Monday, 27 August 2018

Laghu katha 3


हवाई जहाज का टिकट

शालिनी के फोन रखते ही मोना ने पूछा, 'मौसी क्या कह रही थी, मम्मी!'
'कह रही थी अपना गोवा का ट्रैन का टिकट रद्द करा दो, मैं हवाई जहाज का टिकट करा देती हूँ। ट्रैन में दो दिन धक्के खाओगी और जहाज से दो घंटे में पहुंच जाओगी।'
'यह तो बहुत अच्छी बात है मम्मी। हम लोग पहली बार हवाई जहाज में घूमेंगे।'
'नहीं! हमें नहीं घूमना, हवाई जहाज में। हम जितने में हैं, ठीक हैं। अभी कौन सी जिंदगी निकल गयी है। तुम और मंटू पहले पढ़ाई कर लो, फिर तुम लोग हवाई जहाज में घुमाना।'
'मगर मम्मी! मौसी तो टिकट करवा ही रही है, उनके पास इतना पैसा है, हमारे टिकट से उन्हें क्या अंतर पड़ने वाला। और हम थोड़े ही मांग रहे हैं, वो तो खुद ही कह रही है।'
'हां बेटी, उन्हें तो अंतर नहीं पड़ने वाला, मगर हमें तो पड़ेगा न! देख ये मोबाइल फोन, जबसे दी है कितनी बार सुना चुकी है। मेरे तो सुन सुन कर कान पाक चुके हैं। जब भी मिलती है, ये भी नहीं देखती सामने कौन बैठा है, कौन नहीं; किसी न किसी बहाने जताने लग जाती है कि यह फोन उसने गिफ्ट किया है। उसके हवाई जहाज में जितना ऊँचा उड़ूँगी नहीं, उससे अधिक नीचे तो वो एहसान में गाड़ के रख देगी।'


कल कौन देगा चॉकलेट

मिहिर चाय पानी पीकर चलने को हुआ तो सौ का नोट निकल कर बिट्टू को थमा दिया। जैसे ही उसकी माँ ने देखा, आवाज लगायी, 'नहीं'।
बिट्टू को डाँटते हुए बोली, 'लौटा दे।'
मिहिर उसका मुंह ही ताक रहा था कि जशोदा वो नोट बिट्टू के हाथ से छीन कर, मिहिर को लौटाने लगी।
'अरे क्या हुआ, भाभी! बच्चा है इतने दिनों बाद दिल्ली से आया हूँ और मिठाई वगैरह भी नहीं लाया।'
'कोई बात नहीं, इसके लिए मिठाई मैं बना दूंगी।'
'ठीक है तो आप ही रख लो, इसके लिए चॉक्लेट खरीद देना।'
'नहीं, चॉक्लेट खिलाकर इसकी आदत नहीं ख़राब करनी। आज तो आप खिला रहे हो, कल को कौन खिलायेगा? हमारे पास जितनी चादर है, उतने में ही पैर रखना है हमें।'
सौ रुपये का नोट चारपाई पर रखकर; जशोदा बिट्टू का हाथ पकड़, अपने पास खड़ा कर ली।



दिन की सब्जी

सोनम के आते ही कौतुकी ने कहा, 'जा मम्मी जी से पूछ ले कितनी रोटी खाएंगी, सेक देना।'
'सब्जी नहीं बनेगी भाभी?'
'नहीं दिन की पड़ी है न! गरम करके खा लेंगी।'
'और आप दोनों की रोटी?'
'हम कहीं बाहर जा रहे हैं। आज बाहर ही खाएंगे।'
'आंटी नहीं जाएँगी ?'
'तू बहुत सवाल जबाब करती है। लगता है आंटी की तुझे ही चिंता है, हमें नहीं। तू चाहती है तुझे दो रोटी भी न सेकनी पड़े।'
'नहीं भाभी मैं तो यूँ ही कह रही थी। मुझे क्या है, दो रोटी सिकवा लो चाहे दस। आप लोग चले जाओगे और ये घर में अकेली रहेंगी   ... ।'
कौतुकी और अमन के जाते ही सोनम ने जले पर नमक छिड़क दिया। उसकी सास को सुनाने लगी, 'बताओ आज कल की बहुएं अपने तो जाकर रेस्तराँ में व्यंजन उड़ाएंगी और सास को बासी  ... ।'
 वैसे शारदा देवी को ठेस तो लगी थी, लेकिन बात घर की थी। वे समझ रहीं थीं कि ये आग लगा रही है। शारदा देवी ने उसे चुप करा दिया, बोलीं, 'तू जा, आज मेरा खाने का मन नहीं है। रेस्तरां में खाना होता तो मैं जाती नहीं क्या !'
सोनम के जाने के बाद वे दो रोटी सेंक कर अंचार से खा लीं, सब्जी को छुईं भी नहीं। 




ब्रांडेड

शशि कभी अपना पर्स आगे कर देती तो कभी अपनी ड्रेस को निहारने लगती कि सुमित्रा उससे पूछे। लेकिन सुमित्रा इस पर तनिक भी ध्यान नहीं दी। थक हार कर शशि ने ही सुमित्रा से पूछ लिया,  'तूने अपना पर्स कहाँ से लिया?'

सुमित्रा को तो पता ही था कि शशि किसी भी तरह अपनी चीज को ऊपर करके बताएगी। शशि से यह सुन सुन कर, उसके कान पहले ही पक चुके थे कि 'मुझे लोकल चीजें पसंद नहीं आती मैं तो हमेशा ब्रांडेड ही खरीदती हूँ।' सुमित्रा के पास इतने पैसे होते नहीं कि वह ब्रांडेड चीज खरीदे, बस सुन लेती। इस बार, वह मन ही मन सोचने लगी कि हर बार यह मुझे नीचा दिखाती है, इस बार मैं भी इसे थोड़ा सबक सिखाऊं।  उसने पर्स तो लक्ष्मी नगर बाजार से ही खरीदा था मगर शशि से बोल दिया, 'मैंने नहीं ख़रीदा है, जीजा जी दुबई घूमने गये थे उन्होंने गिफ्ट दिया है।'
बस फिर क्या था शशि उससे पर्स लेकर उलाट पलाट कर देखने लगी, 'किस ब्रांड का है?'
'मुझे ये सब नहीं पता।'
'मेरा तो 'लेवी' का है बहुत मंहगा है। ढाई हजार का खरीदी हूँ। लेकिन तेरा अच्छा लग रहा है। इम्पोर्टेड है न।'
'हां वो तो है। जीजा जी कह रहे थे शायद गुक्की का है।'
तब तक शशि को गुक्की का लेबल भी दिख गया। 'सुमित्रा! अब तो ये पर्स मेरा है। तू मेरे से बदल ले या फिर मैं तेरे लिए दूसरा खरीद दूंगी।'
सुमित्रा तो बड़ी खुश हुई कि यह बड़ा अच्छा सौदा है, सात सौ के पर्स के बदले उसे ढाई हजार का मिल रहा है। लेकिन उसकी जमीर गवाही नहीं दे रही थी। सात सौ का हो चाहे ढाई हजार का, काम तो वही कर रहा है। मुझे न तो दाम के पीछे भागना है, न ही नाम के। उसने बहाना कर दिया, अरे जीजा जी क्या कहेंगे।        


