Tuesday, 17 May 2016

Matrimonial

मैट्रिमोनियल

सौम्या ने अख़बार में पढ़ा 'बधू चाहिए'। लड़का उसी की जाति का है, उसका कनाडा में अपना कारोबार है। अब वह अनिवासी भारतीय है तथा उसे कनाडा की नागरिकता मिल चुकी है। सौम्या के मन में विदेश जाने की ललक पहलुए से ही थी, उसे लगा कि विदेश जाने का इससे अच्छा अवसर कहाँ मिलेगा। उसने, अख़बार का वह पृष्ठ खोलकर, मेज पर इस ढंग से रख दिया कि उसके पापा की दृष्टि उस पर पड़े। इस बात को सीधे पापा से कहने में उसे संकोच हो रहा था।
अख़बार रखकर वह निर्मला के यहाँ चली गयी। निर्मला उसकी घनिष्ठ सहेली थी।  सौम्य ने उससे इस बात की चर्चा की तो निर्मला ने सलाह दिया, 'किस्मत आजमाने में क्या जाता है। यदि लड़का विदेश में है तो बड़ी अच्छी बात है।  सुना है तुझे लोगों की आमदनी बहुत अधिक होती है, लोग ऐश की जिंदगी जीते हैं। और तू जाएगी तो हमें भी घूमने को मिलेगा।'
'हां, पहले तू घूमकर आ जा, तब आगे की बात करते हैं। उसके बारे में ठीक से पता कर लियो। जब तू ठीक कहेगी तभी आगे की बात करेंगे। '
दोनों जोर के ठहाके लगाकर, हंसने लगती हैं।
निर्मला फिर बोली, 'सही कह रही है, इस तरह के मैट्रिमोनियल में कई बार धोखा भी हो जाता है। भाई ठीक से जाँच परख के ही कोई कदम उठाना।'
सौम्या जब लौटकर आई तो उसके पापा अखबार लेकर ही बैठे थे। उसकी युक्ति काम कर गयी थी। वे वही पृष्ठ  पढ़ रहे थे जिसे वह पढ़ाना चाहती थी। घर में घुसते ही उसके पापा बोले,
'बेटा सौम्य! देखो मैट्रिमोनियल में एक विज्ञापन आया है, सब ठीक ठाक तो लग रहा है। लड़का यहीं अपने पंजाब का रहनेवाला है, कनाडा का नागरिक हो चुका है, अच्छी आमदनी है।'
'पापा, जो आप लोग ठीक समझें।' 
 इतने में सौम्या की माँ भी आ जाती है। सौम्या के पापा अख़बार उसकी और बढ़ाते हैं, 'देखो सुकेशी, यह सौम्य के लायक अच्छा मैच लग रहा है। '
सुकेशी अख़बार ले लेती है, और पढ़कर, अपनी आशंकाओं  से अवगत कराती है, 'लड़का विदेश में हैं, न जाना न सुना, पता नहीं कैसा होगा, उसका चाल चलन, उसकी आदतें, नशेड़ी है, जुआरी है।'
'अरे नहीं, लुधियाना के पास का ही रहने वाला है, उसके पिंड से पता करवा लेंगे।'
मेहरा जी ने उसके गांव से पता लगवाया तो पता चला  कि रोहन के पिता पंजाब मूल के थे। वे एक अच्छे व्यक्ति थे। पहले लुधियाना में एक दुकान किये। पर बाद में कनाडा चले गए। रोहन का जन्म वहीँ हुआ था। वह क्या करता है, यह किसी को नहीं पता।  
काफी सोच विचार कर मेहरा जी ने सौम्या का विवरण भेज दिया। मेहरा जी की वित्तीय स्थति बहुत अच्छी नहीं थी। उन्होंने सोचा कि यह रिश्ता तय हो जाता है तो वे बिना दान दहेज़ की शादी कर लेंगे और सौम्या सीधे कनाडा जाएगी। मेहरा जी को यह पता था कि अमेरिका और कनाडा में नागरिक अधिकार अपने यहाँ से अधिक मजबूत हैं। वैसे भी सौम्या पढ़ी लिखी है ही, हर स्थिति से निपटना जानती है। 
काफी विचार मंथन कर, सौम्या का विवरण और फोटो भेज दिया गया और बहुत अधिक समय लगे बिना वहां से स्वीकृति भी आ गयी। अब  फेस बुक पर चैटिंग और फोन से वार्तालाप भी शुरू हो गयी। सौम्या रोहन से काफी प्रभावित थी। शादी का दिन पक्का हुआ। रोहन इंडिया आया और अपने कुछ रिश्तेदारों व मित्र आदि को एकत्र किया।  सौम्या से उसकी शादी हो गयी।  विवाह के पंजीकरण के बाद दोनों कनाडा चले गये। सौम्या के पति के कनाडा का नागरिक होने के कारण उसे भी वहां की नागरिकता मिल गयी। 

कनाडा में जाकर सौम्या को तो लगा कि वह स्वर्ग में ही आ गयी है। साफ सुथरी जगह, बड़ा सा घर, गाड़ी, व्यवस्थित जीवन, सब कुछ उसकी सोच से ज्यादा। एक वर्ष कैसे निकल गया, पता ही नहीं चला। घूमना फिरना, रेस्तरां में खाना उसे बहुत अच्छा लगता। एक साधारण परिवार की होने के कारण, उसे पैसे काम मिलते और इन सबके लिए कई बार मन मरना पड़ता। सौम्या दिन में अकेले बोर होती, एकाध बार तो अपनी मां से बात कर लेती, बाकी समय या तो टेलीविजन देखती या सोती । उसने सोचा कि वह इंग्लिश ऑनर्स है, क्यों न कोई जॉब ढूंढ ले। जब उसने यह बात रोहन से कही, तो वह साफ मना कर दिया।

धीरे धीरे दोनों की शादी को एक वर्ष बीत गए। सौम्या जब भी जाब की बात करती, पता नहीं क्यों रोहन उसे मना कर देता। एक दिन सौम्या के लिए एक कागज का टुकड़ा क़यामत लेकर आया, वह था कोर्ट का नोटिस। 
रोहन ने कोर्ट में सौम्या से तलाक की याचिका डाल दी थी। अब तो सौम्या के पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी।  वह परदेश में क्या करेगी, कैसे रहेगी? या फिर वापस इंडिया? रोहन के इस आचरण से वह हत प्रभ थी। विदेश में उसकी कोई मदद करने वाला भी नहीं। ऐसा भी हो सकता है, वह कभी सोच भी नहीं सकती थी। फिर भी वह हिम्मत वाली लड़की थी, उसने सोचा अभी वह अपने मम्मी पापा को नहीं बताएगी और परिस्थिति से लड़ेगी। अंग्रेजी बोलने में उसे समस्या नहीं थी और उसने एकाध मित्र भी बना लिया था। अब तो वह रात दिन एक करके जॉब ढूंढने लगी और तीन दिन बाद ही उसे एक जॉब मिल गयी। उसने ठान लिया कि चाहे कुछ हो जाये, वह अपने पांव वहां जमा के रहेगी। 

एक दिन, एक शॉपिंग माल में उसकी मुलाकात एक और भारतीय लड़की नीलम से हुई।  बात चीत से पता चला की नीलम भी रोहन की भूतपूर्व पत्नी थी, जिसे वह तलाक दे चुका था। रोहन यही काम करता था इंडिया से शादी करके लड़की ले जाता और वहां जाकर तलाक दे देता। उसे नई नई लड़कियों के साथ समय बिताने का शौक था। सौम्या को इस बात की तनिक भी भनक नहीं थी कि वह उसकी तीसरी पत्नी है। नीलम से उसकी मित्रता हो गयी और उसके घर आना जाना शुरू हो गया। इधर कोर्ट से नोटिस के उत्तर में सौम्या जज के सामने पेश होकर बोल दी रोहन जीवन भर साथ देने का भरोसा देकर शादी किया। यह तलाक तो उसके साथ सरासर धोखा है। रोहन ने उसे कोई काम भी नहीं करने दिया। वह कनाडा के लिए नई है और तुरंत कुछ करने में सक्षम नहीं है, अतः उसे रोहन से मुआवजा दिलाया जाय। कोर्ट ने तलाक तो मंजूर कर लिया, मगर उसके जीवन यापन हेतु, रोहन को दो लाख डॉलर देने का आदेश दे दिया।
नीलम का भाई एक कंपनी में बड़ा अधिकारी था। उससे पता चला कि उसकी कंपनी में सौम्या के प्रोफाइल की जॉब निकली है। सौम्या का वहां पर चयन हो गया और उसने कंपनी बदल ली । अब सौम्या की परेशानी समाप्त हो चुकी थी। वह अपने नाम के अनुकूल ही सौम्य स्वाभाव की थी। नीलम के भाई कार्तिक को वह बहुत अच्छी लगती थी और उससे प्यार हो गया। दोनों ने विवाह कर लिया।  
उधर रोहन ने बिना सोचे समझे तलाक का कदम उठा तो लिया पर उसे सौम्या का व्यव्हार इतना पसंद था कि उसके लिए दिन रात तड़पता था। पर अब वह क्या कर सकता था, उसका भण्डा फूट चुका था। सौम्या और नीलम ने ठान लिया कि वे रोहन को, और किसी लड़की को उसके जाल में नहीं फंसने देंगी। अब रोहन को अकेले ही रहना था। वह अपने किये पर पछताने के अलावा कर भी क्या सकता था। 


Friday, 13 May 2016

Purani kitab

पुरानी किताब - १

पंडित रामधन के पास खेत तो था, पर सारी खेती अनुकूल बारिश पर निर्भर करती। खेत से खाने भर को बड़ी मुश्किल से पैदा होता। घर के छोटे मोटे सामान अनाज के बदले ही आते थे। घर के बच्चों तक को मन मार के रहना पड़ता। कपड़ा लत्ता भी एकाध साल बाद ही नया बन पाता। बेटे को पढ़ाने लिखाने के लिए पैसे नहीं होते। सरकारी स्कूल की फीस तो नाम मात्र की होती पर कापी किताब खरीदने में भी कोताही थी। किताब के लिए रिश्तेदारियों के बच्चे ढूंढे जाते। बड़े बेटे से अगली कक्षा में किस रिश्तेदार का बच्चा पढता है, उससे पहले ही बोल दिया जाता था कि किताबें सम्भाल के रखना, अगली साल बिटवा को चाहिए होगी।

बिटवा छठीं में आ गया था, पंडित जी ने जिस रिश्तेदारी में किताब के लिए बोला था, वह फेल हो गया। अब वे बड़ी परेशानी में पड़ गए। आखिर किताब के लिए क्या करें! पैसे तो थे नहीं, कि खरीदें। बिटवा पढ़ने में बहुत तेज था। कक्षा में प्रथम तीन में ही स्थान रखता था, मगर किताब के बिना कैसे पढ़ेगा। पहले तो सोचे उधार पायींच करके खरीद दें, मगर पंडित जी ने दिमाग दौड़ाया तो उनको याद आया कि उनके मामा की लड़की यानी ममेरी बहन का लड़का भी इसी वर्ष छठी कक्षा से उत्तीर्ण हुआ है। बहनोई जी जिला मुख्यालय के एक कॉलेज में लेक्चरर थे। रामधन ने सोचा, चलें उनसे एक बार किताब के लिए कहें मगर हिम्मत भी नहीं हो रही थी, बड़े लोग हैं पता नहीं बात का मान रखेंगे या नहीं, ना कर दिया तो बेइज्जती होगी और साथ में दुःख। मगर और कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा था। उन्होंने सोचा एक बार देख लेने में कोई हर्ज नहीं, ना कर देंगे तो देखा जायेगा। एक दिन थोड़ी लइया भूजा लेकर, वे ममेरी बहन के यहां चले गए। दीदी के यहां पहुंचते ही बड़े होने के लक्षण दिखने लगे थे। रामधन का केवल पानी पिलाकर स्वागत किया गया, क्योकि चाय बनाने में श्रम और शरबत बनाने में चीनी खर्च होती। वही अगर वो पंडित रामधन के यहाँ आते तो निर्धन होते हुए भी वह शरबत के साथ भूजा भी देते। उस समय गांव में चाय का फैशन नहीं था। 

खैर, रामधन ने अपनी बात बहन के सामने रख दी। कंप्यूटर की तरह उनको उत्तर मिला, 'इस साल बेटी पांचवी में है, अगली साल छठी में जाएगी, बेटे की सारी किताबें उसके लिए सम्भाल कर रख दी हैं।'
रामधन ने कहा अगली साल वह सभी किताबें वापस कर देगा, तो बहन का कहना था कि वे पहले ही पुरानी हैं, एक साल में और पुरानी हो जायेंगी, फिर पढ़ने लायक कहाँ रह जाएँगी! बेटी वैसे ही बड़ी नखरेवाली है, ज्यादा फटी पुरानी किताब से वह पढ़ेगी ही नहीं।

लौट के बुद्धू घर को आये। अब तो बिटुआ को बिना किताब के ही स्कूल जाना पड़ता। शुरू में एकाध दिन डांट पड़ी, पर बिटुआ के अध्यापक ने परिस्थिति का बोध होते ही साथ बैठने वाले छात्र के साथ, साझे में किताब पढ़ने की व्यवस्था करवा दिया।


 - एस० डी० तिवारी

पुरानी किताब - २

बिरजू ही पंडित रामधन के खेतों का सारा काम करता था। बदले में थोड़ा सा खेत उसे दे दिया गया था और पंडित जी के खेत में पैदा हुए अनाज में से थोड़ा बहुत मजदूरी के रूप में ले जाता था, जिससे उसके परिवार का पेट पलता था। वह एक दलित भूमिहीन था, गांव में रोजगार के और कोई साधन नहीं थे, इसलिए उसके परिवार की निर्भरता रामधन पर ही थी। उसका छोटा भाई सिरजन, कलकत्ता, किसी मिल में काम करता था। वह बचपन में ही कलकत्ता चला गया था। उसने अपना घर बिरजू से अलग बनवा लिया था। अपने मोहल्ले में उसका घर सबसे सुन्दर दिखता था। उसका परिवार गांव के किसानों पर आश्रित नहीं था। कलकत्ता से पैसा आता था और वे ठीक ठाक से रहते थे। सिरजन के बेटे को कॉपी किताब का कोई अभाव नहीं था। 

बिरजू की पत्नी रमौती, अधिकतर पंडित जी के यहाँ आती और उनकी पत्नी के काम में हाथ बंटा देती थी। बदले में कुछ खाने पीने को मिल जाता। कभी कभी, घर ले जाने को, बचा खुचा खाना भी मिल जाता। एक दिन रमौती आई तो बिटुआ को देखकर पूछ दी, बिटुआ किस कक्षा में है? जब उसे पता चला छठी में तो चौंक कर बोली, अरे सिरजन का बेटा सातवीं में है। पंडित रामधन और उनकी पत्नी समझे  कि वह अपने परिवार को ऊँचा दिखाना चाहती है कि उसके घर के बच्चे पढ़ने में इनसे आगे हैं। पंडित रामधन थोड़ा ऐंठ कर बोले, 'तो हम क्या करें।'  

'अगली साल उसकी किताबें, बिटुआ के काम आ जाएँगी। कहें तो, अभी से बोल के रखूं। हमारे पास पड़ोस और रिश्तेदारी में इस साल और कोई छठी में नहीं है।'

पंडित जी को अपनी ममेरी बहन याद हो आई जिसने अपने बेटे की पुरानी किताब भी देने से मना कर दिया था।  वे रमौती की ओर अवाक् कुछ देर देखते रहे।


