Sunday, 12 July 2020

dharm 2



खंड 2  - मंथन 

हिन्दू धर्म की उदारता और बिखराव 

हिन्दू धरम; और कितना नरम ?  
हिन्दू धर्म की एक बहुत बड़ी विशेषता है - उसकी उदारता। हिन्दू धर्म जैसी धार्मिक स्वतंत्रता, किसी अन्य धर्म में नहीं मिलती। यह धार्मिक स्वतंत्रता एक बहुत बड़ी निधि है। इसकी उदारता, विशालता और सहिष्णुता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह प्रत्येक व्यक्ति और जीव के  अधिक से अधिक स्वतंत्रता चाहता है। धार्मिक उदारता के परिणाम स्वरुप, भिन्न भिन्न पूजा पद्धति और परम्पराओं का विकास हुआ। हिन्दू धर्म में अनेक देवी देवता किसी न किसी विशेष गुण या शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। अनुयायी किसी भी देवता की उपासना करने तथा कोई भी पूजा पद्धति अपनाने के लिए स्वतन्त्र है। यहाँ किसी विशेष पूजा अर्चना या परम्परा को निभाने की कोई वाध्यता नहीं है। हिन्दू धर्म में उपासना के मार्ग और उससे होने वाले लाभ के बारे में बता दिया जाता है। कोई उस मार्ग पर चले, न चले, किस प्रकार चले इस पर बल नहीं दिया जाता। यहाँ तक कि कोई पूजा करे तो ठीक, नहीं करे तो भी ठीक। ईश्वर सभी के साथ है। अधिकतर धार्मिक कार्य आपसी देखा-देखी से ही चलते हैं।

यद्यपि यह धर्म अपनी सुंदरता और सुदृढ़ता के कारण लाखों वर्ष से सुचारु रूप से चलता चला आ रहा है। हिन्दू- धर्म में जितनी अधिक स्वतंत्रता है, उसका बिखरना बहुत सरल था; किन्तु हिन्दू देवी-देवताओं की परम  शक्ति और ऋषि मुनियों द्वारा स्थापित संस्कारों व प्रथाओं ने ऐसा होने से रोके रखा। इसकी अच्छाइयों के कारण ही प्रत्येक हिन्दू  के अंतःकरण तक धर्म की मान्यताएं और आस्था कूट कूट कर भरी हैं। जितनी स्वतंत्रता हिन्दू धर्म में है शायद ही किसी अन्य धर्म में हो। हिन्दू धर्म में वैचारिक स्वतंत्रता के अतिरिक्त अनुष्ठानों और पूजा-पाठ के प्रकार व विधि के साथ कई अन्य नियमों में अनेक प्रकार की स्वतंत्रता है। कुछ अन्य धर्म, कट्टरवाद की चरम के कारण, भय के बल पर चलते रहे। किन्तु हिन्दू धर्म इतना उदार होने के बाद भी अपनी सुंदरता और भव्यता को न्यून नहीं होने दिया। यद्यपि अत्याधिक धार्मिक स्वतंत्रता, उदारता और स्वामित्व के अभाव के फलस्वरूप, अनुयायी अपनी-अपनी करते रहे। सभी घटकों को एक सूत्र में बांध कर रखने वाला कोई नहीं था, कई साधु संत अपना पृथक पंथ स्थापित करने में लग गए। कई तरह की वैचारिक विभिन्नताओं के कारण, हिन्दू धर्म अपने को एक नहीं रख पाया और यह समय के साथ बिखरता गया, जिसके फलस्वरूप कुछ नए धर्मों ने भी जन्म लिया। वैसे तो धर्म के कट्टरवाद के दुष्परिणामों से हम परिचित हैं, किन्तु अधिक उदारवादी होने के कारण हिन्दू धर्म को निम्न परिणाम देखने को मिले : 

१. अन्य धर्मों का प्रादुर्भाव 
२. स्वार्थी साधु-संतों के अपने पृथक पंथ 
३. ढोंग, पाखंड, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता व कुप्रथाओं को जन्म 
४. कुछ तत्वों द्वारा हिन्दू धर्म का अनादर और परिहास 

१. इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि आदि काल में मात्र हिन्दू धर्म ही अस्तित्व में था, शेष सभी धर्म इसी से संस्फुटित हुए हैं। मानव का साधारण स्वभाव है कि वह एक स्थान या एक मार्ग पर स्थिर नहीं रहता। जिसे थोड़ी शक्ति मिल जाती है, वह अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। अपने संगठन में शीर्ष पर आरूढ़ होने में सफलता नहीं मिलने पर, वह पृथकतावादी निति अपनाने लगता है। हिन्दू धर्म में भी ऐसा ही कुछ हुआ। अलगाववादी तत्वों को साथ रख पाने की शक्ति के अभाव ने कई अन्य धर्मो को पनपने दिया। सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में हिन्दू धर्म के वेदों, उपनिषदों के सिद्धांत और परम्पराएं मिलती हैं। हिन्दू आदिकाल से ही मंदिरों में पूजा करते हैं तो कई अन्य धर्मों में भी मंदिर अथवा एक निश्चित पूजा स्थल का प्रचलन है; दीप या मोमबत्ती, लगभग सभी धर्मों के पूजा में प्रयुक्त होती है। जप, तप, व्रत का भी किसी न किसी रूप में, सभी धर्मों में प्रावधान है। जिस प्रकार बड़े परिवार में बंटवारा होता है, वैसे ही हिन्दू धर्म में भी नए संप्रदाय बने। और  साम्प्रदायों के धर्मगुरु, ईश्वर का दूत बनकर, नए धर्म की स्थपना किये। धर्म के द्वारा अपनी प्रभुता और सत्ता स्थापित करने की लालसा, अलग पंथों को जन्म देती रही है। इसी वैचारिक भिन्नता और अलगाववाद की निति के कारण, लगभग हर धर्म में दो या दो से अधिक पंथ हैं; हिन्दुओं में सनातन-आर्यसमाज, इस्लाम में सिया--सुन्नी, सिक्ख धर्म में अकाली-निरंकारी, जैन धर्म में श्वेताम्बर-दिगंबर, बौद्ध  धर्म में हिनायण--महायण, और ईसाई धर्म में कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट-ऑर्थोडॉक्स इत्यादि। 

२. हिन्दू धर्म का कोई एक निश्चित संरक्षक नहीं था। धर्मगुरुओं और ब्राह्मणों ने सामूहिक रूप से इसे आगे बढ़ाया। कई धर्म गुरु अपने साम्प्रदाय में इतने लोकप्रिय हो गए कि उन्हें भगवान का रूप मान लिया गया। कई स्वार्थी धर्म गुरुओं ने अनुयायिओं के भोलेपन का लाभ उठाकर, अपने निहित व्यक्तिगत और स्वार्थपूर्ण कारणों से नए पंथ की स्थापना करना चाहा। उनका उद्देश्य भी स्वयं को देवदूत कहलाना अथवा प्रतिष्ठा पाना और अपनी सत्ता स्थापित करना था। बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी में कई स्वार्थी बाबा लोगों ने अवतार लिया, जिनका उद्देश्य धर्मान्धता का लाभ उठाकर धन कमाना, और सत्ता की दलाली करके अपना उल्लू सिद्ध करना रहा। 

आडम्बर के कृत्यों से कुछछ्लते संत समाज यहाँ।
लेकर के ओट धरम की वोचाहें सिर पर ताज यहाँ
भोली जनता भी चंगुल में जाती बड़े सहज ही, 
राजनीति के संरक्षण में, चलता उनका राज यहाँ

३. हिन्दू धर्म की विशालता और उदारता का इसी बात से बोध होता है कि हिन्दुओं के अनगिनत देवी-देवता, अनेक साम्प्रदाय, साम्प्रदायों के भिन्न-भिन्न संस्कार और भिन्न पूजा पद्धति हैं। आदिकाल के देवी देवताओं के अतिरिक्त ग्राम देवता, कुल देवता, स्थानीय देवी-देवताओं आदि का समावेश होता गया और स्थान एवं व्यक्ति विशेष के अनुसार उनकी आराधना होती रही है। यही नहीं अन्धविश्वास के कारण भूत-पिशाचों, झाड़-फूँक, तंत्र-मत्र, टोना-टोटका आदि ने भी बिना किसी अन्तर्विरोध के हिन्दू धर्म में अपना स्थान बना लिया। हिन्दू धर्म में एक ओर देवी-देवताओं की सरल पूजा-अर्चना तो दूसरी ओर भयावह कर्मकाण्डीय अनुष्ठान भी किये जाते हैं; एक ओर भक्ति रस से सराबोर है, तो कहीं नास्तिक भी मिलते हैं। बीच-बीच में कई स्वार्थी पोंगा पंडित भी आते रहे, जिन्होंने अपने ढोंग और पाखण्ड से हिन्दू धर्म के प्रति आस्था को ठेस पहुँचाया। विज्ञान के विकास और हिन्दू समाज के शिक्षित होने के साथ इन बातों को लेकर धर्म में आस्था कम होती गयी। यह सब हिन्दू धर्म की उदारता तथा धार्मिक सहिष्णुता की श्रेष्ठ भावना का ही परिणाम और परिचायक है। उदारवाद के कारण बीच बीच में अनेक कुरीतियां और कुप्रथाएं पनपीं, किन्तु समय-समय पर उनमें सुधार किया जाता रहा। हिन्दू-धर्म में जहाँ हजारों अच्छाइयां थीं तो कई बुराईयां भी पनपीं जिनके कारण हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता का क्षय हुआ। अशिक्षा के कारण बहुत सी कुरीतियां पनपीं, उनमें से बहुत से ठीक कर ली गयीं, किन्तु कुछ कुप्रथाएं अभी भी विद्यमान है। कोई रोक टोक नहीं होने के कारण, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता, पाखंड, जादू टोना, ढोंग, भूत प्रेत, आदि को खूब बढ़ावा मिला। 

हिन्दू धर्म में उदारता और अज्ञानता के कारण विभिन्न प्रकार के अन्धविश्वास और ढोंग पनपते गए। वे ढोंग, धर्म का अंग कदापि नहीं हैं। कुछ ढोंगी साधुओं और धर्म गुरुओं ने अपने को सिद्ध बताने के ध्येय से कई प्रकार के अन्धविश्वास और ढोंग पालते रहे और भोली जनता को छलते रहे। शिक्षा और विज्ञान के विकास से बहुत से अन्धविश्वास तो दूर हुए किन्तु अभी भी अनेक अन्धविश्वास और रूढ़िवादी प्रथाएं प्रचलित हैं। इसका कारण है - अज्ञानता और शिक्षा का अभाव। कई रोगों को आज भी भूत प्रेत के कारण उत्पन्न माना जाता है और उसका निदान मन्त्रों या झाड़ फूंक के द्वारा किया जाता है। अंधविश्वास आदि काल से चले आ रहे हैं और सम्पूर्ण भारत में फैले हुए हैं। इनकी जड़ें भारत में बहुत गहरी हैं। इन अंधविश्वासों में से कुछ को तंत्र-मन्त्र, भूत-पिशाच आदि से सम्बंधित साहित्यों ने दिया है, और कुछ दूसरों को ठगने के उद्देश्य से मन्त्रों का व्यवसाय करने वालों ने। जादू, टोना, टोटका, ताबीज इत्यादि अनेक ऐसी क्रियाएं हैं, जिनका प्रयोग, धार्मिक भाव समाहित करके किया जाता है। प्राचीन काल में तो जब विज्ञान अधिक विकसित नहीं था, लगभग सभी कार्य तंत्र-मन्त्र की विद्या के द्वारा ही सिद्ध किये जाते थे। यह विश्वास दिलाया जाता था कि इन मन्त्रों के द्वारा कोई भी कार्य करवाया जा सकता है। नजरौना, नीबू मिर्ची,  तरह का अंक बिल्ली का रास्ता काट जाना, दूध गिर जाना, पानी में सिक्के फेंकना, नारियल फोड़ना, छींकना, टोकना, शनि को नाख़ून न काटना आदि अनेकों शुभ व अशुभ प्रभाव वाली प्रथाएं हैं। ये अन्धविश्वास केवल हिन्दुओं में ही नहीं अपितु सभी धर्मों में हैं। ऐसी अनेक क्रियाएं और घटनाएं हैं, जिनके कारणों का मनुष्य को ज्ञान नहीं हो पाने के कारण, इनके पीछे किसी अदृश्य शक्ति जैसे किसी देव या प्रेत-पिशाचों का प्रकोप या कृपा मान लिया जाता है

अन्धविश्वास मनुष्य के मानसिक निर्बलता का परिचायक है। किसी को भी सभी विषयों का ज्ञान नहीं हो सकता। बहुत सी बातों के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है। यहाँ तक कहीं जाने के लिए मार्ग भी कोई बताता है तो उस पर विश्वास करके जाना पड़ता है। इसी प्रकार राशिफल पर भी भरोसा करने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता। संसार में सैकड़ों करोड़ व्यक्तियों का भाग्य अलग-अलग होता है तो पूरी दुनिया को मात्र बारह वर्गों में कैसे बांटा जा सकता है। राशिफल और कार्ड आदि विद्या का प्रयोग करके जो भविष्य बताया जाता है, उन पर विश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं प्रतीत होता और प्रायः असत्य ही होता है। ये भविष्यफल गोल मोल करके बताये जाते हैं और कभी तुक्का लग जाय तो ज्योतिषी जी की शाख बन जाती है। शिक्षा के प्रसार और कानून ने कई पाखंड, रूढ़िवादिता, ढोंग, जादू टोना आदि दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। किन्तु आज भी दूरवर्ती  गांवों में अन्धविश्वास, कई रूढ़िवादी परम्पराएं और टोना-टोटका देखा जा सकता है।  

४. हिन्दू धर्म का अनादर और परिहास : अत्यधिक उदारवादी होने के कारण, द्वेषी तत्व हिन्दू-धर्म का परिहास करने से नहीं चूकते। हिन्दू धर्म के ऊपर कटाक्ष करते हुए लेख लिखे जाते हैं, कहानियां लिखी जाती हैं, फिल्में बनती हैं जिन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाता। यहाँ किसी फतवा का डर नहीं है। जैसा की ऊपर बताया गया है, हिन्दू धर्म में लोगों के भोलेपन का लाभ उठाने के उदेश्य से, समय समय पर बहुत सी ठगी वाली विद्याएं पनपीं; किन्तु शिक्षा के विकास के साथ उन पर नियंत्रण पा लिया गया। बहुत सी कमियां अन्य धर्मों में हैं किन्तु वहां किसी प्रकार का कटाक्ष या परिहास करने का किसी में साहस नहीं होता। हिन्दू धर्म का कोई निश्चित संरक्षक नहीं होने के कारण, परिहास करने वाले लोगों पर लगाम नहीं लगाया जाता। हमारे देश में धर्म के अनादर के विरुद्ध कानूनी प्रावधान भी हैं, किन्तु उसका प्रयोग भी यदा कदा ही दिखता है। हिन्दू धर्म का अनादर करते हुए यदि कोई नाटक, कहानी, फिल्म, साहित्य, शो आदि प्रस्तुत किया जाय तो उसे संज्ञान में लेते हुए हिन्दू संस्थाओं द्वारा तुरंत क़ानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए। 
  

राजनितिक प्रभाव  
धर्म और राजनीति का सम्बन्ध अटूट होता है। वेदों में राजधर्म का विस्तृत वर्णन है। धर्म के बिना राजीनीति निरंकुश हो जाएगी और उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। राजनीति का दायित्व है कि वह धर्म को साथ लेकर चले। वैसे तो धर्म और राजनीति एक दूसरे के पूरक हैं, किन्तु कई स्थानों पर घोर विरोध भी है। वेदों के अनुसार राजनीति भी धर्म का ही अंग है, परन्तु कई बातों में दोनों का परस्पर विरोध स्पष्ट दिखता है। धर्म सदाचार सिखाता है : राजनीति भ्रष्टाचार को जन्म देती है, धर्म दान सिखाता है : राजनीति में संचय और कोष निर्माण की निति है, राजनीति के पास स्पष्ट शक्ति है : धर्म के पास अदृश्य शक्ति है, धर्म में त्याग है : राजनीति में स्वार्थ भारी है, धर्म में आदर्श और आस्था समाहित है : राजनीति नियम और व्यवस्था पर टिकी है, धर्म में शांति है : राजनीति में युद्ध, धर्म में ईश्वर सर्वोपरि है : राजनीति में राजा सबसे ऊपर है; इत्यादि। ये विरोधाभास, समय के साथ पनपते गए और धर्म की गलत अवधारणाओं तथा धर्म के प्रति मनुष्य की उदासीनता के कारण, वर्तमान में चरम तक पहुँच गए हैं।    


 ऋग्वेद में राजधर्म का व्यापक उल्लेख है। प्राचीन काल में राजाओं का कार्य, धर्म का पालन करना और करवाना भी होता था। मंदिरों का निर्माण, बड़े धार्मिक आयोजन राजाओं के ही तत्वाधान में होता था। राजा स्वयं भी बड़े धार्मिक प्रवृत्ति के होते थे; तथा कोई भी आयोजन करने से पूर्व, वे राजगुरु और राजपुरोहित से परामर्श लेते थे। अब राजनीति में आने वाले अपनी महत्वाकांक्षा, सुख, सुविधा, श्रेय, प्रस्थिति, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, प्रसिद्धि आदि का ही ध्यान रखते हैं। धर्म और मानवता का ध्यान उनके लिए गौण है। वेदों के ज्ञान से और धर्म से उनकी अनभिज्ञता बढ़ती जा रही है। आज मानवजाति की आधुनिक जीवन शैली जो व्यापक, बहुआयामी और  बहुपक्षीय हो चुकी है; जीवन-व्यवस्था में धर्म का साथ छोड़ती जा रही है। राजनीति का उद्देश्य, धर्म और सत्ता के सम्बन्ध को नकारने का प्रयास और सत्ता में धर्म के हस्तक्षेप को न्यूनतम करना है, ताकि उसका निहित उद्देश्य निर्वाध पूरा हो सके। अपितु अब धर्म के भी रजिनीतिकरण करने का प्रयत्न होता है। राजनीतिज्ञों के अपने अनुचित आचरण के द्वारा प्राप्त उनका वैभव पूर्ण जीवन देख कर, लोग उधर आकर्षित होते रहे, जो धार्मिक आस्था का हनन करता  रहा।  धर्म गुरुओं की अपेक्षा लोग राजनीतिज्ञों के अनुयायी होने लगे। धर्म को व्यवस्था से, व्यवस्था को धर्म से अलग-थलग कर दिया गया। यह अलगाव इतना प्रबल रहा कि ‘धर्म’ और ‘व्यवस्था’ एक-दूसरे के प्रतिरोधी और प्रतिद्वंद्वी बन गए, फलस्वरूप एक नए धर्म 'धर्मनिरपेक्ष' का अविष्कार किया गया। इसका मूल कारण धर्म को राजनीति से दूर रखना ही था। राजनितिक व्यवस्था में हिन्दू धर्म के प्रति पक्षपात भी देखने को मिला, जो इसे निर्बल करता रहा।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कई धर्मों के अनुयायियों को एक साथ संतुष्ट करने की आवश्यकता के कारण, राजनीतिज्ञों को 'धर्मनिरपेक्षता' का सहारा लेना पड़ा। यह 'धर्मनिरपेक्ष' हिन्दू धर्म के लिए एक छलावा बनकर उभरा। एक ओर कुछ धर्मों को अल्पसंख्यक के नाम पर पूरी छूट दी जाती रही, उन्हें अपने धर्म का वैयक्तिक कानून बनाने का भी अधिकार मिला, उनका धर्म चलाने के लिए उनके धर्मगुरुओं पर छोड़ दिया गया; किन्तु हिन्दू धर्म में राजनितिक हस्तक्षेप पूरा रहा। जब कि विधि बनाने वालों में हिन्दुओं का ही बहुमत था। सत्ता पर आसीन हिन्दू, अपने धर्म को भूलता गया, उसे सत्ता ही सबसे बड़ा धर्म दिखाई देने लगा। यह उसी प्रकार होता रहा जैसे कोई बालक शरारत करते हुए अपनी माँ को आघात भी पहुंचाता है तो माँ चुपचाप सह जाती है।

