो गया, शादी कर ले, अब क्या बूढा होकर करेगा।
शादीलाल महत्वाकांक्षी थे, वे कुछ बनना चाहते थे। अब उन्होंने एल.एल.बी. करने की ठानी, अभी तक, गांव में कोई वकील नहीं था। सोचे वकालत करके थोड़ी नेतागिरी भी चमक जाएगी।
देर किस बात की, जुगाड़ लगाया और एल.एल.बी. में प्रवेश मिल गया। कॉलेज गांव से काफी दूर था। मगर वे घर से ही आते जाते थे। आने जाने के लिए उन्हें कई तरह के साधन का प्रयोग करना पड़ता। कभी साईकिल तो कभी बस से, कभी किसी से लिफ्ट ले लिया, कभी पापा की पुरानी मोपेड से। खिंच खाँच कर वे अंतिम सत्र तक पहुँच गए थे। शादीलाल के माता पिता सोच रहे थे उनकी जल्दी शादी करके बहू लाया जाय, वे अपनी जिम्मेदारी से भी मुक्त हों और घर में थोड़ी चहल पहल हो। परन्तु उसकी शादी में दोहरा व्यवधान था, एक ओर तो शादीलाल का विवाह से पहले कुछ बनने का जनून, और दूसरा वकालत की पढ़ाई करने के कारण शादी के लिए अच्छे रिश्ते नहीं आ रहे थे। वकीलों की कमाई पर किसी को भरोसा नहीं था, चल गयी तो चल गयी नहीं तो बस  ... कचहरी में धक्के खाओ।

एक बार शादीलाल को देखने वाले आये। बातचीत चली तो लगा कि इस बार शादी पक्की हो जाएगी। मगर उनके वापस जाते समय गांव के किसी ने कह दिया, 'बनवारी लाल तो बड़े अच्छे व्यक्ति हैं पर उनका लड़का अवारा है। वह यूँ ही नाम के लिए वकालत कर कर रहा है कि शादी हो जाय। इतने अच्छे परिवार का होकर, अगर ठीक होता तो अब तक कुंवारा थोड़े ही बैठा होता।' वह पार्टी लौट कर दुबारा नहीं आयी।

एक दिन बनवारी लाल चकबंदी के सिलसिले में कचहरी गए थे, वहां उनके पुराने मित्र जगप्रवेश मिल गए। बात चीत में शादीलाल की बात चली। जगप्रवेश की पुत्री संध्या अब सयानी हो चुकी थी, उसने सोचा बनवारी लाल से जान पहचान है ही, क्यों न शादीलाल से विवाह का प्रस्ताव रखा जाय। बात आगे बढ़ी और बनवारी लाल ने संध्या से शादी पक्की कर दी। थोड़ी ना नुकुर करने के बाद शादी लाल भी मान गया और शादी तय हो गयी। शादीलाल के एल०एल०बी० का अंतिम वर्ष था।  वह चाहता था कि विवाह के लिए, परीक्षा के बाद की कोई तिथि निश्चित कर दी जाय। परन्तु उसकी परीक्षा के बाद की लग्न का कोई शुभ मुहुर्त नहीं था। अब शादी के लिए, शादीलाल या तो एक वर्ष और प्रतीक्षा करे या परीक्षा से पहले की ही कोई तिथि देख ली जाय। शादी के लिए पहले ही बहुत देर हो रही थी, बनवारी लाल चाहते थे कि अब और देर न किया जाय और इसी वर्ष के मुहूर्त में शादी कर दी जाय।   

पण्डित जी से परीक्षा का ध्यान रखते हुए, शादी का मुहुर्त निकालने के लिए कहा गया। बड़ा सोच विचार करके शादी की तिथि निश्चित की गयी और लग्न पत्रिका बन गयी। परीक्षा की विगत वर्षों की समय सारिणी देख कर, परीक्षा की संभावित अंतिम तिथि के बाद की तिथि निश्चित की गयी और शादीलाल के विवाह की तैयारी शुरू हो गयी। घर में शादीलाल के शादी का उत्साह देखते ही बनता था। विवाह के लिए अभी दो महीने का समय था, परन्तु शादीलाल की माँ का जोश देखकर लगता था कि कल परसों ही है। बहू के लिये कपड़े लत्ते खरीदे जाने लगे, उसे देने के लिए गहनों का आर्डर हो गया, शादीलाल के विवाह में पहनने के लिए सूट का आर्डर हो गया। जैसे जैसे समय समीप आता गया, शादीलाल के माँ की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। अब तो शादी के एक पखवाड़ा ही रह गया था और कई काम शेष रह गए थे।       

