Monday, 24 July 2017

Baap deshi beta videshi / chhataka beej


छटका बीज

मंत्री जी ने बहुत प्रयत्न कर लिया, पर अमलताश है कि स्वदेश वापस आने का नाम ही नहीं लेता। अब तो वे खुद को ही कोसते हैं  कि आखिर उसे लंदन पढ़ने भेजा ही क्यों ?  ये भी नहीं कि किसी गोरी के चक्कर में हो, विवाह तो यहीं अपने संप्रदाय की ही लड़की से करके गया है।

मंत्री जी ने खूब पैसा कमाया और खूब लुटाया भी। उनके क्षेत्र का शायद ही कोई प्रधान होगा कि चुनाव में उनसे पैसे न लिया हो। वे अपने लोगों को  खिला पिला कर और पैसे देकर खुश रखते थे। कई लोग तो उनके बड़े आभारी थे, मंत्री जी ने नियमों ताख पर रख के भी उनकी मदद की थी। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी थे, जरूरत पड़ने पर मंत्री जी  के लिए  कुछ भी कर सकते थे।
अमलताश, मंत्री जी का इकलौता बेटा था। उसको भी मंत्री जी के छोटे मोटे चमचे घेरे ही रहते थे। जो मंत्री जी तक सीधे नहीं पहुँच पाते, वे अमलताश के द्वारा सिफारिश करवाते और अपना उल्लू सीधा करते। बदले में अमलताश को बड़े बड़े सौगात मिलते। वैसे अमलताश शांतिप्रिय लड़का था, और उसे किसी से कुछ लेना पसंद नहीं था। एकाध बार तो उसने ले लिया, पर इन सब के पीछे की पूरी बात की, उसे समझ नहीं थी। उसे ऐसा लग रहा था कि उसके पिता लोक प्रतिनिधि हैं और लोगों की मदद करना उनका कर्तव्य है। केवल अपने निकटतम लोगों की ही सहायता करें, उसे अच्छा नहीं लगता। राजनीति एक व्यापार भी है, और लोगों के काम करवाने के पैसे लिए जाते हैं; यह सोचकर, उसे बड़ा अजीब लगता। वैसे भी मंत्री जी ने अकूत धन कमा रखा था।  कहते हैं कि उनके विदेश में भी खाते थे। देश के बाहर के ठेकेदारों को कोई काम दिया जाता तो, ठेकेदार से बोल दिया जाता कमीशन की राशि बाहर ही स्विस बैंक में जमा करा दे। आवश्यकता पड़ने पर उसमें से आवश्यक राशि, मंत्री जी कभी घूमने जाते तो ले आते, या फिर किसी विश्वासपात्र से मंगवा लेते।

