Friday, 9 September 2016

Kuchh din aur ruk jate

कुछ दिन और रुक जाते


विद्या को जर्मन गए चार वर्ष हो चुके थे। दिव्यांश के मम्मी पापा तो जर्मनी घूम आये, मगर विद्या के मम्मी पापा अभी तक जर्मनी नहीं जा पाए थे। विद्या ने उन्हें कई बार कहा, मगर इंडिया में कोई न कोई काम होने की बात कहकर, वे टाल देते। विद्या और दिव्यांश दोनों ही कहकर हार गए कि पापा जी, समय निकालिये और एक बार यूरोप घूम लीजिये, बड़ी सुन्दर जगह है, पर यादव जी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।  एक दिन यादव जी नाश्ता पानी करके एक बार फिर से अखबार उठा लिए, इतने में ही फ़ोन की घंटी बजी। कोमल ने आवाज लगाई, 'देखो जी फ़ोन बज रहा है, विद्या का ही होगा।'
यादव जी अख़बार रखकर, चार्ज में लगे फोन को निकालने लगे। इतने में फ़ोन कट गया। कोमल फिर से बोली, 'उसी का है न !'
'अरे, कट गया, अभी देखता हूँ।'
नंबर देखकर यादव जी ने बताया, 'हां, उसी का था। चलो फिर से कर लेगी।'
फिर से घंटी बजी, यादव जी ने अबिलम्ब उठाकर हेलो किया। विद्या की आवाज आई, 'पापा! नमस्ते, कैसे हैं आप लोग ?'
'ठीक हैं बेटी, तुम अपना बताओ। इतनी जल्दी उठ गयी! और भारत कब आना है। '
'हम भी ठीक हैं पापा। बस आप लोगों की याद आ रही थी। और इस बार हम नहीं, आप यहां आ रहे हैं। मैं आज ही टिकट करवाने जा रही हूँ। सितम्बर में आप लोग आ जाईये। अकेले नहीं आ सकते तो दिव्यांश को भेज देती हूँ। वैसे आने में कोई परेशानी नहीं है, क्षितिज है न ! वीसा लेने में मदद करवा देगा और दिल्ली हवाईअड्डे तक छोड़ देगा। बाकी हम यहाँ  एयरपोर्ट से ले ही लेंगे।'
'ठीक है बेटी, आ जायेंगे कभी।'
'कभी नहीं, इस सितम्बर में आना ही है। शाम तक टिकट और वीसा  आमंत्रण भेज देती हूँ और क्षितिज को भी कह देती हूँ।'
'चलो इतना कह रही हो तो ठीक है।'    
फ़ोन रखकर, यादव जी कोमल के पास गए, 'सुन रही हो! विद्या हमें बुलाने के लिए जिद्द कर रही है। चलो घूम ही आते हैं। फिर धीरे धीरे बुढ़ापा घेर लेगा तो कहां जा पाएंगे।'
कोमल मन में मुस्करायी, 'वो तो कबसे बुला रही है, तुम्हीं तो नखरे दिखाते रहते हो। कब जाना है ?'
'सितम्बर में।' 
शाम को फिर से विद्या का फ़ोन आया, 'पापा, टिकट हो गया है और मैंने आपके मेल पर भेज दिया है। बस जल्दी से जल्दी वीसा के  लिए आवेदन कर दीजिये।'
यादव जी को पता चला कि उनका वापिसी का टिकट, पूरे तीन महीने बाद का है, तो वे उसे एक महीने बाद का ही कराने के लिये कहने लगे। उन्हें तीन माह का समय लम्बा लग रहा था। यदि वे तीन महीने वहां रह गए तो उनके  बिना भारत में बड़ा अकाज होगा। लेकिन विद्या ने उनकी एक न सुनी, बोली, 'पापा! पहले आ तो जाओ, फिर जब जाना चाहोगे, टिकट की तारीख बदलवा देंगे।'
विदेश घूमने का मन तो यादव जी का भी बहुत था मगर वे बड़े सामाजिक और मिलनसार व्यक्ति थे। अपने कस्बे के लोगों में उनका समय बहुत अच्छा कट रहा था। उन्हीं लोगों के साथ समूह में घूमने फिरने भी चले जाते। इसके अलावा दो तीन निर्धन बच्चों को पढ़ाने का भी जिम्मा ले रखा था। उनके विदेश नहीं जाने का कारण यही सब था और कुछ वहां के माहौल व भाषा का डर। इस बार वे बेटी दामाद के आग्रह के आगे झुक ही गए। यादव जी, अब वीसा बनवाने में जुट गए। विद्या ने उन्हें फ़ोन पर सब कुछ समझा दिया था और अपने ममेरे भाई क्षितिज को इसमें मदद के लिए बोल दिया था। यादव जी ने जर्मनी के वीसा के लिए आवेदन किया और उन्हें तीन महीने का टूरिस्ट वीसा मिल गया।
यादव जी सपत्नी बर्लिन पहुंचे। जर्मन की ठण्ड के बारे में उन्होंने सुन तो रखा था, पर इतनी ठण्ड पड़ती है, इसका अनुमान नहीं था। जाते ही हाड़ कंपाने वाली ठण्ड से जूझना पड़ा। विद्या ने पहले ही बता दिया था कि यूरोप में बड़ी ठण्ड पड़ती है और वे अपने गरम कपडे लेकर आएं परन्तु जो गरम कपड़े इत्यादि वे ले गए, अपर्याप्त थे। विद्या को वहां के मौसम के अनुकूल, मम्मी पापा के लिए और जैकेट, लोअर, मोज़े  आदि खरीदने पड़े।
वहां की प्राकृतिक सौंदर्य से, यादव जी अभिभूत थे। वहां की हरियाली और भारत से पृथक मौसम व पेड़ पौधों के प्रति वे बहुत आकर्षित थे। शांतिपूर्ण वातावरण में उनका मन लग रहा था। कहीं कोई शोर शराबा नहीं, यहाँ तक कि गाड़ियों का हॉर्न तक नहीं। इतनी शांति कि देखकर लग रहा था मानो तपोस्थली हो। वे टहलने निकल जाते तो पार्क की साफ, सफाई और सुंदरता देखकर, मंत्र मुग्ध हो जाते। इसी बीच विद्या और दिव्यांश ने उन्हें फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड भी घुमा दिया। एक महीना तो क्या, कब तीन महीने बीतने को आ गया, पता ही नहीं चला। अब उनके वापस लौटने का समय समीप आ गया। विद्या और दिव्यांश ने उनसे कुछ समय और रुकने का आग्रह किया, इनके वहां रहने से उन दोनों को भी बहुत अच्छा लग रहा था। कम से कम चार लोग मिलकर, कुछ बात चीत कर लेते, वरना बस एक दूसरे का मुंह देखते रहो। पास पड़ोस से इतना कुछ मेल जोल तो था नहीं। इनके जाने के बाद फिर वही अकेले। दिव्यांश ने कहा, 'मैं वीसा बढ़वा देता हूँ। कम से कम छः महीने तो यहां रुकिए। असली ठण्ड का मौसम तो अब आ रहा है। यहाँ की बर्फ़बारी भी देख लीजिये।' मगर, यादव जी अपने इण्डिया के काम गिनाने लगे। वहां की प्राकृतिक छटा, उन्हें आने से तो रोक रही थी, पर इंडिया का काम धाम अपनी ओर खींच रहा था। अपने काम और मातृभूमि से अधिक लगाव के कारण यादव जी शीघ्र से शीघ्र वापस आने को विवश थे।