इधर शादीलाल की परीक्षा की वास्तविक समय सारिणी आई तो पता चला कि अंतिम परीक्षा की तिथि भी वही है जो शादी का दिन। अब तो विकट समस्या हो गयी, क्योंकि परीक्षा का समय अपरान्ह तीन से छः बजे तक था। शादी लाल पढ़ाई के लिए पूर्ण रूप से समर्पित था और किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहता था। वह परीक्षा की तैयारी में पहले ही जुटा था, उसकी माँ चाहती कि शादी की तैयारी में वह भी कुछ हाथ बँटाये, पर शादीलाल परीक्षा में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं चाहता था। यह अंतिम सत्र की परीक्षा थी। वह इसी सत्र में सफल होकर, वकील बनना चाहता था। परीक्षा के बीच में शादी की तिथि आ जाने के कारण, शादीलाल के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई थी। शादीलाल ने भी संकल्प ले रखा था कि वह दोनों ही दायित्वों का निर्वहन करेगा। 

 धीरे धीरे शादी की तिथि आ गयी। शादी पर जाने से पहले नहाने की रस्म, परछन आदि कई परम्पराओं का निर्वहन होना था और शादीलाल को परीक्षा के लिए भी जाना आवश्यक था। अब ये हुआ की परीक्षा देकर आने पर तो रात के आठ बज जायेंगे फिर कब ये सब होगा, कब बारात निकलेगी। अतः नहान परछन आदि पहले ही हो जाय और शादीलाल परीक्षा देकर सीधे मौजपुर, लड़की वालों के यहाँ पहुंचे। शादी के वस्त्र पहन कर परीक्षा के लिए जाना, शादीलाल को अटपटा लग रहा था इसलिए वह साधारण कपडे पहनकर ही जाना उचित समझा। शादी की लिए बना सूट और पगड़ी आदि बारात के साथ चली जाएगी, वह वहीँ पहन लेगा।

शादीलाल, पापा की मोपेड उठाया और परीक्षा स्थल पहुंच गया। उसे घर पर ही देर हो गयी थी इसलिए परीक्षा में कुछ बिलंब से ही बैठ पाया। उसकी शेष परीक्षा तो ठीक हो गयी, पर अंतिम परीक्षा में कई प्रकार के विघ्न का सामना करना पड़ा। ठीक से तैयारी नहीं होने के बावजूद भी शादी की उमंग में शादीलाल ने खूब लिखा और संतुष्ट होकर परीक्षा कक्ष से बाहर निकला। देर से आने के कारण, निरीक्षक ने उसकी कापी सबसे बाद में लिया। बाहर निकलते ही उस पर मौजपुर जाने की धुन सवार थी। अन्य परीक्षार्थी पूछते रहे, 'शादीलाल, पेपर कैसा हुआ?' पर उसके पास उनका उत्तर देने का समय तक नहीं था। शीघ्रता से जाकर मोपेड पे किक मारा। पर, यह क्या? मोपेड बीस पच्चीस मीटर चलकर बंद हो गयी। पता चला मोपेड में तेल गायब। घर से बिलम्ब से निकलने और परीक्षा की हड़बड़ी में पेट्रोल भरवाने का ध्यान नहीं रहा था। पास में कोई पेट्रोल पंप भी नहीं था। अब तो बड़ी समस्या हो गयी। क्या किया जाय ? मौजपुर कैसे पहुंचा जाय ?