उस समय तो मंत्री जी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा भी, अभी से गन्दी राजनीति के दलदल में गिर जाय। वे चाहते थे, पहले ठीक से पढ़ाई कर ले, फिर राजनीति में आये। वैसे राजनीति से ऊपर इस देश में और कुछ था भी क्या ! प्रतिष्ठा और पैसा दोनों। एक बार हाथ में पैसा आ गया तो पैसे के बल पर जो चाहे कर लो। वे चाहते तो, अपने प्रभाव और धन के बल, छोटी उम्र में भी उसे विधायक बनवा सकते थे। मगर, अमलताश को उन्होंने पढ़ने के लिए लंदन भिजवा दिया। बेटे के लन्दन जाने से उनकी एक और समस्या हल हो गयी। स्विस बैंक का खाता का भी प्रबंध भी सरलता से हो जाता। अमलताश, जहां पढ़ाई में यहाँ फिसड्डी होने लगा था, लंदन जाकर उसका दिमाग खुल गया और सही संगत पाकर, ठीक से पढ़ने लगा। एम० बी० ए० कर लेने के बाद, एक वित्तीय कंपनी में, उसे वहीँ जॉब मिल गयी।
इधर मंत्री जी ने रेवड़ियां बांटकर अपने लोगों को तो खुश किया था, मगर क्षेत्र में सार्वजनिक कार्यों में विशेष प्रगति नहीं होने के कारण, अगले चुनाव में हार गए। और, एक बार क्या हारे कि फिर उसके बाद, दुबारा कभी जीत न सके। दूसरी पार्टी की सरकारों ने उनके भ्रष्टाचार का पोल खोलना शुरू कर दिया। अब वे अपनी जिंदगी से दुखी रहने लगे। सिर पर भ्रष्टाचार का कलंक, उन्हें भारी लगने लगा था। कई प्रकार के जांच का भी सामना करना पड़ रहा था। अब वे चाहते थे, अमलताश को वापस बुला लें और उसे अपना राजनितिक उत्तराधिकारी बना दें। अमलताश को लंदन इतना भा गया था कि उसे वापस अपने वतन आना गवारा नहीं था। अपनी माँ की बात मानकर, शादी तो यहां आकर कर लिया था, पर बहू को साथ लेकर वहीं चला गया।
मंत्री जी ने कितनी ही बार कहा, 'बेटा आ जा तुझे किसी न किसी पार्टी में घुसाकर, मंत्री नहीं तो कम से कम विधायक तो बनवा ही दूंगा। यहाँ पर मान मर्यादा है, धन दौलत है, चार लोग जानते हैं; वहां इतनी दूर अकेला कहां पड़ा  है !'
मगर अमलताश कहता, 'पापा मैं शांति का जीवन बिता रहा हूँ। मैंने, अपनी एक वित्तीय कंपनी खोल ली है। वहां पर सब काम बिना किसी मंत्री के सिफारिश के हो जाते हैं।  बस नियमों का ज्ञान होना चाहिए। मैं तो कहता हूं, आप भी वहीँ चलिए और शान्ति से जीवन बिताइए। वहां दूसरों के बीच कोई टांग नहीं अड़ाता, बस अपने काम से काम।'
''मुझे सब पता है, ऐसे कह रहा है, जैसे कि मैंने लन्दन देखा ही नहीं। वहां कोई एक दूसरे से बात करके राजी नहीं। न पास, न पड़ोस, बस घर में बैठे रहो। न तो कोई हाल चाल लेने वाला होता न ही कोई सुख दुःख में किसी के साथ होता।'
'नहीं पापा वहां सरकार ने सब व्यवस्था कर रखी है और बिना किसी भेदभाव के। और, कोई जरूरत पड़ने पर, अपने इंडियन लोग तो हैं ही। '
अमलताश अब पूरी तरह लंदन में जम चुका था। जितनी सुख सुविधा से, मंत्री जी यहाँ रह रहे थे, उससे कम वहां अमलताश के पास भी नहीं थी।  बस अंतर यह था कि पैसा होने के बावजूद भी उसे अपना काम खुद करना पड़ता। उसके पास न तो चमचे थे, न बेगारी करने वाले। उसके पास भी बड़ा सा बंगला था, मर्सिडीज कार थी। हाँ कार पर लाल बत्ती नहीं थी। और तो और, नियमों का उलंघन करने पर, चालान भी भरना पड़ता। मगर उसे वहीं की जिंदगी अच्छी लगती थी। यहां जबरदस्ती के चार लोगों के घेरे में रहना, और इनकी उनकी चुगली करना व सुनना उसे पसंद नहीं था। अमलताश के मन में कहीं न कहीं यह भी डर था कि गलत तरीके से कमाया धन का आगे की पीढ़ी उपभोग भी कर पायेगी या वही उसके संकट का कारण भी बन जाएगी। पापा पर तो जांच चल ही  रही है।

