Saturday, 30 April 2016

Arab se afrika

अरब से अफ्रीका

अरब में काम करते मनदीप को एक वर्ष बीत चुका था। अपना वतन छोड़कर भी, यहां कोई खास परेशानी नहीं थी।  कंपनी ने रहने के लिये कमरा दे रखा था। खाने पीने की भी कोई समस्या नहीं थी, यहाँ के रेस्तरां में भारतीय व्यंजन का स्वाद मिल जाता था। अरब की राजधानी, रियाध से कोई एक सौ किलोमीटर की ही दूरी पर, अल-खर्ज में उसकी कंपनी का प्रोजेक्ट चल रहा था। वहां कई भारतीय रहते थे, उनसे परस्पर सहयोग मिलता रहता और घर पर फ़ोन से बात हो जाती, इस कारण उसे घर से दूरी और अकेलापन नहीं अखरता था। खा पीकर जो पैसे बचते, इंडिया भेज देता। उसका सपना था कि अरब से लौटने तक अपने कस्बे में एक बड़ा सा आलीशान मकान बनवा ले।  
एक दिन उसे अचानक कम्पनी से निर्देश मिला कि उसे यूगांडा जाना है। उसका रियाध से जिंजा, जो काम्पाला से लगभग अस्सी किलोमीटर है, तक का टिकट भी कंपनी ने करवा दिया है। जिंजा में कंपनी का एक बिल्डिंग प्रोजेक्ट चल रहा है, जब वह पूरा हो जायेगा तो वापस बुला लिया जायेगा। मनदीप ने सोचा, जब घर से बाहर निकल ही गए हैं तो क्या अरब, क्या अफ्रीका। इसी बहाने एक और देश घूम लेंगे। बिना ना नुकुर किये, वह जिंजा पहुँच गया। कंपनी ने वहां भी रहने के लिए कमरे की व्यवस्था कर रखी थी, पर पास पड़ोस में यूगांडा के लोग ही थे। उनकी अलग भाषा होने के कारण बात चीत की की बड़ी समस्या थी। शाम को खाने के लिए रेस्तरां ढूंढने लगा तो आस पास, उसके मन पसंद भोजन का कोई रेस्तरां नहीं मिला। हाँ फलों की कई दुकानें थीं। वहां केला, पपीता, आम, नारियल खूब मिल रहे थे। वह रात उसने फल खाकर ही बिताया। अगले दिन सुबह टहलते हुए, कुछ दूर चल कर गया तो एक रेस्तरां देखकर, बड़ी राहत मिली। वहां अंडे के आमलेट को पराठे में लपेट कर, जिसे वे रोलेक्स कह रहे थे, खाने को मिला। मनदीप को यह व्यंजन भा गया। अब ये था कि और कुछ नहीं तो फल और रोलेक्स तो है ही।    
ड्यूटी पर जाने के बाद पता चला कि उस प्रोजेक्ट में बस एक ही भारतीय करीम काम कर रहा था और वह भी छुट्टी पर भारत गया हुआ था। किसी तरह उगांडीयन सहकर्मियों से टूटी फूटी अंग्रेजी बोल कर वह अपनी व्यवस्था बनाया।
एक दिन जब वह जिंजा घूमने निकला वहां बुजागली जल प्रपात देखकर दंग रह गया। उसकी सुंदरता मन मोहने वाली थी। अब तक उसे यह नहीं पता था कि यही प्रपात, दुनिया की सबसे लम्बी नील नदी का स्रोत है। कुछ दिन तो उसके यूगांडा में बहुत अच्छे बीते। नई नई जगह, नई नई बात। लेकिन बाद में पता चला वहां पानी की बड़ी दिक्कत  थी। किसी बात चीत न होने के कारण, मन उचाट सा रहने लगा। और मच्छरों से भी जूझना था। नम क्षेत्र रहने के कारण वहां मच्छरों की भरमार थी। बाजार में मच्छरदानी लेने गया तो मच्छरदानी नहीं मिल रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मच्छरदानी कहां से मंगाए। चद्दर ओढ़कर सोता तो गर्मी लगाती।
मच्छरों के आतंक से उसे लगने लगा कि वह यहाँ आकर फंस गया है। उसे तो यह भी नहीं पता था, कि एक साजिश के तौर पर उसे यहाँ भेजा गया है। वहां के जलवायु के कारण, भारत से सीधे अफ्रीका जाने के लिए कोई तैयार नहीं होता, इसलिए कंपनी जिस किसी का चयन करती, पहले अरब के किसी प्रोजेक्ट पर भेजती और बाद में अफ्रीका भेजकर उसका पासपोर्ट अपने पास रख लेती।