ऋण

अनमोल ने डब्बा आगे बढ़ाया, 'ये लीजिये सर! लड्डू खाइये।'
'वाह! बधाई हो, क्या खुशखबरी लाये हो? अनमोल!'
'सर, बैंक ने मुझे ऋण देने की स्वीकृति दे दी है।'
खन्ना साहब ने एक कागज का टुकड़ा लिया और डिब्बे में से एक लड्डू उठाकर मेज पर रख लिया- 'बहुत अच्छा, बैठो मैं भी तुम्हें मिठाई खिलता हूँ।'
अनमोल सामने कुर्सी पर बैठ गया। खन्ना साहब ने दराज से मिठाई का डिब्बा निकाला और अनमोल की ओर बढ़ाते हुए बोला, 'मैं इसे लेकर घूमा नहीं, सोचा जो जो यहाँ आते रहेगा, उसे मिठाई खिलाता रहूँगा। जब अपनी सीट पर जाना तो आरती को भी भेज देना।'
'ठीक है, सर! आप किस बात की मिठाई खिला रहे हैं?'
'बस यूँ समझो, मैं भी बैंक के ऋण का ही खिला रहा हूँ। तुम अपने सिर पर कर्ज का भार चढ़ा कर खिला रहे हो और मैं भार को उतार कर। मैंने भी अपनी कार खरीदने के लिए चार लाख का ऋण लिया था, कल अंतिम किस्त  का भुगतान कर दिया। अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ। बैंक के किस्त के चक्कर हर महीने कितनी ही  बातों के लिए मन मार के रखना पड़ता था।'



प्यार की सवारी

रिंकी को दादा की उंगली पकड़े स्कूल आते सभी बच्चे देखते थे। इस बार एक बच्चे ने पूछ ही लिया ।
'तुम कार से क्यों नहीं आते? क्या तुम्हारे पास कार नहीं है?'
यह प्रश्न तो रिंकी के मन में भी पहले कई बार आया था, और उसने दादा से उसका उत्तर पूछ लिया था। एक बार स्कूल जाते हुये उसने  दादा से पूछा, 'दादा! आखिर कार तो हमारे पास भी है, फिर आप मुझे पैदल क्यों लेकर जाते हैं? सभी बच्चे स्कूल, या तो बस में आते हैं या अपने पापा की कार में।'
दादा से मिला, वही उत्तर रिंकी ने दोहरा दिया, 'मैं तो प्यार की सवारी करके आता हूँ। देखो, न तो कोई धुआं न पर्यावरण को हानि। मेरा घर कोई अधिक दूर भी नहीं है, इतना भी पैदल नहीं चले तो पांव बेकार हो जायेंगे। और जहाँ कार ले जाना संभव नहीं और पैदल चलना ही पड़ गया तो तुम लोग थक जाओगे, परन्तु मैं चल लूंगा। पता है दादा की उंगली में कितनी ताकत होती है, मुझे चलने लायक उनकी उँगलियों ने ही बनाया है।'
यह उत्तर सुनकर सभी बच्चे अवाक् थे। रिंकी ने अपने उत्तर से सबको चित्त कर दिया था।
बिट्टू बोल पड़ा - 'मैंने तो अपने दादा जी को देखा ही नहीं।'
स्वीटी बोली, 'मेरे दादा तो गांव में रहते हैं। हम लोग कभी कभी ही जा पाते हैं।'
सन्नी बोला, 'मेरे दादा जी को कार चलाने नहीं आता। पापा छोड़ने आते हैं तो इतनी जल्दी में होते हैं, लगता है कार से ही धक्का दे देंगे।'
मोनू कहाँ चुप रहता, 'मेरा घर तो ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन डैडी कहते हैं, बेटे को इतने महंगे स्कूल में डाला है, पैदल जायेगा तो लोग कहेंगे पैसा बचा रहा है।'
'पैसा से ज्यादा जरूरी तो हमारी सांसे हैं। देखो मैं उंगली पकड़ के आता हूँ तो तुम लोगों से तेज दौड़ लेता हूँ।'



वहां क्या ये सब नहीं मिलता

सुभाष की बहन सुभांगी जब उससे मिलने, आगरा से दिल्ली आती तो चाहती कि यहाँ क्या क्या खरीद लूँ। उसे आगरा में नहीं खरीदना पड़ेगा। और सच्ची बात तो यह थी यहाँ कम पैसों में ज्यादा शॉपिंग हो जाती। यह बात नहीं थी कि दिल्ली में चीजें बहुत सस्ती हों अपितु सुभांगी, सुभाष को लेकर शॉपिंग पर जाती तो एकाध सामान के पैसे वो दे देती, कई सामान के पैसे सुभाष देता तो वह चुप्पी लगा जाती।
सुभाष की आमदनी अपने जीजा से बहुत अधिक थी।  इस बात को वह समझता था, और सुभांगी की सामान लेने में मदद करना चाहता था। परन्तु इस प्रकार सुभाष का सुभांगी के लिए पैसे खर्च करना, सुभाष की पत्नी, मनोरमा के आंख लगता था। एक बार तो वह बोल ही दी, 'क्या यह सब सामान,  इन्हें आगरा में नहीं मिलता !'
सुभाष ने उसे समझाया, 'हम लोग जब तुम्हारी माँ के यहाँ अलवर जाते हैं तो वो चाहती हैं, बेटी दामाद को क्या क्या दे दूँ। जब कि हम लोग कहते रहते हैं, दिल्ली में सब कुछ मिलता है। शायद हमें छोटा समझ कर ऐसा करती होंगी। ये भी तो हमारी छोटी बहन है। और यहाँ आकर ये सब खरीददारी के लिए उसके पास खाली समय होता है। कौन सा रोज आती है।'
माँ की प्रशंसा ने मनोरमा का मन बदल दिया।



किसके मजे

'क्या हुआ शशि! बड़े दिनों बाद फोन की। मैं कितने दिनों से तेरे फोन का इंतजार कर रही थी।' कनक बोली।
'पिछले दोनों ही सप्ताह शनिवार और रविवार को कहीं न कहीं घूमने निकल गए। इस बार भी तीन दिन की छुट्टी थी, शंभू बेल्जियम जाने का कार्यक्रम बना रहा था, मैंने मना कर दिया।'
'तुम्हारे मजे हैं यार! हर सप्ताह दो दिन मिल जाते हैं घूमते रहो। यहाँ तो साल में कहीं ऐसा अवसर मिल पाता है।'
अरे क्या मजे हैं। यहाँ लन्दन में दो दिन जरूर मिल जाते हैं बाकी जिंदगी तो एकदम मशीन है। सुबह उठते ही मशीन की तरह लग जाओ। नाश्ता तैयार करो, चिंटू को तैयार करो, फिर खुद तैयार होवो। अपना, रोहन का और चिंटू का टिफ़िन पैक करो। फिर ऑफिस जाते समय चिंटू को शिशु सदन छोडो, शाम को आते हुए ले के आओ। फिर डिनर तैयार करो। और रात से ही अगले  दिन की तैयारी शुरू,  रोज रोज पिज्जा तो  खाया नहीं जाता। वीक एन्ड पर दो दिन मिलते हैं, उसमें भी एक दिन घर और कपड़ों की सफाई में निकल जाता है। फिर घर के घटे बढ़े सामान लाकर रखो।  कई बार तो सोचकर परेशान हो जाती हूँ, आखिर हम मशीन हैं या इंसान।'
'क्यों? रोहन मदद नहीं करता ?' मृदुला ने पूछा।
'रोहन हाथ तो बंटाता है, मैं अकेले कहाँ से कर पाती। मगर सभी काम तो जंजीर की कड़ियों की भांति, एक दूसरे से लगे होते  हैं; कोई भी काम स्वतंत्र तरीके से नहीं कर पाते। और हर बात का ध्यान  तो मुझे ही रखना पड़ता है। मर्दों का तो तुझे पता ही है।'
'काम तो हमारे पास भी कौन सा कम होता है।'
'वो मुझे पता है, तुम लोग काम की चिंता ज्यादा करती हो, हमारे जैसे अपने हाथ काम थोड़े ही करती हो। तुम्हारे यहां तो हर काम के लिए अलग अलग बाई मिल जाती हैं। तुम्हारी झाड़ू-पोंछा, बर्तन के लिए अलग आती है तो कपड़े धोने वाली अलग। अगर हम काम वाली लगवा लें तो एक का वेतन वही ले जाएगी।"



ये भी तो देखो, हमने क्या प्रणाली बनायीं है; आधे लोग मजे करते हैं, और आधे उनकी सेवा। यहाँ सभी अपना काम करते हैं, कोई किसी का नौकर नहीं। यहाँ सभी अपने काम का उचित पारिश्रमिक पाते हैं, और वहां कामवाली बाई को अपनी मेहनत का पूरा मिलता है क्या?