   एस० डी० तिवारी



पुरानी किताब  - ३

आठवीं कक्षा तक बिटुआ गांव में पढ़ा। उसके चाचा सदानन्द दिल्ली रहते थे। सदानंद ने रामधन से कहा बिटुआ को उसके साथ दिल्ली भेज दें, वहां पढ़ाई लिखाई का अच्छा माहौल है, पढ़ लिख जायेगा। रामधन को भी यह बात अच्छी लगी।  गांव में तो खेल कूद में ही लगा रहेगा और बच्चों के साथ बिगड़ जायेगा। बिटुआ अपने चाचा के साथ दिल्ली आ गया। उसके चाचा ने एक सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में उसका नाम लिखवा दिया। अब फिर से किताब की समस्या आई। नई किताबें बहुत मंहगी थीं और किसी से जान पहचान भी नहीं थी कि पुरानी मांग कर काम चलाये। उसके चाचा उसे समझाते कि शहर का खाने पीने का ही खर्च बहुत होता है, ऊपर से पढ़ाई का खर्च। यह वेतनभोगी के लिए बहुत बड़ा भर है इसलिए कोशिश करके, अन्य लड़कों से दोस्ती कर ले ताकि कम से कम किताबों का तो बंदोबस्त हो जाय। चलो, आने जाने का तो बस का सस्ता पास बन जायेगा। 

उसे साथ पढ़ने वाले बच्चों से किताबें तो नहीं मिलीं पर एक रास्ता मिल गया, लड़कों ने बताया कि नई सड़क से पुरानी किताबें खरीद ले। वहां आधे दाम पर ही किताबें मिल जाती हैं। नयी सड़क की बाजार देख बिटुआ को बड़ा आश्चर्य हुआ और अपना गांव याद आ गया। गांव में तो पुरानी किताबें मांगने पर मुफ्त में ही मिल जाती थीं, और यहाँ पुरानी किताबों का बाजार लगा है। उसने कुछ जरूरी किताबें वहां से खरीद लीं। एकाध तो साथ के बच्चों से मांगकर काम चला लेता। जिसदिन किसी बच्चे को उस विषय का काम नहीं करना होता, वह उससे किताब मांग कर ले जाता और अपना काम कर लेता। 

कई बार बच्चों द्वारा बहाना का सामना भी करना पड़ता। इन घटनाओं से क्षुब्ध, बिटुआ ने ठान लिया कि वह अपने बच्चों को कभी किताब का अभाव नहीं होने देगा। खुद बेशक पुरानी किताबों से पढ़ रहा है, मगर वह इस लायक बन कर रहेगा कि उसके बच्चे किताब के लिए न तरसें। उसका परिश्रम रंग लाया माध्यमिक परीक्षा बड़े अच्छे अंकों से उत्तीर्ण किया। आगे ग्रेजुएशन में तो पुस्तकालय की सुविधा भी मिल गयी थी। 

बिटुआ का बेटा नई किताबें लेकर अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ने जाता है। पंडित रामधन पैसे की बड़ी तंगी देख चुके थे, अब बिटुआ उनके लिए हर महीने कुछ पैसे भेज देता है।  


एस० डी० तिवारी


पुरानी किताब - ४

बिटुआ अब विवेक पांडेय था। दरिया गंज में पटरी पर लगी पुरानी किताबों के बाजार में विवेक को एक  किताब दिख गयी। दाम पूछा तो, मात्र बीस रुपये। बिटुआ ने तुरंत बीस का नोट निकाला और उस पुस्तक को उठा लिया। वैसे, अब उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी। परंतु उसके लिए इसका प्रसंग एक पुरानी घटना से जुड़ा था। जब वह पढता था तो बहुत महँगी होने के कारण वह मनोविज्ञान की यह पुस्तक खरीद नहीं पाया था। पुस्तकालय से वह पुस्तक उसे काफी प्रतीक्षा के पश्चात् मात्र पंद्रह दिन के लिए मिल पायी थी। केवल पंद्रह दिन में वह उस पुस्तक से क्या कुछ कर पाता? किसी तरह थोड़ा बहुत नोट बना पाया था। आज वह पुस्तक उसे लगभग मुफ्त में मिल रही है।
वह उस पुस्तक को घर लाकर समझ पाया कि अभी भी उसके लिए कितनी मूल्यवान है। पढ़ाई के समय जिस ज्ञान से वह वंचित रह गया था, उसकी पूर्ति अब हो रही है। उसे एहसास हुआ कि यह पुस्तक उसकी एक बहुत पुरानी संगिनी है, जिससे वह अब तक दूर रह रहा था।


पुरानी किताब ५

विवेक को मुंशी प्रेम चंद की कहानियां पढ़ने का शौक था। एक बार वह दरियागंज पुरानी पुस्तकों के बाजार में घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक किताब पर पड़ी। यह वही किताब थी जिसके लिए उसने कभी नई सड़क छान मारी थी। किताब जर्जर अवस्था में थी। उसका जिल्द तक भी नहीं था। खैर प्रेम चंद की कहानियों की मनपसंद किताब थी, उसने बिना अधिक सोचे उसे खरीद लिया।

घर लाकर, उसने किताब को मेज पर रख दिया और किसी काम से बाहर चला गया। उसके जाने के पीछे कबाड़ी वाला आ गया। उसकी उनकी पत्नी ने अखबार की रद्दी के साथ उस किताब भी दे दिया। विवेक जब लौट कर आया तो पढ़ने के लिए वो किताब ढूंढने लगा। नहीं मिली तो, शालिनी से पूछा 'मेज पर एक किताब रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'एक फटी पुरानी सी किताब पड़ी तो थी मैंने तो उसे रद्दी में बेच दिया।'
अब तो विवेक के अफ़सोस का ठिकाना न रहा। इतनी मेहनत से ढूंढकर लाया था और वह रद्दी में चली गयी। वो भी मुंशी प्रेम चंद की किताब। अब मुंशी प्रेम चंद ये कदर रह गयी है!
खैर, उसने सोचा, अगले रविवार को एक बार फिर से प्रयास करेगा, इतने बड़े पुस्तकों के भंडार में शायद एक और किताब हो। रविवार को वह दरियागंज पहुँच गया। पहले तो वह उसी दुकान पर गया, 'भाई मैं एक प्रेम चंद की कहानियों की पुस्तक ले गया था, मुझे एक और चाहिए।'
'अरे साहब यहाँ एक शीर्षक की दो किताबें तो मुश्किल से ही मिलती हैं। ढूंढ लीजिये, शायद किसी  के पास मिल जाय।'
विवेक पटरी बाजार का चक्कर लगा रहा था कि एकाएक एक दुकान पर, एक ग्राहक के हाथ में वही किताब देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ।  'भाई साहब ! यह किताब नहीं ले रहे हों तो मैं ले लूँ।'
नहीं भाई अभी देख रहा हूँ, मेरे काम की लग रही है, बेटा हिंदी से एम० ए० कर रहा है। उसे चाहिए।
जब उस व्यक्ति ने दाम पूछा तो दुकानदार बोला १०० रुपये।
तबतक विवेक की दृष्टि उस पुस्तक पर लगे एक चिन्ह पर पड़ गयी। यह तो वही पुस्तक थी जिसे वे पिछली बार ले गया था। वह बड़ा हैरान हुआ, इतनी जल्दी वह पुस्तक फिर से इस बाजार में कैसे आ गयी।
दाम सुनकर, विवेक बोला, 'पिछली बार तो मैं यहीं से ४० रुपये में ले गया था।'
दुकानदार बोला, 'बाबूजी, इसकी छपी कीमत तो तीन सौ रुपये है। बाकी तो ग्राहक के जरूरत के हिसाब से दाम।कभी ग्राहक छपे मूल्य से भी अधिक दाम देने को तैयार हो जाता है।'










पुरानी किताब

बिटवा यानि केदारनाथ, एडवोकेट अपनी साठ की उम्र पार कर, जिंदगी के दूसरे छोर पर पहुँच चुके हैं। वे अपने जीवन से जुड़े, पुरानी किताब के इन सात प्रसंगों को कभी नहीं भूल पाते।

प्रथम 
पंडित रामधन के पास थोड़ा बहुत खेत था और सारी खेती अनुकूल बारिश पर निर्भर करती। खेत से खाने भर को बड़ी मुश्किल से पैदा होता। किसी तरह से काम चल जाता था। घर के छोटे मोटे सामान अनाज के बदले ही आते। बच्चों तक को अपनी जरूरतों के लिए मन मार के रहना पड़ता। कपड़ा लत्ता भी एकाध साल बाद ही नया बन पाता। बेटे को पढ़ाने लिखाने के लिए पैसे नहीं होते। सरकारी स्कूल की फीस तो नाम मात्र की होती पर कापी किताब खरीदने में बड़ी कोताही थी। किताब के लिए रिश्तेदारियों के बच्चे ढूंढे जाते। बड़े बेटे से अगली कक्षा में किस रिश्तेदार का बच्चा पढता है, उससे पहले ही बोल दिया जाता कि किताबें सम्भाल के रखना, अगले साल बिटवा को चाहिए होगी।

बिटवा छठीं में आ गया था, पंडित जी ने जिस रिश्तेदारी में किताब के लिए बोला था, वह फेल हो गया। अब वे बड़ी परेशानी में पड़ गए। आखिर किताब के लिए क्या करें! पैसे तो थे नहीं, कि खरीदें। उस समय सरकार की ओर से भी कापी किताब की कोई योजना नहीं थी। बिटवा पढ़ने में बहुत तेज था। कक्षा में प्रथम तीन में ही स्थान रखता, मगर किताब के बिना कैसे पढ़ेगा। पहले तो सोचे उधार पायींच करके खरीद दें, मगर पंडित जी ने दिमाग दौड़ाया तो उन्हें याद आया कि उनके मामा की लड़की यानी ममेरी बहन का लड़का भी इसी वर्ष छठी कक्षा से उत्तीर्ण हुआ है। बहनोई जी जिला मुख्यालय के एक कॉलेज में लेक्चरर थे। रामधन ने सोचा, चलें उनसे एक बार किताब के लिए कहें, मगर हिम्मत भी नहीं हो रही थी। बड़े लोग हैं पता नहीं बात का मान रखेंगे या नहीं, ना कर दिया तो बेइज्जती होगी और साथ में दुःख। मगर और कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा था। उन्होंने सोचा एक बार देख लेने में कोई हर्ज नहीं, ना कर देंगे तो देखा जायेगा। एक दिन थोड़ी लइया और गुड़ लेकर, वे ममेरी बहन के यहां चले गए। दीदी के यहां पहुंचते ही बड़े होने के लक्षण दिखने लगे थे। रामधन का केवल पानी पिलाकर स्वागत किया गया, क्योकि चाय बनाने में श्रम और शरबत बनाने में चीनी खर्च होती। वही, अगर वो पंडित रामधन के यहाँ आते तो निर्धन होते हुए भी वह शरबत के साथ भूजा भी देते। उस समय गांव में चाय का फैशन नहीं था। 

खैर, रामधन ने अपनी बात बहन के सामने रख दी। कंप्यूटर की तरह उनको उत्तर मिला, 'इस साल बेटी पांचवी में है, अगली साल छठी में जाएगी, बेटे की सारी किताबें उसके लिए सम्भाल कर रख दी हैं।'
रामधन ने कहा अगली साल वह सभी किताबें वापस कर देगा, तो बहन का कहना था कि वे पहले ही पुरानी हैं, एक साल में और पुरानी हो जायेंगी, फिर पढ़ने लायक कहाँ रह जाएँगी! बेटी वैसे ही बड़ी नखरेवाली है, ज्यादा फटी पुरानी किताब से वह पढ़ेगी ही नहीं।

लौट के बुद्धू घर को आये। अब तो बिटुआ को बिना किताब के ही स्कूल जाना पड़ता। शुरू में एकाध दिन डांट पड़ी, पर बिटुआ के अध्यापक ने परिस्थिति का बोध होते ही साथ बैठने वाले छात्र के साथ, साझे में किताब पढ़ने की व्यवस्था करवा दिया।


द्वितीय

बिरजू ही पंडित रामधन के खेतों का सारा काम करता था। बदले में थोड़ा सा खेत उसे दे दिया गया था और पंडित जी के खेत में पैदा हुए अनाज में से थोड़ा बहुत मजदूरी के रूप में ले जाता था, जिससे उसके परिवार का पेट पलता था। वह एक दलित भूमिहीन था, गांव में रोजगार के और कोई साधन नहीं थे, इसलिए उसके परिवार की निर्भरता रामधन पर ही थी। बिरजू का छोटा भाई सिरजन, कलकत्ता, किसी मिल में काम करता था। वह बचपन में ही कलकत्ता चला गया था। उसने अपना घर बिरजू से अलग बनवा लिया था। अपने मोहल्ले में उसका घर सबसे सुन्दर दिखता था। उसका परिवार गांव के किसानों पर आश्रित नहीं था। कलकत्ता से पैसा आता था और वे ठीक ठाक से रहते थे। सिरजन के बेटे को कॉपी किताब का कोई अभाव नहीं था। 

बिरजू की पत्नी रमौती, अधिकतर पंडित जी के यहाँ आती और उनकी पत्नी के काम में हाथ बंटा देती थी। बदले में कुछ खाने पीने को मिल जाता। कभी कभी, घर ले जाने को, बचा खुचा खाना भी मिल जाता। एक दिन रमौती आई तो बिटुआ को देखकर पूछ दी, बिटुआ किस कक्षा में है? जब उसे पता चला छठी में तो चौंक कर बोली, अरे सिरजन का बेटा सातवीं में है। पंडित रामधन और उनकी पत्नी समझे  कि वह अपने परिवार को ऊँचा दिखाना चाहती है कि उसके घर के बच्चे पढ़ने में इनसे आगे हैं। पंडित रामधन थोड़ा ऐंठ कर बोले, 'तो हम क्या करें।'  

'अगली साल उसकी किताबें, बिटुआ के काम आ जाएँगी। कहें तो, अभी से बोल के रखूं। हमारे पास पड़ोस और रिश्तेदारी में इस साल और कोई छठी में नहीं है।'

पंडित जी को अपनी ममेरी बहन याद हो आई जिसने अपने बेटे की पुरानी किताब भी देने से मना कर दिया था।  वे रमौती की ओर कुछ देर अवाक् देखते रह गए।


तृतीय

आठवीं कक्षा तक बिटुआ गांव में पढ़ा। उसके चाचा सदानन्द दिल्ली रहते थे। सदानंद ने रामधन से कहा बिटुआ को उसके साथ दिल्ली भेज दें, वहां पढ़ाई लिखाई का अच्छा माहौल है, पढ़ लिख जायेगा। रामधन को भी यह बात अच्छी लगी।  गांव में तो खेल कूद में ही लगा रहेगा और बच्चों के साथ बिगड़ जायेगा। बिटुआ अपने चाचा के साथ दिल्ली आ गया। उसके चाचा ने एक सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में उसका नाम लिखवा दिया। अब फिर से किताब की समस्या आई। नई किताबें बहुत मंहगी थीं और किसी से जान पहचान भी नहीं थी कि पुरानी मांग कर काम चलाये। उसके चाचा उसे समझाते कि शहर का खाने पीने का ही खर्च बहुत होता है, ऊपर से पढ़ाई का खर्च। यह वेतनभोगी के लिए बहुत बड़ा भार है इसलिए कोशिश करके, अन्य लड़कों से दोस्ती कर ले ताकि कम से कम किताबों का तो बंदोबस्त हो जाय। चलो, आने जाने का तो बस का सस्ता पास बन जायेगा। 

उसे साथ पढ़ने वाले बच्चों से किताबें तो नहीं मिलीं पर एक रास्ता मिल गया, लड़कों ने बताया कि नई सड़क से पुरानी किताबें खरीद ले। वहां आधे दाम पर ही किताबें मिल जाती हैं। नयी सड़क की बाजार देख बिटुआ को बड़ा आश्चर्य हुआ और अपना गांव याद आ गया। गांव में तो पुरानी किताबें मांगने पर मुफ्त में ही मिल जाती थीं, और यहाँ पुरानी किताबों का बाजार लगा है। उसने कुछ जरूरी किताबें वहां से खरीद लीं। एकाध तो साथ के बच्चों से मांगकर काम चला लेता। जिसदिन किसी बच्चे को उस विषय का काम नहीं करना होता, वह उससे किताब मांग कर ले जाता और अपना काम कर लेता। 

