Friday, 22 December 2017

Neev ki int

नींव की ईंट

 'ये लो साहब! नींव खुदकर बिल्कुल तैयार है, लेकिन पंडित जी तो अभी तक नहीं आये,' बिरजू बोला।
'बस आते ही होंगे, ग्यारह बजे का समय दिया था, अभी पांच मिनट ही ऊपर हुए हैं। दस पांच मिनट इधर उधर तो हो ही जाते हैं। जा, चट्टे से पांच नयी इंटें उठाकर यहाँ ले आ। नींव की पूजा हो जाने के बाद मेरे हिस्से में आई  पुरानी ईंटों से नींव भर देंगे।' झबरू पांडेय बोले।
'पुरानी ईंट क्यों साहब? नया मकान बन रहा है तो ईंट भी नयी लगाइये।'
'अरे नया कहाँ, पुराना मकान ही तो गिरवाकर दुबारा बना रहे हैं। जा जल्दी ले आ।'
बगल में खड़ा राज मिस्त्री बोल पड़ा, 'पांड़े बाबा ठीक ही तो कह रहे हैं, वैसी ईंट अब कहां बन रही हैं।  देख कितनी लाल हैं और अभी तक कहीं से एक झिर्री तक नहीं निकली, और वो तो नींव में लगनी हैं।'

'अरे, पंडित जी आ गए। मोहन बेटा, जरा जाओ चाची से पूजा का सब सामान मांग के ले आओ।  उनको बता देना चांदी का नाग अलमारी में रखा है। ...
और विवेक तू जरा आम का पल्लव तोड़ ला ...
आईये पंडित जी, यहाँ सब तैयार है, बस आपकी ही प्रतीक्षा थी।'
'हां, एक और जगह पूजा करनी थी, थोड़ी देर हो गयी।  सब सामान मंगाइये, पूजा आरम्भ करें। '
'बस पंडित जी मोहन लेकर आ ही रहा है।  तब तक आप आसन वगैरह बनाइये।'

'आज से लगभग पच्चीस वर्ष पहले भी मैंने ही यहाँ नींव की स्थापना कराई थी। तब आपके बाबा भी जीवित थे।'
वहीँ खड़े ठाकुर देवनाथ बीच में ही बोल पड़े, 'पंडित जी इस बार जरा ठीक से नींव की स्थापना करना। फिर से न उजड़े।'
पंडित जी भौचक्के ठाकुर देवनाथ का मुंह ताकने लगे, 'हां, मगर यह सब हुआ कैसे ? इतना मजबूत और सुन्दर मकान बना था, कैसे उजाड़ गया ?'
'बस पूछिए मत। कहते हैं न, भाईयों के झगड़े में नींव की ईंट भी फोड़ कर बंटती है। समझिये, ऐसा कुछ यहाँ भी हुआ है।'
'तो बताईये! भला, नींव की पूजा से भाइयों के कुविचार कैसे बदल देंगे।  इसके लिए तो, उन्हें भी मन को शुद्ध और साफ़ रखना होगा, न।'

पंडित जी की और जानने की जिज्ञासा ने, देवनाथ से पूरी कहानी कहलवा दिया ....