करीम अपनी छुट्टी बिताकर लौट आया था। एक से दो भले। साथ मिल जाने से, दोनों को ही बड़ी राहत मिली। मगर मनदीप का मच्छरों से संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। कुछ ही महीने बीते थे कि उसे मलेरिया हो गया। करीम उसे डॉक्टर को दिखाकर, दवा ले आया। दिन में तो ड्यूटी पर चले जाने के कारण, करीम उसे सुबह शाम ही देख पाता। उसका पडोसी अकीकी, एक नेक दिल इंसान था। मनदीप को संकट में देख, वह आकर दवा के लिए पूछ जाता और काफी पिला देता। उसके लिए खाने पीने का सामान भी बाजार से लाकर दे देता। तीन दिन बीत गए, मनदीप का बुखार ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अकीकी की सलाह पर, करीम ने उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया। अकीकी उसे देखने अस्पताल भी रोज जाता था। एक सप्ताह भर्ती रहने के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी मिली। अब वह ड्यूटी पर जाने लगा, पर बहुत कमजोर हो गया था।  खाने पीने में, उसे मन पसंद स्वाद नहीं मिल रहा था, इसलिए इच्छा भर खा नहीं पाता था। यहाँ आस पास कोई भारतीय रेस्तरां नहीं था और अपने आप बनाने का पूरा सामान भी नहीं। अब उसका मन वहां से ऊब चुका था, चाहता था कि कब इंडिया वापस चला जाये। 
धीरे धीरे उसे दो वर्ष हो गए। उसका स्वास्थ बिगड़ता ही गया। परेशान होकर, उसने कंपनी से वापस इंडिया जाने के लिए अनुरोध किया, मगर व्यर्थ। कंपनी वाले इसके लिए तैयार नहीं हुए। उसका पासपोर्ट भी कंपनी ने  अपने पास रख लिया था। जिस प्रोजेक्ट के लिए उसे भेजा गया था वह प्रोजेक्ट पूरा हो गया तो दूसरे प्रोजेक्ट में लगा दिया गया। अब तक तो मनदीप को भी समझ में आ चुका था कि उससे छल किया गया है। मगर, उसके पास कोई चारा नहीं था, वह बुरी तरह से फंस चुका था। वहां पर, वह शिकायत भी किससे करता। उसके पास कोई पहचान पत्र तक नहीं था। अस्वस्थ होने के बारे में जब उसके माता पिता को पता चला तो वे तुरंत ही इंडिया वापिस आने के लिए कहने लगे। उसने अपना पासपोर्ट लौटाने और वापस इंडिया भेजने के लिए कई बार अनुरोध किया, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। उसके स्तीफा देने का भी कोई लाभ नहीं था क्योंकि पासपोर्ट कंपनी के पास जमा था।  वह तो कंपनी का एक कठपुतली बन कर रह गया था। 
मनदीप, एक अजीब जाल में फंसा हुआ था। उसे निकलने को कोई तरीका नहीं सूझ रहा था, परन्तु उसने अपना विवेक और धैर्य नहीं खोया। एक बार उसे पता चला कि कंपनी के मुख्य कार्यकारी, मोईन जी एक मीटिंग के लिए कम्पाला आने वाले हैं। वह उनके होटल का पता करके वहां पहुँच गया। कमरे की घंटी बजाया। मोईन जी ने दरवाजा खोला तो देखा, सामने दुबला पतला व्यक्ति, मानो चलता फिरता नर  कंकाल हो, खड़ा है। उसे देखकर पहले तो वे चौंके, फिर पूछे -
'कौन हो तुम? क्या चाहिए ?'
'सर! मैं आपकी कंपनी में कर्मचारी हूँ। जिंजा वाले प्रोजेक्ट में काम कर रहा हूँ। मेरी हालत देखिये, बड़े दिनों से बीमार हूँ। यहाँ की जलवायु मेरे लिए अनुकूल नहीं है।  मैं इंडिया वापस जाना चाहता हूँ। '
'तो स्तीफा दो और जाओ किसने रोका है ?'
'सर ! मेरा पासपोर्ट, कंपनी में जमा है।  वापस नहीं दे रहे हैं। '
मोईन जी झोंक में बोल तो गए, स्तीफा दो और जाओ मगर उन्हें यह ध्यान नहीं था कि पासपोर्ट जमा करने की निति उन्हीं की बनाई है। खैर मनदीप को देखकर उन्हें दया आ गयी और उसका पासपोर्ट वापस करवा दिया।

