Tuesday, 24 November 2015

Udaka dal

उड़ाका दल

शशांक एक कुशाग्र छात्र होने के साथ आज्ञाकारी भी था। वह अपनी पढ़ाई और विद्यालय द्वारा सौंपे कार्यों के प्रति बहुत सजग रहता। डॉक्टर या  इंजीनियर बनने का सपना संजोये, अपनी कक्षा में प्रथम पांच-छः छात्रों में स्थान रखता। सरकारी स्कूल गांव से कुछ दूरी पर था, इसलिए पढ़ने हेतु एक निजी विद्यालय में जाना पड़ा। वैसे भी पढ़ाई के मामले में सरकारी स्कूल पर भरोसा कुछ कम ही था। सरकारी स्कूल में कभी सुविधाओं का अभाव  तो कभी कक्षा से शिक्षक नदारद, यदि उपस्थित भी हों तो अपने कर्तव्य निर्वाह में कोताही। वहीँ आम निजी स्कूलों में कम वेतन के कारण, योग्य शिक्षक नहीं होते। मगर शशांक की लगन के आगे ये सब नतमस्तक थे। उसके संपर्क में कोई भी योग्य आता, उससे अपने प्रश्नों का निराकरण कर लेता और अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए सदैव तत्पर रहता ।

वह अब दसवीं कक्षा का छात्र था।  इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा होने के कारण, अच्छे अंक लाने हेतु पढ़ाई में जी जान से जुटा था। परीक्षा की तिथि समीप आ चुकी थी, परंतु शशांक के मन में तनाव बिलकुल भी नहीं था।  बल्कि वह उत्साह से परिपूर्ण था क्योंकि तैयारी में उसने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। उच्चतर माध्यमिक में उसे जनपद के एक अच्छे स्कूल में विज्ञानं विषय से दाखिला लेने की योजना थी, ताकि आगे चलकर इंजीनियर या डॉक्टर की पढ़ाई कर सके। बोर्ड की परीक्षा होने के कारण इस बार उसका परीक्षा केंद्र दूसरे गांव, यादव सिंह के स्कूल में पड़ा था। परीक्षा का आज पहला दिन था, अतः वह समय से पहले ही केंद्र पर पहुँच गया ताकि अपनी सीट आदि की व्यवस्था भली प्रकार से देख ले, और परीक्षा का समय नष्ट न हो ।

परीक्षा हॉल में प्रवेश करके शशांक ने अपनी सीट ग्रहण कर लिया। उत्तर पुस्तिका पर रोल नंबर, विषय आदि लिखने के बाद प्रश्न पत्र मिला, उसे वह बड़ी तन्मयता से पढ़ डाला। प्रश्न पत्र आकाँक्षाओं के अनुरूप ही था। बहुत सारे प्रश्न उसे ठीक से आते थे, बस एक दो प्रश्नों में ही संशय था। हां, प्रश्न पत्र थोड़ा लम्बा अवश्य था। तनिक भी देर किये बिना, उसने उत्तर लिखना प्रारम्भ कर दिया। उसके लिखने की गति देखकर ऐसा लग रहा था कि विषय के सभी पाठ, उसे कंठस्थ हों।

यह क्या, थोड़ी देर बाद उसे परीक्षा कक्ष में एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला। परीक्षा में भाग ले रहे अधिकतर बच्चों का किताब खोलकर नकल प्रारम्भ। शशांक के तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। एक दो बच्चे तो किताब से भी ठीक ढंग से नहीं लिख पा रहे थे और निरीक्षक बना अध्यापक उनकी मदद कर रहा था। कुछ ही क्षण पश्चात्, एक अन्य अध्यापक कक्ष में प्रवेश किया और छात्रों से पैसे वसूलना आरम्भ कर दिया। सभी परीक्षार्थी छः-छः सौ रुपये देना प्रारम्भ कर दिए। एक छात्र ने यह कह कर पांच सौ रुपये ही दिया कि  'पापा ने इतना ही दिया है।'
'अबे, यह पिछले साल का रेट है। इस साल छः सौ समझे! कल सौ रुपये और लेकर आना। '

