Wednesday, 28 December 2016

Maa ki diary

मम्मी की डायरी

अंजलि अब बड़ी हो गयी थी। बचपन से ही अपनी माँ को संघर्ष करते और पापा को पीकर लड़ते देखा था। कुन्ती ने जीवन में इतना कुछ सहा, सोच कर अंजलि का मन करुणा से भर जाता। किशनपाल अपनी कमाई का एक हिस्सा तो पीने में ही उड़ा  देता। वह जो कुछ कुंती को देता, उसमें शौक पूरा करना तो संभव नहीं था, पर घर का काम काज चल जाता।  जीवन की अनेकों विसंगतियां सह कर भी, कुंती अपने घर को बड़े सुव्यवस्थित ढंग से चला रही थी। उसके मन में बस यही था कि अंजलि पढ़ लिख जाय, और अपने पैरों पर खड़ी हो जाय तो उसके सभी कष्ट दूर हो जायेंगे। खुद तो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, पर बेटी को पढ़ाने का भरपूर जज्बा था। वह अंजलि को पूरा प्यार देती और सही मार्ग पर चलने की नसीहत। वह बेटी की जिंदगी में किसी प्रकार का दुःख नहीं आने देगी, मन में संकल्प लिये थी।
मम्मी की संघर्ष भरी जिंदगी देख कर, अंजलि के मन में जिज्ञासा रहती कि वह एक दिन पढ़ लिख कर, कुछ बनेगी, और मम्मी की शेष जिंदगी खुशहाल बनाने में हर संभव मदद करेगी। धीरे धीरे अंजलि बड़ी हो गयी, और उसका ग्रेजुएशन पूरा हो गया। अपना खर्च वह स्वयं निकाल ले और  माँ के हाथ में कुछ पैसा आये, सोचकर, दो तीन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी।
एक दिन अंजलि घर में अकेली थी। वह अलमारी में अपना कुछ सामान ढूंढ रही थी, तभी उसके हाथ एक डायरी लगी। समय था ही, वह बैठ कर उसे पढ़ने में लग गयी। डायरी में जो कहानी लिखी थी, उसे बहुत रोचक लगी, जिस कारण उसे पूरा पढ़ने का मन हो चला। कहानी के करुण प्रसंग पढ़कर, कई बार अंजलि की आँखों से आंसू छलक आये।
'एक गांव की लड़की, जिसका गरीबी के कारण बेमेल विवाह हो गया। दूल्हे की उम्र  पिता के बराबर की थी। जब कुंती को पता चला कि लड़का एक विधुर है और सिर पर आधे बाल हैं तो वह दबी जबान से अपनी माँ से पूछी कि और कोई लड़का नहीं है क्या, माँ? माँ ने समझाया कि लडके हैं तो दहेज़ कहाँ से लाएंगे। आजकल लडके वालों का कितना मुंह खुला हुआ है; समझते हैं कि लड़की वालों के घर, पेड़ पर पैसा उगता है। देवदत्त भी क्या बुरा है, अच्छा कमा लेता है। खाली उम्र ही तो कुछ ज्यादा है, रुपये पैसे की तुझे तंगी नहीं होगी  ....  ।  धीरे धीरे, वह दिन आ गया जब द्वार पर बारात आई। औरतों में कानाफूसी हो रही थी, लड़का ठीक तो है पर उम्रदराज है। सुनकर कुंती की छाती पर साँप लोट जाता। वह खिड़की से झांक कर देखने का प्रयत्न करती, पर भीड़ में घिरे होने के कारण लडके तक नजर नहीं पहुँच पाती। कई बार तो मन में आता, जाकर सीधे कह दे, मुझे यह विवाह नहीं करना। किन्तु माँ बाप के मान मर्यादा का ख्याल मन में रख कर, हिम्मत नहीं जुटा सकी। शादी हो गयी। जिस बात का डर था, वही हुआ। अधेड़ उम्र के मर्द से विवाह कर, कुंती वैवाहिक सुख से वंचित रहने लगी। अधिक उम्र होने के कारण देवदत्त का घूमने फिरने का शौक भी मर गया था। वह तो बस उसकी नौकरानी बन कर रह गयी थी।

इस बीच पड़ोस की एक हम-उम्र लड़की सुमित्रा से कुंती की मित्रता हो गयी। सुमित्रा कुंती के यहाँ आती जाती, उससे बातों में जी लग जाता। एक बार कुंती ने सुमित्रा को केक बनाना सिखाया। सुमित्रा ने जब केक बनाने का अभ्यास किया तो थोड़ा सा केक, चखने के लिए अपने भाई मदन के हाथों, कुंती के पास भिजवा दिया। मदन जब कुंती को देखा तो देखता रह गया। कुंती की सुंदरता थी ही ऐसी। यह तो उसकी बदकिस्मती थी कि माँ बाप गरीबी का अभिशाप लिए, अच्छी शादी का प्रयास ही नहीं किये।  अन्यथा कोई भी युवक उसे एक बार देख कर शादी के लिये ना, नहीं कर सकता था। अब तो मदन किसी न किसी बहाने कुंती के यहाँ आने जाने लगा। कुंती को भी उससे बात कर बड़ा शकुन मिलता। एक दिन मदन ने कुंती से बोल दिया 'आई लव यू'। कुंती के दिल में तो तूफान सा आ गया। जिस मान मर्यादा को लेकर वह अधेड़ से शादी की, अब क्या पति के रहते किसी से प्यार करके उसे मिटा देगी। उस समय तो वह अवाक् रह गयी। पर मदन की बात उसके मन को उद्वेलित करती रही। यह बात उसे मरुभूमि में हरियाली सी लग रही थी। अब तो दिन-रात, सोते-जागते, उसके मन में मदन की बात गूंजती रही। धीरे धीरे उसने मन बना लिया कि आखिर जीवन जीना है तो इतना घुटन क्यों सहे। अगली बार मदन कुंती के लिए उपहार लेकर आया तो कुंती ने उसे स्वीकार कर लिया। धीरे धीरे दोनों का मिलना जुलना प्यार में बदलने लगा।

एक दिन मदन कुंती के यहाँ गया तो वह घर में अकेली थी। देवदत्त कहीं बाहर गया हुआ था। अब तक मदन उस पर अपना अधिकार समझने लगा था। वह उसे पकड़ कर गले से लगाना चाहा, पर कुंती तब तक सम्हल चुकी थी, उसे एहसास हो चुका था कि वह किसी की पत्नी है। अपने मन के दोनों के पक्ष के द्वन्द पर निर्णय लेने के लिए उसे स्वयं ही न्यायाधीश बनना था। एक ओर जिंदगी का प्रश्न तो दूसरी ओर मर्यादा। उसने मदन से बोला, मैं अपने पति को छोड़ देती हूँ, चलो विवाह कर लेते हैं।  मदन ने झट पल्ला झाड़ लिया, 'तुम तो विवाहित हो।'
'तो, यह पहले पता नहीं था? प्यार का ढोंग क्यों रच रहे थे? '
अब मदन के ख्वाबों का किला ढह चुका था। उसके बाद कुंती के यहाँ आना जाना छोड़ दिया।
 
कुंती तो देवदत्त के पास एक सेवादार के रूप में जीवन बिता रही थी। उसे विवाह का तनिक भी सुख नहीं मिला, जिंदगी घुटन भरी लग रही थी। जीवन के दो साल शून्य में बीत चुके थे। पर अब कुंती की सहनशक्ति बोल चुकी थी। उसके भीतर छुपी नारी जाग गयी और एक दिन जब देवदत्त काम पर गया था तो वह अदम्य साहस का परिचय देते हुए, एक पत्र लिखकर, उसके विस्तर पर रख दी। और ससुराल छोड़ कर अपने पिता के घर आ गयी।  पहले तो माँ बाप ने समझाया कि बेटी विवाह के बाद लड़की का घर ससुराल होता है। तुझे इस तरह नहीं आना चाहिए था। पर कुंती अब दुनिया के प्रपंच जान चुकी थी। उसने अपनी माँ से पूछ लिया अगर मजदूरी ही करनी है तो किसी की बंधुआ मजदूर बनकर क्यों ? मैं यहीं रहकर कुछ काम कर लूंगी, तेरी भी मदद करुँगी। कुंती की बात उन्हें समझ आ गयी, और वह अपने माँ बाप के साथ रहने लगी।

कुछ ही समय बीता था, दूर की रिश्तेदारी के मोहन लाल, कुंती के घर आये हुए थे। उन्हें एकाएक याद आ गया कि उनके गांव का किशनपाल अभी तक अविवाहित है और मोहनलाल के कहे को टालेगा नहीं। वह कुंती के लिए योग्य वर रहेगा। किशनपाल का गांव में खेत वगैरह तो कुछ खास नहीं है, पर वह शहर में रहता है और ठीक ठाक कमा लेता है। सारी स्थिति को समझते हुए मोहन लाल ने, किशनपाल से विवाह की बात चला दी। कुंती के पास सुंदरता की संपत्ति तो थी ही, एक नजर डालने के बाद किसी को भी ना करना  असंभव था। मोहनलाल ने किशनपाल से विवाह करवा दिया। कुंती उसे पाकर बहुत प्रसन्न थी। सुमित एक खूबसूरत नौजवान था और कुंती को बहुत प्यार करता।  कुंती ने जो साहस दिखाया उसे उसका प्रतिफल मिल गया। सुमित कमा तो ठीक ठाक लेता था, पर उसे कुछ ऐसे लोगों की संगति मिल गयी कि कभी कभी शराब भी पी लेता। किशनपाल कभी कभार पीता था, पर अपनी जिम्मेदारियों पर आंच नहीं आने देता था। वह कुंती को बहुत प्यार करता व उसका भरपूर ख्याल भी। कुंती उसके साथ प्रसन्न रहने लगी।

शादी के पश्चात् सुन्दर सी लड़की पैदा हो गयी। अब कुंती को जिंदगी का कारण और सहारा, बेटी के रूप में दोनों ही मिल गए थे। अपनी जिंदगी से अब वह पूर्णतया संतुष्ट थी, उसे और कुछ भी नहीं चाहिए था। उसकी बस यही चाह थी कि बेटी को खूब प्यार दे और पढाये लिखाये। एक बार फिर समय ने करवट बदला। कई वर्षों बाद, मदन फिर से प्रकट हो गया। पता नहीं कहाँ से मदन को कुंती का फ़ोन नंबर मिल गया था। फोन पर कुंती से प्यार की बात फिर से दोहराने लगा, और दोस्ती का हाथ बढ़ने लगा। उसे लगा कि किशनपाल शराब पीता है तो कुंती उससे घृणा करती होगी जिसे वह उससे दोस्ती करने के अवसर के रूप में देख रहा था। अबकी भी, कुंती ने अपने पांव लड़खड़ाने नहीं दिया और दो टूक शब्दों में उसे कह दिया, 'अब इस गली में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है, यहाँ किसी और का घर बन चुका है।'

कुंती एक बार फिर अपने अतीत को देखती है, एक तो बीबी बनाकर नौकरानी का काम लेना चाहता था, दूसरा प्यार का ढोंग रचकर साथ समय बिताने के चक्कर में। निर्धन होना कितना बड़ा अभिशाप है। थोड़ा और पढ़ लिख गयी होती तो इतना कुछ नहीं देखना पड़ता। फिर भी ईश्वर का दिया विवेक तो है न, संयम और साहस से भी बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है । किशनपाल कभी-कभी बेशक पी लेता है, पर प्यार तो करता है न, और परिवार की जिम्मेदारी भी निभा रहा है। नशा करता है फिर भी वह मेरे बारे में सोचता है, परिवार के बारे में सोचता है, अंजलि से कितना प्यार करता है। मुझे तो इसने एक नयी जिंदगी दे दी, वरना एक नौकरानी बन कर ही रह जाती।

यह करुण गाथा पढ़कर, अंजलि के आँखों से आंसू नीचे की ओर ढुलक ही रहे थे कि बाहर से कुंती आ गयी। अंजलि के हाथ में डायरी और ऑंखें नम देख कर, वह चौंक गयी। झट से, उसके हाथ से डायरी छीन ली।
'यह तुझे कहाँ से मिली। '
'अलमारी में '
'चल छोड़, खाना वगैरह बनाने की तैयारी करते हैं।'
'मम्मी कहीं यह आपकी कहानी तो नहीं?' अंजलि ने पूछ लिया।
वैसे अंजलि को आभास तो होता था कि कुंती दिल में कोई गहरी पीड़ा रखे हुए है, पर उसे वास्तविक कहानी का पता नहीं था। बार बार हठ करने पर कुंती सच बोलने से अपने को रोक न सकी। फिर तो दोनों की आँखों से गंगा यमुना की धार बह निकली।

'माँ जीवन में तूने कितनी व्यथा सही, और हमारे ऊपर आंच तक नहीं आने दी ! तू धन्य है, माँ।'

एस० डी० तिवारी

Sunday, 18 December 2016

Do bibi ka pati

दो बीबी का शौहर

रसिक लाल  की शादी के पांच साल से भी अधिक हो गए थे। अभी तक गोद सूनी रहने से सीमा और वे दोनों ही हताश थे, और उपर से  रोज ही लोग पूछते रहते, अभी कुछ है तो नहीं ?
शीला ताई ने अभी कल ही पूछा था, आज फिर -
'अरे रसिक बहू के कुछ है तो नहीं ?'
'ताई एक दिन का जांचने की अभी कोई मशीन भी ना आई। '
 तब तक उनके साथ बैठी शकुंतला भाभी बोल बैठीं, 'किसी बड़े डाक्टर को दिखा लो। ना हो तो दोनों बाला जी मंदिर जाकर, झाड़ फूंक करवा लो। सुलेखा को वहीँ जाकर लाभ मिला था।'

रसिक लाल की जहां तक पहुँच थी, जाँच कराया, पर कोई लाभ नहीं मिला। अब तो लोगों की सलाह ताने का रूप ले चुकी थी। रसिक लाल की संतान पाने की प्रबल इच्छा थी। इसी चाह में वे दूसरी शादी के लिए मन बना बैठा।

रसिक लाल की शादी का जामा जोड़ा, अभी तक रखा था, उसके भाग्य जगे और ड्राई क्लीनिंग के लिए भेज दिया गया। रसिक लाल उन भाग्यशाली लोगों में से निकले जिन्हें अपनी शादी का जामा जोड़ा एक बार फिर पहनने का अवसर मिला, वरना शादी के जोड़े का तो बस यही हस्र होता है, कि या तो रखा रह जाय या किसी को दे दिया जाय।  स्त्रियों को तो फिर भी कभी कभार उत्सव आदि में अपनी शादी का लहंगा पहनने का मौका मिल जाता है। अधिक समय नहीं बीता, रेशमा नई दुल्हन बनकर आ गयी।

रेशमा के आ जाने पर रसिक लाल के दोनों हाथ में लड्डू थे। सीमा और रेशमा दोनों में रसिक लाल की सेवा करने और उसे प्रसन्न रखने के प्रतियोगी भाव होते।  दोनों पत्नियां चाहतीं कि उसे सिर पर बिठा कर रखें। एक पकौड़ी बनाकर रसोई से हटती तो दूसरी हलवा बनाने लगती। दोनों अपनी तरह के बढ़िया से बढ़िया पकवान बनाकर खिलाने का प्रयत्न करतीं। कभी कभी शादी लाल को अपनी इच्छा से अधिक खाना पड़ जाता।

दोनों कुछ न कुछ विशेष पकवान बनाना जानती थीं। सीमा छोले बटूरे अच्छा बनाती तो रेशमा सांभर डोसा और चाउमिन। वे अपना कच्चा मॉल चुपके से तैयार करतीं कि कहीं दूसरी न सीख जाय। उनके हाथ के बने पकवान के स्वाद की चर्चा रसिक के मित्रों में भी होती। कभी कोई मित्र किसी चीज की प्रशंसा करता तो रसिक जी उसे छुट्टी के दिन निमंत्रित कर लेते। उनकी पत्नियां भी प्रशंसा से फूले न समातीं।

एक बार सीमा ने रसिक लाल की पसंद, चोखा बाटी बनाया और साथ धनिया टमाटर की चटनी, तो उन्होंने छक कर खा लिया। रेशमा को चोखा बाटी इतना पसंद नहीं था, वह चुपके से बेसन का चीला बना लाई। रसिक लाल के पेट में बिल्कुल भी जगह नहीं थी पर नई बीबी का तिरस्कार कैसे कर सकते थे। जब उसने आग्रह किया तो उन्होंने खा लिया। अब तो भरा पेट बहुत भारी हो गया, और पानी पाकर पेट में बाटी और फूल गयी। वे अपच के मारे परेशान हो गए। डाइजीन की गोली भी खाई पर स्थिति नियंत्रण में नहीं हुई। रात में कई बार उठ कर टहलना पड़ा और पूरी रात यूँ जाग कर ही बितानी पड़ी ।

सोने की समस्या बड़ी थी।  दो बेड रूम का फ्लैट था। दोनों बीबियों ने एक एक कमरा हथिया लिया था।  रसिक लाल को यह तय करना बड़ा कठिन होता कि किसके कमरे में सोयें। उनका किसी एक के कमरे में सोने का मन होता तो शाम से ही उसी के कमरे में अड्डा जमा लेते।  वहीँ पर शाम की चाय, वहीँ खाना और जल्दी नींद आने का बहाना। कभी रेशमा के कमरे में लेटे होते तो सीमा अवसर पाकर जाती और बोल देती, 'यहाँ क्यों सोये हो? जाकर उधर सो जाओ, आज ही चद्दर बदली हूँ।

पहले रसिक लाल की सीमा से कभी कभी नोक झोंक हो जाया करती थी, अब वे बड़ी शांति की बंशी बजा रहे थे। उनका जीवन अच्छे से बीत रहा था। उनकी दोनों पत्नियां परस्पर लड़ झगड़ कर अपनी शक्ति का संतुलन बनाये रखतीं तथा अपनी जिह्वा की खाज मिटा लेती थीं। जब दोनों में तकरार होती तो रसिकलाल स्वयं को किसी काम में व्यस्त कर लेते या बाजार से कोई सामान लाने के बहाने बाहर चले जाते।

टेलीविज़न पर सीमा को फिल्में और पुराने गाने देखना अधिक पसंद था और रेशमा को टी वी  धारावाहिक।  इस बात पर दोनों मेँ खिंचाव रहता था। जब एक अपनी पसंद का कार्यक्रम देखती और दूसरी चैनेल बदल देती तो वह झल्ला जाती। रेशमा अपनी धारावाहिक छोड़ने को कत्तई तैयार नहीं होती। एक दिन उसके धारावाहिक के बीच में ही सीमा ने आकर, चैनेल बदल दिया, वह क्रोध में वहां से उठकर चली गयी और कैकेयी की भांति कोपभवन में पुहंच गयी।  शाम को जब राजा दशरथ आये तो अगले ही दिन, उसके लिए अलग नया टेलीविज़न लाने का वर दे दिए। नया टेलीविज़न आ गया और रेशमा उसे अपने कमरे में लगाकर अपना धारावाहिक देखती। अब तो धारावाहिक देखने में कभी सब्जी जलती तो कभी दूध उफन कर गिर जाता। सीमा को ही सब ध्यान रखना पड़ता।

रसिक लाल तुष्टिकरण की नीति भली भांति जानते थे। दोनों में से कोई नाराज न हो जाय कपड़े गहने आदि जोड़े से ही खरीदते थे। शादी की वर्षगांठ पर दोनों को एक सी सौगात देते और तो और दोनों में से किसी का जन्मदिन आता तो दूसरी का जन्मदिन भी उन्हें ख्याल रखना पड़ता, जो सौगात एक को दिया दूसरी को उससे अधिक सस्ता या मंहगा न हो जाय।  कितने की सौगात लाये थे रसिक लाल को याद रहे या न रहे, उनकी पत्नियों को अवश्य रहता था।