Visa nahin mila

वीसा नहीं मिला

निजी कारखाने में काम करके अमन को जो वेतन मिलता, महंगाई के ज़माने में बड़ी मुश्किल से गुजर हो पाता। भारत में इतने श्रम कानून होने के बावजूद भी, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के शोषण से सभी परिचित हैं। अमन भी कारखाने की कार्यदशा से संतुष्ट नहीं था। उससे निर्धारित सीमा से अधिक समय तक काम लिया जाता और पूरा वेतन भी नहीं दिया जाता। और तो और अधिक राशि पर हस्ताक्षर करवा के उसे कम पैसा दिया जाता था ।उसके मन में कई बार हुआ कि वह शिकायत करे पर यह भी आशंका बनी हुई थी कि इन उद्योगपतियों का कुछ बिगड़ेगा नहीं, और नौकरी चली जाएगी। दुबारा इतनी आसानी से नौकरी कहाँ मिलेगी।

एक दिन मध्यावकाश के समय अमन कैंटीन में खाना खा रहा था, उसी की मेज पर उसक सहकर्मी विनोद भी बैठा था. विनोद ने पूछा, 'और अमन, कैसा चल रहा है?'
'सब ठीक है।'
'और आजकल ओवरटाइम भी कर रहा है ?' 
'काम तो अधिक समय तक करते ही हैं, पर उसका फालतू पैसा कहां मिलता है!'
'हां यार, ये सेठ लोग खुद खा खाकर मोटे हो जाते हैं और काम करने वालों को पूरा पैसा भी नहीं देते। तुझे पता है? एक कंपनी विदेश भेजने के लिये कर्मचारियों की भर्ती कर रही है। मेरठ में एक एजेंसी है, उसी के द्वारा सब काम हो रहा है। चलते हैं हम भी कोशिश करते हैं। विदेश में एकाध साल  काम कर लेंगे तो हाथ में कुछ पैसा हो जायेगा, फिर आकर ऐश करेंगे, यहाँ की पगार में तो दाल रोटी चल जाय, वही बहुत है।'
अमन को सहकर्मी की बात अच्छी तो लगी पर उसे अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं था। वह बोला, 'अपनी, इतनी कहाँ किस्मत है कि विदेश जाएं।  वहां जाने में भी तो खर्च होगा, वो कहां से आएगा।'
'अरे खर्च तो बस उस एजेंट की फीस और वीसा का ही होगा, बाकी किराया वगैरह तो कंपनी ही देगी। चल पता तो करते हैं। '
अमन के मन में विदेश जाने जिज्ञासा जग गयी । एक दिन अमन और विनोद उक्त एजेंट के यहाँ गए। वहां पर विदेश जाने के इच्छुक लोगों की काफी भीड़ लगी थी। बातचीत हुई, एजेंट ने बताया कि हां कोरिया में एक प्रोजेक्ट के लिए कुछ मजदूरों की आवश्यकता है। उसके लिए सारी व्यवस्था वही करवा रहा है। यह काम करवाने के लिए पांच हजार वीसा शुल्क, दस हजार मेडिकल के और पंद्रह हजार एजेंट की फीस, लगेगी। जाने का किराया और वहां रहने आदि का खर्च कंपनी देगी।
बात तो कुछ जमी, पर अमन के पास तीस हजार रुपये का जुगाड़ नहीं था। खाने पीने से जो बचा पाता, वह गांव अपने पिता के पास भेज देता। उसके माता पिता और छोटा भाई उसी पर आश्रित थे। खेत का एक छोटा सा टुकड़ा था, उससे थोड़ा बहुत अनाज हो जाता था। घर की परिस्थिति सोचकर, वह इस काम में पैसा नहीं खर्च करना चाहता था और साथ यह भी सोचता कि इस प्रकार का अवसर बार बार कहाँ मिलेगा। आखिरकार, उसने घर फोन करके अपने पिता जी को बताया और तीस हजार की मांग कर दी।
कुबेर के पास  भी इतनी राशि कहां से होती। खेती बारी से जो कमाया था और अमन का भेजा हुआ पैसा, सब जोड़ जाड कर, पिछली साल ही बेटी की शादी की थी। बल्कि अभी सिर पर कुछ पैसा उधार भी था।
कुबेर ने अमन को बता दिया, 'इतने पैसे कहाँ से लाएं, अभी पहले का उधार ही नहीं चुकता हुआ।'
'पापा एक बार विदेश चला जाऊंगा तो एक महीने की कमाई में ये सारा उधार चुक जायेगा। बस आप रुपयों का इंतजाम करवा दो।'
उसके बहुत आग्रह पर कुबेर ने मांग मुंग कर पैसे का प्रबंध तो कर दिया, पर वह आशंक भी था। कुबेर ने विदेश भेजने के नाम पर धोखा धड़ी के किस्से भी सुन रखे थे। कुछ समय पहले ही अख़बार में छपे इस समाचार का हवाला भी दिया -
'एक एजेंसी अरब ले जाने के नाम पर सैकड़ों लोगों से पैसे ऐंठे। विश्वास ज़माने के लिए कई औपचारिकताएं पूरा करवाकर उन्हें सऊदी अरब जाने के लिए पासपोर्ट के साथ मुम्बई बुलाया गया। पानी के जहाज में यह कहकर कि सऊदी अरब जा रहा है बिठा दिया गया। अगले दिन उन सबको देश के ही एक अनजान बंदरगाह पर उतार दिया गया। सब के सब ठगे गए। '
कुबेर ने यह कहानी बताकर उसे रोकने का प्रयत्न किया। पर अमन ने इसके विपरीत, विदेश में अधिक कमाई की कहानियां सुन रखी थीं। उसे लग रहा था कि एक बार विदेश चला गया तो थोड़ा कम खा पीकर, पैसे बचा लाएगा। वहां उसका खाना पीना कौन देखेगा। खैर, एजेंट को पैसा दिया गया। एजेंट ने उनका पासपोर्ट जमा करवा लिया, उनसे वीसा फॉर्म भरवाकर हस्ताक्षर करवाया, मेडिकल करवाया और सूचित करने के लिए बोल दिया। एजेंट से मिलने के बाद अमन विदेश जाने के लिए आस्वस्त हो गया था।  यह सोच कर कि विदेश जाना है, फिर काफी समय बाद लौटेगा, अतः कुछ समय गांव में बिता ले, अमन नौकरी छोड़ कर गांव चला गया।  
गांव जाकर, अमन एजेंट की सूचना की प्रतीक्षा करने लगा। महीना बीता,  दो महीने बीते, अभी तक कोई सूचना नहीं। अमन एजेंट के नंबर पर फोन करता तो कोई उत्तर ही नहीं मिलता। कई दिनों तक प्रयास करने के बाद एक बार एजेंट ने फ़ोन उठा लिया। अमन खुश हुआ, चलो फ़ोन तो उठाया। बोला, 'मैं अमन बोल रहा हूँ, हमारे वीसा का क्या हुआ ?'
उत्तर मिला, 'पहले कंपनी को तीस लोगों की जरूरत थी, बाद में उसने यह संख्या घटाकर आठ कर दी, तुम्हारा वीसा रिजेक्ट हो गया है। '
अब तो अमन के पैरों तले से जमीन खिसक गयी। वह फोन पर चिल्लाने लगा, 'तो हमारे पैसे वापस कर दो। '
'वो तो हमारी फीस आदि के थे। इसमें हमारी क्या गलती है। हमने तुम्हारे फॉर्म वगैरह में कोई कमी थोड़े ही छोड़ी है। वीसा तो दूतावास को देना था, जितने लोगों का कंपनी ने लिख के दिया, मिल गया। तुम्हारा रिजेक्ट कर दिया तो हम क्या करें।'
यह दो टूक जबाब सुनकर अमन के पास आंसू बहाने के सिवा कोई चारा नहीं था।  