समाहित सदा धर्म में , क्षमा अरु परमार्थ।  
राजनीति का मन्त्र अब,  सत्ता और स्वार्थ।

हिन्दू धर्म को अपनी सीमितताओं और निर्बलताओं के परिणामस्वरूप मानव के व्यक्तित्व को दो भागों में बाँट दिया गया। १, ईश्वरवादी और धार्मिक व्यक्ति को पूजा-पाठ तक सिमित कर दिया गया और २. सामाजिक या सामूहिक व्यवस्था में अपने धर्म को भूल जाने पर बल दिया गया। सामाजिक और सामूहिक व्यवस्था के द्वारा सत्ता पर अधिकार जमाने और भ्रष्ट आचरण के द्वारा धन कमाने का अधिक अवसर था। अपनी निर्बलताओं और उदारवादी सिद्धांतों के कारण हिन्दू-धर्म ने धर्म-निरपेक्षता के समक्ष स्वयं को समर्पित कर दिया। वहीं अल्पसंख्यक अपनी मनवाने में सफल होते रहे। हिन्दुओं के विषमताओं का शिकार होना भी इसका एक कारण था। हिन्दू जातियों, नस्लों, क्षेत्रवाद, भाषावाद आदि में जकड़ा हुआ था। इस नयी व्यवस्था ने सामूहिक जीवन, राजनीति, न्यायपालिका, कार्यपालिका, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, शैक्षणिक व्यवस्था आदि से धर्म को शनैः शनैः बाहर निकाल दिया। हिन्दुओं के कुछ धर्मगुरुओं ने समय-समय पर अपना वर्चस्व बनाया, किन्तु उन्हें अधिक धन कमाने की लालसा के कारण अपने संरक्षण हेतु उन्हीं राजनीतिज्ञों से जोड़-तोड़ करना पड़ा और अंततः उन्हें राजनीति का ही शिकार भी होना पड़ा।  
चला रहे दुकान, धर्म के नाम पर।  
दलाली का काम, धर्म के नाम पर। 
कैसे सिखाएं बातें नीति कीखेलते -
राजनीति के दांवधर्म के नाम पर। 
भारत को 'फूट डालो और राज करो' की निति अंग्रेजों से विरासत में मिली। इस निति का आज भी राजनीतिज्ञों द्वारा बड़ी तन्मयता से पालन होता है। भारत में जनप्रतिनिधित्व कानून है; जिसके अंतर्गत धर्म, भाषा, समुदाय और जाति का प्रयोग कर चुनाव में वोट मांगना भ्रष्ट आचरण है। इस विषय में सुप्रीम कोर्ट के भी स्पष्ट निर्देश हैं जिसके अनुसार, न केवल प्रत्याशी अपितु उसके विरोधी उम्मीदवार के धर्म, भाषा, समुदाय और जाति का प्रयोग भी चुनाव में वोट माँगने के लिए नहीं किया जा सकेगा। चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है। धर्म के आधार पर वोट माँगना संविधान की भावना के विरुद्ध है। किन्तु चुनावों में प्रायः देखा जाता है कि धर्म तो क्या अब जातिगत आधार पर भी  वोट मांगने में कोई परहेज नहीं। इस प्रकार राजनितिक नेता बड़े स्तर पर जातिगत विभेद उत्पन्न करते हैं, जो हिन्दू धर्म के एकीकरण को क्षति पहुंचाता है। 
अलग रंगो में, राष्ट्र को बांटने वालों !
तीन टुकड़ों मेंतिरंगा टांगने वालों !
खेत न केसरिया,  चेहरा हरा होगा;
सुनो! संप्रदाय, रंगों से
 आंकने वालों !

संविधान एक ओर तो धर्मनिरपेक्षता की बात करता है दूसरी ओर अल्पसंख्यक और जातिगत प्रावधान हैं। इन प्रावधानों को राजनीतिज्ञ अपने हितों के अनुसार प्रयोग करते रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता की बात केवल हिन्दू राजनीतिज्ञ ही करते हैं कई अन्य धर्म के नेताओं के लिए राजनीति से बढ़कर उनका तथाकथित धर्म है, क्योंकि उनका हित उसी में निहित है। अन्य धर्म का व्यक्ति तो राष्ट्राध्यक्ष भी बन जाय वह अपने धर्म का ही रहता है, किन्तु हिन्दू यदि कोई नेता या अधिकारी भी बन जाय वह धर्म निरपेक्ष हो जाता है। भारत के लोकतान्त्रिक व्यवस्था में भी धर्मनिरपेक्ष सरकार, कश्मीर में हिन्दुओं पर अत्याचार होते देखती रही और लाखों हिन्दुओं को वहां से पलायन करना पड़ा। 

शिक्षा, स्वास्थ का समान अधिकार है, संविधान में !
क्यों फिर जाति, धर्म  का आधार है, संविधान में ?
वास्तविक पिछड़ा तो अब भी पड़ा पिछड़ों के जैसा,
नाम का पिछड़ा मलाई खाता अपार हैं, संविधान में।

संविधान अंग्रेजी भाषा में लिखा गया और अंग्रेजी का वर्चस्व बनाये रखा गया, जिससे कि अंग्रेजी पढ़ने लिखने वालों की सत्ता से निकटता बनी रहे। हिन्दू धर्म के अधिकतर साहित्य संस्कृत में लिखे गए या फिर हिंदी में। अंग्रेजी स्कूलों के बहुतायत की संख्या में खुलने के कारण भी हिन्दू संस्कृति का निरंतर ह्रास हुआ।  


हिन्दू धर्म और सामाजिक व्यवस्था 

हिन्दू सामाजिक व्यवस्था की चर्चा, दो भागों में बाँट कर करते हैं : १. परिवार और २. समाज  

पारिवारिक व्यवस्था : हिन्दू परिवार में जन्मा बच्चा जन्म से ही हिन्दू होता है, उसे हिन्दू बनने के लिए कोई किसी अन्य प्रक्रिया से नहीं गुजरना होता तथा एक विवाहित दंपत्ति को ही बच्चे को जन्म देने का अधिकार है। हिन्दुओं में विवाह, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र सम्बन्ध है। विवाह सोलह संस्कारों में में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है जिसके द्वारा ही वंश चलता है। हिन्दुओं में एक विवाह की प्रथा है तथा दम्पति के एक सूत्र में जीवन पर्यन्त बंधे रहने की कामना की जाती है। पति पत्नी को जीवन की गाड़ी के दो पहियों के रूप में देखा जाता है। विवाह के पश्चात् पति पत्नी गृहस्थी  कार्यों का बंटवारा करके अपने कार्यों का निर्वाह करते हैं। 

हिन्दुओं में प्रायः संयुक्त परिवार की प्रथा है। संयुक्त परिवार में साथ का बहुत बड़ा सुख है। संयुक्त परिवार में रहने से संबंधों का सम्मान, बड़ों का आदर, आज्ञा पालन, अनुशासन, धैर्य, सहनशीलता, प्रेम, सहयोग की भावना, त्याग,  धर्म और कर्म का पालन इत्यादि बड़े सहज ही सीखने को मिल जाता है। धार्मिक संस्कार, उत्सव आदि मिल जुल कर हो जाते हैं। बड़ों का आशीर्वाद मिलता रहता है। परिवार  के सभी सदस्य अपने लिंग, उम्र, प्रतिष्ठा-पदवी के अनुसार निर्धारित कर्म को करते हैं। हिन्दुओं में तीन पीढ़ियों, कभी कभी तो चार पीढ़ियों तक के सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हैं और पारिवारिक सम्पति को साँझा करते है। पिता के पश्चात्, पुत्र अपने कुल के उत्तराधिकारी हो जाते हैं और संपत्ति पर उनका अधिकार  हो जाता है। अपने कुल की परंपरा को आगे ले जाने तथा धर्म और कुल की मर्यादा की रक्षा करना का उनका दायित्व हो जाता है। अब हिन्दू उत्तराधिकार कानून में सुधार करके पिता की संपत्ति में पुत्र व पुत्री दोनों का समान अधिकार कर दिया गया है।   

हिन्दुओं में मौसी, चाची, मामी और बुआ को माँ तुल्य माना जाता है और इनके पुत्र-पुत्रियों को भाई-बहन। पुत्र-बधू को भी पुत्री के समान समझा जाता है। इसी प्रकार भाई बहन के पुत्र पुत्रियों को पुत्र पुत्री ही समझा जाता है। हमारे ग्रंथों में पारिवारिक और सामाजिक संबंधों के महत्व को बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। रामचरित मानस में आदर्श माता, पिता, पुत्र, भाई, बहन, गुरु, राजा, मित्र, सेवक आदि के प्रति कर्तव्य और दायित्व को बड़े उत्तम ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रन्थ त्याग, प्रेम, दया, भक्ति, आज्ञा पालन, धैर्य, वीरता, कुसंगति और ऊंच नीच की भावना का परित्याग आदि सिखाता है। इसी प्रकार महाभारत राजनीति के सिद्धांत, योजना बद्ध चलना, सत्य की राह चलना, योग्य और कर्मठ बनना, ज्ञान का उचित प्रयोग करना, कुसंगति से बचना, शत्रु व मित्र की पहचान करना, वाणी पर नियंत्रण, जुआ एक सामाजिक अभिशाप है, संघर्ष से घबराना नहीं चाहिए अपने अधिकार और धर्म की रक्षा के लिए युद्ध भी करना पड़े तो अवश्य करो, चाहिए, नम्रता और भावुकता से हर समय काम नहीं बनता, दृढ़ता, अहंकार पतन का कारण, संपत्ति के कारण पतित न बनो इत्यादि  की शिक्षा देता है। एक अच्छे समाज में रहने के लिए ये सभी गुण आवश्यक हैं।   

 

सामाजिक और वर्ण व्यवस्था 

प्राचीन काल में सामाजिक कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए समाज का वर्गीकरण किया गया और समाज को चार वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित करने की व्यवस्था बनायी गयी। ये चार वर्ण प्रारम्भ में कर्म के आधार पर विभाजित थे।  शूद्र वर्ग का काम था - सफाई, धुलाई, पशु पालन, तकनिकी कार्य, श्रम के कार्य आदि। वैश्य वर्ग का काम था - व्यापार, तेल, मसाले, अन्न, वस्त्र आदि का खरीद बेच तथा समाज की आर्थिक आवश्यकताएं पूरी करना। क्षत्रिय वर्ग का कर्तव्य था - शासन करना, देश धर्म की रक्षा करना, आवश्यकता पड़ने पर युद्ध करना, कृषि, समाज कल्याण आदि का कार्य; तथा ब्राह्मणों का कार्य था - शिक्षा, पूजा पाठ, अध्यापन, कर्मकांड, पुरोहिती आदि। जातियों में भी गोत्र के रूप में और विभेद हैं। 

यह वर्ण व्यवस्था भी ईश्वरीय देन ही है। गीता के अध्याय चार में भगवान् ने स्वयं कहा है - 
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌ ॥ 

(यानि सृष्टि के गुणों के आधार पर कर्म को चार वर्णों में मेरे द्वारा रचा गया, इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान।) 

गीता के इस श्लोक के अनुसार वर्ण व्यवस्था स्वयं भगवान् द्वारा बनायी गयी है। यह व्यवस्था इसलिए दी गयी जिससे कि समाज के विभिन्न कार्य जैसे शिक्षा, स्वच्छता, रक्षा, कृषि, यातायात, वस्तुओं का उत्पादन और विपणन,आदि सुचारु रूप से चले ताकि मानव जीवन सुविध हो। 

ऋग्वेद के मंडल दस, सूक्त १९१ में भगवान् ने कहा है -

समानो मंत्रः समितिः ससानी समानं मनःसह चित्तमेषाम।
समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वृ: समानेन चो हविषा जुहोमि।
अर्थात सबका विचार एक समान हो, परस्पर संगति, मेलजोल एक समान और भेदभाव रहित अंतःकरण एक समान और सबका चित्त एक साथ हो। मैं सबको सम विचारवान बनाता हूँ और एक समान भोजनादि देकर पोषण करता हूँ।

रहो रहित भेद भाव से, रखो विचार समान।
मेल-जोल हो चित्त में, आपस में सम्मान।

इससे यह स्पष्ट होता है भगवान ने वर्ण व्यवस्था तो दिया है किन्तु ऊंच-नीच का भेद भाव नहीं। ऊंच-नीच तथा विभिन्न जातियों का भेद-भाव मनुष्य द्वारा बनाया गया है। वेदों में सबसे समभाव से मिलने और मिलकर रहने के लिए कहा गया है। वर्ण व्यवस्था समाज की आवश्यकतों के अनुसार बनायी गयी थी, किन्तु आगे चलकर इसका बहुत दुरूपयोग हुआ। समाज ने ही शनैः शनैः वर्ण व्यवस्था को विकृत रूप दे दिया। पहले समाज में ऊंच-नीच की भावना ने हिन्दुओं के उन सामाजिक वर्गों में दूरी बनायी, बाद में राजनितिक कारणों ने। मुग़लों और अंग्रेजों ने अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए हिन्दू जातियों के बीच की खांई को और अधिक चौड़ा किया, तथा अश्पृश्यता जैसे ओछे स्तर तक ले गए। मुगलकाल में हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार किये गए। औरंगजेब ने तो बहुत से हिन्दुओं को मरवा दिया, जिनमें मुख्य रूप से ब्राह्मण थे। शूद्रों में से बहुतों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया गया। हिन्दू धर्म को नष्ट करने के सैकड़ों वर्षों के प्रयासों के बाद भी ब्राह्मणों ने वेद, पुराण व अन्य धर्म-ग्रंथों के प्रसंगों को कंठस्थ करके धर्म को नष्ट होने से बचाये रखा। 

समाज को कर्मपूजा की विधि सिखाया ब्राह्मण ने।    
वेद, पुराण, ग्रंथों को कंठस्थ कर बचाया ब्राह्मण ने।
धर्मसंस्कृति और संस्कारों को रखे हुए है जीवित वो,  
धर्मोत्थान कर, ईश्वर में आस्था जगाया ब्राह्मण ने। 
स्वयं दरिद्र होकर भीसमाज को ऊँचा रखता रहा। 
पूजा, पाठ, दान से ही, जीवन उसका चलता रहा।
विरोध और त्रासदियां झेल कर भी ब्राह्मण वर्ग;
नीतिगत शिक्षा प्रदान, चरित्र निर्माण करता रहा।
जो जिस वर्ण में जन्म लेता था उसकी जाति जीवन पर्यन्त वही रहती थी। हिन्दू धर्म पर अतीत में कई प्रकार के आक्रमण हुए और इसे नष्ट करने के प्रयास भी होते रहे किन्तु अपने-अपने कार्यों में दक्ष, इन वर्णों ने सम्पूर्ण धर्म को  न केवल जीवित रखा, अपितु और अधिक सशक्त बनाया। हिन्दू धर्म को बचाये रखने और समृद्ध करने में ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। किसका जन्म किस कुल में हुआ यह तो ईश्वर के हाथ में था। आज भी कोई धनाढ्य के यहाँ पैदा होकर सभी प्रकार के ऐश्वर्य का उपभोग करता है, कोई निर्धन के यहाँ जन्म लेकर दरिद्रता का अभिशाप झेलता है। 

गुण, दोष और कर्म सब, है ईश्वर के हाथ।  
करता वही ऊंच नीच, कुल में भेजता नाथ।

 स्वार्थ भरे कारणों से ऊँच-नीच का भेद और घृणा के भाव को कम करने का प्रयत्न नहीं किया गया। उच्च वर्ग ने अपने कार्यों को अपने वंशजों के लिए सुरक्षति रखने हेतु अन्य जातियों को प्रवेश नहीं करने दिया। चाहे वे उसके योग्य नहीं रहे हों, किन्तु कुल में जन्म लेने के नाते वह काम उसे मिल जाता था। व्यवस्था जटिल होती गई और यह वंशानुगत तथा शोषणपरक हो गई। पिछड़ी जाति के लोग ऊँचा उठना चाहते थे किन्तु उन्हें इसकी छूट नहीं थी। कर्मकांड केवल ब्राह्मण कर सकता था। निम्न जाति के लोगों के निर्धन होने के कारण व्यापार भी नहीं कर सकते थे। जो जिस जाति में जन्म लेता था उसे उसी के अनुसार व्यवसाय अपनाना पड़ता था। प्राचीन काल में वैश्य और क्षत्रिय संपन्न होते थे, किन्तु शूद्र निर्धन और ब्राह्मण दरिद्र होता था। ब्राह्मणों को उच्च जाति का कहलाने के बाद भी दान और भिक्षा पर निर्भर रहना पड़ता था। पूर्व समय में जाति पाँति समाप्त करने के लिए कोई सशक्त प्रयास नहीं किये गए। किन्तु समय के साथ कई समाज सुधारक आंदोलनों ने जन्म लिया और हिन्दू धर्म में पनप रहीं कुरीतियों को दूर करने के सार्थक प्रयास किये गए। वर्ण व्यवस्था का रूप परिवर्तन भी उनमें से एक था। राष्ट्र के स्वतंत्र होने के पश्चात् जात-पांत और अस्पृश्यता मिटाने के लिए भरसक प्रयास किये गए और सामाजिक भेदभाव समाप्त करने के लिए कानून बनाये गए। आने वाली पीढ़ियों ने अपने पूर्वजों की दीन दशा से बड़ी सीख लीं और शिक्षित होकर अपने व्यवसाय बदलने लगीं। भारतीय संविधान में पिछड़ी जातियों के विकास के लिए विशेष व्यवस्था का प्रावधान रखा गया। स्वतंत्रता के बाद पिछड़ी जातियों के विकास में वृद्धि तो हुई पर राजनितिक कारणों से जातिगत भावना कम न होकर, और बढ़ गयी। 

हिन्दू धर्म को निर्बल करने के लिए वर्ण व्यवस्था दोषी नहीं है, अपितु मानवीय व्यवहार ही इसका उत्तरदायी है। चाहे पूर्व काल हो या आधुनिक, वर्ण व्यवस्था की बुराईयों को ढूंढा गया और आगे बढ़ाया गया, अच्छाइयों को नहीं। हर वर्ण का अपना विशेष महत्त्व था किन्तु सबको तदनुसार सम्मान नहीं दिया गया। डॉक्टर आयुर्विज्ञान की शिक्षा लेकर रोगों को ठीक करता है और लोगों की जान बचाता है तो उसे भगवान तुल्य समझा जाता है। क्षत्रिय अपनी वीरता के कारण शत्रुओं से रक्षा करता था तो क्या वह भगवान तुल्य नहीं था ? ब्राह्मण जो शिक्षा देकर ईश्वर के बताये मार्ग पर चलना सिखाता था और ईश्वर से मिलने की राह बताता था, वह  भगवान् का दूत नहीं था ? शूद्र जो सभी के जीवन की आवश्यकताएं पूरी करता था, भगवान् तुल्य नहीं था ? तो फिर ऊंच नीच की बात कहाँ से आयी ? निम्न जातियों में महर्षि बाल्मीकि, संत रैदास जैसे कितने ही महापुरुष पैदा हुए। वेदों में शुचिता के कार्य को अनिवार्य और पवित्र माना गया है तो स्वच्छता के कार्य को छोटा कैसे माना गया?
   