दूर के ढोल


बेड ख़रीदा

नवीन ने आईकिया से बेड ख़रीदा। बेड के पाये, पाटी, और कई पुर्जे तथा नट, बोल्ट, पेंच आदि पैकेटों में बंद
शोरूम के बाहर लाकर रख दिया गया।
अब घर लाकर पुर्जों को लगाकर बेड तैयार करना था। लगाने पर पता लगा कि एक पाटी लग ही नहीं पा रही। साथ मिली ड्राइंग को नवीन कई बार ध्यान से पढ़कर लगाने का प्रयत्न किया, पर असफल रहा।
अब वह शिकायत लेकर आईकिया पहुंचा तो बताया गया सामान तो पूरा और सही दिया गया था। फिर भी
यदि वह बेड लेकर आए तो उसकी समस्या का निदान ढूंढा जाय या फिर उसे बदल दिया जाय। इस पर नवीन थोड़ा खीझ गया, ' अब तो हमने पूरी पैकिंग खोल दी है, लाना बड़ा मुश्किल है। और लाने, ले जाने में कितना समय और किराया खर्च होगा।'
'ठीक है सर, आप किराया मत दीजिये, हम अपनी गाड़ी से माँगा लेंगे। फिर भी थोड़ा रुकिए देखते हैं क्या गड़बड़ है।'
आईकिया के कर्मचारी ने बिल का विवरण देखा तो पता चला उसी समय एक और बेड बिका था। बिल पर अंकित फ़ोन नंबर मिलाया तो पता चला कि वह ग्राहक भी परेशान था और उसका बेड भी फिट नहीं हो रहा था। वह आईकिया को संपर्क करने ही वाला था। कर्मचारी, समझ गया कि बेड के एक पुर्जे  के पैकेट की अदला बदली हो गयी है। नवीन को सही पुर्जा, दो दिन के भीतर उसके घर पहुँचाने का आश्वासन देकर वापस भेजा गया।



व्यापारी साहित्यकार

विमलेश्वर प्रसाद भी अपने गांव के नाम फिरदौस के आगे वी लगाकर विमलेश्वर प्रसाद फिरदौसवी हो गए थे। उनकी कई किताबे छप चुकी थीं। उनके परिचितों में से एक प्रमोद सहाय भी कुछ कवितायेँ लिख लेता था। प्रमोद के पास भी काफी सारी कवितायेँ हो चुकी थीं तो सोचा एक पुस्तक ही छपवा ली जाय। प्रमोद यह सोचकर कि अपनी पुस्तक  के बारे में फिरदौसवीं जी से कुछ शब्द लिखवा ले तो कुछ मान बढ़ जायेगा, उनके पास गया।
'सर, ये देखिये मेरी यह काव्य पुस्तक। आप के दो शब्द जुड़ जायेंगे तो इस पुस्तक का मान बढ़ जायेगा।'
फिरदौसवी जी ने पुस्तक का एक पन्ना पलटा और मेज पर रख दिया और बोले, 'देखो भाई यह सब काम सबके लिए नहीं होते। इसके लिए बड़ा मँजना पड़ता है।  देखो मैंने कितने साल इसमें खपाये हैं। कई बार रातों को सोया नहीं हूँ।'
'सर यह सब तो मैंने भी किया है। साल भर में जाकर यह पुस्तक लिख पाया हूँ। ये है कि आप प्रकाश में आ चुके हैं और मुझे अभी आप जैसे लोगों के सहारे की आवश्यकता है। मैं जो परिश्रम कर रहा हूँ, मुझे भरोसा है एक दिन मेरी भी पुस्तकें साहित्य की दुनियां में होंगी। मैंने भी यूँ ही नहीं लिख दिया है, किताब प्रकाशित होने का अर्थ तो मुझे भी पता है। मैं तो आपके पास इसीलिए आया हूँ की कोई कमी बेसी हो आपके अनुभव का लाभ मुझे भी मिलेगा।'
'कोई बात नहीं, इन कामों के लिए धन खर्च करना पड़ता है। मेरे शागिर्द आते हैं, पैसे खर्च करते हैं और गजल मुकतक लिखना सिखते हैं। कइयों ने किताबें लिखीं और मुझसे ठीक करायीं।'
प्रमोद समझ रहा था कि वे क्या कहना चाहते हैं। फिर भी पूछ लिया, 'तो क्या लेते हैं?'
'एक गजल या कविता के सौ रूपये।'
प्रमोद ने देखा कि उन्हें काम की दर बताने में भी कोई झिझक नहीं हुई तो वह समझ गया कि ये साहित्य के सेवक नहीं हैं अपितु साहित्य के व्यवसायी हैं। प्रमोद साहित्य के क्षेत्र में बेशक नया था परन्तु उसे अपनी लेखनी पर विश्वास था। फिरदौसवी जी की बातों से वह निराश तो था पर कहने से नहीं चूका -
'सर! मुझे नहीं पता था आप साहित्य की दुकान चलाते हैं, नहीं तो मैं पैसे लेकर आता। और वैसे भी अगर मुझे किसी दूसरे साहित्यकार को पैसे देकर ही किताब छपवानी थी तो इतनी मेहनत करने की भी क्या आवश्यकता थी आप से ही खरीद लेता और अपने नाम से छपवा लेता।'



अनेक या अनेकों

बहुत बहुतों
कई कइयों


क्या पाया  क्या खोया

रवि प्रकाश को अमेरिका रहते वर्षों बीत गए थे। वह अपने माँ बाप को भी वहीँ ले जाना चाहता था पर वे अपना देश छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। इस बार वह कई साल बाद आया था। अभी तो अप्रैल का ही महीना था कि गर्मी से हाय तोबा करने लगा। वह बार बार मम्मी पापा को कोस  रहा था।

'आप लोग वहां चले होते तो सही था। अब यहाँ की जलवायु झेलना मेरे वश की तो नहीं है।'
'बेटा तू वहां की परिस्थितियों और जलवायु का गुलाम हो चुका है। भारत माँ यहां अपने सवा सौ करोड़ लाल पालती है और वे सब सुख पूर्वक रह रहे हैं। उन्हें यहाँ की परिस्थितियां और जलवायु से कोई परेशानी नहीं। अब बताओ तुम्हारी शक्ति कितनी क्षीण हो चुकी है। अब अगर भारत में रहना पड़े तो उस लायक भी नहीं रहे।