Friday, 29 April 2016

char chakka

चार चक्का

कार के पंजीकरण प्रमाणपत्र में कैलाश का जो पता लिखा था, उसमें कुछ त्रुटि रह गयी थी। उसे ठीक कराने, वह सड़क परिवहन कार्यालय पहुंचा। वह त्रुटि ठीक कराने के बारे में पूछ ताछ कर रहा था, बाबू ने उसे एक फॉर्म पकड़ा दिया और बोला कि उसे भरकर अंदर सड़क परिवहन अधिकारी से मिल ले। फॉर्म लेकर वह सड़क परिवहन अधिकारी के कक्ष में घुसा। फॉर्म पर नाम पता पढ़कर, अधिकारी ने पूछा -
'तुम्हारे पिताजी का क्या नाम है ?'
'अलोक नाथ उपाधयाय'
अधिकारी ने उसे बैठने के लिए कहा और चपरासी से उसके लिये चाय लाने के लिए कहकर, फिर से पूछा  -
'नयी खरीदी है ?'
'खरीदी नहीं, शादी में मिली है। ' कैलाश ने उत्तर दिया।
शालिनी मुस्कराते हुए बोली, 'मैं ठीक करा देती हूँ, अपना आरसी परसों ले जाना। हाथ से करना होता तो अभी हो जाता। पर इसके बदले कंप्यूटर से दूसरा कार्ड निकालना पड़ेगा, मैं कंप्यूटर विभाग को भेज देती हूँ। वैसे चाहो तो कूरियर से घर भिजवा दूँगी।'
'मैं स्वयं ही आकर ले लूंगा। ' कैलाश ने कहा। 
इतने में चाय आ गयी। आरटीओ के इस उदार चित्त और आव भगत से कैलाश अभिभूत भी था और आश्चर्य चकित भी। मन में सोचा, आखिर पिता जी का नाम पूछने के बाद चाय क्यों मंगा ली? कैलाश ने उससे पूछ लिया, 'क्या आप पिताजी को जानती हैं ?'
'बस यूँ ही पूछ लिया। ठीक है, परसों आरसी ले जाना, मैं नहीं भी रहूंगी तो काउंटर से मिल जायेगा। '

शालिनी पढ़ने में बहुत तेज थी। ग्रेजुएशन तक सभी कक्षा में प्रथम श्रेणी से पास हुई। उसके पिता जी अलोक नाथ के यहाँ उसकी शादी का प्रस्ताव लेकर गए थे। पर अलोक नाथ ने बड़े साफ शब्दों में सुना दिया था कि उनका बेटा बीटेक है, और वे पांच लाख नकद और एक चार चक्का लेंगे इसके अलावा उत्तम स्तर की शादी होनी चाहिए।  शालिनी के पापा को यह उनके बजट से बाहर की बात लगी, तो वे पीछे हट गए।  उन्होंने देख सुन कर, उसका विवाह दूसरी जगह कर दिया। शालिनी की इच्छा थी, वह एक बार प्रांतीय नागरिक सेवा (पी.सी.एस.) की परीक्षा में बैठे। ससुराल वालों ने भी उसका भरपूर सहयोग दिया। शालिनी ने तैयारी की और प्रथम प्रयास में ही सफल हो गयी। प्रशिक्षण के पश्चात, उसे सड़क परिवहन विभाग में नियुक्ति मिली। 

चार चक्का के चक्कर में कैलाश को चार वर्ष तक विवाह के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी और शालिनी के विवाह के चार वर्ष हो चुके थे, उसकी दो वर्ष की एक सुन्दर, प्यारी सी बेटी भी थी। 
 
एस० डी० तिवारी 

Thursday, 28 April 2016

Nahar ka pani

नहर का पानी

आज, कल करते इस वर्ष मेहराम ने खेत बोने में देरी कर दी थी। चन्द्रिका का बोया गेहूं कबका जमीन के ऊपर आ चुका था। अब, वह पहली सिंचाई की तैयारी भी करने लगा था। मेहराम की चन्द्रिका से तो पहले ही पटरी नहीं थी, उसका हरा खेत देख कर वह ईर्ष्या से भुन रहा था। नहर का पानी छूट चुका था, चन्द्रिका ने उसके खेत को जाने वाली नाली में पानी खोल दिया। मुख्य नहर से निकलने वाली, मेहराम और चन्द्रिका की एक ही नाली थी, आगे चलकर वह दो अलग दिशाओं में बंट जाती थी।