दूसरी होने के कारण रसिक लाल का लगाव तो रेशमा से ही अधिक था परंतु उन्हें कुछ विशेष  खाने  पीने का मन होता तो सीमा को ही याद करते, क्योंकि खाने पकाने में सीमा के आगे रेशमा बहुत पीछे थी। एक दिन रसिक लाल अरबी के पत्ते ले आये और सीमा को अपनी फरमाइश बता दिए। सीमा ने उसमें बेसन लपेट कर पकौड़ी बना लिया।  रेशमा को भी खिलाया रेशमा को वह बहुत पसंद आया। रसिक लाल के लिए सीमा ने फ्रिज में रख दिया। शाम को रसिक लाल के आते ही, सीमा प्रफुल्ल होकर बोली 'आज आपके लिए अरबी के विशेष पकौड़े बनाई हूँ' फ्रेश हो जाओ गरम करके अभी लाती हूँ। वह गयी तो फ्रिज में पकौड़े नादारद। मुंह बना कर वापस आई। ' वो तो फ्रिज में है ही नहीं, सीमा ...  फ्रीज में पकौड़े पड़े थे..... । '
'हाँ, गौरव आया था न, वह खा गया। बड़ी तारीफ कर रहा था।' दोपहर को रेशमा का भाई, गौरव आ गया और रेशमा ने सीमा को बिना बताये ही उसे खिला दिया।
सीमा मन मसोस कर रह गयी। अब उसे रसिक के कान भरने का अवसर मिल गया। पर रेशमा के विरुद्ध कुछ कहने पर उनके कान पर जूं कहाँ रेंगने वाली थी। बोले 'जाने दो, जिसके नसीब की थी, खा गया। '

एक दिन रसिक को अपने किसी सहकर्मी की पार्टी में जाना था। वह सीमा को एक दिन पहले ही बता दिया। सीमा ने पूछ लिया, ' क्या पहनोगे?
'ब्राउन वाला सूट'
'सीमा ने उनके आने से पहले ही अलमारी में से सूट निकाल कर ब्रश मार दी थी। '
रसिक लाल ऑफिस से आया। चाय वगैरह पीकर पार्टी में जाने के लिए तैयार होने लगा, 'सीमा, जरा अलमारी से सूट निकाल देना। '
'वो तो मैंने पहले ही ब्रश मार कर रखा है' कहते लेने चली गयी। देखी तो वहां से सूट गायब।
'अरे मैंने तो यहीं रखी थी, घर में से कौन ले जायेगा?'
 रेशमा ने सीमा को परेशान देखकर पूछ लिया, क्या ढूंढ रही हो दीदी ?'
'सूट'
'वो तो मैंने ड्राई क्लीनिंग के लिए दे दिया। यहाँ पड़ा था मैं समझी धुलवाना है, मुझे भी अपनी साड़ी देनी थी साथ में सूट भी दे आई। '
रसिक लाल चाहते थे इस बार बदल कर पहनें, हर बार एक ही सूट पहन कर ऑफिस वालों की पार्टी में जाते थे। फिर वही मत्थे पड़ा।

सीमा की उससे एक बड़ी बहन थी जो अपनी गृहस्थी में व्यस्त होने के कारण बहुत कम ही उसके घर आ पाती। हाँ, उसका बेटा सोमेश मौसी से मिलने कभी कभी आ जाया करता था। सीमा सोमेश को बहुत प्यार करती थी। उधर रेशमा का भाई गौरव भी अक्सर आता जाता था। रेशमा का भाई आता तो वह चाहती कि उसे क्या क्या खिला पिला दें। कई बार सीमा की सम्हाल कर रखी चीज भी गायब हो जाती, सीमा जब रेशमा से पूछती तो पता चलता गौरव आया था, खा गया।
'क्या रे ! उसे अपने घर कुछ नहीं मिलता क्या ! इस पर रेशमा तिलमिला जाती और बाद में रसिक लाल का सिर नोचती। धीरे धीरे दोनों में विवाद बढ़ता गया। रसिक लाल सीमा को ही शांत रहने के लिए समझाता, 'देखो रेशमा तुम्हारी छोटी बहन सी है, प्यार से रखोगी तो तुम्हारी भी सेवा करेगी। '
'कर ली, सेवा! सौत भी बहन हो सकती है क्या ?'

'सुनते हो जी! परसों हमारी शादी की साल गिरह है, थोड़ी अच्छी सी पार्टी वार्टी कर लेते हैं। ' रेशमा ने रसिक लाल से कहा।
'अभी  इसी महीने तो पार्टी किया था। हम तीनों चलकर किसी अच्छे रेस्तरां में खा पी लेंगे। क्यों फालतू खर्च करना ?'
'हम तीनों क्यों ? गौरव और मम्मी पापा को भी बुला लेंगे। '
'खामोख़ाह खर्च बढ़ा रही हो, तुम्हारे लिए गिफ्ट भी तो लाना है। '
'वाह! दीदी की शादी की साल गिरह में उनके मम्मी पापा को बुलाया, हमारी साल गिरह में मेरे मम्मी पापा को नहीं बुलाओगे तो, क्या सोचेंगे। '
'अच्छा चलो, जैसा चाहोगी, हो जायेगा। '

एक दिन रसिक लाल को दफ्तर से आते ही, बन्दर बनकर, दो बिल्लियों का झगड़ा निबटाना पड़ा। दोनों आपस में लड़ झगड़ कर रूठी बैठी थीं, आपस की बोल चाल बंद।  रसिक जी को चाय स्वयं ही बनानी पड़ी और बनाकर उन दोनों को भी पिलाये। भोजन का भी कोई ठिकाना नहीं था।  पहले तो सोचा ब्रेड खा कर काम चला लें मगर बीबियों का भी ख्याल था इसलिए होटल से मंगा लिया। चूकि खाना होटल से आया था और भोजन से उनका कोई झगड़ा नहीं था, सीमा और रेशमा दोनों ही अपने अपने हिस्से का खाना लेकर अपने कमरे में चली गयीं। रसिक लाल के लिए उन्होंने  जो छोड़ा, खा लिया। जब सोने के लिए सीमा के कक्ष में घुसे तो साफ बोली यहां क्या करने आये हो? जाओ उसी के कमरे में। रेशमा के कमरे में गए तो वहां भी यही सुनने को मिला। रसिक लाल को डॉइंग रूम में ही सोना पड़ा। रेशमा आई थी तो जहाँ शुरू में शांति हुआ करती थी अब तो बात बात पर कचाईन।

एक बार रसिक ने सोचा कि दोनों को बाहर की सैर करा दें। सीमा से पूछे, ' बाहर खाने चलना है।'  सीमा बोली 'सिर में दर्द है, रेशमा को ले जाओ।' रसिक लाल की इतनी हिम्मत कहाँ थी। ले तो जांय, अगले दिन का कलह कौन झेले। पिछली बार की बात उन्हें याद थी, जब सीमा मायके गयी थी तो रेशमा को सिनेमा दिखाने ले गए। आते ही घर में कचाईन, ' तुम्हारे लिए तो बस वही प्यारी है, मैं रहूंगी तब थोड़े ही सिनेमा जाओगे। '  पिछली बात याद करके रसिक लाल ठिठके और बिलंब होते देख, सीमा ने खिचड़ी बना डाली। 'क्या हुआ, नहीं गए।  ये लो खिचड़ी खाओ। तुम लोग बाहर जाओगे यह सोच कर  मैं अपने लिए खिचड़ी रख दी थी, इसी में तुम भी खा लो।'

रसिक लाल को तीन तीन ठिकानों की खबर रखनी पड़ती।  अपना घर तो था ही दोनों ससुराल का भी।  सीमा जब कभी भी अपने माता पिता के तबियत ख़राब होने की बात सुनती तो रसिक लाल को तुरंत भेजती। इधर रेशमा का झुकाव मायके की तरफ अधिक था, रसिक लाल को भी उसे खुश रखने के लिए नयी ससुराल का अधिक ध्यान रखना पड़ता। अपना जन्म दिन उन्हें याद रहे या न रहे, सोमेश का अवश्य याद रखना पड़ता। सोमेश अभी कमाता तो था नहीं, उसके जन्म दिन की पार्टी भी रसिक को ही देनी पड़ती।

सबसे राहत की बात थी कि रसिक लाल के पास कोई कार नहीं थी। वे मोटर साइकिल से ही कहीं आते जाते थे। चुकि मोटरसाइकिल पर दोनों को एक साथ बिठा नहीं सकते थे, कहीं जाना होता तो बारी बारी से ही लेकर जा पाते।  यह उनके लिए सुनहरा क्षण होता क्योंकि पत्नी से अकेले में प्यार भरी दो बातें करने अवसर मिल जाता।  घर में एक  से बात करते तो दूसरी निरीक्षक की भांति सिर पर खड़ी हो जाती। रसिक लाल कभी भी दोनों बीबियों को साथ लेकर नहीं जा पाते। कभी एकाध बार साथ ले जाने का मौका मिला तो  दोस्त मित्र छेड़ने से बाज नहीं आये। वाह भाई मजे हैं तो बस रसिक लाल के, 'हम लोगों की किस्मत कहाँ कि जुडवा बीबी के साथ घूमें'।

पहले सीमा कभी मायके चली जाती तो रसिक लाल खाने पीने की परेशानी के कारण, जल्दी से जल्दी ले आते थे। अब तो वे चाहते हैं, दोनों  नहीं तो कम से कम एक मायके चली जाय ताकि कुछ शांति मिले। मगर दोनो में से कोई मायके जाने को तैयार नहीं होती। दोनों को डर था कि उसकी अनुपस्थिति में रसिक लाल दूसरे को अधिक प्यार न करने लगे।

समय बीता रेशमा गर्भवती हो गयी।  गर्भ धारण करने के कारण सीमा रसिकलाल को छोड़ उसका ध्यान रखने लगी। एक सुन्दर सा पुत्र उत्पन्न हो गया। पुत्र पाने से रेशमा से अधिक सीमा प्रसन्न हुई।  उसने शिशु का नाम सौम्य रख दिया पर बुलाती सोम कहकर ही। अब दोनों का ध्यान शिशु पर केंद्रित हो गया । बच्चे को दोनों माँ का भरपूर  प्यार मिलता। बच्चे में व्यस्त रहने के कारण अब दोनों में झगड़ा बहुत कम हो गया था। अब तो लगता था कि मैदान में दोनों टीमों का एक ही गोल है।  रसिक लाल की तो रेफरी की भी भूमिका जाती रही। अब सीमा कभी रेशमा से नाराज होती तो बच्चे को माध्यम बनाकर मन की कह डालती, 'देख तेरी छोटी मम्मी ने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया। मैं न रहूँ तो तेरा ख्याल भी कोई न करे।' और रेशमा भी जब उसकी देख भाल से थक जाती, 'तू तो बड़ी माँ का बेटा है, जा, उन्हीं के पास जा। '

बच्चे के लिए कुछ कम ज्यादा होता तो रसिक की शामत आ जाती। उसके लिए दूध, टॉनिक, खिलौने, कपड़ा आदि की शीघ्र और समुचित व्यवस्था करनी पड़ती। बच्चे के प्यार ने दोनों माताओं को एक कर दिया था। दोनों की प्रतियोगिता अब एक संगठन में बदल चुकी थी। रसिक लाल का काम बहुत बढ़ गया था, पर बालक की ख़ुशी में कोई भी बोझ उन्हें थोड़ा ही लगता।

एक कुछ सामान मंगाती तो थोड़ी देर में दूसरी की फरमाइश आ जाती।  'अरे, बच्चे की नैपी ख़त्म हो गयी है।' परेशान होकर रसिक लाल कहते, 'दोनों एक बार में क्यों नहीं बता देती, तुम दोनों के लिए अलग अलग चक्कर लगाना पड़ता है।' फिर झख मारकर बाजार जाते। कभी कभार बीबी को साथ लेकर शॉपिंग करने के लिए चलने को टाल देते। अब बच्चे के साथ सभी व्यस्त हो गए थे, और रसिक लाल शकुन की जिंदगी बिताने लगे थे।


कपड़ा पजामा छोटा



Saturday, 10 December 2016

Shadilal ki shadi

शादीलाल की शादी

पढ़ लिख कर खेती करें, यह शादीलाल को गवारा नहीं था। ग्रेजुएशन करने के बाद वे नौकरी ढूंढने लगे। पहले तो प्रशासनिक परीक्षा का भूत सवार हुआ, पर सफलता नहीं मिली तो सहायक की परीक्षा में बैठे। दो तीन बार प्रयास करने के बाद वहां भी हताशा ही हाथ लगी। अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफल नहीं हुए तो सोचे बी० एड०  करके अध्यापक बन जाएँ, मगर गांव में पहले ही कई लोग अध्यापक थे, वे कुछ अलग बनना चाहते थे। धीरे धीरे तीन वर्ष बीत गए। नौकरी नहीं मिलने के कारण शादी  भी नहीं कर रहे थे। माँ बार बार कहती पच्चीस का हो गया, शादी कर ले, अब क्या बूढा होकर करेगा।
शादीलाल महत्वाकांक्षी थे, वे कुछ बनना चाहते थे। अब उन्होंने एल.एल.बी. करने की ठानी, अभी तक, गांव में कोई वकील नहीं था। सोचे वकालत करके थोड़ी नेतागिरी भी चमक जाएगी।
देर किस बात की, जुगाड़ लगाया और एल.एल.बी. में प्रवेश मिल गया। कॉलेज गांव से काफी दूर था। मगर वे घर से ही आते जाते थे। आने जाने के लिए उन्हें कई तरह के साधन का प्रयोग करना पड़ता। कभी साईकिल तो कभी बस से, कभी किसी से लिफ्ट ले लिया, कभी पापा की पुरानी मोपेड से। खिंच खाँच कर वे अंतिम सत्र तक पहुँच गए थे। शादीलाल के माता पिता सोच रहे थे उनकी जल्दी शादी करके बहू लाया जाय, वे अपनी जिम्मेदारी से भी मुक्त हों और घर में थोड़ी चहल पहल हो। परन्तु उसकी शादी में दोहरा व्यवधान था, एक ओर तो शादीलाल का विवाह से पहले कुछ बनने का जनून, और दूसरा वकालत की पढ़ाई करने के कारण शादी के लिए अच्छे रिश्ते नहीं आ रहे थे। वकीलों की कमाई पर किसी को भरोसा नहीं था, चल गयी तो चल गयी नहीं तो बस  ... कचहरी में धक्के खाओ।

एक बार शादीलाल को देखने वाले आये। बातचीत चली तो लगा कि इस बार शादी पक्की हो जाएगी। मगर उनके वापस जाते समय गांव के किसी ने कह दिया, 'बनवारी लाल तो बड़े अच्छे व्यक्ति हैं पर उनका लड़का अवारा है। वह यूँ ही नाम के लिए वकालत कर कर रहा है कि शादी हो जाय। इतने अच्छे परिवार का होकर, अगर ठीक होता तो अब तक कुंवारा थोड़े ही बैठा होता।' वह पार्टी लौट कर दुबारा नहीं आयी।

एक दिन बनवारी लाल चकबंदी के सिलसिले में कचहरी गए थे, वहां उनके पुराने मित्र जगप्रवेश मिल गए। बात चीत में शादीलाल की बात चली। जगप्रवेश की पुत्री संध्या अब सयानी हो चुकी थी, उसने सोचा बनवारी लाल से जान पहचान है ही, क्यों न शादीलाल से विवाह का प्रस्ताव रखा जाय। बात आगे बढ़ी और बनवारी लाल ने संध्या से शादी पक्की कर दी। थोड़ी ना नुकुर करने के बाद शादी लाल भी मान गया और शादी तय हो गयी। शादीलाल के एल०एल०बी० का अंतिम वर्ष था।  वह चाहता था कि विवाह के लिए, परीक्षा के बाद की कोई तिथि निश्चित कर दी जाय। परन्तु उसकी परीक्षा के बाद की लग्न का कोई शुभ मुहुर्त नहीं था। अब शादी के लिए, शादीलाल या तो एक वर्ष और प्रतीक्षा करे या परीक्षा से पहले की ही कोई तिथि देख ली जाय। शादी के लिए पहले ही बहुत देर हो रही थी, बनवारी लाल चाहते थे कि अब और देर न किया जाय और इसी वर्ष के मुहूर्त में शादी कर दी जाय।   

पण्डित जी से परीक्षा का ध्यान रखते हुए, शादी का मुहुर्त निकालने के लिए कहा गया। बड़ा सोच विचार करके शादी की तिथि निश्चित की गयी और लग्न पत्रिका बन गयी। परीक्षा की विगत वर्षों की समय सारिणी देख कर, परीक्षा की संभावित अंतिम तिथि के बाद की तिथि निश्चित की गयी और शादीलाल के विवाह की तैयारी शुरू हो गयी। घर में शादीलाल के शादी का उत्साह देखते ही बनता था। विवाह के लिए अभी दो महीने का समय था, परन्तु शादीलाल की माँ का जोश देखकर लगता था कि कल परसों ही है। बहू के लिये कपड़े लत्ते खरीदे जाने लगे, उसे देने के लिए गहनों का आर्डर हो गया, शादीलाल के विवाह में पहनने के लिए सूट का आर्डर हो गया। जैसे जैसे समय समीप आता गया, शादीलाल के माँ की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। अब तो शादी के एक पखवाड़ा ही रह गया था और कई काम शेष रह गए थे।       

इधर शादीलाल की परीक्षा की वास्तविक समय सारिणी आई तो पता चला कि अंतिम परीक्षा की तिथि भी वही है जो शादी का दिन। अब तो विकट समस्या हो गयी, क्योंकि परीक्षा का समय अपरान्ह तीन से छः बजे तक था। शादी लाल पढ़ाई के लिए पूर्ण रूप से समर्पित था और किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहता था। वह परीक्षा की तैयारी में पहले ही जुटा था, उसकी माँ चाहती कि शादी की तैयारी में वह भी कुछ हाथ बँटाये, पर शादीलाल परीक्षा में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं चाहता था। यह अंतिम सत्र की परीक्षा थी। वह इसी सत्र में सफल होकर, वकील बनना चाहता था। परीक्षा के बीच में शादी की तिथि आ जाने के कारण, शादीलाल के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई थी। शादीलाल ने भी संकल्प ले रखा था कि वह दोनों ही दायित्वों का निर्वहन करेगा। 

 धीरे धीरे शादी की तिथि आ गयी। शादी पर जाने से पहले नहाने की रस्म, परछन आदि कई परम्पराओं का निर्वहन होना था और शादीलाल को परीक्षा के लिए भी जाना आवश्यक था। अब ये हुआ की परीक्षा देकर आने पर तो रात के आठ बज जायेंगे फिर कब ये सब होगा, कब बारात निकलेगी। अतः नहान परछन आदि पहले ही हो जाय और शादीलाल परीक्षा देकर सीधे मौजपुर, लड़की वालों के यहाँ पहुंचे। शादी के वस्त्र पहन कर परीक्षा के लिए जाना, शादीलाल को अटपटा लग रहा था इसलिए वह साधारण कपडे पहनकर ही जाना उचित समझा। शादी की लिए बना सूट और पगड़ी आदि बारात के साथ चली जाएगी, वह वहीँ पहन लेगा।

शादीलाल, पापा की मोपेड उठाया और परीक्षा स्थल पहुंच गया। उसे घर पर ही देर हो गयी थी इसलिए परीक्षा में कुछ बिलंब से ही बैठ पाया। उसकी शेष परीक्षा तो ठीक हो गयी, पर अंतिम परीक्षा में कई प्रकार के विघ्न का सामना करना पड़ा। ठीक से तैयारी नहीं होने के बावजूद भी शादी की उमंग में शादीलाल ने खूब लिखा और संतुष्ट होकर परीक्षा कक्ष से बाहर निकला। देर से आने के कारण, निरीक्षक ने उसकी कापी सबसे बाद में लिया। बाहर निकलते ही उस पर मौजपुर जाने की धुन सवार थी। अन्य परीक्षार्थी पूछते रहे, 'शादीलाल, पेपर कैसा हुआ?' पर उसके पास उनका उत्तर देने का समय तक नहीं था। शीघ्रता से जाकर मोपेड पे किक मारा। पर, यह क्या? मोपेड बीस पच्चीस मीटर चलकर बंद हो गयी। पता चला मोपेड में तेल गायब। घर से बिलम्ब से निकलने और परीक्षा की हड़बड़ी में पेट्रोल भरवाने का ध्यान नहीं रहा था। पास में कोई पेट्रोल पंप भी नहीं था। अब तो बड़ी समस्या हो गयी। क्या किया जाय ? मौजपुर कैसे पहुंचा जाय ?