कालेज से थोड़ी दूरी पर ही एक गांव था। वह मोपेड घसीटते हुए वहां पहुंचा। गांव के छोर पर ही जो पहला घर दिखा, एक बुजुर्ग व्यक्ति ने पूछ लिया, 'क्या हो गया भाई, गाड़ी पंचर हो गयी क्या?'
'नहीं दादा, पेट्रोल समाप्त हो गया है। थोड़ा मिटटी का तेल मिल जायेगा? मुझे मौजपुर शीघ्र से शीघ्र पहुंचना है।'
'रुको, देखता हूँ। ' और जाकर एक बोतल ले आया 'बस इतना ही है।'
'चलो, शायद इतने में काम बन जाय।'
शादीलाल मिट्टी का तेल भरकर, मोपेड से अपनी यात्रा पर आगे बढ़ा। एक बार फिर उसे मुसीबत ने घेरा। लड़की वालों के यहाँ पहुँचने से पहले ही मिट्टी का तेल भी ख़त्म हो गया। उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन भी नहीं था कि सूचित करके कोई अन्य साधन मंगवा ले। यह तो शुक्र था जहां तेल ख़त्म हुआ, उसी गांव में उसकी फुआ का घर था। वह झटपट वहां जाकर, गाड़ी खड़ी कर दिया।  फूफा आदि पहले ही बारात के लिए जा चुके थे, घर में बस फुआ की बहू थी। मोटर साइकिल भी सुभाष लेकर चला गया था। घर पर बस एक पुरानी साइकिल पड़ी थी। शादीलाल ने बिलम्ब किये बिना, साईकिल उठाया और आगे चल दिया।

उधर लड़की वालों के यहाँ हड़कम मचा हुआ था। बारात द्वार पर, दूल्हे का पता ही नहीं। रात के बारह बज चुके थे। लड़की वाले अत्यंत चिंतित थे। बारातियों को खिला पिला दिया गया था। अब विवाह का मुहुर्त रात साढ़े बारह बजे तक ही था। अब ये हुआ कि बाकी कार्यक्रम किये जायँ, हो सकता है तब तक शादीलाल आ जाय, उसे जलपान करके तुरंत विवाह के मण्डप में ले जाया जाय। हर जगह कुछ शरारती तत्व तो होते ही हैं। किसी ने तंज कस दिया, 'बारातियों को खिलाना पिलाना कहीं दण्ड न हो जाय। लगता है, लड़का किसी के प्यार में फंसा होगा, और भाग गया।'
एक समझदार व्यक्ति ने कहा, 'बातें बनाने से अच्छा है; एक, दो आदमी मोटर साइकिल से परीक्षा केंद्र तक चले जाओ और पता कर आओ कि क्या बात है। हो सकता है कोई अड़चन आ गयी हो, गाड़ी ख़राब हो गयी हो, कोई दुर्घटना हो गयी हो। ' 
दो लोग अभी मोटर साइकिल स्टार्ट ही कर रहे थे कि शादीलाल साइकिल से आते दिख गया। पूरे खेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। 'शादीलाल आ गया, शादीलाल आ गया।' मौजपुर के एकाध बच्चे अभी तक जगे थे, हंस कर कह रहे थे, 'हा, हा साईकिल पर दूल्हा।' 
शादीलाल के लिए झटपट मिठाई आयी और उससे कहा गया, ये लो पानी पीओ और सीधे मंडप में चलो। अब तक विवाह मंडप में कार्यक्रम शुरू हो चुका था। वस्त्र आदि बदलने में और समय व्यर्थ करने की बजाय शादीलाल को सीधे मण्डप में ही चलने के लिए कहा गया। जयमाल के कार्यक्रमों को रद्द कर दिया गया था। द्वारपूजा के नाम पर, द्वारपूजा के लिए बने चौक में दूल्हे को खड़ा करके बस दो मिनट का मंत्रोच्चार हुआ। और पंडित जी ने बोल दिया, 'लड़के को कुछ खिला पिला कर सीधे मंडप में ले चलो, फेरे और सिंदूर दान का समय हो चुका  है। अधिक बिलम्ब करने से मुहुर्त निकल जायेगा।'
शादीलाल को दोपहर से घर से निकला था, उसे बहुत भूख लगी थी किन्तु उसे इस बात का एहसास था कि उसके कारण लोग कितना परेशान हो रहे हैं। बोला, 'पहले सिंदूरदान कर लूँ , बाद में खा पी लूंगा।' पर लोगों ने शादीलाल की दयनीय हालत देखकर, पहले कुछ खा पी लेने के लिए आग्रह किया। उसके बाद शादी के मंडप में बिठाया गया।
शादीलाल का शादी का जोड़ा जामा रखा ही रह गया, उसे पहन पाने का अवसर नहीं मिल पाया और उसके साधारण कपड़ों में ही शादी हो गयी। मंडप में सजी धजी दुल्हन और अन्य सभी लोग, साफ-सुन्दर वस्त्रों में, बस शादीलाल साधारण कपड़े में सबसे अलग सर्कस का जोकर लग रहा था। दामाद को इस रूप में देखकर, जगप्रवेश को बहुत शर्म आ रही थी। जगप्रवेश ने कहा, 'सिंदूर दान के बाद शादीलाल जाकर कपड़े बदल लें। दस मिनट लगेगा, इसमें कुछ नहीं बिगड़ेगा। फोटोग्राफर को कह दिया फोटो वगैरह तभी लेना। शादीलाल को कपड़ों की तनिक भी म्लानि नहीं थी, आज उसके दोनों हाथ में लड्डू थे; एक तो वकालत की पढ़ाई पूरी हो गयी और दूसरे दुल्हन का हाथ उसके हाथ में। फिर भी ससुर का आग्रह मान कर वह कपड़े बदलने मंडप से बाहर निकला, जब बनवारी लाल से कपड़े माँगा तो पता चला वह तो घर पर ही छूट गया। बेचारे शादीलाल, फिर उसी परिधान में मंडप में विराजे। 