मेहराम के खेत के पास एक पोखरी थी, जो बरसात के बाद शीघ्र ही सूख जाती थी। मेहराम ने सोचा कि अभी उसके खेत की सिंचाई में तो समय है, चलो इसी को भर लेते हैं। बाद में जब नहर में पानी नहीं भी आएगा, तब भी पम्प लगाकर अपने खेत की सिंचाई कर लेगा। मगर यह उसकी कुटिल चाल थी, उसकी असली मन्सा तो कुछ और थी। वह नहीं चाहता था कि चन्द्रिका के खेत में पानी जाय और उसकी फसल अच्छी हो। उसका पानी तो वह नहीं बंद कर सकता था, इस बहाने पानी का प्रवाह कम करके उसके खेत की सिंचाई में व्यवधान उत्पन्न करना चाहता था। वह नाली को पोखरी में खोलकर किसी रिश्तेदारी में चला गया। 

इधर चन्द्रिका के खेत को पूरा पानी तो नहीं मिला, पोखरी लबालब भर गयी और पानी बहकर मेहराम के खेत में भी भर गया। बेचारे का  खेत का सारा बीज सड़ गया। और तो और कुछ समय बाद सिंचाई विभाग से पानी का बिल भी आ गया। 

एस० डी० तिवारी 


Holi ki thitholi

होली की ठिठोली

ससुराल करने का वास्तविक मजा तो अधेड़ उम्र में होता है। और ससुराल अगर गांव में हो तो क्या कहने। सबसे दुआ सलाम; साली, सरहज से खुलकर चिकारी, मजाक;  किसी भी ससुराल वाले को छेड़ देना और साथ ही मजाकिया प्रतिक्रिया पाना; दो चार लोग एकत्र हो जायं तो कहकहों की गूंज; कभी चाय पकौड़ी तो कभी शरबत, लस्सी, केवल और केवल खुशनुमा माहौल। ससुराल में जाकर, हर मौसम बसंत सा लगता है। आपस की गुदगुदाने वाली बातें चमन में खिले फूल की भांति वातावरण को महका देती हैं।

सुमेर जी अधेड़ हो चुके थे। वे जब भी ससुराल जाते तो दो तीन दिन का समय लेकर ही जाते। उनकी ससुराल भरी पूरी थी, ससुर जी तीन भाई; साले, सालियों का कोई अभाव नहीं था ।  एक बार वे होली पर ससुराल पहुँच गए। सरहजों ने जमकर रंग डाला।  सुमेर जी भी कौन सा पीछे हटने वाले, उन्होंने भी खूब साथ निभाया। बड़ी वाली सरहज ने बाल्टी में रंग घोल कर रखा था। सुमेर जी के आँगन में आते ही उन पर डालने को बाल्टी  उठायी तो सुमेर जी ने बाल्टी पकड़ ली।  छीना झपटी में कुछ रंग उन पर गिर कुछ सरहज पर थोड़ा बहुत बाल्टी में बचा रहा। सुमेर जी ने बाल्टी छीन लिया तो सरहज कमरे के भीतर भाग चली, सुमेर जी ने दूर से ही बाल्टी का रंग उनपर फेंक दिया।  सरहज तो बगल होकर बच गयी, वह रंग उधर से आ रही सास पर पड़ा। सास बेचारी भौचक्की रह गयी और सुमेर जी 'अरे माता  जी, अरे माता जी' करने लगे। वो तो शुक्र था कि सुमेर जी की पत्नी वहां मौजूद नहीं थीं।

होली खेलने के बाद ठंडई छनी तो सुमेर जी ने अपने बड़े साले रमाकांत की ठंडई में थोड़ी ज्यादा भांग मिला दी। फिर तो रमाकांत की भांग रंग दिखाने लगी। वे दो तीन घंटे तक हँसते ही रहा।  बिना हंसी की बात पर भी हंसी आ जाती। द्वार पर कोई आ जाता, कभी उसे पकड़कर हंसने लगता तो कभी ठंडई का गिलास पकड़ाकर। उसे वहां से जल्दी जाने भी नहीं देता । घर के अंदर से सभी, रमाकांत की पत्नी को उनका तमाशा दिखाने लगे तो वह बेचारी स्वयं को लज्जित महसूस करने लगी।   

अब रमाकांत की पत्नी ने भी सुमेर जी को सबक सिखाने की सोची। जब सुमेर जी ने शौच जाने के लिए पानी मंगवाया तो रमाकांत की पत्नी ने थोड़ी चीनी घोल कर पानी का लोटा पकड़ा दिया। सुमेर जी को जोर की लगी थी, लोटा थामे और तेजी से खेत की ओर भागे। जब वापस आये तो उनके पीछे धोती पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। रमाकांत और ससुराल के अन्य लोग मक्खियों को देख हंसने लगे और सुमेर जी को चिढ़ाने लगे। क्यों भाई साहब! धोती में चीनी विनी लगा कर चले हैं क्या ? या कि ठीक से धोया नहीं ? आपका पिछवाड़ा मक्खियों का आकर्षण बना हुआ है। सुमेर जी ने थोड़ा गुस्सा दिखाया और रमाकांत की धोती खोलने लगे । 
'अरे यह क्या?'
'अब मैं इसे ही पहनूंगा और तुम मेरी पहनो।' सुमेर जी कहने लगे ।
'अरे जीजा जी, मैं आपके लिए दूसरी धोती देता हूँ, चलिए स्नान कर लीजिए, मैं आपकी धोती धो भी देता हूँ।'