कालेज से थोड़ी दूरी पर ही एक गांव था। वह मोपेड घसीटते हुए वहां पहुंचा। गांव के छोर पर ही जो पहला घर दिखा, एक बुजुर्ग व्यक्ति ने पूछ लिया, 'क्या हो गया भाई, गाड़ी पंचर हो गयी क्या?'
'नहीं दादा, पेट्रोल समाप्त हो गया है। थोड़ा मिटटी का तेल मिल जायेगा? मुझे मौजपुर शीघ्र से शीघ्र पहुंचना है।'
'रुको, देखता हूँ। ' और जाकर एक बोतल ले आया 'बस इतना ही है।'
'चलो, शायद इतने में काम बन जाय।'
शादीलाल मिट्टी का तेल भरकर, मोपेड से अपनी यात्रा पर आगे बढ़ा। एक बार फिर उसे मुसीबत ने घेरा। लड़की वालों के यहाँ पहुँचने से पहले ही मिट्टी का तेल भी ख़त्म हो गया। उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन भी नहीं था कि सूचित करके कोई अन्य साधन मंगवा ले। यह तो शुक्र था जहां तेल ख़त्म हुआ, उसी गांव में उसकी फुआ का घर था। वह झटपट वहां जाकर, गाड़ी खड़ी कर दिया।  फूफा आदि पहले ही बारात के लिए जा चुके थे, घर में बस फुआ की बहू थी। मोटर साइकिल भी सुभाष लेकर चला गया था। घर पर बस एक पुरानी साइकिल पड़ी थी। शादीलाल ने बिलम्ब किये बिना, साईकिल उठाया और आगे चल दिया।

उधर लड़की वालों के यहाँ हड़कम मचा हुआ था। बारात द्वार पर, दूल्हे का पता ही नहीं। रात के बारह बज चुके थे। लड़की वाले अत्यंत चिंतित थे। बारातियों को खिला पिला दिया गया था। अब विवाह का मुहुर्त रात साढ़े बारह बजे तक ही था। अब ये हुआ कि बाकी कार्यक्रम किये जायँ, हो सकता है तब तक शादीलाल आ जाय, उसे जलपान करके तुरंत विवाह के मण्डप में ले जाया जाय। हर जगह कुछ शरारती तत्व तो होते ही हैं। किसी ने तंज कस दिया, 'बारातियों को खिलाना पिलाना कहीं दण्ड न हो जाय। लगता है, लड़का किसी के प्यार में फंसा होगा, और भाग गया।'
एक समझदार व्यक्ति ने कहा, 'बातें बनाने से अच्छा है; एक, दो आदमी मोटर साइकिल से परीक्षा केंद्र तक चले जाओ और पता कर आओ कि क्या बात है। हो सकता है कोई अड़चन आ गयी हो, गाड़ी ख़राब हो गयी हो, कोई दुर्घटना हो गयी हो। ' 
दो लोग अभी मोटर साइकिल स्टार्ट ही कर रहे थे कि शादीलाल साइकिल से आते दिख गया। पूरे खेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। 'शादीलाल आ गया, शादीलाल आ गया।' मौजपुर के एकाध बच्चे अभी तक जगे थे, हंस कर कह रहे थे, 'हा, हा साईकिल पर दूल्हा।' 
शादीलाल के लिए झटपट मिठाई आयी और उससे कहा गया, ये लो पानी पीओ और सीधे मंडप में चलो। अब तक विवाह मंडप में कार्यक्रम शुरू हो चुका था। वस्त्र आदि बदलने में और समय व्यर्थ करने की बजाय शादीलाल को सीधे मण्डप में ही चलने के लिए कहा गया। जयमाल के कार्यक्रमों को रद्द कर दिया गया था। द्वारपूजा के नाम पर, द्वारपूजा के लिए बने चौक में दूल्हे को खड़ा करके बस दो मिनट का मंत्रोच्चार हुआ। और पंडित जी ने बोल दिया, 'लड़के को कुछ खिला पिला कर सीधे मंडप में ले चलो, फेरे और सिंदूर दान का समय हो चुका  है। अधिक बिलम्ब करने से मुहुर्त निकल जायेगा।'
शादीलाल को दोपहर से घर से निकला था, उसे बहुत भूख लगी थी किन्तु उसे इस बात का एहसास था कि उसके कारण लोग कितना परेशान हो रहे हैं। बोला, 'पहले सिंदूरदान कर लूँ , बाद में खा पी लूंगा।' पर लोगों ने शादीलाल की दयनीय हालत देखकर, पहले कुछ खा पी लेने के लिए आग्रह किया। उसके बाद शादी के मंडप में बिठाया गया।
शादीलाल का शादी का जोड़ा जामा रखा ही रह गया, उसे पहन पाने का अवसर नहीं मिल पाया और उसके साधारण कपड़ों में ही शादी हो गयी। मंडप में सजी धजी दुल्हन और अन्य सभी लोग, साफ-सुन्दर वस्त्रों में, बस शादीलाल साधारण कपड़े में सबसे अलग सर्कस का जोकर लग रहा था। दामाद को इस रूप में देखकर, जगप्रवेश को बहुत शर्म आ रही थी। जगप्रवेश ने कहा, 'सिंदूर दान के बाद शादीलाल जाकर कपड़े बदल लें। दस मिनट लगेगा, इसमें कुछ नहीं बिगड़ेगा। फोटोग्राफर को कह दिया फोटो वगैरह तभी लेना। शादीलाल को कपड़ों की तनिक भी म्लानि नहीं थी, आज उसके दोनों हाथ में लड्डू थे; एक तो वकालत की पढ़ाई पूरी हो गयी और दूसरे दुल्हन का हाथ उसके हाथ में। फिर भी ससुर का आग्रह मान कर वह कपड़े बदलने मंडप से बाहर निकला, जब बनवारी लाल से कपड़े माँगा तो पता चला वह तो घर पर ही छूट गया। बेचारे शादीलाल, फिर उसी परिधान में मंडप में विराजे। 

अगले दिन दुल्हन विदा कराके शादीलाल बड़े शान से ससुराल से चल दिया। राह में एक जगह गाड़ी रुकी तो किसी ने छेड़ दिया, 'भैया, किसकी नई नवेली दुल्हन लिए जा रहे हो?'
'अरे मेरी ही है, और किसकी !'

खैर, लिवास में क्या रखा है। शादीलाल के घर में नई दुल्हन आई। पास पड़ोस की स्त्रियां गीत गाने के साथ स्वागत में जुट गयीं। घर में रौनक लग गयी। शादी लाल की माँ के तो लग रहा था, पांव जमीं पर ही नहीं थे। माँ के कहने पर, शादीलाल अब थोड़ा बन ठन कर, दूल्हा जैसा दिखने लगा।




Monday, 5 December 2016

tari par

निर्वासन

चुनाव का समय आ गया था। चुनावी दांव पैंतरों का खेल प्रारम्भ हो चुका था। किसी पार्टी का अध्यक्ष पैसे के बदले चुनाव का टिकट दे रहा था, कोई पार्टी सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध भड़का रही थी तो कोई पार्टी अपने हवाई वादों से मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटी थी। कौशिक जी के पास तो छल, बल सब कुछ था क्योंकि वे सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक होने के साथ मंत्री भी थे। प्रशासनिक अधिकारियों का चरित्र बस सत्ता पक्ष के मंत्रियों को प्रसन्न करने भर में सिमट चुका था। कौशिक जी का अपने क्षेत्र में तो वर्चस्व था ही, मंत्री होने के कारण वे अन्य क्षेत्र से भी विजय को हथिया लेने में सक्षम थे। इसलिये उन्होंने सोच रखा था, अपने गृह क्षेत्र से पुत्र वीरेन्द्र कौशिक को उतारें और स्वयं  किसी अन्य क्षेत्र से चुनाव लड़ें।

उनके गृह क्षेत्र से एक नया नेता सुन्दरलाल लोकप्रिय हो रहा था। वह क्षेत्र के समस्यायों से भली भांति अवगत था और समाधान हेतु यथाशक्ति संघर्षरत था। अधिकारियों को ज्ञापन देकर और समय-समय पर आंदोलनों के द्वारा क्षेत्र की समस्यायों को सरकार तक पहुंचाता रहता था। एक साधारण परिवार से होने के कारण सुन्दरलाल के साथ क्षेत्रीय जनता की सहानुभूति भरपूर थी। मंत्री जी को उसके लोकप्रियता की भनक मिल चुकी थी। इस बार के चुनाव में वह भी प्रत्याशी होने की तैयारी में जुटा था, मंत्री जी को इस बात का भी आभास था। वैसे तो पैसे आदि बंटवा कर मतदाताओं को प्रभावित कर सकने में वे सक्षम थे पर साथ ही डर भी था कि सुंदरलाल  नया लड़का है, कहीं परिवर्तन की आंधी न चल जाये और वीरेंद्र पर भारी पड़े। मंत्री जी कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते थे। यह वीरेंद्र का पहला चुनाव होगा, पहली ही बार हार गया तो उसका राजनितिक करियर बर्बाद हो जायेगा। अब मंत्री जी ने सुन्दर लाल की छवि धूमिल करने और उसे निर्बल बनाने के कार्य में जुट गए और अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए इस आशय का प्रशासन को निर्देश दे दिए । अब क्या था प्रशासन इस कार्य में तत्पर हो गया, सुंदरलाल के एक आंदोलन को रोकने में बल प्रयोग कर लाठी चार्ज करा दिया। कई लोग लहूलुहान हुए और सुन्दर लाल गिरफ्तार।
सुन्दर लाल पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, गेंगस्टर एक्ट और गुंडा एक्ट आदि की कई संगीन धाराएं लगा दी गयीं। मंत्री जी ने सोचा उनका काम हो गया। जिन लोगों पर लाठी चार्ज हुआ है, वे अब सुन्दर लाल का साथ छोड़ देंगे। पर हुआ इसके उलटा, सुन्दर लाल के पक्ष में जनसमर्थन और बढ़ गया। जेल में उससे मिलने हजारों लोग जाने लगे। इस कार्यवाही से मंत्री जी की चिंता और बढ़ गयी। उन्होंने प्रशासन से मिलकर, सबसे भयानक चाल चल दिया। सुन्दरलाल को जिला बदर करवा दिया। सुन्दर लाल के पास बड़ी लड़ाई लड़ने की क्षमता नहीं थी। वह क्षेत्र छोड़कर बहार चला गया और अपना समर्थन एक अन्य नेता मधुसूदन को दे दिया।

वीरेंदर लन्दन से एम बी ए की पढ़ाई पूरी कर चुका था और उसे वहीँ पर नौकरी भी मिल गयी। वह वहां एक गोरी लड़की, ऐना के प्यार में फंस चुका था और किसी भी हाल में उसे छोड़कर इंडिया नहीं आना चाहता था। मंत्री जी को इस बात का पता चला तो वह उस लड़की से वीरेंद्र का विवाह करने के लिए भी तैयार हो गए। मगर ऐना के दिमाग में इंडिया की तस्वीर अच्छी नहीं थी, वह यहाँ की राजनितिक गन्दगी के बारे में समाचार पत्रों में पढ़ चुकी थी और अपने मन ऋणात्मक बिम्ब बना चुकी थी। भारत का मौसम भी उसके अनुकूल नहीं था। वह भारत आने से साफ मना कर दी। वीरेन्द्र भी अपने प्यार को खोना नहीं चाहता था। मंत्री जी ने उसे बुलाने के लिए पूरा जोर लगा लिया मगर परचा दाखिल करने के लिए वीरेन्द्र को नहीं बुला पाए। अब मंत्री जी हाथ मल कर रह गए।  उनकी सारी मेहनत बेकार हो गयी।
दो बिल्लियों की लड़ाई में बन्दर ने लाभ उठा लिया। मधुसूदन विधायक हो गए। सरकार के कार्य कलापों से जनता प्रसन्न नहीं थी, इस बार वास्तव में परिवर्तन की आंधी चली और मंत्री जी को भी चुनाव में पराजय का सामना देखना पड़ा।

मंत्री जी घर में मुंह बनाकर बैठे थे कि वीरेन्द्र का लिखा एक पत्र मिला -
'विधायक जी ! जो दूसरों के लिए कांटे बोता है उसके राह में अपने आप कांटे उग आते हैं। आपने मुझे क्षेत्र से ;निकाला आपके बेटे को स्वतः ही देश निकाला मिल गया। अब तो आप पूरी जिंदगी अकेले ही बसर करेंगे या देश छोड़कर लन्दन में बसेंगे। यद्यपि मेरे लायक कोई काम हो तो निःसंकोच बताईयेगा।'

हार का विषाद कुछ कम होने पर मंत्री जी ने सुंदरलाल को फोन मिलाया -

'सुन्दर! जीत की बधाई। तुम भी मेरे बेटे जैसे हो, राजनीति में कोई व्यक्तिगत शत्रुता थोड़े ही होती है। अभी तुम नए हो, राजनीति के दांव पेंच अधिक नहीं जानते। मुझसे कोई मार्गदर्शन चाहिए होगा तो बता देना। वैसे तुम मेरी पार्टी में आ जाओ तो अच्छा रहेगा, अगले चुनाव में तुम्हें अपनी पार्टी का टिकट दिला दूंगा। '
'जी मंत्री जी, सोचने के लिए समय चाहिए'



Saturday, 22 October 2016

Khopadi ka lekh

खोपड़ी का लिखा

मदनमोहन अपनी जन्म भूमि छोड़ने को बिल्कुल भी इच्छुक नहीं थे, मगर बेटा मिहिर अमेरिका से पढ़ाई किया और वहीँ पर उसे काम मिल गया। विवाह के बाद, वह मान्यता को भी साथ ले गया।  मिहिर ने अमेरिका में अपना घर बना लिया और वहीँ का होकर रह गया। इधर मदनमोहन अब बूढ़े हो चले थे और अकेले जिंदगी बिताने में बड़ी कठिनाई हो रही थी। वैसे मिहिर ने उनका भी अमेरिका का ग्रीन कार्ड बनवा दिया था और वे दो बार वहां हो भी आये थे मगर उन्हें स्थाई रूप से अमेरिका रहना स्वीकार नहीं था। उनकी प्रबल इच्छा थी कि जिस जन्मभूमि ने उन्हें सब कुछ दिया, अपने प्राण भी वहीँ त्यागें और उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित हों।
धीरे धीरे वे पचहत्तर के हो चले। उनकी पत्नी ने एक वर्ष पूर्व, उनका साथ छोड़ दिया। अब वे अस्वस्थ रहने लगे, खाने पीने की दिक्कत रहती थी। कुछ दिन, उनके यहाँ बेटी रहकर, देखभाल की पर उसे अपना भी घर देखना था। अंततः हार के उन्हें, मिहिर के पास जाना ही पड़ा।
मृत्यु तो सबकी निश्चित है। अमेरिका जाने के दो वर्ष पश्चात् ही मदनमोहन को दिल का दौरा पड़ा। मिहिर ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया पर कोई लाभ नहीं मिला। आखिरकर, मदनमोहन को भी संसार छोड़ कर जाना पड़ा, और वह भी अपनी जन्मभूमि से हजारों मील दूर, विदेश में। मरते दम तक, अपनी जन्मभूमि पर ही रहने का मदनमोहन का सपना तो पूरा नहीं हुआ मगर उनकी दूसरी इच्छा कि कम से कम मरने के बाद उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित हों, मिहिर ने भरसक प्रयास किया। मिहिर ने उनके दाह संस्कार का प्रबंध तो वहीँ कर दिया पर अपने पिता की इच्छा मान रखते हुए, अस्थियां लेकर भारत के लिए चल दिया ताकि हरिद्वार जाकर गंगा में प्रवाहित कर सके।
दिल्ली हवाई अड्डे पर आने पर, कस्टम जाँच के लिए उसे अपना सामान खोलना पड़ा। एक पोटली में अस्थियां देखकर कस्टम अधिकारियों ने शंका व्यक्त की।
पूछने पर, मिहिर ने बताया, 'यह, उसके पिता की अस्थियां हैं।'
कस्टम अधिकारी ने इसकी पुष्टि के लिए प्रमाण पत्र मांग दिया। मिहिर को इस तरह के किसी प्रमाणपत्र की जानकारी नहीं थी, इसलिए वह बस अस्थियां लेकर सीधे चला आया था।
मिहिर पहले ही परेशान था ऊपर से कस्टम ने उसपर, और आघात करने वाले प्रश्न दाग दिए, 'हमें क्या पता ये इंसान की अस्थि है! हो सकता है किसी और जंतु की हड्डी हो या फिर ड्रग हो जिसकी तस्करी कर रहे हो!'
इस बात पर कस्टम अधिकारी और मिहिर में गरम बहस हो गयी। अब तो मिहिर के लाख समझाने पर भी अधिकारी नहीं माना और अस्थियों को जाँच के लिए भेजने पर अड़ गया। अस्थियां जाँच के लिए प्रयोगशाला में भेजने के लिए रख लिया और मिहिर को धमकी दे डाली, 'यदि कोई आपत्तिजनक वस्तु निकली तो कस्टम अधिनियम के अंतर्गत मुक़दमा चलेगा।' मिहिर के पिता की अस्थियां जब्त हो गयी, बेचारा बिना अस्थियों के पैतृक गृह पहुंचा।

इस घटना पर एक कहानी याद आ गयी -
[एक पंडित जी, जो ज्योतिषाचार्य भी थे, कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक खोपड़ी दिखी। पंडित जी, भाग्य की रेखायें भली भांति पढ़ सकते थे। खोपड़ी जीर्ण शीर्ण अवस्था में थी, मगर उसके बचे खुचे भाग पर लिखी रेखाओं को पढ़ कर वे निष्कर्ष निकल लिए। उस पर लिखा था 'अभी कुछ  बाकी है। ' पंडित जी को अपनी विद्या जांचने का अच्छा अवसर मिल गया। वे उस खोपड़ी को यह सोचकर, उठा लाये कि देखें अभी क्या बाकी है। खोपड़ी को वे एक वस्त्र में लपेट कर ताख पर रख दिए। एक दिन पंडित जी को कहीं जाना पड़ा, पंडितानी की दृष्टि उस खोपड़ी पर पड़ी। इससे पहले वह कभी कोई खोपड़ी नहीं देखी थी, समझी कि वो कोई खाने की वस्तु है। उसने उसे उठाया और पकाने के लिए ओखली में कूट डाला। जब पंडित जी आये तो देखे वह खोपड़ी गायब है। जब पंडितानी से पूछा तो उसने बताया कि मैंने तो उसे कूट डाला। पंडित जी को समझने में देर नहीं लगी कि क्या बाकी था।]

