छटका बीज
मंत्री जी ने बहुत प्रयत्न कर लिया, पर अमलताश है कि स्वदेश वापस आने का नाम ही नहीं लेता। अब तो वे खुद को ही कोसते हैं कि आखिर उसे लंदन पढ़ने भेजा ही क्यों ? ये भी नहीं कि किसी गोरी के चक्कर में हो, विवाह तो यहीं अपने संप्रदाय की ही लड़की से करके गया है।
मंत्री जी ने खूब पैसा कमाया और खूब लुटाया भी। उनके क्षेत्र का शायद ही कोई प्रधान होगा कि चुनाव में उनसे पैसे न लिया हो। वे अपने लोगों को खिला पिला कर और पैसे देकर खुश रखते थे। कई लोग तो उनके बड़े आभारी थे, मंत्री जी ने नियमों ताख पर रख के भी उनकी मदद की थी। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी थे, जरूरत पड़ने पर मंत्री जी के लिए कुछ भी कर सकते थे।
अमलताश, मंत्री जी का इकलौता बेटा था। उसको भी मंत्री जी के छोटे मोटे चमचे घेरे ही रहते थे। जो मंत्री जी तक सीधे नहीं पहुँच पाते, वे अमलताश के द्वारा सिफारिश करवाते और अपना उल्लू सीधा करते। बदले में अमलताश को बड़े बड़े सौगात मिलते। वैसे अमलताश शांतिप्रिय लड़का था, और उसे किसी से कुछ लेना पसंद नहीं था। एकाध बार तो उसने ले लिया, पर इन सब के पीछे की पूरी बात की, उसे समझ नहीं थी। उसे ऐसा लग रहा था कि उसके पिता लोक प्रतिनिधि हैं और लोगों की मदद करना उनका कर्तव्य है। केवल अपने निकटतम लोगों की ही सहायता करें, उसे अच्छा नहीं लगता। राजनीति एक व्यापार भी है, और लोगों के काम करवाने के पैसे लिए जाते हैं; यह सोचकर, उसे बड़ा अजीब लगता। वैसे भी मंत्री जी ने अकूत धन कमा रखा था। कहते हैं कि उनके विदेश में भी खाते थे। देश के बाहर के ठेकेदारों को कोई काम दिया जाता तो, ठेकेदार से बोल दिया जाता कमीशन की राशि बाहर ही स्विस बैंक में जमा करा दे। आवश्यकता पड़ने पर उसमें से आवश्यक राशि, मंत्री जी कभी घूमने जाते तो ले आते, या फिर किसी विश्वासपात्र से मंगवा लेते।
उस समय तो मंत्री जी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा भी, अभी से गन्दी राजनीति के दलदल में गिर जाय। वे चाहते थे, पहले ठीक से पढ़ाई कर ले, फिर राजनीति में आये। वैसे राजनीति से ऊपर इस देश में और कुछ था भी क्या ! प्रतिष्ठा और पैसा दोनों। एक बार हाथ में पैसा आ गया तो पैसे के बल पर जो चाहे कर लो। वे चाहते तो, अपने प्रभाव और धन के बल, छोटी उम्र में भी उसे विधायक बनवा सकते थे। मगर, अमलताश को उन्होंने पढ़ने के लिए लंदन भिजवा दिया। बेटे के लन्दन जाने से उनकी एक और समस्या हल हो गयी। स्विस बैंक का खाता का भी प्रबंध भी सरलता से हो जाता। अमलताश, जहां पढ़ाई में यहाँ फिसड्डी होने लगा था, लंदन जाकर उसका दिमाग खुल गया और सही संगत पाकर, ठीक से पढ़ने लगा। एम० बी० ए० कर लेने के बाद, एक वित्तीय कंपनी में, उसे वहीँ जॉब मिल गयी।
इधर मंत्री जी ने रेवड़ियां बांटकर अपने लोगों को तो खुश किया था, मगर क्षेत्र में सार्वजनिक कार्यों में विशेष प्रगति नहीं होने के कारण, अगले चुनाव में हार गए। और, एक बार क्या हारे कि फिर उसके बाद, दुबारा कभी जीत न सके। दूसरी पार्टी की सरकारों ने उनके भ्रष्टाचार का पोल खोलना शुरू कर दिया। अब वे अपनी जिंदगी से दुखी रहने लगे। सिर पर भ्रष्टाचार का कलंक, उन्हें भारी लगने लगा था। कई प्रकार के जांच का भी सामना करना पड़ रहा था। अब वे चाहते थे, अमलताश को वापस बुला लें और उसे अपना राजनितिक उत्तराधिकारी बना दें। अमलताश को लंदन इतना भा गया था कि उसे वापस अपने वतन आना गवारा नहीं था। अपनी माँ की बात मानकर, शादी तो यहां आकर कर लिया था, पर बहू को साथ लेकर वहीं चला गया।
मंत्री जी ने कितनी ही बार कहा, 'बेटा आ जा तुझे किसी न किसी पार्टी में घुसाकर, मंत्री नहीं तो कम से कम विधायक तो बनवा ही दूंगा। यहाँ पर मान मर्यादा है, धन दौलत है, चार लोग जानते हैं; वहां इतनी दूर अकेला कहां पड़ा है !'