कई बार बच्चों के द्वारा बहाना का सामना भी करना पड़ता। इन घटनाओं से क्षुब्ध, बिटुआ ने ठान लिया था  कि वह अपने बच्चों को कभी किताब का अभाव नहीं होने देगा। खुद बेशक पुरानी किताबों से पढ़ रहा है, मगर वह इस लायक बन कर रहेगा कि उसके बच्चे किताब के लिए न तरसें। उसका परिश्रम रंग लाया माध्यमिक परीक्षा बड़े अच्छे अंकों से उत्तीर्ण किया। आगे ग्रेजुएशन में तो पुस्तकालय की सुविधा भी मिल गयी थी। 

केदार यानि बिटुआ का बेटा नई किताबें लेकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ने जाता है। पंडित रामधन पैसे की बड़ी तंगी देख चुके थे, अब बिटुआ उनके लिए भी हर महीने कुछ पैसे भेज देता है।  


चतुर्थ

बिटुआ अब केदार नाथ था। दरिया गंज में पटरी पर लगी पुरानी किताबों के बाजार में केदार को एक किताब दिख गयी। दाम पूछा तो, मात्र बीस रुपये। बिटुआ ने तुरंत बीस का नोट निकाला, और उस पुस्तक को उठा लिया। वैसे, अब उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी, परंतु उस पुस्तक से उसका एक पुराना प्रसंग जुड़ा था। जब वह बी. ए. कर रहा था तो बहुत महँगी होने के कारण वह मनोविज्ञान की यह पुस्तक खरीद नहीं पाया था। पुस्तकालय से वह पुस्तक उसे काफी प्रतीक्षा के पश्चात् मात्र पंद्रह दिन के लिए मिल पायी थी। केवल पंद्रह दिन में वह उस पुस्तक से क्या कुछ कर पाता? किसी तरह थोड़ा बहुत नोट बना पाया था। आज वह पुस्तक उसे लगभग मुफ्त में मिल रही है।
वह उस पुस्तक को घर लाकर समझ पाया कि अभी भी उसके लिए कितनी मूल्यवान है। पढ़ाई के समय जिस ज्ञान से वह वंचित रह गया था, उसकी पूर्ति अब हो रही है। यह पुस्तक उसके लिए कोयले के खान में मिले हीरे के जैसी थी। उसे एहसास हो रहा था कि यह पुस्तक उसकी एक बहुत पुरानी संगिनी है, जिससे वह अब तक दूर रह रहा था।


पंचम

एक बार केदार दरियागंज में पुरानी पुस्तकों के बाजार में घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक किताब पर पड़ी। वह मुंशी प्रेम चंद की लिखी कहानियों की किताब थी। जिसके लिए उसने कभी नई सड़क छान मारी थी। किताब जर्जर अवस्था में थी। उसका आवरण तक भी नहीं था। केदार को मुंशी प्रेम चंद की कहानियां पढ़ने का बहुत शौक था और वो विशेषतः मनपसंद किताब थी। केदार ने बिना अधिक सोचे, उसे खरीद लिया।

घर लाकर, उसने किताब को मेज पर रख दिया और किसी काम से बाहर चला गया। उसके जाने के पीछे कबाड़ी वाला आ गया, उसकी पत्नी पूजा ने अखबार की रद्दी के साथ उस किताब को भी दे दिया। विवेक जब लौट कर आया तो पढ़ने के लिए वो किताब ढूंढने लगा। नहीं मिली तो, पूजा से पूछा 'मेज पर एक किताब रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'एक फटी पुरानी सी किताब पड़ी तो थी, मैंने तो उसे रद्दी में बेच दिया।'
अब तो विवेक के अफ़सोस का ठिकाना न रहा। इतनी मेहनत से ढूंढकर लाया था और वह रद्दी में चली गयी। वो भी मुंशी प्रेम चंद की किताब। अब मुंशी प्रेम चंद ये कदर रह गयी है!
खैर, उसने सोचा, अगले रविवार को एक बार फिर से प्रयास करेगा, इतने बड़े पुस्तकों के भंडार में शायद एक और किताब हो। रविवार को वह दरियागंज पहुँच गया। पहले तो वह उसी दुकान पर गया, 'भाई मैं एक प्रेम चंद की कहानियों की पुस्तक ले गया था, मुझे एक और चाहिए।'
'अरे साहब यहाँ एक शीर्षक की दो किताबें तो मुश्किल से ही मिलती हैं। ढूंढ लीजिये, शायद किसी  के पास मिल जाय।'
विवेक पटरी बाजार का चक्कर लगा रहा था कि एकाएक एक दुकान पर, एक ग्राहक के हाथ में वही किताब देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। 'भाई साहब ! यह किताब नहीं ले रहे हों तो मैं ले लूँ।'
नहीं भाई अभी देख रहा हूँ, मेरे काम की लग रही है, बेटा हिंदी से एम० ए० कर रहा है। उसे चाहिए।
जब उस व्यक्ति ने दाम पूछा तो दुकानदार बोला १०० रुपये।
तब तक विवेक की दृष्टि उस पुस्तक पर लगे एक चिन्ह पर पड़ गयी। यह तो वही पुस्तक थी, जिसे वह पिछली बार ले गया था। वह बड़ा हैरान हुआ, इतनी जल्दी वह पुस्तक फिर से इस बाजार में कैसे आ गयी।
दाम सुनकर, विवेक बोला, 'पिछली बार तो मैं यहीं से ४० रुपये में ले गया था।'
दुकानदार बोला, 'बाबूजी, इसकी छपी कीमत तो तीन सौ रुपये हैं। बाकी तो ग्राहक के जरूरत के हिसाब से दाम।कभी ग्राहक छपे मूल्य से भी अधिक दाम देने को भी तैयार हो जाता है।'
वह किताब केदार को दुबारा नहीं मिल पायी।


षष्टी

केदार को कहानियां पढ़ने और लिखने का शौक था। धीरे धीरे उसने कई कहानियां लिख डालीं। एक बार
सोचा कि जिंदगी भर किताब पढ़ते बीती है, अब अपनी कहानियों की, कम से कम एक किताब छपवा भी ले। किताब छप जाएगी तो उसका नाम होगा और समाज में वह लेखक कहलायेगा। वह छपवाने के लिए एक प्रकाशक के पास गया तो प्रकाशक ने किताब की रायल्टी देने की बात तो दूर किताब छापने की लागत भी उसी से मांगने लगा। पैसों की राशि सुनकर, विवेक ने अपनी इच्छा को ताक पर रख दिया। अब कभी पैसा होगा तो देखा जायेगा।
एक बार फिर से केदार के मन में जिज्ञासा जगी। इस बार एक अन्य प्रकाशक कुछ उचित दर पर छापने को तैयार हो गया। अब केदार अपनी पुरानी डायरी ढूंढने लगा। घर में सभी जगह ढूंढ मारा, मगर उसे उसकी डायरी नहीं मिली।  वह परेशान होकर, पूजा से पूछा, 'पूजा! यहाँ अलमारी के ऊपर एक  डायरी रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'हाँ, एक दिन कृति उससे खेल रहा था, मैंने छीन कर टांड़ पर रख दिया। पता नहीं कैसे मूढ़ा पर चढ़ कर, अलमारी से उतार लिया और उसमें से पन्ने फाड़कर नाव बनाने लगा। कई पन्ने तो फाड़कर टुकड़े टुकड़े कर दिया। वो तो मेरी नजर पड़ गयी, वरना तुम्हारी पूरी डायरी का सत्यानाश कर दिया होता।'
कहते हुए, पूजा ने डायरी लाकर केदार को दे दिया। केदार ने फटाफट पन्ने पलटे, देखा तो उसकी सबसे प्रिय कहानी ही डायरी  से गायब थी। अब वह अपने मस्तिष्क पर जोर डालने लगा परन्तु बड़े प्रयत्न के पश्चात् भी उसे अपनी उस कहानी  का पूरा प्रसंग याद नहीं आया। उसे लग रहा था कि उस कहानी के बिना उसकी किताब में वो जान नहीं आ पायेगी। किन्तु अब कोई चारा भी नहीं था, अपनी पुस्तक उस कहानी के बिना ही प्रकाशक को देनी पड़ी।
एक दिन, छुट्टी के दिन पूजा घर की सफाई कर रही थी कि आलमारी के नीचे खाली पड़ी जगह में उसे एक कागज की नाव दिखाई पड़ी। उसने उसे निकाल कर केदार को बताने लगी, 'देखो एक नाव ये पड़ी।' केदार ने झट से वो नाव ले लिया और उसे खोल कर पढ़ने लगा। उसका चेहरा खिल गया। 'अब तो काम बन जायेगा, कहानी का प्रमुख प्रसंग मिल गया है। बस अब क्या दो तीन दिन में मेरी पूरी कहानी तैयार हो जाएगी।'
केदार ने प्रकाशक को फोन किया, 'मेरी किताब में एक कहानी और जोड़नी है। '
उत्तर ने केदार को एक बार फिर निराश कर दिया, 'किताब तो फाइनल हो चुकी है, उसमें अब कोई भी परिवर्तन संभव नहीं है।'



सप्तम

केदार नाथ की वकालत चलने लगी थी। एक दिन वह शालिनी आंटी के यहाँ गया, तो शालिनी बोल पड़ी, 'बेटा केदार तेरे अंकल की यह लाइब्रेरी खामख्वाह एक कमरा घेर रखी है। कक्कड़ साहब तो अब इस दुनिया चले गए, तुझे पता ही है, विनोद आई. टी. कंपनी में लग गया है, अब ये सारी कानून की किताबें बेकार पड़ी हैं। इन्हें रखकर कोई फायदा नहीं, ये निकल जाएँगी तो यह कमरा खाली हो जायेगा और किताबें भी किसी के काम आ जाएँगी।'
केदार मन ही मन सोचने लगा कि उसे भी कानून की धाराएं और न्यायालयों के फैसलों को देखने के लिए न्यायालय की लाइब्रेरी का सहारा लेना पड़ता है। अगर यह लाइब्रेरी उसे मिल जाय तो उसका कार्यालय भव्य लगेगा और उसका रुतबा भी बढ़ जायेगा।  भेजे में क्या है कौन देखता है, बड़ी सी लाइब्रेरी देखकर, मुवक्किल प्रभावित होगा और उसे अधिक काम मिलेगा। यह विचार करते उसने पूछ दिया, 'कितना लोगी आंटी ?'
'अब तू ही  देख ले बेटा, इसमें चार पांच सौ किताबें तो होंगी ही। अब लगा ले सौ, डेढ़ सौ से कम की एक किताब क्या होगी। पाँच लाख तो ठीक रहेगा न !'
अब केदार का हौसला तो पस्त हो गया।  उसके पास पांच लाख कहाँ थे। हाँ चालीस पचास हजार तक सोच सकता था। तत्काल बात टालने के लिए बोला, 'ठीक है आंटी किसी वकील से बात कर के बताऊंगा।'
'अरे तू भी तो वकालत करता है।'
'हाँ आंटी, पर मेरे  पास अभी इतने पैसे कहाँ हैं ?'
'देख ले तुझे तो चार लाख में ही सब दे दूंगी।'
'नहीं आंटी, मैं किसी और वकील से बात करके देखूंगा।'
अब तो केदार के मन में उस लाइब्रेरी को हथियाने की ललक लग गयी। मगर इतने पैसे जुटाना उसके लिए कठिन था। अभी इतनी राशि बचा  रखा था। उसने लाइब्रेरी का भाव कम करने के उद्देश्य से एक वकील को वहां भेज दिया और लगभग एक महीने के पश्चात् वह स्वयं जा धमका। 'क्या हुआ आंटी मैंने अधिवक्ता सुरेश को भेजा था।'
'अरे छोड़, वह तो पचास हजार बोल कर गया।'
'बताओ उसे शर्म भी न आयी, आजकल इतनी मंहगी किताबें हैं और वो चाहता है फ़ोकट में मिल जाय। एक लाख तक तो मैं ही दे सकता हूँ।'
'हूँ! अच्छा, दो तीन दिन रूक जा, विनोद से पूछ लेती हूँ क्या कहता है।'
केदार प्रतीक्षा ही कर रहा था कि तीसरे दिन फ़ोन आ गया, 'आ बेटा ले जा, एक सप्ताह में यह कमरा खाली कर दे।'  
 

पुस्तक की सौगात /भेंट 

बद्रीनाथ को लिखने पढ़ने का शौक तो बचपन से ही था।  वे कई पुस्तकें लिख चुके थे मगर उनका प्रकाशित करवाना सरल नहीं था।  इतने परिश्रम से तो पुस्तक लिखी और छपवाने के लिए ऊपर से प्रकाशक को प्यासे दो। हर प्रकाशक यही कहता कि आजकल कोई किताब तो पढता नहीं।  आप अपने खर्च पर छपवा कर शौक पूरा कर लें। 
बद्रीनाथ के पास इतने अतिरिक्त पैसे भी तो नहीं थे कि वे लगा कर एकाध किताबे छपवा लें।   
बद्रीनाथ की इच्छा थी कि इतनी पुस्तकें लिख लिए एकाध छपवा लें नहीं तो ये सब डायरियों में ही पड़ी सद जाएँगी। 
उन्होंने किसी तरह धन की व्यवस्था कर ली। एक प्रकाशक बद्रीनाथ की लागत पर पुस्तक छपने को तैयार हो गया।उसने अपना खर्च जोड़कर अस्सी पुस्तकें बद्री नाथ को दे दीं। उन किताबों को घर में रखे, बद्रीनाथ यही सोचते कीअब इनका क्या करें। उनकी पत्नी को भी घर की साफ सफाई में  कठिनाई होती।  वे बार बार कहतीं कि इन कितबों से कुछ मिलता है नहीं और ऊपर से घर कितना गन्दा दिखता है। 
बद्रीनाथ को किसी को किताब खरीदने के लिए कहने में शर्म का अनुभव करते थे।  बस कोई घर पर आ गया तो उसे सौगात के रूप में एक पुस्तक थमा देते।   अब तक उन्होंने कई पुस्तकें छपा लीं। अब वे जब किसी जन्म दिवस आदि किसी उत्सव में जाते तो किताब को ही 'गिफ्ट पैक' करके ले जाते। 
एक दिन मधु के घर महफ़िल जमी हुई थी। कई महिलाएं एकत्र थीं। मधु उनको बद्रीनाथ की पुस्तकों के किस्से सुना रही थीं।  बताओ बद्रीनाथ बुलबुल के जन्मदिन पर किताब की सौगात लाये। अरे उससे अच्छा तो सौ का नॉट ही थमा देते, कुछ काम आ जाता।  हम किताब का क्या करेंगे! रेनू को भी लिखने का शौक है।  वह लेखक के मनोभाव और धन का आभाव दोनों बातों को समझती है। उसने तबक से उत्तर दिया, ' लोग कहीं किसी उत्सव जैसे विवाह, गृह प्रवेश, जन्म दिन इत्यादि में जाते हैं तो कुछ कुछ सौगात ले जाते हैं या फिर नगद ही थमा देते हैं। बद्रीनाथ ने अपने खर्च पर पुस्तक छपवायी और उसके विमोचन पर भी खर्च किया। वहां आने वाले बिना कुछ दिए खा पी भी लिए और मुफ्त किताब भी माँगते रहे। यह तो उचित नहीं है भाई,    


अंग्रेजी पढ़ी बहू आ गयी।  हिंदी का मान घाट गया।  बड़ी नाथ की पुस्तकें नदारद होने लगीं अब शेल्फ में उनकी एक भी किताब नहीं थी। 





 
  