जो छात्र पैसे नहीं देता - या तो उसकी उत्तर पुस्तिका छीन ली जाती या उसे थप्पड़ जड़ दिया जाता।
शशांक यह सब देखकर हत प्रभ था । परिक्षा कक्ष का यह दृश्य ऐसा लग रहा था, मानो आतंकवादियों के चंगुल में फंसे किसी जहाज के यात्री।
अब तो शशांक का भी नंबर आ ही गया। अध्यापक उसके पास आ पहुंचा - 'निकालो छः सौ रुपये। '
'किस बात के, सर ? मैं तो नहीं लाया। '
'अरे, परीक्षा का सुविधा शुल्क।'
'सर, परीक्षा शुल्क तो फॉर्म के साथ ही जमा करा दिया। '
' अरे भाई वो नहीं, यहाँ पर जो नकल करने की सुविधा दी जा रही है।'
'सर, मैं तो नहीं लाया हूँ, न ही मुझे नकल करनी है।'
'नक़ल करो या न करो, तुम्हारी इच्छा। शुल्क भरो या बाहर जाओ।'
 यह कहते हुए अध्यापक ने उत्तर पुस्तिका छीन लिया। शशांक अभी लगभग आधे प्रश्न ही कर पाया था। उसकी ऑंखें डबडबा गयीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। कभी सोचा नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। छः सौ रुपये के लिए, उसका सपना, सपना ही रह जायेगा। एकाध बार मन में आया कि पैसे देकर जान छुड़ाए क्योंकि उसका भविष्य पैसे से अधिक महत्वपूर्ण था। परन्तु उसके पास इतने पैसे भी तो नहीं थे। उधार के लिए पता नहीं अध्यापक माने या न माने।  फिर सोचता है यह तो अत्याचार है, बर्बर अत्याचार। इस अन्याय से उसे लड़ना होगा। किसी को तो पहल करनी ही पड़ेगी, पर इसका सामना कैसे करे? यहाँ पर कौन सुनेगा ? सभी छात्र तो दे ही रहे हैं। उसके मन में यह सब मंथन चल ही रहा था कि एक लड़का दौड़ता हुआ आया और चिल्लाकर बोला,  'सर,  उड़ाका दल, उड़ाका दल।''
इस लडके को स्कूल वालों ने, मुख्य सड़क से स्कूल की ऒर आने वाले मार्ग पर, इस निर्देश के साथ खड़ा कर रखा था कि जैसे ही 'उड़ाका दल' की गाड़ी आती दिखाई दे अबिलम्ब विद्यालय को सूचित करे।
अध्यापक ने तुरंत ही सभी परीक्षार्थियों को आदेश दिया, 'सब लोग अपनी अपनी किताब, पर्चे, फर्रे जो कुछ भी है बाहर फेंक दो। उड़ाका दल  चले जाने के बाद ही पुनः प्रयोग करना है, समझे! '
'शशांक बोला, सर मेरी कापी ?'
'वह नहीं मिलेगी। अभी मैं जा रहा हूँ। उड़ाका दल आया है। '
'तो, मैं उड़ाका दल से बोल दूं?'
अध्यापक आग बबूला हो गया।
'अगर ऐसा किया तो नकल करने के आरोप में आगे की भी परीक्षा से जाओगे।  तुम्हे पता है यह सब तुम लोगों के लिए ही करना पड़ता है, इतने सब स्कूल के खर्चे कहाँ से आएंगे। तुम लोगों को पास भी तो कराना है।'
अध्यापक का यह भी रूप हो सकता है, शशांक कभी सोचा भी न था। वह एक सीधा सादा लड़का था और अपने परिवार से उसको आदर्श और नीतिगत बातें ही संस्कार में मिली थीं। वह सोच नहीं पा रहा था, इन नकल मार कर पास हुए बच्चों का आखिर क्या भविष्य होगा।
तत्पल, सभी बच्चे अपनी अपनी नकल सामग्री कक्षा के बाहर रख दिए ।
उड़ाका दल विद्यालय में दाखिल हो हुआ। प्रधानाध्यापक और अध्यापकों की एक टीम उसके स्वागत में जुट गयी। आव भगत के लिए इस निरीक्षक अध्यापक को भी जाना पड़ा । प्रधानाध्यापक के कार्यालय में चाय नाश्ता का दौर चल रहा था । शशांक साहस बटोर कर, अपनी उत्तर पुस्तिका छीने जाने की शिकायत करने चला। इसी बीच, किसी सहानुभूति रखने वाले छात्र ने शशांक को संकेत कर दिया कि जब तक निरीक्षक आता है, वह मेज पर पड़ी उत्तर पुस्तिका उठाकर कुछ लिख ले और उसके आने तक वापस रख दे, जो ही कुछ प्रश्न हो जायेंगे । शशांक को बात जंची, इस अवसर का लाभ उठाकर बिना समय गंवाए, मेज पर पड़ी अपनी उत्तर पुस्तिका उठा लिया और जितनी तीव्र गति से हो सका, लिखना प्रारम्भ कर दिया ।
अब तो मात्र शशांक की ही कलम चल रही थी। कक्षा में बैठे शेष छात्रों की कलम विश्राम पर थीं।
लगभग आधे घंटे पश्चात निरीक्षक महोदय लौट कर आये। एक परीक्षार्थी ने शशांक को बता दिया कि अध्यापक आ रहा है और वह अपनी उत्तर पुस्तिका वापस मेज पर रख दे । शशांक सभी प्रश्न तो नहीं हल कर पाया पर अब तक कई महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर लिख चुका था ।
उड़ाका दल चाय नाश्ता करके और अपनी भेंट लेकर चला गया ।
गर्व से भरा निरीक्षक, मुख पर विजय की मुद्रा लिए कक्ष में प्रवेश किया।
'हाँ अब तुम लोग नकल की प्रक्रिया चालू रख सकते हो।'
उसने शशांक की कापी भी यह कहते हुए लौटा दिया, 'ये लो, अगली परीक्षा में पैसे लेकर आना। '
अब तो समय थोड़ा ही बचा था, पर डूबते को तिनके का सहारा।  जितनी शीघ्रता से हो सका शशांक ने बाकी प्रश्न भी हल कर लिया । बस नाम मात्र के ही प्रश्न छूटे।
परीक्षा के बाद जब शशांक घर पहुंचा तो उसका उदास चेहरा देखकर अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि उसका पेपर ठीक नहीं हुआ है । पिता के पूछने पर, उसने सब साफ साफ बता दिया।