मंत्री जी ने उसे हर तरह से समझा लिया, जन्म भूमि का भी वास्ता दिया, पर अमलताश को राजनीति का दलदल बिल्कुल भी पसंद नहीं था। राजनीति में बस तिकड़म करते रहो। हमेशा अनिश्चितता का माहौल। दूसरों के लिए चक्रव्यूह रचते रहो। अपने पद का दुरुपयोग और गलत तरीके से पैसे कमाओ, यह सब उसे बिलकुल भी रास नहीं आ रहा था। उसे अपने पिता के कमाये धन का कोई लोभ नहीं था, वह परिश्रम से कमाकर कुछ बनना चाहता था। सभी सम्बन्धी और मित्र उसके सीधे सादे आचरण की प्रशंसा तो करते, मगर उसके वापस अपने देश आने का आग्रह भी करते। उसके सत्ता में बने रहने से, उन लोगों को जिस प्रकार मंत्री जी से लाभ मिलता था, आगे भी चलते रहने का क्रम सुनिश्चित हो जाता।  
इस बार जब अमलताश घर आया तो मंत्री जी ने फिर आग्रह किया, ' बेटा तू लौट आ, हमारे पास इतना है कि चार पीढ़ी बैठ कर खायेगी तो भी समाप्त नहीं होगा। यहाँ पर अन्य लोग हमारा खा रहे हैं और तुझे वहां काम करना पड़ रहा है।'
'पिताजी मैं तो यही कहता हूँ, आप भी वहीँ चलो। आपका ग्रीन कार्ड बनवा देता हूँ। अब आपकी पार्टी की सरकार बनेगी नहीं और आप जाँच ही झेलते रह जायेंगे।'
अब तो मंत्री जी बार बार यही सोचते, 'आखिर मेरा माथा क्यों फिर गया कि इसे लन्दन पढ़ने के लिए भेजा। यहीं रहा होता तो, बेशक पढ़ता लिखता नहीं, पर यहाँ के माहौल में मंज गया होता।'
कहते हैं न, बेटे की जिद्द के आगे कौन जीता है। लाख समझाया बुझाया पर अमलताश की बुद्धि पर धूल पड़ी थी, उसे किसी की बात समझ नहीं आ रही थी। अंततः यही तय हुआ कि अमलताश तो छुट्टियों में आएगा ही, बीच बीच में मंत्री जी भी आते जाते रहेंगे। कोई समस्या होगी तो लंदन कौन सा दूर है, अमलताश छः सात घंटे में उड़ कर आ जायेगा।
एक बार मंत्री जी की तबियत कुछ बिगड़ी, तो अमलताश, रंजना के साथ तुरंत घर आ गया। लगभग एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहने के बाद उन्हें छुट्टी मिली। डाक्टर ने दो माह तक पूर्ण विश्राम की सलाह दी। अमलताश इतनी लम्बी छुट्टी नहीं ले सकता था, इसलिए मंत्री जी को साथ लन्दन ले जाने की सोचा। टिकट वगैरह करवा दिया। मंत्री जी का लम्बी अवधी का वीसा पहले ही बना हुआ था। अमलताश और मंत्री जी के जाने में अब तीन चार दिन का ही समय रह गया था। वे जाने कि तैयारी में लगे ही थे कि अचानक जाँच ब्यूरो का सम्मान आ गया। मंत्री जी को एक सप्ताह के अंदर, जाँच आयोग के समक्ष प्रस्तुत होना था। जब मंत्री जी जाँच आयोग के समक्ष पेश हुए तो उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया, और जाँच पूरी होने तक उनके विदेश जाने पर रोक लग गयी।
अब तो, अमलताश फंस गया और उसके पास, अपनी छुट्टी बढ़ाने के अतिरिक्त, कोई चारा नहीं था। मंत्री जी के स्वस्थ होते ही वे लंदन चले गए। बेटा बहू के विदेश में रहने के कारण, घर में मंत्री जी और उनकी पत्नी के अतिरिक्त और कोई भी नहीं था। इतना बड़ा घर, अकेले काटने को दौड़ता। सहारे के लिए, उन्हें किसी न किसी को पाल के तो रखना ही था। अब नौकरों का ही सहारा रह गया था। मंत्री जी बार बार यही सोचते जिसके लिए इतना कुछ कमाया, भ्रष्टाचार का कलंक लिया, वही इस धन को नकार रहा है। पहले जितने आराम का जीवन बिताया, अब उससे भी बड़ा कष्ट ढोना पड़ रहा है। बुढ़ापे का बदन, जांच की चिंता, अकेलेपन का दंस, कमाया धन दूसरे ही खा रहे थे। मंत्री जी का लगाया बाग, वीरान सा हो रहा था। अब तो वे यही सोचते, कब विदेश जाने से रोक हटे और वे अमलताश के पास चले जांय।

Door ke dhol


दूर के ढोल

राकेश परीक्षा में सदा अच्छे परिणाम लाता।  इस कारण माता पिता को भी उससे बहुत अच्छी उम्मीद रहती थी।  १० वीं १२ वीं सभी परीक्षा अव्वल दर्जे से पास किया। उसके बाद मिश्र जी ने इंजीनियरिंग करवा दिया। मिश्रा जी अच्छे स्तर के अधिकारी थे।  वे चाहते थे की पुत्र भी कोई सरकारी अधिकारी बने।  परन्तु अपने यहाँ तो इतनी कठिन प्रतियोगिता है और हर कदम पर अनिश्चितता बनी रहती है। कहीं पैसे के बल तो कहीं सिफारिश के बल अयोग्य लोग नौकरी पा जाते हैं और योग्यता धरी रह जाती हैं। एकाध जगह प्रतियोगिता में परीक्षा दिया पर सफलता नहीं मिली। सरकारी नौकरी में आधी  सीट तो आरक्षित हो जाती हैं। आधे में ही भाग्य अजमाना था।