Tuesday, 10 May 2016

FLAT KA JUNUN

फ्लैट का जुनून

क्षेत्र के सभी प्रॉपर्टी डीलरों की घंटियां बजने लगीं।
'ग्लोब अपार्टमेंट में कोई फ्लैट है?'
मनसुखानी की भी घंटी बजी और उत्तर दे दिया,
'अभी तो नहीं है, सिंघानिया साहब ! जैसे ही आएगा बता दूंगा। '
'देखना, जितनी जल्दी हो सके।'
फोन रखकर मनसुखानी ने अपने लोगों को काम पर लगा दिया, 'दीपक पता कर, ग्लोब अपार्टमेंट में कोई फ्लैट बिकाऊ है? सिंघानिया प्रॉपर्टी से फ़ोन आया था। अर्जेंट है।'
'ठीक है सर, वैसे उसके ठीक बगल वाले अपार्टमेंट में एक बहुत ही बढ़िया फ्लैट है, तीन ओर से खुला, बड़े बड़े कमरे, पावर बैक अप, लिफ्ट; देखते ही पसंद आ जायेगा। ' दीपक ने उत्तर दिया।
'अरे नहीं, ये तो मैं सिंघानिया जी को भी पता है। उन्हें ग्लोब में ही चाहिए, किसी एन. आर. आई. (अनिवासी भारतीय) को लेना है। '
सिंघानिया प्रॉपर्टी ने पूरा ग्लोब अपार्टमेंट खंगाल लिया, पर कोई फ्लैट बिकाऊ नहीं था। सिंघानिया ने अमेरिका फ़ोन करके राम प्रसाद से आग्रह किया कि वह किसी और अपार्टमेंट में फ्लैट ले ले। बहुत अच्छा फ्लैट और उचित दाम पर दिला देगा। मगर राम प्रसाद था कि ग्लोब अपार्टमेंट में ही फ्लैट लेने को अड़ा हुआ था। सिंघानिया के सभी आकर्षक प्रस्ताव, उस अपार्टमेंट से अच्छी लोकेशन, अधिक क्षेत्रफल, उससे अच्छी सुविधाओं से युक्त, मगर एक एक कर, रामप्रसाद ने रद्द कर दिए। उसे कोई भी विकल्प पसंद नहीं आ रहा था। सिंघानिया प्रॉपर्टी डीलर ने अनुमान लगा लिया था कि रामप्रसाद फ्लैट खरीदने में गम्भीर है इसलिए सहयोगी डीलरों को अच्छा कमीशन देने का भी प्रस्ताव रखा मगर उसके सभी प्रयास विफल रहे। उस अपार्टमेंट में कोई भी फ्लैट बिकाऊ नहीं था। राम प्रसाद को समझाना बुझाना भी व्यर्थ ही सिद्ध हुआ, वह तो ऐसे अड़ा था, मानो कोई संकल्प लिया हो, जब भी फ्लैट खरीदेगा तो उसी अपार्टमेंट में खरीदेगा। राम प्रसाद ने यहाँ तक कह दिया कि जब मिले तब बताना और कीमत की परवाह नहीं करना। 
हार कर सिंघानिया ने कहा, 'ठीक है मैं नोट कर लेता हूँ, जब कभी भी कोई सौदा आएगा, आपके लिए रख लूंगा और सूचित कर दूंगा।'
'हां, नोट कर लो और चाहो तो कुछ पैसा एडवांस भेज दूंगा। वैसे दो महीने बाद ही मुझे इंडिया आना भी है, और छः महीने तक वहीँ रहूँगा।  देख लेना, तब तक कुछ हो जाय तो अच्छा रहेगा। '
राम प्रसाद के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। बेटे कुशल को पढ़ा लिखा कर इंजीनियर बना दिया था। वह अमेरिका चला गया और वहां खूब डॉलर कमा रहा है। उसने प्रयास कर, अपने पिता राम प्रसाद का भी ग्रीन कार्ड बनवा दिया और वह भी वहां का निवासी हो गया। अमेरिका में कुशल ने आलीशान बंगला और मंहगी गाड़ी ले लिया था और अपने पिता के लिए भी बिजनेस डलवा दिया। राम प्रसाद का भी काम काज ठीक ठाक चल रहा था और उसे भी अच्छी कमाई हो जाती थी। अमेरिका में रामप्रसाद की बड़ी ऐश की जिंदगी कट रही थी। कभी कभी वह एकांत में बैठता तो उसे अपनी पुरानी जिंदगी याद आ जाती। आज वह महंगे से महंगा पिज्जा आर्डर करता है, कई बार पूरा नहीं खाया जाता तो छोड़ कर चल देता है। किसी भी होटल या रेस्तरां में खाने में कोई संकोच नहीं, महँगी से मंहगी शराब उसके घर में है। एक समय था कि पटरी पर बिकने वाली आलू की टिक्की के लिए भी मन मार के रहना पड़ जाता, बस का किराया बचाने के लिए, कितना पैदल चल लेता; क्योंकि उसे अपने पेट से ज्यादा चिंता, कुशल के पढ़ाई की रहती। 
  
दो महीने बीतते देर नहीं लगी और राम प्रसाद इंडिया आ गया। आते ही सिंघानिया से संपर्क किया। वह भाग्य का तेज निकला, ठीक उसी समय ग्लोब अपार्टमेंट के निवासी के० के० नागर, अपना फ्लैट बेचने के लिए किसी प्रॉपर्टी डीलर से संपर्क किया। उनकी एक ही बेटी थी और वह अमेरिका में रहती थी। अब तक तो वे अकेले ही जिंदगी काट रहे थे, पर बेटी की जिद्द थी कि अमेरिका आ जायँ क्योंकि अब वह अमेरिका की नागरिक हो चुकी थी और नागर जी का भी स्थाई निवासी होने का दर्जा दिलवा दी थी। कंचन के अब इंडिया लौटने की कोई सम्भावना नहीं थी। माँ का पहले ही देहांत हो चुका था, अतः वह चाहती थी उसके पिता भी वहीँ आ जायँ। नागर साहब के मुंह खोलते ही, बात सीधे सिंघानिया तक पहुँच गयी। नागर साहब यह सुनकर हतप्रभ कि उनके फ्लैट का सौदा हो गया और जो कीमत वे चाहते थे उसी कीमत पर।
सौदा पूरा होने तक और अधिक हो हल्ला न हो, सिंघानिया ने सबको चुप रहने को कह दिया। क्योंकि सभी प्रॉपर्टी डीलरों जुबान पर बस ग्लोब अपार्टमेंट ही था।  सिंघानिया ने रामप्रसाद को सूचित किया। रामप्रसाद ने अच्छा ख़राब, किस मंजिल पर है; कुछ नहीं पूछा और 'सौदा पक्का' बोल दिया। फ्लैट के लेन देन की प्रक्रिया भी शीघ्र ही पूरी हो गयी। रामप्रसाद ने फ्लैट को अपने नाम से पंजीकृत करवा लिया।
रामप्रसाद की ग्लोब अपार्टमेंट में फ्लैट लेने की महत्वकांक्षा थी जो पूरी हुई। उसके बाद वह बड़ी धूम धाम से गृह प्रवेश करवाने की योजना बनाई। बड़े समय से उसे यह फ्लैट मिल गया था। अभी उसके अमेरिका वापस जाने में समय था, वह चाहता था गृह प्रवेश के बहाने वह अपने पुराने रिश्तेदारों, दोस्त मित्रों से मिल भी ले। अपने सभी पुराने मित्र और रिश्तेदारों को याद कर करके, आमंत्रित किया। रामू का उत्साह देखते बनता था और वैसे ही बढ़ चढ़ कर जोश उसे बधाई देने वालों का।  

आज गृह प्रवेश का उत्सव है। खानेपीने की व्यवस्था शहर के बहुत अच्छे कैटरर को दिया गया है। अपने पुराने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलकर, रामप्रसाद बहुत रोमांचित और प्रसन्न है। पार्टी में लोग छोटे छोटे समूह में बंटे, हाथों में खाने की प्लेट लिए, रामप्रसाद की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे। आयोजन तो अच्छा था ही, चर्चा का मुख्य विषय था रामप्रसाद की कर्मठता और प्रगति। अपनी जिंदगी में उसने जितनी उन्नति की है बहुत कम लोग ही मिलते हैं। उसके रिश्तेदार, धीरे धीरे बात कर रहे थे, श्रम और किस्मत का ऐसा योग तो शायद ही कहीं देखने को मिलेगा। 'इस बिल्डिंग के बनने में रामप्रसाद का भी पसीना लगा है। आज उसे अपना पसीना वापस पाकर, जिंदगी की कितनी बड़ी संतुष्टि मिली होगी। कभी वह एक मजदूर के रूप में इस भवन के निर्माण में कार्यरत था। वह स्वयं झोपड़ी में रह कर भी कुशल की पढ़ाई का कितना ध्यान रखता था। जो भी कमाई होती, बेटे की पढ़ाई पर खर्च कर देता। पेट काट कर उसे पढ़ाया और इंजीनियर बनाया। कुशल भी पढ़ने में होनहार था, पर रामप्रसाद के तपस्या की भूमिका बहुत बड़ी थी। उस समय तो इसके लिए फ्लैट में रहने की सोचना भी सपने से परे की बात थी। आज वह अपनी बनाई बिल्डिंग में अधिकार के साथ खड़ा है।'



Samantvadi loktantra

सामंतवादी लोकतंत्र

एक बार उत्तर प्रदेश के एक सांसद, अपनी कोठी से बाहर निकल रहे थे। उनके सामने से एक ग्रामीण साईकिल सवार उनका ध्यान दिए बिना सामने से निकल गया। सांसद महोदय के सिपहसलार दौड़ कर उसे पकडे और दो तीन रसीद कर दिये।
'देखता नहीं राजा साहब आ रहे हैं! '
ग्रामीण बेचारा मुंह बना कर रह गया। कोई पूछे कि राजा साहब उससे वोट मांगने दुबारा कैसे जायेंगे तो किसी किसी गांव में वोट माँगा नहीं, छीन लिया जाता था। वहां भी वही परंपरा थी।

बिहार के विधान परिषद सदस्य के बेटे ने अपनी कर से आगे निकलने वाले को गोली मारकर 'सामंतवादी लोकतंत्र' की प्रतियोगिता में यूपी को पीछे छोड़ दिया।

एस० डी० तिवारी 

sharten lagu

शर्तें लागू

 दोपहर को कॉलेज से छूटने के बाद, एक मित्र के साथ योजना बनी कि आज रेस्तरां के खाने का स्वाद लिया जाय। आपात काल लगे होने का कारण, दुकानदारों को वस्तुओं के कीमत की सूची (रेट लिस्ट) लगानी जरुरी थी। उक्त रेस्तरां में भी बड़े बड़े अक्षरों में हरेक मद की दर लिखी थी। हमने पढ़ा, कीमत अपनी जेब के अनुसार ही लगी और खाने बैठ गए।
'एक प्लेट दाल तड़का, एक प्लेट सब्जी और छः रोटी। रोटी दो दो कर के लाना।' हमने आर्डर कर दिया। बैरा पहले दो प्लेट कटी प्याज और दो प्लेट रायता लाकर मेज पर रखा, फिर हमारा आर्डर किया खाना। उस समय  लगभग सभी रेस्तरां में खाने के साथ प्याज मुफ्त दी जाती थी। पर रायता भी, यह देख हम थोड़ा चौंके, मगर मन में रेस्तरां के लिए बड़ा सम्मान जागृत हुआ, 'कितना अच्छा रेस्तरां है, प्याज के साथ रायता भी। वाह! हमने खाना खा लिया। क्या सस्ती का जमाना था, दो लोगों ने मात्र १८ रुपये में खाना खा लिया। मगर  बिल आया तो हम एक बार फिर चौंक गए। ३६ रुपये का बिल।  हम दुकानदार से बोले, भाई, हमने तो १८ रुपये का खाना खाया और बिल ३६ रुपये का ?
'हां, प्याज और रायता भी तो लिया, साढ़े चार रूपया प्रति प्लेट, उसका। '
'मगर वह तो आपके रेट लिस्ट में है ही नहीं और हमने उसका आर्डर भी नहीं किया था। '
'उसका रेट दुकान के अंदर, पीछे रखे बोर्ड पर लिखा है। '
'ये तो सरासर ठगी है।'
हम उससे झगड़ने लगे, हमारा बजट बिगड़ चुका था।  सच्चाई तो यह थी कि जेब में उतने पैसे भी नहीं थे। बहसबाजी के बाद ३० रुपये पर समझौता हुआ।

- एस० डी० तिवारी 

Friday, 6 May 2016

Nadi ro padi

नदी रो पड़ी

मन्दाकिनी शादी के बाद कनाडा चली गयी थी और वहीँ की होकर रह गयी। जब तक उसके पिता जीवित थे, कभी कभी गांव भी आ जाती थी। इस बार तो पूरे पच्चीस वर्ष बाद अपने गांव आई थी। परिवार में  उसकी एक बुढ़िया चाची, उनके बेटे बहु और बेटे के दो बच्चे बचे थे। मन्दाकिनी के माता-पिता दोनों का स्वर्गवास हो चुका था और भाई भाभी भी कनाडा चले गए थे। बचपन में चाची उसे बहुत प्यार करती। आते ही चाची से लिपट गयी, 'अरे चाची ! पच्चीस वर्ष बाद। ' चाची की ऑंखें डबडबा गयीं। एक बार फिर से उठाकर उसे गोद में ले लेना चाहती थी, पर वह समय बहुत पीछे चला गया था।
'बिटिया ! अब तो अंत समय आ चुका है। पका आम हूँ, ना जाने कब टपक जाऊं।  कितने अच्छे भाग हैं, तू आ गयी।  मैं तो समझ रही थी, परलोक में ही जाकर, तेरी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।'
'नहीं चाची! तू अभी कहीं नहीं जा रही। देख तेरा प्यार खींच लाया। मैं तो तुझे कितना बुलाई, आ जा, कनाडा घूम ले, पर तुझे यहीं से छुट्टी नहीं  मिल पाती। '
'अरे बेटा, मेरे लिए यहीं अमेरिका, कनाडा है। चंदू ये दो नन्हें से हैं, बस इन्हीं में पूरी दुनिया देख लेती हूँ।' चन्द्रिका के बच्चों की ओर इशारा करके चाची बोली। 'अरे बहू, आज शाम को मन्दाकिनी के लिए चोखा बाटी और खीर बना लेना, इसे बहुत पसंद है और सुनो, कल नाश्ते में मटर की घुघुनी। तू कब तक रहेगी, बेटी? एक एक करके तेरी पसंद की सब चीजें खिलाऊंगी। भैंस भी लग रही है, दूध दही का कोई अकाज नहीं। '
'बस चाची दो दिन रहूंगीं, सुदेश जी भी आये हैं, वे परसों आप से मिलने आएंगे, फिर उनके साथ ही चली जाउंगी और वहीँ से कनाडा।'
इतने में सुप्रिया चाची भी आ गयीं। 'अरे मन्दाकिनी! तू कब आई ?'
'बस आज ही चाची। अच्छा हुआ तू आ गयी, तेरे साथ मैं नदी के तीर तक चलूंगी। देख कर आउंगी, मेरी 'बेशो' अब कैसी है ? '
'अब कहां पानी होगा बेशो में। बरसात बीतते ही लोग पम्प लगाकर सारा पानी उदह लेते हैं। फिर तो अगली बरसात तक बेचारी वैसे ही उदास पड़ी रहती है। खैर, थोड़ी देर में आती हूँ तो चलते हैं। '

सुप्रिया चाची थोड़ी देर बाद अपने घर होकर आ गयी और मन्दाकिनी को लेकर नदी की ओर चली गयी। अब बहुत कुछ बदल चुका था, गांव में खड़ंजे लग गए थे, गलियां पहले से पतली हो चुकी थीं। गांव का आकार पहले से बड़ा हो चुका था और गांव के बाहर भी कई जगह छुटपुट घर बन गए थे। गांव के समीप वाली सड़क पक्की हो चुकी थी और मोटर साइकिलें सरपट दौड़ रही थीं।
मन्दाकिनी ने पूछा, 'चाची ! पखडू का एक्का अभी भी चलता है ?'
'नहीं बेटी वो तो बहुत बूढ़े हो गए। उनका बेटा दूसरा काम पकड़ लिया। अब तो लोग बाग़ जीप गाड़ी से आते जाते हैं। एक्का और घोडा गाड़ी पर कौन बैठता है !'