रमाकांत, सुमेर जी को नलकूप पर स्नान करवाकर उनकी धोती कचार कर पसार दिया। माहौल फिर से स्नेहिल हो उठा।

एस० डी० तिवारी


Pet kharab hai

पेट ख़राब है

गांव का स्वस्थ्य केंद्र खुल गया था, केंद्र पर रोगियों की भीड़ जुट चुकी थी। डॉक्टर कुशवाहा आते ही रोगियों को देखना प्रारम्भ कर दिये। कुछ देर बाद, अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही, एक महिला चंपा का नंबर आ गया। उस समय उसकी सहायता करने हेतु आया, उसका पति शौचालय चला गया था। वह महिला पहले तो डॉक्टर कुशवाहा के कक्ष में जाने में झिझक रही थी, पर, वहां एकत्र लोगों ने उससे कहा कि तुम्हारा नंबर आ गया है, जा के डॉक्टर को दिखा लो, तब वह कक्ष में गयी और डॉक्टर के बगल वाले स्टूल पर बैठ गयी।
'हां, क्या हुआ है?' डॉक्टर ने पूछा।
'डॉक्टर साहब! पेट ख़राब है।' महिला ने उत्तर दिया।
'तकलीफ क्या है ?'
थोड़ा शरमाते, पेट पर हाथ रख के 'पेट ख़राब है। '
'पेट में दर्द है ?' डॉक्टर ने फिर से पूछा।
'नहीं! पेट ख़राब है। ' महिला ने उत्तर दिया।
डॉक्टर कुशवाहा थोड़ा झुंझला कर बोले, ' अरे, पेट ख़राब है, इससे मैं क्या समझूंगा? तकलीफ क्या है, ये तो बताओ, जल्दी से दवाई लिखूं, और भी बहुत मरीज देखने हैं। '
चंपा ने रिकॉर्ड किये टेप की भांति फिर से दोहरा दिया, 'डॉक्टर साहब! पेट ख़राब है। '
डाक्टर कुशवाहा वहां के अनपढ़ लोगों और उनके सीधेपन से परिचित थे। वे इस बात से आवेश में आये बिना चंपा से थोड़ा घुमा फिरा कर पूछना आरम्भ कर दिए, 'पेचिस है? '
चंपा पेचिस नहीं जानती थी, अगर वे आंव बोलते तो शायद वह 'नहीं' बोल देती। फिर वही उत्तर 'पेट ख़राब है। ' लूज मोशन भी उसकी समझ से बाहर था। डॉक्टर कुशवाहा धैर्य खोये बिना, एक एक करके पूछने लगे -
पेट में दर्द है ? 'नाहीं'
टट्टी हो रही है ?  'हाँ '
कड़ी हो रही है ? 'नाहीं'
पतली हो रही है ? 'हाँ'
कितनी पतली ? 'एक्दमै पानी'
कितनी बार गयी ? 'चार-पांच बेर'
उलटी भी हो रही है ? 'नाहीं'
डॉक्टर कुशवाहा, लूज मोशन की दवाई लिख ही रहे थे कि चंपा का पति आ गया - 'डॉक्टर साहब! चंपा का पेट झरत है। '


एस० डी० तिवारी

Kadaha me vistar

कड़ाहा में बिछौना

तिलकोत्सव के अवसर पर सभी मेहमान जुट गए थे। गांव का हाल तो कुछ ऐसा ही होता है, खटिया और विस्तर के लिए छिना झपटी। जो पहले पा गया सो पा गया, नहीं तो बंगले झांको। कभी खटिया मिली तो बिछौना नहीं, बिछौना मिला तो खटिया नहीं। पर दोनों में से एक भी मिल जाय तो काम चल जाता है। कुछ लोग मेजबान के पास पड़ोस से भी जुगाड़ लगा लेते हैं। 

गुड्डू के ममेरे भाई योगेश का तिलक था। गुड्डू  के पडोसी रामफेर के यहाँ भी उसके मामा का आना जाना था। अतः रामफेर को भी तिल्कोत्सव  में आने का निमंत्रण था। रामफेर के पिताजी किसी अन्य काम में व्यस्त होने के कारण, तिलकोत्सव में नहीं जा पाए, इसलिए उन्होंने रामफेर को ही गुड्डू के साथ लगा दिया। गुड्डू और रामफेर हम उम्र थे, एक दूसरे का साथ पाकर बहुत प्रसन्न हुए। रामफेर बहुत ही सीधा सादा लड़का था। दोनों बड़े उत्साह से मामा  कुलभूषण के यहाँ पहुंचे। मामा गुड्डू को बहुत प्यार करते, जब भी वह आता तीन चार दिन से पहले तो जाने ही नहीं देते। गुड्डू भी बहुत खुश रहता, मामा के यहाँ खाने पीने की बड़ी मौज होती थी।  दूध दही की हमेशा ही भरमार रहती थी। गुड्डू, दूध पीने में तो नाक मुंह सिकोड़ता पर नानी की जमाई दही, गुड़ डालकर बहुत पसंद थी।  