शिक्षा के उत्थान के अतिरिक्त औद्योगीकरण, आधुनिकीकरण, सरकारीकरण इत्यादि व्यवस्थाओं ने जाति व्यवस्था को समाप्त करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अब वैश्य के अतिरिक्त पिछड़ी जाति, क्षत्रिय और ब्राह्मण भी व्यापार करता है। औद्योगिक, सरकारी नौकरियों और सेना में किसी भी जाति का व्यक्ति नियुक्त होता है। किसी भी जाति का व्यक्ति डॉक्टर या वकील बन सकता है। अब समाज में व्यावसायिक विशेषज्ञता अधिक महत्वपूर्ण है, जाति का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया। किसी भी जाति के व्यक्ति द्वारा चलाये जा रहे उद्द्योग में किसी भी जाति का व्यक्ति कार्य करता है। व्यवसाय में तो जाति-पांत का भेद बहुत सीमा तक मिट चुकी है, किन्तु शादी विवाह तथा कई अन्य धार्मिक संस्कारों में अभी भी इसका बोलबाला है। इसके अतिरिक्त जातिगत विभेद वोट बैंक की राजीनीति के कारण अधिक है। जाति विभेद और छुआछूत समाप्त करने के लिए हमारे देश में प्रभावशाली कानून भी बने हैं। किन्तु बिडम्बना यह है जो नेता कानून बनाते हैं, वही अपने वोट बैंक के लिए जाति व्यवस्था को बढ़ावा भी देते हैं। वोट का गणित बैठाने के लिए जातिगत जनगणना करवाते हैं। आज की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में क्या सामाजिक समानता मिल गयी है ? क्या संपन्न और प्रभावशाली लोगों के समक्ष निर्बल वर्ग घुटनों पर नहीं है ?

जाति में बंटा था समाज, उसे तो कोसते हो!
उसी जाति, धर्म को फिर क्यों पोषते हो?
आपस में लड़ा भिड़ा कर काम निकालते,
बाद में दिखावे के लिए मन मसोसते हो!

समाज में वर्ण व्यवस्था और वर्ग व्यवस्था केवल भारत में नहीं अपितु पूरे विश्व में रही है। भारत में वर्ण व्यवस्था थी तो अमेरिका और यूरोपीय देशों में स्वामी और दास की व्यवस्था थी, उद्योगपति और श्रमिक की व्यवस्था थी। समाज में वर्ग व्यवस्था अपना रूप तो बदलती रहती है, किन्तु समाप्त नहीं होती। समाज में कार्य का विभाजन तो अभी भी है, किन्तु रूप बदल गया है। समाज में अब प्रबंधक, कर्मी, चिकित्सक, व्यापारी, उद्योगपति, श्रमिक, नेता, अभिनेता, कृषक, अधिवक्ता आदि के रूप में वर्गीकरण है, किन्तु  वर्गीकरण में अस्पृश्यता जैसी कुप्रथा नहीं है।   

सरकार भी अपने कार्यों को कई विभागों में विभक्त करती है, और प्रत्येक विभाग में पदों की भी श्रेणी भी बनाती है, जैसे सचिव, अधिकारी, बाबू, चपरासी आदि, जिनमें अधिकारों व सुविधाओं की असमानता रहती है। वैसे यह विभाजन योग्यता और निपुणता के आधार पर होता है, जन्म या जाति के आधार पर नहीं। शिक्षा और अनुभव के प्रसार होने से, कार्यों की विशेषज्ञता प्राप्त कर ली गयी है। किन्तु निजी क्षेत्र के कार्य अभी भी वंशानुगत ही होते हैं। अशिक्षित व अप्रशिक्षित बच्चे भी अपने कुटुंब के काम को पकड़ लेते हैं। क्या हमारा संविधान भी वही काम नहीं कर रहा है? आरक्षण प्राप्त व्यक्ति चाहे कितना भी संपन्न हो जाय, उसका वंशज उसी प्रकार लाभ लेता रहता है। जबकि कई बार अभावग्रस्त व्यक्ति भी जातिगत विभेद के कारण समुचित संरक्षण नहीं पाता। 

कोई भी संगठन बिना कार्य विभाजन के नहीं चल सकता तो इतनी बड़ी सृष्टि कैसे चल सकती थी। सामाजिक विभेद, वर्ण व्यवस्था के दुरुपयोग के कारण हुआ। पढ़े लिखे लोगों के कार्यों को बड़ा माना गया और श्रम के कार्यों को छोटा, इस कारण भारत में श्रम करने वालों का शोषण होता रहा और वे निर्धन बने रहे। पिछड़ी जातियों के अलावा अन्य जाति का व्यक्ति भी जो श्रम का कार्य करता है, निर्धन ही रहता है। श्रमिक हितों के अनेक कानून के बाद भी श्रमिकों का शोषण नहीं रूक पाता। विकसित देशों में परिश्रम का काम करने वालों की भी समुचित आय प्राप्त होती है, जिससे उनका जीवन स्तर अन्य लोगों के समान ही रहता है। 



धर्म की शिक्षा 

धर्म की शिक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, जितना कि धर्म। धर्म के कितने भी अच्छे सिद्धांत हों, जब तक उन्हें जन-साधारण तक नहीं पहुँचाया जाय, वह व्यर्थ है। धर्म मनुष्य में मानवीय मूल्यों को स्थापित करता है तो शिक्षा उन मूल्यों के ज्ञान के प्रसार के साथ उन्हें स्थापित करने की विधि सिखाती है। धर्म का उद्देश्य है - नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का विकास, संस्कृति का विकास, चरित्र का विकास; और यह सब धर्म की शिक्षा के बिना संभव नहीं है। समुचित शिक्षा के बिना ढोंगी लोग अपने ढोंग और अंधविस्वास को बढ़ावा देने लगते हैं। 

हिन्दुओं को उम्र की आरम्भिक अवस्था में धर्म की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं दी जाती है। उन्हें धर्म की शिक्षा और संस्कार परिवार से ही मिलते हैं। हिन्दू-धर्म के समुचित ज्ञान के बिना, धर्म का अर्थ मात्र पूजा पाठ मान लिया जाता है। भारत-वर्ष जैसे हिन्दू बाहुल्य राष्ट्र में हिन्दू-धर्म की गतिविधियों को सांप्रदायिक कहकर, धर्म की शिक्षा और प्रचार-प्रसार को हतोत्साहित किया जाता रहा है। हिन्दू धर्म के लिए सरकार का योगदान न्यून रहा और अल्पसंख्यकों को कई सुविधाएँ और अनुदान दिया जाता रहा। अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया, वहीं धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दू-धर्म से दूरी रखी गयी। एक ओर तो धर्म निरपेक्षता के नाम पर हिन्दू-धर्म के प्रति सरकार उदासीन रही, वहीं अल्पसंख्यकों को उनके धर्म की शिक्षा और प्रचार-प्रसार के लिए संरक्षण और प्रोत्साहन देती रही। हजारों मदरसे सरकारी अनुदान से चलते हैं, जहाँ इस्लाम की शिक्षा दी जाती है। भारत में दस हजार से भी अधिक मदरसे हैं, जो आलिया, मुंशी, मौलवी, आलिम, कामिल, फाजिल के पाठ्यक्रम चलाते हैं, जिनमें अरबी साहित्य और इस्लाम पढ़ाया जाता है। कई मदरसों में तो अन्य धर्मों के प्रति घृणा का भी पाठ पढ़ाया जाता है। 

हिन्दू-धर्म की मूलभूत शिक्षा के लिए संस्थानों का आभाव है। छुटपुट रूप से कहीं कहीं ज्योतिष, हस्तरेखा, वास्तु शास्त्र, वेद-पाठ, योग आदि की शिक्षा तो दी जाती है; किन्तु समग्र हिन्दू धर्म की शिक्षा के संस्थान न के बराबर हैं। हिन्दू धरम क्या है? उसका इतिहास  क्या है? भारत की संस्कृति में हिन्दू धर्म की भूमिका और महत्त्व, हमारे पूर्वज व महापुरुष, धर्म ग्रंथों का परिचय, ईश्वर की उपासना का महत्व आदि के विषय में बच्चों को अनौपचारिक रूप से परिवार द्वारा ही बताया जाता है। विद्यालयों द्वारा हिंदुत्व के विषय में कुछ पढ़ाने पर धर्म निरपेक्षता आड़े आ जाती है। भारत में कई संस्कृत विश्वविद्यालय हैं, जिनमें संस्कृत के अतिरिक्त ज्योतिष, कर्मकांड, वास्तु शास्त्र, वेदांत आदि की शिक्षा स्नातक स्तर पर दी जाती है। किन्तु वे छात्र भी हिंदुत्व के मूल सिद्धान्त की शिक्षा से वंचित रह जाते हैं क्योंकि धर्म शास्त्र का कोई विस्तृत पाठ्यक्रम नहीं है। आवश्यकता है आरम्भ से ही हिन्दू धर्म के विषय में क्रमिक शिक्षा देने की, जिससे कि बच्चे अपने धर्म को भली भांति समझ सकें और इससे बच्चों के नैतिक तथा चारित्रिक विकास के साथ सांस्कृतिक विकास को भी बल मिले। 

भारत के स्वतंत्र होने के बीसियों वर्ष बाद तक, हाई स्कूल तक की शिक्षा में रामायण व महाभारत के कुछ प्रसंग, कई पौराणिक कथाएं जो भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं, पाठ्यक्रम में सम्मिलित थे। किन्तु धर्म निरपेक्षता का आंदोलन इस स्तर तक चला कि भारत के प्राचीन साहित्य, पुराण आदि जो भारत की संस्कृति की धरोहर हैं, सब सांप्रदायिक हो गए। पाठ्यक्रमों में सम्मिलित पुराणों के वीर, दानी, चरित्रवान, भक्त, पितृ-सेवा में समर्पित बालकों व व्यक्तियों की कथाएं हटवा दी गयीं। धीरे धीरे उनपर सांप्रदायिक रंग चढ़ गया। कितने ही महापुरुषों की जीवनी पाठ्यक्रमों से नदारद हो गयीं, क्योंकि वे हिन्दू थे। ध्रुव, प्रह्लाद, नचिकेता, श्रवण, दानी दधीचि, एकलव्य आदि की कहानियां जो नैतिक और चारित्रिक शिक्षा प्रदान करती थीं, वो सब सांप्रदायिक हो गयीं। इन सबके चरित्र को पढ़कर बालकों के मन में उस भांति का बनने की जिज्ञासा उत्पन्न होती थी। रामायण और महाभारत की ज्ञानवर्धक तथा रोचकता से परिपूर्ण कथाओं को पाठ्यक्रमों से हटा दिया गया। कई अन्य पौराणिक कथाएं जो ज्ञानप्रद और चरित्र निर्माण की प्रेरणा से परिपूर्ण हैं, पाठ्यक्रमों से हटा दी गयीं। यह सब राजनितिक स्वार्थ और षड्यंत्र के कारण ही हुआ। धर्म की शिक्षा को न्याय नहीं मिलने से हमारी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है।

भारत में हिन्दू धर्म की शिक्षा संस्थाएं नाम मात्र की हैं। जो हैं भी उनमें न तो धर्म की शिक्षा सुचारु रूप से मिलती है न ही उन संस्थाओं द्वारा शिक्षितों को समुचित व्यवसाय मिलता है। आचार्य, वेदाचार्य, धर्माचार्य आदि की उपाधियाँ लेने वालों के रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण, विद्यार्थी इस ओर आकर्षित नहीं होते। कुछ ब्राह्मण परिवार अपनी परम्परा का निर्वाह करते हुए ज्योतिष या कर्म-कांड आदि की शिक्षा लेने के लिए अपने बच्चों को इन संस्थाओं में अवश्य भेजते हैं। धर्म की शिक्षा का विकास अवरुद्ध होने के कारण उन्हें विद्यालयों में शिक्षक बनने का भी अवसर नहीं मिल पाता। पंडिताई और पुरोहिती में भी व्यावसायिक रूप से शिक्षित लोगों की संख्या कम दिखती है। पहले तो ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ बालक अपने पिता से ही पंडिताई सीख लेता था और यजमानों का पुरोहित बन जाता था। किन्तु यह आवश्यक नहीं था कि वह धर्म के ज्ञान में प्रवीण हो। आजकल बड़े नगरों में अन्य जातियों के लोग भी कर्मकांड आदि सीख कर पंडिताई कर रहे हैं। बड़े नगरों में जातिगत भेद भाव पर्याप्त सीमा तक मिट चुका है। 

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् अंग्रेजी स्कूलों का बोलबाला रहा। विशेषतः निजी क्षेत्र में अंग्रेजी स्कूल खोले गए जो पूर्णतः व्यावसायिक हैं। इन स्कूलों ने समाज को धनी निर्धन दो वर्गों में बांटा। इनमें बच्चों को केवल वस्तुपरक शिक्षा दी जाती है और उन्हें धन कमाने की एक मशीन बनाया जाता है। ये निजी स्कूल 'समान शिक्षा' के संवैधानिक प्रावधान का भी सम्मान नहीं कर पाते।   

यत्र तत्र सर्वत्र खुल गयी, शिक्षा की दुकान।
कहीं चलता ढाबा, कहीं होटल आलीशान।
समझ में नहीं समाती, 'समानता की बात',
कैसी शिक्षा का अधिकार, देता है संविधान।

अंग्रेजी स्कूलों के बड़े भवन देखकर हमें लगता है कि ये शिक्षा के बड़े स्थान हैं, किन्तु यहाँ पढ़ कर शिक्षार्थियों को मानवीय समस्याओं का ज्ञान  नहीं हो पाता।  इन विद्यालयों में प्रवेश के लिए कुशाग्रता बाधा नहीं होती अपितु धन का अभाव होता है। 

धन देकर ज्ञान को, क्रय कर सके न कोय। 
विनय, पात्रता, गुरु भक्ति, पन्थ ज्ञान का होय।    

संतों की शिक्षा हेतु आदिशंकराचार्य द्वारा नियुक्त चार मठों की स्थापना की गयी है। हिंदू धर्म की एकजुटता और व्यवस्था के लिए ये चार मठ अति महत्वपूर्ण हैं। इन चार मठों में गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता है। इन मठों में आध्यात्मिक शिक्षा और दीक्षा दी जाती है। तथा इनमें से किसी भी मठ में संस्यास लेने पर वह दसनामी संप्रदाय में से किसी एक संप्रदाय पद्धति की साधना करता है। 
शृंगेरी मठ - भारत के दक्षिण में चिकमंगलूर में स्थित इस मठ के अंतर्गत 'यजुर्वेद' को रखा गया है, और इसका महा वाक्य है 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात 'मैं ब्रह्म हूँ'। 
गोवर्धन मठ - भारत के पूर्वी भाग में जगन्नाथपुरी में स्थित इस मठ के अंतर्गत 'ऋग्वेद' को रखा गया है, और इसका महा वाक्य है 'प्रज्ञानं ब्रह्म' अर्थात 'ज्ञान ही ब्रह्म है'। 
शारदा मठ - यह मठ पश्चिम दिशा में द्वारकाधाम में स्थित है।  इसके अंतर्गत 'सामवेद' को रखा गया है, तथा इसका महा वाक्य है 'तत्त्वमसि' अर्थात 'वह तुम ही हो'। 
ज्योतिर्मठ -उत्तर दिशा में बद्रीनाथ में स्थित है। इसके अंतर्गत अथर्वेद को रखा गया है, और इसका महा वाक्य है 'अयमात्मा ब्रह्म' अर्थात 'यह आत्मा ब्रह्म है'। 

ये मठ और संस्कृत विश्वविद्यालय मात्र उच्च स्तरीय शिक्षा ही देते हैं। आवश्यकता है ऐसे संस्थानों की जो बालपन से ही अन्य विषयों के साथ, उचित पाठ्यक्रम के अनुसार, धर्म की शिक्षा भी दें। आरम्भिक कक्षाओं में धर्म शास्त्र नहीं पढ़ाया जाता है और उच्च शिक्षा में विषय विशेष की ही शिक्षा रह जाती है। धर्म की शिक्षा मात्र वही छात्र प्राप्त कर पाते हैं, जो उसी उद्देश्य से पढ़ाई करते हैं। शेष अन्य छात्रों को धर्म का आरम्भिक ज्ञान भी नहीं दिया जाता।

हमारा संविधान भी भेदभाव से मुक्त नहीं है। अल्पसंख्यकों को अपने स्वायत्त शिक्षा संस्थान चलाने की अनुमति देता है किन्तु हिन्दुओं को बहुसंख्यक होने के कारण, यह अधिकार नहीं है। संविधान के अनुच्छेद २८ और ३० को देखें तो यही बात समझ में आती है।

अनुच्छेद २८: कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता
(1) राज्य-निधि से पूर्णतः पोषित किसी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।  
(२) खंड (1) की कोई बात ऐसी शिक्षा संस्था को लागू नहीं होगी जिसका प्रशासन राज्य करता है किंतु जो किसी ऐसे विन्यास या न्यास के अधीन स्थापित हुई है जिसके अनुसार उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है।
(3) राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य-निधि से सहायता पाने वाली शिक्षा संस्था में उपस्थित होने वाले किसी व्यक्ति को ऐसी संस्था में दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा में भाग लेने के लिए या ऐसी संस्था में या उससे संलग्न स्थान में की जाने वाली धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के लिए तब तक बाध्य नहीं किया जाएगा जब तक कि उस व्यक्ति ने, या यदि वह अवयस्क है तो उसके संरक्षक ने, इसके लिए अपनी सहमति नहीं दे दी है।

अनुच्छेद ३० के अनुसार - 1) धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक-वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।  .... 
2) शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक-वर्ग के प्रबंध में है।

यह अनुच्छेद अल्पसंख्यकों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और अधिकार का समर्थन करता है, किन्तु अनुच्छेद ३० के अंतर्गत हिन्दू-धर्म के साथ भेद भाव स्पष्ट दिखता है। यह अनुच्छेद भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए है, परन्तु वास्तविकता यह है कि इसके द्वारा अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षिक संस्थान स्थापित करना और धर्म की शिक्षा देने की स्वतंत्रता मिलती है। इन संस्थानों पर निजी नियंत्रण होता है, सरकार इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती। जहाँ अल्पसंख्यक संस्थान पूर्ण स्वतन्त्रता का आनंद लेते हैं, वहीं हिंदू संस्थानों को सरकारी हस्तक्षेप का सामना करना पड़ता है, जो हिन्दुओं के विरुद्ध भेदभाव है। भारत के सभी नागरिकों के समान अधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रयत्न को भी ठेस लगता है और यह अनुच्छेद सांप्रदायिक असंतुलन को बढ़ावा देता है।
इसके अलावा, अनुच्छेद 30 की धारा 1 (ए) के अनुसार, पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण नीति को लागू करने की बाध्यता भी इन अल्पसंख्यक संस्थानों की नहीं है। 

अनुच्छेद 30 ने एक घातक उदाहरण स्थापित किया है। यह, अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थानों को ‘प्रशासन’ का पूर्ण अधिकार देता है। इसका अर्थ यह है कि सरकार एक अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान के शासी निकाय के गठन और प्रबंधन पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण लागू नहीं कर सकती है। यहाँ तक कि भ्रष्टाचार की स्थिति में भी सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती और प्रभार अपने हाथ में नहीं ले सकती है। जबकि बहुसंख्यक, जो कि भारत में मात्र हिन्दू ही है, की संस्थाओं में सरकार का पूर्ण हस्तक्षेप है। अनुच्छेद 30 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अल्पसंख्यकों के साथ असमान व्यवहार न हो किन्तु वास्तव में, यह गैर-अल्पसंख्यकों (बहुसंख्यक) को अपने संस्थानों को “स्थापित और प्रशासित करने” के अधिकार से वंचित करता है। संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, अनुच्छेद 30 देश को धर्म के आधार पर विभाजित करता है क्योंकि हिंदुओं द्वारा संचालित संस्थानों में सरकारी हस्तक्षेप होता है, जबकि अल्पसंख्यक संस्थान पूर्ण स्वायत्तता का आनंद लेते हैं। एक विश्लेषक ने यहाँ तक कहा है कि शिक्षण संस्थान में कुरान या बाइबिल तो पढ़ाया जा सकता है किन्तु वेद या गीता नहीं। देखा जाय तो भारतीय मुसलमानों के तार अरब देशों से जुड़े हैं, और बहुत सारी बातों में वे वहीं से निर्देश लेते हैं; उनके द्वारा संचालित मदरसों की शिक्षा प्रणाली भारत से नहीं अपितु अरब देशों से मेल खाती है तो फिर ये अल्पसंख्यक कैसे हुए? 