खेतों की मेड़ों से होते, वे नदी के तट की ओर चल दीं। राह के एक-एक स्थल को मन्दाकिनी भली प्रकार से निहारती और अपने बचपन को याद करती।
'चाची, यह मंगलू का खेत है, न ! '
'हाँ, तुझे अभी तक याद है। '
'हाँ चाची, मैं एक मटर की छिम्मी तोडूंगी। पहले भी वे इसमें मटर बोते थे, हम जब नदी पर नहाने जाते तो इसमें से एकाध छिम्मी तोड़ कर खा लेते। एक बार तो तारा ने जैसे ही छिम्मी तोड़ी, मंगलू चाचा को आहट मिल गयी।  वे चिल्लाये, कौन ? हम दोनों तेजी से नदी की ओर भाग लिए। मगर उनकी नजरें तेज थीं। जब हम नदी से वापस आये, तब तक वे वहीँ थे। हम दोनों को बुलाया, डरते डरते उनके पास गए कि वे डांटेंगे पर उन्होंने खेत से तोड़कर थोड़ी थोड़ी फली हमें दे दी। ले जाओ, घर पर जाकर खाना ।'

वे नदी के तट पर पहुंचीं।  वही बरगद का पेड़, मगर पहले जितना हरा भरा और घना नहीं था। नीचे तने के चारों ओर बना गोल चबूतरा जीर्ण शीर्ण हो चुका था और कई जगह से टूटा फूटा था। उसका किसी ने कभी जीर्णोद्धार नहीं कराया।  चाची ने बताया 'बरगद के पत्ते हाथी को खिलाने के लिए काट ले जाते हैं, इसलिये यह फ़ैल नहीं पाता।' मन्दाकिनी जाकर, चबूतरे पर बैठ गयी और एक गहरी सांस ली। फिर गर्दन घुमा घुमा कर चारों ओर, फिर आसमान की ओर देखी। आखिर में उठकर नदी के तट पर खड़ी हो गयी और जब नदी की ओर आँख गड़ाई तो फफक कर रोने लगी और आखों से धार बह निकली। नदी में उतना पानी नहीं था जितना मन्दाकिनी के आँखों में। सूखी नदी के,बस बीच में एक नाली के बराबर हिस्से में पानी था। हाँ कहीं कहीं तलहटी में गड्ढे बन गए थे, बस उनमे अवश्य थोड़ा थोड़ा पानी भरा था। चाची ने फिर बताया, अब तो बरसात ख़त्म होने से पहले नदी बेआब हो जाती है, लोग पंप लगा कर सारा पानी सिंचाई के लिए निकाल लेते हैं।

मन्दाकिनी की आँखों के सामने उसका बचपन फिल्म की रील की भांति चलने लगा। नदी उसके घर से बस दो सौ कदम की ही दूरी पर थी। जब कभी गांव के बच्चों के साथ वह निकल जाती; नदी में कम से कम घंटा भर नहाती और मस्ती करती। कई बार घर पर डांट भी खानी पड़ती। वह दृश्य आज भी याद है जब कभी कभी मां और चाची के साथ बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठकर दूर क्षितिज में सूर्यास्त का अनुपम दृश्य का अवलोकन करते, उसका चचेरा भाई बृजेश साथ जाता तो कहता, देख पचास तक गिनने तक सूरज डूब जायेगा और वो कहती नहीं सौ तक। कभी ये जीतती, कभी वो। आंखें कभी आसमान को देखतीं तो कभी जल में। सूरज का बिम्ब नदी के जल में पड़ता तो ऐसा प्रतीत होता कि होठलाली लगाए नदी मुस्करा रही हो। जब तक सूरज पूरा नहीं डूब जाता, वहां से हिलने का जी नहीं होता। 

अभी वह अतीत में ही खोयी थी कि एकाएक नालीनुमा नदी का जल स्तर बढ़ गया। जैसे लगा कि उसे रोता देख, नदी भी रोने लग पड़ी हो और आंसुओं की धारा बह निकली हो। दो सखियाँ वर्षों बाद मिलकर, आलिंगन पाश में बंधे, बोले बिना ही एक दूसरे से विछोह की सारी बातें कह रही हों। यह देख मन्दाकिनी द्रवित भी थी और आश्चर्य चकित भी। क्या वास्तव में नदी का उसके लिए प्यार उमड़ आया ! एकाएक यह जल कहाँ से आ गया। प्रश्न भरी ऑंखें सुप्रिया चाची की ओर देखने लगीं।

चाची ने बताया, 'ठाकुर बालगोबिंद सिंह ने नलकूप का पानी छोड़ा होगा। उनके खेत का एक चक थोड़ी दूरी पर है। नदी का जल समाप्त हो जाने पर वे इसी रास्ते वहां तक पानी ले जाते हैं और पम्प से फिर से निकाल कर, खेत के उस टुकड़े की सिंचाई करते हैं। चल अब चलते हैं। '

'बस चाची, दो मिनट और! फिर पता नहीं, इस जीवन में इस नदी के दर्शन होंगे भी या नहीं। '

- एस० डी० तिवारी 


Wednesday, 4 May 2016

Tarikh par nahin ayee

तारीख पर नहीं आई

पिछली बार कोर्ट आई तो जिस प्रकार देख रही थी, लग रहा था कुछ कहना चाहती है; मगर ख़ामोशी तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पायी। आखिर अकेले शम्भू की ही गलती तो नहीं थी। फिर कोर्ट में एप्लीकेशन भी खुद ही डाली थी । बात नहीं कंरने का बहुत पछतावा था। घर आकर रोई भी।

शम्भू एक बार गोवा घूमने गया तो वहां की तस्वीर फेस बुक पर डाला। गौरी ने देखते ही समझ लिया की यह उसी होटल का चित्र है, जिसमें वह जब शम्भू के साथ गयी तो रुकी थी। पुरानी स्मृतियां एक बार फिर ताजा हो उठीं। उससे रहा नहीं गया और तस्वीर पर लाइक भेज दी। सबसे पहला लाइक उसी का था। उसके बाद शम्भू, फेस बुक पर जो भी तस्वीर अथवा अभिव्यक्ति डालता उसका लाइक अवश्य आता।

अब एक वर्ष बीत चुका था। आज फैमिली कोर्ट में सुनवाई की तारीख थी मगर वो कोर्ट नहीं आई न ही उसका कोई प्रतिनिधि। कोर्ट से लौटते ही शम्भू ने फेस बुक पर मेसेज डाल दिया, 'तारीख पर तुम कोर्ट नहीं आई? ऐसे केस लम्बा खिंच जायेगा । कम से कम इसी बहाने मिल भी लेते।'

मैसेज का उत्तर आने में देर नहीं लगी - 'मिलना था तो घर आ जाते। कल शाम उसी रेस्तरां में आ जाना, मिल लेते हैं । '
फेस बुक ने एक बार फिर से जोड़ दिया।

एस० डी० तिवारी

Dharm ka arth



जिज्ञासु के मन में  धर्म को लेकर अनेकों प्रश्न थे। एक दिन दादा जी के साथ बात चीत में व्यस्त था सोचा कुछ प्रश्नों के समाधान का यह अच्छा अवसर है। उसने पूछ लिया - 
'दादा जी धर्म क्या होता है ?'
'क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, जिससे सभी जीवों और ईश्वर की बनाई चीजों की रक्षा हो सके।' अपने पांच वर्ष के पोते जिज्ञासु के प्रश्न का पाण्डे जी उत्तर दिए।
'क्या इंसान को लड़ना चाहिए ?'
'नहीं। '
'फिर लड़ते क्यों हैं ?'


दादा जी धर्म क्या होता है 
ईशवर ने सृष्टि की रचना की और लाखों तरह के जीव जंतु और पदार्थ बनाए 

शेर शिकार करता है तो

या तो ईशवर अल्लाह गॉड  सभी एक हैं या सभी किसी एक ही ईशवर के अधीन हैं
पानी पर कुछ लिखो तो दुबारा पढ़ नहीं पाओगे इस तरह की क्रिया एक लिखे पाठ की तरह है

क्रियाओं को समझने के बुद्धिमान लोगों ने लिए संस्कार बनाये



Swayambhu

मैं प्रमुख  हूँ

'आखिर मुख्यमन्त्री तो पूरे प्रदेश की जनता के हैं, फिर सरकारी नियुक्तियों में और संसाधनों के आवंटन में अपने लोग और जाति के लिए पक्षपात पूर्ण रवैया क्यों है ? इससे एक तरफ तो हम बदनाम हो रहे हैं और दूसरी तरफ अनैतिकता पूर्ण कार्य करके अनेकों लोगों के आक्षेप और गालियां ले रहे हैं।' एक सहयोगी नेता ने पूछ लिया।

'मुझे तो एक बात मालूम है कि मैंने अपनी जाति के लोगों को बड़ी मुश्किल से संगठित किया है और उन्हीं के वोट और सहयोग के कारण जीत कर आया हूँ। इसके अतिरिक्त जिस स्थान पर आप हैं वो भी मेरे पक्षपात पूर्ण रवैये के कारण हैं, वरना आप समझ सकते हैं कि आप से भी योग्य लोग हमारी पार्टी में थे। मैं चाहता तो आपको पार्टी का टिकट ही नहीं देता, तब आप कैसे सभा के सदस्य होते।' मुख्यमंत्री ने दो टूक जबाब दे दिया।

'योग्य दावेदार तो मुख्यमंत्री के लिए भी और हैं श्रीमान जी, यह तो पार्टी के लोगों की नियति और आस्था है कि आपने जो परिश्रम और लगन से काम करके एक संगठन खड़ा किया उसके लिए प्रतिबद्ध हैं। किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि पूरा प्रदेश आपकी व्यक्तिगत सम्पदा हो जाय। इस प्रकार तो पूरा देश, जो स्वतंत्रता की लड़ाई लड़े थे, उन्हीं का होना चाहिए था। आपको इस बात का आभास होगा कि प्रदेश को इस स्थिति तक लाने में इस भूमि पर जन्म लिए हरेक व्यक्ति  का योगदान रहा है, न कि केवल हमारी जाति अथवा पार्टी का। जनता सरकार को राजा के रूप में देखती है और न्यायपूर्ण रवैये की अपेक्षा करती है। पहले भी यदि कोई राजा, प्रजा की उपेक्षा करके अपने और अपने लोगों के सुख साधन का ख्याल रखता था, अप्सराओं के नृत्य आदि में लिप्त रहता था, तो वह सर्वथा निंदनीय होता था। उसकी प्रायः भर्त्सना ही होती थी और उसे मुंह की खानी पड़ती थी। सरकार किसी जाति की नहीं होती, न ही किसी जाति के लिए होती है और सभा भी एक पार्टी की नहीं अपितु सभी चुने हुए प्रतिनिधियों की है। समाज में सभी जाति और धर्म का अपना महत्व है, और सरकार व प्रकृति के लिए एक एक व्यक्ति समान हैं। पुराने जमाने में समाज ने अपनी व्यवस्था बनाई और जातियों में बांटा, वे शासक ही थे जो सबको उचित न्याय नहीं दिए, जिस कारण अनेकों लोगों को कष्ट सहना पड़ा। सबको समुचित अवसर और न्याय मिले यह शासक का कर्तव्य होता है। हमारे शरीर के हर अंग के अपने अलग कार्य हैं, शरीर जो भोजन ग्रहण करता है प्रत्येक अंग को उचित भाग में पहुंचाता है। इसी प्रकार बड़े संगठनों को सुचारु रूप से चलाने के लिये भी अलग अलग विभागों में बांटना पड़ता है। किसी को अधिक प्रमुखता और किसी का तिरस्कार सदैव ही निंदनीय है। एक अंगुली में भी कष्ट हो तो व्यक्ति कराहता है। एक विभाग की अक्षमता का प्रभाव पूरे संगठन पर पड़ता है। जब समाज का स्वरुप जाति से ऊपर उठकर पुनर्गठित होने लगा था तो हम अपनी सत्ता सुख के लिए फिर से समय को पीछे ले जाना चाहते हैं। आज हम यह बहाना लें कि पहले दूसरी जाति के लोगों ने लाभ लिया, आज हमको अवसर मिला तो अपनी जाति को देना चाहते हैं, कल फिर दूसरे किसी को अवसर मिलेगा वह अपनी जाति के लिए कार्य करेगा तो प्रदेश का समग्र विकास कभी भी संभव नहीं हो पायेगा। समाज का इस प्रकार बंटवारा कब तक चलता रहेगा? सभी संगठनों के प्रमुख, अपनी ही जाति के लोगों को बनाने का क्या उद्देश्य है ? सत्ता में बने रहने के लिए, उनसे भी अनैतिक काम करवाना चाहते हैं? इन सबसे हमारा तंत्र भ्रष्ट नहीं हो रहा है? और यह कब तक चल सकता है? इतिहास साक्ष्य है कोई भी अनिश्चित काल के लिए सत्ता प्रमुख रह सकता। ' सहयोगी नेता ने फिर से कहा।

इतनी बात तो, मुख्यमंत्री के लिए अत्यन्त पीड़ा देने वाली, और सर्वथा असहनीय थी। उन्होंने तेवर कड़े किये  - 'पीकर आये हैं क्या ? यह तो बागी स्वर लग रहा है, आप को पार्टी की नीतियां पसंद नहीं तो जाने के लिए स्वतंत्र हैं। और यदि हमारी नीतियों और अपेक्षाओं के विरुद्ध काम किया तो हमही पार्टी से निकालने के लिए विवश होंगे । हमें अनुशासन हीनता कत्तई पसंद नहीं। पहले भी देखा है आप पार्टी विरूद्ध मीडिया तक में वक्तव्य दे चुके हैं। '

नेता जी भी झुकने वाले कहाँ थे उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि ईश्वर ने उन्हें जन्म दिया है और जनता ने चुनकर सभा में भेजा है इसलिए वे पार्टी के अतिरिक्त जनता और ईश्वर के प्रति भी उत्तरदायी हैं, न कि मात्र अपने जाति और धर्म के। मुख्यमंत्री और नेता जी के बीच की दरार अत्यधिक चौड़ी हो गयी। नेता जी के ऊपर विधायक निधि में गड़बड़ी का अभियोग लग गया और जाँच बिठा दिया गया। नेता जी का मुंह ऐसे बंद हो गया जैसे बजते लाउडस्पीकर का तार कट गया हो।

नेता जी का इस घुटन के साथ पार्टी में रह पाना कठिन था। जिन्हे पद, प्रतिष्ठा, सार्वजानिक साधन अथवा जन-धन के दुरूपयोग का लोभ हो वे चाहे पार्टी से जुड़े रहें पर नेता जी को इस प्रकार का कोई लोभ तो था नहीं, उन्होंने पार्टी से स्वयं को अलग रखना ही उचित समझा।


*****

घर का भेदी

नेता जी को पहले ही पता था उन्हें पार्टी से अलग होना पड़ेगा।  या तो बेईमान मंत्रियों का साथ देते या खुद भी बेईमान हो जाते। उन्हें नितिगत बात करने के कारण पार्टी विरोधी बताया जाता था।  चूकि पार्टी में स्वार्थी लोगों और बेईमानों का बोलबाला था, नेता जी को डर था कि पार्टी से अलग होने के बाद उन्हें तंग किया जायेगा। 
इसलिये वे कुछ अन्य नेताओं से, जिनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता अनदेखी करते थे, मेल जोल बढ़ा लिए थे और पार्टी की गलत नीतियों के बारे में बता बता करके पार्टी के विरूद्ध भड़काते रहते थे । जब वे पार्टी से अलग हुए तो उनके साथ एक दर्जन सदस्य और भी थे। अब तो सरकार में  भूचाल आ गया, मुख्यमंत्री की कुर्सी हिलने लगी। सरकार अल्पमत में आ गयी। फिर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, और साथ ही मीडिया का शोर शराबा।

मुख्यमंत्री कहते नेता जी को अनुशासन हीनता के कारण पार्टी से निकाला गया है और नेता जी कहते की पार्टी में बढती बुराइयों के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दिया है। 

कारण कुछ भी रहा हो इस स्तर की और इस तरह की बात की जाँच के लिए प्रदेश में कोई तंत्र तो था नहीं और होता भी तो उसका क्या परिणाम होता, अनेकों जाँच आयोगों के कार्य प्रणाली से सभी अवगत थे। नेता जी के पृथक होते ही विरोधी दल ने हाथों हाथ लपक लिया। नेता जी ने सशर्त समर्थन देने की बात स्वीकार कर ली। फिर क्या था विरोधी दल के प्रमुख मुख्यमंत्री बन गये और नेता जी उनके सहयोगी। 

अब प्रश्न था कि नेताजी, गन्दगी को गन्दगी से साफ करेंगे या कि साबुन से। 










Monday, 2 May 2016

Kamwali ko chay

 -तीसरा पहिया 
2 -बोलती खामोशी 
3 -पुतले का दर्द 
4 - मैला इन्द्रधनुष 
5 -रिश्तों का ब्याज 
6 - एक पुख्ता सवाल 
7 -संजीवनी 
8 -स्वयंसिद्धा 
9 -विभीषण
10 - धर्म का अर्थ

काम वाली की चाय

भुवन ने उठते ही चाय के लिए बोला, मगर नीतू इधर उधर के कामों में लगी रही। आधा घंटा हो गया और चाय बनने का नामो निशान नहीं। भुवन की चाय पीने की प्रबल इच्छा थी, उसने एक बार फिर याद दिलाया। 
नीतू बोली 'अभी'

थोड़ी देर में घंटी बजी, लक्ष्मी दाखिल हुई और दो मिनट में चाय सामने आ गयी। भुवन ने पूछा, 'अभी तो आई है। इतनी जल्दी उसने कैसे चाय बना ली?'