'पांड़े बाबा तो सरकारी नौकरी में रहने के कारण, घर कम ही आ पाते थे। उनके सगे भाई, सदानन्द ने विवाह नहीं किया और साधु के जैसा जिंदगी बिताया। वह साधुओं की टोली में इधर उधर घूमता रहता था। झबरू पांडेय जी की पत्नी व  तीनों बेटियां गांव में उनके चचेरे भाइयों गोकुल और मुकुल के परिवार के साथ ही रहती थीं।
पूरे परिवार में, केवल वे ही पढ़े लिखे थे, उस ज़माने में उन्होंने मैट्रिक पास कर लिया था। मैट्रिक होने के कारण उन्हें आसानी से सरकारी नौकरी मिल गयी। दोनों चचेरे भाइयों में से गोकुल पांचवीं तक पढ़ पाया और मुकुल तो दूसरी भी पास नहीं किया। हाँ, कूटनीति की विद्या में दोनों ही झबरू से कहीं बहुत आगे थे। झबरू, परिवार में सबसे बड़े होने और नौकरी करने के कारण, परिवार का पूरा बोझ उठाये रखते थे। नौकरी में होने से, परिवार को उनसे रुपये-पैसों की भी बहुत अधिक अपेक्षा रहती। जब उनके पिता जी जीवित थे, तभी से उनका घर पर नियमित पैसे भेजने का क्रम चला आ रहा था। गोकुल और मुकुल खेती में मंजे हुए थे। उस समय खाद पानी की समस्या तो थी ही, खाने भर अनाज तो पैदा तो हो जाता पर उसमें से बेच भी लें, इतना नहीं होता। घर में नकदी की सभी आवश्यकताएं झबरू ही पूरी करते। झबरू के भेजे पैसे के कारण पुरे परिवार का जीवन स्तर गांव के अन्य लोगों से बढ़िया था। उनके कारण, उस ज़माने में भी इन लोगों का अपना नलकूप और घर पर ट्रैक्टर था।
झबरू, पढाई का महत्त्व समझते थे, इसलिए लड़कियों और भाइयों के बच्चों की पढ़ाई पर जोर देते। वे बेटियों को खूब पढ़ाना लिखाना चाहते थे। मगर, उनके वे चचेरे भाई अपने पुत्रों को तो पढ़ाना चाहते थे, पर यह नहीं चाहते कि लड़कियां पढ़ें लिखें। झबरू के भेजे हुए पैसे, वे घर बनाने और उसके रख रखाव में खर्च कर देते। गोकुल और मुकुल के पुत्र भी पढ़ने में अधिक रूचि नहीं रखते। दोनों के दो दो पुत्र थे। कई प्रयासों के पश्चात्, गोकुल का बड़ा बेटा माध्यमिक परीक्षा पास कर पाया। बाकी सभी तो मैट्रिक भी पास नहीं कर पाए और सभी के सभी बच्चे खेती में ही रह गए।
झबरू ने बड़ी बेटी का विवाह अल्पावस्था में ही कर दिया, किन्तु दोनों छोटी बेटियों को पढ़ाने के लिए साथ शहर ले गए। वे चाहते थे कि उनकी बेटियां आत्मनिर्भर हो जायं। पढ़ लिख लेने से, विवाह के बाद भी ससुराल में उन्हें मान मर्यादा मिलती रहेगी। और हुआ भी वही, बेटियों का विवाह संपन्न परिवार में कर दिया और वे अपने अपने ससुराल में सुखपूर्वक रह रही थीं। इधर बच्चों के बड़े होने के साथ, गोकुल और मुकुल की आवश्यकताएं बढ़ती गयीं, और बात बात पर तकरार होने लगी। दोनों में मनमुटाव निरंतर बढ़ता गया। हमेशा किसी न किसी बात पर खट-पट होती रहती थी, और कई बार तो झगड़े का रूप ले लेती। झगड़े में उनकी पत्नियों की भूमिका भी कम न थी। दोनों खूब बढ़ चढ़ के लड़ लेतीं। उनके बीच झगड़ा होने पर, बड़ी पडाईन तटस्थ रहती थीं। उन्हें दोनों देवरानियों का सम्मान समान रूप से मिलता रहता।'
'लेकिन घर कैसे उजड़ा ?' पंडित जी ने फिर पूछा।
'वही,  चचेरे भाइयों के झगड़ों ने बंटवारा करा दिया। एक दिन दोनों में खूब झगड़ा हुआ और झबरू को खबर भिजवा दिया गया, जल्दी से जल्दी आ जाओ, घर का बंटवारा होना है। झबरू तो संतोषी व्यक्ति थे और उन्हें अधिक की आवश्यकता भी नहीं थी। तब तक बेटियों का विवाह  कर चुके थे, खुद का क्या? मियां-बीबी कहीं भी रह लेंगे। सरकारी नौकरी में थे ही, बुढ़ापे में पेंशन मिलेगी, जिसके साथ रहेंगे, वही सिर पर उठाये रखेगा। उन्होंने वहीँ से सन्देश भिजवा दिया कि गोकुल और मुकुल खेत और घर बांट लें तथा उनका हिस्सा छोड़ दें, जब आएंगे तो देखेंगे।