धर्म की शिक्षा में सरकारी भेदभाव नहीं होनी चाहिए। चाहे कोई भी धर्म हो, धर्म की शिक्षा का एक ही प्रारूप हो। यदि सरकार के अंतर्गत धर्म की शिक्षा हो तो सभी धर्मों की शिक्षा का प्रबंध सरकार करे; यदि शिक्षा का सञ्चालन साम्प्रदाय के हाथों में हो तो सभी धर्मों में यही हो। सरकार सभी धर्मों की शिक्षा का व्यय वहन करे। किसी धर्म को पूर्ण रूप से स्वतंत्र और किसी धर्म में सरकारी हस्तक्षेप जैसा भेदभाव नहीं हो। वैसे सभी संस्थाओं में सरकार का हस्तक्षेप होना चाहिए, जिससे कि किसी धर्म दवरा अन्य धर्मों के प्रति घृणा, विद्वेष या वैमनस्यता का पाठ पढ़ाने पर अंकुश रखा जा सके तथा धर्म के नाम पर शोषण और दुरूपयोग न हो सके। 


यदि सरकार हिंदुत्व की शिक्षा देने में संकोच करती है तो इसके लिए हिन्दू संगठनों को आगे आने की आवश्यकता है। हिन्दू धर्म व संस्कृति की सुरक्षा, विकास, संरक्षण और हिन्दुओं के सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु अपने विद्यालयों तथा पाठ्यक्रमों का निर्माण करना चाहिए। इसके सञ्चालन के लिए सरकार को धन की व्यवस्था करनी चाहिए। किन्तु इसमें यह भी ध्यान रखना होगा कि शिक्षा की व्यापकता पर प्रभाव न पड़े। इस प्रकार की शिक्षा से संकीर्ण मानसिकता और सांप्रदायिक भावना न उत्पन्न हो, जिससे कि इनके पृथक दुष्परिणाम भुगतने पड़ें। दूसरे, धर्म को आधार बनाकर धर्म-गुरुओं का उद्देश्य शोषण और सत्ता प्राप्ति न हो जाय।

धर्म की शिक्षा बालपन से ही मिलनी चाहिए, क्योंकि धर्म की शिक्षा ही मानवता को सही राह पर ले जाती है। धर्म के सही अनुसरण के बिना, मनुष्य जीवन का मोल नहीं समझ सकता। आज की शिक्षा भौतिकतावाद से सनी हुई है। अभी तक हिन्दू बच्चों को धर्म की शिक्षा उनके परिवार से ही मिलती है, जिस कारण इसमें विशेषज्ञता और एकरूपता का अभाव रहता है। जो बच्चे छात्रावास में रहकर पढ़ते हैं या जिनके माता पिता अपने कार्यवश घर से दूर रहते हैं, वे धर्म की शिक्षा व संस्कार से वंचित रह जाते हैं। धर्म की शिक्षा  की संस्थाएं होनी चाहिए जो शिक्षा के साथ धर्म का सही प्रचार प्रसार तो करे ही, साथ ही पूजा पाठ की एक निश्चित पद्धति प्रतिपादित करे।

ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किये जायँ जिन्हें स्कूल स्तर की शिक्षा में किसी रूप में धर्म को भी सम्मिलित किया जाय। विज्ञान विषयों के साथ धर्म की शिक्षा भी दी जाय और धर्म की शिक्षा ग्रहण करने वालों को विज्ञान की भी। मंदिरों में पूजा पाठ के लिए शिक्षित पुजारियों की नियुक्ति होनी चाहिए जिससे उन्हें आजीविका का साधन भी मिले। कर्मकाण्ड में पहले से लगे कम पढ़े लिखे ब्राह्मणों व पुजारियों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

धर्म शास्त्र में माध्यमिक स्तर का प्रमाणपत्र या डिप्लोमा, स्नातक और स्नातकोत्तर के समकक्ष की शिक्षा का प्रावधान होना चाहिए और शिक्षित विद्वानों के रोजगार की व्यवस्था होनी चाहिए। जिस प्रकार संस्कृत में मध्यमा, शास्त्री, आचार्य, विशारद आदि की उपाधि का प्रावधान है, उसी प्रकार धर्म शास्त्र के पृथक पाठ्यक्रम बनने चाहिए और पंडिताई, पुरोहिती व कर्मकांड के डिप्लोमा पाठ्यक्रम आरम्भ होना चाहिए। विश्वविद्यालयों से सम्बन्ध स्थापित करके या स्वतंत्र विद्यालयों द्वारा इस प्रकार के पाठ्यक्रम स्थापित किये जा सकते हैं। उन पाठ्यक्रमों में हिन्दू-धर्म क्या है?, धर्म का महत्व, हमारे देवी देवता, हमारे त्यौहार और पर्व, पूजा उपासना का महत्व व प्रकार तथा विधि, धर्म व मानवता, पूजा स्थल, स्वच्छता, प्रार्थना, ईश्वर और प्रमुख देवता, प्रमुख ग्रंथों का परिचय, चरित्र निर्माण, धर्म के प्रति हमारे कर्तव्य, हमारे तीर्थ स्थल, प्रकृति और धर्म, धर्म के तत्व, कर्मकांड, पुरोहिती, ज्योतिष, धार्मिक ग्रंथों की भूमिका, धर्म की रक्षा के उपाय, प्रमुख ग्रन्थ, हिन्दुओं के संस्कार और उनका महत्व, कुप्रथाएं, धर्म और विज्ञान, धर्म और समाज, मुख्य पौराणिक कथाएं, अन्य धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन, शोध के द्वारा साहित्य सृजन, धर्म में अनर्गल समावेशित बातों का अध्ययन और उनका निराकरण, धर्म और व्यक्ति, वेद, वेदांत, अध्यात्म, दर्शन, हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता, शोध साहित्य इत्यादि। 


हिन्दू-धर्म और विज्ञान 


किसी भी ज्ञान का मूल स्रोत वेद है। विज्ञान का भी बीज वेद ही है। वेदों का प्रादुर्भाव तब हुआ था, जब विश्व ज्ञानशून्य था। सृष्टि की रचना के साथ ही ईश्वर ने सभी कुछ दिया और वेदों के द्वारा उनके विषय में बताया। वेदों के ज्ञान और अधिक विकसित होने के पश्चात् शास्त्रों की रचना हुई, जिनमें  विज्ञान भी है। विज्ञान, ईश्वर द्वारा रचित उन वस्तुओं और जीवों के उत्पन्न होने और विकसित होने के कारण, व्यवहार तथा परस्पर संबंधों का अध्ययन है, तथा धर्म उन जीवों और वस्तुओं के कार्यों व व्यवहार को तर्क संगत रहने के लिए निर्देशित करता है। विज्ञान ईश्वर द्वारा रचित पदार्थो के तत्वों का अध्ययन करता है; और अध्यात्म, ईश्वर के तत्व का पता लगाने में जुटा है। विज्ञान तो अपने आप में ही धर्म है। किसी जीव या वस्तु की संरचना व व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन ही विज्ञान है। व्यवस्थित होने का तात्पर्य वही - धर्मानुकूल। कितना भी उन्नत हो जाय, बिना नियम के विज्ञान अनुकूल परिणाम नहीं दे सकता और धर्म का अनुपालन न हो तो विज्ञान विनाशकारी हो जायेगा। 

विज्ञान प्रभु का विधान नहीं, वरदान है एक।
जीवन को सुविध बनाने का निदान है एक।
जीव और तत्वों के गुणों का ईश्वर ही दाता,
विज्ञान विद्यमान तथ्यों का ज्ञान है एक।

हिन्दू धर्म में विज्ञान का समावेश आदिकाल से है। वेदों में विज्ञान की न केवल महत्ता को बताया गया है अपितु विज्ञान की शिक्षा भी है। कई स्थानों पर विज्ञान को आधार बनाया गया है। वायु, जल, अग्नि, सूर्य, मेघ आदि के विषय में वेदों में व्यापक ज्ञान है। चिकित्सा विज्ञान का ज्ञान आयुर्वेद में मिलता है। हमारे वेद पुराणों में रथ, नौका, विमान और आकाशवाणी आदि का वर्णन मिलता है। बहुत से कार्यों का निष्पादन चमत्कारिक ढंग से होने का वर्णन भी है। विज्ञान को हम जिस रूप में आज देख रहे हैं यह लाखों वर्ष के शोध का परिणाम है। और यह भी संभव है कि अतीत में इससे भी विकसित विज्ञान रहा हो जो प्रलय काल में लुप्त हो गया हो तथा पुनः नए सिरे से विकसित हुआ हो और यह चक्र कई बार दोहराया गया हो।

धर्म और विज्ञान को लेकर अक्सर विरोधाभाषी बातें सामने आती रहती हैं, तथा कहा जाता है कि धर्म और विज्ञान एक दूसरे के विरोधी हैं। विज्ञान और धर्म को लेकर सदियों से विवाद चला आ रहा है। आधुनिक जीवन जीने वाले बहुत से लोग धर्म को आडंबर समझते हैं। उनके अनुसार विज्ञान के कारण ही जीवन सुविधाजनक है, धार्मिक आस्था निरर्थक और एक आडम्बर है। वैज्ञानिक और धर्म गुरू एक दूसरे के विरोध में दिखाई देते हैं। धर्म तथा विज्ञान को एक दूसरे का प्रतिद्वंदी समझा जाता है। यह प्रतिद्वंदिता प्राचीन काल से ही चली आ रही हैं। देखा जाय तो दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। विज्ञान में हम शाखाएं और फल देखते हैं, बीज और जड़ नहीं दिखते, वो वेदों में हैं। विज्ञान के भौतिक होने के कारण, उसके परिणाम प्रत्यक्ष दिखते हैं; इसलिए हम उसपर अधिक विस्वास करते हैं। वहीं अध्यात्म अति सूक्ष्म और आत्मिक बोध है। विज्ञान और अध्यात्म दोनों का जनक वेद ही है।  

पूर्व काल में होते थे, मन्त्रों से चमत्कार। 
इस युग में है ढो रहा, विज्ञान ये सब भार।  
एक आत्मिक सुख देता, और दूजा सुविधा, 
धर्म, विज्ञान दोनों ही, जीवन के आधार। 
  
धर्म और विज्ञान का परस्पर तालमेल जितना भारत में देखने को मिलता है, उतना और कहीं नहीं। हमारे ऋषि-मुनियों ने युगों पूर्व विज्ञान को न केवल धर्म के साथ जोड़ा, अपितु लोगों को इसके व्यावहारिक ज्ञान के विषय में भी बताया। उनका मानना था कि यदि विज्ञान को सुव्यवस्थित ढंग से संवारकर मनुष्य के कल्याण में लगाया जाए तो यह धर्म बन जाता है। हालांकि वर्तमान में समाज का एक वर्ग विज्ञान को चमत्कार और धर्म को आडंबर समझने लगा है।  वैसे तो दोनों का स्वरूप और कार्य-क्षेत्र एक-दूसरे से भिन्न हैं, किन्तु इनके सम्बन्ध को नकारा नहीं जा सकता। कई धर्म तो अपनी रूढ़िवादी परम्पराओं का दिखावा करते हैं, किन्तु अपनी सुविधा के अनुसार वैज्ञानिक अनुसंधानों का प्रयोग भी करते हैं। पहले धर्म के कट्टरपंथी, वैज्ञानिक अनुसंधानों का विरोध करते थे, अब वे बढ़ चढ़ कर आधुनिक उपकरणों का प्रयोग कर रहे हैं।


धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। धर्म के बिना विज्ञान और विज्ञान के बिना धर्म अधूरा है। धर्म और विज्ञान एक-दूसरे से जुड़ने के बाद ही पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं। दोनों ही मनुष्य के लिए आवश्यक हैं। धर्म मनुष्य को भीतर से सुंदर बनाता है और विज्ञान बाहर से। दोनों का विवेकपूर्ण समन्वय मनुष्य के जीवन को सुंदर बना सकता है और मानवता का कल्याण कर सकता है। धर्म और विज्ञान का समन्वय आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य है। मनुष्य के लिए धर्म और विज्ञान दोनों ही अलग-अलग स्तर पर आवश्यक हैं। धर्म और विज्ञान एक-दूसरे को अधिक उपयोगी बनाते हैं। धर्म केवल मानव कल्याण के लिए है जब कि विज्ञान कल्याण भी करता है और विनाश भी। विनाश से रोकने के लिए धर्म की आवश्यकता पड़ ही जाएगी। 

विज्ञान और धर्म दोनों ही मानव जीवन के सञ्चालन में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। जिस प्रकार हमारे ऋषि, मुनि कंदराओं और गुफाओं में एकांत में रहकर, ब्रह्म की खोज में लगे रहे और मनुष्य को साधना और अनुशासन के द्वारा ब्रह्म तक पहुँचने की मार्ग बताया; वहीं वैज्ञानिकों ने भांति भांति के अनुसन्धान करके मनुष्य की जीवन-यात्रा के उपकरण बनाकर, इस यात्रा का सुगम बनाया। किन्तु आज वैज्ञानिक अविष्कारों के कारण मानव जीवन में जो सुविधाएँ मिल रही हैं, मनुष्य उसी में खोकर, ईश्वर और धर्म दोनों को भूलता जा रहा है। आज भौतिकवाद ने हमारी शांति छीन लिया है। यह इसलिए हो रहा है कि हम जीवन के वास्तविक मूल्यों को पहचान नहीं रहे और कुछ उपकरणों के अधीन होकर अपने को धन्य समझ रहे हैं।


विज्ञान भौतिक ज्ञान है और धर्म - आध्यात्मिक ज्ञान। बिना धर्म के विज्ञान निरंकुश हो जाता है तो बिना विज्ञान के धर्म अंधविस्वास बन जाता है। विज्ञान ने कई रूढ़िवादी परम्पराओं का अंत किया है। विज्ञान ने विकास नहीं किया होता तो आज भी बुढ़िया चन्द्रमा पर चरखा कात रही होती और सूर्य, पृथ्वी का चक्कर काट रहा होता। बिमारियों को दैविक प्रकोप के अतिरिक्त कुछ नहीं समझा जाता। विज्ञान ने यह भ्रम तोड़कर रोगाणुओं और विषाणुओं के विषय में बताया। धरती, चन्द्रमा और कई अन्य ग्रहों के विषय में धर्म की मान्यताएं कुछ और थीं जो मनुष्य के मस्तिष्क में भांति भांति की भ्रांतियां उत्पन्न कर रखी थीं, जिसे विज्ञान ने दूर किया। जादू, टोना, भूत, प्रेत आदि के भ्रम से विज्ञान ने निकाला। लोगों में विज्ञान का ज्ञान कम होने के कारण धर्म के कई अंधविश्वास और रूढ़िवादिता आज भी प्रचलित हैं। देखा जाय तो विज्ञान में भी अन्धविश्वास है। सभी को विज्ञान का ज्ञान तो होता नहीं, बहुत सी बातों पर उन्हें विश्वास ही करना पड़ता है। डॉक्टर रोग को बढ़ा चढ़ाकर बताये या किसी रोग को कुछ और बताये तो रोगी को विश्वास करना पड़ता है। अन्धविश्वास तो ज्ञान के अभाव से उत्पन्न होता है तथा ज्ञान के साथ समाप्त हो सकता है। धर्म का अंधविश्वास आस्था पर टिका होता है, उसे वैज्ञानिक प्रमाण के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। वेदों के साथ विज्ञान की शिक्षा भी दी जाय जिससे की विज्ञान और धर्म का समन्वय स्थापित किया जा सके।

विज्ञान धर्म का ऐनक, हरे दृष्टि का दोष।   
दूर करे सब भ्रांतियाँ, धर्म रखे जो पोष।

कोई व्यक्ति बीमार है, यह एक सत्यता है। बीमारी रोगाणुओं के कारण है, सामान्य रूप से दृष्टिगत नहीं होता किन्तु विज्ञान इसका पता लगा लेता है। विज्ञान रोग के दवा की खोज भी करता है, किन्तु दवा खाना रोगी का धर्म है। विज्ञान का उपयोग कल्याण में भी किया जा सकता है और विनाश में भी। उसका उपयोग मानव कल्याण के लिए ही हो, यह धर्म है। विज्ञान का बहुत अधिक विकास, विनाश का भी कारण बन सकता है; किन्तु धर्म का नष्ट होना ही विनाशकारी है। यदि विज्ञान के साथ धर्म नहीं होगा तो विकास नहीं अपितु विनाश होगा। विज्ञान जीवन में गति देता है और धर्म दिशा। यदि हमारे पास गति है लेकिन दिशा नहीं तो निश्चित ही लक्ष्य से भटकना पड़ेगा। विज्ञान के बिना जीवन संभव है, किन्तु धर्म के बिना मनुष्य भटक जाएगा। 

मैं वेदों के ज्ञान के महत्व के विषय में बात कर रहा था, तभी विज्ञान के एक विद्यार्थी ने मुझसे प्रश्न कर दिया - फिर तो आज भी गुरुकुल व्यवस्था ही होनी चाहिए और वेद ही पढ़ाया जाना चाहिए। मैंने उससे पूछा, क्या गुरुकुल व्यवस्था आज नहीं है? जिसे बोर्डिंग स्कूल कहते हो वह क्या है? आई. आई. टी. या मेडिकल आदि संस्थाओं में रहकर, विद्यार्थी जो विद्या अर्जित करते हैं, वह गुरुकुल का रूप नहीं है? शोध करने वाले छात्र, छात्रावास में रहकर अपना शोध पूरा करते हैं, वह गुरुकुल नहीं है? आज के गुरुकुल और तब के गुरुकुल में विषय और सोच का अंतर है। विज्ञान, आयुर्विज्ञान अथवा इंजीनियरिंग आदि सभी का मूल वेदों में है। सभी विषय वेदों से ही संस्फुटित हुए हैं, विज्ञान भी। ये वैज्ञानिक अविष्कार एकाएक नहीँ आ गए। आज जो ज्ञान प्राप्त कर रहे हो, वह हजारों वर्ष की शोध और साधना के पश्चात् इस रूप में उपलब्ध है। वेद को मात्र मूल रूप में देखना संकीर्ण दृष्टिकोण का परिचायक है; उसे समग्र रूप से देखना होगा, उस पर खड़े ज्ञान के विशाल पर्वत भी देखो, जिसका शीर्ष आज का विज्ञान है। इस अंतराल में नए अविष्कारों के साथ, शिक्षा का व्यवसायीकरण हुआ और गुरुओं के सम्मान का लोप हुआ है। शिक्षा का व्यवसायीकरण हो जाने के कारण, विद्यालयों को दुकान समझा जाने लगा है। अब मशीनों का युग है, हो सकता है कुछ काल के पश्चात् विद्यालयों की भी आवश्यकता समाप्त हो जाय और विद्यार्थी इ-विद्या के रूप में घर पर ही शिक्षा ग्रहण करें। हम लोग आज जो भोजन कर रहे हैं, वह भी हजारों वर्ष के शोध का परिणाम है। कितने ही लोग विषाक्त पदार्थ खाकर प्राणों को त्याग दिया होगा, तब हम इस निश्चय पर पहुंचे होंगे कौन से पदार्थ भोज्य हैं और कौन से नहीं। तुम जिस रूप में आज विज्ञान के छात्र हो जनमते ही तो नहीं हो गए !