तिलकोत्सव में मामा के साथ, गुड्डू और रामफेर भी मेहमानों की खातिरदारी में जी जान से जुटे थे। बड़ा भव्य आयोजन था। चार पांच सौ लोगों की भीड़। खिलाने पिलाने में आधी रात हो गयी। काम करते दोनों थक गए थे। सब कुछ ठीक ठाक से संपन्न हो गया। अब ये हुआ कि चल कर सोया जाय। रामफेर बोला, 'गुड्डू ! अब सोने की व्यवस्था कर। ' दोनों खटिया और विस्तर ढूंढने लगे पर कोई भी खाली नहीं मिल रहा था। हरेक खटिये पर कोई न कोई काबिज था। समझ नहीं आ रहा था, वे खान सोएं। गुड्डू ने सोचा सौरव के यहाँ चलें, वहां कुछ न कुछ व्यवस्था हो ही जायेगा। पर तभी मामा दिख गए।  मामा ने पूछ लिया, 'क्या हुआ अभी तक सोये नहीं ?'
'नहीं मामा, कोई खटिया खाली ही नहीं है', रामफेर बोला। 
मामा मुस्कराते हुए एक ओर इशारा किये, 'अरे तुम लोग किशोर हो, कोई विस्तर उठा लो और देखो वो गुड़ बनाने वाला कड़ाहा खाली पड़ा है, उसी में बिछा कर सो जाओ। '

उन दोनों को यह नायाब सुझाव जंच गया।  इस तरह का खेल तो पहले किसी ने नहीं खेला होगा। उन्होंने सोचा यह नया काम करके सबको आश्चर्य में डाल देंगे। रोमांचित हुए दोनों ही, उसी में बिछा कर सो गये। लग रहा था पंखुड़ी रहित कमल पुष्प के ऊपर दो राजकुमार सोये पड़े हों। सम्भवतः कड़ाहे की पेंदी समतल नहीं थी। वे जब जब करवट लेते कड़ाहा ऊपर-नीचे होता और भड़ भड़ की आवाज से सोने में व्यवधान उत्पन्न होता। कोई एक सोता तो शायद उसमें  समा भी जाता, चुकि दो लोग सोये थे इस कारण बीचों बीच तो सो नहीं सकते, पैर पसारने में बड़ी कठिनाई हो रही थी।  कभी गुडू, रामफेर के पैर पर तो कभी रामफेर, गुड्डू के पैर पर. पैर फेंकता।
मगर दोनों पूरी तरह थके थे, कड़ाहे की आवाज तो क्या बैंड भी बजता तो भी नींद आ जाती। मामा ने उन्हें सोने कह तो दिया था पर उन्हें यह नहीं पता था कि वह खाली कड़ाहा उनके कुत्ते के भी सोने स्थान था। उनके सोने के पश्चात्, वह भी आकर उसी में सो गया। एक बार रामफेर का पांव कुत्ते को लगा तो भौं भौं करता कड़ाहे के बाहर कूदा। मामा की नींद खुल गयी। वो समझे, कुत्ते को किसी ने मारा है। उठकर इधर उधर चारों ओर देखे मगर कोई नहीं था। कुत्ता कड़ाहे से हटकर दूसरी जगह सो गया।

रात को जब रामफेर पिशाब करके कड़ाहे में दुबारा दाखिल हुआ तो उसके पजामे की हवा का तूफान, कड़ाहे की धार पर बैठे चींटे को भीतर उड़ा ले गया। रात को विस्तर लगाते समय उसमें पड़े दो तीन चींटे तो सिधार गए, ये बेचारा किसी तरह अपनी जान बचाकर कड़ाहे की बार पर चढ़ गया था। गोल गोल घूमते उसकी अक्ल भी गुम हो गयी थी कि वह किस दिशा में जाय और नीचे उतरने का कोई सोपान भी नहीं सूझ रहा था। धीरे धीरे वह रामफेर के पाजामे में जा घुसा। अब जब रामफेर के पैर के नीचे दबा तो चींटे ने काटकर उसे बताया कि मैं दबा हूँ, मुझे छोड़ दो। रामफेर ने मच्छर समझकर हाथ का हथौड़ा चलाया और एक ही चोट में बेचारे चींटे की पतली कमर टूट गयी।   

किसी तरह सुबह हुई। उठते रामफेर चांपा कल पर गया और मुंह धोया, जब उसकी नजर अपने पाजामे पर पड़ी तो देखा उस पर कई जगह कालिख लगी थी। कड़ाहा सीधा ही रखा था, भीतर वाला हिस्सा तो साफ़ था, किन्तु बाहर वाले हिस्से की कालिख  को भला कौन साफ़ करता है। रात को घुसते समय, रामफेर ने इस बात का ध्यान नहीं दिया और कड़ाहे की कालिख उसके पाजामे में लग गयी। पाजामे में लगी कालिख को देख, वह शर्माने लगा। बदलने के लिए और कपड़ा भी नहीं लाया था, सुबह नाश्ता करते ही गुड्डू से कहने लगा, अब घर चलते हैं। गुड्डू बोला कि मामा इतनी जल्दी कहां जाने देंगे। रामफेर ने आग्रह किया, 'उन्हें बिना बताये निकल चलते हैं, गांव के और बच्चे पाजामे की कालिख देखेंगे तो चिढ़ाएँगे।'
गुड्डू बोला, 'मामा से धोती दिलवा देता हूँ, उसे पहन ले।'
मगर रामफेर को धोती कहाँ पहनने आती थी। फिर योगेश से पूछा कोई पाजामा या निकर की व्यवस्था कर दे, पर रामफेर के साइज का पाजामा नहीं मिला। अब रामफेर, गुड्डू से बोला, योगेश को बताकर चलते हैं। अब योगेश को बताकर दोनों चलने की तैयारी करने लगे। गुड्डू अभी अपना एक ही जूता पहना था और रामफेर अपनी चप्पल ढूंढने में लगा था तब तक उधर से आते हुए मामा दिख गए। गुड्डू एक जूता हाथ में लिए लंगड़ाते और रामफेर नंगे पांव ही वहां से चल दिया। इधर योगेश ने  कुलभूषण जी को बता दिया वे दोनों वापस अपने घर जा रहे हैं, और रामफेर की ये चप्पल यहीं रह गयी। तब कुलभूषण जी बड़े नाराज हुए, 'अरे ऐसे कैसे चले जायेंगे। अभी उनको विदाई भी नहीं दिया और घर के लिए कुछ मिठाई वगैरह।'
  