'मैने पानी पहले ही रख दिया था। उसका भी आने का समय हो गया था, फिर उसके लिए अलग से बनानी पड़ती। '
नीतू बोली। 

'वाह, तुम भी गजब हो! लक्ष्मी के चक्कर में मुझे चाय के लिए आधा घंटा तरसा दिया। उसे चाय पिलाना जरूरी था तो दुबारा बना लेती या वह खुद बना लेती। पहले बताती तो मैं ही बनाकर पी लेता, पर तुम्हारे हाथ की चाय की बात कुछ और ही है। कल तो मेरे कहने से भी पहले चाय आ गयी थी । '
'कल लक्ष्मी जल्दी आ गयी थी न !' फिर नीतू चिल्लाई, 'लक्ष्मी! चूल्हे के पास पराठा पड़ा है, गरम करके खा लेना। ' फिर, धीरे से भुवन के कान के पास मुंह करके बोली 'जानते हो! पटाकर रखना पड़ता है ! कई बार दूसरे काम भी लेने होते हैं। और कभी कभी जब तुम बाहर जाते हो तो बाजार से छोटी मोटी चीज भी इसीसे मंगवा लेती हूँ। ' 

'मगर ध्यान रखना, पैसे दो तो ये लोग उसमें दण्डी भी मार लेते हैं।' भुवन ने समझाया। 

'खोट निकालने की तुम्हारी आदत है। तुम भी तो स्टेपनी के लिए घिसा पिता पिटा टायर रखते हो। '

एस० डी० तिवारी 




कामवाली -१
बजाज साहब शाम को घर आये, घंटी बजाये, सावित्री ने दरवाजा खोला। चेहरा कुछ मुरझाया हुआ था।
'सब ठीक है न ?' पूछते हुये सीधे शयन कक्ष में चले गये और बिस्तर पर सुस्ताने के लिए बैठ गये। सावित्री अभी कुछ बोली भी नहीं, तभी फिर से घंटी बजी, वह दरवाजा खोलने शीघ्रता से गयी। वापस खिला हुआ चेहरा लेकर आई और पूछी 'चाय पियोगे न ?'
बजाज साहब 'हां' बोलते हुये पूछे 'कौन है?'
'कामवाली। '

कामवाली - २
'मेम साहब, इस महीने के पैसे मुझे एडवांस में दे दो'  कामवाली मनोरमा से बोली।
'क्यों, क्या हो गया ?'
'मुझे दो हजार रुपये बाबा के खाते में जमा कराने हैं।  इस महीने उनके दर्शन करने जाना है। मोहन की नौकरी छूट गयी है न ! पहले गयी थी, कुत्ते को रोटी खिलाया, गाय को गुड़ खिलाया, पांच शनिवार को समोसा भी खाया, मगर कुछ नहीं हुआ। सोच रही थी एक बार और हो आऊं ।'
'और फिर नहीं लगी तो फिर से दो हजार जमा कराएगी? बाबा बोल देंगे, गुड़ में नमक लगा रहा होगा। इससे अच्छा ये पैसा उसके नौकरी ढूंढने के लिए आने जाने में खर्च कर।'
कामवाली सोच में पड़ गयी।


कामवाली - ३

फूलवती ने आते ही मुहल्लनामा  बांचना शुरू कर दिया, 'अरे मेम साहब आपको पता है ! कम्मो, जब देखो, गली के नुक्कड़ पर खड़ी होकर किसी लडके से खुसर फुसर करती रहती थी। '
'हाँ मैं भी देखती , उसके मोबाइल की घण्टी बजती ही रहती है। अधिकतर गर्दन टेढ़ी करके मोबाइल दबा लेती है और घंटे भर बर्तनों की खटपट कराती है। इधर तीन दिन से नहीं आ रही है। मैं तुझे ढूंढ ही रही थी। जब तक नहीं आती है मेरा भी काम कर दे। '
'हां हाँ मेम साहब, मुझे पता था, तभी तो आई हूँ। मैं गांव गयी तो आप ने उसे लगा लिया। मैं आपका काम छोड़ना थोड़े ही चाहती थी। अब तो मुझे करना ही है। '
'अरे नहीं, जब तक वो नहीं आती है, तभी तक। हटाउंगी तो उसे दुःख होगा। जब छोड़ेगी तो तुम आ जाना। '
'अब वो नहीं आएगी, मेम साहब ! कम्मो उसी लडके के साथ भाग गयी है।'
'अरे, उसके दस दिन के पैसे भी हैं, उसकी माँ को खबर दे देना आकर ले जाएगी। '


कामवाली - ४

शम्भू को खाना देकर मेघना दूसरे काम में व्यस्त हो गयी। सब्जी बड़ी स्वादिष्ट बनी थी, शम्भू और लेना चाहता था मगर सोचकर कहीं मेघना के लिए कम न पड़ जाय थोड़ी थोड़ी करके खा रहा था और अंचार से काम चला लिया।
अगले दिन सुबह देखा तो कामवाली सब्जी पराठा खा रही थी।
शम्भू यह देख कर चौंका, 'अरे! इतनी जल्दी खाना बन गया।'
'कल का पड़ा है, फ्रिज में रख दी थी।'
'सब्जी पड़ी थी ? मैं तो थोड़ी थोड़ी करके खाया था।'
'थोड़ी सी मैंने अलग रख लिया था। मुझे लग रहा था, तुम इससे अधिक नहीं खाओगे, काम वाली खा लेती है तो खुश रहती है।'



कामवाली - ५

सतीश ने कामवाली को दे दिया अब तो सरिता को सांप सूंघ गया।
कहीं कामवाली सतीश से ज्यादा खुश न हो जाय

वह उसका अधिक ख्याल करने लगी, चाय सामान अदि


कामवाली - ६

'मेम साहब कितनी रोटी बनानी है ?'
'बस आठ बना ले, तीन तीन हम दोनों की और दो चिंटू की। कल नौ बोली, तूने दस बना दिया और वो भी मोटी, दो बच गयीं। फ्रीज में थोड़ी सब्जी पड़ी है, गरम करके खा ले। '
कामवाली खाना बनाकर चली गयी। उसने रोटी इतनी पतली बना दी कि आज चिंटू तीन  खा गया। सुरेंदर और सिंधु खाने बैठे तो दोनों के दो, दो खाने के बाद एक ही रोटी बची। फिर वे एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।
सिंधु बोली 'ले लो, थोड़ा सा चावल भी है, अभी गरम कर देती हूँ ।' सुरेंदर का उसे खाकर भी ठीक से पेट नहीं भरा।
अगले दिन सिंधु ने फिर दस रोटी बोल दिया तो उसने मोटी बना दी।


कामवाली -७


 ये बड़े लोग ताजी  रोटी नहीं खाने देते।  बासी हो जाती है तब कामवाली को पूछते हैं।


कामवाली - ८

मेरी साड़ी कैसे पहन ली
कोई चोरी थोड़े ही की है साहब ने दी है
नई साड़ी
सिंधु ने सोचा आज तो उसे भाव से लुंगी
बोला मेरे लिए लाया है दे उसे दिया
वह अपनी शिकायत लेकर पहुंची
की बादल पहले ही बरस पड़ा। इतने प्यार से पसंद करके तुम्हारे लिए साड़ी लाया। और तुम ने उसे दे दिया। नहीं पसंद था तू बता देती बदल लाता।
अच्छा जी उल्टा चोर कोतवाल को डाटे। पकड़े गए तो बात बना रहे हो। तुम्हे तो कामवाली का ही ज्यादा ख्याल है मेरा कहाँ। अब तो दिन का  खाना भी दोनों ने नहीं खाया। कामवाली आई तो सिंधु ने बोल दिया। दिन का पड़ा है वही खा लेंगे। चल चाय बना ले।
'क्या हो गया मेम साहब, तवियत तो ठीक है न ! खाना क्यों नहीं खाया ?'
तू ही जहर बो गयी थी।
हा दइया, मैंने क्या किया ?
तूने ही तो कहा था, कल जो साड़ी पहनी थी साहब ने दिया था।
'हाँ वो जहाँ दूसरी जगह काम करती हूँ न। उनकी मैरिज एनिवर्सरी थी, मुझे गिफ्ट दिया था।
सिंधु दौड़ी गयी और जाकर अलमारी में देखा तो साडी वहीँ पड़ी थी। किसी ने कहा कौवा कान ले गया तो कौवे के पीछे दौड़ ली, अपना कान नहीं देखा। अपने किये पर वह बहुत पछताई।


कामवाली -९

कामवाली के आने से पहले ही दरवाजा खुला था।



कामवाली १०

क्या हुआ आंटी आप खुद खाना बना रही हैं ? अल्का ने दमयंती से पूछा।
हां क्या करूँ, आजकल खाना बनाने वाली टिकती ही नहीं।  जहाँ महीना, दो महीना हुआ नहीं कि छोड़ कर चली जाती हैं।
पिंकी सुन रही थी
अरे दमयंती तुझे नहीं पता जो भी खाना बनाने वाली  आती है,मम्मी उसे अपने अच्छे डिश सिखाने लग जाती हैं। जब वो सिख लेती हैं तो उनका भाव बढ़ जाता है और ज्यादा पैसे मिलने लगते हैं।


कामवाली ११

आज तो दमयंती की लाटरी खुल गयी। पूरे एक महीने बाद, नई कामवाली मिली है। बड़ी मुश्किल से महीना काटा। घर का सारा काम खुद करना पड़ता। पड़ोस की कामवाली से कितना कहा कि यहाँ का भी पकड़ ले मगर वह सुनने को तैयार ही नहीं थी। हमेशा यही कहती 'मेरे पास टेम कहाँ है '
वैसे कभी कभार कर देती
 दमयंती नई कामवाली के आतिथ्य सत्कार में जुट गयी।  ये ले चाय, साथ में दो ब्रेड भी सेक कर ले आई। दमयंती चाहती थी बस कैसे भी फंस जाय। उसकी तिकड़म सफल हुई कामवाली ने जो पगार बोली, दो सौ रुपये करके मान गयी। और अगले दिन से काम पर आने को बोल गयी।
अभी हफ्ता भी नहीं बीता कि कामवाली ने कहा, 'मेम साहब अगले महीने मेरी बेटी की शादी है, मेरे इस महीने के पैसे एडवांस दे दो, कुछ सामान वगैरह खरीदना है ।  और पांच तारीख से पंद्रह दिन मैं छुट्टी पर रहूंगी।  २१ तारीख को आउंगी, तब तक के लिए मैं किसी को लगा जाउंगी। '
दमयंती बड़ी खुश हो गयी, चलो किसी को लगा कर, छुट्टी पर जाने को बोल रही है और पैसे तो देने ही हैं आज नहीं तो पंद्रह दिन बाद,  'ठीक है, जब दुबारा काम करने आएगी तो ले जाना। और शादी के लिए कुछ सामान भी दूंगी। ' दमयंती उसके काम से खुश थी। चाहती थी उसे कितना खुश रखे कि वह छोड़े नहीं।
कामवाली को एडवांस के साथ कई सामान भी दे दिया, लड़की की शादी थी। पुण्य भी मिलेगा।
कामवाली एडवांस और सामान लेकर गयी, मगर उसी दिन से छुट्टी मार ली।  उसके बाद काम पर नहीं आई न ही किसी को लगवाई। दमयंती बीस तारीख तक किसी प्रेमी की तरह उसकी प्रतीक्षा करती रही पर बेकार। दिन बीतते रहे मगर कामवाली का कहीं अता पता नहीं। अब तो जो भी काम वाली मिलती दमयंती पूछती अरे ऊषा को जानती हो।  जब हाँ में उत्तर मिलता तो पूछती, 'अपने गांव से आई कि नहीं?'
कइयों ने कहा, 'हाँ वो तो कबकी आ गयी है, उधर काम पर भी जाती है। '
दमयंती यही सोचती, मिलेगी तो बताउंगी। मगर वह उसे कहाँ मिली।  झख मारकर दूसरी ढूंढनी पड़ी।


कामवाली ११

'सोनम! जरा जा, देख आलमारी खुली है, एक पांच सौ का नोट निकाल ला, जाऊं कुछ सामान ले आऊं।'
सोनम पांच सौ के नोट के साथ आलमारी में पड़ी एक चांदी का छल्ला भी लाई।  हँसते हुए,  'मम्मी, इसे भी पहनती हो क्या !'
'नहीं, ले जा वहीँ रख दे। तुझे पता है, ये ४० साल पुरानी है। सम्हाल कर रखी हूँ।'
'लगता है आपको भी किसी ने धोखा दिया है। मगर, उसकी याद सम्हाल कर क्यों रखा है मम्मी? फेंक देती हूँ।'
'ले जा चुप चाप वहीँ रख आ। पता है तेरी नानी के घर एक शीला आंटी  काम करने आती थीं। मेरे पांचवे जन्मदिन पर  उन्होंने यह सौगात दिया था।  उसकी हस्ती वही थी। पर प्रेम तो देख। उनका वही प्रेम देखकर, यह निशानी मैं सम्हाल कर रखी हूँ। 