अब वापस जाने में बस कुछ ही दिन बचे थे। यादव जी के भाग्य में यह भी अद्भुत नजारा देखना बदा था। प्रातः उठकर, जब खिड़की से देखे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, पूरी धरती श्वेत चादर से ढक चुकी थी। पेड़, पौधे, सड़क, घरों की छत सब जगह बर्फ ही बर्फ। पेड़ ऐसे लग रहे थे, मानो चांदी के नकली पेड़ खड़े कर दिए गए हों। यादव जी ने पहली बार हिमपात का दृश्य देखा। लान, मकान, दुकान आदि सभी बर्फ के नीचे दबे हुए थे, बर्फ के अतिरिक्त कुछ नहीं दिख रहा था। उन्होंने तुरंत कोमल और फिर विद्या व दिव्यांश को जगाया। सब के सब यह दृश्य देखकर आश्चर्य से झूम उठे। यह था बर्लिन का माइनस अटैक, तापमान ऋण १० डिग्री। जितना सुन्दर नजारा था विद्या और दिव्यांश की उतनी ही बड़ी चिन्ता। रात की भारी बर्फ़बारी के कारण सभी रास्ते बंद हो गए थे। यहाँ तक कि गैराज से गाड़ी निकाल पाना भी असंभव था। शुक्र था की उस दिन शनिवार था और विद्या तथा दिव्यांश को काम पर नहीं जाना था पर घर के कुछ जरूरी सामान लाने थे। विद्या बोली, 'अब तो कहीं दोपहर बाद तक ही सड़क साफ हो पायेगी, ऐसे में कहीं जा तो सकते नहीं, चलो घर पर ही बनाते खाते हैं। आप लोग नजारा देखिये, तब तक चाय बनती हूँ। '