आरम्भ में विज्ञान के अविष्कारों का भरपूर विरोध किया गया। यहाँ तक कि धर्म गुरुओं के विरोध के कारण कई वैज्ञानिकों को दण्डित तक किया गया। किन्तु आज यह संसार विज्ञान का इतना आशक्त हो चुका है कि घातक अस्त्रों के अविष्कार और निर्माण का भी विरोध नहीं कर पा रहा। धर्म भी स्वयं को असहाय ही अनुभव कर रहा है। यह तो जान लेना चाहिए कि भौतिकवाद के साथ अगर अध्यात्म नहीं होगा तो विज्ञान का दुरूपयोग होगा और वह केवल प्रलय का कारण बनकर रह जाएगा। बिना धर्म के केवल विज्ञान के सहारे जीवन पार नहीं हो पायेगा। विज्ञान कोई आधुनिक ज्ञान नहीं है, और ना ही कोई आधुनिक विषय है। विज्ञान एक  भौतिक विषय है, जो भौतिकता के आधार पर सत्य की खोज करता है। हमारी इंद्रियो से जो हमें दिखाई देता है और जो अनुभव होता है, उसकी सत्यता और उसके काम करने के ढंग को जानना ही विज्ञान है। ज्ञान, विज्ञान से पूर्व भी है और पश्चात भी। 

धर्म परम सत्य है, विज्ञान तथ्य का शोध।  
धर्म से ही होता, कर्तव्य मार्ग का बोध। 

हमारे वेद, उपनिषद, दर्शन आदि जितने धर्मग्रंथ हैं, उनमें विज्ञान पिरोया हुआ है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वर्षों पहले विज्ञान को न केवल धर्म के साथ जोड़ा, बल्कि लोगों को इसके व्यावहारिक ज्ञान के बारे में भी बतलाया। उनका मानना था कि यदि विज्ञान को सुव्यवस्थित ढंग से संवारकर मनुष्य के कल्याण में लगाया जाए तो यह धर्म बन जाता है। विज्ञान आज भी कई गूढ़ विषयों पर किंकर्तव्यमूढ़ बना हुआ है, जबकि अध्यात्म उनके उत्तर ढूंढने में सतत प्रयासरत है। जहां एक ओर धर्म ईश्वर को मानता है और उसकी खोज में प्रयत्नशील है, वहीं विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व को ही नकार देता है। मनोविज्ञान विषय पर कार्य करने के पश्चात् भी मनुष्य को मन की अवस्थाओं के बारे में पूर्ण ज्ञान नहीं हो पाया है। 

विज्ञान के कारण मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव प्रभावित हुआ है। विज्ञान के कारण कुछ लोग धनाढ्य और साधन संपन्न हो जाते हैं, जिसके बल पर दूसरों पर अपना अधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं। कई बार उन साधनों को ग्रहण करने के लिए भ्रष्ट और त्रुटिपूर्ण तरीके अपनाते हैं। विज्ञान जीवन-परक सुविधाएँ तो देता है किन्तु विनाश के साधन भी पैदा करता है। वैज्ञानिक उपकरणों के कारण सुविधा मिलती है तो दुर्घटनाएं भी होती हैं। युद्ध के कितने ही घातक अस्त्रों का निर्माण हो चुका है, जिनके द्वारा कुछ ही समय में पूरे विश्व को नष्ट किया जा सकता है। फिर इन सबसे रक्षा के लिए धर्म को ही आना पड़ता है।

तत्वों को सही जान लेना ही ज्ञान है।
तथ्यों से चमत्कार लाना विज्ञान है।
विज्ञान है मनुष्य की अनुपम देन,
धर्म को देने वाला स्वयं भगवान है।

विज्ञान नैतिकता का क्षय करता है।
विज्ञान भ्रष्ट आचरण तय करता है।
भौतिक साधनों को उपलब्ध कराता,
विज्ञान विनाश का भी भय करता है।  

धर्म आध्यात्मिक शक्ति देता है।
धर्म ही परमेश्वर की भक्ति देता है।
धर्म ही कर्म और मर्म सिखलाता,
धर्म अनैतिकता से विरक्ति देता है।

विज्ञान सुविधा के साधन लाता है।
मानवीय गुणों को धर्म सिखाता है।
विज्ञान के बिना जीवन संभव है,
धर्म जीवन पर्यन्त संग निभाता है।

विज्ञान को चमत्कार और धर्म को आडंबर समझना भूल है। दोनों का स्वरूप  भिन्न है किन्तु इनका सम्बन्ध अटूट है। विज्ञान धर्म का ही एक अंग है। यदि कोई व्यक्ति बीमार हो जाय तो उसे ठीक करना मनुष्य का धर्म है; प्रकृति में अनेक जड़ी बूटियां व रसायन उपलब्ध हैं, जो चिकित्स्कीय गुण धर्म से परिपूर्ण हैं; उनसे औषधि बनाना विज्ञान का कार्य है। विज्ञान का कोई भी क्षेत्र वेदों से नहीं छूटा । विज्ञान कृत सुविधा के आगे मनुष्य धर्म को भूलता जा रहा है। कुल मिलाकर विज्ञान की भौतिक शक्ति के आगे आध्यात्मिक शक्ति क्षीण होती जा रही है और निरंतर धर्म का ह्रास हो रहा है। विज्ञान और धर्म का परस्पर समन्वय कैसे हो इसका व्यापक रूप से चिंतन और मंथन करने की आवश्यकता है। हमें धर्म में आडम्बर समाहित करने के प्रयासों को पहचानना है और उसे रोकना है। आप पढ़ रहे है What is Dharma
इस युग में हो गयीं, मशीनें जन  की  पूज्य 
भूल रहा धर्म को,  विज्ञान समक्ष मनुष्य 




हिन्दू-धर्म और विधि या कानून

न्याय भी धर्म का एक अंग है। मनुष्य को उसके व्यक्तिगत, समानता, सुरक्षा व  सामाजिक अधिकार मिले, न्याय का कर्तव्य है। सभी को स्वतः न्याय मिल जाय, यह संभव नहीं है। स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के कारण, मनुष्य के अपने कर्तव्यों की अवहेलना करना स्वाभाविक है। यहाँ तक कि वह अपनी स्वार्थ पूर्ति में आपराधिक प्रवृत्ति से भी बाज नहीं आता। वैसे धर्म की मान्यता है कि जो मनुष्य धर्म का अनुसरण करेगा वह पाप नहीं करेगा, क्योंकि ईश्वर का न्याय दोष-रहित है और वह पापी को अवश्य दण्डित करता है। किन्तु इस प्रकार की व्यवस्था प्रत्यक्ष नहीं दिखती; इस कारण बहुत से लोग, जो आध्यात्मिक ज्ञान नहीं रखते, वे पाप से नहीं डरते। इसके लिए धार्मिक व्यवस्था से पृथक सामाजिक व्यवस्था के द्वारा कानून बनाकर मनुष्य के आचरण को नियंत्रित किया जाता है। ये कानून शासन द्वारा बनाये जाते हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा के साथ प्रकृति और धर्म को भी संरक्षण मिले, इसके लिए नियम अथवा कानून बनाये जाते हैं। वेदों में न्याय को राजा का परम कर्तव्य बताया गया है। धर्म की रक्षा करना भी राजा का कार्य है।

धर्म का क्षेत्र कानून से बड़ा होता है। धार्मिक अवधारणाओं और परम्पराओं को ध्यान में रखकर कानून बनाया जाता है। धर्म, चरित्र निर्माण और समाज के कल्याण हेतु होता है; कानून सामाजिक सुरक्षा और अपराध रोकने के लिए होता है। धर्म प्राकृतिक और दैविक शक्ति लिए हुए है, कानून सामाजिक और प्रशासनिक शक्ति लिए होता है। धर्म के द्वारा दैविक भय और आध्यात्मिक शक्ति से पाप को रोका जाता है, तथा यह पाप और पुण्य के बोध से चलता है। कानून दण्ड का भय दिखाकर चलता है। ईश्वर के नियमों  विपरीत किये कार्य पाप हैं और कानून के विपरीत किये कार्य अपराध। कई ऐसे कृत्य हैं जो पाप तो हो सकते हैं, किन्तु अपराध नहीं। धर्म मान्यता से चलता है, जबकि कानून थोपा जाता है। धर्म की उत्पत्ति वेद-पुराणों से है, कानून की उत्पत्ति संविधान से है। साम्प्रदाय के अनुसार धार्मिक संस्कारों और परम्पराओं में भिन्नता होती है, कानून सबके लिए एक जैसा होता है।

विधि रोके अपराध को, धर्म रोकता पाप।
अपराधी पाये दंड, पापी प्रभु का शाप।

धर्म, पाप का भय दिखाकर और महापुरुषों के चारित्रिक अनुसरण के द्वारा चरित्र निर्माण करता है, जिससे कि पाप-कर्म अथवा अपराध न हों; और कानून दंड का भय दिखाकर अपराध रोकने का काम करता है। यदि दंड के भय से व्यक्ति अपराध करने से डरता है, तो वहीं चरित्रवान व्यक्ति अपराध करेगा ही नहीं। धर्म की कई क्रियाएं पाप के भय से पूरी होती हैं। धर्म स्वयं दंड नहीं देता, अपितु शासन द्वारा दिलवाता है। धर्म को विश्वास होता है पापयुक्त कार्य करने पर ईश्वर कभी न कभी अवश्य दण्डित करेगा। धर्म के लिए अपराध भी पाप ही है। पाप करने वाले को आत्मग्लानि और मानसिक यातना का सामना करना पड़ता है। पाप का बोध होने पर वह प्रायश्चित करता है। हिन्दू धर्म की मान्यता है कि यदि कोई पाप करेगा तो ईश्वर उसका दंड अवश्य देगा। 'भगवान् के घर देर हो सकती है, अंधेर नहीं'। कोई छल, कपट या बेईमानी से धन कमाकर कानून के दंड से बच भी जाय किन्तु उसे किसी अन्य रूप से; चाहे रोग देकर, मानसिक यातना देकर या किसी संकट में डालकर, ईश्वर अवश्य दण्डित करेगा। धर्म का क्षेत्र, कानून से बहुत वृहत है; किन्तु दंड देने की शक्ति धारण करने के कारण कई बार कानून शक्तिशाली प्रतीत होता है। कानून की व्यवस्था और दण्ड देने की शक्ति सरकार के हाथ में होती है और अपराध करने पर वह उसका प्रयोग अनिवार्य रूप से करती है। कानून का कार्य धर्म को भी संरक्षण देना है। पाप कर्मों की संहिता तो धर्म के पास होती है, किन्तु दण्ड-संहिता कानून के पास होती है। कानून की सीमा अपराध तक होती है, अपराधी को दंड देने के साथ ही समाप्त हो जाती है। धर्म का हृदय बहुत विशाल होता है और वह दूर तक देखता है। धर्म पापी को सुधारने का कार्य तथा सही मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन भी करता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार कई जघन्य अपराधी बड़े धर्मात्मा तक बन गए।


कर्मों का फल मिलेगा, हो सकती है देर।
भगवान के यहाँ कभी, होता नहीं अंधेर।

बच लो चाहे दंड से, करके तुम व्यभिचार।
पाओगे नित पाप का, आत्मा से दुत्कार।


बहुत से ऐसे कार्य हैं, जो कानून नहीं कर सकता। किसी अतिथि का स्वागत, शिष्टता का आचरण या समाज सेवा इत्यादि कानून के द्वारा नहीं करवाया जा सकता। इसी प्रकार किसी सैनिक के लिए अनिवार्य रूप से 'शहीद' होने का कानून तो नहीं बनाया जा सकता, किन्तु उसका धर्म है कि आवश्यकता पड़ने पर, राष्ट्र की रक्षा में अपने प्राणों की बलि दे दे। किन्तु कानून के महत्व को कदापि कम नहीं समझना चाहिए। कई छद्म धर्म-गुरुओं के ढोंग के कारण बहुत सी रूढ़िवादी कुप्रथाओं और गलत परम्पराओं ने जन्म लिया, जिन्हें कानून के द्वारा दूर किया गया। हिन्दू धर्म में अनेक ऐसी परम्पराएं पनप गयी थीं, जो असामाजिक थीं; जैसे कि बाल विवाह, बहु-विवाह, सती प्रथा, भ्रूण हत्या, जौहर, जादू-टोना, जातिगत-घृणा, अस्पृश्यता इत्यादि, जिन्हें कानून के द्वारा दूर किया गया। सदियों से चले आ रहे इन जघन्य पापों को रोकने में धर्म के संचालक असफल रहे थे।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४४ में यह उल्लेख किया गया है कि नागरिकों के लिए देश के पूरे क्षेत्र में एक समान अधिकार हो तथा समान नागरिक संहिता की रक्षा करना राज्य का प्रमुख कर्तव्य है। किन्तु मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत कानून को भी मान्यता देता है और हिन्दू पर्सनल लॉ के अंतर्गत, हिन्दू धर्म से सम्बंधित ये अधिनियम भी हैं: हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम; हिन्दू विवाह अधिनियम; हिन्दू अवयस्क एवं संरक्षक अधिनियम; हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम। 

भारतीय संविधान में धर्म का संरक्षण : भारतीय संविधान में सभी धर्मों के स्वतंत्रता, संरक्षण और प्रसार-प्रचार के विषय में कई प्रावधान हैं। 

संविधान के अनुच्छेद १४ के अनुसार - राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद १५(१) धार्मिक समानता का निर्देश देता है। अनुच्छेद १५(१) के अनुसार :
(१) राज्य, किसी नागरिक के विरुंद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा। 

संविधान का अनुच्छेद २५ धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है तो वहीँ अनुच्छेद २६ धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता प्रदान करता है। 
संविधान के अनुच्छेद २५ : अंतःकरण की और धर्म की अबाध रूंप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता -
(1) लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंत:करण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूंप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार होगा। 
(2) इस अनुच्छेद की कोई बात किसी ऐसी विद्यमान विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या राज्य को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी जो-
(क) धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निर्बन्धन करती है;
(ख) सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए या सार्वजनिक प्रकार की हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गों और अनुभागों के लिए खोलने का उपबंध करती है। 
स्पष्टीकरण 1-कृपाण धारण करना और लेकर चलना सिक्ख धर्म के मानने का अंग समझा जाएगा।स्पष्टीकरण 2-खंड (2) के उपखंड (ख) में हिंदुओं के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत सिक्ख, जैन या बौद्ध धर्म के मानने वाले व्यक्तियों के प्रति निर्देश है और हिंदुओं की धार्मिक संस्थाओं के प्रति निर्देश का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा। 

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यह अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता तो देता है किन्तु राज्य को किसी धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप के विषय में विधि बनाने पर कोई रोक नहीं है। दूसरा इस अनुच्छेद में हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं के प्रति निर्देश सिक्ख, जैन और बौद्ध पर भी लागू होगा किन्तु इस्लाम इसमें सम्मिलित नहीं है। 

अनुच्छेद २६ धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस अनुच्छेद के अनुसार लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए, किसी भी धार्मिक संप्रदाय को धार्मिक प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का, धर्म विषयक कार्यों के प्रबंध करने का, संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का, और संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का, अधिकार होगा।

अनुच्छेद २८ कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में कुछ अंकुश लगाता है और राज्य-निधि से पोषित किसी शिक्षा संस्था में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबन्ध लगाता है। यह राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य-निधि से सहायता पाने वाली शिक्षा संस्था में किसी व्यक्ति को धार्मिक शिक्षा में भाग लेने के लिए या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के लिए बाध्य करने से भी रोकता है। किन्तु अनुच्छेद ३० के अंतर्गत हिन्दू धर्म के साथ भेद करता है। यह अनुच्छेद, अल्पसंख्यकों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और अधिकार का समर्थन करता है और धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक-वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार देता है। अनुच्छेद ३० यह भी सुनिश्चित करता है कि शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक-वर्ग के प्रबंध में है। 

धर्मनिरपेक्ष संविधान का अनुच्छेद ३० अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थानों को ‘प्रशासन’ का पूर्ण अधिकार देता है, जिनमें सरकार किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकती और न ही प्रभार अपने हाथ में ले सकती है। जबकि बहुसंख्यक, जो कि भारत में मात्र हिन्दू ही है, की संस्थाओं में सरकार का पूर्ण हस्तक्षेप हो सकता है। इस अनुच्छेद के दुरुपयोग और इसकी आड़ में देश को इस्लामीकरण की ओर अग्रसारित करने के प्रयास को रोकने के विषय में कानून मौन प्रतीत होता है। यह भी विडम्बना ही है कि विपुल आय अर्जित करने वाले, कई हिन्दू मंदिरों या संस्थाओं को सरकार ने कानून बनाकर अपने हाथ में ले रखा है, किन्तु हिन्दू धर्म के लिए सरकार का कुछ करना संविधान के धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध हो जाता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा २९५ से २९८ के अनुसार :
१. किसी उपासना के स्थान को या व्यक्तियों के किसी वर्ग द्वारा पवित्र मानी गई किसी वस्तु को नष्ट, क्षतिग्रस्त या अपवित्र करना या अपमानित करना; २. धार्मिक उपासना या धार्मिक संस्कारों में वैध रूप से लगे हुए किसी समूह में विघ्न डालना; ३. किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से उसकी श्रवणगोचरता में कोई शब्द उच्चारित करना या कोई ध्वनि करना, या कोई संकेत करना, या कोई वस्तु रखना; दंडनीय अपराध हैं। 

भारतीय दंड संहिता की धारा ५०८ के अनुसार, जो कोई किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करता है या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करता है कि यदि वह उसके द्वारा कही बात को न करेगा,  दैवी अप्रसाद का भाजन हो जाएगा, या बना दिया जाएगा तो वह दंड का भागी होगा। इसी प्रकार जादू-टोना एवं अंधविश्वासों पर रोक लगाने के लिए कई राज्यों ने अलग कानून बनाये हैं। 

जनप्रतिनिधित्व कानून : उच्चतम न्यायलय ने कहा है कि कोई उम्मीदवार धर्म, भाषा, समुदाय और जाति का प्रयोग चुनाव में वोट माँगने के लिए नहीं करेगा, यदि ऐसा करता है तो ये जनप्रतिनिधित्व कानून के अंतर्गत भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि न केवल प्रत्याशी बल्कि उसके विरोधी उम्मीदवार के धर्म, भाषा, समुदाय और जाति का प्रयोग भी चुनाव में वोट माँगने के लिए नहीं किया जा सकेगा। चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है। धर्म के आधार पर वोट माँगना संविधान की भावना के विरुद्ध है। जनप्रतिनिधियों के क्रिया कलाप भी धर्मनिरपेक्ष आधार पर ही करने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रत्याशी और उसके विरोधी एजेंट की धर्म, जाति और भाषा का प्रयोग वोट माँगने के लिए कदापि नहीं किया जा सकता।

किन्तु वास्तविकता इससे हट कर है। विगत कई चुनावों में देखा गया है कि धर्म तो क्या अब जातिगत आधार पर भी  वोट मांगने में कोई परहेज नहीं। चुनाव के धर्मनिरपेक्ष कानून चाहे बने हों, परन्तु उन्हें लागू करने में सरकार अक्षम दिखती है। राजनितिक नेताओं द्वारा जातिगत विभेद बड़े स्तर पर पैदा कर दिया गया है। कई बार, राजनितिक पार्टियां धर्म के शीर्षस्थ मंच से धर्म के अनुयायियों को उक्त पार्टी को वोट देने की घोषणा करवाते देखे गए हैं। संविधान एक ओर तो धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, दूसरी ओर अल्पसंख्यक और जातिगत प्रावधान हैं। इन प्रावधानों को राजनीतिज्ञ अपने हितों के अनुसार प्रयोग करते रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता की बात केवल हिन्दू राजनीतिज्ञ ही करते हैं। अन्य धर्मों के अधिकतर नेताओं के लिए राजनीति से बढ़कर उनका धर्म है, क्योंकि उनका हित उसी में निहित है। 