कितना भी पढ़ लिख लो, उच्च अधिकारी बन जाओ, मगर अनपढ़ नेताओं के आगे झुकना पड़ता है। स्वयं को विषय का ज्ञान न होने पर भी उन्हीं की चलती है।  यहाँ तक कि कई बार अपमान का भी सामना करना पड़ता है। एकाध बार असफल होने के कारण राकेश कुछ उदास रहने लगा।  इन बातों से क्षुब्ध मिश्रा जी को यही निर्णय सही लगा कि  राकेश को और आगे की पढ़ाई करने लिए विदेश भेज दिया जाय। वहां कम से कम कानून व्यवस्था तो ठीक है और मानवाधिकार का सम्मान है। एक दिन उन्होंने राकेश की मम्मी के समक्ष यह बात रख दी।  उसे तो लगा की सांप सूंघ गया।
'इकलौता बेटा है वो भी दूर रहेगा ? विदेश क्यों भेजना ? यहाँ क्या रोटी नहीं मिलेगी ? और भी सभी तो इस देश में ही कमा खा रहे हैं ?' उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
'देखो जी हमने तो तंगी में जिंदगी काट ली, अगर बच्चे कुछ करना चाहते हैं तो उन्हें प्रोत्साहन देने में क्या जाता है। हाँ, जाने के लिए रुपये पैसे की जरूरत किसी तरह पूरा कर लेंगे।'
उस समय तो मिश्रा जी चुप हो गए पर बीच बीच में राकेश की मम्मी से इस विषय पर चर्चा करते रहते। उनकी नौकरी में आई तरह तरह की परेशानियों से वह परिचित थी। बार बार तबादला, राजनीतिज्ञों का गलत काम करने का दबाव, किसी राजनीतिज्ञ के प्रसन्न न होने पर हंगामा, गलती होने पर फंसने का डर अनेकों अनिश्चितताओं से घिरे, सदा भय में ही नौकरी करनी पड़ती थी। उसने अमेरिका व यूरोप के कई देशों में साफ सुथरा प्रशासन के बारे में सुन रखा था।  सभी बड़े नेताओं, उद्योगपतियों, बड़े अधिकारीयों के बच्चे विदेश पढने जाते हैं। यह सब देख कर उसका भी मन राकेश को विदेश भेजने के लिए चुगला रहा था मगर यही बात सता रही थी की एक बार विदेश गया तो वापिस नहीं आएगा।
'देखो जी भेज तो दें पर सुना है जो बच्चे विदेश पढने गए वहीँ के होकर रह गए।  हम लोग बुढ़ापे में अकेले कैसे रहेंगे?'
'अरे, अकेले क्या ? आते जाते रहेंगे और आजकल  यहाँ रहके भी  कोई क्या करता है? सब अपने अपने में व्यस्त हैं।  बीबी आई नहीं की बच्चे बीबी के हो  जाते हैं, माँ बाप की कौन सुनता है। '
तभी राकेश आ जाता है।  अमेरिका के बारे में तो मित्रों से वह पहले ही सुन रखा था और उसका भी मन अमेरिका जाने के लिए लालायित था।  मम्मी पापा के तर्क वितर्क सुन कर बीच में कूद पड़ता है -
'क्यों मम्मी, आप लोग भी साथ चलना, सब वहीँ रहेंगे। '
'इसका अर्थ कि तू भी हमें छोड़ कर जाना चाहता है। '
'मम्मी, वहां बड़ी अच्छी लाइफ है।  वृजेश, आदित्य, आलोक वहां गए, सब वहीँ सेटल हो गए। वहां की लाइफ इतनी अच्छी है, अब वे वापस आना ही नहीं चाहते। वहां उत्तम आय के साथ रोजगार के बड़े अच्छे अवसर हैं। '
'अच्छा ठीक है, जाना ही चाहता है तो हमें क्या।  हम तो यही चाहते हैं कि तू सुखी रह। '
फिर क्या, राकेश प्रसन्न हो जाता है।  दोस्त मित्रों से काना फूसी शुरू कर देता है।  दोस्तों से बात करने पर पता लगता है अमेरिका जाना इतना सरल नहीं है। बहुत पैसा लगता है, हाँ. एक बार चले गए तो वसूल भी हो जाता है।  वहां पढ़ाई चलते, पार्ट टाइम छोटा मोटा काम भी मिल जाता है।  समझदार बच्चे कुछ करके अपना खर्च निकाल लेते हैं। यह जानकर राकेश का उत्साह और बढ़ जाता है। मन में विचार करता है मैं मम्मी पापा पर अधिक बोझ नहीं डालूँगा, मेहनत करके खर्च निकाल लूँगा। फिर पढने के बाद जॉब मिल जाएगी तो इतना पैसा भेजूंगा कि इन लोगों को पैसे की कमी कभी नहीं खलेगी।
मिश्रा जी भी राकेश को पढ़ाने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। उन्होंने पहले ही सोच रखा था राकेश जहाँ तक पढ़ेगा, पढ़ाएंगे। वह चाहेगा तो अमेरिका, इंग्लैंड भी भेज देंगे। तैयारी प्रारम्भ हो जाती है, मिश्रा जी अपने निवेश का हिसाब लगाना शुरू कर देते हैं। कौन से सावधि जमा (एफ डी ) कब पूरी होगी, कितनी राशि मिलेगी। सब मिला के जो राशि बन पा रही है अमेरिका जाने के लिए भारी भरकम आवश्यकता के लिए कम पड़ रही थी। मिश्रा जी चिन्तित थे बाकी पैसे कहाँ से लायें। बैंक भी पता नहीं कितना ऋण देगा। राकेश की मम्मी कोई नौकरी वगैरह तो करती नहीं थी, पर इधर उधर से बचा कर एक लाख रुपये एकत्र कर लिए थे उसे देने का प्रस्ताव रख दिया। इधर राकेश जीआरई और टोफेल करने में जुटा था, जिसे वह पास कर लिया।  