बंटवारे में गोकुल और मुकुल की बुद्धि समान स्तर पर कार्य करने लगी। अच्छी जमीन तथा नया वाला घर वे अपने हिस्से में ले लिए और दूर के खेत तथा संकरी गली में स्थित पुराना मकान झबरू के हिस्से में आया। नया घर बहुत छोटा था, पर खुल्ले में था और यहाँ बहुत सी जमीन थी। पांड़े बाबा को गली के अंदर वाला मकान यह कहकर दिया कि तुम्हारे पैसे से बना है। यह सुनकर बाबा को इस बात से संतोष हुआ, चलो मेरे दिए पैसे को तो इन्होने महत्त्व तो दिया।
तीनों बेटियां अपने-अपने घर में सुखी थीं। न तो पांड़े बाबा को न ही उनकी पत्नी को अपने हिस्से को लेकर कोई खास दिलचस्पी थी। उन्हें पता था, सेवानिवृत्ति के पश्चात्, गोकुल या मुकुल में से ही किसी के साथ रहना है। जो कुछ हिस्से में आएगा वह सब जिसके साथ रहेंगे, उसे ही सौंप देंगे। वैसे तो सरकारी नौकरी है, पेंशन मिलेगी; उसी से उनका सब काम चल जायेगा। बस ये है, जन्मभूमि छोड़कर, बेटियों के यहां रहने नहीं जायेंगे।'

'लेकिन यह तो सरासर अन्याय है। जो गांव में घर पर नहीं रहता, उसके साथ घर वाले भी बेईमानी करने से नहीं चूकते। जमीन जायदाद का मामला ही ऐसा है। वैसे तो पुस्तैनी जमीन में बेटियों का भी हक़ होता है। उनमें से किसी ने आपत्ति नहीं जताई।' पंडित जी ने पूछा।
'हाँ, बेटियां अपने ससुराल में ही व्यस्त थीं। उन्हें इधर ये सब देखने की फुरसत कहाँ थी। और तब भी इन्हें कहाँ संतोष हुआ। नये मकान में केवल दो ही कमरे बने थे और पुराने दो मंजिले मकान में सात-आठ कमरे थे। गोकुल और मुकुल ने यह कहकर की बहुओं के लिए, अंदर वाला मकान अधिक उचित है; एक-एक कमरा उसमें भी कब्जिया लिया। झबरू को इसमें भी कोई आपत्ति नहीं हुई। वैसे भी मकान में कोई नहीं रहेगा तो भूत का डेरा हो जायेगा। अच्छा ही है, ये लोग रहेंगे तो कम से कम चहल-पहल रहेगी और साफ़ सफाई होती रहेगी। बेटियों में से भी कोई आयेगा तो घर में चहल पहल रहेगी।'
'अच्छा! भला बताओ!'
'अब झबरू के सेवानिवृत्ति का समय समीप आ गया। गोकुल और मुकुल को चिंता सताने लगी कि कहीं झबरू घर वापस आयें तो पुराना घर छोड़ने को कह दें।  और तो और, उन्हें यह भी डर था कि कहीं आगे चलकर, झबरू अपना मकान बेटियों को न दे दें। गोकुल ने चाल चली और बोला, पुराने मकान में बहुत अधिक ईंटें लगी हैं।  नए वाले मकान से लगभग छः-सात गुना, इसलिए आधे मकान की ईंट उखाड़ ली जायें और उन्हीं ईंटों से अपने हिस्से के मकान में कुछ और निर्माण कार्य करवा लें। गोकुल और मुकुल ने मिलकर, यह प्रस्ताव झबरू के समक्ष रखा। झबरू इस प्रस्ताव से बहुत खिन्न हुए। उन्होंने कहा, यही करना था तो तुम लोग वो पुराना मकान भी अपने पास ही रखते। मैं बाहर सहन में अपने लिए एक कमरा बनवा लेता। हमें तो बस दो मुर्गी को रहना था, इतना बड़ा मकान क्या करना था। खैर, वो दो भाई और भरा पूरा परिवार और इधर पांड़े बाबा अकेले, उनको साथ रखे बिना इनका काम कैसे चलता। वो जो कहते गए, ये हाँ करते गए।