विद्या को तभी ध्यान आया, दूध तो घर पर है ही नहीं, अब चाय कैसे बनेगी। कल ही लाने वाली थी, मगर उसे काम पर से लौटने में थोड़ी देर हो गयी, इसलिए सोची अगले दिन सुबह ले आएगी। समाचार भी नहीं देख पाई कि अगले दिन के मौसम के बारे में जान पाती। बर्फ के कारण बाहर निकल पाना बहुत कठिन था, परंतु अब आवश्यक हो गया। फ्रिज में देखी तो एक नीबू पड़ा था।  ये हुआ कि आज नीबू की चाय पीते हैं। चाय पीकर, उसने बाहर देखा तो सड़क से बर्फ हटाई जा रही थी। सोची, तब तक वो भी अपने ड्राइव वे की बर्फ हटा ले ताकि सड़क साफ होने पर बाजार से घर के सामान ले आये। विद्या के साथ, यादव जी भी मदद करने में जुट गए। वो बार बार कहती रही, 'पापा, आप आराम से बैठो, हम और दिव्यांश साफ कर लेंगे।' पर यादव जी नहीं माने, उन्होंने बेलचा उठाया और बर्फ हटाने लगे। यह काम उनके लिए अनोखा था और बड़े मुदित मन से सलग्न हो गए। यादव जी को बर्फ का अनुभव तो था नहीं, एक जगह बर्फ जम गयी थी और हटाते समय उनका पांव फिसल गया। बर्फ हटी, गाड़ी निकली और यादव जी सीधे अस्पताल। वहां जाकर, पता चला कि पैर की हड्डी में क्रेक आ गया है और उस प्लास्टर करना पड़ेगा। भरने में एक महीने से भी अधिक समय लग सकता है।
दिव्यांश दौड़ भाग करके, यादव जी का वीसा तीन महीने के लिए और बढ़वा दिया। 
अब तो यादव जी को काम धाम की चिंता छोड़ रुकने के लिए वाध्य होना पड़ा। उधर अस्पताल का खर्च लाखों का। यादव जी बीमा करवा के नहीं गए थे। यह तो शुक्र था विद्या ने उनके पहुंचते ही, उनके लिए स्वस्थ्य चिकित्सा बीमा की पालिसी ले ली थी जिस कारण चिकित्सा के भारी भरकम खर्च से बच गयी।

यादव जी को जर्मन की कड़क ठण्ड में तीन महीने और बिताने पड़े, और वो भी घर में ही।



Tuesday, 6 September 2016

Na ji, naa


ना  जी, ना!

