Saturday, 28 March 2015

Bachche ki pooja


बच्चे की पूजा

दादा को आये दो महीने बीत चुके थे। चार साल का सचिन दादा से घुल मिल गया था। जब वह शिशु सदन से आता तो दादा से इंडिया की बातें करता और सुन कर बड़ा रोमांचित होता। दादा प्रातः नहा धो कर पूजा पर बैठते तो वह भी साथ बैठ जाता। विजय ने घर में पूजा के लिए अलग स्थान बना रखा था। सचिन को पूजा स्थल पर रखे, सभी देवताओं की पहचान भली भांति थी। दादा को सबके नाम बताता रहता, ये गणेश भगवान हैं, ये शंकर भगवान हैं, ये हनुमान जी हैं; तो दादा और चित्रों को दिखाकर पूछ लेते, ये कौन हैं? वो भी बता देता। तुम्हें कौन से भगवान सबसे अच्छे लगते हैं ? 'हनुमान जी। '
'हनुमान जी क्यों ?'
'वो सुपरमैन से भी ताकत वाले हैं और भगवन जी हैं। '
एक दिन दादा जी पूजा आरम्भ किये ही थे कि वह भी साथ बैठ गया और बड़ी उत्सुकता से पूजा की एक एक बात पूछने लगा।
'दीप क्यों जला रहे हैं ?'
'इससे भगवान् प्रसन्न होते हैं। '
जब अगरबत्ती जलाने लगते तो 'व्हाट आर यू डूइंग बाबा, यू आर गोइंग टु ब्रेथ द स्मोक (ये क्या कर रहे हैं बाबा, सांसों में धुंआ जायेगा)'
'हाँ, पर भगवान जी को सुगंध अच्छा लगता है। '
'ओ. के. (ठीक), पर स्मोक से तो अलार्म बज जायेगा और फायर वाले आ जायेंगे। '
दादा छत की ओर देखते हैं तो स्मोक डिटेक्टर (धुआं सूचक यन्त्र) लगा हुआ है। 'नीलम देखो तो बेटा, जरा इसे बंद कर दो। '
नीलम सारी खिड़कियां खोल देती है और एग्जॉस्ट चला देती है। 'ठीक है इतने से नहीं बोलेगा। '
'बाबा, पूजा से क्या होता है ?'
'भगवान जी खुश होते हैं, बुद्धि देते हैं, तुम भी हाथ जोड़ कर प्रार्थना करो और बुद्धि मांगो।'

सचिन ने नवरात्रों में बाबा को दुर्गा शप्तशती का पाठ करते देखा। उसे भी उत्सुकता होती कि वह किताब पढ़े, किताब में झांकता तो कोई चित्र आदि नहीं देख पीछे हट जाता। एक दिन नीलम खड़े खड़े ही पूजा स्थान पर दीप  जलाकर, हाथ जोड़े प्रार्थना कर रही थी। सचिन मम्मी का कुर्ता खींच कर कहने लगा - 'मम्मी वैसे करो जैसे बाबा करते है। '
'बाबा कैसे करते हैं ?'
'किताब से।'
'नहीं वैसे बड़े लोग करते हैं ' कह कर बात को टाला। सचिन जिद्द करने लगा नहीं किताब पढ़ो और मुझे भी पढ़ना सिखाओ। '
नीलम चक्कर में पड़ी, उसे मन ही मन हंसी भी आ रही थी।  दुर्गा शप्तशती आज तक तो कभी पढ़ी नहीं तो वह बच्चे को कैसे समझाए।  'अभी बाबा टहलने गए हैं। आएंगे तो तुम बाबा के साथ पढ़ लेना। '
बाबा के आते ही सचिन जोर से उन्हें पकड़ लिया। 'बाबा बाबा मुझे पूजा करनी है। '
'मम्मी के साथ कर लो।'
'नहीं आप के साथ करनी है, किताब से। '
यह सुनकर दादा गदगद हो गए, 'अच्छा ठीक है, जब मैं  करूंगा तो मेरे साथ कर लेना। '
दादा जी नीलम से कह रहे थे कि पार्क की ओर गया था, कहीं फूल नहीं दिखा। सचिन तपाक से बोला, 'मेरे शिशु सदन के लान में बहुत से फूल हैं, मगर मैडम बोलती हैं फूल तोड़ना गलत है। '
अगले दिन सचिन शिशु सदन से एक गुलाब का फूल लेकर आया और दादा जी को दे दिया। दादा जी चौंके, यह क्या? क्यों तोड़ लाये ? तुम्ही कह रहे थे न फूल तोड़ना गलत है। '
'बट आई आस्कड मैडम, टोल्ड हर आई नीड अ फ्लावर फॉर माय ग्रैंडपा एंड शी गेव वन' (मैंने मैडम से बोला, मेरे बाबा को फूल चाहिए तो उन्होंने तोड़कर ये दे दिया।) 
कुछ दिनों में दादाजी ने श्री दुर्गा शप्तशती का मुख्य मंत्र व गायत्री मंत्र सचिन को सिखा दिया। सचिन का जन्म अमेरिका में ही हुआ था अतः वह विदेशी नागरिक हो गया था। दादा जी उसे अपने ये मंत्र सिखाकर बड़े गौरवान्वित अनुभव कर रहे थे। विजय और नीलम भी जब किसी भारतीय के यहाँ जाते या कोई उनके यहाँ आता तो वे सचिन को गायत्री मंत्र सुनाने को अवश्य कहते और सचिन स्पष्ट व शुद्ध उच्चारण के साथ मंत्र सुना देता तो वे सभी चंभित होते और मम्मी पापा गर्वित।   

फूल 

Videshi bahu

विदेशी बहू

पीटर को इंडिया से आये चार पांच वर्ष हो चुके थे। मोना उसके ऑफिस में ही काम करती थी। दोनों की सीट अगल बगल थी, अतः प्रायः आपस में बात होती रहती थी। पीटर जब काम में कहीं अटकता तो मोना उसकी मदद कर दिया करती। पीटर जब अपने लिए काफी लाता तो मोना के लिए भी ले आता। दोनों ही अक्सर काफी साथ पिया करते। धीरे धीरे दोनों में अच्छी दोस्ती हो गयी। पीटर गोर रंग का मोहा तो इन्डिया से ही लेकर गया था, मोना के रंग रूप पर मुग्ध था। भाग्य वश गोरी अंगरेजन उसके बगल में ही बैठती थी, मोना को वह मन ही मन प्यार करने लगा। पीटर के मन में कई बार आया कि वह उससे कहा दे, 'आई लव यू। ' किन्तु  उसके मन में डर भी था कि मोना उसके काला होने के कारण ना न कर दे।  मोना तो गोरी चिट्टी लड़की थी, भला वह काले को क्यों चाहती।  यह सब उधेड़ बुन करते महीनों बीत गए। मोना धीरे धीरे, पीटर के दिल में उतरती जा रही थी। एक बार पीटर ने सोचा, मोना से 'आयी लव यू' बोल देना ही उचित रहेगा। क्या होगा, अधिक से अधिक ना ही तो कर देगी, नहीं कहने से भी 'ना' ही है। अगर बात बन गयी तो गोरी अपनी। एक दिन पीटर ने मोना से कहा, 'चलो आज पैंट्री में काफी पीते हैं। '
मोना 'गुड आईडिया' कहकर साथ चल दी।
पैंट्री में जाकर पीटर काफी बनाने लगा। 'मोना तुम क्या लोगी कपचीनो या मौका?'
'आई लव मौका। '
'एंड आई लव यू। '
 पीटर के मुंह से यह कैसे निकल गया, यह उसे समझ ही नहीं आया।
  मोना को इस बात से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस बात का अनुमान तो उसे पहले से ही था। उसने भी मन में सोच रखा था, यहां की सारी लड़कियां गोरों के पीछे ही भागती हैं, उनसे वह कुछ अलग करेगी। उठने किताबों में पढ़ रखा था काले लोग दृढ इच्छा शक्ति के होते हैं और उनके शरीर की रोग रोधक क्षमता अधिक होती है । पीटर काला था तो क्या! उसका व्यक्तित्व आकर्षक था, और ऊपर से इंडियन। मोना को पता था इंडियन लोग परिवार के लिए समर्पित होते हैं और पति के रूप में उन पर पूरा विस्वास किया जा सकता है। उसने भी बिना और सोचे, 'आई लव यू टू' कहकर, पीटर के होंठ चूम ली।  बस फिर क्या था, अब तो काम के बाद मिलना जुलना और साथ घूमना फिरना शुरू हो गया।

पीटर ने सोचा अब तो अमेरिका में ही रहना है, धर्म भी दोनों का एक ही है, मोना से शादी करने में कोई हर्ज नहीं। मोना के गोरी और स्मार्ट लड़की होने के कारण, पीटर उस पर मरता था। अब तो खुद के काला होने के कारण, मोना द्वारा तिरस्कृति होने का डर निकल चुका था। एक बार उसके मन में विचार आया, इन अंग्रेज लोगों से बिना शादी के भी साथ में समय बिताते रहो कोई अंतर तो पड़ता नहीं, एक बार अपने भारतीय मित्रों से बात कर ले तो अच्छा रहेगा। एक दिन अपने मन की बात उसने नितिन से कर दी। नितिन ने मोना को कभी देखा नहीं था, उसने बताया कि मोना के व्यवहार और विवेक के बारे में उसे कुछ पता नहीं, फिर भी इंडिया से विवाह करके इंडियन बहू लाये तो अच्छा है। वहां की लड़कियां संस्कारी होती हैं। इंडियन पत्नी जितनी समर्पित रहेगी, अमेरिका की लड़की नहीं होगी। वह कब तक साथ रहे, कब पिनक कर तलाक ले ले, कोई गारंटी नहीं। मगर पीटर तो मोना के रंग का दीवाना हो चुका था। उसने सलाह ले भर ली, करना तो उसे अपने मन का ही था। उसने नितिन की बात पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया और एक दिन मोना से शादी का प्रस्ताव रख दिया। मोना को भी हाँ करने में कोई भी हिचक नहीं हुई। दोनों ने एक चर्च में शादी कर ली, और रजिस्टर करा लिया। दोनों को साथ रहना, बड़ा अच्छा लगा। कई मामलों में दोनों की खूब पटती थी। पब और क्लब दोनों को ही रास आ रहा था, इसके अलावा डांस के भी दोनों शौक़ीन थे । 

पीटर बड़ा मिलनसार लड़का था, उसके कई इंडियन मित्र थे, जो पीटर के यहाँ मिलने जुलने आते थे। मोना को उसके यहाँ किसी इंडियन का आना, ज्यादा पसन्द नहीं आता। हां, कहीं बाहर घूमने फिरने चलो तो कोई बात नहीं। किसी के आने पर कुछ जलपान की व्यवस्था करना तो उसे बहुत बड़ा भार लगता। अधिकतर काम पीटर को ही करना पड़ता। पीटर पहले कभी कभी, घर पर भारतीय व्यंजन बना लेता था, परन्तु अब घूमने फिरने के कारण समय कम मिल पाता। भारतीय व्यंजन का स्वाद, बस इंडियन रेस्टोरेंट में ही जाकर मिलता। घर पर खाने के लिए रेडीमेड ही होता, पिज्जा, बर्गर, सौसेज या होट डॉग। मोना खाना पकाने के नाम पर  केवल  माइक्रोवेव या फिर चूल्हे पर, बना बनाया खाना गरम करना जानती थी। अंडे का ऑमलेट उसे बहुत पसंद था, वो पीटर को ही बनाकर खिलाना पड़ता।

धीरे धीरे समय बीता, एक बार पीटर, अपनी मम्मी को अमेरिका ले आया। सोचा कुछ समय वो रहेंगी तो घर का इंडियन खाना, खाने को मिलेगा और एकाध चीज बनाना, मोना भी सीख लेगी। मां के आने से, पीटर के मन में ख़ुशी भर गयी। काम से आते ही, मां कुछ न कुछ देशी नाश्ता बना कर रखती। माँ के हाथ का देशी स्वाद, पीटर को आनंद से भर देता। मोना को एकाध चीजें पसंद आतीं, वरना वही पाई, सौसेज और हॉट डॉग।

सास बहू का ताल मेल बैठना तो मुश्किल था ही। मोना को भारतीय भाषा बिलकुल भी नहीं आती थी और पीटर की माँ को बस टूटी फूटी अंग्रेजी ही आती थी। कई बार बातों को वे कुछ का कुछ समझ लेतीं, फिर यदि पीटर वहां होता तो समझाता, वरना जो समझ आता वही करतीं। एक बार पीटर की माँ अगले दिन एक पार्टी में जाने के लिए गिफ्ट पैक कर रही थीं, तभी मोना वहां आ गयी और ध्यान से देखने लगी। पीटर की माँ ने अपने साथ शामिल करने के लिए कहा, 'ओपन द टेप।' मोना गई बाथ टब का नल खोल आयी। वह समझी शायद ये टब में नहायेंगी। पीटर की माँ सारी बात समझ गयीं, वो टॉयलेट जाने के बहाने जाकर बंद कर आयीं। फिर मोना ने खाने का इशारा करते हुए पूछा, 'माँ हॉट डॉग।' पीटर की माँ ने उत्तर दिया, 'तुम्हीं लोगों को मुबारक हो। बताओ गोर डॉग भी नहीं छोड़ते।'  

विवाह के अभी छः महीने ही बीते थे, मोना के व्यव्हार में बहुत परिवर्तन आ चुका था। वह पीटर को अपनी माँ को प्यार और इतना सम्मान करते देखती तो उसे लगता कि उसकी माँ का भी ऐसे ही सम्मान होना चाहिए। पीटर की माँ को वहां के ठण्ड के बारे में अनुमान नहीं था, इसलिए वह गर्म कपड़े, कोई खाई नहीं ले गयी थी।पीटर ने माँ के लिए वहां के मौसम के हिसाब से गरम कपड़े वगैरह खरीद दिया। मोना बोली  'मेरी माँ के लिए तो कभी ये सब खरीदा नहीं, केवल अपनी माँ लिए ही  खरीद रहे हो।' तब पीटर ने मुश्किल से समझाया, 'तुम्हारी माँ के पास तो ये सब है ही। इंडिया में इतनी ठण्ड नहीं पड़ती, इसलिए लोग ज्यादा गरम कपडे नहीं रखते।'

मोना को तो रेडी मेड खाना पसंद आता, लेकिन पीटर की मम्मी को वहां का खाना पसंद नहीं था। वे इंडियन खाना बनातीं तो बर्तन अधिक जूठे होते, जिन्हे साफ करने को मोना तैयार नहीं होती। बेचारी बूढी माँ को ही साफ करना पड़ता। पीटर कभी कभी मदद करा देता या डिश वाशर का प्रयोग करता। घर की सफाई में भी वही झंझट होता, मोना तो वैक्यूम क्लीनर से घर साफ़ करती, पीटर की मम्मी ने एक बार सोचा कि सैनिटाइजर छिड़क कर  पोंछा लगा दे, ताकि फर्श कीटाणुरहित हो जाय और चिपके हुए धूल के कण भी निकल जाएँ। पोंछा लगाकर, साबुन से हाथ धोयी और फिर खाना परोस दिया। मोना ने वह खाना खाया ही नहीं। वह अपने लिए अलग इंतजाम करने लगी। जब पीटर ने पूछा, 'आखिर क्या बात है? तुम तो यह डिश पसंद से खाती हो। '
वह बोली, 'ओल्ड मदर ने हाथों में बिना ग्लोब्स (दस्ताने) पहने ही पोंछा लगाया था और उसी हाथ से खाना सर्व किया (परोसा)।'
'धो तो लिया था। '
'नो, नो; ग्लोब्स नहीं लगाया था।  उसके हाथ में जर्म्स होंगे।'

पीटर की माँ सोचतीं, अगर इसका यही रवैया रहा तो पोता, पोती होने पर हाथ भी नहीं लगाने देगी। उनको हम खिलाएंगे कैसे !