भारतीय संविधान, बिना धर्म का विचार किए सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है। संविधान का अनुच्छेद 44 के अनुसार 'राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।'  जबकि समान नागरिक संहिता के अंतर्गत भारतीय समाज को एकीकृत करने के प्रयासों का राजनीतिज्ञों द्वारा ही विरोध जाता रहा। भारतीय मुसलमानों द्वारा इसे अल्पसंख्यक समूहों की सांस्कृतिक पहचान को क्षीण करने के प्रयत्न के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार भारत में दोहरी विधि प्रणाली विद्यमान है : एक धर्मनिरपेक्ष कानून जो सबके लिए है और भारतीय मुसलमानों के लिए पृथक शरीयत कानून। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना "मुस्लिम पर्सनल लॉ" यानी भारत में शरीयत अनुप्रयोग अधिनियम, सुरक्षा और प्रयोज्यता लागू करने के लिए किया गया।  

भारतीय कानूनों के अनुसार ईश्वर या मंदिर भी एक व्यक्ति है। हमारे कानून में दो प्रकार के व्यक्ति हैं; एक प्राकृतिक रूप से जन्मा और दूसरा विधान द्वारा निर्मित। वैधानिक व्यक्ति में कंपनी के अतिरिक्त ट्रस्ट, मंदिर, देवता, मस्जिद, चर्च इत्यादि भी सम्मिलित हैं। मंदिर में स्थापित देवी देवता की प्रतिमा, वैधानिक व्यक्ति के रूप में वह सभी कार्य कर सकती है, जो एक व्यक्ति वैधानिक रूप से कर सकता है। इसे संपत्ति रखने, देख-भाल करने, क्रय या विक्रय करने इत्यादि के सभी अधिकार उपलब्ध हैं। मंदिर में स्थापित देवता एक वैधानिक व्यक्ति है; और उसके कानूनी अधिकार और अभिलाषाएं उसके प्रतिनिधि या प्रबंधक के द्वारा अभिव्यक्त की जा सकती है। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि देवता भी एक वैधानिक व्यक्ति है और जिस प्रकार किसी अव्यस्क व्यक्ति का संरक्षक उसका अभिभावक होता है, उसी प्रकार मंदिर या उसमें स्थापित देवी देवता का संरक्षक उसका पुजारी या प्रबंधक हो सकता है। उत्तराखंड उच्च न्यायलय ने गंगा, यमुना जैसी नदियों को भी जीवित व्यक्ति के रूप में माना है। भारत में हिंदू देवी-देवताओं को पहली बार सन 1888 में ब्रिटिश काल में वैधानिक व्यक्ति माना गया था। हिंदू देवी-देवताओं को स्कूल, कॉलेज आदि चलाने और ट्रस्ट बनाने का भी कानूनी अधिकार मिला है। इसी प्रकार श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर या धार्मिक स्थलों पर बनी प्रतिमा को दान की गयी संपत्ति उस देवता की संपत्ति मानी जाती है, जिसे धार्मिक स्थल, ट्रस्ट या प्रबंधक उसे संभालता है। 

चूकि संविधान लिखने में हिन्दुओं का बाहुल्य था, यह मान लिया गया कि उनका वर्चस्व सदा बना रहेगा और हिन्दुओं के मर्म की उपेक्षा करने में किसी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुमत में होने के पश्चात् भी स्वतंत्रता के बाद से हिन्दू-धर्म को सतत संघर्ष करना पड़ रहा है। अंग्रेजी और पाश्चात्य सभ्यता का वर्चस्व बढ़ता रहा। दूसरे धर्म सशक्त होते रहे। क्योंकि उन्हें संवैधानिक सुरक्षा और प्राथमिकता दी गयी। हिन्दुओं को भी संवैधानिक समानता मिलनी चाहिए और संविधान के अनुच्छेद ४४ का पालन होना चाहिए। शासन द्वारा अल्पसंख्यकों को सुरक्षा तो मिले किन्तु बहुसंख्यकों का तिरष्कार न हो। केंद्रीय हिन्दू संगठन में कानूनी प्रकोष्ठ होना चाहिए जो धर्म से सम्बंधित कानून पर दृष्टि रखे और धर्म की रक्षा हेतु कानूनी मदद करे।



हिन्दू संगठन और संस्थाएं  

धर्म को एक संस्था के रूप में भी देखा जा सकता है क्योंकि इसका निर्माण समाज ने किया है और बहुत से अनुयायी एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य करते हैं। धार्मिक क्रियाएं समाज से चलती हैं। संगठन के बिना धार्मिक क्रियाएं न तो व्यवस्थित ढंग से चल सकती हैं न ही प्रबंध के सिद्धांत सुचारु रूप से लागू हो सकते हैं। धार्मिक संगठनों में भी समन्वय, निर्देशन, योजना, प्रचार, नियंत्रण, प्रोत्साहन आदि कार्यों की आवश्यकता होती है। संगठन से परस्पर सम्बन्ध और समुचित वातावरण बनता है। संगठन से मनोबल को बढ़ावा, विकास, रचनात्मक विचारधारा, व्यवस्था का निर्माण, साधनों का उपयोग, संचार, सामूहिक प्रभाव आदि का लाभ मिलता है। वैसे तो विभिन्न उद्देश्यों को लिए हुए हिन्दू धर्म से सम्बंधित हजारों संस्थाएं कार्यरत हैं, परन्तु आवश्यकता है एक ऐसी केंद्रीय संस्था की, जो हिन्दू धर्म और समाज को समग्र रूप से साथ लेकर चले। जिससे समय समय पर पूरे हिन्दू संप्रदाय को मार्गदर्शन मिलता रहे। 

हिन्दू धर्म में संगठनात्मक ढांचा और प्रबंध के सिद्धांत लचर ही दिखते हैं। यदि संगठनात्मक ढांचा दिखता है तो केवल क्षेत्रीय और संस्थागत स्तर पर, जो कि हजारों की संख्या में हैं। सभी हिन्दुओं को एक ध्वज के तले रखे, ऐसा कोई संगठन नहीं दिखता। हिन्दू धर्म में बहुत से संगठन, मठ, पीठ, अखाड़े, ट्रस्ट, संस्थाएं आदि हैं जो स्वतंत्र रूप से अपने बनाये नियमों के अनुसार काम करते हैं। कोई ऐसा केंद्रबिंदु नहीं दिखता जहाँ से सबके तार जुड़ते हों। धर्म के सिद्धांत तो सभी के एक हैं पर कार्य प्रणाली एक नहीं। हिन्दू-धर्म, आदि-धर्म  होने के कारण बहुत 
वृहत और विस्तृत भी है। यह धार्मिक ग्रंथों में दिए सिद्धांतों को लेकर आगे बढ़ता रहा। हिन्दू धर्म का कोई निश्चित संरक्षक नहीं रहा है, इस कारण से निर्देशों में एकाकता व एकरूपता नहीं है। धार्मिक ग्रन्थ और देवी देवता तो समान हैं, किन्तु पूजा पद्धति में भिन्नता मिलती है। कोई एक ऐसा संगठन अवश्य होना चाहिए जो सभी हिन्दू संस्थाओं को एक सूत्र में पिरोये रखे, ताकि विभिन्न इकाइयों में पारस्परिक समन्वय बना रहे। कई अन्य धर्मों में ऐसे संगठन देखने को मिलते हैं: जैसे - सिक्ख शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति, द वर्ल्ड फैलोशिप ऑफ बुद्धिस्ट्स, आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (पूरे विश्व में शाखाएं), इस्लामिक सम्मलेन संगठन (जिसे २४ देशों के राष्ट्राध्यक्षों का समर्थन प्राप्त है)। इन धार्मिक संगठनों की इकाईयां एक नियमावली से चलती हैं। एक सार्वभौमिक हिन्दू संगठन भी होना चाहिए जो विश्व में हिन्दुओं को संगठित रखने के अतिरिक्त उनकी हर प्रकार की समस्या का निदान करे, हिन्दू धर्म की शिक्षा का प्रबंध करे और धर्म का प्रचार प्रसार करे। 

अपने पृथक उद्देश्यों जैसे मंदिर निर्माण व प्रबंधन, सामाजिक कार्य, धार्मिक शिक्षा आदि के अंतर्गत बहुत सी संस्थाएं, ट्रस्ट, संगठन, अखाडा, आश्रम, मठ आदि हैं। कुछ प्रमुख संस्थाएं निम्न हैं : 

विश्व हिन्दू परिषद् : हिंदू समाज को मजबूत करने, हिंदू जीवन दर्शन और आध्यात्म की रक्षा, संवर्द्धन और प्रचार करने; तथा विदेशों में रहनेवाले हिंदुओं से तालमेल रखने, हिंदू और हिंदुत्व की रक्षा के लिए उन्हें संगठित करने और मदद करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दू संगठन की स्थापना हुई। आगे यह तय किया गया कि यह गैर-राजनीतिक संगठन होगा और राजनीतिक पार्टी का अधिकारी विश्व हिंदू परिषद का अधिकारी नहीं होगा। इसके अतिरिक्त परिषद् संस्कृत भाषा की शिक्षा व विकास, वेद विद्या का शोध व विकास, संस्कृत में विज्ञान की शिक्षा पर बल, संस्कृत की पुस्तकों का प्रकाशन, शिविर के द्वारा पुरोहिती प्रशिक्षण, दिल्ली में प्रति वर्ष अखिल भारतीय संस्कृत व्यव्हार शिविर का आयोजन, शोध पत्र 'अभिव्यक्ति' का प्रकाशन, संस्कृत कवि सम्मेलन, संस्कृत  सेवकों द्वारा संस्कृत की रक्षा की शपथ आदि कार्य भी करता है। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, भारत संस्कृत परिषद् इसकी शाखाएं हैं जो व्याकरण, छंद शास्त्र, साहित्य दर्शन, भाषा शिक्षण आदि का प्रशिक्षण देती हैं। विश्व हिन्दू परिषद् का नारा है : धर्मो रक्षति रक्षतः (अर्थात धर्म के रक्षा से ही हमारी रक्षा है) यह नारा परिषद के प्रतीक चिन्ह का अंग है। 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ : विश्व हिन्दू परिषद् को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अनुवांशिक अंग माना जाता है। संगठन से ही शक्ति है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उद्देश्य है हिन्दू समुदाय  को एकजुट रखना। संगठन भारतीय संस्कृति और चारित्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए तथा आदर्शों को स्थापित करने के  कार्य करता है और बहुसंख्यक हिंदू समुदाय को सुदृढ़ करने के लिए हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार करता है। अतः प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है की वह  हिन्दू समाज के प्रति समर्पित हो। संगठित हो के बड़े से बड़ा कार्य किया जा सकता है। राष्ट्र का भाग्योदय हिन्दू युवाओं के धर्म और राष्ट्र के प्रति समर्पण से ही होगा, अतः सभी हिन्दुओं के संगठित रहने की आवश्यकता है।राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उद्देश्य धार्मिक न होकर राष्ट्रीय है। 

हिन्दू जनजागृति समिति : एक हिंदूवादी संगठन है जो पूरे विश्व में हिन्दुओ के मानवाधिकारों के लिए कार्य करती है। इस संस्था का कथन है कि वह "सभी हिन्दुओं की सभी बाधाओं को तोड़कर उन्हें एकजुट करने के लिए एक साझा मंच के रूप में खड़ा है"।

रामकृष्ण मिशन : रामकृष्ण मिशन की स्थापना सन् १८९७ में स्वामी विवेकानंद ने की। इसका मुख्यालय कोलकाता के निकट बेल्लोर में है। इस मिशन की स्थापना के केंद्र में वेदांत दर्शन का प्रचार-प्रसार है। रामकृष्ण मिशन दूसरों की सेवा और परोपकार को मानता है। 

हिन्दू ऐक्य वेदी : भारत के केरल प्रदेश में सक्रिय एक हिन्दू संगठन है। इसका प्रमुख उद्देश्य हिन्दू संगठनों को एकत्र करना है। 
चिन्मय मिशन : यह एक आध्यात्मिक, शैक्षिक तथा धार्मिक संस्था है। इसका परिचालन सेंट्रल चिन्मय मिशन ट्रस्ट द्वारा होता है। इसकी स्थापना स्वामी चिन्मयानन्द के शिष्यों द्वारा स्वामी जी द्वारा किये जा रहे कार्यों को संगठित स्वरूप प्रदान करने के लिये की गयी थी। इस समय पूरे विश्व में इसके ३०० से अधिक केंद्र हैं। वेदांत प्रशिक्षण, शिक्षा, भजन आदि उद्देश्य है  

भारत सेवाश्रम संघ : एक आध्यात्मिक लोकहितैषी संगठन है। सर्वांगीण राष्ट्रीय उद्धार इसका मुख्य उद्देश्य और संपूर्ण मानवता की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति इसका सामान्य लक्ष्य है। संघ का उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय जीवन का पुनः संगठन और पुनर्निर्माण सार्वलौकिक आदर्शो और सनातन धर्म के सिद्धांतों के आधार पर करना है। 

इनके अतिरिक्त अनेक हिन्दू संगठन अपने विभिन्न उद्देश्यों को लिए कार्यरत हैं। 

कोई भी संगठन अनुशासन और नियमों के अनुपालन से चलता है। यदि सदस्यों को असमिति स्वतंत्रता दे दी जाय तो वह संगठन नहीं रह जाता। आवश्यकता से अधिक स्वतंत्रता उस जल की भांति है जो स्वतंत्र होने के कारण फैलकर नष्ट हो जाता है, यदि वही जल एक बर्तन की सीमा में रहे तो भविष्य में कभी भी काम आ सकता है। अधिक स्वतंत्र होने पर सभी सदस्य, सुविधानुसार स्वयं के नियम से कार्य करने लगते हैं; और संगठन के लिए पिछले किये गए कार्य निरर्थक हो जाते हैं। बहुत से लोग इन संस्थाओं से जुड़े हैं; किन्तु बहुत से लोग हैं जो किसी भी प्रकार से हिन्दू धर्म के विकास और संरक्षण में अपना योगदान नहीं देते। धर्म को धारण कर व्यक्ति का अस्तित्व एवं व्यक्तित्व दोंनों की प्राप्ति होती है। अतः प्रत्येक हिन्दू  का भी कर्तव्य हो जाता है कि धर्म के प्रचार और उसकी रक्षा के लिए अपना योगदान दे।  

संगठन बनाने में यह भी ध्यान रखना आवश्यक होगा कि संगठन बनाकर, संचालक अपने विचार थोपने और उद्देश्यों की पूर्ति में न लग जाएँ। संगठनों के संचालक अन्य लोगों को अपना अधीनस्थ न समझने लगें, जो हिन्दू धर्म और मानवीय गरिमा के विरुद्ध है। संगठन में कठोरता को स्थापित न करे। अनौपचारिक विचारों के आदान प्रदान का ह्रास न हो। लचीलेपन का अभाव न हो। लालफीताशाही और नौकरशाही न समाये और न ही जनतांत्रिक व सामाजिक शक्ति क्षीण हो। नियमों पर कठोरतापूर्वक बल दिए जाने के कारण सौहार्दपूर्ण मानवीय संबंधों का विकास नहीं हो पाता मुसलमानों में भी कई उदारवादी धर्मगुरुओं ने सुधार के आंदोलन चलाये किन्तु कट्टरवादी ताकतों ने अधिक आगे नहीं बढ़ने दिया। वे परंपरागत इस्लामिक शिक्षा पर ही जोर देते रहे। यद्यपि आधुनिक शिक्षा को ग्रहण  करने और कई कुरीतियों को दूर करने में कुछ सफलता मिली।



अन्य धर्म

हिन्दू धर्म समूह का मानना है कि पूरे विश्व में केवल एक ही धर्म है: शाश्वत सनातन हिन्दू धर्म। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से जो धर्म चला आ रहा है, उसी का नाम हिन्दू धर्म है। शेष सभी धर्म इसी से संस्फुटित पन्थ या साम्प्रदाय मात्र हैं। हिन्दुओं का प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ वेद है, इसके अतिरिक्त उपनिषद, अरण्यक, श्रीमद्भागवत गीता, रामायण, पुराण आदि भी हिन्दुओं धार्मिक ग्रन्थ हैं। अन्य सभी तथाकथित धर्मों के सिद्धांत किसी न किसी रूप में इन्हीं पर आधारित हैं। सभी धर्मों का उद्गम एशिया है। हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिक्ख धर्म का उद्गम स्थल तो भारत ही है। जैन, बौद्ध  सिक्ख धर्म हिन्दू धर्म से ही पृथक हुए हैं। पारसी धर्म  उद्गम स्थल फारस और यहूदी धर्म का येरुसलम है। यहूदी धर्म का स्रोत बौद्ध धर्म को बताया जाता है। आगे चलकर यहूदी धर्म की दो शाखाएं, ईसाई और इस्लाम के रूप में विकसित हुईं। 

कई धर्मों ने अपना प्रसार हिंसा के सहारे किया। पहले हिन्दुकुश पर्वतमाला, अफगानिस्तान से लेकर कम्बोडिया तक हिन्दू धर्म का ही वर्चस्व था। कम्बोडिया में अंकोरवाट मंदिर, जो भगवान विष्णु का मंदिर है, हिन्दुओं का सबसे बड़ा मंदिर है; जिसे बाद में बौद्धों ने अपने अधीन ले लिया और उसका नाम विष्णु बुद्धा मंदिर रख दिया। अंग्रेजों के शासनकाल में बहुत से हिन्दुओं का ईसाई धर्म में धर्मान्तरण कराया गया। इसी प्रकार पश्चिम से मुसलमानों ने भी भारत पर कई बार आक्रमण किया और हिन्दुओं को मृत्यु के घाट उतारा। भारत में मुस्लिम शासकों के अत्याचार ने हिन्दुओं के मन में इस्लाम के प्रति घोर घृणा भर दी। हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले मुसलमान शासकों की लम्बी सूची है। चंगेज खान, गजनवी, खिलजी, लोदी, बाबर, हुमायूँ, नादिरशाह, तैमूर लंग आदि ने कई लाख हिन्दू मरवा दिए; औरंगजेब ने अकेले लाखों हिंदू मरवाये। इनका धर्म ही लूट और हत्या था। इन्होंने भारतीय हिन्दुओं पर अत्याचार को ही धर्म समझ लिया। औरंगजेब ने बहुत से हिन्दुओं को या तो मुसलमान बना दिया या मरवा दिया। हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया कि आर्थिक बोझ से दबकर वे मुसलमान बनें। इन राजाओं की करतूतों के कारण आक्रमण, अधीनता, अत्याचार और लूट आदि; मुसलमानों के अभिन्न अंग हो गए। धर्मान्तरण के उपरांत भी अन्य धर्मों को अपनाने वाले हिन्दुओं की स्थिति अच्छी नहीं हो पायी।   

दुनिया में पैदा किया, जीव सभी भगवान। 

मिटाये उसकी कृति को, होता वो शैतान।  


उन मुस्लिम शासकों द्वारा औरतों पर अत्याचार ने कई कुरीतियों को जन्म दिया, जैसे जौहर प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह, घूँघट प्रथा आदि। अन्य धर्मों में समय समय पर सुधारवादी विचार आते रहे और परम्पराओं में परिवर्तन होते रहे, किन्तु मुस्लमान अपनी कट्टर परिधि में रहे स्त्री-पुरुष के बीच की खांईं को भी नहीं मिटा सके जेहाद के द्वारा हिंसक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला। बहुत से मुसलमानों ने हिन्दुओं के प्रति विद्वेष की भावना रखी और उन्हें काफिर कहा। मुसलमानों के इन कृत्यों ने हिन्दुओं के मन में उनके प्रति घृणा का भाव भर दिया।  

धर्म के प्रति जो कट्टरपन है

दिखावा और अक्खड़पन है।  

आस्था से अधिक स्वार्थ, ढोंग;  