चंद्राकर जी के बेटा, बेटी दोनों ही ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी थे। बेटा-बहू एडिलेड में बड़ा सा मकान लेकर रहता था और बेटी-दामाद कैनबरा में। वे चाहते थे, चंद्राकर भी वहां के स्थाई निवासी हो जायँ ताकि आने के लिए बार बार वीसा लेने का चक्कर समाप्त हो जाय। आखिर भारत में बच्चों के बिना, अपने भाइयों के सहारे कब तक रहेंगे। वैसे भी ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी होने पर, वहां की कई सारी सुविधाओं के अधिकारी हो जाते हैं, जैसे निःशुल्क चिकित्सा, वरिष्ठ नागरिकों की सस्ती बस व रेल यात्रा और दस वर्ष स्थाई निवासी रहने के पश्चात वृद्धा पेंशन भी। चूकि बेटा, बेटी दोनों ही ऑस्ट्रेलिया के नागरिक हो चुके हैं, उन्हें स्थाई निवासी का दर्जा मिलने में कोई अधिक समस्या नहीं थी। पर जब भी केशव उनसे पी. आर. (स्थाई निवासी) के लिए अप्लाई करने के लिए कहता, वे ना कर देते। कहते वे अपना वतन और इतने रिश्ते नाते छोड़ कर कैसे जा सकते हैं। हाँ, घूमने फिरने के लिए ठीक है, और दो तीन बार तो घूम भी चुके हैं। पूरी जिंदगी भारत में काट लिया, अब बुढ़ापे में सब कुछ छोड़ कर दूसरे देश में कैसे जी पाएंगे। बड़ी मुश्किल से, किसी तरह, केशव ने उन्हें समझाया, 'पापा! स्थाई निवासी होकर भी आप भारत में रह सकते हैं। स्थाई निवासी होकर, बार बार का वीसा का झंझट ख़त्म हो जायेगा और आप को यहां की चिकित्सा सुविधा का लाभ मिल सकेगा। आपका जब मन आये यहाँ रहिये, वहां जाना हो वहां जाईये।'
उसके बाद भी आज कल करते, चंद्राकर जी ने साल बिता दिया। अब तो दोस्त मित्र भी उनको समझाने लगे थे, 'चंद्राकर जी, यहाँ  क्या रखा है! आप भी बेटे के पास ऑस्ट्रेलिया चले जाओ।'
'हाँ, मैं भी यही सोच रहा हूँ।  केशव भी बहुत दिनों से कह रहा है। मगर आप लोगों का प्यार और आदर, वहां नहीं जाने दे रहा है।'
एक मित्र अभी समझा ही रहा था कि ये प्यार कितने दिन काम आएगा, आखिरी  दम में तो बच्चे ही साथ देंगे कि चंद्राकर जी की अचानक ही तवियत ख़राब हो गयी। उनका ब्लड प्रेशर (रक्त चाप) बढ़ गया और उन्हें अपोलो अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। केशव को सूचना मिली तो अगले ही दिन छुट्टी लेकर आ पहुंचा। तीन दिन भर्ती रहने के बाद अस्पताल से छुट्टी मिली।
अब केशव को कहने का मौका मिल गया, 'बताईये, जब से कह रहा हूँ, अप्लाई किये होते तो अब तक पी. आर. आ भी गया होता। अभी तो अस्पताल का पचास हजार ही लगा, कुछ सीरियस होता तो ये अस्पताल वाले लाखों ऐंठ लेते।'
अब तक चंद्राकर जी को समझ आ चुका था। उन्होंने स्थाई निवासी के लिए अप्लाई कर दिया। अप्लाई करने के कुछ महीनों के पश्चात् ही वे ऑस्ट्रेलिया के पी. आर. (स्थाई निवासी) हो गए।
उनके पी. आर. होते ही केशव ने, चंद्राकर जी को ऑस्ट्रेलिया बुला लिया। वहां बेटे की सम्पन्नता और सुख सुविधा देखकर वे प्रसन्न तो थे, पर कुछ दिनों के बाद ऊबन होने लगी। उनका जी वहां नहीं लगता। उन्हें बार बार इंडिया के दोस्त मित्र याद आते। कहाँ इंडिया में  पार्क में बैठ कर, घंटों गप सड़ाके करते; वहां पास पड़ोस से कोई खास मेल जोल भी नहीं, बस दूर से ही हाय हेल्लो होती थी। अभी घर में कोई पोता, पोती भी नहीं कि उनके साथ मन बहल जाय। बस टेलीविज़न पर, या अपने लान के रख रखाव में समय बिताना होता था। बेटी दामाद के यहाँ तो फिर भी मन लग जाता, उसके दो छोटे बच्चे थे। परंतु चंद्राकर जी पुराने विचार के व्यक्ति थे, वे बेटी के यहाँ अधिक रुकना पसनद नहीं करते थे।
उनका बेटा केशव वीकएन्ड पर (सप्ताहांत) अपने एक मित्र के यहाँ खाने पर गया।  मित्र ने विशेष रूप से चंद्राकर जी के स्वागत में ही निमंत्रित किया था।
'अंकल! पी. आर. की बहुत बहुत बधाई। '
'थैंक यू बेटा।'
'चलिए अच्छा हो गया, अब बेटे के साथ रहेंगे। इंडिया से तो यहाँ अच्छा ही है। शांति है, कोई ज्यादा झंझट नहीं। क्या लेंगे स्कॉच या बीयर?'
 'ना जी, ना ! कभी छुआ तक नहीं।'
'अच्छा आपके लिए ठंडा लाता हूँ।'
चन्द्राकर जी को ठंडा और कुछ नाश्ता देकर, वे स्कॉच पीने लगे।
 'ये चिकन नगेट तो ले लेंगे!'
'ना जी, ना ! मैं बिल्कुल शाकाहारी हूँ।' चंद्राकर जी बोले।
'और अंकल, दिन में तो आपके बेटे, बहू काम पर चले जायेंगे, आप समय कैसे बिताएंगे?'
'देखेंगे, यहाँ तो बस तुम्हीं लोगों का सहारा है। ऐसे ही मिलते जुलते समय कट जायेगा।'
'क्लब चले जाया करिये। केशव अंकल को मेंबर बनवा दे।'
'ना जी, ना! वहां पर हमारे लायक क्या है? दारू हमें पीना नहीं, कैसिनो में मशीनों पर पैसे लुटाते रहो, यह सब मुझसे तो नहीं होगा। '
कहीं घूमने फिरने जाना होता तो चंद्राकर जी पहले ना नुकुर करते, मगर उन स्थानों की सुंदरता देखकर, मुग्ध हो जाते।
समय के साथ चंद्राकर जी की मुश्किलें बढ़ती गयीं। गाड़ी चलानी आती नहीं थी, मंदिर घर से काफी दूर था। बस का किराया इतना कि सुनकर ही होश उड़ जाते। पास पड़ोस कोई बोलता-बतियाता नहीं। उनकी दुनिया बस परिवार तक ही सिमट कर रह गयी थी। दिन में बेटा-बहू दोनों काम पर चले जाते। चंद्राकर जी कुछ समय सो लेते या घर से बाहर निकल कर टहल लेते। यहाँ तो ऐसा लग रहा था कि काला पानी हो। भारतीय मूल के लोग भी दूर दूर ही रहते थे। सप्ताह के अंत में ही मिल जुल पाते थे। हाँ, बच्चों ने एक अच्छी परंपरा चला राखी थी कि इंडिया से किसी के माँ बाप आते थे तो वे बारी बारी से खाने पर बुलाते थे। इसी बहाने वे एक दूसरे से मिल लेते और थोड़ी बहुत मन की बात हो जाती। चंद्राकर जी सुनते कि इंडिया से कोई बुजुर्ग आया है तो उनकी आत्मा के लिए संजीवनी सा काम करता। उसके अलावा भी कभी किसी यहां पार्टी आदि होती तो सभी बच्चे अपने मम्मी पापा को भी साथ ले जाते।
एक दिन चंद्राकर जी आत्मचिंतन कर रहे थे। यहाँ बच्चों का उत्तम रहन सहन है, अच्छा खा पहन रहे हैं पर उसका क्या लाभ! कोई अपना तो उसे देख भी नहीं रहा। मोटा खा पीकर भी अपने गांव में कितने प्रसन्न थे। मगर क्या करें, बच्चों के लिए सब करना पड़ता है। यहाँ अच्छी कमाई है तो महंगाई भी कितनी है। लान की एक बार घास काटने के लिए ही सौ डॉलर (लगभग पांच हजार रुपये) तक देना पड़ जाता है। घास की बात पर उनके मन में आया, क्यों न वे अपना समय फूल, फुलवारी में लगाएं! उन्होंने केशव से कहकर खुरपी और कुछ अन्य औंजार मंगवा लिया। फिर क्या था, उन्होंने लान के सौंदर्यीकरण का कार्य प्रारम्भ कर दिया। घास काटने की मशीन, केशव के पास पहले से ही थी। अब घास काटने के पैसे नहीं देने होते, यह जिम्मा चंद्राकर जी ने ले लिया। उन्होंने लान में, कुछ सुन्दर फूल और नारंगी के दो पेड़ लगा दिए। धीरे धीरे उनके लान की शोभा बढाती गयी। घर के पिछवाड़े के प्रांगण में उन्होंने सब्जियां बो दीं। मेथी, धनिया, मिर्ची, टमाटर, जहाँ पहले फ्रिज की जमाई हुई आती थी अब घर की उगाई, ताजा मिलने लगी। 