पीटर की मम्मी जब छौंक या तड़का लगातीं तो मोना परेशान हो जाती। उसे छौंक का उठा धुआं बिल्कुल भी बर्दास्त नहीं होता। छींक से उसकी हालत खराब हो जाती और अंग्रेजी में बुदबुदाने लगती।

कभी कभी शाम को पीटर और मोना पब वगैरह चले जाते; और कभी ऐसा भी होता कि मोना घर में ही बियर खोल कर बैठ जाती और खीरा, छुरी पीटर की माँ को पकड़ा देती, 'मदर सलाद'। यह सब पीटर की माँ को अच्छा तो नहीं लगता पर कर भी क्या सकती थी। अमेरिका में रहना है तो सब करना ही पड़ेगा। कुछ ही दिनों में वह ददुःखी हो गयी।

एक दिन पीटर की माँ के सिर में दर्द हो रहा था। उसने पीटर को बता दिया। पीटर बोला, 'लाओ पहले सिर में तेल लगा देता हूँ, फिर दवाई का इंतजाम करता हूँ।' पीटर तेल लेकर माँ के सिर में मालिश करने लगा। मोना ने पूछा, 'ये क्या कर रहे हो ?'
पीटर ने बताया 'मसाज, तेल मालिश।'
'मसाज सेंटर क्यों नहीं ले जाते? ओ. के. मसाज भी करते हो ! मेरा और मेरी मां का तो कभी नहीं किया। '

धीरे धीरे, दोनों में बात बात पर नोक झोंक होने लगी और आपस की खट-पट बढ़ती गयी, और नौबत यह आ गयी कि मोना अपने माँ बाप के यहाँ चली गयी। अब पीटर का भी गोरी चमड़ी से मोह भंग हो चुका था। फिर भी फोन करके मोना को एडजस्ट करने के लिए बहुत समझाया, पर सब बेकार। मोना इंडियन माहौल से सामंजस्य नहीं रख पा रही थी। पीटर को भी मोना से विवाह करके गोरी चमड़ी के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला। मोना जब मन होता अपने माँ बाप के यहाँ चली जाती और पीटर व उसकी माँ घर अकेले रह जाते। पीटर की माँ को तो उसके जाने से अच्छा ही लगता, कम से कम घर में शांति तो हो जाती। पीटर के पास अब एक ही विकल्प था 'तलाक'। 
दोनों की खटपट की बात जब भारतीय मित्रों को चली तो वो भी बहुत दुखी हुए। नितिन ने कहा, पहले ही समझाया था पर यही गोरी चमड़ी का दीवाना था। कितना भी ये गोर भेद भाव तो रखते ही हैं। अब हो भी क्या सकता था। पीटर ने मन बनाया मोना को तलाक करके इंडिया से दूसरी दुल्हन लाये। यह सब सोचकर उसने तलाक का अनुरोध पत्र दाखिल कर दिया। मोना भी कौन सी कम थी, हर्जाने के रूप में उसने एक भारी भरकम राशि की मांग रख दी तो पीटर के होश उड़ गए। फिर भी जिंदगी की शांति से वह रकम देनी उसे सस्ती लग रही थी। आपसी बातचीत और कोर्ट की मध्यस्थता से समझौता हुआ तथा पीटर और मोना का तलाक हो गया।  

कुछ महीनों में पीटर की मां का वीसा समाप्त हुआ और वह वापस इंडिया आ गयी। बेचारे पीटर को फिर से अब अकेले समय बिताना था। अब उसने ठान लिया था, बेशक कुंआरा रह जाय किन्तु गोरी यानी अंग्रेजन से शादी नहीं करेगा। दो वर्ष अकेले काटने के बाद जब वह इंडिया आया तो उसकी में ने भारतीय परिवारों के तौर तरीकों से चलने वाली व्यवहार कुशल बहू पहले ही तलाश रखी थी। पीटर उसके साथ विवाह करके अमेरिका ले गया। उसके साथ पीटर चैन की जिंदगी जीने लगा। अब उसकी मां को भी अमेरिका आने जाने में कोई परेशानी नहीं थी। 


Udan pari

उड़न परी

सिम्मी का एयर होस्टेस का कोर्स पूरा हो गया था। उसे एक विदेशी एयरलाइन्स में होस्टेस की जॉब भी मिल गयी। वह बहुत खुश थी, और घर के सभी लोग बड़े खुश थे। पहला वेतन मिलने पर, घर में सबको कुछ न कुछ सौगात लायी। माँ के लिए महँगी वाली साड़ी, पापा के लिए जैकेट, छोटे भाई के लिए जींस और टी. शर्ट । ट्रेनिंग पूरी होने पर उसकी ड्यूटी, मुंबई हवाई अड्डे पर ग्राउंड स्टाफ में लगी थी, और उसे कस्टमर केयर (ग्राहक सेवा) का काम देखना था । एक दिन फ्रांस एयरलाइन्स की, पेरिस से फ्लाइट आई। सभी यात्री विमान से उतर कर, अपने अपने सामान के लिए कन्वेयर बेल्ट के चारों ओर खड़े हो गए। उन्हीं में एक यात्री रोहन भी था। लगभग सभी यात्री सामान लेकर, हवाई अड्डे से बाहर जा चुके थे, बस दो चार यात्री ही रह गए थे उनमें से एक रोहन भी था। उसका सामान अभी तक कन्वेयर बेल्ट पर नहीं आया था। वह कई बार पूरी तरह से देखा, पर उसे अपना बैग नहीं मिला। वह एयरलाइन्स के काउंटर पर शिकायत करने जा ही रहा था कि उसी समय फ्रांस एयरलाइन्स की यूनिफार्म पहने, सिम्मी दिख गयी। उसने सिम्मी से सामान न मिलने की शिकायत की तो सिम्मी बोली -
'ठीक है सर, थोड़ी प्रतीक्षा करें, अभी देखती हूँ।'
सिम्मी ने फ्लाइंग स्टाफ से छान बीन की तो पता चला कि रोहन का सूट केस पीछे छूट गया था, वह अगली फ्लाइट से आ रहा है। रोहन इस बात से बहुत नाराज हुआ। वह एयरलाइन्स को भला बुरा कहने लगा। सिम्मी ने उसका बैग छूट जाने का खेद व्यक्त किया और उसे एयरलाइन्स के कार्यालय ले गयी। कार्यालय में उससे एक फॉर्म पर उसका नाम, पता, फ़ोन आदि नोट करवा कर आश्वस्त किया, कल तक उसका सूट केस उसके घर पहुंचा दिया जायेगा। सिम्मी ने फोन से पता करने के लिए उसे अपना नंबर भी दे दिया।  अब रोहन कर भी क्या सकता था, वह अपने घर चला गया। अगले दिन उसका सामान आ गया और उसके दिए पते पर भिजवा दिया गया। सामान पहुँचने की पुष्टि के लिए सिम्मी ने रोहन को फोन किया और एक बार फिर सारी बोली। उसके व्यवहार और सहयोग से रोहन बहुत प्रभावित था। 
छुट्टी बिता कर, रोहन फिर पेरिस जाने के लिए हवाई अड्डे पहुंचा। इस बार सिम्मी की ड्यूटी बदल गयी थी और उसे आगमन से प्रस्थान में लगा दिया गया था। इस बार भी बोर्डिंग पास लेते समय रोहन की मुलाकात सिम्मी से हो गयी। सिम्मी ने उसे पहचान लिया और मुस्करा कर बोली, 'सॉरी सर, आपको आगमन में काफी परेशानी हुई थी। उम्मीद है, अगली बार ऐसा नहीं होगा। आप पेरिस में ही रहते हैं ?'
'हां, कई साल हो गए। मुझे अब वहीँ की नागरिकता मिल चुकी है।'
'क्या, वहां जॉब करते हैं ?' सिम्मी ने पूछा।
'हाँ, एक आई टी फर्म में। कभी पेरिस गयी हो कि नहीं?'
'अभी नहीं, अभी हाल ही में जॉब मिली है। चूकि वहीं की एयरलाइन्स है तो कभी न कभी जाना होगा ही। आपका इंडिया का चक्कर कितने दिन में लग जाता है ?'
'अक्सर ही आ जाता हूँ, कुछ इंडियन ग्राहक भी हैं।  काम का काम हो जाता है और अपने पुराने लोगों से मिलना भी।'
'ठीक है सर, आपकी यात्रा मंगलमय हो। फिर कभी एयरपोर्ट पर कोई परेशानी हो तो, मेरा नंबर आपके पास है ही, फोन कर देना। किसी भी एयर लाइन्स का टिकट क्यों न हो। वैसे मैं तो यही कहूँगी, फ्रांस एयरलाइन्स से ही यात्रा करना।'
रोहन ने भी अपना फ्रांस का नंबर दे दिया, 'कभी पेरिस आना तो फोन करना। '
अब दोनों में फोन से बातें होने लगीं और वह मुलाकात धीरे धीरे दोस्ती में बदल गयी। तीन चार महीने में ही रोहन का फिर से चक्कर लगा। वह सिम्मी को सरप्राइज देना चाहता था, इसलिए पहले नहीं बताया। मुंबई हवाई अड्डे पर पहुँच कर ही उसने फोन किया, 'हेलो ! सिम्मी!'
'एस, अरे रोहन। कैसे हो ?'
'अच्छा हूँ और तुम कैसे हो?"
'मैं भी अच्छी हूँ।  मुंबई कब आ रहे हो?
'मैं मुंबई से ही बोल रहा हूँ। अभी अभी लैंड किया हूँ। अराइवल में आ जाओ, साथ काफी पीते हैं।"
'लेकिन मैं तो ड्यूटी पूरी करके घर आ चुकी हूँ। तुमने पहले तो अपने आने के बारे में बताया नहीं।"
'हां, सोचा था तुम्हें सरप्राइज दूंगा। मगर यह तो उल्टा पड़ गया। चलो कल डिनर साथ करते हैं।"
'सारी! कल भी नहीं,  कल तो मेरे छोटे भाई रोमी का जन्मदिन है, और हमने घर पर ही पार्टी रखा है।'
'तो फिर कैसे मिलेंगे।'
'जब समय निकाल पाती हूँ तो फ़ोन करती हूँ।"
'मगर मेरी भी कई मीटिंग हैं, ऐसा न हो कि जब तुम्हें समय हो, मुझे न हो।"
'देख लो साथ डिनर करना है तो समय तो निकालना पड़ेगा। ठीक है, अब बाद में बात करेंगे।"
 
रोहन बहुत पछताया। वहीँ से फोन कर दिया होता तो कम से कम एयरपोर्ट पर ही उससे मिल लेता। इस बार उसे चार पांच दिन ही रुकना था। रोहन सोचने लगा कि शायद सिम्मी उसे अपने भाई के जन्म दिन की पार्टी पर निमंत्रित करेगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अभी तक सिम्मी ने रोहन के बारे में घर पर किसी को नहीं बताया था। एक बा एक, उसे कैसे आमंत्रित कर सकती थी। रोमी के जन्म दिन पर बहुत ही बढ़िया, चॉकलेट वाला सुन्दर सा केक कूरियर से उसके घर पहुंचा। केक पर लिखा था 'विथ गुड विशेष फ्रॉम रोहन'। रोहन का नाम देखकर सभी अचंभित थे। किसने भेजा होगा अभी अटकलें ही चल रही थीं कि इतने में वहां सिम्मी भी आ गयी। उसने बोल दी कि एयरलाइन्स के किसी स्टाफ का पेरिस ट्रांसफर हो गया है और यह केक उसने भेजा है। खैर, दान की बछिया का दांत देखने से क्या लाभ। केक कटा और खाकर सबको मजा आ गया।

रोहन और सिम्मी के डिनर का कार्यक्रम उसके अगले दिन के लिए तय हो गया। दोनों ने एक जाने माने होटल में साथ खाना खाया। रोहन, सिम्मी के लिए पेरिस से परफ्यूम लाया था, जो सिम्मी को गिफ्ट किया। परफ्यूम की महक ने तो सिम्मी के दिल को ही छू लिया। रोहन के दिए दोनों सौगातों ने सिम्मी के दिल में जगह बना ली। रोहन अपना काम पूरा करके वापस पेरिस चला गया। अब दोनों के बीच फ़ोन से वार्तालाप का सिलसिला और तेज हो गया, सुबह शाम दोनों समय ही फोन से बातें होतीं। शाम को कई बार तो उनकी बात घंटे घंटे तक चलती।