उसके पिता ने ढाढ़स दिया, 'कोई बात नहीं अगली परीक्षा में छः सौ रुपये ले जाना। '
इस बात ने शशांक को अति उद्वेलित किया, 'लेकिन पिता जी, मैंने आपसे यह तो नहीं सीखा है।  यही करना था तो वह पहले ही कर लेता, पहली परीक्षा भी खराब न होती। पिताजी, मुझे तो नकल ही नहीं करनी है और ऐसी व्यवस्था से लड़ना है। '
'पर बेटा ! क्या करोगे? तुम अकेले तो नहीं हो न, जब सभी दे रहे हैं तो तुम्हें वो क्यों छोड़ेंगे! और जरा सी बात के लिए अपना परिणाम खराब करोगे।'
शशांक को अपने पिता की यह बात अटपटी लगी, मगर अपने भविष्य के बारे में भी सोचना था। एक बाऱ तो सोचा कि वह अकेले क्या कर लेगा, पर वह हार भी नहीं मानना चाहता था। उसने पिता से आग्रह किया कि अगली परीक्षा में वे भी साथ चलें, अन्यथा वह प्रधानाध्यापक से अपनी बात कहेगा। परिणाम चाहे कुछ भी हो। और साथ ही नकल न करने का प्रण लिया । अगली परीक्षा में उसने प्रधानाध्यापक से दो टूक शब्दों में कह दिया न तो वह नक़ल करेगा, ना नक़ल के पैसे देगा। प्रधानाध्यापक वस्तुस्थिति को भांप कर, और बात के आगे बढ़ने के डर से, उसके निर्धन होने की बात कहकर, निरीक्षक से पैसे न लेने का निर्देश दे दिया। यद्यपि परीक्षा के समय में उसकी गहन जाँच के बहाने तंग किया जाता रहा और समय नष्ट किया जाता रहा, पर यह सब कुछ सहन करते हुए भी वह शील भाव से अपनी परीक्षा देता रहा। उसे इस बात का संतोष था कि उसने भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध एक लड़ाई छेड़ दी है।  
  