मिश्रा जी ने एक बैंक से बात किया। उनके सरकारी नौकरी होने के कारण ऋण मिलने अधिक परेशानी नहीं हुई। एक दिन राकेश अमेरिका के लिए उड़ गया।

     

Friday, 14 July 2017

Assmaan ki khoj

आसमान की खोज / छोटा  आकाश

आकाश बचपन से ही बहुत होनहार और प्रतिभाशाली था। अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आता। कोई हवाई जहाज उड़ता देखता तो अपने पापा से पूछता, 'इतना बड़ा जहाज हवा में कैसे उड़ जाता है ?'
बनर्जी साहब इसका सही उत्तर तो नहीं दे पाते, पर जब उसे बताते कि जहाज, खाली उड़ता ही नहीं बल्कि अपने भीतर सैकड़ों लोगों को बिठाकर उड़ता है, तो वह बहुत रोमांचित हो जाता।
'मैं भी उसमें बैठ पाउँगा, पापा !'
'हां, क्यों नहीं।  तुम हवाई जहाज में जरूर बैठोगे। '
'कब ?'
'बस थोड़ा और बड़े हो जाओ, कुछ पढ़ लिख लो। पढ़ लोगे तो तुम्हें अच्छी सी नौकरी मिल जाएगी, तुम अफसर बन जाओगे फिर तो जहाज में देश, विदेश घूमोगे।'
आकाश अपने पापा की बात से संतुष्ट हो जाता और उन्हें खूब पढ़ने का आश्वासन देता।
'मैं आपको भी हवाई जहाज में घुमाऊंगा।'
'हां मैं भी चलूँगा, और तुम्हारी मम्मी भी चलेगी।'
'हाँ'
आकाश की जिज्ञासा बढ़ती गयी। वह कोई भी मशीन या उपकरण देखता उसके बारे में गहराई से सोचता, वह किस प्रकार बना होगा, कैसे काम करता है, क्या इससे भी अधिक उपयुक्त हो सकता है, आदि आदि। आकाश के गवेषणापूर्ण प्रश्नों को सुनकर बनर्जी साहब कहते, 'लगता है तू बड़ा होकर वैज्ञानिक बनेगा।'
धीरे धीरे, आकाश बड़ा हुआ, उच्चतर माध्यमिक में उसने विज्ञानं विषय लेकर पढ़ाई की। विज्ञानं में उसकी बहुत रूचि थी और परीक्षा में अच्छे अंक लाता। एक बार स्कूल में विज्ञान की एक प्रदर्शनी लगी। विज्ञान विषय पढ़ने वाले सभी छात्रों को प्रदर्शनी में भाग लेना था कर मॉडल बनाकर रखना था। आकाश ने सबसे कुछ अलग ही सोचा। वह सौर्य ऊर्जा से चलने वाला, छोटा सा विमान बनाना चाहता था । उसने हवाई जहाज के उड़ने की तकनिकी के बारे में अध्ययन किया और सामग्री जुटाने में लग गया। सोलर पैनल और कुछ सामान तो वह ले आया मगर और सामान के लिए काफी पैसे की आवश्यकता थी। उसे न तो घर से उतना पैसा मिल पा रहा था न ही विद्यालय ने उपलब्ध कराया। उसने अपने प्रोजेक्ट के लिए अपने एक मित्र को सहयोगी बनाने की सोचा ताकि कुछ वित्तीय मदद मिल सके। परन्तु पैसे के नाम पर वह भी विदक गया। आकाश, निराश हो गया।