कुछ समय पश्चात्, सिम्मी को विमान परिचारिका बन कर पेरिस जाने का अवसर मिला। जब रोहन को पता चला तो वह एयरपोर्ट पर ही मिलने आ गया। रोहन ने उसका शानदार स्वागत किया। रोहन चाहता था, सिम्मी को अपने घर ले जाये और उसे पेरिस अपने साथ घुमाये परन्तु सिम्मी को अगली ही फ्लाइट से फिर वापस आना था। सिम्मी को न तो घूमने का अवसर मिला न ही रोहन के साथ कुछ समय बिताने का। खैर, यह तय हो गया कि अगली उड़ान में जब वह पेरिस आएगी तो रोहन के साथ ही खाना खायेगी। अब पेरिस में एक दूसरे से मिलने का जल्दी जल्दी अवसर मिलने लगा। सिम्मी होटल में रुकती, रोहन को कभी लंच पर तो कभी डिनर पर होटल में बुला लेती। कभी सिम्मी के पास ज्यादा समय होता तो दोनों साथ घूमने चले जाते। दोनों की दोस्ती अब प्यार में बदल चुकी थी। दोनों एक दूसरे को बहुत चाहने लगे थे।

एक बार फिर सिम्मी फ्लाइट लेकर पेरिस पहुंची। रोहन ने उसे डिनर पर आमंत्रित किया। इस बार रोहन ने उससे कह दिया, 'सिम्मी! चलो हम विवाह कर लेते हैं।'
सिम्मी के दिल में भी उत्तर तो हाँ में ही था पर उसे अपने मम्मी पापा से अनुमति लेनी थी। वह बोली, 'मम्मी से बात करके बताउंगी।'
'लेकिन, आई लव यू,  तुम मुझे प्यार करती हो या नहीं?'
'आई टू लव यू, लेकिन मम्मी पापा से पूछने में क्या जाता है ?'
'अगर वो नहीं कर दिए तो।'
'तो कोई रास्ता निकालेंगे। बात को समझो, तुम यूरोप में हो और मैं भारत में, और ऊपर से लड़की हूँ।  तुम्हें पता है, वहां लड़कियों को कितने बंधन में जीना पड़ता है। '
'लेकिन तुम उन लड़कियों में से नहीं हो। तुम तो उड़न परी हो। तुमने आकाश नापकर यूरोप तक का  रास्ता तय कर लिया। बीच में नदी, समुद्र, जंगल, पहाड़ ये सब पार कर के आयी हो, तो ये छोटी सी रूकावट तुम्हें कैसे रोक लेगी।'
'फिर भी सिम्मी ने उसे समझाया, कोई काम तरीके से करने से वह सुन्दर और पक्का होता है। थोड़ी औपचारिकता निभाने में जाता ही क्या है। जब मम्मी पापा नहीं मानेंगे तब देखेंगे। मैं तू तुम्हारी हो ही चुकी हूँ। ' 
इंडिया वापस आकर सिम्मी ने मम्मी से सारी बात बताई। मम्मी को उसकी यह बात कत्तई पसंद नहीं आयी। वह बेटी को इतनी दूर नहीं भेजना चाहती थी। सिम्मी के विवाह को लेकर, घर में काफी बहसबाजी हुई। उसके मम्मी पापा को रोहन से विवाह में कोई खास एतराज नहीं था, परन्तु उनके मन में तरह तरह की आशंकाएं थीं। वहां जाकर, सिम्मी परिवार से दूर एकदम अकेली हो जाएगी, रोहन के ही व्यव्हार के बारे में किसको क्या पता, विदेश में सिम्मी के साथ कहीं कुछ हो गया तो वे उसकी कौन मदद करेगा।

इन सब बातों का सिम्मी के पास उत्तर था। वह कहती, अब वह कोई बच्ची नहीं है, देश दुनिया घूमी है।  उसे अपने ऊपर और रोहन पर भी पूरा भरोसा है। फिर भी जिंदगी में कुछ न कुछ तो जोखिम उठाना ही पड़ता है। भारत में विवाह करें तो भी क्या गारंटी है, सब ठीक ही होगा। पूरी तरह से आत्म मंथन करके सिम्मी ने मम्मी को समझाया, 'वह पेरिस जाएगी तो रोमी को भी आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाने का अवसर मिल जायेगा और आप लोग भी इसी बहाने विदेश घूमेंगे। एयरलाइन्स से टिकट मिलेगा और रहने के लिए अपना घर होगा, कभ मैं इंडिया आ जाउंगी कभी आप लोग फ्रांस आ जायेंगे। फिर क्या समस्या होगी।"
उस उड़नपरी के आत्म विस्वास और दृढ़ता को देखकर, उसके मम्मी पापा को झुकना पड़ा। अंत में उन्होंने शर्त रखी कि शादी इंडिया में होगी। ताकि यहाँ का समाज और सम्बन्धी भी विवाह को देखें। सिम्मी ने रोहन को यह बात बताई, उसे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। अंधे को और क्या चाहिए, दो ऑंखें।  रोहन इस बात को तुरंत मान गया। विवाह की तैयारियां प्रारम्भ हो गयीं। मुंबई के एक अच्छे होटल में दोनों का विवाह धूम धाम से संपन्न हो गया। सिम्मी ने अपनी बदली वहां के घरेलू उड़ान के परिचालन में करवा ली और दोनों सुखपूर्वक पेरिस में रहने लगे।  

Sunday, 15 March 2015

Niwasi


निवासी

गुरमीत के मन में बस यही था का इंगलैंड में बसना है। उसके गांव और आस पास के एकाध लोग लंदन में रहते थे। वहां के बारे में सुनकर उसके मन में इंग्लैंड जाने का सपना घर कर गया था। यह तो उसने पता लगा लिया था अधिकतर लोग उच्च शिक्षा के लिए वहां जाते हैं, और पढ़ लिख कर वहीँ जॉब मिल जाती है। गुरमीत पढ़ा लिखा तो कोई खास था नहीं, किसी तरह माध्यमिक परीक्षा पास कर ली थी। इसलिए पढ़ने के लिए उसका जाना संभव नहीं था।
उसके साथ का पढ़ा एक लड़का दिल्ली रहता था, वह गांव आया था।  गुरमीत ने अपने मन की बात उससे कर ली। उसने उसे सलाह दी कि दिल्ली में वीसा वगैरह दिलाने वाले कई एजेंट हैं उनसे बात कर ले।  वे पैसा लेते हैं और कोई न कोई हल निकाल लेते हैं।  'पर तू तो ज्यादा पढ़ा लिखा है नहीं करेगा क्या ?'
''टैक्सी चलाऊंगा, सुना है टैक्सी में बहुत पैसा है '
गुरमीत दिल्ली एजेंट से मिलने गया और अपनी बात बताया।
एजेंट ने साफ़ बता दिया कि वहां जाने के दो ही विकल्प हैं, या तो आगे की पढ़ाई के लिए जाओ या यहाँ की किसी कंपनी का वहां काम चल रहा हो तो वह भेज सकती है।  टैक्सी चलाने के लिए इंग्लैंड की सरकार थोड़े ही वीसा देती है। गुरमीत थोड़ा निराश तो हुआ पर हिम्मत नहीं हारा। वह एजेंट को पैसे का लालच देने लगा।
'यार सुना है पैसे से सब हो जाता है, तू यह काम करवा मैं पैसे खरचने वास्ते भी तैयार हूँ । क्या है थोड़ी बहुत जमीन भी बेचनी पड़ जाय तो वहां जाकर कमा लूंगा।  थोड़ी ज्यादा मेहनत कर लूंगा। और क्या ?'
पैसे की बात सुनकर एजेंट के कान खड़े हो गए। अच्छा एक  बात बता, 'तू शादी शुदा है ?'
'नहीं, पर क्यों ?'
'बस तो यही करते हैं, वहां की निवासी किसी लड़की से तेरी शादी करवा देते हैं, उसके आधार पर तेरे को वीसा मिल जायेगा। फिर जाकर उससे तलाक ले लेना। '
'वहां की लड़की मुझसे क्यों शादी करेगी ?' गुरमीत ने पूछा।
'अरे वह सब नाटक होगा, वो भी पैसे लेगी।  खाली दिखाने के लिए शादी होगी, सिर्फ कागजों में। वहां जाकर तलाक ले लेना।  वहां तलाक लेने में कोई दिक्कत नहीं होती। '
एजेंट ने जुगाड़ लगाया, एक अंग्रेजन जिसका नाम एन था, से गुरमीत की शादी करवा दिया। गुरमीत इंग्लैंड पहुँच गया और टैक्सी चलाने लगा। वहां की लाइफ से वह बहुत खुश था।

एक दिन वह किसी सवारी को एक होटल में छोड़ने गया वहां एन टैक्सी का इंतजार कर रही थी।  जैसे ही टैक्सी की सवारी उतरी, एन उसमे बैठ गयी। एन समझ नहीं पायी थी जिस टैक्सी में बैठी है, वह गुरमीत ही चला रहा है। गुरमीत ने उसे शीशे में देख लिया और पहचान लिया। गुरमीत ने जैसे ही बोला 'एन ' , वह चौंकी।
'अरे गुरमीत ! प्रजेंटली यू आर माय हसबैंड (अभी तक तुम मेरे पति हो। '
गुरमीत बोला, 'हां, तलाक का काम कब तक होगा?'
'चलो टैक्सी कहीं रोको, साथ काफी पीते हैं। '
गुरमीत एक कैफे में टैक्सी रोकता है, दोनों काफी पीने के लिए बैठ जाते हैं। फिर एन उसे बोलती है 'मैं तुम्हें कैसी लगती हूँ? '
' अच्छी '
'गुरमीत ! तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो। मैं तुम्हारे पास आने सोच रही थी, देखो किस्मत कितनी अच्छी है तुम अपने आप ही मिल गये। '
दोनों में बात होती रही।  काफी पीकर बाहर निकले तो एन ने गुरमीत का हाथ पकड़ लिया। 'अगर हम तलाक न लें तो कैसा रहेगा ! तुम आ जाओ मेरे घर मेरे साथ रहो।  मैं अब आगे और नाटक नहीं करना चाहती। '




Friday, 13 March 2015

Yahan bhi wahan ki

यहाँ भी वहां की

'हम लोग संडे को नीतू के यहाँ गए थे। इंडिया से उसकी माँ आई हैं। बता रही थीं, बंगलोर में उनके तीन पेट्रोल पंप हैं और एक बस चलती है।' वीना ने सुषमा को बताया।
'इससे पहले तो नीतू ने कभी चर्चा नहीं की, कि उसके पेट्रोल पंप हैं और बस चलती है। चल, होगा, हमें क्या ? पर रहन सहन से तो ऐसा कुछ नहीं दिखता। तुझे पता है ? जब ये इंडिया से आये थे तो सोफा पटरी से उठाकर लाये थे। उसकी एक टांग टूटी थी, नीचे ईंट रखकर काम चलाया। बाद में जब पैसा हुआ तो नया खरीदा।' सुषमा बोली। 
'तो क्या सोफा इंडिया से लाते ?'
'नहीं, मेरा कहने का मतलब है कि इतने पैसे वाले होते तो पहले ही नया खरीद लेते।'
'हां, सही कह रही है, इतने पैसे होते तो इंडिया छोड़ कर ही क्यों आते !'