मगर अमलताश कहता, 'पापा मैं शांति का जीवन बिता रहा हूँ। मैंने, अपनी एक वित्तीय कंपनी खोल ली है। वहां पर सब काम बिना किसी मंत्री के सिफारिश के हो जाते हैं। बस नियमों का ज्ञान होना चाहिए। मैं तो कहता हूं, आप भी वहीँ चलिए और शान्ति से जीवन बिताइए। वहां दूसरों के बीच कोई टांग नहीं अड़ाता, बस अपने काम से काम।'
''मुझे सब पता है, ऐसे कह रहा है, जैसे कि मैंने लन्दन देखा ही नहीं। वहां कोई एक दूसरे से बात करके राजी नहीं। न पास, न पड़ोस, बस घर में बैठे रहो। न तो कोई हाल चाल लेने वाला होता न ही कोई सुख दुःख में किसी के साथ होता।'
'नहीं पापा वहां सरकार ने सब व्यवस्था कर रखी है और बिना किसी भेदभाव के। और, कोई जरूरत पड़ने पर, अपने इंडियन लोग तो हैं ही। '
अमलताश अब पूरी तरह लंदन में जम चुका था। जितनी सुख सुविधा से, मंत्री जी यहाँ रह रहे थे, उससे कम वहां अमलताश के पास भी नहीं थी। बस अंतर यह था कि पैसा होने के बावजूद भी उसे अपना काम खुद करना पड़ता। उसके पास न तो चमचे थे, न बेगारी करने वाले। उसके पास भी बड़ा सा बंगला था, मर्सिडीज कार थी। हाँ कार पर लाल बत्ती नहीं थी। और तो और, नियमों का उलंघन करने पर, चालान भी भरना पड़ता। मगर उसे वहीं की जिंदगी अच्छी लगती थी। यहां जबरदस्ती के चार लोगों के घेरे में रहना, और इनकी उनकी चुगली करना व सुनना उसे पसंद नहीं था। अमलताश के मन में कहीं न कहीं यह भी डर था कि गलत तरीके से कमाया धन का आगे की पीढ़ी उपभोग भी कर पायेगी या वही उसके संकट का कारण भी बन जाएगी। पापा पर तो जांच चल ही रही है।
इस बार जब अमलताश घर आया तो मंत्री जी ने फिर आग्रह किया, ' बेटा तू लौट आ, हमारे पास इतना है कि चार पीढ़ी बैठ कर खायेगी तो भी समाप्त नहीं होगा। यहाँ पर अन्य लोग हमारा खा रहे हैं और तुझे वहां काम करना पड़ रहा है।'
'पिताजी मैं तो यही कहता हूँ, आप भी वहीँ चलो। आपका ग्रीन कार्ड बनवा देता हूँ। अब आपकी पार्टी की सरकार बनेगी नहीं और आप जाँच ही झेलते रह जायेंगे।'
अब तो मंत्री जी बार बार यही सोचते, 'आखिर मेरा माथा क्यों फिर गया कि इसे लन्दन पढ़ने के लिए भेजा। यहीं रहा होता तो, बेशक पढ़ता लिखता नहीं, पर यहाँ के माहौल में मंज गया होता।'
कहते हैं न, बेटे की जिद्द के आगे कौन जीता है। लाख समझाया बुझाया पर अमलताश की बुद्धि पर धूल पड़ी थी, उसे किसी की बात समझ नहीं आ रही थी। अंततः यही तय हुआ कि अमलताश तो छुट्टियों में आएगा ही, बीच बीच में मंत्री जी भी आते जाते रहेंगे। कोई समस्या होगी तो लंदन कौन सा दूर है, अमलताश छः सात घंटे में उड़ कर आ जायेगा।
एक बार मंत्री जी की तबियत कुछ बिगड़ी, तो अमलताश, रंजना के साथ तुरंत घर आ गया। लगभग एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहने के बाद उन्हें छुट्टी मिली। डाक्टर ने दो माह तक पूर्ण विश्राम की सलाह दी। अमलताश इतनी लम्बी छुट्टी नहीं ले सकता था, इसलिए मंत्री जी को साथ लन्दन ले जाने की सोचा। टिकट वगैरह करवा दिया। मंत्री जी का लम्बी अवधी का वीसा पहले ही बना हुआ था। अमलताश और मंत्री जी के जाने में अब तीन चार दिन का ही समय रह गया था। वे जाने कि तैयारी में लगे ही थे कि अचानक जाँच ब्यूरो का सम्मान आ गया। मंत्री जी को एक सप्ताह के अंदर, जाँच आयोग के समक्ष प्रस्तुत होना था। जब मंत्री जी जाँच आयोग के समक्ष पेश हुए तो उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया, और जाँच पूरी होने तक उनके विदेश जाने पर रोक लग गयी।
अब तो, अमलताश फंस गया और उसके पास, अपनी छुट्टी बढ़ाने के अतिरिक्त, कोई चारा नहीं था। मंत्री जी के स्वस्थ होते ही वे लंदन चले गए। बेटा बहू के विदेश में रहने के कारण, घर में मंत्री जी और उनकी पत्नी के अतिरिक्त और कोई भी नहीं था। इतना बड़ा घर, अकेले काटने को दौड़ता। सहारे के लिए, उन्हें किसी न किसी को पाल के तो रखना ही था। अब नौकरों का ही सहारा रह गया था। मंत्री जी बार बार यही सोचते जिसके लिए इतना कुछ कमाया, भ्रष्टाचार का कलंक लिया, वही इस धन को नकार रहा है। पहले जितने आराम का जीवन बिताया, अब उससे भी बड़ा कष्ट ढोना पड़ रहा है। बुढ़ापे का बदन, जांच की चिंता, अकेलेपन का दंस, कमाया धन दूसरे ही खा रहे थे। मंत्री जी का लगाया बाग, वीरान सा हो रहा था। अब तो वे यही सोचते, कब विदेश जाने से रोक हटे और वे अमलताश के पास चले जांय।