फिर भी, उसकी लगन और साहस उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। वह हार मानने वाला नहीं था। यह तो जान ही चुका था अपने पास उपलब्ध साधन से वह विमान का मॉडल नहीं बना सकता था। मगर उस दिशा में उसे कुछ प्रयोग अवश्य करने थे। अब वह विमान बनाने की जगह सोलर रिक्शा बनाने में लग गया। कई विशेषताओं से परिपूर्ण, प्रदर्शनी तक उसने अपना रिक्शा तैयार भी कर लिया। थोड़ी देर धूप में रखने के बाद, बटन दबाते ही रिक्शा दौड़ पड़ता और रिमोट कण्ट्रोल से उसकी दिशा और गति नियंत्रित कर ली जाती। पूरी प्रदर्शनी में उसका वह मॉडल आकर्षण का केंद्र बन गया।  उसके बाद भी आकाश तरह तरह के प्रयोग करना चाहता, पर पैसे की जगह उसे झिड़की ही मिलती।

उच्चतर माध्यमिक परीक्षा में भौतिक शास्त्र में, उसके शत प्रतिशत अंक थे। बारहवीं के बाद, परिवार वालों ने उसे इंजीनियरिंग कराना चाहा, पर आकाश वैज्ञानिक बनने की ठान चुका था। वह बी० एससी० और उसके उपरांत एम० एससी० करना चाहता था, ताकि आगे चलकर कोई शोध कार्य करे। उसका मन अभी से कोई नया अविष्कार करने का था।  भौतिकी से स्नातक करने के बाद, उसकी पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी हुई और साथ ही, कनिष्ठ वैज्ञानिक के पद के लिए, उसका चयन हो गया।

राष्ट्र के अंतरिक्ष अनुसन्धान केंद्र में आकाश को नियुक्ति मिली तो उसे लगा कि मन  की मुराद मिल गयी। वह स्वयं को विज्ञान के लिए समर्पित कर देना चाहता था। उसके मन में था कि देश के लिये ऐसे ऐसे अविष्कार करे कि दुनिया मुंह ताके। कुछ समय तक सब ठीक चलता रहा । अनुसन्धान केंद्र में उसकी प्रतिभा को काफी सम्मान मिला और काफी कुछ सीखने को मिला। उसने अंतरिक्ष और अंतरिक्ष यान के बारे में बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वह और नए नए प्रयोग करना चाहता था पर यहां भी वही बजट का प्रश्न था। शोध व प्रयोग के लिए, आवश्यक सामग्री नहीं मिल पाती। शोध के नाम पर विदेशों से उपकरण मंगाए जाते तो उन्हें खोल खाल कर रख दिया जाता और उसके पुर्जों का विवरण नोट करने के अतिरिक्त कुछ नहीं  होता। आकाश के प्रस्ताव भी लालफीता शाही के शिकार होने लगे। कुछ समय के बाद, वह अनुसन्धान केंद्र, सरकार का एक सफ़ेद हाथी लगने लगा। हर साल बजट आता, विदेशों से कुछ उपकरण मंगाया जाता और उसे खोल खाल कर रख दिया जाता।
केंद्र में राजनीति पूरी थी। वह कोई नया प्रयोग करने की सोचता तो वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा हतोत्साहित कर दिया जाता। एक बार ने अंतरिक्ष राकेट के इंजन में सुधार के लिए एक शोध किया। उसका यह शोध कार्य, अनुसन्धान केंद्र की बुलेटिन में प्रमुख वैज्ञानिक के नाम से छापा गया, उसमें आकाश का नाम मात्र सहयोग देने भर के लिए दर्शाया गया। आकाश को राजनीति की समझ नहीं थी। वह अपनी बात सीधे तरीके से कहता जिसका लाभ और लोग उठा लेते। इस तरह की बातों से वह क्षुब्ध रहने लगा। केंद्र में जातीय समीकरण के चलते उसका स्थान्तरण एक महत्वहीन परियोजना में कर दिया गया। अब उसे लगने लगा कि यह उसके लिए उपयुक्त स्थान नहीं है।