चंद्राकर जी अब पूरी तरह से अपने लान के लिए समर्पित थे। वे टहलने के लिए निकलते तो औरों के लगाए पेड़ पौधों को ध्यान से देखते। उनके मन में इच्छा जागृत होने लगी कि वे एक दिन अपना लान सबसे सुन्दर बना कर रहेंगे। जब भी नर्सरी जाते पौधों के बारे जानकारी लेते और पसंद आने पर ले आते। अब तक उनके लान में नारंगी, चेरी, बलूत, खजूर और अशोक के पेड़ अपने यौवन पर थे, और न जाने कौन कौन से शोभनीय पौधे, उनके बीच हरी कचनार घास। उधर से जो भी गुजरता, चंद्राकर जी के लान की ओर गर्दन घुमाये बिना नहीं रह पाता।
बसंत ऋतु में जहां पूरा एडिलेड रंग बिरंगे फूलों से सजा हुआ, दुल्हन की तरह सुन्दर लग रहा था; उसी सुंदरता का एक नन्हां सा टुकड़ा चंद्राकर जी के लान में भी था। एक दिन चंद्राकर जी को पता चला कि अगले दिन, एडिलेड काउंसिल के द्वारा, कालोनी के लानों का निरिक्षण होना है। चंद्राकर जी भी खर पतवार साफ़ करके, अपने लान को चमका रखे थे। इधर चंद्राकर जी की बहू आशा, गर्भवती थी, और डॉक्टरों के अनुसार उसी दिन अस्पताल में दिखाना था। डॉक्टर की सलाह के अनुसार, केशव सुबह ही आशा को लेकर अस्पताल चला गया। अस्पताल जाने पर आशा को भर्ती कर लिया गया। भर्ती कराके, अस्पताल दिखाने के ध्येय से, वह चंद्राकर जी को भी लेने आ गया। जैसे ही चंद्राकर जी अस्पताल जाने को तैयार हुए, पता चला कि काउंसिल की टीम निरीक्षण के लिए आ चुकी है। केशव की जल्दी के मारे, चंद्राकर जी टीम को अपने काम के बारे में कुछ बताने के लिए रुक नहीं पाए, और अस्पताल चले गए। सूचना पाकर उनकी बेटी, चंदा भी अस्पताल आ गयी थी।