कामवाली १२

प्रिया चहकती हुई आयी 'आंटी मेरी घड़ी !'
सुनंदा को समझते देर नहीं लगी कि प्रिया बारहवीं पास हो गयी है। 'क्यों ? रिजल्ट आ गया क्या !'
'हां, कल ही आ गया। ६१ प्रतिशत आये हैं।'
'अरे वाह, तूने तो कमाल कर दिया।  काम करने के साथ पढाई के लिए भी समय निकाल लेती है, बड़ी बात है।  वो भी फर्स्ट क्लास से पास। वाह तूने  खुश किया। '
फ्रिज से मिठाई का डब्बा निकाल कर आगे बढ़ाते हुए, 'ये ले मिठाई खा। वैसे मैं तो गुस्सा थी, तू कल नहीं आयी, सारा काम मुझे खुद करना पड़ा। लेकिन तेरी इस खबर ने सारा गुस्सा  ख़ुशी में बदल दिया।'
'क्या करती आंटी, मम्मी की तवियत थोड़ी ख़राब हो गयी थी और पास होने के कारण हम लोग बहुत खुश थे इसलिए भी आने का मन नहीं हुआ।'
'चल कोई बात नहीं जल्दी से अपना काम कर ले, फिर मैं तुझे घड़ी देती हूँ। इम्पोर्टेड घड़ी है।  पिछली बार भैया आया था तो स्विट्ज़रलैंड से मेरे लिए लाया था, लेकिन मुझे अपनी पुरानी घडी ही अच्छी लगती है। अब वो तेरी है।'
प्रिया ख़ुशी से चिल्लाते हुए, 'हा, इम्पोर्टेड घड़ी, सुना है स्विट्ज़रलैंड की घड़ियाँ सबसे अच्छी होती हैं। माँ सुनेगी तो कितनी खुश होगी।'
'हाँ,  और यही नहीं तू कॉलेज में नाम लिखवा ले, तेरे कॉलेज की फीस भी मैं दूंगी।'
'सच आंटी ! फिर तो मैं अफसर बनकर दिखाउंगी।'
'शाबाश प्रिया ! वही तो मैं देखना चाहती हूँ। ऐसा हो गया तो मैं अपना जीवन धन्य समझूंगी।' 


कामवाली १३

घनश्याम जी, अपने बेटे अंकित के साथ गेट पर खड़े प्रतीक्षा कर रहे थे कि कामवाली निकले तो वे और पूछ ताछ कर लें।  कामवाली से बढ़िया घर का भेदी और कौन हो सकता है।
लड़का कब आता है। पीता पाता है कि नहीं आदि।
कई प्रश्न पूछे वह सब ठीक ही बताती गयी।
जब वो संतुष्ट होकर चलने को हुए तो वो बोल पड़ी, 'साहब उस घर से मैं पगार लेती हूँ वहां की बुराई थोड़े ही करुँगी।
'घनश्याम को बात समझ आ गयी। तुरंत एक हजार रुपये निकाले, 'हाँ अब बता'।
'रुपये लेकर बोली हाँ साहब अच्छे लोग हैं, लड़का भी अच्छा है।' 
'अच्छा, उन लोगों को बताना नहीं कि मैंने तुमसे ये सब पूछा।'
'ठीक है साहब।'



कामवाली १४ 

मशीन सी जिंदगी

चाय का कप रखते ही, शालिनी बड़बड़ाने लगी, 'यहाँ क्या जिंदगी है यार। सुबह उठते ही मशीन की तरह लग जाओ। नाश्ता तैयार करो, चिंटू को तैयार करो, फिर खुद तैयार होवो। अपना, रोहन का और चिंटू का टिफ़िन पैक करो। फिर ऑफिस जाते समय चिंटू को  शिशु सदन छोडो, शाम को आते हुए ले के आओ। फिर डिनर तैयार करो। फिर अगले  दिन की तैयारी शुरू,  रोज रोज पिज्जा तो  खाया नहीं जाता। वीक एन्ड पर दो दिन मिलते हैं, उसमें भी एक दिन घर और कपड़ों की सफाई में निकल जाता है। फिर घर के घटे बढ़े सामान लाकर रखो।  कई बार तो सोचकर परेशान हो जाती हूँ, आखिर हम मशीन हैं या इंसान। '
'क्यों? रोहन मदद नहीं करता ?' मृदुला ने पूछा।
'रोहन हाथ तो बंटाता है, मैं अकेले कहाँ से कर पाती। मगर सब काम जंजीर की कड़ियों की भांति, एक दूसरे से लगे होते  हैं; कोई भी काम स्वतंत्र तरीके से नहीं कर सकते। और हर बात का ध्यान  तो मुझे ही रखना पड़ता है। मर्दों का तो तुझे पता ही है। अपना इंडिया कितना अच्छा है यार! हर काम के लिए अलग बाई मिल जाती हैं, झाड़ू पोंछा वाली अलग, खाना बनाने के लिए अलग, कपड़े धोने के लिए अलग।"

ये भी तो देखो, हमने क्या प्रणाली बनायीं है; आधे लोग मजे करते हैं, और आधे उनकी सेवा। यहाँ सभी अपना काम करते हैं, कोई किसी का नौकर नहीं। यहाँ सभी अपने काम का उचित पारिश्रमिक पाते हैं, और वहां कामवाली बाई को अपनी मेहनत का पूरा मिलता है क्या?



मम्मी
चांदी का छला

Sunday, 1 May 2016

Shani ke sadhesati

शनि की साढ़ेसाती

पूजा समाप्त हुई। कई लोग पंडित जी को अपना अपना हाथ दिखाने लगे।
'जीजा जी आप भी दिखा लो'  लल्लन बोला। विभूति नारायण दूर से ही सब देख रहे थे, पंडित जी किस प्रकार से सबको चला रहे हैं।  मजे लेने के ध्येय से वे पंडित जी के पास पहुँच गए। 'देखिये पंडित जी ' अपना दायां हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया।
पंडित जी ने बताया, 'आप एक बार बहुत बीमार पड़े थे !'
'हाँ'
पंडित जी ने फिर पूछा 'आपके कितने बच्चे है? 'एक....  नहीं, दो ...ऊहूं, तीन?' थोड़ा रूक गए।  पंडित जी असमंजस में पड़े विभूति नारायण की ओर देख रहे थे, जिस संख्या पर ये हां बोलें, उसीकी पुष्टि कर दें।  पर विभूति नारायण इस बार मौन ही रहे तो पंडित जी ने अंततः बोला  'दो'।
'नहीं पंडित जी! अभी एक ही है। ' विभूति जी ने बताया।
'आपके ऊपर तो शनि की महादशा दशा चल रही है और साढ़ेसाती का योग बन रहा है। वैसे आप का भाग्य प्रबल है, शीघ्र ही जमीन जायदाद का लाभ मिलने वाला है। बस यही शनि थोड़ी रूकावट डाल रहा है।'

विभूति जी कुछ संशय में तो पड़े कि पंडित जी ने बिना कुंडली के ही शनि की महादशा कैसे बता दिया, पर थोड़ा डरते हुए कि पंडित जी कोई बड़े खर्च वाला पूजा वगैरह बता देंगे, विभूति नारायण ने पूछा , 'कोई उपाय भी तो होगा पंडित जी! '
पंडित जी ने तुरंत अपनी झोली से रत्नों से भरी छोटी सी एक पोटली निकाला । 'मेरे पास ये रत्न  है, अंगूठी में जड़वा कर पहनने से लाभ मिलेगा।'
'कितने का है पंडित जी ?'
'मात्र इक्कीस सौ रुपये का।'
इसी तरह पंडित जी किसी को मोती, किसी को मोंगा तो किसी को पन्ना, नीलम आदि बता रहे थे। तभी भीतर से एक महिला घूँघट काढ़े आयी और पल्लू से अपना थोड़ा सा हाथ निकाल कर सामने कर दिया, ''पंडित जी !हमारे हाथ में पुत्र का योग कब तक है ?'
पंडित जी ने पूछा 'ये  कौन है ?'
एक अन्य महिला ने  उत्तर दे दिया कि एक रिश्तेदारी से आयी है।
पंडित जी ने बताया, 'शीघ्र ही पुत्र रत्न प्राप्त होगा, आप पुखराज धारण करें।'
जब अधेड़ उम्र की महिला ने घूँघट उठाया तो सब हंस पड़े। पंडित जी थोड़ा नाराज मगर दृढ़ होकर बोले, पहन कर तो देखो!

एस० डी० तिवारी






Allah se mango


अल्लाह से मांगो

ख्वाजा जी की दरगाह में जैसे ही घुसा, एक व्यक्ति आकर पूछने लगा, हां जी कितने की चादर चढ़ाओगे? मैंने बोल दिया नहीं भाई, चादर नहीं चढ़ानी, बस दर्शन करना है। मैं आगे बढ़ता गया, वह बगल में साथ चलता रहा, 'पांच की नहीं तो ढाई हजार की ही चढ़ा लो, फूलों के सस्ती भी है।  देखो, अभी तुमसे आगे वे साहब गये हैं, पंद्रह हजार की चढ़ा रहे हैं।' मैं उसकी बातों पर अधिक ध्यानं दिये बिना आगे बढ़ गया, जब बुलंद दरवाजा के पास पहुंचा तब तक वह पीछे हट चुका था।

मैं सीधे गरीबनवाज की  मजार पर पहुंचा, सिर झुकाकर सजदा किया। जब मजार में घुसा तो अंदर मात्र छः सात लोग ही दिखाई दे रहे थे, पर न जाने कहाँ से एकाएक भीड़ आ गयी और उसी में मेरी पैंट की पीछे की जेब से किसी ने पर्स निकाल लिया। मुझे तुरंत इसका आभास हो गया और मेरे पीछे खड़े एक व्यक्ति पर मुझे शक हुआ। मैं पलट कर उसे नीचे से ऊपर तक देखा तो वह बड़े भक्ति भाव से अपने दोनों हाथ आँखों के सामने करके कुछ पढ़ते हुए दुआ मांगने लगा। मुझे विश्वास था कि पर्स उसी ने निकाला है पर वह उसके पास नहीं था। उसने अपने पीछे खड़े एक लडके को पास कर दिया था। मैंने बोला, 'जिसने भी निकाला है वह पछतायेगा ही, पर्स में विजिटिंग कार्ड के आलावा कुछ भी नहीं है।' तभी उसके पीछे खड़ी एक महिला की आवाज आई 'ये किसका पर्स है? ' मैंने देखा, मेरा ही था।

गरीबनवाज के दर्शन करके मजार के बगल में ही सूफी कव्वाली का कार्यक्रम चल रहा था। वह बहुत ही अच्छा लग रहा था पर पर समय आभाव के कारण एक दो सुनकर ही वहां से हम चल दिए। जब टैक्सी में बैठे तो ड्राइवर ने पूछ लिया 'कैसा दर्शन रहा साहब ?' मैंने उसे पूरा  किस्सा सुना दिया।  ड्राइवर ने कोई नाम लेते हुए पूछा, 'आप उधर नहीं गए थे?' जब मैंने नहीं बोला तो उसने फिर पूछा 'अंगूठी पहने हैं?' हाँ बोलने पर उसने बताया, 'साहब आप बच गए, वहां एक मोटी सी दीवार है जिसमे दो बड़े सुराख़ हैं, इधर ये ठग बोलते हैं इसमें दोनों हाथ डाल कर सीना दीवार से सटा लो और अल्ला से दुआ मांगो, सभी मुराद पूरी होगी। दीवार के दूसरी ओर इनके आदमी होते हैं वे अंगूठी निकाल कर भाग जाते हैं। बाहर निकल कर वहां तक जाने में पंद्रह बीस मिनट लग जाता है और इनसे शिकायत करो तो बोलेंगे कि हमें क्या पता, आप की अंगूठी अल्ला को मंजूर हो गयी। '

मैंने ड्राइवर का धन्यवाद किया, 'अच्छी बात बताई भाई, ऐसे स्थान पर जाने में सतर्क रहने का पाठ पढ़ाया । '

एस० डी० तिवारी


Makkhi bhagane ki dawa


मक्खी भागने की दवा

एक बार सुदर्शन ने अख़बार में पढ़ा 'मक्खी भागने की अचूक दवा'। बस आप अपना पता लिख पोस्टकार्ड और पांच रुपये का डाक टिकट एक लिफाफे में कर के दिए गए पते पर भेजें। सुदर्शन भी क्यों चूकने लगा था। वह डाकखाने अपना लिफाफा भेजने गया तो मंगल मिल गया। मंगल के पूछने पर उसने उसे भी  बता दिया और बोला तू भी भेज दे। पहले तो मंगल ने आनाकानी की और भोला की कहानी बताकर हतोत्साहित किया -

'दिल्ली के एक अख़बार में भोला को एक परचा मिला उस पर नौ खाने बने थे। छः खानों में अंक भरे थे और तीन खाने खाली थे।  उन तीन खानों में इस प्रकार अंक भरने थे कि सभी पंक्तियों के जोड़ उसमे दिये अंक के बराबर हों। सही होने पर इनाम मिलेगा। उसका हल इतना सरल था कि कोई भी भर ले। भोला ने भरकर भेज दिया और उसका मोबाइल फ़ोन इनाम निकला। अब उसे सौ रुपये पहले भेजने थे और डेढ़ सौ रुपये देकर डाक का वी.पी.पी. पार्सल छुड़ाना था।  जब उसे पार्सल मिला तो उसमे खाली मोबाइल का डिब्बा मिला। ' 

खैर, इसमें कोई ज्यादा लागत नहीं है, केवल पांच रुपये का डाक टिकट और एक पोस्टकार्ड ही तो भेजना है। चलो भेज देते हैं, क्या पता कोई ऐसी दवा का अविष्कार हो ही गया हो। दोनों ने भेज दिया। अब वे मक्खी भगाने की दवा की प्रतीक्षा करने लगे। लगभग एक  माह के पश्चात उनका भेजा हुआ पोस्टकार्ड वापस आ गया। पोस्ट कार्ड पर मुहर लगी थी 'प्यारे ग्राहक ! जब आप भोजन कर रहे हों तो दाहिने हाथ से भोजन करें और बायें हाथ से मक्खी उड़ाते रहें। '

बेचारे दोनों ठगे से रह गए। पता चला कि लाखों लोगों ने पांच रुपये का डाक टिकट भेज था। 