अब परिणाम का समय आ चुका  था। घर के सभी लोग डरे हुए थे, साथ ही शशांक। अगर कम अंक आये तो मनचाहे विषय में प्रवेश नहीं पा सकेगा। और हुआ भी वही, वह उत्तीर्ण तो हो गया पर प्राप्तांक उसकी आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं थे। उच्चतर माध्यमिक में विज्ञान विषय में प्रवेश पाने के लिए कुछ अंक कम रह गए। उसका नाम विज्ञानं विषय की प्रतीक्षा सूची में रह गया। शशांक के तो अफसोस का ठिकाना नहीं था। उसे आर्ट विषय लेने के लिए वाध्य होना पड़ा। मरता क्या न करता। वह कला विषय में दाखिला ले लिया। पर कहते हैं बहादुरों का भाग्य भी साथ देता है। कुछ दिनों पश्चात ही उसके भाग्य ने साथ दिया। विज्ञान विषय के एक छात्र को किसी कारणवश विद्यालय छोड़ कर अन्यत्र जाना पड़ा । शशांक का नाम पहले से ही प्रतीक्षा सूची में था, उसे विज्ञान विषय में प्रवेश पाने का अवसर मिल गया। अब उसने इस भ्रष्ट तंत्र से लड़ने के लिए स्वयं को समर्पित करने के लिए ठान लिया। विज्ञान विषय पढ़कर वह इंजीनियर तो बन गया, परन्तु अब उसकी जिंदगी का लक्ष्य भ्रष्टाचार से लड़ना था, वह प्रशासनिक सेवा की तयारी में जुट गया। 