'जानती है वीना, नीतू की सैलरी तो तेरे से भी कम है, उसके हस्बैंड का पता नहीं। इतनी कंजूस है कि उसके यहां जाओ तो बिना चाय पानी के ही टरकाने की कोशिश करती  है। और पता है, कपडे हमेशा सेल से ही खरीदती है। कभी पार्टी वगैरह करो तो दूर ही रहना चाहती है ताकि अपने हिस्से के पैसे न देने पड़ें। '
'तुझे तो सब खूब मालूम है। '
'मेरा तो पाला पड़ता रहता है न ! भाई खाओ तो खिलाओ भी। ऐसे थोड़े ही चलता है, खाये पिए खिसके। देख हमने उसके बच्चे के जन्मदिन पर इतना महंगा गिफ्ट दिया और उसका देखो, नयन के लिए वही सेल वाली पैंट शर्ट। नयन तो देखते ही नाक मुंह सिकोड़ने लगा। हमने भी पैक कर के रख दिया, आगे बढ़ा देंगे।'
वीना भी सुषमा की बातों में अपनी कुछ जोड़ना चाहती थी, पर उसे इतना सब न तो याद आ रहा था और न ही ज्यादा बात बनानी ही आती थी। फिर भी याद करके बोली -
'एक बात तो मैंने भी नोट किया है, पिकनिक वगैरह पर भी जाओ तो हम लोग इतना कुछ बना कर ले जाते हैं। वो वहां भी चिप्स और सैंडविच से ही काम चला लेती है।'
तभी घंटी बजती है, 'लगता है कुसुम आ गयी। आने को बोली थी।'  कहते हुए, वीना दरवाजा खोलती है।
'आ कुसुम! हम इंतजार ही कर रहे थे। सुषमा भी थोड़ी देर पहले ही आई है। '
'और क्या गप्पें हो रही थीं?'
'यही नीतू के पेट्रोल पंप और बस की बात हो रही थी।' वीना ने बताया। 
'छोड़ भी, सभी लोग अपना वतन छोड़ के यहाँ आये हैं, वहां कुछ कमी दिखी होगी तभी तो। 'पता है! आजकल सरला और अंजू में बोल चाल बंद है।' कुसुम ने समाचार दिया।
'क्यों क्या हो गया? उनमें तो बड़ी दोस्ती थी।' सुषमा पूछी।
'जब वे पिकनिक पर गए थे तो अंजू ने संध्या को बताया कि दिल्ली में सरला का छोटा सा मकान है। इसके पापा कोई छोटी मोटी नौकरी करते हैं। उनके पास गाड़ी तक नहीं है। ये तो महेश को फंसाकर लव मैरिज करके अमेरिका आ गयी है। यह बात संध्या के पची नहीं और वह सरला से पूछ ली। बस फिर क्या था, अंजू और सरला में फ़ोन पर ही हो गयी। '
'अरे, यह तो बड़ी बुरी खबर लेकर तू आई। कब की बात है ?'
'अभी एक सप्ताह ही हुए हैं, पिछले से पिछले संडे को ही तो पिकनिक पर गए थे। '
'यह तो बड़ी ख़राब बात है, इंडिया का इतिहास लेकर यहां पर टेंशन रखें, बिलकुल भी ठीक नहीं। अंजू को ऐसा नहीं करना चाहिए था। अंजू तो बड़ी खतरनाक लड़की है यार। केयरफुल रहना पड़ेगा। ' सुषमा बड़बड़ाती रही।
वीना उसे चुप कराते हुए, 'चल छोड़, चाय बनाकर पीते हैं।  साथ में क्या लेगी ?'
'बस चाय ठीक है। और कामिनी के यहाँ गयी थी कि नहीं। सुना है उसकी भी माँ आई है।'
 'नहीं अभी नहीं जा पाए। उन्हें खाने पर बुलाना है।  देखते हैं अगले सन्डे को और कोई कार्यक्रम नहीं बना तो बुलाते हैं।' वीना ने कहा।
तभी कुसुम बोल पड़ी, 'कामिनी के पापा यहां आने को तैयार नहीं होते। इसने उनकी मर्जी के खिलाफ शादी की थी, तभी से नाराज हैं। मां का दिल तो नहीं माना, वे चली आईं।'
'ठीक है कभी न कभी वे भी मान जायेंगे। '    
वीना अभी चाय छान ही रही होती है कि सोमेश और इला भी आ धमकते हैं। कुसुम, इला को देखते ही चहक उठती है, 'अरे इला हमें तो मिले एक महीने से भी अधिक हो गए। और कैसे है ? तू पिंकी के शादी की वर्षगांठ पर भी नहीं आई थी।'
'हां, हमने वो ग्रुप छोड़ दिया।'
'हं, क्या हो गया।'
'कुछ नहीं, वो अपने को कुछ ज्यादा ही समझते हैं। पिंकी के पापा इंडिया में कस्टम अधिकारी हैं तो बड़ी ताव दिखाती है। सुरभि के पापा किसी प्राइवेट कम्पनी में मैनेजर हैं। एक बार उनकी कंपनी ने कोई सामान इम्पोर्ट किया तो पिंकी के पापा ने उनका माल कम ड्यूटी पर छुड़वा दिया था। पिंकी यह बात सबके सामने गाने लगी। सुरभि को बहुत बुरा लगा। हमसे तो ज्यादा क्लोज सुरभि ही है न। उसे तो हम नहीं छोड़ सकते।'
'अच्छा छोड़, ये चाय ले और सोमेश को दे, तेरे लिए अभी बनती हूँ।' वीना इला की ओर इशारा करते हुए कहा।
'नहीं, मैं चाय नहीं पिऊँगी। कोल्ड में क्या है ?' कहते फ्रिज खोलकर कोक की कैन निकाल ली। 
सोमेश कुछ देर तक सब सुनता रहा, फिर अपना मौन तोडा, 'यहाँ हम आये हैं कि सुख शांति की जिंदगी जीने और तुम लोग वही इंडिया का इतिहास यहाँ भी ढो रही हो। वहां की कूटनीति, यहाँ भी ढोते रहे तो जिंदगी नरक हो जाएगी। अरे अपने कमाओ खाओ और मौज मनाओ। लाइफ को एन्जॉय करो। इसने क्या किया, उसने क्या किया, इन सब का टेंशन हम क्यों पालें। उसे जिस तक है, उसी तक छोड़ दो।'
 


Preeti jaisi bahu

प्रीति जैसी बहू

मम्मी, पापा ने ठान लिया था कि प्रीति की शादी वहीं करनी है। वैसे तो प्रीति के पापा खन्ना जी को पहले से जानते थे। अच्छा घर बार है, धनी  परिवार है,  बढ़िया कारोबार चल रहा है, अपने ही शहर के रहने वाले हैं; और क्या चाहिए! लड़की वहां सुख करेगी, खाने पीने की कभी कोई कमी नहीं होगी। माता, पिता को तो लगता है पैसा होना ही सुख है, पर प्रीति को समीर की शक्ल, सूरत और तो और व्यव्हार भी कत्तई पसंद नहीं था। जब देखो पैसे के घमंड में चूर रहता, पढ़ा लिखा कुछ खास नहीं, बात करने का सऊर तक नहीं।  वह किसी तरह इस मुसीबत से छुटकारा पाना चाहती थी। मगर इस मुसीबत से निकलने  का कोई उपाय भी तो दिखे।
प्रीति अपनी उधेड़ बुन में थी कि आखिर वह क्या करे, इस मामले में किससे मदद मांगे कि कपूर साहब एक दिन शादी का प्रस्ताव लेकर, खन्ना जी के यहाँ चले गए।  खन्ना जी को भला कैसे एतराज होता।  प्रीति जैसी सुन्दर, एकदम मृदुल स्वाभाव की लड़की उन्हें जो मिल रही थी। फिर भी औपचारिकता के तौर पर, एक बार बेटे से पूछकर बताने के लिए टाल दिए। प्रीति को जब पता चला तो बहुत दुःखी हुई। उसने सोचा अगर यूँ चुप रही तो सब अनर्थ हो जाएगा और उसकी शादी खन्ना के बेटे से कर दी जाएगी। उसने हिम्मत बटोरा और मम्मी से कह दिया, 'मम्मी, शादी की अभी इतनी जल्दी क्या है? मैं क्या आप लोगों को बोझ लग रही हूँ।'
'नहीं बेटा, तू बोझ काहे को है। फिर भी जिंदगी भर कुंवारी तो नहीं रहेगी न! जिम्मेदारी वाले काम जितनी जल्दी हो जांय, अच्छा है।'
'तो मैं अभी शादी नहीं करुँगी।'  
'आखिर बात क्या है?'
'मम्मी, एक तो मुझे संजय पसंद नहीं, दूसरे नौकरी में अभी प्रोबेशन पर हूँ। कम से कम एक वर्ष शादी नहीं करनी है।' 
प्रीति की मम्मी ने सारी बात  कपूर साहब को बताई, तो उनके पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी। 'आखिर खन्ना के घर, शादी का प्रस्ताव लेकर तो वे खुद ही गए थे। खन्ना ने प्रीति से मिलने की बात भी कह दी है।खन्ना क्या कहेगा। इतना बड़ा आदमी है, पैसे वाला है। वह हमारे यहाँ रिश्ता करने को तैयार हो गया, हमरे लिए तो गर्व की बात है। ऐसा रिश्ता कहाँ मिलेगा। अब उसे हम किस मुंह से मना करेंगे।'  
प्रीति की माँ ममता ने कहा, रुको एक दो दिन में उसे समझाकर देखती हूँ। एक दिन प्रीति को अच्छे मूड में देखकर, ममता ने कहा, 'बेटी, खन्ना साहब बड़े आदमी हैं, शहर में रुतबा है, बड़े उद्योगपति हैं। फिर ऐसा रिश्ता नहीं मिलेगा। अगर किसी और लडके को चाहती है तो भी बता दे।'
'नहीं मम्मी मैं किसी को नहीं चाहती। खन्ना जी हो सकता है बड़े होंगे किन्तु अच्छे भी हैं यह कैसे कह सकती हो। उनके बेटे को देखी हो न शकल न सूरत ऊपर से पैसे का घमंड इतना कि वो सोचते हैं किसी को भी खरीद लेंगे। वे मुझे प्यार कहाँ देंगे, जिंदगी भर पैसे से ही तौलते रहेंगे। माँ! जल्दी क्या है, मुझे पैसे की भूख नहीं है। एक साल रूक जाओ फिर जैसा कहोगी कर लूंगी। '    

फिर तो श्रीमती कपूर के घर में क्लेश शुरू हो गया। कपूर साहब को बेइज्जती की चिंता सताने लगी। खन्ना जी से अब क्या मुंह ले के बात करेंगे। इतना स्पष्ट मना करने पर भी बीच बीच में खन्ना के यहाँ शादी की चर्चा हो जाती। दो तीन महीने बीत गए, लेकिन कपूर की जुबान पर खन्ना के अलावा और कोई नाम नहीं आया। अपने मम्मी पापा का व्यव्हार देखकर, प्रीति को लगने लगा कि अब इस समस्या का उपाय उसे स्वयं ही ढूंढना पड़ेगा।

एक दिन प्रीति, अपनी सहेली के साथ एक मॉल में घूम रही थी कि वहां अचानक उसे सुमित दिख गया। प्रीति लपक कर पास पहुंची, 'अरे सुमित, यहाँ कैसे! तुम तो अमेरिका चले गए थे न!'
'हाँ, अभी एक सप्ताह पहले आया था, सोचा मम्मी को थोड़ी शॉपिंग करा दूँ। ये मेरी मम्मी हैं।'
प्रीति ने झुक कर सुमित की मम्मी के पैर छू लिया।
सुमित की मम्मी उसे देखीं तो देखती रह गयीं। 'कितनी प्यारी बच्ची है। क्या नाम है बेटा?'
'प्रीति'
'बहुत सुन्दर नाम है। और बेटा, करती क्या हो?'
'बैंक में जॉब कर रही हूँ, ऑन्टी। इसी साल लगी हूँ। ग्रेजुएशन सुमित के ही साथ किया था। ये अमेरिका चला गया, और मैंने एम. बी. ए. करके, बैंक ज्वाइन कर लिया।'
'अच्छी बात। और मम्मी पापा।'
'दोनों बहुत अच्छे हैं, पापा एक कंपनी में मैनेजर हैं और मम्मी घर पर ही रहती हैं।'
सुमित की ओर देखते हुए  'कितनी प्यारी बच्ची है।'
सुमित की मम्मी, प्रीति से मिलकर मंत्र मुग्ध हो गयीं। शायद मन में यही सोच रही थीं यह लड़की उनकी बहू हो जाय तो कितना अच्छा लगेगा, सुन्दर, सुशील  और सभ्य। सुमित के साथ इसकी जोड़ी कितनी अच्छी लगेगी। प्रीति और उसकी सहेली शॉपिंग में सुमित की मम्मी की मदद करने में लग गयीं, थोड़ी बहुत खरीददारी हो जाने के बाद प्रीति बोली, 'अच्छा ऑन्टी चलते हैं। देर हो जाएगी।'
'चलो कुछ खा पी लेते हैं ' सुमित ने कहा।
 'नहीं, चलते हैं, देर हो रही है,  मम्मी इंतजार कर रही होंगी।'
'अरे ऐसा कैसे होगा, तुमसे कॉलेज के बाद अब मिले हैं, सामने ही तो फ़ूड कोर्ट है।'
सुमित की मम्मी भी बोल पड़ती हैं, 'कुछ खा लो बेटी, कम से कम सुमित का मन तो रख दो।'
इतना कहने पर प्रीति, सुमित की मम्मी की बात, टाल नहीं पायी। चाहती तो वो भी थी, कुछ समय सुमित के साथ रहे, पर घर जाने की भी चिंता थी। फ़ूड कोर्ट  में जाकर, सभी ने बर्गर और कोल्ड ड्रिंक लिया। खा पीकर, प्रीति चलने लगी तो सुमित बोल पड़ा, 'अपना फ़ोन नंबर तो दे दो।'
'सॉरी, भूल ही गयी थी, तुम भी अपना नंबर दे दो।'
'खाली नंबर ही लेना है या फोन भी करना है।'
 'हाँ, हाँ देखना करती हूँ कि नहीं, वैसे जब अमेरिका चले जाओगे तो तुम्हीं नहीं करोगे।'
'अमेरिका जाने में तो अभी समय है, आज ही, घर पहुंचते ही करता हूँ।'
प्रीति वहां से चल दी। जाते समय कई बार मुड़ कर सुमित को देखी और एक बार जब थोड़ा सा हाथ निकाल कर, धीरे से हिलाकर मुस्करायी तो सुमित के दिल को छू गयी। सुमित ने हाथ हिला कर उसे विदा किया। घर पहुंचते ही सुमित की मम्मी ने सुमित से कहा, 'प्रीति जैसी बहू घर आती तो कितना अच्छा होता।'
सुमित भी कहाँ चुप रहने वाला, ' तो ले आओ उसी को।'
'अरे, उसके मम्मी पापा बात करेंगे तभी तो, वैसे तूने अमेरिका में देख तो नहीं रखा है न!'
'नहीं मम्मी! तेरी बहू तो इंडियन ही होगी।'
फुर्सत पाते ही, सुमित ने फोन उठाया और प्रीति को मिला दिया, 'हेलो, प्रीति!'
'हाँ, कौन सुमित। और हो गयी शॉपिंग पूरी? आंटी कैसे हैं? आंटी बहुत अच्छी हैं।'
'वो भी तो तुम्हारी तारीफ कर रही थीं। तुमसे मिलके उनका तो जी ही नहीं भरा ... और मेरा भी  ... '
'तो साथ ही लिए चलते।'
'वाह! उस समय तुम्हारी रजामंदी नहीं मालूम थी न!'
'अब फिर कब मिलेंगे ?'
'जब तुम कहो!'
फिर कॉलेज की पुरानी बातें शुरू हुईं तो घंटा निकल गया, पता ही नहीं चला।
प्रीति इस अवसर का लाभ उठाना चाहती थी। खन्ना साहब के बेटे से छुटकारा पाने का यही सही मौका था। दोनों के मिलने जुलने का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ ही दिनों में, दोनों एक दूसरे को बहुत चाहने लगे। अब सुमित के वापस अमेरिका जाने का समय आ गया। उसने प्रीति से शादी का प्रस्ताव रख दिया। प्रीति के मन में तो पहले से हाँ थी, पर वह अपने माँ बाप को कैसे मनाये। पापा तो पहले ही कहीं और बात चला रहे थे। और साथ ही मन में डर भी था कि कहीं सुमित अमेरिका जाकर, उसे भूल न जाये। जब सुमित ने अमेरिका जाने के बाद भी उससे बात चीत चालू रखा तो प्रीति को उसके प्यार पर भरोसा हो गया। एक दिन वह अपनी माँ से सुमित से विवाह करने की बात कह दी। माँ को इसका कोई एतराज नहीं था, पर पापा को खन्ना साहब से बात पलटने की चिंता अभी तक सता रही थी।