 बनवारी आज घर से देर से निकला था। अपने अड्डे पर जा ही रहा था कि उसे भंडारे की भनक लग गयी। वह जाकर कतार में खड़ा हो गया। उसका नंबर अभी बहुत पीछे था। वह पंक्ति छोड़ कर आगे मेज की ओर बढ़ गया, 'सेठ जी! मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया, भूख लगी है। अल्ला की मेहरबानी सेइस बार मुझे मिल जायेगा?'
पंक्ति में खड़े लोग चिल्लाने लगे, 'अरे ये तो उस चौराहे वाला भिखारी है, लाइन में जाबाबा!'
भंडारा परोसने वाला उनकी बात सुनकर, बनवारी को लौटा दिया, 'बाबा लाइन में जाओ। ये सब लाइन में खड़े हैं, बेवकूफ थोड़े ही हैं। जब नंबर आएगा, तुम्हें भी मिल जायेगा।'
'या अल्ला! लगता है, आज भूखे ही रहना पड़ेगा या किसी गुरूद्वारे में जाना पड़ेगा।' कहते हुआ वहाँ से चल दिया। बनवारी ने भांप लिया था, सब्जी भी थोड़ी ही है। पता नहीं जो पहले से खड़े हैं उन्हें भी पूरी पड़ेगी या नहीं, ऐसा हुआ तो उसका वहाँ खड़ा होना भी व्यर्थ ही होगा। आज घर से देर से निकलने के कारणअभी तक कोई कमाई भी नहीं हो पायी थी।
उसके जाने के बस पांच मिनट में ही पूड़ी की नई घान गयी। कुछ लोगों को देने के बाद भंडारा परोसने वाले ने चार पूड़ी अलग कर दी और बच्चों से पूछने लगा, अरे, वो भिखारी कहाँ गया?
बच्चे चिल्लाने लगे, 'वो तो चला गया।'
एक बच्चे की ओर इशारा करते हुए, 'जाओ देखो यहीं कहीं होगा, बुला लाओ। तुम्हें, मैं लाइन से अलग दे दूंगा।'
वह बच्चा आस पास देखा मगर बनवारी नहीं मिला, तब तक पता नहीं कहाँ अंतर्ध्यान हो गया था। तभी भंडारा करवा रहेसेठ जी गए। परोसने वाले ने उन्हें बता दिया, 'एक भिखारी आया था, पूड़ी तैयार नहीं थी, पता नहीं कहाँ चला गया? एक बच्चे को भेजा था पर वो दिखा नहीं।'
सेठ जी के दिल में करुणा जागीबोले, 'तुम खुद जाकर देख लो, कहीं आस पास ही होगा। बुला कर खिला दो। '
'बच्चों में से आवाज आई, 'वो आगे वाले चौराहे पर बैठता है। वहीँ गया होगा।'
सेठ जी ने उस कार्यकर्ता को थोड़ी सब्जी और कुछ पूड़ियाँ एक पन्नी में डाल कर वहीं ले जाने को कहा। वह कार्यकर्ता अविलम्ब अपना स्कूटर उठाया और उधर गया, मगर थोड़ी ही देर में, वह सब लेकर वापस गया, 'सेठ जी वो तो वहां भी नहीं मिला।'
अब सेठ जी भंडारे का विश्लेषण करने लगे, 'वैसे काफी लोग निबट गये। तुम लोगों ने बड़ा सहयोग दिया। देखो! दो बोरा आटा खप गया! चलो, अब हो गयासब समेटो।'
सेठ जी की बात सुनकरएक सहयोगी बोल पड़ा, 'हां, लाला जी! खाने की भी सभी लोग बहुत तारीफ कर रहे थे। एक हजार से भी ऊपरलोग खा चुके होंगे। बस वही, एक भिखारी भूखा चला गया। वह बेचारा तो कह भी रहा था कि बहुत भूखा है।'


खा पीकर आया हूँ 

सेठ जी की पत्नी बहुत करुण  विचार वाली स्त्री थीं। उन्हें रात में ही पता चल गया था कि एक भिखारी भंडारे से भूखा चला गया था, इस बात का उन्होंने रात भर पश्चाताप किया और सुबह उठते ही सेठ जी से बोलीं 'बताओ आपने सैकड़ों लोगों को तो खिला दिया और एक भूखे को नहीं खिला पाए। मैं भोजन बनाकर पैक कर देती हूँ, ले जाकर यह उसे खिला देना।'
'क्या करता? मुझे जब पता चला कि वह अगले चौराहे पर बैठता है तो एक लड़के को पूड़ी सब्जी लेकर भेजा था, मगर वह वहां मिला ही नहीं।' 

सेठ जी को भिखारी का ठिकाना तो पता लग ही चुका था, वे डिब्बे में बंद भोजन ले गए। भाग्य वश बनवारी उसी चौराहे पर बैठा मिल गया। उसकी ओर खाने का डब्बा बढ़ाते हुए सेठ जी ने कहा, 'ये लो बाबा! भोजन कर लो।'
बनवारी इस प्रकार से अचानक उसके पास भोजन आने पर चौंक गया, 'लेकिन, मैं तो आज खा पीकर आया हूँ। मुझे तनिक भी भूख नहीं है।'
'ठीक है, रख लो, किसी और को दे देना।'
'वाह साहब! जो चीज मेरी नहीं है, मैं क्यों रख लूँ? और मैं किसको दूंगा? चले जाओ पास में ही मंदिर है, कोई कोई भिखारी मिल जायेगा, खिला देना। बाकी आपकी किस्मत। आपने मेरे बारे में सोचा, मैं आपके लिए दुआ करता हू, अल्ला आपकी खैर करे।'


जेब में क्या छुपा रखा

छठी  कक्षा की परीक्षा चल रही थी।  सभी बच्चे सिर झुकाये परीक्षा में तल्लीन थे। जौहर था कि दाहिने हाथ से लिख रहा था और बायां हाथ, बार बार निकर के जेब में डाल लेता। जब निरीक्षक की नजर उस पर पड़ी तो वह समझा, जौहर ने जेब में कुछ छुपा रखा है।
एक बार निरीक्षक ने डपट कर बोल दिया, 'क्या बार बार जेब में हाथ डाल रहे हो।'
इसके बाद कुछ देर तक वह नहीं डाला, मगर थोड़ी देर बाद फिर वही हरकत। निरीक्षक को अब विश्वास हो गया इसने जरूर कोई चिट या फर्रा जेब में रखा होगा। निरीक्षक उसके समीप जाकर पूछा, 'जेब में क्या है?'
'कुछ नहीं सर। '
'कुछ तो है। तुमने जेब में फर्रा छुपा रखा है? खड़े हो जाओ।'
जौहर खड़ा हो गया और निरीक्षक उसकी जेब में हाथ डाल कर देखने लगा कि क्या है। जब पता चला कि उसकी जेब फटी हुई है तो 'बैठो' कहकर अपने स्थान पर चला गया।

 


Saturday, 11 August 2018

Bhumika


आशिक अली की होली,  भूमिका
प्राक्कथन
वैसे तो मेरी पहली पसंद, काव्य रचना ही है, किन्तु अनेक बातें ऐसी भी होती हैं, जिन्हें कविता में ढाल कर कह पाना सरल नहीं होता। अपनी बात को समग्र और सशक्त रूप से कहने के लिए गद्य का सहारा लेना पड़ता है। गद्य लेखन की विधाओं में सामाजिक खूबियां, विसंगतियां, कुरीतियां, परम्पराएं, घटनाएं, चरित्र  इत्यादि को दर्शाने और समझाने के लिए कहानी से सुन्दर, साहित्य की और कोई विधा नहीं हो सकती। कहानी में जीवन के किसी एक अंग, भाव अथवा खंड को दर्शाती है। वही जीवन का सम्पूर्ण अथवा वृहत चित्रण, एक ही कहानी में होने से उपन्यास हो जाता है। गद्य के रूप में कहानी विधा का प्रादुर्भाव और विकास उन्नीसवीं सदी में माना जाता है, यानि की यह गद्य विधा काव्य साहित्य से सैकड़ों वर्ष पश्चात् आयी। वैसे प्राचीन काल में काव्य के माध्यम से ही अनेक कवि कहानियां कह कर अमर हो गए। कई प्राचीन कवियों ने अपनी भावपूर्ण काव्य रचना के लिए किसी गाथा या कथा का सहारा लिया। अलिखित कहानियों का सिलसिला और भी पुराना रहा है। अपनी यात्रा का वृतांत, साहस और बहादुरी की कहानियां, अपनी उपलब्धियां, घटनाएं, प्रेम प्रसंग, चरित्र का चित्रण इत्यादि मौखिक रूप कहने की प्रक्रिया अनंत काल से चली आ रही हैं। मुझे तो लगता है जबसे भाषा का विकास हुआ होगा, तभी से कहानियों का सिलसिला भी होगा। कोई व्यक्ति किसी प्रकार का दृश्य या घटना देखता होगा तो अन्य लोगों से शब्दों में ही बताता रहा होगा। कहानी ने बस अपना साहित्यिक रूप बाद में लिया होगा।