       
  - एस० डी० तिवारी

Tuesday, 17 November 2015

Parcha dakhil


परचा दाखिल

नेता लोगों की मौज बहार देख, श्यामल का भी पढ़ाई लिखाई से अधिक नेतागिरी में चाव था। वह कॉलेज से ही छात्र नेता के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने लगा था। पढ़ाई पूरी होने के पश्चात नौकरी ढूंढने का कोई खास प्रयास नहीं किया और न ही अपनी खेती बारी में मन लगाया।  हाँ, अपना समय समाज सेवा और जन-संपर्क में अधिक व्यतीत करता था। मित्रों के प्रोत्साहन स्वरुप चुनाव लड़ने की प्रबल इच्छा उतपन्न होती, परन्तु, एक साधारण परिवार से होने के कारण धन के अभाव का सामना करना पड़ता और इस कारण चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा पाता।
धीरे धीरे समय बीतता गया, लोग उसके साथ जुड़ते गए और जन संपर्क बढ़ता गया, मगर धनाभाव के चलते चुनाव लड़ पाना उसके लिए अभी भी संभव नहीं था। श्यामल अपने क्षेत्र की बिजली, पानी आदि से सम्बंधित समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाता रहता तथा लोगों की सरकारी कार्यालयों में फंसे कार्यों में उनकी मदद करता रहता। कई लोग कार्य हो जाने  से प्रसन्न होकर, उसे चंदा भी दे देते और साथ ही चुनाव में खड़ा होने के लिए प्रेरित करते । चंदे की राशि को श्यामल संचित कर रख लेता ताकि जब भी उचित समय आएगा चुनाव के लिए परचा दाखिल कर देगा।
दो चार मित्र उसे हमेशा घेरे रहते और चुनाव में खड़ा होने को उकसाते रहते।
एक दिन उल्लास में भरा रामधन अख़बार लहराता दौड़ा हुआ आया।
'अरे श्यामल! देख, पंचायत चुनावों की घोषणा हो गयी। बस डेढ़ महीने में चुनाव होने हैं, इस बार तो तुझे खड़ा होना ही है।  प्रचार की चिंता मत कर, हम दोस्त सब किस काम आएंगे ! '
'और पैसा कहाँ से आएगा ?'
' हम लोग चंदा एकत्र करेंगे । तेरे काम की चर्चा दूर दूर तक हो रही है, तू अवश्य ही जीतेगा। '
'परन्तु किसी पार्टी का टिकट मिल जाता तो अच्छा होता, कुछ खर्च बर्च का पैसा मिल जाता और प्रचार भी हो जाता। एक पार्टी से बात किया था, पर पता चला कि सुरेश कुमार ने पैसे देकर उस पार्टी का टिकट ले लिया है। अपने पास कहाँ पैसे कि पार्टी को दें।  हाँ पार्टी कोई पैसे खर्च करे तो चुनाव लड़ लेंगे। '
'तू चिंता मत कर, सब हो जायेगा। तू स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में खड़ा  हो जा।  हम जी जान लगा देंगे।  तुझे जीतना ही है।' 
'चल ठीक है। '
सभी मित्र जुट गए।  निर्वाचन आयोग के कार्यालय से फॉर्म आया। पहले चुनाव लड़ चुके उम्मीदवारों से सलाह ली गयी और बड़ी सावधानी से फॉर्म भरा गया।  आज फॉर्म भरने का अंतिम दिन है।  भरपूर जज्बे के साथ श्यामल की मित्र मंडली परचा दाखिल करने चल पड़ी। निर्वाचन कार्यालय पहुंचते ही 'श्यामल जिंदाबाद' के नारे से वातावरण गूँज उठा। निर्वाचन अधिकारी के समक्ष परचा दाखिल हो गया। 
 अब चुनावी गणित शुरू हो गयी। मित्र चंदा जुटाने में लग गए। सम्बन्धी, सलाहकार आने लगे।
किस किस क्षेत्र में अपने पक्ष के कितने लोग हैं, अपनी जाति के कितने वोट हैं, और  जातियों का समर्थन मिल सकता है, विरोध में रहने वाले कौन से लोग होंगे, कहाँ के वोट पक्ष में नहीं आने वाले हैं, रिश्तेदारियां कहाँ कहां हैं, रिश्तेदारों की रिश्तेदारियां कहाँ कहाँ हैं, उन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव है या नहीं, नहीं तो उन्हें कैसे जोड़ा जाय। तरह तरह का जोड़ तोड़ प्रारम्भ हो गया।
परचा भरने की अंतिम तिथि बीत जाती है तभी निर्वाचन अधिकारी का फोन आता है कि श्यामल के पर्चे में कुछ कमियां हैं अतः नामांकन निरस्त हो सकता है। शयामल यह सुन कर भौचक्का रह जाता है।  वह अपना दल बल लेकर निर्वाचन कार्यालय पहुँच जाता है।  जाने पर ज्ञात होता है कि फॉर्म में जन्म तिथि गलत लिखी गयी है। श्यामल फॉर्म देखता है तो पता चलता है की जन्मतिथि के ऊपर किसी ने पुनः कुछ लिखा है, स्याही भी पहले वाली स्याही से मेल नहीं खा रही थी।  फॉर्म के साथ संलग्न प्रमाण पत्र से सही जन्म तिथि की पुष्टि हो रही थी।  समझाने बुझाने पर परचे को  स्वीकार कर लिया जाता है।