अब सुमित और प्रीति का एक दूसरे के बिना, रहना मुश्किल था। एक दिन सुमित का फोन आया तो प्रीति ने उसे बता दिया, 'तुम्हे पता है, पापा मुझे दलदल में धकेलना चाह रहे हैं। अब तुम्हे ही कोई रास्ता निकालना है। देर हो जाय, इससे पहले कोई उपाय ढूंढो।'
सुमित तो प्रीति को चाहता ही था और उसकी मम्मी पहले ही पसंद कर चुकी थीं, उसने सलाह दी कि अगले महीने वह फिर इंडिया आ जायेगा, 'चलो कोर्ट मैरिज कर लेते हैं और साथ ही अमेरिका चली आना। मेरा ग्रीन कार्ड तो है ही, मैरिज रजिस्टर होने के बाद तुम्हे वीसा मिल जायेगा।'
सुमित आया और दोनों ने कोर्ट मैरिज करके रजिस्टर करवा लिया। सुमित की मम्मी को यह तरीका पसंद नहीं आया, वह अपने बेटे का बड़ी धूम धाम से विवाह करना चाहती थी। सुमित ने माँ को समझाया कि कोर्ट मैरिज औपचारिकता मात्र है, खन्ना साहब से बात करके फंक्शन कर लेना। सुमित की माँ ने इस बारे में जब खन्ना साहब बात किया तो वे हतप्रभ रह गए। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी सकता है। लेकिन अब खन्ना साहब के पास और कोई विकल्प नहीं था। शादी तो हो ही चुकी थी, एक भव्य समारोह का आयोजन हुआ। रिश्तेदार, मित्र सब एकत्र हुए। सगे सम्बन्धियों से आशीर्वाद लेकर प्रीति सुमित के साथ उड़ गयी।





Kinara



कलकत्ता की एक कंपनी गंगा सागर, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम के दर्शन कराने के लिए जहाज ले जा रही है।

तीर्थयात्रियों का जत्था जात  है।  गंगासागर होइके  जगन्नाथ पुरी  जाई ।
बिमला, सुदर्शन से बोली; अउर गांव क  बहुत लोग जात हैं।  अब समय आ गईल, थोड़ा तीर्थ  व्रत कई लें।  बार बार एइसन मौका नाहीं लागी।  सुखराम की माँ कहत रही बहुते लोग जात हैं।  उहो पति पत्नी जात हैं।
सुदर्शन सब ध्यान से सुन रहा था।
यह भी पता किया है कैसे जा रहे हैं और खर्च कितना है।
खर्च क त पता नाही पर पटना से कंपनी का जहाज जाये वाली है।  सारा तीरथ करायके एक महीना में लौट आई।   आजकल तो खेती क भी एइसन कौनो खास काम नहीं बा।  जब तलक खेत बोवे क समय आई लौट आवल जाई।
गंगा जल भर ले

खाने पीने का सामान समाप्त होने को आ गया

दूर  उम्मीद की किरण दिखाई दी। इंडोनेशिया

तलब में गंगा जल डाल डेट हैं
गंगा मईया यहां सहारा दिहन 

Ganga talab

गंगा तलाव

'साहब पहली बार मौरिसस आया है ?' टैक्सी ड्राइवर ने पूछा।
'हाँ, और समझो की आखिरी बार भी।'
'क्यों साहब ? हमसे नाराज हो गया क्या ?'
'नहीं भाई।  तुम्हे पता है न इंडिया कितनी दूर है ! इतनी दूर से बार बार आना कहाँ संभव है।'
'हाँ, सो तो है।' ड्राइवर बोला।
'तुम्हारा नाम क्या है?'
'सुदामा'
' वाह! बिलकुल इंडियन नाम है।' आहूजा जी बोले।
'हाँ साहब। हमारे पूर्वज कभी इंडिया से ही आये थे। गंगा तलाव बहुत सुन्दर जगह है, साहब।  शिव जी की बहुत बड़ी मूर्ति है।  हिन्दू देवी देवताओं के और भी मंदिर हैं।  वहां से जाने का आपका दिल नहीं करेगा। हमारे पूर्वजों को यहां सैकड़ों साल पहले आये थे, साब! अब तो हमको कई पुश्त हो गया।'
'इंडिया में कहाँ से आये हो तुम लोग? ' आहूजा जी ने पूछा।
'बाबा कहते हैं, हम लोग बिहार से आया है।  हमारे पूर्वज काम की तलाश में यहाँ आये। कलकत्ता से जहाज पकड़ा और यहाँ आ गए।   अब तो कई पुश्तों से हम लोग यहाँ हैं।  बाबा कहते हैं जब उनके दादा आये थे तो यहाँ रेगिस्तान जैसा था लेकिन उन लोगो ने मेहनत करके इस जगह को इतना सुन्दर बना दिया है। पहले कोई यहाँ आना भी नहीं चाहता था, अब देखिये लाखों लोग यह स्थान देखने आता है। सौ साल से भी ऊपर हो गया उन्हें आये । हम लोग तो अपने को इंडियन ही समझते हैं।  यूँ समझिये की इंडिया का एक टुकड़ा काटकर समुद्र के बीच यहाँ रख दिया है।'
'लेकिन वे इण्डिया छोड़ इतनी दूर क्यों आ गए होंगे?' आहूजा साहब ने फिर सवाल किया। 
'बाबा कहते हैं कि उस समय यहाँ काम मिलना आसान था। बाबा के बाबा कलकत्ता में कपड़े के कारखाने में काम करते थे।  वे बहुत अच्छे कारीगर थे। पर वहां तनखाह बहुत कम मिलती थी। उन्हें इंडिया से बहुत ज्यादा वेतन का लालच मिला और वे यहाँ आ गए। रहते रहते बूढ़े हो गए और बच्चों को यहीं रोजगार मिल गया तो यहीं के होकर रह गए।  उस समय तो लोग लालच में या मजबूरी में ही यहाँ आते थे और आज देखिये कि कोई आना भी चाहे तो सरकार अनुमति नहीं देगी।'
'हाँ, सही कह रहे हो। यह जगह है बहुत सुन्दर।' 
'हाँ साहब यहाँ कुछ समय रहें तो पूरा मौरिसश को ठीक से देख, समझ पाएंगे। यहाँ को लोग इंडिया को बहुत पसंद करते हैं। इंडिया से कोई बड़ा आदमी आता है तो लोग बहुत खुश होते हैं। लोग हिंदी फिल्मे  और हिंदी गाने बहुत पसंद करते हैं। हिन्दुओं के अनेकों मंदिर हैं।'
'तुम इंडिया गए हो?'
'अभी नहीं, पर जाने का बहुत मन करता है।  असली गंगा के दर्शन करने को जी करता है।  गंगा जल लाकर गंगा तलाव में डालने से बहुत पुण्य मिलता है, साहब ! वहां जायेगा तो पूर्वजों की जन्म भूमि के भी दर्शन करेगा।'

'अरे मुझे तो पता नहीं था, वरना मैं भी गंगा जल ले आता।'
बातें करते गंगा तलाव पहुँच गए सुन्दर, हरा भरा, मनमोहक रास्ता। पहुँच कर १०८ फीट ऊँची शिव जी की मूर्ति देख आहूजा जी दंग रह गए। कई छोटे बड़े देवी देवताओं के मंदिर, अनवरत गूंजता 'ओम नमः शिवाय' का मंत्र। ऐसा लग रहा था मानो किसी दिव्या दुनिया में आ गए हों।  यह स्थान भी एक ज्योतिर्लिंग है, जब आहूजा साहब को पता लगा तो उनका आश्चर्य और बढ़ गया। उन्हें अभी तक भारत के १२ ज्योतिर्लिंगों के बारे में ही पता था। सुदामा ने फिर बताया, तलाव में स्नान और यहाँ की आरती दिव्य अनुभूति कराती है। आहूजा जी शिव जी का दर्शन कर और गंगा तलाव का अवलोकन कर गदगद थे।

'सुदामा तुमने मेरा मन प्रसन्न कर दिया। इस समय तो मेरे पास कुछ नहीं है जो तुम्हें भेंट करूँ, मगर अपना पता दे दो मैं भारत जाकर तुम्हारे लिए कोई सौगात भेजूंगा।'
'ठीक है साहब, ये लीजिये। फोन नंबर तो मैंने दे ही दिया है।'
लगभग एक महीने बाद, इंडिया से भेजा हुआ, सुदामा को एक कूरियर आया। उसे समझते देर नहीं लगी, यह आहूजा साहब ने ही भेजा होगा। उसने तुरंत ही पैकेट खोला। उसमे एक छोटी बोतल मिली जिस पर लिखा था 'गंगा जल'। 
  


Need ki khoj

नीड़ की खोज


मरता क्या न करता। बेरोजगारी इतनी अधिक है कि रोजगार का एक अवसर मिले तो सौ लोग काम के लिए आ जाते हैं।  जहाँ किसी चीज की मांग अधिक हो तो ठग और नक्काल  भी अपने आप ही पनप जाते हैं। १९ वीं शदी की बात है।  देश अंग्रेजों के हाथों त्राषदी झेल रहा था।  बात बात पर लोगों को यातनाएं दी जा रहीं थीं । बरसात के सहारे ही खेती होती थी। यदि वर्षा कम तो, भूखमरी का सामना करना पड़ता। पढ़ाई लिखाई तो आम आदमी के लिए दूर की कौड़ी होती। बस आठ दस तक कोई पढ़ ले तो बड़ी बात होती थी। सुदर्शन आठ तक की पढ़ाई पूरी कर चुका।  अब घर पर ही इधर उधर समय व्यतीत करता।  जब मन होता तो अपने गोरू, बछरू का सानी-पानी कर देता, नहीं तो वो भी नहीं। उसके पिता जी कभी डाँटते तो माँ बीच में आ जाती, और उन्हें चुप करा देती।  एक दिन सुदर्शन बाजार गया था, वहां किसी के यहाँ अखबार में पढ़ा कि कलकत्ता में जूट मिल में भरती हो रही है। उसने सोचा क्यों न चल के किस्मत आजमाई जाय। 
घर पर आकर उसने माँ से बताया।  माँ तो राजी नहीं हो रही थी, वह नहीं चाहती थी सुदर्शन उससे दूर जाय, पर उसके पिता ने कहा, 'अच्छा तो है दो पैसे कमाएगा, घर पर क्या करेगा।  कलकत्ता में इधर के बहुत लोग हैं, जो जूट मिल में काम करते हैं।'
'पर यह रहेगा कहाँ? खायेगा पियेगा कैसे ?' मन्दाकिनी बोली।
'अरे सभी लोग रहते ही हैं। कोठरी ले लेगा। ठहर, रानीपुर का श्यामलाल भी कलकत्ता ही रहता है। मैं कल ही जाकर पता करता हूँ, रहने की कोई व्यवस्था करवा देगा।'
तैयारी शुरू हो गयी, एक दिन सत्तू पिसान लेकर, सुदर्शन धनबाद से कलकत्ता के लिए रवाना हो गया। वह श्यामलाल के यहाँ जाने की बजाय सीधे अख़बार में दिए पते पर पहुंचा। वहां एक कमरे में एक व्यक्ति बैठा था, जो आने वालों का इंटरव्यू ले रहा था। वह कंपनी का एजेंट था, जिसे कर्मचारियों की नियुक्ति करनी थी। इंटरव्यू बस औपचारिकता मात्र था, उसे तो यह देखना था की उम्मीदवार स्वस्थ है या नहीं। आखिर मजदूरी ही तो करनी थी। सुदर्शन के जाते ही उसका नाम, पता पूछ कर रजिस्टर में नोट किया और एक पर्ची पकड़ा दिया। 'ठीक है, इनके साथ जाओ और सराय में आराम करो, दो दिन बाद तुम्हें रंगून जाना होगा। वहीँ पर मिल में काम करना है' एक आदमी की ओर इशारा करते हुए वह बोला ।
सुदर्शन सराय में गया, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। कहाँ तो कलकत्ता नौकरी के लिए लिखा था और ये लोग रंगून भेज रहे हैं। उसे वहां अपने क्षेत्र के कुछ और लोग मिले तो, उनसे बात करके थोड़ी हिम्मत आई। एक आदमी ने समझाया, अरे भाई, जब नौकरी करनी है तो क्या कलकत्ता, और क्या रंगून ! अखबार में कलकत्ता में भर्ती के लिये लिखा था, नौकरी कहाँ करनी है ये थोड़े ही लिखा था। सुदर्शन बीच में समय निकाल कर, श्यामलाल के पास पहुंचा। श्यामलाल से जब अपनी नौकरी की बात किया तो उसने भी वही कहा, 'कलकत्ता से तो रंगून अच्छा रहेगा, वहां ज्यादा मजदूरी मिलेगी।' 
फिर तो सुदर्शन ने भी कमर कस ली। अब जो होगा देखा जायेगा, वापस घर तो नहीं जायेगा। दो दिन बाद सब जहाज में सवार हुए, और जहाज बंगाल की खाड़ी में आगे बढ़ा। किस्मत ने एक बार और खेल खेला।  यह किसी को नहीं पता था कि एजेंट उनसे धोखा कर रहा है। जहाज, पूरे महीने भर समुद्र में चलता रहा। उन्हें खाने पीने की चीजें बड़ी सिमित मात्रा में मिलती। लेकिन वहां न तो ये कुछ कह सकते थे, न ही कोई सुनने वाला था। यदि कोई सवाल जबाब करता तो मार खाता। एक महीने बाद पता चला कि जहाज रंगून की जगह मौरीसस पहुंच गया।  ये क्या हुआ, लोगों में हाहाकार मच गया। यह तो सरासर धोखा है, रंगून कहा और मारीशश ले आये। अब हो भी क्या सकता था। इतने लोग थे, सभी एक दूसरे को ढांढस बंधाने लगे। ओखली में सिर दे दिया तो मूसल से क्या डर। अब जो होगा, देखा जायेगा। उन्हें ले जाकर, एक चीनी मिल में काम पर लगा दिया गया। खैर वहां उनके लिए रहने वगैरह की व्यवस्था ठीक ठाक थी, वे अपने काम पर लग गए।
इधर सुदर्शन की माँ उसकी खोज खबर न मिलने पर बड़ी चिंतित होने लगी थी।  जाने कहां होगा, कैसे होगा, मेरा लाल ! कैसे खाता पीता होगा।  उधर का कोई भी कलकत्ता से आता तो सुदर्शन के बारे में पूछती, पर कोई क्या बताता। उसे गए एक वर्ष हो चुके थे, अभी तक कोई खोज खबर नहीं। एक दिन सुदर्शन के पिता से बोली 'आप क्यों नहीं कलकत्ता चले जाते, और सुदर्शन के बारे में पता करते। '
'कलकत्ता क्या छोटी जगह है ? कहाँ ढूंढूंगा?' उसके पिता बोले।
पत्नी के रोने गाने और कई बार आग्रह करने पर वे जाने को तैयार हुये। अभी जाने की तैयारी चल ही रही थी कि पता चला श्यामलाल कलकत्ता से छुट्टी आया हुआ है। सुदर्शन के पिता बिना देर किये श्यामलाल के गांव गए। वहां जाकर पता चला कि सुदर्शन तो रंगून चला गया। अब तो उसकी माँ का रो रोकर बुरा हाल। कहां तो कलकत्ता जाने पर ही वह इतनी दुखी थी, पता चला कि उससे भी दूनी दूरी पर चला गया। अब कब तक लौट के आएगा? उसके बारे में किससे पता करें ? सोच सोच कर पागल हुई जा रही थी।   
कुछ दिन और बीते कि सुदर्शन का भेजा पोस्ट कार्ड आ गया। उसमें उसने अपने मौरीसस पहुंचने की बात लिखी थी और साथ यह भी लिखा था कोई जाने वाला मिलेगा तो पैसे भी  भेजेगा। अब उसके माता पिता की जान में जान आई, चलो वह जीवित तो है न! कभी न कभी आ भी जायेगा। और साथ सी सोच कर हैरान, परेशान थे कहाँ कलकत्ता, रंगून और कहां मारीशश पहुंच गया।
उधर मौरीसस में भी अंग्रेजों का शासन था। जो एक बार वहां गया तो गया, लोगों की कमी थी, इसलिए छुट्टी मिलना आसान नहीं था और वहां आना जाना तो बहुत बड़ा पहाड़। महीनोंं में कभी कोई जहाज आता जाता। धीरे धीरे सुदर्शन को वहां रहते कई वर्ष बीत गए, वह सुन्दर, स्वस्थ जवान तो था ही, एक लड़की उस पर मर मिटी।
सुदर्शन, जिस रेस्तरां में भोजन करने जाता, उसके मालिक की बेटी का नाम मलिका था। एक बार उसने खाने में गड़बड़ी की शिकायत करने गया तो उस समय ठीहे पर मलिका ही बैठी थी। मलिका ठन्डे  दिमाग की और समझदार थी, उसने सुदर्शन की बात ध्यान से सुनी और उसे समझा बुझा कर शांत किया। उसके बाद जब कभी सुदर्शन रेस्तरां में भोजन करने आता और मलिका वहां होती तो उसके पास जाकर उससे  ने उससे  खाने पीने के बारे में पूछती। धीरे धीरे दोनों का इस तरह से मिलना प्यार  में बदल गया। और एक दिन दोनों एक दूसरे के हो गए।
सुदर्शन के मलिका से शादी के बाद बाल बच्चे हो गए और उसने वहां अपनी पूरी घर गृहस्थी बसा लिया। इधर उसके माँ बाप उसका मुंह ताकते रहे। बीच बीच में एकाध बार चिठ्ठी और कुछ पैसे तो जरूर भेजा किन्तु वह मारीशश से भारत नहीं आ पाया। धीरे धीरे पंद्रह वर्ष बीत गए, इस बीच उसके पिता का स्वर्गवास हो गया। उसकी कंपनी के नियम में कुछ बदलाव आये और उसे छुट्टी पर भारत आने का अवसर मिला। फिर वही पानी के जहाज से आना था और यात्रा में एक महीने का समय लगना था। जब तक वह भारत पहुंचा, पता चला कि एक महीने पहले ही उसकी माता का भी देहांत हो चुका है। अब वह गांव में रह  कर क्या करता, उसके बाल बच्चे तो मौरीसस में ही थे। एकाध दिन अपने चाचा के यहाँ रहकर, वापस हमेशा हमेशा के लिए मारीशश चला गया।



