पखड़ू का एक्का
जिसने एक्का की सवारी नहीं की, उसकी हवाई जहाज और मंहगी से मंहगी कर की यात्रा भी व्यर्थ। मैं तो उन भाग्यशाली लोगों में से एक हूँ, जिन्हें पखड़ू के एक्का में सवारी करने का अवसर मिल चुका है। यह सुनहरा अवसर मुझे उसी के गांव में ससुराल होने के कारण मिल सका। पचास साल के पखड़ू का एक्का कितना पुराना था, सही अनुमान लगाना तो कठिन था, परन्तु देख कर लगता था, उसे अपने पिता से विरासत में मिला होगा। हाँ घोड़ी एकदम नई नवेली, बदन से चुस्त दुरुस्त, तंदुरुस्त युवती थी, जिसका नाम था 'जुगनी'। वह गले में घुंघरू का हार, सिर से लटकी दो दो रंगीन चोटी, माथे पर कौड़ियों की माला पहने सजी रहती थी। आँखों में काजल तो नहीं लगाती पर नयनों के दोनों ओर नक्काशी किये हुए चमड़े के दो आवरण ताकि उसकी दृग दृष्टि इधर उधर न भटके। सुतली का बनी, लाल रंगी लगाम पकड़े, पखड़ू फूले नहीं समाता।
किसी गाड़ी या कार में, जब जोर का ब्रेक लगता है, तो झटका लगता है। परन्तु पखड़ू का एक्का इसके ठीक उलट जब चालू होता था, तब झटका देता था। फिर तो हल्के झटकों की कड़ी, पहले कमर, फिर गर्दन को हिला कर, घोड़ी के खुरों की ताल पर, कत्थकली नृत्य का रूप ले लेती। उसके खुरों की धुन को, किसी अच्छे शायर की गाई गजल पर, श्रोताओं के स्थान पर 'वाह, शाबाश, क्या खूब, कमाल है, क्या चाल है, तेरी तो बात ही कुछ और है आदि शब्दों से और फिल्मी हेरोइनों की संज्ञा देकर, पखड़ू जुगनी का उत्साह बनाये रखता। पखड़ू हाथ में चाबुक तो रखता था, पर वह जुगनी की पीठ पर नहीं पड़ता, हवा में ही लहराता था। चाबुक कभी अधिक ऊपर तक उठ जाता तो जुगनी समझ जाती उसे क्या करना है और उसे पीठ तक आने से पहले, पखड़ू को या तो अपना हाथ रोकना पड़ता या उसकी दिशा बदलनी पड़ती।
पखड़ू के एक्का के यात्रा का रोमांच तो एक्का पर चढ़ते समय ही आरम्भ हो जाता। एक्का के पीछे लगे छोटे से बांस के पायदान पर पांव रखकर एक ही छलांग में ऊपर तख़्त पर चढ़ना होता और पांव बटोर कर उस पर बैठना होता। तख़्त उसके पहियों से, जो लगभग पांच फुट व्यास के थे, थोड़ा सा ऊपर होता और उस पर टाट की गद्दी बिछी होती। एक्का के चलते ही, सभी यात्री हिलने डुलने लगते और कंधे से कन्धा मिलने लगता। जब किसी का पैर दूसरे यात्री को छूता तो तुरंत चेतावनी मिल जाती। अगल बगल किसी महिला सवारी के होने पर थोड़ी सतर्कता रखनी होती। जंगीपुर से मानपुर तक की, पूरी यात्रा भर, सवारी, कमर के ऊपर से हिलती रहती। अधपक्की सड़क थी, बीच बीच में गड्ढे और धूल भी। गढ्ढा देखते ही पखड़ू सवारियों को चेतावनी दे देता, 'आगे गड्ढा है, इक्का को कस के पकड़े रखना।' अब सवारी, कुछ पकड़ने का हिस्सा ढूंढने लगतीं। पकड़ने के लिए पीछे की ओर दो खूंटी भर थीं, जिसका लाभ पीछे बैठे लोगों को ही मिल पाता। इक्का पर किनारे बैठी सवारी, बैठने वाले तख्त को ही किनारे से पकड़ लेतीं; बीच की सवारियों को पकड़ने के लिये कुछ नहीं होता। जिनके हाथ लम्बे होते, बढ़ाकर वे भी तख़्त का किनारा थाम लेते, अन्यथा एक दूसरे को पकड़ कर, सहारा ले लेते। गड्ढे में पहिया पड़ते ही सबकी खामोशी टूट जाती, हलकी हंसी की फूलझड़ी के साथ रोमांचित करने वाली सबकी चीख निकल पड़ती। उसके बाद परस्पर बातचीत का सिलसिला आरम्भ हो जाता। पहले तो गड्ढे के कारण हचकी की चर्चा होती, फिर कौन कहां से आ रहा, कहाँ जा रहा, आदि । इक्का पर कोई अपरिचित सवारी होती तो उससे उसके गंतव्य गांव का नाम और उसका परिचय पूछ लिया जाता और उसे वहां तक पहुंचने की राह बता दी जाती।