मिहिर के पैतृक गांव पहुँचने पर, सम्बन्धियों द्वारा निर्णय लिया गया कि तब तक बाकी के संस्कार संपन्न किये जायं। दो चार दिन बाद जब भी अस्थियां मिलेंगी, प्रवाहित कर दिया जायेगा। उसे एक सप्ताह ही रुकना था और इसी समय में चौथा आदि सब करना था। एक सप्ताह तक जाँच रिपोर्ट नहीं आ पायी। अस्थियों को बिना प्रवाहित किये ही,उसे वापस अमेरिका जाना पड़ा।

जाँच रिपोर्ट आने में पंद्रह दिन का समय लग गया। उसने अपने चचेरे भाई को अस्थियां का पता करने और उसे लेने के काम में लगा रखा था। वह स्वयं भी, कस्टम अधिकारियों से फ़ोन पर पूछ ताछ करता रहा। अमेरिका आये उसे एक सप्ताह ही हुए थे कि समाचार मिला, अस्थियों की जाँच पूरी हो गयी है और वह उन्हें ले सकता है। पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए मिहिर संकल्पित था। अगली ही उड़ान से पितृ ऋण से मुक्त होने, वह एक बार फिर से दिल्ली आया। अस्थियां लेने के लिए कस्टम का दरवाजा खटखटाया। उसे अस्थियां मिल गयीं जिसे लेकर वह अपने गांव गया। वहां से चाचा आदि को साथ लेकर हरिद्धार गया और गंगा मईया को समर्पित कर दिया। इस प्रकार मिहिर के पिता की इच्छा व उसके कर्तव्यों का निर्वहन हुआ।

Friday, 9 September 2016

Kuchh din aur ruk jate

कुछ दिन और रुक जाते


विद्या को जर्मन गए चार वर्ष हो चुके थे। दिव्यांश के मम्मी पापा तो जर्मनी घूम आये, मगर विद्या के मम्मी पापा अभी तक जर्मनी नहीं जा पाए थे। विद्या ने उन्हें कई बार कहा, मगर इंडिया में कोई न कोई काम होने की बात कहकर, वे टाल देते। विद्या और दिव्यांश दोनों ही कहकर हार गए कि पापा जी, समय निकालिये और एक बार यूरोप घूम लीजिये, बड़ी सुन्दर जगह है, पर यादव जी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।  एक दिन यादव जी नाश्ता पानी करके एक बार फिर से अखबार उठा लिए, इतने में ही फ़ोन की घंटी बजी। कोमल ने आवाज लगाई, 'देखो जी फ़ोन बज रहा है, विद्या का ही होगा।'
यादव जी अख़बार रखकर, चार्ज में लगे फोन को निकालने लगे। इतने में फ़ोन कट गया। कोमल फिर से बोली, 'उसी का है न !'
'अरे, कट गया, अभी देखता हूँ।'
नंबर देखकर यादव जी ने बताया, 'हां, उसी का था। चलो फिर से कर लेगी।'
फिर से घंटी बजी, यादव जी ने अबिलम्ब उठाकर हेलो किया। विद्या की आवाज आई, 'पापा! नमस्ते, कैसे हैं आप लोग ?'
'ठीक हैं बेटी, तुम अपना बताओ। इतनी जल्दी उठ गयी! और भारत कब आना है। '
'हम भी ठीक हैं पापा। बस आप लोगों की याद आ रही थी। और इस बार हम नहीं, आप यहां आ रहे हैं। मैं आज ही टिकट करवाने जा रही हूँ। सितम्बर में आप लोग आ जाईये। अकेले नहीं आ सकते तो दिव्यांश को भेज देती हूँ। वैसे आने में कोई परेशानी नहीं है, क्षितिज है न ! वीसा लेने में मदद करवा देगा और दिल्ली हवाईअड्डे तक छोड़ देगा। बाकी हम यहाँ  एयरपोर्ट से ले ही लेंगे।'
'ठीक है बेटी, आ जायेंगे कभी।'
'कभी नहीं, इस सितम्बर में आना ही है। शाम तक टिकट और वीसा  आमंत्रण भेज देती हूँ और क्षितिज को भी कह देती हूँ।'
'चलो इतना कह रही हो तो ठीक है।'    
फ़ोन रखकर, यादव जी कोमल के पास गए, 'सुन रही हो! विद्या हमें बुलाने के लिए जिद्द कर रही है। चलो घूम ही आते हैं। फिर धीरे धीरे बुढ़ापा घेर लेगा तो कहां जा पाएंगे।'
कोमल मन में मुस्करायी, 'वो तो कबसे बुला रही है, तुम्हीं तो नखरे दिखाते रहते हो। कब जाना है ?'
'सितम्बर में।' 
शाम को फिर से विद्या का फ़ोन आया, 'पापा, टिकट हो गया है और मैंने आपके मेल पर भेज दिया है। बस जल्दी से जल्दी वीसा के  लिए आवेदन कर दीजिये।'
यादव जी को पता चला कि उनका वापिसी का टिकट, पूरे तीन महीने बाद का है, तो वे उसे एक महीने बाद का ही कराने के लिये कहने लगे। उन्हें तीन माह का समय लम्बा लग रहा था। यदि वे तीन महीने वहां रह गए तो उनके  बिना भारत में बड़ा अकाज होगा। लेकिन विद्या ने उनकी एक न सुनी, बोली, 'पापा! पहले आ तो जाओ, फिर जब जाना चाहोगे, टिकट की तारीख बदलवा देंगे।'
विदेश घूमने का मन तो यादव जी का भी बहुत था मगर वे बड़े सामाजिक और मिलनसार व्यक्ति थे। अपने कस्बे के लोगों में उनका समय बहुत अच्छा कट रहा था। उन्हीं लोगों के साथ समूह में घूमने फिरने भी चले जाते। इसके अलावा दो तीन निर्धन बच्चों को पढ़ाने का भी जिम्मा ले रखा था। उनके विदेश नहीं जाने का कारण यही सब था और कुछ वहां के माहौल व भाषा का डर। इस बार वे बेटी दामाद के आग्रह के आगे झुक ही गए। यादव जी, अब वीसा बनवाने में जुट गए। विद्या ने उन्हें फ़ोन पर सब कुछ समझा दिया था और अपने ममेरे भाई क्षितिज को इसमें मदद के लिए बोल दिया था। यादव जी ने जर्मनी के वीसा के लिए आवेदन किया और उन्हें तीन महीने का टूरिस्ट वीसा मिल गया।
यादव जी सपत्नी बर्लिन पहुंचे। जर्मन की ठण्ड के बारे में उन्होंने सुन तो रखा था, पर इतनी ठण्ड पड़ती है, इसका अनुमान नहीं था। जाते ही हाड़ कंपाने वाली ठण्ड से जूझना पड़ा। विद्या ने पहले ही बता दिया था कि यूरोप में बड़ी ठण्ड पड़ती है और वे अपने गरम कपडे लेकर आएं परन्तु जो गरम कपड़े इत्यादि वे ले गए, अपर्याप्त थे। विद्या को वहां के मौसम के अनुकूल, मम्मी पापा के लिए और जैकेट, लोअर, मोज़े  आदि खरीदने पड़े।
वहां की प्राकृतिक सौंदर्य से, यादव जी अभिभूत थे। वहां की हरियाली और भारत से पृथक मौसम व पेड़ पौधों के प्रति वे बहुत आकर्षित थे। शांतिपूर्ण वातावरण में उनका मन लग रहा था। कहीं कोई शोर शराबा नहीं, यहाँ तक कि गाड़ियों का हॉर्न तक नहीं। इतनी शांति कि देखकर लग रहा था मानो तपोस्थली हो। वे टहलने निकल जाते तो पार्क की साफ, सफाई और सुंदरता देखकर, मंत्र मुग्ध हो जाते। इसी बीच विद्या और दिव्यांश ने उन्हें फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड भी घुमा दिया। एक महीना तो क्या, कब तीन महीने बीतने को आ गया, पता ही नहीं चला। अब उनके वापस लौटने का समय समीप आ गया। विद्या और दिव्यांश ने उनसे कुछ समय और रुकने का आग्रह किया, इनके वहां रहने से उन दोनों को भी बहुत अच्छा लग रहा था। कम से कम चार लोग मिलकर, कुछ बात चीत कर लेते, वरना बस एक दूसरे का मुंह देखते रहो। पास पड़ोस से इतना कुछ मेल जोल तो था नहीं। इनके जाने के बाद फिर वही अकेले। दिव्यांश ने कहा, 'मैं वीसा बढ़वा देता हूँ। कम से कम छः महीने तो यहां रुकिए। असली ठण्ड का मौसम तो अब आ रहा है। यहाँ की बर्फ़बारी भी देख लीजिये।' मगर, यादव जी अपने इण्डिया के काम गिनाने लगे। वहां की प्राकृतिक छटा, उन्हें आने से तो रोक रही थी, पर इंडिया का काम धाम अपनी ओर खींच रहा था। अपने काम और मातृभूमि से अधिक लगाव के कारण यादव जी शीघ्र से शीघ्र वापस आने को विवश थे।

अब वापस जाने में बस कुछ ही दिन बचे थे। यादव जी के भाग्य में यह भी अद्भुत नजारा देखना बदा था। प्रातः उठकर, जब खिड़की से देखे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, पूरी धरती श्वेत चादर से ढक चुकी थी। पेड़, पौधे, सड़क, घरों की छत सब जगह बर्फ ही बर्फ। पेड़ ऐसे लग रहे थे, मानो चांदी के नकली पेड़ खड़े कर दिए गए हों। यादव जी ने पहली बार हिमपात का दृश्य देखा। लान, मकान, दुकान आदि सभी बर्फ के नीचे दबे हुए थे, बर्फ के अतिरिक्त कुछ नहीं दिख रहा था। उन्होंने तुरंत कोमल और फिर विद्या व दिव्यांश को जगाया। सब के सब यह दृश्य देखकर आश्चर्य से झूम उठे। यह था बर्लिन का माइनस अटैक, तापमान ऋण १० डिग्री। जितना सुन्दर नजारा था विद्या और दिव्यांश की उतनी ही बड़ी चिन्ता। रात की भारी बर्फ़बारी के कारण सभी रास्ते बंद हो गए थे। यहाँ तक कि गैराज से गाड़ी निकाल पाना भी असंभव था। शुक्र था की उस दिन शनिवार था और विद्या तथा दिव्यांश को काम पर नहीं जाना था पर घर के कुछ जरूरी सामान लाने थे। विद्या बोली, 'अब तो कहीं दोपहर बाद तक ही सड़क साफ हो पायेगी, ऐसे में कहीं जा तो सकते नहीं, चलो घर पर ही बनाते खाते हैं। आप लोग नजारा देखिये, तब तक चाय बनती हूँ। '

विद्या को तभी ध्यान आया, दूध तो घर पर है ही नहीं, अब चाय कैसे बनेगी। कल ही लाने वाली थी, मगर उसे काम पर से लौटने में थोड़ी देर हो गयी, इसलिए सोची अगले दिन सुबह ले आएगी। समाचार भी नहीं देख पाई कि अगले दिन के मौसम के बारे में जान पाती। बर्फ के कारण बाहर निकल पाना बहुत कठिन था, परंतु अब आवश्यक हो गया। फ्रिज में देखी तो एक नीबू पड़ा था।  ये हुआ कि आज नीबू की चाय पीते हैं। चाय पीकर, उसने बाहर देखा तो सड़क से बर्फ हटाई जा रही थी। सोची, तब तक वो भी अपने ड्राइव वे की बर्फ हटा ले ताकि सड़क साफ होने पर बाजार से घर के सामान ले आये। विद्या के साथ, यादव जी भी मदद करने में जुट गए। वो बार बार कहती रही, 'पापा, आप आराम से बैठो, हम और दिव्यांश साफ कर लेंगे।' पर यादव जी नहीं माने, उन्होंने बेलचा उठाया और बर्फ हटाने लगे। यह काम उनके लिए अनोखा था और बड़े मुदित मन से सलग्न हो गए। यादव जी को बर्फ का अनुभव तो था नहीं, एक जगह बर्फ जम गयी थी और हटाते समय उनका पांव फिसल गया। बर्फ हटी, गाड़ी निकली और यादव जी सीधे अस्पताल। वहां जाकर, पता चला कि पैर की हड्डी में क्रेक आ गया है और उस प्लास्टर करना पड़ेगा। भरने में एक महीने से भी अधिक समय लग सकता है।
दिव्यांश दौड़ भाग करके, यादव जी का वीसा तीन महीने के लिए और बढ़वा दिया। 
अब तो यादव जी को काम धाम की चिंता छोड़ रुकने के लिए वाध्य होना पड़ा। उधर अस्पताल का खर्च लाखों का। यादव जी बीमा करवा के नहीं गए थे। यह तो शुक्र था विद्या ने उनके पहुंचते ही, उनके लिए स्वस्थ्य चिकित्सा बीमा की पालिसी ले ली थी जिस कारण चिकित्सा के भारी भरकम खर्च से बच गयी।

यादव जी को जर्मन की कड़क ठण्ड में तीन महीने और बिताने पड़े, और वो भी घर में ही।



Tuesday, 6 September 2016

Na ji, naa


ना  जी, ना!

चंद्राकर जी के बेटा, बेटी दोनों ही ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी थे। बेटा-बहू एडिलेड में बड़ा सा मकान लेकर रहता था और बेटी-दामाद कैनबरा में। वे चाहते थे, चंद्राकर भी वहां के स्थाई निवासी हो जायँ ताकि आने के लिए बार बार वीसा लेने का चक्कर समाप्त हो जाय। आखिर भारत में बच्चों के बिना, अपने भाइयों के सहारे कब तक रहेंगे। वैसे भी ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी होने पर, वहां की कई सारी सुविधाओं के अधिकारी हो जाते हैं, जैसे निःशुल्क चिकित्सा, वरिष्ठ नागरिकों की सस्ती बस व रेल यात्रा और दस वर्ष स्थाई निवासी रहने के पश्चात वृद्धा पेंशन भी। चूकि बेटा, बेटी दोनों ही ऑस्ट्रेलिया के नागरिक हो चुके हैं, उन्हें स्थाई निवासी का दर्जा मिलने में कोई अधिक समस्या नहीं थी। पर जब भी केशव उनसे पी. आर. (स्थाई निवासी) के लिए अप्लाई करने के लिए कहता, वे ना कर देते। कहते वे अपना वतन और इतने रिश्ते नाते छोड़ कर कैसे जा सकते हैं। हाँ, घूमने फिरने के लिए ठीक है, और दो तीन बार तो घूम भी चुके हैं। पूरी जिंदगी भारत में काट लिया, अब बुढ़ापे में सब कुछ छोड़ कर दूसरे देश में कैसे जी पाएंगे। बड़ी मुश्किल से, किसी तरह, केशव ने उन्हें समझाया, 'पापा! स्थाई निवासी होकर भी आप भारत में रह सकते हैं। स्थाई निवासी होकर, बार बार का वीसा का झंझट ख़त्म हो जायेगा और आप को यहां की चिकित्सा सुविधा का लाभ मिल सकेगा। आपका जब मन आये यहाँ रहिये, वहां जाना हो वहां जाईये।'
उसके बाद भी आज कल करते, चंद्राकर जी ने साल बिता दिया। अब तो दोस्त मित्र भी उनको समझाने लगे थे, 'चंद्राकर जी, यहाँ  क्या रखा है! आप भी बेटे के पास ऑस्ट्रेलिया चले जाओ।'
'हाँ, मैं भी यही सोच रहा हूँ।  केशव भी बहुत दिनों से कह रहा है। मगर आप लोगों का प्यार और आदर, वहां नहीं जाने दे रहा है।'
एक मित्र अभी समझा ही रहा था कि ये प्यार कितने दिन काम आएगा, आखिरी  दम में तो बच्चे ही साथ देंगे कि चंद्राकर जी की अचानक ही तवियत ख़राब हो गयी। उनका ब्लड प्रेशर (रक्त चाप) बढ़ गया और उन्हें अपोलो अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। केशव को सूचना मिली तो अगले ही दिन छुट्टी लेकर आ पहुंचा। तीन दिन भर्ती रहने के बाद अस्पताल से छुट्टी मिली।
अब केशव को कहने का मौका मिल गया, 'बताईये, जब से कह रहा हूँ, अप्लाई किये होते तो अब तक पी. आर. आ भी गया होता। अभी तो अस्पताल का पचास हजार ही लगा, कुछ सीरियस होता तो ये अस्पताल वाले लाखों ऐंठ लेते।'
अब तक चंद्राकर जी को समझ आ चुका था। उन्होंने स्थाई निवासी के लिए अप्लाई कर दिया। अप्लाई करने के कुछ महीनों के पश्चात् ही वे ऑस्ट्रेलिया के पी. आर. (स्थाई निवासी) हो गए।
उनके पी. आर. होते ही केशव ने, चंद्राकर जी को ऑस्ट्रेलिया बुला लिया। वहां बेटे की सम्पन्नता और सुख सुविधा देखकर वे प्रसन्न तो थे, पर कुछ दिनों के बाद ऊबन होने लगी। उनका जी वहां नहीं लगता। उन्हें बार बार इंडिया के दोस्त मित्र याद आते। कहाँ इंडिया में  पार्क में बैठ कर, घंटों गप सड़ाके करते; वहां पास पड़ोस से कोई खास मेल जोल भी नहीं, बस दूर से ही हाय हेल्लो होती थी। अभी घर में कोई पोता, पोती भी नहीं कि उनके साथ मन बहल जाय। बस टेलीविज़न पर, या अपने लान के रख रखाव में समय बिताना होता था। बेटी दामाद के यहाँ तो फिर भी मन लग जाता, उसके दो छोटे बच्चे थे। परंतु चंद्राकर जी पुराने विचार के व्यक्ति थे, वे बेटी के यहाँ अधिक रुकना पसनद नहीं करते थे।
उनका बेटा केशव वीकएन्ड पर (सप्ताहांत) अपने एक मित्र के यहाँ खाने पर गया।  मित्र ने विशेष रूप से चंद्राकर जी के स्वागत में ही निमंत्रित किया था।
'अंकल! पी. आर. की बहुत बहुत बधाई। '
'थैंक यू बेटा।'
'चलिए अच्छा हो गया, अब बेटे के साथ रहेंगे। इंडिया से तो यहाँ अच्छा ही है। शांति है, कोई ज्यादा झंझट नहीं। क्या लेंगे स्कॉच या बीयर?'
 'ना जी, ना ! कभी छुआ तक नहीं।'
'अच्छा आपके लिए ठंडा लाता हूँ।'
चन्द्राकर जी को ठंडा और कुछ नाश्ता देकर, वे स्कॉच पीने लगे।
 'ये चिकन नगेट तो ले लेंगे!'
'ना जी, ना ! मैं बिल्कुल शाकाहारी हूँ।' चंद्राकर जी बोले।
'और अंकल, दिन में तो आपके बेटे, बहू काम पर चले जायेंगे, आप समय कैसे बिताएंगे?'
'देखेंगे, यहाँ तो बस तुम्हीं लोगों का सहारा है। ऐसे ही मिलते जुलते समय कट जायेगा।'
'क्लब चले जाया करिये। केशव अंकल को मेंबर बनवा दे।'
'ना जी, ना! वहां पर हमारे लायक क्या है? दारू हमें पीना नहीं, कैसिनो में मशीनों पर पैसे लुटाते रहो, यह सब मुझसे तो नहीं होगा। '
कहीं घूमने फिरने जाना होता तो चंद्राकर जी पहले ना नुकुर करते, मगर उन स्थानों की सुंदरता देखकर, मुग्ध हो जाते।
समय के साथ चंद्राकर जी की मुश्किलें बढ़ती गयीं। गाड़ी चलानी आती नहीं थी, मंदिर घर से काफी दूर था। बस का किराया इतना कि सुनकर ही होश उड़ जाते। पास पड़ोस कोई बोलता-बतियाता नहीं। उनकी दुनिया बस परिवार तक ही सिमट कर रह गयी थी। दिन में बेटा-बहू दोनों काम पर चले जाते। चंद्राकर जी कुछ समय सो लेते या घर से बाहर निकल कर टहल लेते। यहाँ तो ऐसा लग रहा था कि काला पानी हो। भारतीय मूल के लोग भी दूर दूर ही रहते थे। सप्ताह के अंत में ही मिल जुल पाते थे। हाँ, बच्चों ने एक अच्छी परंपरा चला राखी थी कि इंडिया से किसी के माँ बाप आते थे तो वे बारी बारी से खाने पर बुलाते थे। इसी बहाने वे एक दूसरे से मिल लेते और थोड़ी बहुत मन की बात हो जाती। चंद्राकर जी सुनते कि इंडिया से कोई बुजुर्ग आया है तो उनकी आत्मा के लिए संजीवनी सा काम करता। उसके अलावा भी कभी किसी यहां पार्टी आदि होती तो सभी बच्चे अपने मम्मी पापा को भी साथ ले जाते।
एक दिन चंद्राकर जी आत्मचिंतन कर रहे थे। यहाँ बच्चों का उत्तम रहन सहन है, अच्छा खा पहन रहे हैं पर उसका क्या लाभ! कोई अपना तो उसे देख भी नहीं रहा। मोटा खा पीकर भी अपने गांव में कितने प्रसन्न थे। मगर क्या करें, बच्चों के लिए सब करना पड़ता है। यहाँ अच्छी कमाई है तो महंगाई भी कितनी है। लान की एक बार घास काटने के लिए ही सौ डॉलर (लगभग पांच हजार रुपये) तक देना पड़ जाता है। घास की बात पर उनके मन में आया, क्यों न वे अपना समय फूल, फुलवारी में लगाएं! उन्होंने केशव से कहकर खुरपी और कुछ अन्य औंजार मंगवा लिया। फिर क्या था, उन्होंने लान के सौंदर्यीकरण का कार्य प्रारम्भ कर दिया। घास काटने की मशीन, केशव के पास पहले से ही थी। अब घास काटने के पैसे नहीं देने होते, यह जिम्मा चंद्राकर जी ने ले लिया। उन्होंने लान में, कुछ सुन्दर फूल और नारंगी के दो पेड़ लगा दिए। धीरे धीरे उनके लान की शोभा बढाती गयी। घर के पिछवाड़े के प्रांगण में उन्होंने सब्जियां बो दीं। मेथी, धनिया, मिर्ची, टमाटर, जहाँ पहले फ्रिज की जमाई हुई आती थी अब घर की उगाई, ताजा मिलने लगी। 