अंततः, इन सब बातों से क्षुब्ध, झबरू ने कह दिया पूरा मकान ही उजाड़ दो, वे अपने रहने के लिए गांव से सटे अपने खेत में मकान बनवा लेंगे। फिर क्या था शेर और ऊंट वाली कहानी हो गयी। वे दोनों भाई घर उजाड़ने के लिए टूट पड़े। देखते ही देखते वह आलीशान मकान खंडहर में बदल गया। घर में लगी आधी से भी अधिक ईंटे उखड़ कर बाहर आ गयीं। सारा गांव तमाशा देख रहा था। घर को उजड़ते दुःख तो सभी को हो रहा था पर किसी को समझाने बुझाने, आगे कोई नहीं आया। गोकुल और मुकुल के ससुराल वालों को पता चला तो वो भी बड़े दुखी हुए। वे लोग रिश्तेदारी करने आते थे तो उन्हें इतना बड़ा मकान देखकर बड़ा गुमान होता था और इसमें उठ बैठ कर बहुत आनंद आता था। वे अपने-अपने गांव में भी अपनी बहनों के घर की प्रशंसा करते नहीं अघाते थे कि उनकी बहन का विवाह कितने बड़े घर में हुआ है। वे चाह कर भी कुछ नहीं बोल पा रहे थे, क्योंकि यह उनके ही बहन के हित की बात थी; उन्हें अपना मकान बनाने के लिए ईंट जो मिल रही थी।
पांड़े बाबा सेवानिवृत्त होकर, गांव से सटे खेत में, अलग घर बनवा कर रहने लगे। भीतर वाले खंडहर में तो वे झांकने भी नहीं जाते। बची खुची ईंटे वहीं रखवा दिए थे। अपने नए मकान में उसमें से एक ईंट भी नहीं लगवाए। इनका खाना पीना गोकुल के ही साथ होने लगा। इनके लिए गोकुल के यहाँ से भोजन बनकर आ जाता। अब गोकुल के परिवार से पांड़े बाबा का प्रेम बढ़ गया था। धीरे-धीरे अंदर वाले मकान पर गोकुल के परिवार का पूरा अधिपत्य हो चुका था।
अब गोकुल के दूसरे बेटे का विवाह होने वाला है। नए घर में स्थान कम होने के कारण, बड़ी वाली बहू पहले ही त्रासदी सह रही है। गोकुल ने सोचा कि अंदर वाले मकान को थोड़ा ठीक करा लिया जाय और चारों ओर  चारदीवारी खड़ी कर दी जाय तो कम से कम, बहुएं वहीँ रह लेंगी। अब गोकुल बहुत पछता रहा था, काश! वो घर उजड़ा नहीं होता तो बहुएं कितने सुख से रह रही होतीं। यह सब उसी के कारण हुआ। उसे क्या पता था, बड़े भइया उसी के साथ रहेंगे और यह सब उसे ही मिल जायेगा।

पांड़े बाबा, गोकुल के छोटे बेटे सोनू को बहुत प्यार करते हैं। सोनू भी इनकी बहुत सेवा करता है। उनके चारपाई, विस्तर से लेकर, पैर दबाने तक का काम भी नियमित रूप से करता है। इसकी शादी को लेकर, झबरू जी बहुत उत्साहित हैं। उनकी प्रबल इच्छा है कि शादी से पहले यह मकान नए सिरे से बन जाय। नये सम्बन्धी देखें तो कहें कि किस घर में हमने बेटी दी है और नई दुल्हन की डोली भी इसी घर में उतरेगी। उन्होंने देर किये बिना ईंटे गिरवा दी हैं। पांड़े बाबा की छोटी बेटी ने कहा भी, जब वहां रहना ही नहीं तो पापा नए सिरे मकान क्यों बनवाने जा रहे हैं। पांड़े बाबा ने उसे समझा लिया, बेटा! हमें रहना इनके ही साथ है, ये सुख से रहेंगे तो हमें भी सुख मिलेगा। गोकुल सोचता अवश्य है, पर वश की कहाँ  कि वह मकान बनवा ले। अब तो वह मन ही मन बहुत पछताता है, कि उसी के कारण इतना बड़ा और सुंदर मकान उजाड़ दिया गया।  उसे पता होता कि यह उसी के काम आना है तो एक ईंट भी टस से मस नहीं होने देता।
अब तो यही देखना है की यह नींव की ईंट कितनी मजबूत है और इस पर खड़ी ईमारत कितना आलीशान होगी।'
'हाँ, सही कह रहे हैं ठाकुर साहब ! भाई तो अगली पीढ़ी में भी होंगे। उनकी कैसी बुद्धि होगी, यह तो इसी पर निर्भर करेगा न।'