कहानी साहित्य की एक ऐसी विधा है, जिसके माध्यम से रचनाकार, अपने मन के पूरी बात की विस्तृत रूप से सजीव प्रस्तुति कर सकता है, जो कि कविता में संभव नहीं है। कहानी के अनेकों रूप हो सकते हैं। कहानी के द्वारा समाज, प्रकृति, जीवन और राजनीति से जुड़े वास्तविकताओं का सम्पूर्ण चित्रण हो सकता है। कहानी समाज को उसका बिम्ब दिखाने, उपदेश और सन्देश देने के अतिरिक्त मनोरंजन का भी एक अमूल्य साधन है। पुराने लोगों ने अपने दादी, नानी से राजारानी की कहानियां अवश्य सुनी होंगी। वो कहानियां जहाँ मनोरंजन करती थीं, वहीँ ज्ञान वर्धन भी। इसी प्रकार पंचतंत्र की कहानियों जो मुख्यतः जानवरों पर आधारित हैं, बच्चे तो क्या बड़ों के भी मनोरंजन के साथ ज्ञान बढ़ाती हैं। मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से हूँ, जिन्होंने अपनी दादी और नानी से कहानियां सुन रखी हैं। मेरी दादी जब राजा-रानी की कहानियां, राजकुमार की कहानियां, बहादुरों की कहानियां बीच बीच में गीत गाकर सुनाती थीं तो मैं बहुत रोमांचित होता था और उसी में खो जाता था। बीच बीच में वे मेरे कौतुहल भरे प्रश्नों का समाधान भी करतीं रहती थीं।

आजकल कहानियां सुनने सुनाने का प्रचलन प्रायः समाप्त हो चुका है। अब तो सभी कहानियां फिल्मों और धारावाहिकों के द्वारा प्रस्तुत की जा रही हैं। फिर भी कहानी की पुस्तकों का महत्त्व कम नहीं हुआ है। अपनी सुविधा और समय के अनुसार पढ़ने की जो स्वतंत्रता पुस्तक में है, फिल्मों में कहाँ है। धारावाहिकों की कहानियां इतनी लम्बी होती हैं कि उनकी कड़ियों को जोड़ना भी एक कठिन कार्य हो जाता है। फिर दृश्यों के अवलोकन में शब्दावली के रस का आनंद भी तो नहीं आ पाता।

अपने परिवेश में विभिन्न पहलू जो मैंने देखा सुना, उन्हें शब्दों में ढालने के लिए यहाँ मैंने भी कहानियों का माध्यम चुना। मेरी इस पुस्तक 'आशिक अली की होली' में कुछ विनोदपूर्ण और भावनात्मक प्रसंगों को दर्शाया गया है। इस पुस्तक के अतिरिक्त मेरी कई अन्य कहानियों की पुस्तकें भी हैं। जिनमे, लघु कथा 'इनकी उनकी' और विदेश में जाकर बसे भारतियों पर आधारित 'बसे विदेश' भी हैं। मुझे पूर्ण विस्वास है पाठक इन कहानियों का भरपूर आनंद लेंगे और अपने स्नेह से और आगे लिखने के लिए प्रेरित करेंगे।

एस. डी. तिवारी, एडवोकेट


बसे विदेश
मेरी बात

विदेश भ्रमण की चाहत लगभग हम सभी भारतीयों की होती है, किन्तु आय सिमित रहने के कारण, अधिकतर लोगों का सपना धरा ही रह जाता है। यूरोप, अमेरिका में वे ही लोग घूम पाते हैं, जिनका कोई सागा सम्बन्धी वहां रहता हो या अपने व्यापारिक कार्यों से यात्रा पर  गए हों। कई देशों में अधिक आय होने के कारण, मध्यम आय वर्ग के परिवारों के युवाओं को रोजगार के लिए आकर्षित करते हैं।  वहां आय अधिक होने और जीवन स्तर बेहतर होने के कारण प्रत्येक वर्ष अनेकों लोग जाते हैं और बहुत से लोग वहीँ बस जाते हैं। कई अन्य घटक भी हैं जिनके कारण अनेकों भारतीय विदेश गए और वहीँ के होकर रह गए। अमेरिकी और यूरोपीय देशों की कंपनियां, 'टैलेंट हंटिंग' (प्रतिभा दोहन) करके भी अनेक भारतीय प्रतिभाओं को ले जाती हैं। हमारे देश बिडम्बना ही है कि अनेकों महान प्रतिभाओं ने विदेश जाकर पूरी दुनियाँ में नाम किया है। हो सकता था, उन्हें अपने देश में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता। हमारे यहां, एक ओर धन के अभाव में प्रतिभाएं उभर नहीं पातीं तो दूसरी ओर, यहाँ की राजनीति और भाई भतीजावाद भी अनेकों बार प्रतिभाओं के हनन के लिए उत्तरदायी होती हैं। 

विदेशों में जाकर पैसा कमाने की ललक, मध्यम वर्ग के अधिकतर भारतीयों की होती है। जिन्हें विदेश जाने का अवसर मिल जाता है वे स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं। बहुत से लोग तो विदेश से पैसा कमाकर, वापस आ के शान औ शौकत से भारत में रहना चाहते हैं, पर अनेक लोग कई विभिन्न कारणों वश वहीँ बस जाते हैं। कुछ लोगों को वहां की जलवायु और व्यवस्था भाने लगती है, जिसके कारण वापस नहीं आते तो कई लोग अपने बाल बच्चों के कारण वहीँ रह जाते हैं और नहीं आ पाते। 

ऐसा नहीं है कि जीवन मात्र धन से ही चलता हो, विदेशों में अच्छी आय होने के पश्चात् भी भारतीयों को कई विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। कई बार अपनी मातृभूमि की याद, अपने देश की परम्पराएं और त्यौहार, भारतीय व्यंजन तो कई बार भावनात्मक परिस्थितियां मन को उद्वेलित हैं। अनेकों बार मन  विवश हो जाता है कि स्वदेश चला जाय, मगर फिर वही कई अन्य कमियां वापस धकेल भी रही होती हैं। इन्हीं सब बातों की ताना बाना से मैंने कुछ कहानियां बुनने का प्रयत्न किया है,  जिन्हें अपनी इस पुस्तक 'बसे विदेश' के द्वारा आपके साथ साँझा कर रहा हूँ। इन कहानियों में विदेश में बसे भारतीयों के रहन सहन और उनकी मनोभावना को इस प्रकार चित्रित करने का प्रयत्न किया है, कि जो लोग अमेरिका, यूरोप या ऑस्ट्रेलिया का भ्रमण नहीं भी किये हैं, इनके द्वारा वहां की अनुभूति कर लें। चुकी विदेशों  भारतीयों की कहानियों की सूचि लम्बी है, कुछ और कहानियां मेरी एक अन्य पुस्तक 'भये परदेशी' में संगृहीत हैं। उनके अतिरिक्त, मेरी  और भी कहानियों की पुस्तकों 'आशिक अली की होली' और 'इनकी उनकी' तथा काव्य रचनाओं से तो आप अवगत ही होंगे। मेरी कविताओं ने आपका भरपूर प्यार पाया है। उम्मीद करता  हूँ, मेरी कहानियां भी आपको भाएंगी और आपका स्नेह बटोरेंगी।