चंद्राकर जी अब पूरी तरह से अपने लान के लिए समर्पित थे। वे टहलने के लिए निकलते तो औरों के लगाए पेड़ पौधों को ध्यान से देखते। उनके मन में इच्छा जागृत होने लगी कि वे एक दिन अपना लान सबसे सुन्दर बना कर रहेंगे। जब भी नर्सरी जाते पौधों के बारे जानकारी लेते और पसंद आने पर ले आते। अब तक उनके लान में नारंगी, चेरी, बलूत, खजूर और अशोक के पेड़ अपने यौवन पर थे, और न जाने कौन कौन से शोभनीय पौधे, उनके बीच हरी कचनार घास। उधर से जो भी गुजरता, चंद्राकर जी के लान की ओर गर्दन घुमाये बिना नहीं रह पाता।
बसंत ऋतु में जहां पूरा एडिलेड रंग बिरंगे फूलों से सजा हुआ, दुल्हन की तरह सुन्दर लग रहा था; उसी सुंदरता का एक नन्हां सा टुकड़ा चंद्राकर जी के लान में भी था। एक दिन चंद्राकर जी को पता चला कि अगले दिन, एडिलेड काउंसिल के द्वारा, कालोनी के लानों का निरिक्षण होना है। चंद्राकर जी भी खर पतवार साफ़ करके, अपने लान को चमका रखे थे। इधर चंद्राकर जी की बहू आशा, गर्भवती थी, और डॉक्टरों के अनुसार उसी दिन अस्पताल में दिखाना था। डॉक्टर की सलाह के अनुसार, केशव सुबह ही आशा को लेकर अस्पताल चला गया। अस्पताल जाने पर आशा को भर्ती कर लिया गया। भर्ती कराके, अस्पताल दिखाने के ध्येय से, वह चंद्राकर जी को भी लेने आ गया। जैसे ही चंद्राकर जी अस्पताल जाने को तैयार हुए, पता चला कि काउंसिल की टीम निरीक्षण के लिए आ चुकी है। केशव की जल्दी के मारे, चंद्राकर जी टीम को अपने काम के बारे में कुछ बताने के लिए रुक नहीं पाए, और अस्पताल चले गए। सूचना पाकर उनकी बेटी, चंदा भी अस्पताल आ गयी थी।

अगले दिन प्रातः ही आशा ने एक सुन्दर से बालक को जन्म दिया। दो दिन भर्ती रहने के बाद आशा को अस्पताल से छुट्टी मिली। जब केशव और आशा नवजात पुत्र को लेकर घर आये, तभी देखा कि पोस्टमैन लेटर बॉक्स में कोई चिट्ठी डाल रहा है। चंद्राकर जी उत्सुकता वश, उसे तुरंत ही निकाल कर लाये और केशव को थमा दिया। केशव ने प्रेषक के रूप में काउंसिल का नाम देखा तो सोचा, कि काउंसिल ने कोई मांगपत्र भेजा होगा, मगर उसके ऊपर किसी तरह की कोई भी राशि बकाया नहीं थी। फिर भी सहम के ही वह लिफाफा खोला। जब पत्र को पढ़ा तो उसके हर्ष का ठिकाना न रहा। वह चंद्राकर के गले लिपट गया।
'पापा! आप ने तो कमाल कर दिया। देखो, सुंदरता में हमारा लान को द्वितीय स्थान पर आया है और कौंसिल की ओर से दो सौ डॉलर का पुरस्कार भी।'
'वाह क्या कहने, हमारे पोते के आते ही यह अच्छी खबर आयी, बस ये समझो कि इसका यह शुभ लक्षण है।'

केशव और आशा को पुत्र की प्राप्ति की बधाई देने के लिए, दोस्त, मित्रों का घर पर ताँता लगा हुआ था। जो भी आता, केशव उसे सबसे पहले लान के पुरस्कृत होने की सूचना देता। अब चंद्राकर जी ऑस्ट्रेलिया के एक गौरवान्वित निवासी थे। उन्हें एक पोता भी मिल गया था। अब उन्हें कोई समस्या नहीं थी और पूरी तरह से वहां रस बस गए थे।




Monday, 29 August 2016

Hileri ka kutta

कुत्ता लेकर आ जाती

हार्दिक के घर से दो तीन घर छोड़ कर हिलेरी का घर था।  बूढी हिलेरी अपने पति के साथ यहाँ रहती थी। हिलेरी एक सुन्दर महिला थी; बदन से पूरी तरह चुस्त-तंदरुस्त, रुई सा सफेद,  लड़कों जैसे छोटे बाल, उम्र पचहत्तर के पार। पैंट टी शर्ट पहन कर चलती थी तो लगता था कि अपने जमाने की कोई नायिका रही होगी। चेहरे पर झुर्रियां अवश्य थीं वरना आव भाव से उम्र की झलक नहीं दिखती। बेटी-दामाद, सिडनी से दूर कैनबरा में रहते थे।  वे महीने में एकाध बार मिलने आ जाते और कभी कभी हिलेरी उनके यहाँ चली जाती । 
हिलेरी का श्वेत रंग का झब्बर बाल वाला कुत्ता, जिसका नाम मेग्जी था, देखने में बड़ा प्यारा था। हिलेरी के पति अधिकतर समय अपने घर के लान में फूल पौधे उगाने व उनके रख रखाव में लगे रहते और वह स्वयं कुत्ते की देख रेख में व्यस्त रहती।  मेग्जी को नहलाने, खिलाने और टहलाने में उसका काफी समय व्यतीत हो जाता। जब वह मेग्जी को टहलाने के लिये निकलती तो हार्दिक का डेढ़ साल का बेटा, चिंतन देखते ही घर से बाहर निकल जाता और मेग्जी साथ खेलने के लिए मचल उठता।  हिलेरी यह देख कर बड़ा प्रसन्न होती। वह चिंतन का हाथ पकड़ कर कुत्ते की पीठ पर फिरवाती। चिंतन मेग्जी को छूकर बड़ा रोमांचित होता। कुछ देर पश्चात् जब वह वापस जाने लगती तो चिंतन रोने लगता, तथा उसके साथ और खेलने के लिए जिद्द करता। हार्दिक उसे बड़ी मुश्किल से बहला फुसला कर घर लाता।  
चिंतन का तो अब मेग्जी से इतना लगाव हो गया था कि बार बार हार्दिक का हाथ पकड़ कर हिलेरी के घर की ओर ले जाता। घर के सामने से निकलते, हिलेरी भी जब खिड़की से चिंतन को देख लेती तो मेग्जी को लेकर बाहर आ जाती और चिंतन उसके साथ खेलने लगता। हार्दिक सोचता कि उधर जाने से, इस उम्र में हिलेरी अनायास ही तंग होती है, इसलिए उसके घर की ओर चिंतन को लेकर जाना उसे अटपटा लगता और कम से कम जाता। पर हिलेरी को, चिंतन का मेग्जी के साथ खेलना देख बहुत अच्छा लगता था। वह जब भी मेग्जी को टहलाने ले जाती कुछ देर हार्दिक के घर के सामने खड़ी हो जाती ताकि चिंतन आकर कुछ देर खेल ले और वह उसके नटखटपना का आनंद ले सके। चिंतन खिड़की से  देख लेता और चिल्लाने लगता 'डौगी, डौगी  .. ' हार्दिक विवश होकर उसे बाहर ले जाता और चिंतन उसके साथ खेलने लगता। कभी कभी चिंतन सोया होता और कुछ क्षण प्रतीक्षा के पश्चात भी बाहर नहीं निकलता तो हिलेरी उदास होकर चली जाती।
चिंतन को मेग्जी से इतना लगाव हो गया था कि वह बार बार उसके पास जाने की जिद्द करता। कई बार वह कुत्ते का अभिनय तक करता, कुत्ते जैसे चार पैरों पर चलता और भौं भौं करता। यहाँ तक कि कई बार तो सपने में भी 'डॉगी, डॉगी' चिल्लाता। चिंतन जब भी किसी बात के लिए जिद्द करता तो हार्दिक और उसकी पत्नी 'देखो, डॉगी!' कहकर उसको मना लेते। जैसे ही वे कहते- डॉगी आ गया, चिंतन भाग कर खिड़की से झांकने लगता।कुत्ते और चिंतन की दोस्ती ने दोनों परिवारों में भी घनिष्ठता बढ़ा दी थी। लगभग रोजाना ही हिलेरी और हार्दिक एक दूसरे का हाल पूछ लेते। 

इधर कुछ समय से हिलेरी कुत्ता लेकर नहीं आ रही थी। चिंतन बार-बार खिड़की से देखता, शायद उसे वह डॉगी दिख जाय पर मेग्जी के दर्शन नहीं हो पाते। अब कोई भी कुत्ता उसके घर के सामने से गुजरता, चिंतन रोमांचित होकर चिल्लाने लगता 'डॉगी, डॉगी।'  कई बार हार्दिक, चिंतन को लेकर हेलेरी के घर के सामने तक गया पर वहां सन्नाटा पसरा था। यहाँ तक कि उसके लान की घास भी सूखने लगी थी। उसने अनुमान लगा लिया, संभवतः वह अपनी बेटी यहाँ कैनबेरा गयी होगी। धीरे, धीरे महीना से ऊपर हो गया। एक दिन जब हार्दिक उधर गया तो हिलेरी के पति जान, लान की सिंचाई करते दिख गए। हार्दिक ने उन्हें बताया कि चिंतन मेग्जी को बहुत याद करता है, दिन में कई बार 'डॉगी डॉगी ' करता है और कभी कभी  तो दौड़ कर आपके दरवाजे तक आ जाता है। जान ने बताया कि अब वह मेग्जी से नहीं मिल पायेगा।
हार्दिक यह सुनकर चौंका, 'क्यों? उसे कुछ हो गया, क्या?'
'नहीं, वह ठीक है पर अब कैनबेरा में बेटी के पास ही रहेगा। हिलेरी का हृदयघात के कारण स्वर्गवास हो गया।  मेग्जी की देखभाल मेरे वश की तो है नहीं। '
अब चिंतन को फुसलाना उनके लिए बड़ा कठिन कार्य था।

Wednesday, 3 August 2016

Laghu katha


जज साहब

जज के कमरे से बाहर निकल कर जमुना प्रसाद, न्यायलय के प्रांगण में ही एक पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठ कर बड़बड़ाने लगे : 'बताओ कितने वर्ष हो चुके, इतने साक्ष्य भी प्रस्तुत कर दिया, मगर न्यायालय एक हत्यारे को सजा तक नहीं दे पा रही।'
बगल में बैठा एक व्यक्ति बोला, 'आप जिस अपराधी की बात कर रहे हैं वह बहुत प्रभावशाली है, मंत्रियों तक उसकी पहुँच है, राजनीति में भी दखल रखता है। जज साहब भी क्या करें, आखिर उन्हें भी तो इसी समाज में रहना है। कोई किसी प्रभावशाली व्यक्ति का रिश्तेदार तो कोई खुद का ही। अपराधी तत्व तो सरकार तक से जुड़े हुए हैं। जज साहब को भी अपनी बचानी है।'
जमना प्रसाद भड़क उठे।  'इस तरह का समाज बनने में क्या जज साहब का हाथ नहीं है? अगर निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपराधियों को सजा देते होते तो ऐसा समाज पनपता ही कैसे। प्रभावशाली तो वे तब होते हैं जब गलत और अवैध तरीके से अपना प्रभाव दिखाते हैं, उनके विरुद्ध एक तो शासन कुछ नहीं करना चाहता और कोई शिकायत न्यायलय तक पहुँच भी जाय तो  न्याय में इतना बिलंब कि वह महत्वहीन हो जाय, ये समझौता है या न्याय ?'
वह व्यक्ति निःशब्द था।

   
झूठ का पाठ


साली की राखी

कमला, होली पर जीजा से खूब होली खेली। पिचकारी भर भर कर रंग डालने लगी। प्यारे लाल, आखिर ससुराल जो आये थे। जीजा जी भी साली की ठिठोली का भरपूर आनंद उठा रहे थे। एक बार रंग डाल कर कमला भागने लगी तो जीजा को भी अवसर मिला और हाथ में गुलाल लिए दौड़ पड़े। कमला को पकड़ कर उन्होंने बाँहों में भर लिया और धीरे धीरे मुंह पर गुलाल मलने लगे।
कमला चिल्लाती रही, 'जीजा जी! दूर से। इस तरह नहीं पकड़ो।'
पर, जीजा ने एक न सुनी, 'हे, हे; साली आधी घरवाली' कहते गुलाल मलते रहे।
गुलाल आंख में पड़ गया और कमला पीड़ा से व्यथित हो गयी। कमला की भाभी, उर्मिला सब देख रही थी। उसने तुरंत ही आंख साफ किया और कमला को कमरे में ले गयी। प्यारे लाल यूँ पश्चाताप तो कर रहे थे, फिर भी उर्मिला ने सुना दिया, 'नंदोई जी! आप कह रहे थे, साली आधी घरवाली होती है।  एक बात बताना - पति पत्नी के ससुराल के बाकी रिश्ते एक दूसरे के लिए समान्तर होते हैं, जैसे पिताजी, माताजी, भाई साहब आदि, तो बहन को बहन क्यों नहीं ? साली क्यों ?'
प्यारे लाल के पास कोई उत्तर तो था नहीं, और तो और ढिठाई से प्रश्न कर दिया,  'तो क्या साली से राखी बँधवाऊं ?'
'बंधवा लोगे तो बड़प्पन ही बढ़ेगा, छोटे थोड़े ही हो जाओगे, नंदोई जी !'