अब प्रचार का सिलसिला बड़े जोर शोर से शुरू हो गया। श्यामल के युवा नेता होने के कारण युवाओं में बहुत उत्साह था।  उसके शील और मिलनसार स्वाभाव के कारण सभी पसंद करते थे। प्रचार अभियान में लोगों से बड़ा समर्थन मिल रहा था।  वह घर घर जाता, सभी बड़े बुजुर्ग से आशीर्वाद लेता। श्यामल जहाँ भी जाता वोट मिलने का भरोसा मिल जाता। अब तो लोग श्यामल को अन्य उम्मीदवारों से बहुत आगे आंक रहे थे। बस मनवीर से थोड़ी टक्कर की उम्मीद थी। क्योंकि वह पहले भी प्रधान का चुनाव लड़ चुका था। प्रदेश के मंत्री यादव जी का बेटा तो कहीं और पीछे ठहर रहा था।
धीरे धीरे चुनाव का दिन आ ही गया, मतदान प्रारम्भ हुआ। रुझान श्यामल के पक्ष में स्पष्ट रूप से दिख रहा था।
मतों की गणना शुरू हुई। परिणाम आशाओं के अनुरूप ही था। श्यामल काफी आगे चल रहा था।  अब तक लगभग तीन चौथाई वोटों की गड़ना हो चुकी थी । अब तो उसकी विजय निश्चित ही थी । श्यामल के खेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी, उत्सव मनाने की तयारी भी शुरू हो गयी।  इधर मंत्री जी का बेटा जो दूसरे क्रम पर था चिंतित होने लगा था।  क्षेत्र का थानाध्यक्ष जो उसी की जाति का था उसका परम मित्र भी था। वह यादव जी के बेटे के पास जाकर चिंता जताने लगा। उसको पुलिस की नौकरी मंत्री जी ही दिलाये थे।  तभी मंत्री जी का ताजा हाल जानने के लिए फोन आ जाता है । बेटे ने उन्हें हालात से अवगत कराया।  मंत्री जी ने थानाध्यक्ष को फ़ोन देने को कहा।  फोन थामते ही थानाध्यक्ष कांपने लगा।
'तुमने कुछ नहीं किया। तुम इस थाने पर रहने लायक नहीं हो।'
'नहीं सर, हमने जो भी हो सका, किया।  सारे स्टाफ को इनको जीतने के लिए लगा रखा था। मैं तो आपका बड़ा एहसान मंद हूँ, सर!, आप के कृपा से ही मैं पुलिस में भर्ती हुआ था।  इतनी कोशिश की मगर इस बार तो उसकी हवा ही बनी हुई थी '    
'मुझे कुछ नहीं पता' यह कहते हुए मंत्री जी ने फोन  रख दिया। थानाध्यक्ष का मुंह बन गया।
थोड़ी ही देर के बाद चुनाव के परिणाम की घोषणा भी हो गयी।  श्यामल नौ सौ मतों से विजयी हो गया। मंत्री का बेटा झुंझला गया।  वह निर्वाचन अधिकारी से पुनर्गणना का आग्रह करने लगा । निर्वाचन अधिकारी ने असहमति जताई क्योंकि विजय का अंतर पर्याप्त मतों से था। थोड़ा बहुत अंतर होता तो करवा भी देते।  उपस्थित लोगों ने भी पुनर्गणना का विरोध किया।  मगर तभी सारा दृश्य एकदम बदल जाता है । उपस्थित भीड़ पर लाठी चार्ज हो जाती है ।  भगदड़ मच जाती है और लाठी चार्ज के बीच ही पुनः मतगणना शुरू हो जाती है ।  बहुत ही अल्पकाल में दुबारा मतगणना हो जाती है और मंत्री जी का बेटा दो सौ मतों से विजयी होता है ।
मंत्री जी के घर पटाखे, फूलझड़ी छूटने लगे । अगले दिन के समाचार पत्र में मुख पृष्ठ पर छपा है 'पंचायत चुनावों में धांधली '
पूरे जनपद में इस बात पर चर्चा है। बताओ सत्ता का कितना दुरुप्रयोग । समाचार पत्र पढ़कर रद्दी में फेंक दिया जाता है। एक दो दिन काना फूसी के बाद सब कुछ सामान्य।
बेचारा श्यामल .....