एस. डी. तिवारी




विदेश की चटनी
मेरी बात

बहुत से भारतीय रोजगार की खोज, उत्तम जीवन स्तर और अधिक आय अर्जित करने के उद्देश्य से, प्रत्येक  वर्ष विदेश चले जाते हैं और वहीँ के होकर रह जाते हैं। आज करोड़ों भारतीय, भारत से बाहर विभिन्न देशों  अलग अलग क्षेत्रों में कार्यरत हैं और अनेक क्षेत्रों में शीर्ष पर हैं। संसार में ऐसा कोई भी देश नहीं, जहाँ भारतीय नहीं रहते हों। पैसा कमाने की ललक में, मध्यम वर्ग के अधिकतर भारतीय किसी न किसी रूप में विदेश जाने का अवसर ढूंढते हैं। अनेकों लोग शिक्षा ग्रहण के लिए विदेश जाते हैं, और वहीँ रोजगार पाने के उपाय ढूंढ लेते हैं। जिन्हें विदेश जाने का अवसर मिल जाता है वे स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं। कई बार हमारे देश में धन के अभाव में या फिर राजनितिक कारणों से प्रतिभाएं उभर नहीं पातीं, वहीँ विदेशों में जाकर, अनेकों लोगों ने नाम कमाया है। रोजगार के अतिरिक्त, और भी कई ऐसे कारण और परिस्थितियां हैं, जिनके चलते हमारे भारतीय विदेशों में जाकर बस गए हैं। विदेश जाने वालों में से कुछ लोगों को वहां की जलवायु और व्यवस्था भाने लगती है, जिसके कारण वापस नहीं आते तो कई लोग अपने बाल बच्चों के वहीँ बसे होने के कारण नहीं आ पाते।

विदेशों में जाकर, उच्च जीवन स्तर के साथ रहना और वहां घूमना, वहां की साफ सफाई और व्यवस्था देखना तो अच्छा लगता है। पर कई बार वहां की विषम परिस्थितियों से भी सामना करना पड़ता है। विदेशों में जहाँ जीवन स्तर अच्छा है, वहीँ रहने की लागत भी बहुत ऊँची होती है। कई बार वहां के नियमों से अनभिज्ञ रहने या किसी कारण वश पालन न कर पाने से भारतीयों को त्रासदी झेलनी पड़ जाती, है तो कई बार विषम जलवायु की मार भी झेलनी होती है। विदेशों में अच्छी कमाई और वहां की व्यवस्था कई बार जहाँ सुख देती हैं, वहीँ अपने देश जैसी स्वतंत्रता का अभाव, अपनेपन की अनुभूति का अभाव, मान सम्मान का अभाव अखरते भी हैं; और अपनी मातृभूमि की याद, मन को कचोटती रहती है। अपने देश की परम्पराएं, त्यौहार, व्यंजन, अपने मित्र व सम्बन्धियों से वंचित रहना पड़ता है। कई बार भावनात्मक परिस्थितियां मन को उद्वेलित करती हैं। 

विदेश भ्रमण की चाहत भला किसे नहीं होती, किन्तु सभी को इसका अवसर भी मिले ऐसा नहीं हो पाता। फिर भी वे लोग पुस्तकों, समाचार पत्रों, फिल्मों अदि के द्वारा विदेशों और वहां के जीवन के बारे में जानकारी पा लेते हैं। जिनके बच्चे या परिवार का कोई सदस्य विदेश चला गया, उन्हें तो कम से कम से एक बार विदेश घूम लेने का अवसर मिल ही जाता है। मुझे भी कई देशों का भ्रमण करने का अवसर मिला। अपने भारतीयों के सन्दर्भ में, वहां के जन जीवन और रहन सहन का जो अनुभव मुझे मिला है, उसका चित्रण मैंने अपनी कुछ कहानियों के द्वारा करने का प्रयत्न किया। उन्हीं कहानियों के संग्रह, मेरी दो पुस्तकों 'बसे विदेश' और 'विदेश की चटनी' में समाहित हैं। 

किन परिस्थियों में हमारे भारतीय विदेश चले गए, इस पर आधारित कुछ कहानियां मेरी एक अन्य पुस्तक 'बसे विदेश' में हैं।  वहां जाकर किन किन परिस्थियों का वे सामना करते हैं और उन्हें क्या क्या समस्याएं झेलनी पड़ती हैं इत्यादि से सम्बंधित कहनियाँ मेरी इस पुस्तक 'विदेश की चटनी' में हैं, जिसमें वहां विदेशों के खट्टे मीठे स्वाद की अनुभूति कराने का प्रयत्न किया है। इन कहानियों में विदेश में बसे भारतीयों के रहन सहन की झलकियां और उनकी मनोभावना को चित्रित करने का प्रयत्न किया है।  'बसे विदेश' और 'विदेश की चटनी' के अतिरिक्त मेरी कहानियों की कुछ अन्य पुस्तकें, जिनमें मुख्यतः 'आशिक अली की होली' और 'इनकी उनकी' भी हैं। मेरी काव्य रचनाओं ने आपका भरपूर प्यार पाया है; उम्मीद करता  हूँ, मेरी कहानियां भी आपको भायेंगी और आपका स्नेह बटोरेंगी।

एस. डी. तिवारी, एडवोकेट





कविता तो बोलेगी में युगीन चेतना के स्वर

इंद्रधनुषी रंगों से सुसज्जित 'कविता तो बोलेगी' कविता संग्रह पेशे से एडवोकेट सत्य देव तिवारी द्वारा रचित है।  सत्य देव तिवारी जी ने हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में रचनाधर्म को निभाया है। हास्य, गजल, मुक्तक और गीतों के रचयिता तिवारी जी का कविता संग्रह 'कविता तो बोलेगी' वर्तमान परिवेश के विविध सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक पहलुओं पर सूक्ष्म दृष्टि से चिंतन करने में सक्षम हैं। ध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत सूर्य वंदना, सरस्वती वंदना, समय कहाँ भाग जाता, मैं  कौन हूँ तथा समय गोल है, कवितायेँ मन को आकृष्ट कराती हैं। स्वयं से बात करते हुए कवि का भोलापन दृष्टव्य हैं -
स्वयं को पहचान लेना कितना कठिन है,
 प्रभु को याद करूँ तो संज्ञान पाता  हूँ मैं।
कवि की 'समय कहाँ भाग जाता' में संसार की नश्वरता और रहसयवादिता में कवि पंत की परिवर्तन कविता का भान होता है। मृत्यु के सच को जानने हेतु आतुर कवि प्रभु से प्रश्न करता है --
हे प्रभु!
अब तक, जग से जाने
कितने ही लोग हो चुके विदा
कहाँ हैं? न कोई पदचिन्ह
न कोई संकेत, न उनका कोई पता।

कवि ने प्रशासनिक तथा राजनैतिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर आक्रोश किया है। 'मग्गू का मुक़दमा' आम आदमी के न्याय पाने की जद्दोजहद को बयां करते हुए न्यायतंत्र के खोखलेपन तथा दोगलेपन को रेखांकित करती है।  आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को दुरुस्त नहीं कर पाए हैं।  यह कविता धूमिल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना तथा नागार्जुन जैसे कवियों की याद  दिलाती है।
इसी क्रम में 'कानून बौना क्यों है, भूमि अधिग्रहण, रोटी के लिए, लाठी चार्ज, तथा सोने की चिड़िया ऐसी ही आक्रामक तेवर से भरी रचनाएँ हैं। कानून  में शिथिलता, न्याय में बिलम्ब, चोर रास्ता निकालने की प्रवृत्ति तथा निरपराध व्यक्ति को दंड ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जिनका कोई हल निकलता नहीं दिखाई देता। 'राजनीती की लड़ाई' में 'करते बड़े घोटाले जमकर' या 'नेता से ज्यादा चेले चपाटे' तथा 'सरकारी धन से चंडी काटें'जैसी पंक्तियाँ भ्रष्ट राजनीती की विद्रूपता को प्रकट कर रही हैं। वहीँ 'बाँट डालो' कविता में जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद तथा धर्म के नाम पर भारत को खंडित करने की साजिश को प्रकट किया गया है। राजनीती से जुड़े भ्रष्ट अपराधी नेताओं पर 'मोती खाल उनकी' कविता में कितना करारा व्यंग हैं -
लिखा जाता है नाम, काले अक्षरों में भी
असर होता नहीं है पर, उनकी मोटी खेलों पर।