Kharbooje ko dekh rang

खरबूजे को देख रंग


पटेल जी के पड़ोसी कुंदन लाल का साला अमेरिका  में रहता था। जब भी कुंदन लाल, उनके साथ उठता बैठता, वह अमेरिका की ही बातें करता। कुंदन लाल द्वारा अमेरिका की तारीफ सुन सुन कर, पटेल जी के कान पक जाते। वहां की सुन्दर व्यवस्था, वहां की साफ सफाई, वहां इतनी आमदनी है कि एक महीने के अंदर कार खरीद लो, आदि, आदि। दो तीन साल की कमाई में तो यहाँ बड़ा सा घर भी खरीद लो। लोग बड़े बंगलों में रहते हैं। जबसे वीरेंदर अमेरिका गया है, वहां पर कितना कुछ बना लिया है और यहाँ भी घर कितना सुधार दिया। उसके पास महँगी वाली कार है, घर में स्विमिंग पूल; इत्यादि। यह सब सुनकर, पटेल जी को तो ऊबन होती पर बेटे अंकित के मन में और जानने की जिज्ञासा उठती। धीरे धीरे उसके मन में भी अमेरिका जाने का सपना घर कर लिया । परन्तु, अमेरिका जाने का उसे रास्ता कौन बताये।
एक दिन उसे पता लगा कि पडोसी के यहाँ वीरेंदर आया हुआ है, अंकित की जिज्ञासा उसके पास खींच ले गयी।
'अरे, वीरेंदर ! कब आये?'
'बस आज ही '
'और अमेरिका से कब आये? '
'तीन चार दिन हो गए। सोचा, थोड़ा फुआ, फूफा से मिल आऊँ, चला आया।'
'और, कब तक रहना है?'
'`एक महीने के लिए आया हूँ '
फिर अंकित अमेरिका के बारे में एक एक करके सवाल दागता रहा, वीरेंदर उत्तर देता रहा। कई बातें तो अंकित को सपने सी लगीं। वीरेंदर ने बताया कि वहां लोगों की बड़ी अच्छी आय है, सुविधा की सब वस्तुएं बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाती हैं, ऐश की जिंदगी है। सबके पास, सभी आधुनिक वस्तुएं हैं। लोगों का अनुशासित जीवन है, कोई किसी को तंग नहीं करता। सभी अपने अपने तरीके से रहते हैं। साफ सफाई के पूछने क्या, एक तिनका भी सड़क पर फैला हुआ नहीं मिलेगा। वहां जीवन और प्रकृति का सामंजस्य भी सुन्दर है, आदि आदि।
यह सब सुनकर, अंकित के मन में और जिज्ञासा बढ़ना स्वभाविक था। उसने पहले भी सुन रखा था कि अमेरिका में बड़ी सरलता से  नौकरी मिल जाती है, वहां ठाट की जिंदगी होती है, यह सब बातें उसे गुदगुदाती रहतीं। वह हमेशा सोचता था कि अमेरिका चला जाए और ठाट से रहे। खूब रूपया पैसा कमा लेगा तो यहाँ भी अपने घर की दशा बदल देगा। उसने वीरेंदर से बोला,'यार, मुझे भी ले चलो।'
'मगर वहां सीधे जा पाना तो लगभग असंभव सा है। यदि कोई कंपनी अमेरिका में नौकरी दे, और वहां से वीसा भेजे तो ही जा पाओगे।'
'हूँ .. मुझे ऐसे कौन सी अमेरिकन कंपनी नौकरी देगी ! तुम कैसे गए थे?'
'मैं तो बी. टेक. करके एम. एस. करने वहां गया और एम. एस. के बाद, वहीं जॉब मिल गयी।'
'तो मेरा भी बी. टेक. का अंतिम वर्ष है, वहां एम. एस. में ही दाखिला दिला दो।'
'पर वहां से एम. एस. करने का खर्च बहुत अधिक है। तुम लोग कैसे कर पाओगे।'
'वो मैं पापा से बात करता हूँ। लेकिन सुना है, उच्च शिक्षा के लिये जाने वाले वहां कोई अल्पकालिक जॉब ढूंढ लेते हैं और अपनी पढ़ाई के खर्च का कुछ हिस्सा निकाल लेते हैं। बस प्रारंभिक खर्च की ही कठिनाई है।'
'हाँ वो तो है, वहां का खर्च लगभग पंद्रह लाख प्रति वर्ष है। फिर उसके अतिरिक्त पहले जी. आर. ई. और टॉफेल पास करना पड़ेगा। बाकी देख लो, मुझसे जो मदद होगी बता देना।'
बस अंकित को तिनके का सहारा मिल गया। उसने वीरेंदर का फ़ोन न. ले लिया और घर आते ही अपने मम्मी पापा से बी. टेक. के बाद एम्. एस. की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने की बात छेड़ दिया। पटेल जी ने यह कहकर बात टाल दिया पहले बी. टेक. तो कर लो। बी. टेक. अब क्या देर थी, एक महीने बाद ही अंतिम सत्र की परीक्षा होनी थी, अंकित अंकित इधर उधर से और जानकारी एकत्र करने लगा और टॉफेल (टेस्ट ऑफ़ फॉरेन इंग्लिश लैंग्वेज) की परीक्षा का फॉर्म भी भर दिया। उसकी अंग्रेजी ठीक ठाक थी, टॉफेल की परीक्षा सरलता से पास कर लिया।
मगर अब समस्या यह थी कि वह आगे किस कोर्स में और किस संस्थान में प्रवेश ले, उसकी लागत क्या आएगी; इन बातों की जानकारी नहीं थी। इसके लिए किसी की मदद लेनी थी जो इन सबके बारे में बताये। उसे वीरेंदर से ही एक एजेंट का नाम पता चल गया था। जब अंकित एजेंट के पास गया उसे यह पता चला कि इसके लिए उसे जी. आर. ई. (ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जामिनेशन) की परीक्षा और पास करनी पड़ेगी तथा एम. एस. करने का दो वर्ष खर्च लगभग ३० लाख होगा। तीस लाख सुनकर उसे लगने लगा कि इतने रुपयों की बात सुनेंगे तो  मम्मी पापा बिलकुल भी नहीं मानेंगे।

दो महीने बीत चुके थे। अंकित जी. आर. ई. की परीक्षा में बैठ गया और पास कर लिया तब तक उसका बी. टेक. का परिणाम भी आ गया। अब उसने पापा से अमेरिका की बात फिर से छेड़ दिया।
'पापा! मेरा बी. टेक. पूरा हो गया, इसके अलावा टॉफेल और जी. आर. इ. भी पास कर लिया। अब अमेरिका जाने  के लिए फाइनेंस  प्रबंध करना है।'
'बहुत ख़ुशी की बात है बेटा,  जी. आर. इ. कर लिया तो इंडिया में भी कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी, अमेरिका जाने की क्या जरूरत है।'
'नहीं पापा मुझे एम. एस. करना है।'
'तो यहीं से एम. टेक. कर लो। यहाँ भी अच्छे इंस्टिट्यूट हैं।'
'नहीं पापा, फिर यहीं नौकरी करनी पड़ेगी। अमेरिका जितना पैकेज कहां मिलेगा।'
'तो खर्च भी सोचा है !'   
'यही, लगभग ३० लाख, मैंने एजेंट से पूछा था।'
तीस लाख सुनकर तो माँ का तो माथा ठनक गया, ' तीस लाख! इतनी बड़ी रकम तो घर बेचकर भी पूरी नहीं होगी।'
'तो बैंक से लोन ले लेते हैं। कर्ज भी पूरा नहीं उठाएंगे, शुरू के थोड़े से पैसे लेंगे, फिर मैं वहां कोई पार्ट टाइम कर लूँगा।'
पटेल जी बोले, 'बैंक से लोन लेना भी कौन सा आसान काम है।'
पटेल जी इस बात से मन में तो प्रसन्न होते हैं कि पडोसी को पटखनी देने का अच्छा अवसर है, वह अमेरिका की बड़ी बड़ी बातें करता है। बेटा जब अमेरिका चला जायेगा तो अपना भी एक रुतबा होगा पर इतनी राशि का प्रबंध करना भी एक कठिन कार्य है। फिर भी वे अंकित को इस काम में सफल बनाना चाहते थे। वे लोन के बारे बैंकों से बात करने लगे।  बैंकों की शर्तें सुनकर, और जमानत के लिए सारी संपत्ति गिरवी रखने की बात सुनकर पस्त हो जाते। सभी पहलुओं पर विचार करके वो अंकित से बोले, 'अमेरिका जाने का सपना छोड़ो, मैं इतने पैसों का प्रबंध नहीं कर पाउँगा।'
'आप चिंता मत करिये, मेरे एक दोस्त के पापा बैंक में मैनेजर हैं, मैं उनसे बात करता हूँ। और आपका दस लाख भी लगने दूंगा, वहां जाकर कुछ न कुछ कर ही लूंगा। बस दो वर्ष की समस्या है उसके बाद तो पैसे ही पैसे होंगे। आपको कभी पैसे के बारे में नहीं सोचना पड़ेगा। बस आप बैंक के लिए जमानत की व्यवस्था कर दीजिये।'  
'लेकिन सुना है, अमेरिका वाले वीसा देने में बहुत नखरे दिखाते हैं।'
'वो तो मैं एजेंट के माध्यम से करवाऊंगा। कागज वगैरह की औपचारिकता वही करवाएगा। पहले भी कई लोगों को भिजवा चूका है। पैसे की चिंता तो बिल्कुल मत करिये, वहां जाकर असिस्टेंटशिप कर लूँगा और बाकी का खर्च निकाल लूँगा।'
पटेल जी अपने बैंक खंगालने लगे तो पता चला उनके पास मात्र पांच लाख की एक एफ. डी. है और उसके अतिरिक्त कुल मिलकर एक लाख तक और हो सकते हैं। इन पैसों को वे बेटी स्नेहा के विवाह में खर्च करने के लिए सुरक्षित रखे थे। एक बार फिर से उन्होंने अंकित को यही कहा, 'चलो छोडो, यहीं कहीं नौकरी ढूंढ लो, देख रहे हो न, इतनी महंगाई में कैसे गुजारा कर रहे हैं। अभी तुम्हारी बहन की शादी के लिए भी पैसे चाहिए होंगे। अगर पढ़ना ही है तो यहीं मास्टर्स में दाखिला ले लो, यहाँ भी क्या कमी है।  पढने वाले लड़कों के लिए कहीं भी कोई परेशानी नहीं है।'