महंगा लहंगा

'इतना महंगा लहंगा और बस एक बार पहनना है। देखो मालती के लिए लहंगा बनवाया, बस एक बार शादी में पहनी और तबसे धरा ही रखा है। 'बहन जी! सुशीला की शादी में लहंगा चुन्नी मत बनवाना . मालती का संभाल कर रखा है, ले लेना। बिलकुल नया है, बस एक बार ही तो पहनी है। शादी के बाद, ड्राई क्लीनिंग करवाके रख लेंगे।  जो पैसे बचेंगे कहीं और काम आ जायेंगे। शादी व्याह में तो दुनिया भर के खर्चे होते हैं। ' मालती की माँ ने सुमित्रा से कहा।
सुमित्रा ने भी हां में हां मिला दिया।
बारात आ गयी थी, जयमाल की तैयारी चल रही थी। दूल्हे राजा मंच पर सजे बैठे थे। सुशीला को उसकी सहेलियां, सुन्दर सी चादर की छाँव में लेकर आ रही थीं। सभी की नजर दुल्हन की सुंदरता पर टिकी थी। सभी की सभी स्त्रियां सुशीला की सुंदरता की प्रशंसा कर रही थीं। कोई उसके मेक-अप की प्रशंसा करता तो  कोई कहता कितनी सुन्दर जोड़ी है।
स्त्रियों की भीड़ में मालती की दादी भी थीं। वे एक एक को खोद कर बता रही थी, 'देखो मालती के लहंगे में शुशीला कितनी सुन्दर लग रही है। बहुत मंहगा बनवाया था।'




पड़ोसी तो बस पड़ोसी है


सिंघवी जी को अपने प्रारम्भ से ही अपने पद  का बड़ा गरूर था। पदोन्नति के पश्चात वे उप आयुक्त बन चुके थे। उनके बगल वाला फ्लैट कामता का था।  कामता, एक सरकारी विभाग में चपरासी के पद पर कार्यरत था। सिंघवी जी के यहां  आने वाला उनका कोई मित्र या रिश्तेदार, जब पूछता बगल वाले फ्लैट में कौन रहता है? तो हेय भाव से बोलते, ' है, एक चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी।'
एक बार, उनका सहकर्मी सचदेवा आया तो उससे भी उन्होंने वही बात कही। सचदेवा को यह परिचय अच्छा नहीं लगा और बोल पड़ा, 'सिंघवी जी! पडोसी तो पडोसी होता है, चपरासी या आयुक्त नहीं। आप घर में भी निदेशक ही बने रहते हैं क्या? अरे, जहाँ हैं, वहां हैं।  हो सकता है, आपका कोई रिश्तेदार, किसी छोटे पद पर हो, इसका अर्थ यह तो नहीं वह आपके अधीनस्थ हो गया।' मगर सिंघवी जी को इन बातों का कोई अंतर नहीं पड़ता। वे अपनी प्रतिष्ठा के प्रति बड़े सजग रहते और पद का गर्व रखते। ये तो उनकी बदकिस्मती थी आबंटन में उनके पड़ोस वाला फ्लैट चपरासी का निकल गया। वे बहुत ईमानदार थे और उनके ऊपर अपने परिवार का दायित्व इतना था कि वे बड़ा घर नहीं ले सकते थे। उन्होंने एक बार प्राधिकरण में फॉर्म भर दिया और यह फ्लैट निकल आया। वे तो कामता को हेय की दृष्टि से देखते परन्तु कामता उनकी सदैव मदद करता रहता।  उनके बच्चों की शादी में उसने, व्यवस्था करवाने, मेहमानों के आवभगत करने में बहुत मदद की, यहाँ तक कि अपने फ्लैट का एक कमरा उनके मेहमानों के लिए खाली कर दिया।

उम्र के साथ सिंघवी जी सेवानिवृत्त हुए। अब विभाग की सभी सुविधाएँ बंद हो गयीं। सभी काम उन्हें स्वयं ही करना होता। बेटे को पढ़ा लिखा कर विवाह कर दिया और वह बहू को लेकर बंगलोर चला गया था।  दोनों बेटियां अपने अपने ससुराल चली गयीं। एक बार वे तेज बुखार और शरीर की अकड़न से बहुत पीड़ित हुए। घर पर उनकी पत्नी, रमा के अतिरिक्त कोई नहीं था। रमा को कुछ नहीं सूझ रहा था, वह क्या करे, कहाँ दिखाए। उसने बेटे श्रीकांत को फोन किया तो वह परसों तक आने को बोला। सिंघवी जी के पुराने कार्यालय में फ़ोन किया तो सचदेवा नहीं मिला और सैनी ने मीटिंग में व्यस्त होने की बात कही। रमा बहुत व्यग्र होने लगी। अभी एम्बुलेंस बुलाने के लिए टेलीफोन ही करने जा रही थी कि उनकी बीमारी के बारे में कामता की पत्नी को पता चला। कामता की पत्नी ने जैसे ही कामता को फ़ोन पर बताया, वह छुट्टी लेकर आ गया। कामता ने लक्षण से भांप लिया, वे डेंगू के शिकार हो गए थे। बिना देर किये सिंघवी जी को लेकर सरकारी अस्पताल गया। वहां एक डॉक्टर से उसका परिचय था, इस कारण बिना किसी परेशानी के उनकी अच्छी देख भाल हो गयी। उनका पलेटलेट बहुत गिर गया था और डॉक्टर ने तुरंत पलेटलेट का प्रबंध करने के लिए बोला।
अस्पताल से पलेटलेट लेने के लिए, खून देने की आवश्यकता पड़ गयी। कामता ने अपने बेटे से अनुरोध कर, रक्त दान करवाया। जब तक श्रीकांत बंगलोर से आया सिंघवी जी के स्वास्थ्य में काफी सुधार हो चुका था। श्रीकांत बस अस्पताल से घर लाने की औपचारिकता भर कर पाया। अब वे कामता के बड़े शुक्रगुजार थे। उसके कारण सही समय पर चिकित्सा के अतिरिक्त उनके काफी पैसे भी बच गए। निजी अस्पताल में तो लाख से ऊपर का बिल आता।

अब कामता कभी किसी से कहता, 'मैं सरकार में एक छोटा सा कर्मचारी हूँ '  तो सिंघवी जी तुरन्त टोक देते, 'कौन कहता है, आप छोटे हो। देखो, मैं तो वो भी नहीं हूँ।'

एस० डी० तिवारी


रैली ने रोका

बहुत बड़ी रैली थी। कहने वाले कह रहे थे, पार्टी वालों ने किराये पर भीड़ जुटाया है। दक्ष के पापा को दिल का दौरा पड़ा, एम्बुलेंस में लिये वह रास्ता मिलने की प्रतीक्षा कर रहा था। रैली थी कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एम्बुलेंस का साईरन निरंतर बज रहा था। पर भीड़ के कहाँ कान और कहाँ मस्तिष्क। दक्ष समझ नहीं पा रहा था कि वह इंसानों कि बस्ती में है या किसी जंगल में। आखिर नेता लोग अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिये लोगों को क्यों तंग करते हैं, वो भी लोगों के ही द्वारा।  दक्ष एम्बुलेंस से उतर कर अनुरोध करने लगा 'भाई एम्बुलेंस निकल जाने दो, पापा की जान खतरे में है, कहीं अनहोनी न हो जाय।'
रैली के बीच में से आवाज आई, 'शीशा तुड़वाना है क्या ?'              
अब उसके पास प्रतीक्षा और ईश्वर से प्रार्थना के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था।


अंतिम अध्याय
मालिनी के घर सहेलियों का मजमा लग गया था। कोई किट्टी पार्टी नहीं थी, बस यूँ ही साथ की पढ़ी कमला और सोनम आ गयी थीं। पड़ोस की मनोरमा भी आ धमकी। मालिनी के पति शहर से कहीं बाहर गए हुए थे।  दिन भर बैठ कर चारों ने खूब बातें की, चाय समोसा हुआ। अब बच्चों के स्कूल से आने का समय हो चुका था।
'भाई वाह ! मजा आ गया।  बहुत दिनों के बाद, इतनी बात करने का अवसर  मिला, जी भर के बातें हो गयीं, फोन पर इतनी बात कहां हो पातीं। अब चलते हैं, तेरे बच्चों के आने का समय हो गया', कमला ने कहा।
'हां, हां' करते सब घर से निकल गयीं। यूँ लग रहा था की अब बातों का अंत हो  चुका था, पर जब वे घर की दहलीज पर खड़ी हुईं तो एक-एक करके और बहुत सी बातें याद आने लगीं। दरवाजे पर खड़े खड़े, आधा घंटा निकल गया, लग रहा था कि अभी कितनी सारी बातें बाकी रह गयीं। आज का दिन तो बातों के लिए बहुत कम था। इतने में मालिनी का बेटा स्कूल से आ गया।
'चलो, अब चलती हूँ, अप्पू आ गया। उसे कुछ खाने पीने को दूँ।'
तभी सोनम बोली, 'अरे कांता की बात तो बतानी ही भूल गयी।'
'आज नहीं, फिर कभी। '
'चल फ़ोन पर बात कर लेंगे।'


न्याय

कल्लू और जानी दोनों एक ही अपराध, मोबाइल चुराने में गिरफ्तार हुए थे। कल्लू की तो पहली पेशी में ही जमानत हो गयी, पर जानी अति निर्धन होने के कारण न तो वकील कर पाया, न ही, उसकी कोई जमानत देने वाला था। वह अपने अपराध के लिए नियत सजा का लगभग आधा समय जेल में बिता चुका था। इस बार न्यायलय में पेशी पर उसकी माँ भी आई थी। उसे जो भी वकील मिलता, 'मेरे बेटे को छुडवा दो साहब, पुलिस वालों ने उसे झूठा ही फंसाया है। '
वकील अनसुनी कर आगे बढ़ जाते।
इस बार उसने सोच लिया था, वह अपनी पैरबी खुद करेगी। वह जज के सामने जा धमकी और रोते हुए कहने लगी, 'जज साहब, जानी बेकसूर है। इसे फंसाया गया है। कैद में एक साल के करीब हो गए, अभी तक जमानत भी नहीं हुई। कल्लू के पास पैसा था, छूट गया। मैं वकील नहीं कर सकती, साहब! मेरी गरीबी के कारण, यह जेल में है।  '
न्यायलय के सामने समस्या थी बिना जमानत के छोड़ दिया तो वह पुनः अपराध कर सकता है, और पकड़ने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं होगा। फिर भी जज साहब ने कहा, 'मैं तुम्हें सरकारी वकील दिला देता हूँ, जमानती का इंतजाम कर लो। '
'मैं ही जमानत दूंगी साहब, जिनके यहाँ झाड़ू, पोछा, बर्तन करती हूँ, वो तो आने से रहे।'

एस० डी० तिवारी


वी. आई. पी. सीट
ट्रैन के प्रथम श्रेणी के वातानुकूल कोच में सांसद जी की शय्या आरक्षित थी।  वे अपने कुप्पे में प्रवेश करते ही   उन्हें छोड़ने आये सहायक को निर्देश दे दिए कि ऊपर वाली दोनों शैय्याओं को मोड़ दे और जाकर टिकट निरीक्षक को बुला लाये। टी.टी.इ. के आते ही सांसद ने कहा, 'देखो मैं सोने जा रहा हूँ, इस कुप्पे मे और कोई न आये। किसी का आरक्षण हो तो कहीं एडजस्ट कर देना।'
'एस सर '  कहकर टिकट निरीक्षक द्वितीय वातानुकूल कोच में एक सीट पर बैठ गया और बड़बड़ाने लगा, 'बताओ कितनों को सीट नहीं मिल पाती है और एक व्यक्ति चार सीट घेर कर बैठ गया। इन लोगों ने तो कानून को अपनी जेब में रखा है। संविधान में समानता बस नाम के लिए है?'
एक यात्री टीटीइ की हां में हां मिलाते हुये बोला, 'यह देश तो भाई, बस वीआईपी लोगों का है। सरकारी साधन इनसे बचे, तभी किसी को मिल पाता है। बड़े सरकारी अस्पताल इन्हीं लोगों के निमित्त, पुलिस का ही देखो, एक बड़ा भाग वीआईपी सुरक्षा में होता है और जनता की सुरक्षा  ... '
"क्या करें, सर ? हम लोग तो सरकारी नौकर हैं। "

एस० डी० तिवारी


नोट का क्या करें ?

नोट बंदी की घोषड़ा ने सबको परेशान कर रखा था।  जिसे देखो वही बैंकों की कतार में खड़ा।
एक बड़े नेता बहुत चिंता में डूबे थे। वे अपने संकट मोचक बाबा के पास पहुंचे। कभी भी कोई समस्या आती तो समाधान ढूंढने, नेता जी, बाबा के पास जाते।  बाबा से उन्होंने अपनी चिंता जताई, विस्तार से बताई।
'बाबा! सरकार ने पांच सौ और हजार का नोट बंद कर दिया, और मेरे पास तो हजार करोड़ से भी अधिक हैं जो मैंने चुनाव के लिए एकत्र कर रखा है। इसे बैंक में भी जमा नहीं कर सकता, क्योंकि यह सब काली कमाई है। और तो और इसमें से कुछ पैसा उम्मीदवारों को टिकेट देने के बदले लिया था। अब आप ही कोई समाधान बताईये, बाबा। मैंने कितना बुद्धि लगाकर और परिश्रम करके यह पैसा एकत्र किया है।  अगर आप कोई समाधान नहीं निकालेंगे तो यह कागज हो जायेगा।'
बाबा ने नेता जी से कहा 'वत्स, चिंता मत करो, आखिर तुम्हें यह पैसा चुनाव में ही तो खर्च करना है।उसे अभी खर्च कर दो और समझो कि चुनाव के लिए निवेश किया है। इन रुपयों को निर्धन मतदाताओं के खातों में दो-दो, चार-चार हजार करके जमा करा दो। वे तुम्हारे कृतज्ञ रहेंगे और तुम्हारे लिए मतदान करेंगे।'
'मगर यह मैं बाटूंगा तो मीडिया वालों को पता नहीं चल जायेगा। फिर वे बदनाम करेंगे, नेता जी के पास इतना पैसा कहाँ से आया।'
'हाँ, यह तो मैंने सोचा ही नहीं। कोई बात नहीं, यह काम अपने एजेंटों द्वारा कर लें।'

बाबा के पास पहले से ही उपस्थित एक उद्योगपति भी अपनी उसी तरह की समस्या लिए बैठा था। बाबा ने  उसे उपाय बता दिया, 'तुम अपने पैसे को बैंक में डाल दो और अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट से बात करके इस वर्ष अधिक व्यापार और लाभ दिखा देना। लाभ पर कर तो चुकाना पड़ेगा पर तुम्हारा वह पैसा कानूनी हो जायेगा।'

जब दोनों चलने लगे तो बाबा ने कहा 'सौ करोड़ के लगभग तो मेरे पास भी रखे हैं, थोड़ा थोड़ा करके इसे भी उसी में एडजस्ट कर देना। '



- एस० डी० तिवारी


घर का चोर

टेलीविज़न पर, प्रधान मंत्री का राष्ट्र को संबोधन समाप्त ही हुआ था, श्रीदेवी चाय लेकर आयी। चाय, मेज पर रखकर, सोफे पर बैठ गयी।
'ये पांच सौ और हजार का नोट बंद हो गया, अब इनका क्या होगा?'
'हमें क्या चिंता है, हमारे पास कोई काला धन थोड़े ही है कि चिंता करें। ये तो उनके लिये समस्या है जो दो नंबर से कमाई करते हैं और कर नहीं चुकाते। '
'अब वे क्या करेंगे ?' श्रीदेवी ने फिर पूछा।
'करेंगे क्या जो उनकी सही कमाई का होगा, बैंक के खाते में जमा करा देंगे नहीं तो रख के सड़ायेंगे। '
'सुनो जी, एक बात कहनी है। '
'हां, बोलो। '
 'बहुत दिनों से एक हार बनवाने की सोच रखी थी। सोची कि तुम्हारे ऊपर एकाएक अधिक भार न पड़े, इसलिए तुम्हारी जेब से चुरा चुरा कर पचास हजार रुपये इकठ्ठे कर रखे हैं। उसका क्या होगा ?'
श्रीकांत जी तिरछी आँखों से देखते हुए, 'हुँ ऊं.. तुमने कभी बताया नहीं, खैर बैंक खुलने दो। वाह प्रधानमंत्री जी, चोर पकड़ने की आपकी योजना की तो अच्छी शुरुआत हुई  .. '

- एस० डी० तिवारी

मिट्टी की मिट्टी

मदन पाल का महल जैसा घर था और वह अकूत संपत्ति का स्वामी बन बैठा था । एक कमरा तो समझो कि नोटों से भरा था।  नोट बंद होने का समाचार पाकर, पति  पत्नी चिंता में डूबे थे। समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्या करें। जीजा जी से भी बात कर लिया, मगर कोई हल नहीं निकला। मदन पाल को पहली बार लगा कि उसके जीजा से भी ऊपर कोई हो सकता है। पहले उसकी बिल्डिंग मैटेरियल की  छोटी मोटी दुकान हुआ करती थी, जब जीजा जी मंत्री बन गए तो उसके पौ बारह थे। नदी की सारी रेत मदनपाल की मर्जी से ही निकलती और बिकती जिसे वह मनमाने दाम पर बिकवाता। उसके समक्ष प्रशासन भी पंगु था। वह दिन दूनी, रात चौगुनी उन्नति करने लगा और धन का अम्बार लगा लिया।
उसकी यह स्थिति से उस दूध वाले की कहानी याद आ गयी -
एक दूध वाला नदी पार करके दूध बेचने जाता। ग्राहकों को दूध देने से पहले नदी से उसमें पानी मिला लेता। एक दिन नाव से नदी पार कर रहा था कि उसका दूध का कंडाल पलट गया और सारा दूध पानी में बिखर गया। मल्लाह उसकी करतूत से अवगत था। हंसते हुए बोल पड़ा, 'ले भइया, दूध का दूध, पानी का पानी'।
अब मदन पाल का भी मिट्टी का पैसा मिट्टी हो चुका था। उसे एक ही विकल्प सूझ रहा था कि चुपके से नोटों को नदी में फेंक आये, कहीं ऐसा न हो नोटों के साथ पकड़ा जाये और परेशानी झेलनी पड़े।

एस० डी० तिवारी


पंडिताईन का आम

पंडिताईन को उन्हें विधवा हुए वर्षों बीत चुके थे। वे पचहत्तर पार कर चुकी थीं।  निःसंतान होने के कारण अकेले ही जीवन व्यतीत करना पड़ रहा था। उनके पास दो तीन बीघा खेत था और एक आम का पेड़, यही दोनों जीवन का सहारा थे। उस समय वृद्धा पेंशन जैसी कोई चीज नहीं होती थी। खेत को कभी वे बंटाई पर दे देतीं तो कभी गांव के लोग ही उनके खेत की जुताई, बुआई कर देते थे।
यूँ तो गांव में कई लोगों के आम आदि के बाग थे, पर बच्चों को पंडिताईन के पेड़ का ही आम पसंद आता। एक तो उसका सुन्दर स्वाद और ऊपर से छिड़का पंडिताईन के गालियों का मसाला। जब बच्चे ढेला लेकर उनके आम के पेड़ के नीचे एकत्र होते, कोई एक बालक फूटकर, जाके पंडिताईन को बोल आता। वे अपना सोटा लिये, गालियों की बौछार करती चली आतीं। सभी बच्चे खिलखिलाते भाग खड़े होते।
गालियों में ही उन्हें, उनके खानदान का इतिहास पढ़ा देतीं। 'फलां का नाती, फलां का पनाती, ... तुम्हें यही पेड़ मिला है, अपना सब क्या भाड़ में झोंकोगे, आदि, आदि?'
वहां तो वे खूब सुना लेती थीं, मगर किसी के घर कभी शिकायत लेकर नहीं जातीं। और तो और जब आम तुड्वातीं तो बच्चों को बुला बुला कर बाँटतीं। उनके मरने के बाद,घर और जायदाद पर मायके के लोगों का अधिकार हो गया। बच्चे भी बड़े और समझदार हो चुके थे।
और वह आम का पेड़, अनेकों वर्ष अकेले उदासी का जीवन बिताता रहा।




हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी

आज विवाह की वर्षगांठ थी, कौतुकी प्रातः ही केशव को  समझा रही थी 'तुम बताना नहीं, देखें मम्मी जी और पापा जी को याद है कि नहीं। मम्मी, पापा तो रात बारह बजे ही फ़ोन पर 'हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी' बोल दिए थे।'

कामता प्रसाद और कमला टहलने गए थे, इधर केशव काम पर चला गया। शाम हुई तो कौतुकी ने मम्मी को फ़ोन मिला दिया, 'मम्मी, कैसे हो ?'

'हम लोग ठीक हैं, बेटा! तुम लोग ठीक हो न! और, एनिवर्सरी पर कहीं जा रहे हो या घर पर ही रहना है?'