पर्यावरण प्रदूषण तहत पारिस्थितिक असंतुलन जैसे गंभीर विषय पर कवी ने 'पहाड़ बोल रहा है'   'वृक्ष के बिना' तथा 'जंगल का सन्देश आदि रचनाएँ लिखी हैं। पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाकर कंक्रीट के जंगल उगाये जा रहे हैं जिसका परिणाम बाढ़, भूकंप तथा जलप्रलय जैसी आपदाएं प्रतिवर्ष असंख्य जीव जंतु, मनुष्य एवं करोड़ों की सम्पदा को लील जाती हैं। शांत पर्वतीय जीवन भौतिक लालसा का शिकार होकर विनष्ट हो रहा है। वृक्षों को काटकर सडकों चौड़ीकरण तथा दस मंजिला भवन बनाने की प्रक्रिया विकास के तहत की जा रही है। इन योजनाओं ने कितनों को बेघर और बेरोजगार भी किया है।  चारित्रिक प्रदुषण को केंद्र में रखकर लिखी गयी कविता 'पप्रदूषण न फैलाओ' विचारणीय है। 'उसका क्या कसूर' कविता अंतर्गत वैषम्य के बीच बदलते जीवन मूल्यों में चरित्रहीन धनाढ्य व्यक्ति को सम्मान तथा चरित्रवान को असम्मान पर तर्जनी उठाकर सोचने को विवश कराती है।

'क्या खोया क्या पाया' तथा 'जिंदगी तू कितनी बदल गयी है'कवितायेँ आर्थिक जीवन मूल्यों के परिवर्तन पर कुठाराघात करती हैं। आगे बढ़ने की ललक, भौतिक सम्पदा का सुख, यश सम्मान प्राप्ति की लालसा मृगतृष्णा बनकर जीवन के अंतिम मोड़ पर एकाकीपन के जंगल में रोदन को विवश कर देती हैं। तब हमें ज्ञात होता है कि परोपकार तथा समाजकल्याण के लिए किये गए सत्कर्म ही हमें मोक्ष प्रदान कर सकते हैं। कवि 'जिंदगी तू कितनी बदल गयी है' में भी सहजता और सरलता को छोड़कर बाजारवाद की चपेट में हम कितने कृत्रिम एवं बनावटी जीवन को जीने लगे हैं इसी यथार्थ को इंगित किया गया है।

आज का बालक कल का राष्ट्र निर्माता है। बालकों के भोलापन, सच्चापन तथा अर्जस्विता की टी.वी. , मोबाइल  तथा कंप्यूटर ने चुरा लिया है। आउटडोर गेम का स्थान इनडोर गेम ने ले लिया है। 'कौन छीन रहा बचपन', 'बालक की मुस्कान' तथा 'खिलौने की दुकान पर' तथा 'सपनों को मरते देखा' कवितायेँ बालकों के  प्रति चिंता से जुडी हैं।  कवि कहता ही -
सपनों को हवा मिल जाती तो,
वह आज देश का धावक होता।
हताशा, निराशा हाथ में लेकर
आस को ताक पर धरती देखा।

स्त्री सशक्तिकरण के इस युग में 'तेरी आँखों में नारी' के विविध गुणों की चर्चा करते हुए 'पति चाहे पतित, व्यसनी हो, सहती उसको भी चुपके नारी। नारी मन के निष्ठां, त्याग, धैर्य, सहनशीलता एवं त्याग को प्रदर्शित करने का प्रयास किया है।  दूसरी और स्त्रियों के प्रति अनाचार और बलात्कार के प्रति रोष 'शहरों में दरिंदे' में व्यंजित हुआ है -
कौन सी दुनिया के हैवान और दरिंदे
घुसकर आतंक मचाये हैं शहरों में?

      
  राष्ट्रिय चेतना की अभिव्यक्ति 'भारत अपना' 'तिरंगा' तथा 'फौजी की होली' 'दुश्मन ने आंख दिखाई तो' तथा
 खून का जूनून में हुई है। आतंकवाद को इंसानियत का दुश्मन मानकर कवि ने तीव्र आलोचना की है। 'आग के रंग' कविता में आग की उपयोगिता को ही व्यक्त किया है यदि कवि मानव मन में बसी स्वाभिमान, क्रांति और विद्रोह की आग की चर्चा करता तो कविता अपने उत्कर्ष पर पहुँच सकती थी।
चाय, नमक, गांठ, अलीबाबा का सिमसिम आदि कविताओं में निम्न पंक्ति मन को छूती है -
गाँधी जी ने पहचानी नमक की ताकत
नमक से हिला डाली अंग्रेजी हुकूमत।
भीड़तंत्र का कोई विवेक नहीं होता।  कभी कभी शक के दायरे में आये व्यक्ति को भीड़ द्वारा मौत का फरमान सुना दिया जाता है। लोकतंत्र में ऐसे लज्जाजनक कुकृत्य में षड्यंत्र की बू आती है-
अब समाचार बनेगा
राजनीति की क्रीड़ा होगी।
सांत्वना के आंसू से धुलती
उसके परिवार की पीड़ा होगी।
'सुबह' 'तितली' 'पाप के बादल'कवितायेँ प्रकृतिपरक हैं।  तितली को देखभर कहना 'पतझड़ में कहाँ पर जाकर सोती हो ?' बालमन जैसी जिज्ञासा और उत्कंठा का भाव कविता के लालित्य में श्रीवृद्धि करता है।
हर व्यक्ति की प्रेरक कोई न कोई स्त्री होती है। कवि के कोमल मन में पत्नी के प्रति गहन प्रेम एवं निष्ठां की अनुभूति 'मेरी पत्नी' तथा 'ऐसा दर्पण हो' में अभिव्यक्त हुई है। कवी अपनी पत्नी को ऐसा दर्पण मानता है जिसमें वह अपने को निहार, बांच, टाक और आंक लेता है। दाम्पत्य प्रेम पर लिखी उत्कृष्ट रचना है। कवि वृद्धावस्था के उस पड़ाव पर है जहाँ बच्चों के साथ खेलना पोते, पोती के साथ कागज के जहाज बनाकर उड़ाना सुखद प्रतीत होता है।  'बच्चों का घर' 'बुढ़ापे ने सताया बड़ा' 'बूढ़ों को कमजोर न समझें' ऐसी रचनाएँ हैं।  बुजुर्गों की होती अवहेलना एवं उपेक्षा को देखकर कवि कह उठता है -
बूढ़ा पेड़ फल न भी दे, पर छाया तो देता ही है।

शिल्प की दृष्टि से कुछ रचनाएँ सुघड़ हैं परन्तु कुछ में परिष्कार की आवश्यकता है। भाषा की दृष्टि से कवि ने लोकजीवन में प्रयुक्त हिंदी तथा अंग्रेजी, उर्दू के शब्दों से परहेज नहीं किया है। क्लच, ब्रेक, डील, फील, पासवर्ड, ए.टी.एम. पिनकोड जैसे शब्द स्वाभाविक रूप से आ गए हैं। कहीं कहीं बिम्ब योजना सुन्दर बन पड़ी है।  'स्याह क्यों करें'में बिम्ब योजना सुन्दर बन पड़ी है। ईश्वर की और से प्रतिदिन प्रदत्त होता है एक दिन प्रदत्त उसे स्याह क्यों करें -
फूलों, तितलियों  से रंग लेकर
पक्षियों के रंगीन पंख लेकर
धूप, बारिश का पानी मिलाकर
ऊँचे, हरे वृक्षों से हिलाकर
एक ऐसा चित्र बना डालें
जी करे, रखें संभाले।
:
अर्जस्विता एवं ताजगी से भरी यह रचना हर क्षण को जिंदादिली से जीने को प्रेरित करती है। सकारात्मक सोच से ओत प्रोत उनकी अनुभूतियों की निधि 'कविता तो बोलेगी' सार्थक ग्रन्थ है। ऐसी बहुरंगी भावों एवं विचारों को गतिमयता प्रदान हेतु आप बधाई के पात्र हैं। काव्य संसार में यह संग्रह अपना महत्वपूर्ण स्थान सुरक्षित रखेगा। मेरा ऐसा विश्वास है।