अगले दिन दुल्हन विदा कराके शादीलाल बड़े शान से ससुराल से चल दिया। राह में एक जगह गाड़ी रुकी तो किसी ने छेड़ दिया, 'भैया, किसकी नई नवेली दुल्हन लिए जा रहे हो?'
'अरे मेरी ही है, और किसकी !'

खैर, लिवास में क्या रखा है। शादीलाल के घर में नई दुल्हन आई। पास पड़ोस की स्त्रियां गीत गाने के साथ स्वागत में जुट गयीं। घर में रौनक लग गयी। शादी लाल की माँ के तो लग रहा था, पांव जमीं पर ही नहीं थे। माँ के कहने पर, शादीलाल अब थोड़ा बन ठन कर, दूल्हा जैसा दिखने लगा।




Monday, 5 December 2016

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निर्वासन

चुनाव का समय आ गया था। चुनावी दांव पैंतरों का खेल प्रारम्भ हो चुका था। किसी पार्टी का अध्यक्ष पैसे के बदले चुनाव का टिकट दे रहा था, कोई पार्टी सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध भड़का रही थी तो कोई पार्टी अपने हवाई वादों से मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटी थी। कौशिक जी के पास तो छल, बल सब कुछ था क्योंकि वे सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक होने के साथ मंत्री भी थे। प्रशासनिक अधिकारियों का चरित्र बस सत्ता पक्ष के मंत्रियों को प्रसन्न करने भर में सिमट चुका था। कौशिक जी का अपने क्षेत्र में तो वर्चस्व था ही, मंत्री होने के कारण वे अन्य क्षेत्र से भी विजय को हथिया लेने में सक्षम थे। इसलिये उन्होंने सोच रखा था, अपने गृह क्षेत्र से पुत्र वीरेन्द्र कौशिक को उतारें और स्वयं  किसी अन्य क्षेत्र से चुनाव लड़ें।