आकाश को अपनी जगह तलाशनी थी। उसे वैज्ञानिक का तमगा नहीं चाहिए था, अपितु वास्तव में वैज्ञानिक बनना था। वह अपने रास्ते ढूंढने लगा। उसे यही लगा कि वह अमेरिका चला जाये और वहां जाकर पी०एच०डी० कर ले। यहाँ के माहौल में वह जो चाहता था, नहीं कर पा रहा था। उसने अमेरिका जाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी। न्यूयार्क के एक विश्वविद्यालय ने अंतरिक्ष विज्ञानं में पी०एच०डी० करने के लिए प्रवेश दे दिया। पी०एच०डी० करने के क्रम में उसने एक ऐसी खोज की जिससे राकेट की गति बढ़ने के साथ उसकी दिशा भी बिलकुल सटीक होती। उसके इस शोध को वहां के राष्ट्रीय विमानन और अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) ने पेटेंट करा लिया तथा उसके बदले आकाश को लाखों डालर मिले। पी०एच०डी० पूरी होने पर आकाश बनर्जी उसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो गए और साथ ही नासा के निर्माण सलाहकार।
अब प्रो. आकाश बनेर्जी को धन की कमी नहीं थी। वे कमाये हुए पैसों से एक शोध संसथान खोल लिये, जिसका नाम रखा, 'आकाश बनर्जी अंतरिक्ष अनुसन्धान केंद्र'। वे चाहते थे उनके जैसे धन के अभाव में प्रतिभाशाली छात्र  आगे बढ़ने से वंचित न रह जायें। वे भारतीय प्रतिभाशाली बच्चों का बहुत ध्यान देते।
तभी नासा ने एक राकेट यान अंतरिक्ष में भेजने की परियोजना बनाई। इस यान में शोध कार्य के लिए तीन वैज्ञानिकों को भी जाना था। राकेट के निर्माण का कार्य भार प्रो. बनर्जी को सौंपा गया। प्रो. बनर्जी और उनकी टीम अपने कार्य में जुट गयी। प्रोफेसर साहब चाहते थे उनका यह यान सभी आवश्यक आधुनिक उपकरणों से युक्त हो ताकि अच्छे से अच्छा परिणाम लेकर आये। यान तैयार हुआ तो नासा की निरिक्षण टीम उसकी परीक्षा के लिये आई। टीम ने यान को फेल कर दिया। प्रोफेसर साहब ने यान में कुछ नए फीचर जोड़ दिए थे जिसके अनुसार वैज्ञानिक यान से बाहर जिधर देखते यान का एक कैमरा उसे भांप कर उधर को घूम जाता और पलक झपकते ही वह दृश्य कैमरे में कैद हो जाता। इस विशेषता के बारे में निरीक्षण समिति को पता नहीं था। जब इस विशेषता के बारे में बताया गया और दिखाया गया तो राकेट यान को उड़ने की अनुमति मिल गयी। प्रोफेसर साहब अपनी इस सफलता से बहुत प्रसन्न हुए।  
प्रोफेसर साहब के मन में एक और सपना जागृत हुआ कि वे अपने बनाये राकेट में उड़ कर अंतरिक्ष की सैर कर के आयें। उन्होंने अपनी यह इच्छा नासा प्रशासन के समक्ष व्यक्त किया, परन्तु नासा ने उनकी उम्र के कारण इसकी अनुमति दी।
प्रोफेसर बनर्जी की बेटी, मीता अब बड़ी हो गयी थी, और अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान से ग्रेजुएट भी। प्रो. बनर्जी के अंतरिक्ष में, खुद के उड़ने का सपना तो ध्वस्त हो चुका था, अब वे मीता को इसके लिए तैयार करने में जुट गए। मीता, अंतरिक्ष में उड़ने की आवश्यक प्रशिक्षण, एक अच्छे अंतरिक्ष संस्थान से पहले ही ले रही थी। इधर प्रोफेसर साहब का मार्गदर्शन मिला तो  उसे और निपुणता प्राप्त हो गयी। मीता की लगन और तन्मयता रंग लाई। नासा के उस अंतरिक्ष अभियान में उसका चयन हो गया। मीता और प्रो. बनर्जी इस बात से बड़े प्रसन्न और उत्साहित थे। कुल छः सदस्यों की टीम का चयन हुआ था जिनमे से केवल तीन सदस्यों को ही यान में स्थान मिलना था, और मीता उन छः में से एक थी।