अंकित मायूस हो गया। मुंह बनाकर अपने कमरे में चला गया। अब तो वह इंडिया में ही कहीं जॉब ढूंढने की सोचने लगा। एक दिन अचानक एजेंट का फ़ोन आ गया, और अंकित से उसके कार्क्रम के बारे में पूछने लगा। अंकित ने सब सही सही बता दिया। एजेंट ने उसे अपने यहाँ बुलाया और समझाया बैंक से लोन केवल मंजूर कराना होगा और विश्वविद्यालय को किस्तों में देना होगा। जो बच्चे पहले गए हैं बस पहली किस्त देकर बाकी पैसे नहीं लिये, वहीं पर कुछ छोटा मोटा काम कर लिया या जूनियर कक्षा के छात्रों को पढ़ाकर अपना खर्च निकाल लिए। शुरू में तो इंस्टिट्यूट को लोन की स्वीकृति पत्र और कोई पांच लाख भेजने पड़ेंगे। तुमने जी. आर. ई. और टॉफेल कर लिया है। यह कोई आसान काम नहीं है। इस अवसर को हाथ जाने मत दो। जी. आर. ई. करके भी अमेरिका न जा पाओ तो तुम्हारी बदकिस्मती ही होगी।

इस बात से उत्साहित होकर, अंकित एक बार फिर अपने अमेरिका जाने के प्रोजेक्ट पर जुट गया। एक बैंक में उसके दोस्त के पिता काम करते थे उनके पास जाकर और जानकारी लिया। फिर घर आकर पापा को समझाया कि वे एफ. डी. बैंक के के पास गिरवी रखकर लोन मंजूर करवा लें और बस पांच लाख का ही प्रबंध करा दें।  बाकी कोई आवश्यकता पड़ी तो वीरेंदर ने भी मदद करने के लिए बोला था।

पटेल जी ने अंकित को फिर यह कहकर निरुत्साहित किया कि उसका कॉलेज वीरेंदर के यहां से दूर हुआ तो क्या करेगा? वहां तो हॉस्टल में रहना पड़ेगा। अंकित सोच में पड़ गया। वह सुबह ही सुबह बिना बताये घर से निकल गया। इधर उसकी मम्मी नाश्ता बनाकर इंतजार करती रही, पर उसका कहीं अता पता नहीं था। वह जाकर उमेश के यहां भी पूछ आई, उमेश ने भी यही बताया कि आज अंकित उसे नहीं मिला। दोपहर हो गयी पर अंकित अभी तक घर नहीं लौटा। अंकित की मम्मी परेशान होकर पटेल जी पर बरस पड़ी, 'जाने तुमने क्या कह दिया, बेटा घर से बाहर चला गया और हो कि हाथ पर हाथ धरे बैठे हो। जाकर कहीं ढूंढते भी नहीं। '

'क्यों घबरा रही हो, कहीं दोस्त मित्रों के यहाँ गया होगा, लौट आएगा।'

इतने में दरवाजे की घंटी बजी, श्रीमती पटेल इस उम्मीद में कि अंकित ही होगा, दरवाजा खोलने दौड़ीं।
'आपका बिजली का बिल।'

बिल लेकर मुड़ी ही थी कि पीछे से आवाज आई, 'माँ बंद नहीं करना।'
बाहर देखी तो अंकित, 'कहां था बेटा? तूने तो जान ही निकाल दी। सुबह से बिना कुछ खाये पिये, घर से गायब है।'
'बस माँ साइबर चला गया था, वीरेंदर से स्काइप पर बात करने।'
'अच्छा !  क्या कह रहा था ?'
'यही कि तू एक बार आ जा, बाकी मैं देख लूंगा। कोई न कोई काम मिल ही जायेगा। कुछ खाने को दे दे, भूख लगी है।'
'चल, खाना तैयार है, तेरा नाश्ता भी अभी वैसे ही पड़ा है।'
अब अंकित के अमेरिका जाने के कार्यक्रम पर काम शुरू हो गया। पटेल जी ने अंकित की पढ़ाई के लिए लोन लेने की जमानत दी और अपनी एफ. डी. गिरवी रख दिया। बैंक के तीस लाख के लोन का स्वीकृति पत्र मिल गया और पांच लाख सीधे यूनिवर्सिटी को भुगतान हो गया। यूनिवर्सिटी ने अंकित के दाखिला की कन्फर्मेशन भेज दिया। एजेंट ने उसका वीसा करवा दिया। आज अंकित के अमेरिका के लिए उड़ने का दिन है। एक ओर तो बेटे के विदेश जाने की ख़ुशी वहीँ दूसरी ओर उसे इतनी दूर भेजने का गम। भांति भांति की आशंकाओं के बीच, अंकित के मम्मी-पापा ने, अमेरिका पढने के लिए, बेटे को नम आँखों से विदा किया। 


      

Sunday, 8 March 2015

badshahat ke din


अपना घर सबसे अच्छा

'बहुत दिनों से कह रहा है, वीसा और टिकट भी लगवा दिया है। अब तो सोच रहा हूँ कनाडा हो ही आऊँ। उसका एक दोस्त आया है वो अगले महीने की १५ तारीख को जा रहा है, उसी के साथ जाना है।' मंगल हाँ, हाँ करता रहा,  कुलदीप अपनी कहता रहा।
'भैया कितने दिन में आ जाओगे? यहाँ तो सूना हो जायेगा।  चलो काम धाम तो सोनू सम्भाल लेगा पर हम लोग गपशप करने कहाँ जायेंगे।' मंगल बोला।
'अब इतनी दूर जा रहे हैं तो एक दो महीने तो रहेंगे ही।  वैसे वीसा ३  महीने का मिला है।'
'अकेले जा रहे हो?'
'नहीं, तुम्हारी भौजाई भी जाएगी। अब १५ तारीख आने में दिन ही कितने रह गए।  बड़ी तैयारी करनी है, वहां पर तो अपनी देशी चीजें मिलती कहाँ हैं।  कुछ मसाले वसाले ले लेंगे बाकी उससे पूछ लेंगे क्या क्या ले जाना है।'
'भैया सुना है, वहां खाने पीने की चीज नहीं ले जाने देते।'
'हाँ, सो तो है बस वही चीजें ले जायेंगे जो सीलबंद आती  हैं। वजन का भी लफड़ा है, ज्यादा वजन तो ले नहीं जा सकते।'
'सीधी उड़ान है ?'
'नहीं, ट्रैन से दिल्ली जायेंगे।  वहां से उड़ान लेंगे।  बीच में जहाज, एम्सटरडर्म रुकेगा, बड़ा लम्बा समय है।
मुझे तो पहली बार जहाज में बैठना है।  कैसे सब होगा, समझ नहीं आ रहा है।'
'अरे चिंता क्या, पप्पू का दोस्त तो साथ है न, संभाल लेगा। '
तैयारियां शुरू हो गयी। ये लाओ, वो लाओ।  बड़ा पैकेट, छोटा पैकेट। इसे रख लो, इसे छोड़ दो।  करते करते
यात्रा का दिन आ गया।  दिल्ली हवाई अड्डे पहुँच गए।  पप्पू का दोस्त रमेश पहले ही वहां प्रतीक्षा कर रहा था।  चेक-इन करा के बोर्डिंग पास ले लिया। एयरलाइन्स से कहके एक सीट, खिड़की वाली ले ली थी। इमीग्रेशन का फॉर्म भरा, सुरक्षा जाँच हुई और हवाई जहाज में बैठने चल दिये।  कुलदीप हक्का बक्का सा था। चमकता हुआ साफ सुथरा हवाई अड्डा, चलने के लिए स्वचालित पट्टी यह सब वह पहली बार देखा।  पट्टी अपने आप ही चलती रहती है। उस पर खड़े हो जाओ और गंतव्य बे तक पहुँच जाओ। प्रस्थान के लिए प्रतीक्षा करने हेतु बाड़ा बना हुआ था। वहां बैठने के लिए सुन्दर सोफे लगे थे। वे लोग वहां बैठे। बाड़े की सभी दीवारें शीशे की थीं। कुलदीप बड़े कौतुहल से हवाई अड्डे से उड़ते और वहां उतरते विमान देख रहा था। यह देख कर उसे बड़ा आश्चर्य होता कि पांच मिनट भी नहीं होते दूसरा विमान उड़ने को तैयार।

कुछ समय बाद कुलदीप को लघु शंका के लिये जाना पड़ा। हाथ धोने के लिए बेसिन के पास पहुंचा तो टोंटी में पानी चलाने के लिए कोई घुंडी या नोब ही नहीं थी। वह नल के चारों ओर देखने लगा कि नल को कहाँ से खोले। फिर नल को हाथ से ठोंकने लगा तो हाथ नल के निचे आते ही पानी चल पड़ा। कुलदीप चौंका कि कहीं कुछ टूट तो नहीं गया, पर थोड़ी ही देर में नल बंद भी हो गया। कुलदीप ने राहत की सांस ली और वापस आ गया। कुछ देर बैठने के बाद घोषणा की जाती है, 'एम्स्टर्डम जाने वाले यात्री विमान की ओर प्रस्थान करें।'
विमान को एम्स्टरडर्म होकर जाना था। एम्स्टरडर्म जाने के बाद, टोरेंटो के लिए जहाज बदलना था।   

वे विमान की ओर बढे, हवाई जहाज के गेट पर विमान परिचारिका ने नमस्कार किया और उनकी सीट कहाँ है , बता दिया। वे जाकर अपनी सीट पर बैठ गये। कुलदीप ने खिड़की वाली सीट ली। विमान उड़ान भरने के लिए दौड़ा तो उसकी गति देख वह हतप्रभ रह गया और थोड़ी ही देर में विमान ने जमीन छोड़ दिया।  लग रहा था कि कान सुन्न हो रहें हैं, कुछ क्षण तो कुछ सुनायी नहीं दे रहा था। कुलदीप ने  रमेश को बताया तो उसने घंटी बजाकर रुई मंगवा ली और बता दिया कि किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर वह घंटी बजा देगा और परिचारिका से मांग लेगा।  थोड़ी देर बाद आजमाने के लिए कुलदीप ने घंटी बजा दी परिचारिका आई। वह बोला-
'पानी मिलेगा'
'येस, जस्ट लाई', वह बोली और पानी की छोटी सी बोतल लाकर पकड़ा दी।
बस इतना सा पानी, मुश्किल से १०० मिली, वह तो बड़ा गिलास पीता था जिसमे आधा लीटर तो होता ही है।  पूरी बोतल वह एक ही घूँट में पी गया और दूसरी बोतल के लिए तुरंत घंटी बजा दी।  पप्पू की मम्मी ने कुहनी मारी ज्यादा पानी मत पियो, छोटी बोतल जान बूझ के रखी होगी, 'आसमान में टॉयलेट कहाँ जाओगे ?'
आरम्भ में तो ऊपर से नदी, सड़क, भवन आदि सभी नजर आ रहे थे, वह बार बार झांक कर देखता और पप्पू की मम्मी को भी दिखाता रहता।  कुछ देर में ही विमान अच्छी खासी ऊंचाई पकड़ लिया। नदी, भवन, पेड़ सब बादलों के नीचे हो गए। कुलदीप यह अद्भुत दृश्य देखकर अचंभित हो गया।  पूरी जिंदगी बादलों को अपने से ऊपर ही देखा था, आज वह बादलों से ऊपर है। ऊपर से लग रहा था आसमान और बादल नीचे चले गए हैं।  बादल को नीचे देख अत्यंत रमणीय दृश्य लग रहा था। उसकी ऑंखें चौड़ी हुई पड़ी थीं, मानो लाखों टन रुई के फाहे आसमान में फैला दिए गए हों। कुलदीप बहुत रोमांचित था।
तभी एक सुन्दर सी परिचारिका ट्राली लिए आई। 'ड्रिंक सर! जूस लेंगे या स्कॉच ?'
कुलदीप ने जूस मांग लिया।
'और स्नैक्स '
'ब्रेड, कटलेट या ऑमलेट '
रमेश ने बोल दिया, 'ब्रेड और कटलेट।'
विमान टोरंटो पहुंचा, इमीग्रेशन के बाद कन्वेयर बेल्ट से सामान लिये और बाहर निकल गये। हवाई अड्डे पर पप्पू बी.एम.डब्लू. गाड़ी लिए पहले से खड़ा था। अपनी गाड़ी में बिठाया और रमेश को उसके घर छोड़ता हुआ मम्मी पापा को घर ले गया। कुलदीप और उसकी पत्नी दो महीने अमेरिका में रहे। वहां का वातावरण और सुख सुविधा देख कर उसे लगता कि क्या उत्तम जिंदगी है। साफ़ सुथरी जगह, कहीं कोई गन्दगी नहीं, सभी काम व्यवस्थित ढंग से, कहीं कोई धक्का मुक्की नहीं, हरे भरे पार्क, पप्पू का आलीशान मकान, खूब मोटा गद्देदार सोफा बाकी सब जरूरत की चीजें थीं।
कुलदीप को कुछ दिन तो अच्छा लगा, फिर उसे वतन की याद सताने लगी। जिसका बचपन और जवानी इंडिया में बीती हो, उसे विदेश घूमने में तो अच्छा लगेगा, रहना नहीं। क्योंकि इतना अधिक अनुशासन और अपने आप में रहना, वश की बात कहाँ है। सारा काम अपने आप ही करना है। काम करने वाले इतने महंगे कि किसी की कोई सेवा लेना आसान बात नहीं। अपने इन्डिया में निकलते बढ़ते, कहीं भी चार लोग मिल जाते हैं, बात कर लो, हाल चाल पूछ लो। यहाँ तो कोई किसी से बात ही नहीं करता। और अंग्रेजी न जानो तो और मुसीबत। घरेलू काम के लिये तो किसी की सेवा लेना, दूर की कौड़ी। किसी से कोई अपनापन नहीं। मशीन जैसी जिंदगी, भावनाओं को कोई समझने वाला ही नहीं। इण्डिया में काम ठीक ठाक चल रहा हो तो बादशाहत की जिंदगी है। चीजें सस्ती, थोड़ा खर्च करके भी कामवाली, कहीं भी गाड़ी खड़ी कर लो, गली में भी खटिया बिछा लो, गाड़ी चलाने में कोई गलती हो गयी तो मान मंनव्वल से भी काम चल जाता है। यहाँ तो हर सांस डर कर लो, तनिक भी गलती हो तो भारी पेनल्टी, बाप रे। अब कुलदीप का जी उकताने लगा था और जल्दी से जल्दी वापस जाना चाहता था ।
घूम घाम कर कुलदीप इन्डिया वापस आ गया और जो मिलता, कनाडा भ्रमण की कहानियां बताता रहता। 