तब कुलभूषण उनके पीछे चले और चिल्लाने लगे, 'अरे गुड्डू रुको, अभी कहाँ जा रहे हो!' भला वे कहाँ सुनने वाले थे, मामा को पीछे आते देखकर और तेज चलने लगे। वास्तव में उन्हें डर था कि कहीं पकड़े गए तो मामा उन्हें जाने नहीं देंगे और यह कालिख लगा पाजामा बेइज्जत करा देगा। इधर योगेश हाथ में चप्पल लेकर दौड़ा, 'चप्पल तो ले लो।'  उन दोनों ने समझा योगेश उन्हें पकड़ने आ रहा है, वे और तेज दौड़ने लगे। ऐसा लग रहा था, कोई बड़ा भय उनका पीछा कर रहा हो। वे दोनों पीछे मुड़कर देखे तक नहीं। अंततः मामा ने वह चप्पल रखवा दिया, 'देखते हैं, एक दो दिन कोई मिठाई लेकर जायेगा तो इसे भी भिजवा देंगे।'




DAHEJ ME SHAUCHALAY

दहेज़ में शौचालय


विवाह के अब चार दिन ही बचे हैं।  मेहमान आने लगे हैं,  घर में गीत गाना शुरू हो चुका है।  सब लोग शादी की तैयारी में जुटे  है, मगर  बिरजू शौचालय बनवाने में लगा है। दुखंती बार बार कोसता है, मोबाइल क्या हो गया कि शादी से पहले ही लडके-लड़की दिन रात उसी पर लगे रहते हैं।  मैंने इसे मना किया था ज्यादा मत बात कर, आखिर वो घर ही तो आएगी। पर ये साहब हैं कि क्यों मानते! बनवाओ अब, सब लोग बारात की तैयारी में लगे हैं, इनके अभी कपडे तक बने नहीं और ये शौचालय बनवा रहे हैं। 

बिरजू पलट कर बोलता है, 'बस पापा शादी से पहले तैयार हो जायेगा।  और आप भी तो इसी में जाओगे न। '

दुखंती ने बिरजू की शादी में फुलवा के पापा से  कुछ नकद के अलावा मोटर साइकिल की मांग रख दी थी। फुलवा को जब दहेज़ की बात का पता चला तो अपने पापा से पूछ लिया, उनके घर में शौचालय है कि नहीं? जब उत्तर नहीं में मिला तो उसने स्पष्ट कह दिया, पापा किस मुंह से वे दहेज़ मांग रहे हैं, उनके यहाँ  शौचालय तक नहीं है। फुलवा के  पापा ने उसकी बात अनसुनी कर दी। वे ज्यादा झंझट  मोल लेना नहीं चाहते थे , सोचते थे कि ज्यादा पंगा लिया तो ससुराल वाले फुलवा के साथ न जाने कैसा बर्ताव करेंगे। फुलवा की शादी पक्की हो गयी और सगाई भी हो गयी। सगाई के बाद एक दिन अचानक बिरजू का फ़ोन आ गया। फुलवा की ख़ुशी का तो ठिकाना नहीं रहा। उसकी बात चीत पर फुलवा मोह गयी। फिर तो उनका बातचीत का सिलसिला चलता रहा। बातचीत से फुलवा ने निष्कर्ष निकल लिया था कि उसके पापा ने गलत निर्णय नहीं लिया है। एक दिन फुलवा ने बिरजू की मनोदशा  भांप कर उससे कह दिया - 'सुना  है कि आपके घर में शौचालय नहीं है,  मुझे बाहर जाने की आदत नहीं है, एक शौचालय तो बनवा लो। '

'पर पापा इसके लिए पैसे कहां देंगे, मैंने भी अपनी कमाई घर में ही दे दी है। ' बिरजू बोला। 

'तो मैं पापा से कह देती हूँ  मोटर साइकिल के बदले शौचालय बनवाने के पैसे दे दें। वैसे भी मोटर साइकिल पर तो हम्हीं दोनों बैठेंगे और शौचालय पूरे परिवार के काम आएगा। तुम कमा कर पैसे जोड़ लेना तो मोटर साइकिल खरीद लेना। ' 
फिर तो बिरजू शौचालय के लिए रकम जुटाने में लग गया। 


एस० डी० तिवारी