इक्का के यात्रा का रोमांच, आगे आने वाले पुलिया पर और बढ़ जाता। चढ़ाई आते ही पखड़ू आवाज लगाता, 'सभी लोग थोड़ा थोड़ा आगे खिसक जाना।' इक्के का तख़्त चार फुट के वर्गाकार आकार में था और उस पर सात आठ सवारी आसीन, सवारियों को खिसकने के लिए स्थान ढूंढना बड़ा कठिन कार्य हो जाता। किसी तरह एकाध इंच की जगह बनाकर खिसकने का प्रयत्न करतीं या आगे झुककर, अपने गुरुत्व को कुछ आगे कर लेतीं। पुलिया के दूसरी ओर ढलान शुरू होते ही पखड़ू फिर आवाज लगाता, ' हाँ, अब पीछे हो जाना।'
पखड़ू को अपने तो अपने, आस पास के गांव की अनेकों दुल्हनों को मायके से ससुराल और ससुराल से मायका पहुँचाने का गौरव प्राप्त था। जब दुल्हन ले जाने की बात आती तो उसका एक्का, चार्टर्ड एक्का हो जाता। दुल्हन लाने ले जाने में उसे कुछ अतिरिक्त आय हो जाती और घोड़ी के लिए चने का प्रबंध। पखड़ू दुल्हनों की सवारी के वृतांत सुनाता रहता। उसके सुनाने की रोचक शैली के कारण, सुनने वालों को किसी फ़िल्मी कथा से कम नहीं लगता। फिर अपनी घोड़ी की प्रशंसा करने लगता, 'अरे भइया, जुगनी को भी बड़ी समझ है। वैसे तो कभी कभी विदक जाती है, पर जब एक्का पर दुल्हन बैठती है तो बिना किसी झटके के, इतने आराम से चलती है कि मानो इसकी कोई सखी-सहेली हो।' फिर तो सवारी अपने अनुभव का बखान करने लगतीं। सवारियों में, हर बार कोई न कोई मिल ही जाता, जो सुदामी चाची को जुगनी के एक्के से पटकने की चर्चा कर देता।
आज ठाकुर साहब की बेटी कोमल को आना था। ठाकुर साहब की मोटर साइकिल बड़ा बेटा अमर सिंह लेकर परीक्षा देने गया था। गांव में और किसी सवारी का साधन नहीं था, बस पखड़ू के इक्के का ही सहारा था। कोमल के मायके से जंगीपुर तक तो बस थी। बस जंगीपुर से घर तक की ही समस्या थी। कोमल को लाने के लिए ठाकुर साहब ने छोटे बेटे, बिक्रम सिंह को भेज दिया था और पखड़ू को बोल दिया था, 'कोमल आ रही है, जरा जंगीपुर में देख लेना और इक्का आराम से लाना। वह इक्का पर बैठने से बहुत डरती है। अगर हो सके तो और सवारी मत बैठाना। तुम्हारी घोड़ी के लिए अलग से भूसा और सेर भर चना दे दिया जायेगा।'
पहले भी कोमल इक्का पर बैठने से, पैदल ही चलना पसंद करती थी। कई बार जंगीपुर से पैदल चलकर आ चुकी थी। पर तब अभी कुंवारी थी, अब शादी शुदा है, पैदल कैसे आएगी। वैसे ठाकुर साहब आस्वश्त थे कि विक्रम साथ है, कोई चिंता की बात नहीं है। मगर ठकुराइन चिंतित होने लगीं, 'देखो सूरज ऊपर चढ़ चुका है, कोमल अभी तक नहीं आई।' ठकुराइन छोटी बेटी चंदा के साथ मिलकर पूड़ी, खीर आदि सब, सुबह ही बना चुकी थीं। वे चंदा से बोलीं, 'जाकर बाहर देखती, पखड़ू का इक्का आ रहा होगा, दोपहर होने को आ गयी।'
जैसे ही चंदा बाहर निकली, कोमल आती दिखाई दे गयी। 'दीदी, दीदी' बोलती चंदा, कोमल की ओर दौड़ी। यह क्या ? कोमल धूल में सनी हुई थी। उसे देखते ही सबके होश उड़ गए। ठाकुर साहब देखते ही गुर्राए, पखड़ू ने कहीं पटक दिया, क्या रे ?'
'हाँ, पापा! एक गड्ढे में घोड़े का पैर मुड़ गया था। इक्का आगे को ओलार हो गया। विक्रम तो कूद कर अलग हो गया, मैं और दत्तापुर वाली चाची धूल में जा गिरे।'
'चोट वोट तो नहीं लगी ?'
'नहीं पापा चोट नहीं लगी, धूल थी न !'