सत्ता हथियाने का प्रयत्न है।  

धर्म श्रद्धा और विश्वास से चलता है, धर्म तो ईश्वर के प्रताप से चलता है। भय और आतंक से कोई भी धर्म कुछ समय तक चाहे चल जाए किन्तु सनातन नहीं हो सकता। रावण के भय के कारण, उसके अत्याचारों और उसके राज्य में पनपे कुरीतियों के विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठा सकता था। बड़े से बड़ा विद्वान भी उसकी अनुमति के बिना संस्कृति में सुधार की बात नहीं कर सकता था, परिणाम स्वरुप उन सभी का रावण के साथ ही अंत हो गया। विभीषण उन कुरीतियों को दूर करना चाहता था राम से शक्ति मिलते ही वह अपने कार्य में सफल हो गया। 

जैन धर्म : हिन्दू धर्म और जैन धर्म में बहुत सी समानताएं हैं। जैन धर्म के २४ तीर्थंकरों ने मनुष्य के रूप में जन्म लिया। जैन संप्रदाय, जैन धर्म की उत्पत्ति अपने प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव से मानते हैं, जिनका जन्म भी अयोध्या में हुआ। महावीर उनके चौबीसवें तीर्थंकर हैं। जिस प्रकार हिन्दुओं में मोक्ष के छः दर्शन बताये गए हैं जैन धर्म में कर्म से छुटकारा पाने के लिए और निर्वाण के लिए सही विश्वास, सही ज्ञान और सही आचरण बताते हैं, इन्हें त्रि-रत्न कहा जाता है। जैन धर्म को भी मुगलों की प्रसारवादी निति का शिकार होना पड़ा, और उनके कई मंदिर और मठ मुगल काल में तोड़े गए। जैन धर्म के सिद्धांत हिन्दू धर्म से मिलते जुलते हैं। जैन धर्म शांति-प्रिय और अहिंसावादी धर्म है, जो हिन्दुओं का भी सिद्धांत है। 


णमोकार का मंत्र, तन, मन, वाणी पर जीत। 
सत्य, अहिंसा है परम, जैन धर्म की रीति। ` 

पारसी धर्म :   महात्मा जरथुस्त्र ने एक ईश्वरवाद का संदेश देते हुए पारसी धर्म की नींव रखी। सिकंदर की फौजों ने तथा अरब के जिहादी आक्रमणकारियों ने प्राचीन फारस का लगभग सारा धार्मिक एवं सांस्कृतिक साहित्य नष्ट कर डाला था। सातवीं सदी तक फारसी साम्राज्य पर अरबों ने अधिकार जमा लिया था। अपने धर्म की रक्षा हेतु अनेक जरथोस्ती धर्मावलंबी समुद्र के रास्ते भागकर भारत के पश्चिमी तट पर शरण लिए। आज विश्वभर में मात्र दो लाख के लगभग जरथोस्ती हैं, जो अधिकांशतः भारत में हैं। पारसी धर्म रीति रिवाज हिन्दुओं से बहुत मेल खाते हैं। वेदों के सिद्धांत पारसी  धर्म में बहुतायत रूप से मिलते हैं। पारसियों में भी यज्ञ होता है, उपनयन संस्कार होता है, गौ की पूजा करते हैं, श्राद्ध करते हैं, दान करते हैं। पारसी भी आत्मा को अमर और शरीर को नश्वर मानते हैं तथा हिन्दुओं की भांति पुनर्जन्म में विश्वास  हैं। पारसियों में भी चार वर्ण हैं १ अथर्वा (पुरोहित), २ रथेस्तो (योद्धा) ३ वास्त्रियोफ़्शया (कृषक) ४ हुईती (मजदूर)।  जैसे हिन्दुओं में सत्विचार, सत्वचन और सत्कर्म करने को कहा गया है  पारसियों  हुमत (सुमत) होखत (सूक्त) और हवरस्त (सत्कर्म) 

किसी किसी को ही क्यों? तू उत्तम गुण  देता। 
प्रभु! किसी को सुख, किसी को दुःख दारुण देता। 

बौद्ध धर्म : बौद्ध, धर्म और कर्म के सिद्धान्तों को मानते हैं। त्रिपिटक बौद्ध धर्म का ग्रन्थ है। बौद्ध धर्म के सिद्धान्त उपनिषदों से ही निकले हैं। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्म सन ५६३ ईसा पूर्व लुम्बिनी नामक वन में हुआ। बोध-गया से ज्ञान प्राप्त कर वे सारनाथ गए और वहां उन्होंने पांच ब्राह्मणों को धर्मोपदेश दिया।  धीरे धीरे अनुयायी बढ़ते गए और मगध नरेश बिन्दुसार भी बुद्ध के अनुयायी बन गए। धर्म के प्रचार प्रसार हेतु उन्होंने कई स्थानों का भ्रमण किया। भगवान बुद्ध के अनुसार धर्म जीवन की पवित्रता बनाए रखना और तथ्य-ज्ञान में पूर्णता प्राप्त करना है, साथ ही निर्वाण प्राप्त करना तथा तृष्णा का त्याग करना है। बुद्ध ने दुःख का कारण तृष्णा को माना और बताया तृष्णा के समूल नाश से दुःख-निरोध संभव है। वे सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध थे, उन्होंने ने कहा कि लोगों का मुल्यांकन जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होना चाहिए, कर्म ही प्राणियों को अधम और उत्तम बनता है। किसी भी जाति का व्यक्ति सत्कर्म से मोक्ष का अधिकारी होगा। पहले पूर्व में म्यांमार से लेकर कम्बोडिया तक हिन्दू धर्म ही था। सुर्यवरणम वंश द्वारा बनवाया विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर कम्बोडिआ का अंकोरवाट मंदिर है। कालांतर में बौद्ध अनुयायियों का अधिकार होने के पश्चात्, इसका नाम विष्णु-बुद्धा मंदिर रख दिया गया।   


तृष्णा त्यागे सुख मिले, तृष्णा से दुःख होय। 
सत्कर्म मन हर्ष भरे, पाप कर्म से रोय।    

सिक्ख धर्म :  सिक्ख धर्म पंद्रहवीं सदी में हिन्दू धर्म की संत परंपरा से निकला एक पंथ है, जिसका आरम्भ गुरु नानक देव जी द्वारा किया गया। गुरुनानक देव का जन्म १४६९ ईसवी में हुआ था। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, जर्जर रूढ़ियों और पाखण्डों को दूर करते हुए; प्रेम, सेवा, परिश्रम, परोपकार और भाई-चारे की दृढ़ नीव पर सिख धर्म की स्थापना की। सिखों के दस सतगुरु माने जाते हैं, इनमें गुरु नानक देव सबसे पहले गुरु हैं। गुरु नानक देव के अतिरिक्त शेष नौ गुरु हैं - गुरु अंगददेव, गुरु अमरदास, गुरु रामदास, गुरु हरगोविंद, गुरु अर्जुनदेव, हरिराइ, गुरु हरकिशन, गुरु तेग बहादुर और दसवें गुरु गुरु गोविन्द सिंह। सिक्ख गुरु उदारवादी दृष्टिकोण रखते थे और सिक्ख धर्म में सभी धर्मों की अच्छाइयों को समाहित किया। उनका मुख्य उपदेश था कि ईश्वर एक है, उसी ने सबको बनाया है। सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं और ईश्वर के लिए सभी समान हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि ईश्वर सत्य है और मनुष्य को अच्छे कार्य करने चाहिए ताकि परमेश्वर के यहाँ उसे लज्जित नहीं होना पड़े। सिक्ख एक ही ईश्वर को मानते हैं जिसे 'एक ओंकार' कहते हैं। सिक्ख धर्म का धार्मिक ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब है, जिसमें गुरुओं के अतिरिक्त सूरदास, शेख फरीद, संत कबीर, रामानंद, परमानन्द, नामदेव, भीखन, रविदास  इत्यादि कई महान संतों की वाणी है। सिक्ख धर्म ने मानवतावादी 

इष्टिकोण अपनाया। सिक्ख गुरुओं ने तत्कालीन धर्म और समाज-व्यवस्था को एक नई दिशा दी। उन्होंने भक्ति, ज्ञान, उपासना, अध्यात्म एवं दर्शन को एक संकीर्ण क्षेत्र से निकालकर विस्तृत समाज तक  पहुँचाया। सिक्ख गुरुओं ने मनुष्य को उद्यम करते हुए जीवन जीने, कमाते हुए सुख प्राप्त करने और ध्यान करते हुए प्रभु की प्राप्ति करने की बात कही। उनका मानना था कि परिश्रम करनेवाला व्यक्ति सभी चिन्ताओं से मुक्त रहता है। गुरु नानक ने तो यहाँ तक कहा है कि जो व्यक्ति मेहनत करके कमाता है और उसमें कुछ दान-पुण्य करता है, वही सही मार्ग को पहचानता है। सिख गुरुओं द्वारा प्रारंभ की गई 'लंगर' प्रथा (निःशुल्क  भोजन) मानवता, समानता एवं उदारता की अद्भुत उदहारण है जो किसी अन्य धर्म में नहीं मिलता। 

सिक्ख धर्म के पालनहारी। धीरवीरश्रमीउपकारी।।   
गुरुग्रन्थ साहिब ने बखानी। गुरुसंतों की उत्तम बानी।।

सिक्ख धर्म, हिन्दू-सनातन धर्म का ही एक अंग है। इसमें सनातन धर्म का व्यापक प्रभाव मिलता है। सिक्ख, हिन्दुओं के कई देवी देवता की उपासना करते हैं और कई पर्व समान रूप से मनाते हैं। राम और कृष्ण सिक्खों के भी भगवान हैं।  सिक्खों ने अपने पराक्रम के बल हिन्दुओं की कई बार रक्षा की। सिक्खों द्वारा प्रदिपदित पर्व लोहड़ी, बैसाखी, आदि हिन्दू भी धूमधाम से मनाते हैं। सिक्खों द्वारा आरम्भ किये गए लोकगीत, लोकनृत्य भांगड़ा आदि मात्र पंजाब ही नहीं पूरे भारत में लोकप्रिय है। उत्साह, श्रम, सेवा, उत्सव और  हर्षोल्लास सिक्ख समुदाय के अभिन्न अंग हैं। 

श्रम, सेवा, जन-कल्याण, रखना सबसे प्रीति। 
उद्यम अरु दान में सुख, सिक्ख धर्म की नीति।   

यहूदी : यहूदी मान्यताओं के अनुसार ईश्वर एक है और उसके अवतार या स्वरूप नहीं है, लेकिन वो दूत से अपने संदेश भेजता है।   ईसाई और इस्लाम धर्म भी इन्हीं मान्यताओं पर आधारित है पर इस्लाम में ईश्वर के निराकार होने पर अधिक ज़ोर डाला गया है। इस्लाम और ईसाई धर्म यहूदी धर्म की ही दो शाखाएं हैं। हजरत अब्राहम, यहूदी, इस्लाम और ईसाई धर्म तीनों के पितामह माने जाते हैं। हजरत अब्राहम लगभग २००० ई.पू. अकीदियन साम्राज्य के ऊर प्रदेश में अपने इब्रानी कबीले के साथ रहा करते थे। वे प्रचलित बुतपरस्ती विरोधी थे, और ईश्वर की खोज में अपने कबीले के साथ एक लम्बी यात्रा आरम्भ किया। उनका कहना था ईश्वर पवित्र है और अपने भक्तों से यह माँग करता है कि पाप से बचकर पवित्र जीवन बिताएँ। ईश्वर एक न्यायी एवं निष्पक्ष न्यायकर्ता है जो कुकर्मियों को दंड और भले लोगों को पुरस्कार देता है। वह दयालु भी है और पश्चाताप करने पर क्षमा प्रदान करता है। भारत में यहूदी धर्म का कोई प्रभाव नहीं है। 

ईसाई धर्म : यह प्राचीन यहूदी से निकला एक धर्म है, जिसका श्रीगणेश प्रथम सदी में फलीस्तीन में हुआ। यह धर्म ईसा मसीह की शिक्षाओं पर आधारित है। विश्व में सर्वाधिक लोग ईसाई धर्म को मानते हैं। ईसाई धर्मग्रन्थ बाइबल में दो भाग हैं। पहला भाग पुराना नियम (ओल्ड टेस्टामेंट)  कहलाता है, जो कि यहूदियों के धर्मग्रंथ तनख़ का ही संस्करण है। दूसरा भाग नया नियम (न्यू टेस्टामेंट) कहलाता है जिसमे ईसा के उपदेश, चमत्कार और उनके शिष्यों के कामों का वर्णन है। ईसाई धर्म के अनुसार मूर्तिपूजा, हत्या, व्यभिचार व किसी को भी व्यर्थ आघात पहुंचाना पाप है। मूर्ति पूजा का विरोधी होने के कारण ईसाई धर्म हिन्दुओं के विरोध में रहा। वैसे गिरिजाघरों में जीसस के शूली पर चढ़ाने के प्रतीक के रूप में क्रॉस लटका होता है। अंग्रेजों के शासन काल में ईसाई धर्म का भारत में आगमन और प्रसार हुआ। गरीब हिन्दुओं लोभ देकर ईसाई बनाया गया। कान्वेंट स्कूल खोले गए और चर्चों की स्थापना की गयी जिनके द्वारा ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार किया गया। अब भी ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में प्रलोभन के द्वारा धर्म परिवर्तन करवाया जाता है। 
इस्लाम धर्म : इस्लाम धर्म का प्रतिपादन हजरत मुहम्मद के द्वारा किया गया, जिनका जन्म २० अप्रैल ५७१ ई. में हुआ था। इस्लाम का धार्मिक ग्रन्थ कुरान है, जिसमें मुहम्मद साहब को अल्लाह द्वारा भेजे गए सन्देश संकलित हैं। कुरान अरबी भाषा में रचा गया है। इस्लाम केवल एक ही ईश्वर यानि अल्लाह को मानता है। सभी मनुष्य उसी की सन्तान है। अल्लाह ही समय-समय पर अपने पैगम्बरों को पृथ्वी पर भेजता है । इस्लाम के अनुसार मनुष्य को अल्लाह की इच्छा के समक्ष अपने आपको पूर्णतया अर्पित कर देना चाहिए । इस्लाम मानव मात्र की समानता में विश्वास करता है जिसके अनुसार एक ही ईश्वर की सन्तान होने के कारण एक मनुष्य तथा दूसरे मनुष्य के बीच कोई भेद नहीं है । इस धर्म की प्रमुख नैतिक शिक्षायें हैं: क्षमा-शीलता, ईमानदारी, दूसरों की भलाई के लिये कार्य करना, निर्धनों की सहायता करना और इसके लिये जकात देना, प्रतिशोध न लेना। 
क्षमा-शीलता, परकल्याण, और रखना ईमान, 
किसी से न बदला लेना, जरूरतमंद को दान। 
हर मुस्लिम को इस्लाम का, है यही सन्देश; 
दुनियां में सब एक ही अल्लाह की सन्तान।
 
इस्लाम और ईसाई धर्म, यहूदी धर्म से स्फुटित हुए हैं। आदम और हव्वा  उत्पत्ति, शैतान के रूप में सर्प का आना, उन्हें फल खाने का प्रलोभन देना तथा स्वर्ग से निकाला जाना - यह कथा यहूदी ग्रंथों से ली गयी है। फरिश्तों के सम्बन्ध में सब बातें यहूदियों से ली गयीं। इसके अतिरिक्त इस्लाम धर्म के कई विचार यहूदी ग्रंथों से लिए गए हैं। इस्लाम में अच्छाई और बुराई भगवान और शैतान के रूप में है, हिन्दुओं में देवता और दानव के रूप में। भारत में इस्लाम का आगमन सातवीं शताब्दी में हुआ।

विकिपीडिआ पर दिए इस्लाम के संस्थापक हज़रत मुहम्मद की जीवनी के अनुसार : उनका जन्म ईशवी ५७० में हुआ। मुहम्मद ने मक्का के पास जबल अल-नूर पर्वत पर गार ए-हिरा नाम की एक गुफा में तपस्या करना शुरू किया। उस गुफा में उनकी एक यात्रा के दौरान, वर्ष ६१० में परी जिब्रिल अलै. ने उनके सामने प्रकट किया और मुहम्मद को उन छंदों को पढ़ने का आदेश दिया जो कुरान में शामिल किए जाएंगे।  मदीन (मदीना के निवासी जो मूर्ति पूजा करते थे ), इस्लाम में परिवर्तित हो गए और मुस्लिम प्रवासियों को आश्रय खोजने में मदद मिली। तब मुहम्मद ने प्रवासियों और समर्थकों के बीच भाईचारे की स्थापना की और उन्होंने अली रजी. को अपने भाई के रूप में चुना। पूर्व इस्लामी अरब में, देवताओं या देवियों को व्यक्तिगत जनजातियों के संरक्षक के रूप में देखा जाता था, उनकी आत्मा पवित्र पेड़ों, पत्थरों, झरनों और कुओं से जुड़ी थी। साथ ही साथ वार्षिक तीर्थ-स्थल होने के कारण, मक्का में काबा मंदिर में जनजातीय संरक्षक देवताओं की ३६० मूर्तियां थीं। मुसलमानों का मक्का से युद्ध हुआ जिसमें मुहम्मद और उनके अनुयायियों की जीत हुई। बद्र की लड़ाई, उहुद की लड़ाई, खाई की लड़ाई, हुनैन की लड़ाई आदि के द्वारा इस्लाम का प्रसार किया गया।   

इस्लाम अवतारवाद और मूर्ति-पूजा का घोर विरोधी है।  इस्लाम अनुयायियों की अनेक परम्पराएं, हिन्दू परम्पराओं के ठीक विपरीत दिखाई देती हैं; इसमें दोनों के अपने तर्क हैं। वैसे दोनों के अपने तर्क हैं। जैसे - हिन्दू मूर्ति की पूजा करता है; इस्लाम बुत-परस्ती को गुनाह मानता है। हिन्दू पूर्व दिशा मुख करके पूजा करता है; मुसलमान पश्चिम। चाँद और सूरज की धार्मिक मान्यताओं में भेद। जीवन शैली और संस्कारों में भिन्नता। मुसलमान धोती नहीं पहनता। पैंट व पायजामा दोनों को ही स्वीकार्य हैं। दाढ़ी और मूंछ रखने में विभेद। हिन्दू धर्म का सिद्धांत शांति, अहिंसा और सभी धर्मों का सम्मान है; केवल आत्म-रक्षा के लिए धर्म-युद्ध है। इस्लाम का सिद्धांत इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए जेहाद करना है। वैसे जेहाद के इस सिद्धांत पर मुस्लिम विद्वान एक मत नहीं हैं। हिन्दुओं के धर्म-ग्रन्थ संस्कृत और हिन्दी भाषा में हैं और इस्लामिक धर्म ग्रन्थ अरबी, उर्दू और फारसी में। हिंदी और उर्दू भाषाओँ में लिपि और बाएं से दाएं लिखने के अतिरिक्त बहुत सी समानताएं भी हैं। मुसलमानों में बहु-विवाह की प्रथा है। प्राचीन काल में हिन्दुओं में भी बहु विवाह होते थे किन्तु इसमें सुधार करके हिन्दुओं में एक विवाह की प्रथा कर दी गयी। हिन्दू-धर्म उदारवादी है और इस्लाम मान्यताओं के प्रति कट्टरवादी। हिन्दू के जीवन का लक्ष्य मोक्ष है; मुसलमान का जन्नत, जहाँ विलासपूर्ण वस्तुएं और हूर हैं। हिन्दू पुनर्जन्म को मानता है। आत्मा अमर है और मृत्यु के पश्चात् दूसरे शरीर में प्रवेश कर पुनः जन्म लेती है; इस्लाम पुनर्जन्म को नहीं मानता। हिन्दू धर्म में मृत्यु के पश्चात् शव को जला दिया जाता है, जिससे पञ्च-तत्व से बना शरीर वापस अपने मूल में विलीन हो जाय; इस्लाम में मृत्यु के पश्चात् शव को कब्र में रखा जाता है, वहां से दूसरा जीवन प्रारम्भ होता है जिसे 'बजरख' कहते हैं। कब्र में आत्मा जीवित पड़ी रहती है जो क़यामत के दिन ईश्वर के सम्मुख होती है। कुरान के अनुसार जन्नत सातवें आसमान पर है, इत्यादि। इनके अतिरिक्त भी और कई भिन्नताएं हैं। 

हिन्दू बहुत से स्थानों पर उदार दिखता है; जैसे वह मुसलमानों की मजारों पर भी जाकर अर्चना करता है, धोती भी पहनता है और लुंगी भी। शव का दाह भी करता है, दफन भी। मंदिरों में देवताओं की पूजा करता है; अल्लाह को भी नमन करता है। 

भारत पर अंग्रेजों का अधिपत्य होने के बाद, हिन्दू-मुसलमानों ने परस्पर सामंजस्य स्थापित किया और उन्होंने मिलकर अंग्रेजों से संघर्ष किया। अंग्रेजों के विरुद्ध भारत के संघर्ष में मुस्लिम क्रान्तिकारियों, कवियों और लेखकों का योगदान प्रलेखित है। स्वतंत्रता के पश्चात मुसलमानों ने अपने उस संघर्ष का बंटवारा कर लिया और अपना हिस्सा पाकिस्तान के रूप में लेकर अलग हो गए। स्वतंत्रता के बाद मुसलमान, भारत में अल्पसंख्यक हो गए। बहुत से शिक्षित मुसलमानों ने हिन्दू-मुस्लिम में भाई चारा को बढ़ाने पर बल दिया। किन्तु अभी भी बहुत से ऐसे कट्टर मुसलमान हैं जो दूसरे धर्म के लोगों को काफिर समझते हैं। कई तो अपने राजनितिक स्वार्थ के कारण, अरब देशों तथा पाकिस्तान से सुर मिलाते हैं। दो टुकड़े होने पश्चात् भी पाकिस्तान, अपने यहाँ के मुसलमानों के दयनीय स्थिति की चिंता कम और भारत में हस्तक्षेप अधिक करता है। वैसे भारत की कला और संस्कृत में मुसलमानों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत में चित्रकारी, नक्काशी, संगीत, नृत्य, कढ़ाई, सिलाई आदि अनेक क्षेत्र हैं जिनमें मुसलमानों को महारथ हासिल थी। कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों के भड़काने के बाद भी अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के उच्चतम न्यायलय के निर्णय के पश्चात् अद्भुत सहिष्णुता और सौहार्द का परिचय दिया।    

गंगा-जमुनी तहजीब तो कहते हो।
अलग धार में फिर क्यों रहते हो?
दो नदियों के संगम की भांति मिल,
मुख्य धारा में क्यों नहीं बहते हो?