डॉ. बीना रानी गुप्ता
एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, हिंदी
भगवानदीन आर्य कन्या स्नात.  महाविद्यालय
लखीमपुर खीरी


 
मेरी बात

 अपनी बात को समग्र और सशक्त रूप से कहने के लिए कहानी सबसे उत्तम माध्यम है। गद्य लेखन की विधाओं में सामाजिक खूबियां, विसंगतियां, कुरीतियां, परम्पराएं, घटनाएं, चरित्र  इत्यादि को दर्शाने और समझाने के लिए कहानी से सुन्दर, साहित्य की और कोई विधा नहीं हो सकती। प्राचीन काल में तो लोग कहानियों को भी काव्य के द्वारा कहते थे। किन्तु उन कहानियों में केवल प्रमुख घटनाओं और चरित्रों का ही वर्णन होता था। हमारे जीवन में हमारे आस पास ही अनेकों घटनाएं घटित होती हैं जो किसी न किसी रूप में कोई सबक दे जाती हैं।  अगर उन घटनाओं को कलमबद्ध न किया जाय तो वे अतीत में लुप्त हो जाती हैं। कहानी के माध्यम से उन घटनाओं को साहित्य की निधि बनाया जा सकता है जो भविष्य में लोगों के पढ़ने, सीखने का प्रभावशाली माध्यम बन सकती हैं। हमें बहुत सी बातें, अपनी तथा अन्य लोगों की गलतियों से सीखने को मिलती हैं। यह संभव नहीं कि सभी घटनाओं को स्वयं देखा जा सके। इसके लिए कई बार औरों के द्वारा कही या लिखी कहानियों पर निर्भर करना पड़ता है।

हमारी रोजाना की जिंदगी में लोगों के व्यव्हार मनोभाव आदि से साक्षत्कार होता रहता है। यदि उन बातों का एकत्र कर मूल्यांकन किया जाय तो हमें सीखने के लिए अनेक उपयोगी बातें सामने आती हैं। उन घटनाओं में समाज और मानवता के लिए क्या कुछ सन्देश छुपा होता है। मुझे तो लगता है जबसे भाषा का विकास हुआ होगा, तभी से कहानियों का सिलसिला भी होगा। कोई व्यक्ति किसी प्रकार का दृश्य या घटना देखता होगा तो अन्य लोगों से शब्दों में ही बताता रहा होगा। कहानी ने बस अपना साहित्यिक रूप बाद में लिया होगा। हम सभी ने अपने मित्रों, सम्बन्धियों या परिवार के सदस्यों से भी उनके समक्ष घटित घटनाओं का विवरण अथवा
यात्रा वृतांत, उनके साहस की कहानियां, उपलब्धियां, चरित्र का चित्रण इत्यादि मौखिक रूप अवश्य ही सुना होगा। इन्हीं घटनाओं को सज्जित शब्दों में ढाल कर पत्र, पत्रिकाओं में लोगों के समक्ष लेन से साहित्य बन जाता है।

 कहानी का छोटी से बड़ी, विभिन्न आकार हो सकता है तथा कहानी के अनेकों रूप हो सकते हैं। कहानी के द्वारा समाज, प्रकृति, जीवन और राजनीति से जुड़े वास्तविकताओं का सम्पूर्ण चित्रण हो सकता है। कहानी समाज को उसका बिम्ब दिखाने, उपदेश और सन्देश देने के अतिरिक्त मनोरंजन का भी एक अमूल्य साधन है।
बच्चों को दादा, दादी से राजा-रानी की कहानियां, राजकुमार की कहानियां, बहादुरों की कहानियां सुनाने में बड़ा आनंद आता है। बीच बीच में कौतुहल भरे प्रश्नों के द्वारा उन्हें कई बातें सीखने का भी अवसर मिलता है। चरित्र निर्माण में कहानियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

आजकल कहानियां सुनने सुनाने का प्रचलन प्रायः समाप्त हो चुका है। अब तो सभी कहानियां फिल्मों और धारावाहिकों के द्वारा प्रस्तुत की जा रही हैं। इसलिए कहानीकारों ने अपनी कहानी का छोटा करके परोसना आरम्भ कर दिया ताकि कम समय में पढ़ी जा सकें और उनके रुचिकर रहते हुए आवश्यक सन्देश दिया जा सके। अपने परिवेश में विभिन्न पहलू जो मैंने देखा सुना, उन्हें छोटी छोटी कहानियों में ढालने का प्रयत्न किय है । मेरी इस पुस्तक 'इनकी उनकी' में अधिकतर वही बातें हैं जो देखि सुनी हैं और हो सकता है आपके सामने भी ऐसा कुछ हुआ हो। इस पुस्तक के अतिरिक्त मेरी कुछ अन्य कहानियों की पुस्तकें भी हैं, जिनमे, 'आशिक अली की होली' और विदेश में जाकर बसे भारतियों पर आधारित 'बसे विदेश' तथा 'विदेश की चटनी' भी हैं। मुझे पूर्ण विस्वास है कि मेरी कविताओं के साथ पाठक इन कहानियों का भी आनंद लेंगे और अपने स्नेह से अनुगृहीत करेंगे।

एस. डी. तिवारी, एडवोकेट 

हिंदी
सर्कार
मीडिया
गांव
रोजगार
शिक्षा
शब्दावली
अन्य देशों में परंपरा
सामाजिक परिवेश



नन्हीं
बोलते मोती
हाइकु शास्त्र
मोतियन की लड़ी
दिल्ली के झरोखे
दुनिया गिर गयी
गुनगुनाती हवा
पांच दाने मोती
गीत गुंजन
कविता तो बोलेगी
तेरे नाम के मोती
प्यार का पिंजरा
आशिक अली की होली
हाइकु रामायण
चाँद के गांव
बसे विदेश
विदेश की चटनी
मुहब्बत के मोती

इनकी उनकी
क्या सखि, साजन ?


अनुक्रम

चाय वाला
चार चक्का
अमीर कौन
हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी
बिजूका
काले धन का हिसाब
पंडिताईन का आम
खाता गुलजार
दिवाली की मिठाई
पटाखे की चोरी
बिस्कुट चोर
पानी पर  पैसा
आरक्षण 
आरक्षित सीट
धारावाहिक
प्यारी सी बहू
ऐसी ही साड़ी पहनती हूँ !
एक दिन की हिंदी 
काम वाली की चाय
जज साहब 
साली की राखी 
शनि की साढ़ेसाती
हवाई जहाज का टिकट
महंगा लहंगा
रैली में फंसे 
अंतिम अध्याय
न्याय 
बाबा का प्रवचन
स्वामीजी के दर्शन
खिलौना 
ऋण 
प्यार की सवारी
क्लब का चस्का
होली की ठिठोली 
ब्रांडेड 
सोच का बोझ
स्पीड लिमिट 
काला कौवा -  
काला कौवा - २  
काला कौवा - ३ 
भोला मन 
मैं प्रमुख हूँ
मच्छरों से रोजी रोटी
कौवा कान ले गया
बेगानी शादी में
घर का भेदी
अल्लाह से मांगो
मक्खी भगाने की दवा
चोर पे मोर 
निमंत्रण 
वीसा नहीं मिला
वी. आई. पी. सीट
नोट का क्या करें ?
वहां क्या ये सब नहीं मिलता
घर का चोर
मिट्टी की मिट्टी
गुरु जी 
व्यापारी साहित्यकार
ठेकेदार 
किसके मजे 
क्या पाया,  क्या खोया
डॉक्टर बहू
गिफ्ट का डिब्बा 
नहर का पानी
पेट ख़राब है 
दहेज़ में शौचालय
मुंडन का वीडियो
वाह री किस्मत 
हेर फेर
गाड़ी का चालान
पूरब की गाड़ी
छत पर धुआं
चुड़ैल देखा
शीशी में भूत