 



Utapatang 17 veen shatabdi

प्रिंसिपल का कमरा  किधर है ब्रेन ने एक बच्चे से पूछा
बस सीधे जा के उधर घूम जाना। आप नए टीचर हैं सर?
नहीं, मुझे इस बच्चे जन्मेजय को दाखिला दिलाना है।
बच्चा जोर का ठहाका लगाता है।  हा, हा, ये तो अंकल हैं। दाखिला का नाम सुनकर और सभी बच्चे जोर से हंसने लग पड़ते हैं। हा हा हा,  इतना बड़ा बच्चा प्राथमिक कक्षा में! बड़ी अजीब बात।  देखने में तो चालीस के ऊपर का लगता है और दाखिला लेने आया है प्राथमिक पाठशाला में । एक बच्चा बोला।
दूसरा बच्चा, 'अरे यह तो अंग्रेज का बच्चा लग रहा है।
ब्रेन उनका ध्यान न देते हुए प्रिंसिपल के कमरे की ओर बढ़ चला।
'मे  आई कम इन सर?'
'एस, कम इन ' ।
सर, इसका आपके स्कूल में दाखिला कराना है।
'यह कोई यूनिवर्सिटी थोड़े ही है कि रिसर्च करेगा, यह तो प्राथमिक पाठशाला है। यहाँ बस आठवीं तक ही पढाई होती है।'
'नहीं प्रिंसिपल साहब, अभी तक यह किसी पाठशाला नहीं गया। पहली या दूसरी में दाखिल करना है। '
'यह कैसे हो सकता है, यहाँ आठ दस साल के बच्चे पढ़ते हैं, ये महाशय तो चालीस से भी ऊपर के लगते हैं और पहली कक्षा मे.…'
'नहीं सर, अभी तीन महीने का ही है।'
प्रिंसिपल ने व्यंग में, 'तीन महीने का ? किस माँ ने इतने बड़े बच्चे को जना।'
'दरअसल वो मैं हूँ।  बस, आप इसका नाम लिख ले।'
आप इसके कौन हैं ?
'पिता।'
"पिता !,  बेटे से भी छोटा बाप ! मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि यह बाप साथ आया है या बेटे के! जो दाखिला दिलाने आया है वह इसके बेटे की उम्र का है।"
प्रिंसिपल हैरत में है, ब्रेन की सभी बातें उटपटांग लग रही थीं। इतना अजीबोगरीब क्षण तो इससे पहले जिंदगी में कभी नहीं आया। उसे ब्रेन की बातों पर क्रोध भी आ रहा था और बात करने की उत्सुकता भी बढ़ रही थी।
'किन्तु आप तो इसे तीन महीने का बता रहे हैं।  दाखिले के लिए कम से कम  पांच वर्ष होना चाहिए। जाईये  पांच वर्ष पश्चात ले आईये।'
ब्रेन ने काफी समझाया, 'इसका विकसित मष्तिष्क है, प्राथमिक पाठशाला की पढ़ाई पूरा करने में अधिक समय नहीं लगेगा। हो सकता है, एक सप्ताह में ही सारा कुछ सीख ले। '
'कुछ विचार कर प्रिंसिपल बोला अच्छा जन्म प्रमाणपत्र दिखाईये।'
सर्टिफिकेट देख कर प्रिंसिपल बोला, 'यह तो किसी अस्पताल का नहीं है ... '
'हाँ , इसका जन्म  विदेश में एक ..... में हुआ है।'
बड़े अनुनय विनय के बाद, किसी तरह दाखिला हुआ।
अब स्कूल का बेंच जनमेजय को बैठने के लिए बहुत छोटा था, उसे जमीन पर बैठने के लिए कहा गया।
मध्यहार में कई बच्चों का भोजन वह अकेले खा जाता। कैंटीन वाला ने उसके खाने के लिए अधिक पैसे की मांग की। प्रिंसिपल ने ऊपर से अप्रोवल की बात कह कर टाल दिया।

जनमेजय की सीखने की बड़ी उतसुकता थी।  दो तीन दिन में ही पूछ पूछ कर पूरी पुस्तक याद कर लिया।
स्कूल प्रशासन के समक्ष समस्या थी कि उक्त कक्षा में उसे और अधिक पढने की आवश्यकता नहीं तो अनायास ही क्यों समय व्यर्थ किया जाय। उसे अगली कक्षा में बिठा दिया वहां भी एक सप्ताह में सब सिख लिया। यहाँ तक कि दो माह में  ही पांचवीं में पहुंच गया।

स्कूल  को अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ा। वह छोटे बच्चों के साथ खेल नहीं सकता था। फुटबाल खेलता तो उसके पास से गेंद किसी और के पास जा ही नहीं पति और एक ही किक में गेंद मैदान से भी बाहर। वैसे ही क्रिकेट का खेल। उसके खेलने पर बच्चे आपत्ति करते। मगर जब खेल से बाहर रखा जाता वह ताकता  बोर होता। बच्चों ने उसका नाम सुपरमैन रख दिया।
साल से पहले ही आठंवीं तक का कोर्स पूरा कर लिया। अब यह निर्णय लिया गया कि ओपन स्कूल से मेट्रिक की परीक्षा में बिठाया जाय। हाई स्कूल भी डिस्टिंक्शन के साथ पास हो गया।


वैज्ञानिकों की टीम कार्य पर लग गयी है। लैब में हलचल है। धीरे धीरे सामान्य तापमान पर लाया जाता है। वैज्ञानिक जी जान से जुटे हुए हैं।  खून द्रवित करने के रसायन काम करना प्रारम्भ कर चुका है।  ४८ घंटे में खून नाडियों में प्रवाहित होने लगेगा। तब तक सघन निरिक्षण में रखना होगा। लाइफ सपोर्ट संयंत्र लगा दिया गया है।  कृत्रिम सांस देने की व्यवस्था हो चुकी है। अतिरिक्त खून चढ़ाने के लिए ताजा खून भी रख लिया गया है। हाथ पैर हिलने डुलने लगे। अभी दिल नहीं धड़क रहा है। ह्रदय विशेषज्ञ को बुलाओ। पेस मेकर लगा दिया जाता है। सुखद आश्चर्य से वैज्ञानिक प्रसन्न दिल धड़क उठता है।  अब तो बस ऑंखें खुलना शेष है।
जाँच में पता चला आंख की एक नस में रक्त प्रवाहित नहीं हो पा रहा है। ठण्ड से नस सिकुड़ गयी है। दबाव देकर वहां तक खून पहुँचाया जा सकता है। हां यह भी काम पूरा हुआ।  पलक हिली और आंख भी खुल गयी।

हाथ में बैंड  बंधा हुआ है


दृश्य
उसे लग रहा था अभी वह गहरी निद्रा से उठा है। एक सप्ताह में स्वस्थ होने के बाद जब वह बाहर निकल तो सब कुछ बदला बदला। यह तो एकदम अलग स्थान था।  यहाँ का वातावरण, मौसम आदि सब अलग।
उसने पूछा मैं कहाँ हूँ ?
वाशिंगटन में
जन्मेजय को अंग्रेजी नहीं आती और वैज्ञानिकों को हिंदी।  अब तो बड़ी समस्या हो गयी उससे कैसे पूछ ताछ करे।  एक वैज्ञानिक जो भारतीय मूल का था, हिंदी आती थी।
ये क्या है मोटर साइकिल
हवाई जहाज को देखकर, देखो कितनी बड़ी चिड़िया उड़ रही है
नहीं यह हवाई जहाज है।  उसमे आदमी बैठे हैं।
टेलीविज़न, पक्की सड़क, ऊँचे भवन इतने आदमी।  इतने कम समय में सब कैसे
जब सोया था तो कुछ नहीं था।  ये पहाड़ ये मौसम सब कहाँ से आ गए।
यह अमेरिक हैं इंडिया नहीं।
मेट्रो ट्रैन ऐसी बस यह सब तो इंडिया में नहीं है
जब वहां जायेगा तब न पता चलेगा।  अब इंडिया वो इंडिया नहीं है
तुम्हें पता है तुम्हारा घर कहाँ है।  हाँ दिल्ली
नहीं, मुझे तो भारत जाना है लेकिन वहां मेरा कोई होगा कि नहीं
पुराणी कहानी ---
इतिहास


रिश्ते / सम्बन्ध

मेरे पिता कौन हैं
तू तो सबका बाप है।  जाने कितनी पीढियां बीत चुकी होंगी।
हाँ मेरे एक बेटा था उसकी शादी कर दी थी
तू तो मुझे विरासत में मिला है पता नहीं कितने लोग तेरे बाद होंगे
नगर के आधे लोग तो तेरे ही वंशज होंगे

विद्यालय
मित्र युवा वर्ग का कोई मित्र ही नहीं बनता। जिससे विवाह, हुआ पता चला उसका डी एन ए वही है। यह तो सैग गड़बड़ है

विदेश से देश


प्रयोगशाला
दम घुटने से मौत
लाशों में रसायन लेप
तापमान
१० लाशें राखी गयीं
उसकी देख भल के लिए वैज्ञानिकों की  टीम
कई शरीरी पर काम किया जा रहा था।  पर सफलता नहीं मिल पा रही थी

बीच का समय/ विकास
ज्ञान
समाज
परिवेश - भीड़
संचार यातायात


तानसेन
इच्छा जताई थी


मीडिया से बचाना है

डूबा तारा फिर उग आया
दुनिया चलती रही


सत्रहवीं शताब्दी की बात है, भारत से सामान भरकर जहाज लन्दन जा रहा था।  ब्रेन की नियुक्ति उसी जहाज में थी। जहाज लन्दन पहुंचने ही वाला था की किसी रासायनिक गैस का रिसाव हुआ और ब्रेन बेहोश हो गया लन्दन पहुंच कर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया पर बचाया नहीं जा सका । जर्मन की एक टीम जिंदगीअन्वेषण कर रही थी।  उसी टीम के एक डॉक्टर इब्राहिम ने उसे पुनर्जीवित करने के लिए प्रयोग करने की सोची  और पुनर्जन्म  के बारे में  उसकी लाश लेने वाला कोई नहीं था।


लाल किला, इतनी ऊँची इमारतें, सड़कें भीड़ उसके लिए सब  कुछ कौतुहल का विषय थीं


क्या प्यारी सी लड़की जा रही है। इतनी सुन्दर लड़की तो अब तक देखा ही नहीं। और  पास से देखने की इच्छा जागृत हो उठी
'कहाँ पढ़ती हो ?'
'श्रीकृष्ण पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज'
'मुझे उसी कॉलेज में नौकरी मिली है।  क्या सब्जेक्ट लिए हैं
'साईकोलॉजी' से एम् ए कर रही हूँ'
'बहुत अच्छा विषय है
मिलने का सिलसिला चलता रहा '
एक दिन ब्रेन बोला, तुम्हारा नाम क्या है
'कमली'
एक दिन धीरे धीरे प्यार होगया
एक दिन ब्रेन ने कहा तुम्हारा पूरा नाम क्या है
'कमली रघुवंशी
अरे मैं भी तो उसी खानदान का हूँ
फिर मन में सोचने लगा अवश्य ही इसके अंदर मेरा खून दौड़ रहा होगा।  डी एन ए  जांच हो तो पता चलेगा यह मेरी ही वंशज होगी ।


ब्रेन को बस इतना याद था। उसके एक बेटा था। उसकी पत्नी बड़े घर की थी। वह छोड़ कर चली गयी। उस समय उसका नाम था रेवती रघुवंशी। बेटे का नाम रखा था रमन्ना। पत्नी उग्र दिमाग की थी बात बात पर झगड़ पड़ती। रेवती ने नशे का सहारा लिया। शोभा रमन्ना को लेकर चली  गयी। किसी और से प्यार था।
रेवती को अकेले ही जिंदगी कटनी थी।  पहले तो दूसरी शादी की सोचा पर एक प्रोजेक्ट पर उसे लंदन जाना था।
पता नहीं वापस लौटे भी या नहीं इसलिए अभी के लिए टाल दिया।




सारी धरती पर खोज लिया कहीं नहीं मिली
लगता है कोई दूसरे गृह पर भगा ले गया
पृथ्वी से एक और लड़की गायब
गायब होने की सिलसिला लगातार चल रहा है
वहां खाने की बहुत दिक्कत गेहूं नहीं नमक नहीं यहाँ से आयात
सूखे अन्न नहीं ठंडा प्रदेश कच्चा ही खाना
लकड़ी नहीं
गैस, पानी से बिजली  से पकाना



दूसरे ग्रह से विवाह करने आये हैं
यहां के दुल्हन के परिधान में ले जायेंगे