अगले दिन प्रातः ही आशा ने एक सुन्दर से बालक को जन्म दिया। दो दिन भर्ती रहने के बाद आशा को अस्पताल से छुट्टी मिली। जब केशव और आशा नवजात पुत्र को लेकर घर आये, तभी देखा कि पोस्टमैन लेटर बॉक्स में कोई चिट्ठी डाल रहा है। चंद्राकर जी उत्सुकता वश, उसे तुरंत ही निकाल कर लाये और केशव को थमा दिया। केशव ने प्रेषक के रूप में काउंसिल का नाम देखा तो सोचा, कि काउंसिल ने कोई मांगपत्र भेजा होगा, मगर उसके ऊपर किसी तरह की कोई भी राशि बकाया नहीं थी। फिर भी सहम के ही वह लिफाफा खोला। जब पत्र को पढ़ा तो उसके हर्ष का ठिकाना न रहा। वह चंद्राकर के गले लिपट गया।
'पापा! आप ने तो कमाल कर दिया। देखो, सुंदरता में हमारा लान को द्वितीय स्थान पर आया है और कौंसिल की ओर से दो सौ डॉलर का पुरस्कार भी।'
'वाह क्या कहने, हमारे पोते के आते ही यह अच्छी खबर आयी, बस ये समझो कि इसका यह शुभ लक्षण है।'

केशव और आशा को पुत्र की प्राप्ति की बधाई देने के लिए, दोस्त, मित्रों का घर पर ताँता लगा हुआ था। जो भी आता, केशव उसे सबसे पहले लान के पुरस्कृत होने की सूचना देता। अब चंद्राकर जी ऑस्ट्रेलिया के एक गौरवान्वित निवासी थे। उन्हें एक पोता भी मिल गया था। अब उन्हें कोई समस्या नहीं थी और पूरी तरह से वहां रस बस गए थे।