धीरे धीरे अंतिम उड़ान का समय आ गया। मीता अपने को बिल्कुल चुस्त, तंदरुस्त और उत्साह से भरे हुए थी। अब उसका अंतरिक्ष में उड़ने का सपना पूरा होने में कुछ दिन का ही समय था। एक दिन वह अपनी उड़ान के बारे में सोचकर प्रो. बनर्जी से पूछ बैठी, 'डैड! अगर मैं, अंतरिक्ष से वापस नहीं लौट पायी तो क्या आप रोयेंगे?'
'ऐसा कुछ नहीं होगा, बेटी। तेरा यान अपना लक्ष्य पूरा करके, जरूर वापस आएगा।'
'अगर मैं नहीं भी आउंगी तो आप रोना नहीं, और मेरे बलिदान को, आप अपना काम और आगे बढ़ने में लगाना।'
'मैं कह रहा हूँ न, ऐसा कुछ नहीं होने वाला। बड़ी मेहनत से ये राकेट यान बनाया गया है, एक एक बात का बड़ी बारीकी से ध्यान  रखा गया है। बस एक महीने की बात है। किसी प्रकार की चिंता मन से निकाल दे, हम अंतरिक्ष केंद्र के द्वारा संपर्क में रहेंगे। और इतना महान काम करने वाला, कभी मरता है क्या ?'
तभी एक टेलीफोन आया जो मीता और प्रो. बनर्जी को हिला दिया। अंतरिक्ष केंद्र से फ़ोन आ गया कि मीता का नाम अंतिम तीन सदस्यों में नहीं है, किन्तु उड़ान के समय उसे पूरे समय अंतरिक्ष केंद्र पर उपस्थित रहना है। इस बात ने प्रोफेसर साहब को बहुत आहत कर दिया।  वे सोचने लगे इंडिया में तो जाति और राजनीति का भेदभाव झेलना ही होता है, लगता है अमेरिका भी इससे अछूता नहीं। संभवतः यहाँ भी गोरे और मूल निवासियों को वरीयता दी जा रही है। मगर वे प्रशासन के निर्णय के आगे, कर भी क्या सकते थे। उनकी वह रात अफ़सोस करते ही बीती। अगले दिन मीता, मुंह लटकाकर अंतरिक्ष केंद्र पहुंची तो उसके घाव पर नमक छिड़का जाने लगा।
'व्हाट हैपेंड मीता? व्हाई हैव यू बीन ड्रॉपड? ( क्या हुआ मीता, तुम्हें ड्राप क्यों कर दिया गया?)' एक एक कर सभी पूछने लगे।
'आई डोंट नो  (मुझे नहीं पता)।' मुंह बनाकर बोलती।
 शाम होते होते एक बार फिर मीता के भाग्य ने पलटी मारा, और अचानक उसे नासा के प्रमुख ने बुला लिया। मीता उदास मन से प्रमुख के पास पहुंची।
'आर यु रेडी टू फ्लाई, मीता? (मीता तुम उड़ने के लिए तैयार हो?' प्रमुख ने पूछा।
'बट आई एम ड्रॉप्ड, सर (किन्तु मुझे रोक दिया गया है, सर)। '
'नो, यू आर इन फाइनल लिस्ट (नहीं, तुम अंतिम सूची में हो।)
उड़ने वाले सदस्यों की सूची को अंतिम रूप देते समय, पता चला कि निर्धारित सदस्यों में से एक का वजन कुछ बढ़ गया था, और ऊपर से प्रशासन ने यह भी निर्णय ले लिया था कि उड़ान भरने वाली टीम में एक महिला सदस्य अवश्य होगी। मीता का चेहरा इस समाचार से खिल उठा। उसे बधाईयां मिलनी शुरू हो गयीं। इधर प्रसन्न प्रोफेसर बनर्जी  ने चाहा कि बेटी के अंतरिक्ष यान का नियंत्रण वे नासा के अंतरिक्ष केंद्र से स्वयं करें मगर उनका यह भी सपना पूरा न हो सका। जिस दिन मीता को उड़ान भरना था उसी दिन प्रो. बनर्जी को सेवा से निवृत्त भी होना था।
निर्धारित दिन, यान अंतरिक्ष के लिए उड़ा, प्रो. बनर्जी ख़ुशी और गर्व से झूम उठे। अमेरिका और भारत के सभी अख़बारों के पहले पृष्ठ की पहली पंक्ति बनी -
'भारत की बेटी अंतरिक्ष में'

Wednesday, 12 July 2017

Beghar


किम अब बड़ा हो गया था और एम्ब्रो को चाहने लगा था। जैसे ही बड़ा हो गया उसके पिता ने साफ कह दिया अब तुम अलग अपना ठिकाना ढूंढ लो या  तुम्हें
मकान का किराया देना होगा
एम्ब्रो बार बार कहती घर तो ले लो
वेटर की नौकरी में मकान लेना बड़ा मुश्किल काम था

घर महंगा
शादी

सरकार



इंडिया में घर क्या होगा बेटा ने बेच दिया