एस० डी० तिवारी 

Riyal se rupaya

रियाल से रूपया

'मम्मी, मैं सऊदी अरब जा रहा हूँ।' अकरम, अख़बार से मिले पर्चे को दिखाते हुए बोला।
'इतनी दूर तू क्या करने जा रहा है ?'
'ये देख वहां बिजली का काम जानने वालों की जरूरत है। बस कल ही पासपोर्ट के लिए अप्लाई करता हूँ। फिर देखना साल भर में तुझे पैसे से तोप दूंगा। अब घर में पैसे की कोई तंगी नहीं रहेगी।'
'बस कर, कहां इतनी दूर जायेगा। चुप चाप पड़ा रह, मुझे नहीं चाहिए, पैसा वैसा।'  
'नहीं मां, हम लोग क्या ऐसे ही रहेंगे ! पता है वहां के एक रियाल में अठारह रुपये होते हैं। यानि कि वहां जो पैसा मिलेगा वह यहां के अठारह गुना होगा। '
अकरम, अख़बार का वह परचा पाकर बड़ा खुश था। अब वह विदेश में नौकरी करेगा और पैसे बचाकर भारत लाएगा, उसका एक अच्छा सा मकान होगा, अच्छी सी बिजली की दुकान होगी। दुकान का नाम, माँ के ही नाम से रखेगा। उसके मन में तरह तरह के ख्याली पुलाव पकने लगे। उसके बगल वाली वाली गली में शमशेर रहता था और वह वेल्डिंग का काम करता था। अकरम वह परचा लेकर उसके पास गया और उसे भी पासपोर्ट के लिए अप्लाई करने को कहने लगा। शमशेर ने भी वह परचा पढ़ा लिखा था, 'सऊदी अरब में भारी संख्या में तकनिकी विशेषज्ञों की आवश्यकता। प्लंबिंग, टर्नर, इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर, मजदूर आदि का काम जानने वाले १५ दिन के अंदर दिए हुए पते पर आवेदन करें। आवेदन करने वाले के पास वैध पासपोर्ट होना आवश्यक है।'
शमशेर को भी यह बात जंच गयी और वेल्डर के लिए अप्लाई करने के लिए राजी हो गया। अकरम ने इलेक्ट्रीशियन का कोर्स कर रखा था, और बिजली के काम में उसका हाथ साफ था।  उसे पूरा विश्वास था उसका सिलेक्शन तो हो ही जायेगा। अब दोनों पासपोर्ट के लिए अप्लाई करने और अपने अपने परिवार को समझाने में लग गये। शमशेर के परिवार वालों ने तो उसे हां कर दिया पर अकरम की माँ उसे जाने देना नहीं चाह रही थी। बड़ी मुश्किल से अकरम ने माँ को समझाया कि वहां बहुत पैसे मिलते हैं। कितने ही लोग अरब जाकर अमीर हो गए। और कौन सा वहां जिंदगी भर रहना है। एकाध साल की बात है। कमाकर फिर वापस इंडिया आ जायेगा। बेटे की जिद्द के आगे  माँ को झुकना पड़ा। तय हुआ कि अकरम सऊदी चला जाये और दो तीन साल काम करके वापस आ जाये, फिर यहीं शादी करके अपना घर बसा ले।
अब प्रश्न खड़ा हुआ कि  १५ दिन में पासपोर्ट कैसे बने ? साधारण तरीके से पासपोर्ट बनवाने में एक महीने से भी अधिक समय लगता, इसलिए उन्हें एजेंट की मदद लेनी पड़ी। पैसे तो कुछ अधिक खर्च हुए पर, समय पर पासपोर्ट बन गया।
प्रार्थना पत्र  उक्त कंपनी को मुंबई के एक पते भेजना था। आवेदन भेज दिया गया और दस दिन के अंदर वहाँ से इंटरव्यू काल आ गयी। इंटरव्यू के समय, हर उम्मीदवार को दो दो हजार रुपये जमा करवाने थे और चयन होने पर बीस बीस हजार वीसा, किराया आदि के खर्च के रूप में। अकरम और शमशेर ने भी दो दो हजार रुपये दिए, उनका इंटरव्यू  हुआ और दोनों पास हो गए। घर आने के एक सप्ताह में ही उनके पास नियुक्ति पत्र आ गया। नियुक्ति पत्र पर कंपनी का पता सऊदी अरब का लिखा  था। घर में ख़ुशी छा गयी। मोहल्ले में ढिंढोरा पिट गया कि अकरम और शमशेर काम करने अरब जा रहे हैं। अब वे कभी घर से निकलते तो सिर आसमान में होता। दोनों की दोस्ती अब गहरी हो गयी थी। हो भी क्यों नहीं, दोनों विदेश जायेंगे और कुछ दिनों में उनकी अपनी शान होगी , एक अलग पहचान होगी। बढ़िया ठाट बाट का रहन सहन होगा।
खैर, पंद्रह दिन के अंदर पूरी तैयारी के साथ बताये गए पता पर मुंबई में उपस्थित होना था। और बीस हजार रुपये भी साथ ही जमा करने थे। दोनों निर्दिष्ट तिथि को  बॉम्बे पहुँच गए। कंपनी का एक कमरे का कार्यालय वहां बैठे कर्मचारी ने पासपोर्ट और पैसे ले लिया और बोला, 'हम वीसा लगवाते हैं, तुम अगले सोमवार को सुबह दो बजे दोपहर बंदरगाह पर हाजिर हो जाना वहां से मस्कट के लिए जहाज रवाना होगा। हवाई जहाज का किराया अधिक है, इसलिए सबको पानी के जहाज से जाना है। वहां बंदरगाह पर, हमारा एजेंट मिल जायेगा, जो कंपनी की साइट पर ले जायेगा। पहुंचने में २४ घंटे लग सकते हैं, अपने खाने पीने का भरपूर सामान ले लेना।'
अकरम और शमशेर, एक बार फिर, अगले सोमवार को मुंबई बंदरगाह पर पहुंचे। वहां बंदरगाह पर काफी भीड़ थी। अकरम समझ गया, अलग अलग क्षेत्र के काम जानने वाले लोग हैं। एक दो लोगों से सऊदी के बारे में पूछा तो पता लगा कि वे सभी पहली बार ही जा रहे हैं। किसी को न तो कंपनी के बारे में कोई आईडिया था, न ही सऊदी अरब के बारे में। सब लोग जहाज में सवार हुए, अँधेरा होते होते जहाज बंदरगाह से चल दिया। जहाज घंटों चलता रहा। आधी रात के बाद, जहाज एक बंदरगाह पर रुका।  सभी सो रहे थे, शोर हुआ उठो उठो आ गए।
समय देखा तो रात के तीन बज रहे थे। सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, इतनी जल्दी कैसे आ गए। बस आठ घंटे में, कंपनी वाला तो बोल रहा था २४ घंटे लग सकते हैं। खैर, बहस करने का समय नहीं था, हड़बड़ी में सभी उठे और जहाज से नीचे उतरे। बाहर निकले तो देखा बंदरगाह बिलकुल निर्जन था। वहां कोई भी दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था। बंदरगाह पर सभी प्रतीक्षा करने लगे, हो सकता है कुछ समय बाद एजेंट आ जाय। जहाज उतारते ही वहां से रफूचक्कर हो गया। सैकड़ों लोग तट पर प्रतीक्षा करते रहे, पर कोई एजेंट नहीं आया। किरण फूट गयी पर किसी का कोई अता पता नहीं। वे जान चुके थे कि ठगी का शिकार हुए हैं। सबने सोचा चलते हैं आस पास कोई गांव, क़स्बा हो तो, पता करते हैं। सभी वहां से चल दिए। चार पांच किलोमीटर चलने पर, उन्हें एक गांव दिखाई दिया वे वहां पहुंचे तो पता लगा कि वे भारत में ही कर्णाटक के एक गांव में हैं। अब वहां उनकी भाषा समझने वाला कोई नहीं था। बड़ी मुश्किल से वे पास के एक कस्बे शिरूर तक पहुंचे वहां एक मस्जिद में उन्हें शरण मिली।


khuda ka fauji

खुदा का फौजी

'बेटा! तीन तीन ईद बीत गयी।  कब तक तू आएगा? बहुत हो गया, यहीं छोटा मोटा कोई काम कर लेना, नहीं चाहिए जयादा पैसा। '

'मां! मुझे एक मिशन पर दूसरे देश जाना है।  वहां से लौटने में थोड़ा समय लगेगा और वहां मेरे पास कोई फ़ोन भी नहीं होगा, इसलिए तेरे से बात नहीं कर पाउँगा।  अपना ख्याल रखना। '
'कौन से देश जा रहा है बेटा, हेलो  ... हेलो ....    '
अकरम के पास खड़े कमांडर ने तब तक फोन काट दिया था।
अकरम की माँ को क्या पता था फोन पर उसकी यह अंतिम बात चीत होगी।

तीन साल हो गए थे, फेसबुक के द्वारा अकरम को एक सन्देश मिला था, अगर अमीरात में नौकरी करनी हो तो अपना बायोडाटा, यहाँ दिये ईमेल के आईडी पर मेल कर दो। वह एक साल से नौकरी के लिए परेशान था। यह सन्देश तो उसके लिए किसी मुराद से कम नहीं था। ग्रेजुएशन में उसकी थर्ड क्लास रह गयी थी।  जहाँ कहीं भी अप्लाई करता इंटरव्यू तक के लिए बुलावा नहीं आता।  सोचा बैंक की परीक्षा में बैठे, पर वहां भी मौका नहीं मिल पाया क्योंकि कम से कम पचास प्रतिशत अंक की मांग होती। अब  देर किस  किस बात की थी। अकरम ने अपना बायोडाटा बनाया और ईमेल के द्वारा भेज दिया। अगले सन्देश के द्वारा उसे इंटरव्यू के लिए मुंबई बुलाया गया। वहां वह अपनी डिग्री वगैरह लेकर पहुंचा। इंटरव्यू में उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिया गया। वह एक तंदरूस्त लड़का था, इंटरव्यू हुआ और चयन भी हो गया।

नियुक्ति पत्र जुबानी ही मिला।  उसे बस यह कहा गया अपना पासपोर्ट और वीसा के लिए पैसे कंपनी के पास जमा करा दे ताकि वीसा लगवाया जा सके और वह जितनी जल्दी हो अमीरात जाने को तैयार हो जाय। उसके घर में ख़ुशी का माहौल छा गया।  मां की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, अब विदेश से पैसा आएगा और सारी गरीबी दूर हो जाएगी। मगर, साथ ही बेटे का देश के बाहर जाने का दुःख भी। अकरम ने मां को समझाया कि अमीरात से आने  में बस चार पांच घंटे ही लगते हैं। इससे ज्यादा समय तो अपने ही देश में एक जगह से दूसरी जगह जाने में लग जाते हैं। मां ने किसी तरह मन को समझा लिया। 

एक दिन अकरम अमीरात के लिए उड़ गया। वहां उसे कुछ दिन एक मकान में रखा गया जहां रहने और खाने पीने की ठीक ठाक व्यवस्था थी। वहां किसी तरह की परेशानी नहीं थी। अकरम को वहां अच्छा लगा। अब प्रोजेक्ट पर जाने का समय आ गया था। अभी तक उसे ठीक तरह से पता नहीं था कि उसका काम क्या होगा। बस भरोसे का पाठ पढ़ाया जा रहा था और यह भरोसा दिलाया रहा था कि उसे अल्लाह के नेक काम में लगाया जायेगा। प्रोजेक्ट की ट्रेनिंग के लिये उसे अरब के किसी स्थान पर ले जाया गया, जहां उसकी ट्रेनिंग प्रारम्भ हुई।  उसे बताया गया कि वह फ़ौज में भर्ती हो चुका है। ट्रेनिंग के बाद, अल्लाह के वास्ते जहाँ जरूरत होगी, लड़ना होगा। उसे इस बात का फक्र महसूस हुआ कि वह अल्लाह की खातिर लड़ेगा, मगर उससे बड़ा अचरज कि दुनिया की कोई भी फ़ौज अल्लाह के लिये तो चींटी से भी छोटी है फिर अल्लाह को इंसानों की फ़ौज की क्या जरूरत? अल्लाह चाहे तो, अपनी जगह से ही दुनिया पर कहर ढा सकता है, उसके कौन से काम के लिए हम जैसों को लड़ना है ! और तो और, अल्लाह ने इंसान को दिमाग भी बख्शा है कि सबकी हिफाजत करे। लेकिन यह सवाल, और किसी से पूछने की इजाजत नहीं थी, बस वह अपने आप से ही पूछ सकता था। 

उसे अब तो समझ आ चुका था कि वह कुछ खुदगर्ज आतंकवादियों के चंगुल में फंस चुका है, और अब निकल पाना नामुमकिन सा है। उसे अपने कैंप से कहीं भी जाने की इजाजत नहीं थी । कैंप इंसानों के ऊपर क्रूरता और कहर देखकर उसका दिल दहल जाता था।  अब कर भी क्या सकता था, ज्यादा पैसे का लालच उसे गर्त में धकेल चुका था। आखिर वतन छोड़ कर क्यों आया? दो रोटी तो वहां भी मिल रही थी। अब वहां रोना भी उन्हीं की मर्जी से था। कभी कभार फ़ोन से घर पर बात करवा दी जाती, पर उसे उतना ही बोलना होता जितना कहा जाता। अब एक एक लमहा काटना मुश्किल था, घुटन में जिंदगी कट रही थी। लेकिन, अब तक उसके सारे रास्ते बंद हो चुके थे। एक बार उसे ट्रेनिंग के अंतिम दौर पर भेजा गया। यह ट्रेनिंग किसी दूसरे देश में थी, वहां उसे नकली पासपोर्ट और वीसा पर जाना था। ट्रेनिंग में उसे उस देश के एक स्थान की रेकी करनी थी, यह उसकी परीक्षा भी थी। उसे बता दिया गया था, अगर कोई चालाकी की तो वहीँ सिर कलम कर दिया जायेगा। नकली दस्तावेजों के जरिये रेकी करके वापस कैंप में आने पर उसे सम्मानित किया गया और उसकी पदोन्नति भी हो गयी। तब तक कमांडरों का उस पर भरोसा भी बढ़ गया था। अब उसे उस काम को अंजाम देना था, जिसके लिए इतना सब कुछ किया गया। उसके कमांडर ने उसे शाबाशी देकर विदा किया, 'हां अपनी माँ से फ़ोन पर बात कर ले, फिर मिशन पूरा होने तक किसी से बात नहीं कर पाएगा। ' उसे अपने ही वतन जाकर दहसत फैलानी थी। उसके दिमाग में अच्छी तरह  भर दिया गया कि वह अब अल्लाह का सबसे नेक काम करने जा रहा है, मगर यह बात उससे नहीं बताई गयी कि उसे अपने ही वतन भेजा जा रहा है। उसे समझाया गया कि अल्लाह के लिए उसे अपनी जान कुर्बान  करनी है, ऐसा करने से उसे जन्नत मिलेगी। अब अकरम खुद से सवाल पूछने लगा कि खुदा के बनाये लोगों को मारना, अल्लाह का नेक काम कैसे हो सकता है? और इस तरह जान देने से जन्नत मिलती तो ये खुद क्यों नहीं जन्नत जाते ? एक बार अकरम के दिमाग में आया, क्यों न इनको ही ख़त्म कर दे, इनके जाने से कितने ही लोग चैन की जिंदगी बसर करेंगे। मगर यह उसके बूते की बात कहाँ थी!  

अब कोई भी चारा नहीं था। उसे जान तो देनी ही थी किस तरह से देनी है, बस यही फैसला करना था। अपनी मंजिल को चल दिया, उस पर नजर रखने के लिए दो और लोगों को भेजा गया। उसे बता दिया गया था, कोई चालाकी करने पर क्या अंजाम होगा। कैंप में वह हैवानियत के कारनामे देख भी चुका था। वहां उसका सारा काम बस कोड वर्ड से चलना था, उसके ऊपर लगा पहरेदार इस बात की निगरानी रख रहा था कि यह कोई गड़बड़ करे या काम को अंजाम न दे तो फ़ौरन उड़ा दिया जाय। बाजार का रंग रूप देख कर उसे कुछ कुछ लग रहा था कि यह उसका अपना ही मुल्क है। एक भीड़ भाड़ वाली जगह पर विस्फोटक रख कर वह वहां से कुछ दूर खड़ा होकर देखने लगा कि जैसे ही भीड़ आये वह रिमोट दबा दे। लेकिन अब उसका जमीर कचोटने लगी थी और बार बार खुद से सवाल पूछने लगा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है? बिना किसी बात के अपने ही लोगों की जान लेगा ! अब तो वह उपाय ढूंढने लगा कि कैसे भी हो, अपनी जान दे दे ताकि और लोग बच जायँ। मगर, अब ऐसा होना नामुमकिन था, उसे तो मरना था ही, पर अकेले नहीं मर सकता था।  ऐ खुदा! ये क्या करवा रहा है? इसीलिए मुझे धरती पर भेजा था? जिस मिट्टी ने मुझे पाला, बड़ा किया, उसी मिट्टी के लोगों को तबाह करने जा रहा हूँ! इंसान का तो इंसान की जान बचाने का फर्ज होता है, तूने यह हैवान का काम सौंप दिया! जन्नत कहाँ, गर्त तो यहीं दिख रहा है। अब तो मेरे लिए दोजख में भी जगह नहीं! मन में यह सब चल ही रहा था कि रिमोट दब गया। उसके वहीँ परखचे उड़ गये।  उसे तो पता भी नहीं चला कितने लोग मारे गए, उनमें उसका कोई अपना भी था या नहीं। खुदा के पास जाते हुये, रस्ते में उसे दर्जनों बेगुनाह जानें मिली, वे चीख चीख कर पूछ रही थीं; तूने कितनों को अपाहिज बनाया? कितनों को अनाथ किया? कितनों को बेवा किया? और तो और अपने मां बाप को भी बेसहारा कर डाला! तुझे जन्नत जाना था तो जाता, हमें तो नहीं जाना था, बेवजह अपनी जान का बाराती क्यों बनाया? तुम अपनी खुदगर्जी में दुनिया को तबाह कर रहे हो! अल्लाह तुमको कभी माफ़ नहीं करेगा! 
मरकर भी अकरम के पास रोने के अलावा कोई जबाब नहीं था।