उनके गृह क्षेत्र से एक नया नेता सुन्दरलाल लोकप्रिय हो रहा था। वह क्षेत्र के समस्यायों से भली भांति अवगत था और समाधान हेतु यथाशक्ति संघर्षरत था। अधिकारियों को ज्ञापन देकर और समय-समय पर आंदोलनों के द्वारा क्षेत्र की समस्यायों को सरकार तक पहुंचाता रहता था। एक साधारण परिवार से होने के कारण सुन्दरलाल के साथ क्षेत्रीय जनता की सहानुभूति भरपूर थी। मंत्री जी को उसके लोकप्रियता की भनक मिल चुकी थी। इस बार के चुनाव में वह भी प्रत्याशी होने की तैयारी में जुटा था, मंत्री जी को इस बात का भी आभास था। वैसे तो पैसे आदि बंटवा कर मतदाताओं को प्रभावित कर सकने में वे सक्षम थे पर साथ ही डर भी था कि सुंदरलाल  नया लड़का है, कहीं परिवर्तन की आंधी न चल जाये और वीरेंद्र पर भारी पड़े। मंत्री जी कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते थे। यह वीरेंद्र का पहला चुनाव होगा, पहली ही बार हार गया तो उसका राजनितिक करियर बर्बाद हो जायेगा। अब मंत्री जी ने सुन्दर लाल की छवि धूमिल करने और उसे निर्बल बनाने के कार्य में जुट गए और अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए इस आशय का प्रशासन को निर्देश दे दिए । अब क्या था प्रशासन इस कार्य में तत्पर हो गया, सुंदरलाल के एक आंदोलन को रोकने में बल प्रयोग कर लाठी चार्ज करा दिया। कई लोग लहूलुहान हुए और सुन्दर लाल गिरफ्तार।
सुन्दर लाल पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, गेंगस्टर एक्ट और गुंडा एक्ट आदि की कई संगीन धाराएं लगा दी गयीं। मंत्री जी ने सोचा उनका काम हो गया। जिन लोगों पर लाठी चार्ज हुआ है, वे अब सुन्दर लाल का साथ छोड़ देंगे। पर हुआ इसके उलटा, सुन्दर लाल के पक्ष में जनसमर्थन और बढ़ गया। जेल में उससे मिलने हजारों लोग जाने लगे। इस कार्यवाही से मंत्री जी की चिंता और बढ़ गयी। उन्होंने प्रशासन से मिलकर, सबसे भयानक चाल चल दिया। सुन्दरलाल को जिला बदर करवा दिया। सुन्दर लाल के पास बड़ी लड़ाई लड़ने की क्षमता नहीं थी। वह क्षेत्र छोड़कर बहार चला गया और अपना समर्थन एक अन्य नेता मधुसूदन को दे दिया।

वीरेंदर लन्दन से एम बी ए की पढ़ाई पूरी कर चुका था और उसे वहीँ पर नौकरी भी मिल गयी। वह वहां एक गोरी लड़की, ऐना के प्यार में फंस चुका था और किसी भी हाल में उसे छोड़कर इंडिया नहीं आना चाहता था। मंत्री जी को इस बात का पता चला तो वह उस लड़की से वीरेंद्र का विवाह करने के लिए भी तैयार हो गए। मगर ऐना के दिमाग में इंडिया की तस्वीर अच्छी नहीं थी, वह यहाँ की राजनितिक गन्दगी के बारे में समाचार पत्रों में पढ़ चुकी थी और अपने मन ऋणात्मक बिम्ब बना चुकी थी। भारत का मौसम भी उसके अनुकूल नहीं था। वह भारत आने से साफ मना कर दी। वीरेन्द्र भी अपने प्यार को खोना नहीं चाहता था। मंत्री जी ने उसे बुलाने के लिए पूरा जोर लगा लिया मगर परचा दाखिल करने के लिए वीरेन्द्र को नहीं बुला पाए। अब मंत्री जी हाथ मल कर रह गए।  उनकी सारी मेहनत बेकार हो गयी।
दो बिल्लियों की लड़ाई में बन्दर ने लाभ उठा लिया। मधुसूदन विधायक हो गए। सरकार के कार्य कलापों से जनता प्रसन्न नहीं थी, इस बार वास्तव में परिवर्तन की आंधी चली और मंत्री जी को भी चुनाव में पराजय का सामना देखना पड़ा।

मंत्री जी घर में मुंह बनाकर बैठे थे कि वीरेन्द्र का लिखा एक पत्र मिला -
'विधायक जी ! जो दूसरों के लिए कांटे बोता है उसके राह में अपने आप कांटे उग आते हैं। आपने मुझे क्षेत्र से ;निकाला आपके बेटे को स्वतः ही देश निकाला मिल गया। अब तो आप पूरी जिंदगी अकेले ही बसर करेंगे या देश छोड़कर लन्दन में बसेंगे। यद्यपि मेरे लायक कोई काम हो तो निःसंकोच बताईयेगा।'

हार का विषाद कुछ कम होने पर मंत्री जी ने सुंदरलाल को फोन मिलाया -

'सुन्दर! जीत की बधाई। तुम भी मेरे बेटे जैसे हो, राजनीति में कोई व्यक्तिगत शत्रुता थोड़े ही होती है। अभी तुम नए हो, राजनीति के दांव पेंच अधिक नहीं जानते। मुझसे कोई मार्गदर्शन चाहिए होगा तो बता देना। वैसे तुम मेरी पार्टी में आ जाओ तो अच्छा रहेगा, अगले चुनाव में तुम्हें अपनी पार्टी का टिकट दिला दूंगा। '
'जी मंत्री जी, सोचने के लिए समय चाहिए'