'अभी देखता हूं, ससुरा पखड़ू को। विक्रम लाठी तो लेकर आ, चल मेरे साथ।'
कोमल और उसकी माँ तो डर ही गयीं। वे ठाकुर साहब से कहने लगीं, 'इसमें पाखड़ू की क्या गलती है! घोडा है विदक गया। कहाँ बेमतलब जा रहे हो।'
पर ठाकुर साहब कहाँ मानने वाले थे। पखड़ू के यहाँ पहुंचते ही उस पर बरस पड़े। 'तुझे मैंने बोला था, इक्का संभाल कर लाना और कोमल के अलावा कोई सवारी नहीं बैठाना, तू खाली पैसे के चक्कर में रहता है। बिटिया को पटक दिया! बता, लगाऊं दो डंडा !'
'क्या करें मालिक, गांव की सड़क तो आप देख ही रहे हैं। गड्ढा थोड़ा बड़ा था, जुगनी संभल नहीं पायी। हम तो सम्हाल के ही चलते हैं।'
ठाकुर साहब का क्रोध सातवें आसमान पर था। पखड़ू को गाली तक सुना डाले। 'अब तुझे न तो पैसे मिलेंगे न ही चना। '
'जैसी आपकी मर्जी, मालिक! आखिर ये तो जानवर ही है न। जुगनी कच्चे में चलती है, कई बार पहिया डांवाडोल हो जाता है। आज यह खुद को संभाल नहीं पायी। साहब मैं तो उपरवाले का शुक्र करता हूँ, यह इक्का था, बहन को खाली धूल लगी। नहा लेगी, ठीक हो जाएगी। यही, अगर मोटर गाड़ी होती तो अस्पताल जाना पड़ जाता।'
इस बात ने ठाकुर साहब को सोच में डाल दिया और वे शांत होकर घर लौटे। उनके आने पर कोमल ने बताया, 'घोड़ी का पैर जैसे ही मुड़ा,पखड़ू चाचा ने खुद को चोट लगने की परवाह नहीं की और इक्का से झट कूद कर घोड़ी नाधने वाले बांस को कंधे पर थाम लिया, वरना तो हमें काफी चोट लग जाती।'
ठाकुर साहब पूरी कहानी सुनकर, ठकुराइन की ओर ताककर बोले, 'मैंने पखड़ू को सेर भर चना के लिए बोला था, ढाई सेर दे देना। '
समय बदला, मगर न पखड़ू बदला न ही उसका एक्का। पखड़ू का एक्का विगत पचास वर्षों से अनवरत सेवा में जुटा रहा। मैंने तो अपने पोते को भी पखड़ू के एक्का के रोमांच का अनुभव करा दिया। पखड़ू अपने एक्का का रख रखाव और मरम्मत का पूरा ध्यान रखता है। जुगनी तो मर चुकी थी, दूसरी घोड़ी भी धीरे धीरे बूढ़ी हो चली थी। इसे भी अपनी राह का एक एक पग याद था। सवारी बैठाकर, पखड़ू बस बैठ भर जाता, घोड़ी अपने आप एक्का को गंतव्य तक पहुंचा देती। जब कभी पखड़ू किसी कारण से एक्का नहीं ला पाता, प्रतीक्षा में सवारियां इधर उधर भटकती नजर आतीं। कई लोग तो पैदल ही चल देते। अब सड़क पहले से कुछ ठीक हो चुकी थी। उसपर मोटर गाड़ी फर्राटे से दौड़ने लगी थी। एक्का के बगल से हार्न बजाती सर्र से जीप या बस निकलती तो कभी कभी घोड़ी चिहुंक जाती। फर्राटेदार गाड़ियां चलने के पश्चात् भी बहुत से लोगों का पखड़ू के एक्के से मोह भांग नहीं हुआ था। कारण था कि जीप आदि में ठूस ठूस कर सवारी भरी जाती थी, साँस तक लेना दूभर हो जाता। एक्का पर थोड़ा समय तो लगता, पर खुली हवा में सांस लेते, कुछ अपनी कहते-सुनते, सवारियां गंतव्य तक पहुँच जाती थीं।
पखड़ू का बेटा बड़ा हो चुका है। उसने एक पुराना ऑटो रिक्शा खरीद लिया है और जंगीपुर से ग़ाज़ीपुर की सवारी ढोता है। वह अपने बूढ़े पिता से बार बार कहता कि अब एक्का चलाना बंद कर दें; पर, पखड़ू को अपने एक्का से बहुत प्यार था और साथ में उसका स्वाभिमान। सत्तर का होकर भी पुत्र पर आश्रित नहीं होना चाहता था। वह कहता, 'जब तक हाथ पैर चलेगा तब तक एक्का चलेगा। मेरे ही सहारे (घोड़ी की ओर देखते हुए) यह जीव भी तो पल रहा है। इतने दिन तक, इसने मुझे, अन्न दाना दिया है, मैं इसकी जिंदगी मझधार में कैसे छोड़ सकता हूँ। हम दोनों में से जब तक एक बैठक नहीं हो जाता, एक्का बंद नहीं हो सकता।'