'अभी पता नहीं, केशव के आने पर देखेंगे .....  मम्मी! देखा, मम्मी जी और पापा जी ने अभी तक 'हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी' तक विश नहीं किया, उन्हें हमारे विवाह की तिथि भी याद नहीं। आप लोग कितना ध्यान रखते हैं।'

तभी कमला ने पुकारा, 'बेटा कौतिकी! देखो, ये पाजेब तुम्हें कैसी लग रही है? और ये जैकेट केशव के लिए। हम प्रतीक्षा कर रहे थे, अपनी शादी की सालगिरह का जब आशीर्वाद लेने आओगी तो साथ ही यह भेंट दे देंगे।'

मन ही मन लजाई कौतुकी पांव छूते हुए, 'अरे! बहुत ही प्यारी है, मम्मी जी,  मैं तो समझ रही थी आपको याद नहीं होगा।'
केशव भी काम से लौट आया था। भूल सुधारते हुए मम्मी पापा के चरण स्पर्श किया।
कामता प्रसाद ने पूछा, 'कहीं बाहर चलें या घर पर ही कुछ  ...... '

- एस० डी० तिवारी


काले धन का हिसाब

मंगत राम ने हाल ही में एक फ्लैट ख़रीदा। फ्लैट के मालिक ने  पहले ही तय कर लिया था कि वह पच्चीस प्रतिशत यानि कि दस लाख रुपये, दो नंबर से लेगा और वो भी नगदी के रूप में, पहले ही। समझौते  के अन्तर्गत पच्चीस प्रतिशत की राशि वह नकद ले लिया। अभी वह इस पैसे को ठिकाने भी नहीं लगा पाया कि समाचार आ गया, पांच सौ और हजार के नोट बंद हो गए हैं। उसे तो मनो सांप सूंघ गया, लाखों रुपये का प्रश्न था। पैसा बैंक में जमा करने पर उसे आय का स्रोत बताना पड़ता और काफी राशि टैक्स के रूप में जमा करनी पड़ती। उसने मंगत से कहा कि इस राशि को एक नंबर मान ले और दो नंबर की राशि बाद में दे दे।
मंगत को यह स्वीकार नहीं था, बोला, 'मेरे पास तो यह गाढ़ी कमाई का पैसा है, बैंक से निकाल कर दिया है।
अब तो समझौता के अनुसार जो बकाया राशि है, वही दूंगा।'
'मगर जो नोट तुमने दिया है वो तो बंद हो गए।'
'तो उसमें मेरी क्या गलती है। मैंने तो सही नोट दिए थे, आपके पास आने के बाद ही तो बंद हुए, आप उसी दिन बैंक में डाल देते।'
'अरे, तुम्हें नहीं पता, इसे बाहर ही बाहर निबटाना था। अब तो मुश्किल  में फंसा दिया।'
'मेरे खाते में तो आठ लाख पड़े थे, दो लाख किसी से उधार लेना पड़ा, दो दिन बाद देने के लिए बोल रहा था तो आप ही जल्दी कर रहे थे, सौदा हाथ से निकल जायेगा।'
'फिर तो अच्छा ही है, इसे बैंक में वापस डाल दो, तुम्हें क्या परेशानी है। बैंक से ही तो निकाले हैं।'
मंगत ने सोचा, उसके पैसे तो निकल ही चुके हैं क्यों न समझौता कर ले और इसी बहाने कुछ फायदा उठा ले। उसने बोला, 'ठीक है अब दो नंबर वाली राशि में से पांच लाख कम करने होंगे।'
फ्लैट के मालिक ने सोचा, बाजार में अब पैसों की कमी रहेगी और उसका फ्लैट आसानी से इस कीमत पर नहीं बिक पायेगा। उसने मंगत राम से समझौता कर लिया।



खाता गुलजार

धन्ना सेठ ने बिरजू को बुलाया, 'ये लो ढाई लाख रूपया। ' कहते हुए एक एक हजार के नोटों की दो और पांच सौ की एक गड्डी थमा दिया।
'लेकिन सेठ साहब सुना है, ये नोट बंद हो गए हैं। क्या करना है इसका ? '
'हाँ, अपने खाते में जमा करा देना, बैंक में चल रहा है।'
बिरजू के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, सेठ ढाई लाख दे रहा है, आखिर किस बात के। सोचा सम्भवतः उसकी दस वर्ष की कर्मठ सेवा से वह प्रसन्न है और पुरस्कार स्वरुप यह राशि दे रहा है। मगर, अपने भाग्य पर उसे भरोसा नहीं हो रहा था। वह फिर से पूछा -
'किस बात के, साहब?'
'तुम्हारे खाते में कभी पैसा नहीं होता न, लो एक बार उसे गुलजार कर दो।'
बड़ी प्रसन्नता से थामते हुए बिरजू ने पूछा, 'कितने पर हस्ताक्षर करना है? सेठ जी!'
'नहीं, नहीं। कोई साइन वोइन नहीं करना है, ले जाओ, जब ये नोटों का भूचाल शांत हो जायेगा तो दो लाख लौटा देना, पचास हजार तुम्हारे। '
बिरजू आश्चर्य चकित था, पचास हजार भी कहाँ के कम। अब तक तो सेठ, दस हजार पर हस्ताक्षर करवा के, छः हजार पगार देता था। इस मंहगाई में वह किसी तरह पेट पालता था और सेठ उसके हक़ का भी पैसा मारकर अपनी तिजोरी में डाल लेता था।
बिरजू समझता तो सब था मगर मज़बूरी मुंह नहीं खोलने देती थी। आज हंसते हुए कह दिया, सेठ जी ! मैं तो दस वर्ष से भी अधिक समय से आपकी सेवा कर रहा हूँ। हर महीने जो अतिरिक्त चार हजार रुपये के लिए दस्तखत करवाते हैं, पांच लाख तो वैसे ही बनते हैं। अब तो आपके लिए यह सब कागज ही है।
धन्ना सेठ डर के मारे कि बिरजू कहीं फूट न पड़े, 'चलो एक लाख रख लेना। '

 - एस० डी० तिवारी


दिवाली की मिठाई

जुवैदा मिठाईयों को अपने तीनों बच्चों में बाँट रही थी। बच्चे खुश हो होकर, अपनी पसंद बता रहे थे।  तभी सलीम भी आ गया। जुवैदा डब्बा उठाते हुए बोली, 'लो एक उठा लो।' सलीम ने डब्बे से चमचम उठाया और दो बार में घोंट गया।
'मिठाई तो अच्छी है, एक और दिखा।'
'रूको, पहले बच्चों को ले लेने दो।'
'कितना मिला।'
'ये आधा आधा किलो के चार डिब्बे और श्रीवास्तव जी ने दो सौ नकद देकर बोला, इसकी मिठाई खरीद लेना। पांच घर में काम करती हूँ न।'
तभी छोटा बेटा, अख्तर ने एक सील किया हुआ डब्बा खोल दिया। सलीम इस पर गुस्सा खा गया, ये लोग कोई चीज थोड़ी देर के लिए भी नहीं रहने देते। जरूरी है एक ही दिन में सब खाओ। उसने उसे थप्पड़ मारने के लिए जैसे ही हाथ उठाया, जुवैदा ने हाथ पकड़, झटक दिया। 'ख़बरदार, खाने दो जी भर। तुम तो ईद पर भी चाहते हो कि बस घर पर बनी सेवई और गुलगुलों से ही काम चल जाय। दिवाली की मिठाई इनके भाग से मिली है तो ये जी भर खाएंगे। इन दो सौ का भी, मैं मिठाई ही लाऊंगी। '

एस० डी० तिवारी


पटाखे की चोरी

आशु के तो आज दोनों हाथ में लड्डू था। दिवाली पर पापा छुट्टी आये थे, ढेर सारे पटाखे लाये थे और नए कपड़े भी। वह सबसे बढ़िया वाला पटाखा, छुपा कर रख दिया कि सबसे बाद में, उसे छोड़ेगा और नए कपडे पहन कर, गांव में घूमने चला गया।
जो देखता ' अरे नए कपडे, बड़े अच्छे हैं। '
'पापा जयपुर से लाये हैं ' कहकर, आशु दो चार कदम मटक कर चल लेता।
वापस आने पर फूलझड़ी और पटाखे छोड़ने की बारी थी, वह एक एक कर छोड़ने लगा। शाम हो गयी तो उसे, उस प्रिय पटाखे की याद आयी। वह लेने गया तो पता लगा कि पटाखा वहां से गायब। अब तो रोना-धोना, चिल्लाना प्रारम्भ।
'मेरा पटाखा किसने लिया? भइया ही  चुराया होगा। '
आशु का संदेह सही था। उस पटाखे पर बड़े भाई, मनु की दृष्टि पड़ी और वह उसे लेकर अपने मित्रों के साथ छोड़ने कहीं बाहर चला गया। घर में तूफान मचा था। नामजद रिपोर्ट, पर नीलम कुछ नहीं कर पा रही थी।
अँधेरा हो चला था, नीलम फेर में पड़ गयी, आशु को कैसे चुप कराये! अब वह, वो वाला पटाखा कहाँ से लाये! आशु था कि जिद्द पे अड़ गया, मुझे पटाखा लाकर दो। 
नीलम का भाग्य अच्छा था, घर से जाते समय मनु का एक पटाखा गिर गया। नीलम ने उसे उठाकर ताक पर रख दिया। उसकी बुद्धि काम की, वहां से उठाकर आशु को देने लगी, 'ये ले।'
'नहीं, ये वो वाला नहीं है।'
अब तो संकट गहरा गया। 'अरे तुझे नहीं पता, पटाखे वाला आया था, कह रहा था वो वाला अच्छा नहीं था, ये वाला उससे अच्छा है और अधिक आवाज करेगा। वो वाला ले गया और उसके बदले ये दे गया। '
'सच मम्मी ? जयपुर से आया था ?'
'हाँ, हाँ '
बालक का भोला मन और छोटा सा झूठ, आंगन फिर चहक उठा।

 - एस० डी० तिवारी


धारावाहिक

जमुना प्रसाद और जान्हवी की अब तक की जिंदगी बड़े प्यार से बीती थी। जमुना प्रसाद सेवानिवृत्त होने के बाद अपना समय घर में ही कुछ लिखने पढ़ने में बिताते और जान्हवी का टेलीविज़न पर धारावाहिक देखने का चस्का था ही। टेलीविज़न धारावाहिक देखने में वह पहले कई बार सब्जी जला चुकी थी।
पहले जहाँ उसे हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई दिखती थी, अब दोष अधिक दिखते हैं। जान्हवी दोनों बहुओं में कई कमियां देखती और वह जमुना प्रसाद से लहराती रहती। जमुना प्रसाद कहते, वे बच्चियां हैं अभी दुनियादारी का अधिक ज्ञान नहीं है, समझा दिया करो। लेकिन जान्हवी धीरे धीरे चिड़चिड़ी होती जा रही थी, कई बार जमुना प्रसाद को भी अच्छी तरह धो देती।
जान्हवी का खाली समय व्यतीत करने का बस एक ही साधन था, टेलीविज़न। अब जमुना प्रसाद कभी बीच में कोई काम कहते तो वह झल्ला सी जाती। उन्होंने उसे समझाया, 'देखो! हम लोग तो टेलीविज़न देखने पर बच्चों को डाँटते थे, टेलीविज़न बंद कर देते थे, परीक्षा के समय केबल कटवा देते थे और अब तुम इतना समय इसी में लगाती हो। एक तो कितना शोर होता है और कई बार काल्पनिक कूटनीति की बातें मन में घर कर जाती हैं।'
'अरे ..  इससे पता चलता है, दुनिया में कैसे कैसे लोग हैं, क्या क्या खेल खेलते हैं। ये धारावाहिक देखकर पता चलता है, क्या अच्छा है, क्या बुरा। '
'अरे भाग्यवान! वो तो सही है, पर वर्षों तक के लम्बे धारावाहिकों में बुराइयों की लम्बी कहानी में अच्छाई वाली बात तो बस फ्लैश मात्र बनकर रह जाएगी न। तब तक तो व्यक्ति बुराईओं के विचार में रंग भी जायेगा। वहम उत्पन्न करने वाले बीज मन में पेड़ बन जायेंगे,  सास बहू का कूटनीतिक खेल वर्षों तक देखने पर, कभी न कभी मन में बहादुर होने की भावना भी जागृत होगी ..... ।

एस० डी० तिवारी

प्यारी सी बहू

विवाह के छः महीने बीत चुके थे। सोनम के मम्मी पापा उसके ससुराल आये थे। पूरा परिवार साथ घूमने के लिए निकला और ये हुआ की रात का भोजन बाहर ही किसी रेस्तरां में  कर के चलते हैं। घूमने के पश्चात्, सभी लोग यानि की सोनम और उसके मम्मी पापा तथा मानस और उसके मम्मी पापा एक अच्छे रेस्तरां में भोजन करने चले गए। मानस और सोनम ने अपने लिए पिज्जा और कोक मंगाया बाकी लोगों ने रोटी, दाल और सब्जी ही पसंद किया।  भोजन परोसने के बाद सोनम ने अपनी सास से पूछा, 'मम्मी जी थोड़ा पिज्जा चखेंगी?'
'नहीं मैं तो रोटी ही खाऊँगी। '
दो तीन कौर खा लेने के बाद सोनम की सास ने रोटी का एक कौर तोडा और सब्जी लगाकर अपना हाथ सोनम की ओर बढ़ाया, 'देख सोनम कितनी स्वादिष्ट सब्जी बनी है। '
सोनम मुंह में कौर दबाकर सिर हिलाई 'हूँउउऊँ'।
'बता तेरा पिज्जा अधिक स्वादिष्ट है या ये रोटी सब्जी।'
सास का प्यार देख, सोनम की मम्मी की आँखों में आंसू छलक आये।






एक दिन की हिंदी
१४ सितंबर

सरकारी कार्यालय के सभी कार्य अंग्रेजी में ही थे। १४ सितंबर को हिंदी दिवस मनाने के लिए, हिंदी के शब्द ढूंढे  जा रहे थे, किस किस ने हिंदी में क्या काम किया, क्या कुछ टिपण्णी की है, आदि। हिंदी प्रखंड पिछले एक माह से इसी कार्य में लगा था। निरंतर प्रयास के पश्चात् भी एक भी अधिकारी हिंदी लिखने को तत्पर नहीं होता। होता भी कैसे! अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले ही तो अधिकारी बनते हैं। एक तो उन्हें हिंदी आती ही कम है, दूसरे हिंदी लिखने में, लघुता का अनुभव होता है। वे सोचते हैं कि लोग समझेंगे, इसे अंग्रेजी कम आती है। जो भी आदेश, परिपत्र आदि निकाला जाता, उसका हिंदी अनुवाद बाद में परिचालित किया जाता, जिसका तब तक कोई महत्त्व नहीं रह जाता। या तो कूड़े की टोकरी या किसी फाइल में नत्थी कर दिया जाता।  

विद्यापति ने हिंदी माध्यम से पढ़ाई की थी और अपना काम हिंदी में ही करते थे। इसके कारण उन्हें पूरे साल तिरस्कार का भी सामना करना पड़ता। वरिष्ठ अधिकारियों से यहाँ तक सुनना पड़ जाता : ठीक से इंग्लिश नहीं आती, किसने तुम्हें सेलेक्ट कर लिया?' विद्यापति अपमान का घूंट पीकर रह जाते। हिंदी माध्यम से पढ़ाई के कारण उन्हें किसी अच्छे विषय में प्रवेश नहीं मिला, इस कारण  हिंदी में एम. ए. कर लिया। उन्हें नौकरी तो मिल गयी पर यह नहीं पता था कि इस देश में अंग्रेजी ही शासन करती रहेगी और हिंदी के कारण सदैव तिरस्कृत रहना पड़ेगा। ग्रेजुएशन करते उनको इसका बोध तो हो चुका था कि देश का संविधान इंग्लैंड से अंग्रेजी पढ़ के आये विद्वानों ने अंग्रेजी में ही लिखा था और इसके कारण हिंदी कभी अपना सिर नहीं उठा पायेगी, परन्तु अब तक देर हो चुकी थी। अब तो उनके पास जो था उसी के आधार पर अपना स्थान बनाना था। 

उनका हिंदी का ज्ञान और हिंदी से प्रेम, उत्कृष्ट हिंदी लेखन हेतु सदैव प्रेरित करता रहता। हिंदी साहित्य विशेषतः कवितओं ने उन्हें जीवन में जो रसास्वादन कराया था, उसके कारण यह भाषा उनके मन की गहराईयों तक बसी थी। वैसे वे काम भर अंग्रेजी जानते थे।

सितंबर आते ही सबकी दृष्टि विद्यापति की और घूमी। उनके सहकर्मी टिप्पणी कर जाते: हिंदी दिवस पर तो पुरस्कार विद्यापति को ही मिलना है। कम से कम इस समय उन्हें, स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करना स्वाभाविक ही था। तैयारियां जोरों पर थी। पूरे पखवाड़ा ही हिंदी के प्रचार प्रसार में उत्सव का सा परिवेश था। कार्यालय में हिंदी पखवाड़ा के बैनर और पोस्टर लगा दिए गये थे। कर्मचारी कई बार हिंदी के क्लिष्ट शब्द चुन कर लाते, और अन्य लोगों के उनसे अनभिज्ञ होने पर विनोद करते। १४ सितंबर को तो विद्यापति, बड़े ठाट बाट से कार्यालय आये। उन्हें पूर्ण विश्वास था हिंदी का सर्वोच्च पुरस्कार उन्हें ही मिलेगा। सुबह से ही उन्हें सहकर्मियों से अग्रिम बधाई मिलना आरम्भ हो चुका था। हिंदी दिवस के समारोह के समय आ गया, सब लोग सभागार में एकत्र हुए, अध्यक्ष महोदय ने अंग्रेजी का सहारा लेकर, अपने वाक्य पूरे करते हुए उद्घाटन भाषण दिया और पुरस्कारों की घोषणा हुई। मगर यह क्या! हिंदी प्रेम के कारण एक बार पुनः विद्यापति को निराशा का मुंह देखना पड़ा। इस बार आयोजन समिति ने निर्णय लिया था कि जो लोग हिंदी माध्यम से पढ़े हैं, वे प्रतियोगिताओं से बाहर रहेंगे और पुरस्कार अहिन्दी भाषियों को दिए जायेंगे।

एस० डी० तिवारी



बाबा का प्रवचन

टेलीविजन पर आ रहे, एक कार्यक्रम पर ध्यान गया, जिसमें एक बाबा गेरुआ वस्त्र में, भारी भीड़ के समक्ष प्रवचन कर रहे थे। वे बता रहे थे कि किसी को अपने ऊपर गर्व नहीं करना चाहिए। मनुष्य जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर की इच्छा है, और उसी की कृपा से है, अन्यथा सभी मनुष्य एक जैसे ही हैं। कोई छोटा बड़ा नहीं होता, सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं। मैं भी एक साधारण मानव हूँ, मुझे गुरु तो तुम लोग मानते हो।

अगले ही क्षण बोले, मैं कहीं गया और एक बड़े अधिकारी के यहाँ रुका। लोगों को उस अधिकारी से मिलने के लिए, पहले से समय लेना पड़ता है, घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है। और देखो, मैं उसके घर में रुका हूँ और वह मुझसे नहीं मिल पा रहा है। मुझसे मिलने के लिए वहां भी मेरे भक्त आ गए, और मेरे पूजा पाठ में व्यस्त रहने के कारण, वह अधिकारी तीन घंटे प्रतीक्षा करने के पश्चात् ही मुझसे मिल पाया।

तत्पश्चात मंच पर एक भक्त को खड़ा कर दिया गया जो बाबा की महिमा और उनके चमत्कारों का गुणगान करने लगा।

एस० डी० तिवारी


स्वामीजी के दर्शन

एक बार ट्रैन में यात्रा कर रहा था। सामने वाली बर्थ पर, मेरे एक पुराने परिचित सज्जन विराजमान हुए। एक दूसरे को देख हम दोनों ने आश्चर्य व्यक्त किया। बातचीत आरम्भ हुई तो उन्होंने एक बहुत बड़े स्वामी का नाम लेकर, मुझसे पूछ दिया, आप उनसे मिले हैं।  मैंने ना में  उत्तर दिया तो वो बोले 'पीछे वाली बर्थ पर ही हैं, चलिए मिलवा देता हूँ। '

वैसे तो मैंने उनसे कह दिया, 'मैं बाबा लोगों और डॉक्टरों से कम ही मिलना पसंद करता हूँ, जाने मन में क्या वहम डाल दें।' चूकि उनका देश भर में नाम था, बड़े बड़े मंत्री उनके शिष्य थे, लोग बहुत प्रयास करके भी उनसे नहीं मिल पाते थे और मुझे इतनी सरलता से यह अवसर मिला है, मिलने की उत्सुकता मन में उठी। कम से कम दोस्त मित्रों से तो कहूंगा कि उन स्वामी से मैं भी मिला हूँ। यह सब विचार करते उनसे कह दिया, 'चलो मिल लेते हैं।' जाकर प्रणाम करते हुए, उनके सामने वाली बर्थ पर बैठ गया । मेरे परिचित ने उन्हें मेरा परिचय बताया, तत्पश्चात स्वामी जी ने मुझसे पूछा :
'कहाँ काम करते हैं?'
मैंने बताया।
'आपके संगठन का चेयरमैन कौन है?'
उन्हें बताया।
'उनसे कहना, वे मुझसे मेरे आश्रम में मिलेंगे। उनकी कोई समस्या होगी तो उसका समाधान हो जायेगा। उनके काम काज में या सरकार की ओर से कोई समस्या होगी तो मैं देख लूंगा। आपकी पदोन्नति कब होनी है?'
'पता नहीं।'
'कोई बात नहीं, वे मिलेंगे तो मैं बोल दूंगा। मेरा आश्रम महरौली में है, अपना विवरण लेकर आ जाना।'
मैंने उनका धन्यवाद किया और अपने स्थान पर लौट आया।


खिलौना

शारदा के दिमाग में पैसे का बड़ा गरूर था, वह समझती थी पैसे से कुछ भी कर सकती है। और हो भी क्यों न, उसके पति की लाखों की मासिक आय थी। घर में महंगे से महंगा सामान था, उसे बस इस बात का शौक था उसके घर में जो कुछ हो, सबसे ऊपर हो। एक दिन शारदा की कामवाली अपने दो साल के नन्हें से बेटे को साथ लेकर आ गयी -
'मेम साहब! आज मेरे घर पर कोई नहीं है, मैं इसे साथ लेकर आ गयी।  थोड़ी देर यहीं बैठकर खेलेगा, तब तक मैं काम निबटा लूंगी।'
शारदा का भी तीन साल का बेटा था, वह कामवाली के बेटे के हाथ में खिलौना देखकर, उसे लेने के लिए रोने लगा। कामवाली ने अपने बेटे से लेकर, वह खिलौना उसे देना चाहा तो वह रोने लगा।  अब वह बड़े असमंजस में पड़ गयी, आखिर किसे रुलाये। शारदा यह देख कर बोल पड़ी, 'देख! इसके पास लाखों के खिलौने हैं, एक से एक महंगे और स्वचालित। तू ही जाकर देख ले खिलौनों वाला कमरा, पता नहीं दक्ष को इस फोकट के खिलौने में क्या नजर आ रहा है! कितने तो इससे अच्छे खिलौने कूड़े में फेंक दिए।'
काम वाली अपने बेटे का खिलौना पकड़ाते हुए बोली, 'मेम साहब! अभी बच्चा है, इसे पैसे से खेलना नहीं आता। '

- एस० डी० तिवारी


क्लब का चस्का

गुप्ता जी को मेलबर्न आये एक महीने हो चुके थे। वे अपने बेटे के साथ, उसके एक मित्र के यहाँ गए तो, उसके पिता, मलिक साहब से मुलाकात हुई। परस्पर बातचीत में मलिक जी ने गुप्ता जी से पूछा, 'बच्चे तो काम पर चले जाते होंगे, आप क्या करते हैं ?'
'बस थोड़ा बहुत टहल लेता हूँ, बाकी घर पर ही टी.वी. वगैरह देख लिया या सो गए। '
अरे, आप क्लब क्यों नहीं ज्वाइन कर लेते! आपके घर से बस एक किलोमीटर है और नाम मात्र का शुल्क, मुफ्त हौजी होती है, और तो और निशुल्क चाय काफी भी। मैं तो वहीँ चला जाता हूँ, अपने भारत के कई लोग मिल जाते हैं, समय अच्छा कट जाता है।
गुप्ता जी क्लब के सदस्य बन गए। तंबोला में जीतने पर उन्हें कूपन मिल जाता तो क्लब के रेस्तरां में खाने पीने का जुगाड़ हो जाता।  उन्हें यहाँ आनंद आने लगा। क्लब में गेमिंग मशीन भी लगी थीं।  गुप्ता जी ने सोचा, यहाँ भी भाग्य आजमाएं। उन्होंने मशीन में पैसे डाल बटन दबाना प्रारम्भ किया। आरम्भ में तो कुछ पैसे भी मिल गए, और समय समय पर 'लकी ड्रा'।  उन्होंने सोचा कि अच्छा है, यहीं से पैसे मिल जायँ तो छोटे मोटे खर्च के लिए, बेटे से मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। लेकिन बाद में धीरे धीरे, मशीन पैसा खाने लगी।

एक दिन गुप्ता जी ने थोड़ा अधिक साहस दिखा दिया, स्पष्ट है कि हानि भी अधिक होनी थी। आकर जब बेटे से बताया तो वह अबिलम्ब सौ डॉलर का नोट उन्हें पकड़ाने लगा। गुप्ता जी परिपक्व व्यक्ति थे। उन्होंने पहले ही आत्म मंथन कर लिया था, 'कभी मैं बेटे को ऐसी जगहों पर जाने से रोकता था, उसे पैसे देने से मना करता था और आज मैं अपने बेटे के पैसे लेकर जुआ खेलूंगा! मुझ पर धिक्कार है। '
बोले - 'इसकी आवश्यकता नहीं।'


सोच का बोझ

दोनों की एक ही मंजिल थी और एक ही राह से गुजरना था। एक, लोगों को जब मार्ग में देखता तो सशंक हो जाता, बार बार सोचता, न जाने इनमें से कौन क्या समस्या खड़ी कर दे। जो भी मिलता, राह में वाधा उत्पन्न न कर दें, यह सोचकर बचने का प्रयत्न करता।
दूसरा जब लोगों को देखता तो मन में संतोष व्यक्त करता। चलो मैं अकेला नहीं, यदि कोई समस्या हुई तो कोई न कोई आकर मदद कर ही देगा।
दोनों ही बारी बारी से बिना किसी झंझट के गंतव्य तक पहुँच गए।
पहला तो अपनी सोच का बोझ ढोते थक गया था और विश्राम के उपाय ढूंढने लगा। दूसरा स्वयं को हल्का अनुभव करते अपने आगे के काम में जुट गया।


स्पीड लिमिट

सोचते सोचते पियूष की नयी कार आ ही गयी। उसने निश्चय किया था कि कार में सबसे पहले पापा को बिठाकर मंदिर घुमायेगा। वैसे तो एक मंदिर घर के पास भी था परन्तु सोचा जब कार से जाना है तो किसी बड़े मंदिर चलते हैं। पापा भी वहां तक हो आएंगे और वह कार भी कुछ दूर तक चला लेगा।

पापा से जाकर बोला, ' पापा! कार आ गयी, 'चलिये मंदिर होकर आते हैं। '

पियूष पापा को कार की खूबियां बताने लगा। पापा भी उसकी प्रशंसा कर रहे थे।  देखते ही देखते, कार हवा से बातें करने लगी।

'देखिये पापा! अस्सी के ऊपर जा रही है।  मैं सौ से भी ऊपर की स्पीड में चला लेता हूँ। '

'नहीं बेटा! मुझे तेरी स्पीड नहीं देखनी, तेरी सुरक्षा देखनी है। स्पीड नहीं, स्पीड लिमिट का ध्यान दे।'



काला कौवा - १

इतना बड़ा कौआ और एक नन्हीं सी चिड़िया शोर मचाती उसका पीछा कर रही थी। देखते ही देखते तीन चार चिड़ियाँ और जुट गयीं। कौआ आकर एक मुड़ेर पर बैठा। पीछा करतीं चिड़ियाँ, उस कौए को घात लगाकर चोंच मार रही थीं। कौआ, चुप चाप सब सह रहा था। मैं देख कर चकित था, आखिर कौआ इतना बड़ा होकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है और मार खा रहा है।  संभवतः उसके मन का चोर उसे निर्बल बना रहा था। बेचारी चिड़ियाँ थोड़ी देर चिल्लाकर फिर थक हार कर चली गयीं। कौआ निर्लज्ज की भांति वहीँ बैठा रहा।
उनकी भाषा तो समझ नहीं आ रही थी पर दृश्य देख कर मैं यही समझ पा रहा था कि वे चिल्ला रही थीं  -       'अंडा चोर! अंडा चोर!'
और उससे निष्प्रभावित् कौआ अपनी अगली योजना में तल्लीन था।


काला कौआ - २

एक कौआ जैसे ही आकर डाल पर बैठा, उस वृक्ष की सभी नन्हीं पक्षियों ने उसे घेर कर शोर मचाना प्रारम्भ कर दिया। पहले तो लगा कि जैसे कोई बड़ा नेता आ गया हो और जनता जनार्दन उसे घेरकर जय जय कर रही हो।पर यह क्या! कई तो उसे चोंच भी मार देती थीं।  व्याकुल होकर कौवे को वहां से जाना पड़ा। मेरा तीन वर्ष का नन्हां पौत्र तनय भी यह दृश्य देख रहा था, उसने मुझसे प्रश्न कर दिया, 'दादा जी ! वे चिड़ियाँ कौवे को क्यों भगा दीं ? क्या कौवा काला है, इसलिये ?'
मैं उसका उत्तर देता इससे पहले ही उसकी माँ बोल पड़ी, 'नहीं, उसका काला होना नहीं, उसके मन का काला होना उनमें भय उत्पन्न कर रहा है। वे डर रही हैं, कहीं वह उनके अंडे न चुरा ले।' तनय सोच में पड़ गया।


काला कौवा - ३

एक पेड़ पर, एक कौवा और कुछ चिड़ियां बैठी थीं।  कौवे ने देखा, चिड़ियाँ पेड़ से जातीं और एक एक दाना चुन कर लातीं। उसी में से कुछ अपने खातीं, कुछ बच्चों को खिलातीं। कौवा उन्हें देख हंस रहा था, 'तुम लोग एक एक दाना के लिये कितनी मेहनत करती हो। मेरा देखो, एक ही झपट्टे में पूरी रोटी लाता हूं जिसमें से मेरे खाने के बाद भी बच जाता है और नीचे गिरे हुए टुकड़ों में एकाध चिड़ियों का पेट भी भर जाता है। '
यह कहते कौवा अपने भोजन का प्रबंध करने के लिए उड़ चला।
थोड़ी ही दूर पर उसे एक ढाबा दिखा, जहाँ  खाना खाकर, एक ग्राहक ढाबेवाले को एक हजार का नोट दे रहा था। दुकानदार छुट्टा न होने की बात कहकर उसे लेने से मना कर रहा था। ग्राहक नोट को उसके ठीहे पर रख, दुकानदार से ले लेने का अनुरोध कर रहा था कि इतने में कौवे ने झपट्टा मारा, और नोट लेकर भाग गया। नोट के लाल रंग से उसे खाने के सामग्री का भ्रम हुआ। जाकर, वह वृक्ष की डाल पर बैठ गया।  इस बार चिड़ियों के हंसने की बारी थी -
 'देखो, ये कैसा मूर्ख है, रोटी ले आता तो बैठ कर खाता; कागज ले आया। मेहनत करके भी भूखा रहेगा।'
इतने में कौवे के सर पर एक ढेला लगा और नोट मुंह से छूटकर नीचे गिर गया। ढाबे पर काम कर रहा एक लड़का उसे देखते ही ढेला लेकर पीछे दौड़ा था, नोट वापस ले गया।

- एस० डी० तिवारी

बिजूका

पक्षियों ने तंग कर रखा था, वे सूर्योदय होते ही फसल पर आ जाते और दाने चुगने लगते। वे फसल को सुबह ही अधिक क्षति पहुंचाते थे। बिरजू ने छोटू की ड्यूटी लगा दी कि पाठशाला जाने से पहले, वह एक घंटे खेतों में जाकर पक्षी उड़ाएगा। उसके पास ही बुद्धन का भी खेत था। छोटू, बुद्धन को साथ ले लेता और खेत पर पहुंचकर दोनों 'ह्वा रे ह्वा' चिल्लाने लगते। 'ह्वा रे ह्वा' की आवाज सुनकर पक्षी भाग जाते।  दूर के पक्षियों को भगाने के लिए उन्होंने ढेलवांस बना लिया। ढेलवांस तो उनके लिए आम का आम, गुठलियों के दाम जैसा सिद्ध हुआ। पक्षी भगाने के अतिरिक्त वे इससे खेल भी लेते और निशाना साधने का अभ्यास करते। यह उनके लिए बड़ा आनंदित करने वाला यन्त्र था और स्वयं का निर्मित। फिर भी जब वे पाठशाला चले जाते तो पक्षी थोड़ा बहुत नुकसान कर ही देते।

तभी छोटू को सूझा कि क्यों न बिजूका या डरावन (पक्षियों को डराने वाला पुतला ) बनाकर खेत में गाड़ दें। इससे रात को सियार आदि भी डरेंगे।  यह काम वह अकेले नहीं कर सकता था, अतः बिरजू की मदद लेनी आवश्यक थी। उन्होंने बांस का बिजूका बनाया और खेत में गाड़ दिया। मानव का आकार देने के लिए उसपर एक पुराना कम्बल लपेट दिया गया और एक कमीज पहना दी गयी। बिजूका ने तो बस एक ही दिन अपना कार्य भार निभाया। अगली सुबह जब छोटू खेत में गया तो केवल बांस का डंडा गड़ा था। छोटू घर आकर, दुखी मन से बिरजू को बताया। बिरजू सुनते ही बरस पड़ा, धिक्कार है ऐसे चोरों को, बताओ पुराने वस्त्र तक नहीं छोड़ते। ससुरे डंडा भी क्यों छोड़े !
तभी छोटू ने बिरजू से एक प्रश्न कर दिया, 'पापा! वह चोर कितना गरीब होगा? इस कड़ाके की सर्दी में बिजूका के पुराने वस्त्र चुराने के लिए मजबूर हुआ।' अब बिरजू इसका उत्तर तो क्या, आगे एक शब्द भी नहीं बोल पाया। आगे का जिम्मा भी छोटू को ही निभाना पड़ा।

 
मच्छरों से रोजी रोटी

मोहल्ला समिति के कुछ लोग, शिकायत लेकर, नगर निगम के कार्यालय पहुंचे। तीन चार बाबू चाय की चुस्की लेते गपशप कर रहे थे। केलकर जी ने उन्हें बताया 'महोदय! बहुत मच्छर हो गए हैं, नाली खुली रहती है, उसमे कभी कोई छिड़काव तक नहीं होता, जिस कारण और मच्छर पनप रहे हैं।'
उनमें से एक बाबू ने, मुंह में पान दबाये, तबाक से उत्तर दिया, 'अरे ये तो हमारी रोजी रोटी हैं, मच्छर हैं तभी तो हमारी नौकरी है। ये समाप्त हो गए तो हमें कौन पूछेगा?'
केलकर जी बोले, 'श्रीमान जी! आपकी नौकरी मच्छरों की रोकथाम के लिए है या पालने के लिए? मेरी समझ से तो मच्छरों और आप में से एक को ही रहना चाहिए। यदि इन्हें ही रहना है तो आपको नौकरी से हटा देना चाहिए। वैसे कुछ शर्म है तो स्वयं ही छोड़ देनी चाहिए।'
'अरे, मजाक कर रहा था। जाईये, ठेकेदार को छिड़काव के लिए बोल देंगे। '
'रोजी रोटी से मजाक! जनाब मजाक से नहीं, काम से रोटी मिलती है।' कहकर वे चले गए।


राम की शोभा यात्रा

विजयदशमी के दिन, दिल्ली की एक सड़क से गुजर रहा था।  रास्ता जाम होने के कारण एक ही स्थान पर आधे घंटे तक रुकना पड़ा, कारण रामलीला की शोभा यात्रा। दशहरा देखने गए बिना ही मुझे श्रीराम की शोभा यात्रा देखने को मिल गयी।  जुलुस में सबसे आगे ढोल ताशे वाले, उनके साथ बारात के जैसे नाचते युवक, पीछे ट्रेक्टर ट्राली और टेम्पो का रेला।  बीच में दो तीन बैंड बाजा वाले।  सबसे आगे वाली ट्राली पर डीजे लगा था जिस पर बहुत ऊँची आवाज में गाना बज रहा था 'बेबी को बेस पसंद है।' उसी पर श्रीराम का परिवार बैठा था।
बेस वाली बात का अपने कॉलेज के समय में एक जोक सुन रखा था, जिसे उस समय अश्लील माना जाता था। अब यह गाना बनकर चौराहों पर बजता है और विजयादशमी की शोभा यात्रा में सुनकर तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
आवाज की तीव्रता से कलेजा तक हिल रहा था। श्रीराम और लक्ष्मण जो डीजे के साथ ही चल रहे थे, सम्भवतः किसी दैविक शक्ति से ही उसे सह रहे थे। मैं तो उनकी इस शक्ति से आश्चर्य चकित था। पीछे वाली ट्रालियों पर; किसी पर रावण का परिवार, किसी पर वानरी सेना, किसी पर राक्षसी सेना, किसी पर रामलीला के आयोजक आदि सवार थे।  जुलुस के सबसे पीछे वाले टेम्पो पर लग रहा था, कोई बहुत बड़ा जिम्मेदार समूह बैठा हो क्योंकि कुछ के हाथ में बियर की बोतल भी थी। अपनी जिम्मेदारी के अंतिम छोर पर आकर थकान मिटा रही थी।

शोभा यात्रा के समाप्त होने से पहले गाड़ी आगे बढ़ा पाना असंभव था। कोई और चारा नहीं होने के कारण, गाड़ी में बैठा शोभा यात्रा का आनंद ले रहा था और सोच रहा था कि शायद यही राम राज्य का है।

एस० डी० तिवारी






उसकी कही बात आज तक याद है

दिल की  रजिस्ट्री


प्रोड्यूसर साहेब.


१ जन्म कुंडली
2.आनंद-पथ
3.अवतार
4.रीढ़ की हड्डी
5. पैबन्द
6.ताबीज
7.अनुकरण
8.जीवहत्या
9.तीसरा चित्र
10.पीड़ा


1.बीज का अंकुर
2.सोई आत्मा
3.युग का दास
4.बेपेंदी का लोटा
5.शर-संधान
6.निज स्वामित्व
7.दूषित वातावरण
8.ठोस रिश्ता
9.मौन बर्फ
10.पेट का रिश्ता
सार्थक लघुकथा के प्रमुख मानक - तत्व इस प्रकार है :--
१ - कथानक- प्लॉट , कथ्य को कहने के लिये निर्मित पृष्ठभूमि ।
२- शिल्प - क्षण विशेष को कहने के लिये भावों की संरचना ।
३- पंच - कथा का अंत ।
४- कथ्य - पंच में से निकला वह संदेश जो चिंतन को जन्म लें ।
५- लघुकथा भूमिका विहीन विधा है।
६- लघुकथा का अंत ऐसा हो जहाँ से एक नई लघुकथा जन्म लें अर्थात पाठकों को चिंतन के लिये उद्वेलित करें।
७- लघुकथा एक विसंगति पूर्ण क्षण विशेष को संदर्भित करें ।
८- लघुकथा कालखंड दोष से मुक्त हो ।
९- लघुकथा बोधकथा ,नीतिकथा ,प्रेरणात्मक शिक्षाप्रद कथा ना हो ।
१०- लघुकथा के आकार -प्रकार पर पैनी नजर ,क्योंकि शब्दों की मितव्ययिता इस विधा की पहली शर्त है ।
११- लघुकथा एकहरी विधा है ।अतः कई भावों व अनेक पात्रों का उलझाव का बोझ नहीं उठा सकती है।
१२- लघुकथा में कथ्य यानि संदेश का होना अत्यंत आवश्यक है।
१३- लघुकथा महज चुटकुला ना हो ।
१४- लेखन शैली
१५- लेखन का सामाजिक महत्व