कुछ मुसलमानों ने जेहाद शब्द का बहुत दुरुपयोग किया। जेहाद का अर्थ इस्लाम की रक्षा के लिए संघर्ष करना होता है। अच्छा मुसलमान बनने के लिए आंतरिक और बाह्य संघर्ष करना होता है। मुस्लिम समुदाय पर अत्याचार किया जाए तो उसको रोकने का प्रयत्न करना और बलिदान देना जेहाद है। मुसलमान राजाओं ने इस्लाम धर्म के इस सिद्धांत दुरुपयोग किया और खूब रक्तपात किया; इस्लाम के प्रसार के लिए लाखों गैर-मुसलमानों को मृत्यु के घाट उतारा। किसी भी धर्म के मूल भूत सिद्धांत- 'मानवता' को कोई महत्त्व नहीं दिया गया। इस्लाम धर्म को न मानने वालों को काफिर कहा गया।  

उदारवादी मुस्लिम विद्वान, जेहाद की व्याख्या इस प्रकार करते हैंजेहाद स्वयं के भीतर विद्यमान सभी बुराईयों के विरुद्ध लड़ने का प्रयास और समाज में प्रकट होने वाली ऐसी बुराईयों के विरुद्ध लड़ने का प्रयास है। नस्लीय भेद-भाव के विरुद्ध लड़ना और औरतों के अधिकार और सम्मान  के लिए प्रयास करना, एक बेहतर इंसान बनने  का प्रयत्न करना और अपने क्रोध को वश में रखना। इस्लाम हमें बताता है कि मुसलमानों को पहले अपने स्वयं के भीतर की बुराइयों के खिलाफ जिहाद करना चाहिए, बुरी आदतों के खिलाफ, झूठ बोलने की आदत के खिलाफ, फितना और फसाद फैलाने की आदत के खिलाफ, जलन, द्वेष, नफरत के खिलाफ, इस जेहाद को स्वयं के खिलाफ संघर्ष कहा जाता है। अपनी मेहनत की कमाई से अनाथों और विधवाओं और गरीबों की सहायता करना भी एक जेहाद है। जेहाद को नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर उन्मुख करने की आवश्यकता है। 

किन्तु इस्लामिक कट्टरपंथ धर्म के सभी सिद्धांतों को ताक पर रख, मुसलमानों  को आतंकवाद की हद तक ले गया है। यह आतंकवाद विश्व के सभी धर्मों के लिए घातक बन गया और अन्य धर्म के अनुयायियों में इस्लाम के प्रति घृणा भर दिया है। कई मुसलमान मानते हैं, जेहाद का यह रूप एक अधर्म है और धर्म को पतन की ओर ले जाने वाला है। धर्म, भय और आतंक से नहीं चलता बल्कि आस्था और श्रद्धा से चलता है।  

सबको बनाया मानुषइक जैसा भगवान। 
लड़ते क्यों परस्पर फिर? हिन्दू-मुसलमान। 
सभी धर्मों का एक धर्म, दया दान उपकार।  
उसका कोई धर्म ना, करता अत्याचार।  

विभिन्न वेब-साइटों से प्राप्त सूचना के अनुसार, भारत के अधिकांश मुस्लिम लोगों के पूर्वज हिन्दू ही थे। सैकड़ों मुस्लिम जातियां हैं जो भय या लोभ कारण हिन्दू से धर्मान्तरित हुई हैं। कहते हैं, वर्तमान दक्षिण पूर्वी एशिया के अधिकांश मुस्लिमों के मूल पूर्वज हिंदू थे; पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रान्त के जाट मुस्लिम भी जो पुराने समय में जाट जाति से निकले हुए हैं। हिन्दू-धर्म के बहुत से निर्धन व्यक्ति प्रलोभन और भय के कारण अन्य धर्मों को स्वीकार कर लिए। हिन्दू-धर्म ने अपने यहाँ से जाने का मार्ग तो खुला रखा, किन्तु अन्य धर्मों से आने वालों के लिए प्रवेश द्वार बंद। 


सोसिअल मीडिया 

आजकल इलेक्ट्रॉनिक्स और इंटरनेट का युग है। धर्म के विषय में बहुत सी अप्रमाणित और भ्रामक बातें इंटरनेट की वेब साइटों पर डाल दी जाती हैं। कोई भी, कोई उटपटांग सामग्री  इंटरनेट पर डालने में संकोच नहीं करता। इंटरनेट पर कई आलेखों के द्वारा हिन्दू धर्म का परिहास तक होता है, हिन्दू धर्म को निर्बल बनाने  के उद्देश्य से विरोधी तत्वों द्वारा भांति भांति के मिथ्या और भ्रामक प्रचार किये जाते हैं। अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का सन्दर्भ देकर कुछ भी अनाप शनाप कह दिया जाता है। इस प्रकार की गतिविधियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। यह भी देखा जा रहा है कि हिन्दू सिद्धांतों व विचारों को बड़ी निपुणता से अन्य धर्मों द्वारा अपना बताकर इंटरनेट पर डाल दिया जा रहा है। हिन्दुओं की कई पौराणिक कथाओं और सिद्धांतों को कुछ संपादन करके उन धर्मों द्वारा अपना प्रदर्शित कर दिया जाता है। इस प्रकार हिन्दू धार्मिक साहित्य की चोरी भी हो रही है। अन्य धर्मों में तो देखा गया है कि तनिक भी उनके तथाकथित धर्म के विपरीत बात हो तो बवाल मचा दिया जाता है या कानूनी कार्यवाही की जाती है, किन्तु हिन्दू धर्म के विरुद्ध किये जा रहे दुष्प्रचारों को रोकने वाला कोई नहीं होता। हमारे हिन्दू संगठन इन दुष्प्रचारों को रोकने में अधिक सजग और सशक्त नहीं दिखते। इन संगठनों के पास इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया और कानून के विशेषज्ञों का अभाव दिखता है जो सोशल मीडिया पर भ्रामक और अनर्गल बातों की जांच करते रहें; और इनकी रोक थाम के आवश्यक उपाय करें। अभिव्यक्ति की आजादी किसी को असमीत अधिकार नहीं देता। संविधान जहाँ आजादी देता है वहीं अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध भी लगाता है। किसी को भी अपने विचार सीमाओं में रहकर ही प्रकट करने का अधिकार है।   
 
कई बार सोसिअल मीडिया का प्रयोग हिन्दू-धर्म की मानहानि और हिन्दू साहित्य की चोरी के लिए भी होता है। कहीं विष्णु के अवतार को हिन्दू-ग्रंथों में वर्णित अवतारों अतिरिक्त और भी अवतार बताये जाते हैं तो कहीं गौतम बुद्ध को राम और कृष्ण से पहले विष्णु के अवतार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हिन्दू-धर्म के विषय में कई अप्रासंगिक सामग्री और विचार वेब साइटों पर डाल दी जाती हैं। इन उटपटांग सामग्री को इंटरनेट पर डालने में कोई संकोच नहीं होता। कई आलेखों के द्वारा हिन्दू-धर्म का परिहास होता है। इस प्रकार की बातों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। आजकल तो यह भी देखा जा रहा है कि कई धर्म के अनुयायी, हिन्दू सिद्धांतों व विचारों को बड़ी निपुणता से अपने धर्म का जताकर इंटरनेट पर डाल दे रहे हैं। हिन्दुओं की कई पौराणिक कथाओं को कुछ संपादन करके अन्य धर्मों द्वारा अपना प्रदर्शित कर दिया जाता है। यूँ तो हिन्दू धर्म और उसकी कृतियां सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हैं तथापि हिन्दू धर्म के साहित्य को अपने नाम से प्रयोग करना सर्वथा गलत है। 

यहाँ तक कि इंटरनेट पर इतिहास को भी तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है। इंटरनेट की विभिन्न साइटों पर प्रकाशित आलेख पूर्णतः निष्पक्ष नहीं होते। ये बहुत कुछ लिखने वाले की मानसिकता पर भी निर्भर है कि वह क्या सोच रहा है और उसका उद्देश्य क्या है। इन आलेखों की सत्यता की जाँच करने वाला कोई नहीं है। कुछ लोग धन कमाने के उद्देश्य से लिखते हैं।  वे कुछ सनसनी बातें लिख देते हैं जिससे कि लोग उसकी ओर आकर्षित हों। जो कुछ इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया जाता है, उसे केवल इतिहास के छात्र ही पढ़ते हैं। अन्य लोग इंटरनेट से सूचनाएं जुटाते हैं। यदि इन आलेखों की जाँच नहीं की गयी तो समय बीतने के साथ, लोग उसी को सत्य मानने लगेंगे। यह सब हिन्दुओं के विरुद्ध एक षड्यंत्र के रूप में भी हो रहा है। नई पीढ़ी न तो धार्मिक ग्रन्थ पढ़ती है, न ही उन्हें नियमित शिक्षा के अंतर्गत धर्म का ज्ञान दिया जाता है। वह सोसिअल मीडिया और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को ही सर्वथा सत्य मान लेती है। भविष्य में चलकर यह हिन्दू साहित्य और संस्कृति के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इस प्रकार की कृतियों के प्रति सजग  सचेत रहना होगा। हिन्दू साहित्य की सुंदरता और इसके मानवीय तथा कल्याणकारी सन्देश अद्वितीय हैं।  

खंड २     

हिन्दू-धर्म की कुछ सूक्तियां और सुविचार

वेद और हिन्दू-धर्म के विभिन्न ग्रंथों से उद्धृत कुछ सूक्तियां, सुविचार और नीतिगत बातें यहाँ दोहों के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये सूक्तियां सम्पूर्ण मानव जाति की अमोल निधि हैं; अमिट और अमर हैं, जो जीवन पर्यन्त हमारा मार्ग दर्शन करती हैं।   

१ अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ: अर्थ अप्रिय किंतु परिणाम में हितकर हो ऐसी बात कहने और सुनने वाले दुर्लभ होते हैं।

प्रेम पूर्वक सब सुनें, चिकनी चुपड़ी बात 

अप्रिय सुनना है कठिन, चाहे हित हो साथ 

2. 'अतिथि देवो भव' अर्थ अतिथि देव स्वरूप होता है।

घर पर आये अतिथि का, करना तुम सत्कार 

ना जाने किस रूप में, मिल जाये करतार 

4. 'अहिंसा परमो धर्म:।' अर्थ अहिंसा परम धर्म है।

सभी जीवों की रक्षा, सबसे उत्तम कर्म।  

अहिंसा है मनुष्य का, जगत में परम धर्म।  

12. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। अर्थ जननी और जन्मभूमि और स्वर्ग से भी बड़ी होती है।

माँ और मातृभूमि दो, पृथ्वी पर हैं स्वर्ग।  

इनका कृत-कृत्य रहना, मनुज धर्म उत्कर्ष।     

7. असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय। अर्थ मुझे असत् से सत् की ओर ले जायें, अंधकार से प्रकार की ओर ले जायें।

अंधकार हरना सदा, करना नित्य प्रकाश।   

असत्य से दूर भगवन!, दिखा सत्य की राह।  

6. 'आचार परमो धर्मः।'  अर्थ आचार ही परम धर्म है।

आदमी का परम धर्म, है उत्तम आचार।  

मनुष्य का आचार ही, दर्शाता संस्कार।  

22. परोपकाराय सतां विभूतय:। अर्थ सज्जनों की विभूति (ऐश्वर्य) परोपकार के लिए है।

परोपकार के निमित्त, सज्जनों की विभूति। 

परमार्थ में दें सहज, स्वार्थ की आहूति।   

 ''ईशावास्यमिदं सर्वं'' अर्थ संपूर्ण जगत् के कण-कण में ईश्वर व्याप्त है।

विवेक बिना नहीं मिले, ढूंढे भी दिन रात।  

ईश्वर का अन्तः में, कण कण में है वास।   

स नः पर्षद् अतिद्विषः  ईश्वर हमें द्वेषों से पृथक कर दे।

ईश्वर मेरे मन में, भरे सद्भाव पूर। 

सप्रेम मैं सबसे मिलूं, द्वेषों से हो दूर। 

यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।।  जहां परमेश्वर की ज्योति है वहां सदा ही कल्याण है।

जहाँ ईश्वर की कृपा, वहां सदा कल्याण। 

हरि की इच्छा के बिना, चले वायु ना प्राण।  

 स एष एक एकवृदेक एव ।। वह ईश्वर एक और सचमुच एक ही है।

ईश्वर तो बस एक है, रचने वाला सृष्टि। 

वही धूप-प्रकाश करे, होय उसी से वृष्टि।  

*10) एको विश्वस्य भुवनस्य राजा ।।  वह सब लोकों का एक ही स्वामी है।

सब लोकों का राजा, त्रिभुवन स्वामी एक।  

सब कुछ करता है वही, सबकी सोचे नेक।  

 मा गृधः कस्यस्विद्धनम्  अर्थ 'किसी के भी धन का लोभ मत करो।'

धन पराया देखकर, ना करना तुम लोभ।  

मन में तृष्णा बैठकर, देगी अतिशः क्षोभ। 

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुख भागभवेत

प्रभु रखना सबको सुखी, सब हों स्वस्थ निरोग।   

दुखी ना होवे कोई, रम्य दिखे हर कोय।   

 मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्। र्थ माता पिता की भली प्रकार से सेवा करनी चाहिये।

माता पिता की सेवा, करना भली प्रकार।  

मिलेगी मन की शांति, बदले में उपकार। 

9. उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत अर्थ हे मनुष्य! उठो, जागो और श्रेष्ठ महापुरुषों को पाकर उनके द्वारा परब्रह्म परमेश्वर को जान लो।

उठो मनुष्य ग्रहण करो, श्रेष्ठ-जन सत्संग।  

ज्ञान उत्तम प्राप्त कर, सीखो जीवन ढंग। 

प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं। तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति। 

प्रथम आश्रम में विद्या, द्वितीय में ना धन। 

तृतीय में न यश अर्जित, चतुर्थ करे क्या जन?

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च। रुग्णस्य चौषधं मित्रं धर्मो मृतं मृतस्य च। 

विद्या, मित्र प्रवास की, घर में पत्नी मीत।  

रोगी का मित्र औषधि, मृत का धर्म पुनीत।    

जीवेम शरद: शतम्।  अर्थ हम सौ वर्ष तक देखने वाले और जीवित रहने वाले हों।

होय न्यूनतम सौ वर्ष, सभी जनों की आयु। 

रुचिकर भोजन सुलभ हो, शुद्ध मिले जलवायु। 


तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते।  अर्थ तेजस्वी पुरुषों की आयु नहीं देखी जाती है।

आयु न देखो मनुज की, देखो गुण अरु तेज। 

स्वर्ण पुराना हो मगर, रखते लोग सहेज।   

31. वसुधैव कुटुंबकम अर्थ सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है।

सम्पूर्ण धरा को समझ, सदा एक परिवार। 

जो भी संकट में मिले, करना तुम उपकार।  

28. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवताः अर्थ  जिस कुल में स्त्रियां सम्मानित होती हैं, उस कुल से देवगण प्रसन्न होते हैं।

जिस कुटुम्ब में हो सदा, नारी का सम्मान।  

देवी देवता आ स्वयं, होते विराजमान।  

30. लोभः पापस्य कारणम् अर्थ  लोभ पाप का कारण है।

अनेक पाप का कारण, जग में होता लोभ।  

व्यग्र रखता मनुष्य को, मन को देता क्षोभ।  

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महानरिपु:। (नीतिशतकम्)

अर्थ आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला उसी का घोर शत्रु है।

शत्रु महान मनुष्य का, आलस को तू मान।   

कर्म किये बिन सुख नहीं, शिला लेख तू जान।     

वाग्भूषणं भूषणम्। अर्थ वाणी रूपी भूषण (अलड़्कार) ही सदा बना रहता है, कभी नष्ट नहीं होता।

उत्तम वाणी जगत में, रत्नों की है खान। 

संतृप्त होता श्रोता, बन जाते सब काम।   

16. दीर्घसूत्री विनश्यति। अर्थ प्रत्येक कार्य में अनावश्यक विलंब करने वाला नष्ट होता है।

होय बिगाड़ा काम का, किया जो करके देर। 

उस वर्षा से लाभ क्या? सूख गया जब खेत। 

17. न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्ष्यते। अर्थ कम उम्र वाले व्यक्ति भी तप के कारण आदरणीय होते हैं।

न्यून उम्र का व्यक्ति भी, रखता उत्तम ज्ञान। 

पाता है संसार में, सदैव समुचित मान।                             

18. न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य। अर्थ मनुष्य कभी धन से तृत्प नहीं हो सकता।

धन से होता है नहीं, मनुष्य कदापि तृप्त। 

कराय धन की लालसा, पाप काम में लिप्त।  

19. नास्तिको वेदनिन्दकः।  अर्थ वेदों की निन्दा करने वाला नास्तिक है।

नास्तिक करता निंदा, वेद की कुछ न हानि। 

वेद सदियों से तटस्थ, धरे धर्म के प्रान।      

20. नास्ति मातृसमो गुरु।  अर्थ माता के समान कोई गुरु नहीं।

गुरु के बिना ज्ञान मिले, जग में संभव नाहिं।  

गुरु न कोई विद्यमान, जग में जननी मांहि।  

21. नास्ति विद्या समं चक्षु। अर्थ् संसार में ब्रह्मविद्या के समान कोई नेत्र नहीं है।

विद्या सम संसार में, ना है कोई नैन।   

ज्ञान भगाये उलझनें, जगमग मन की रैन।     

33. विद्या विहीनः पशुः अर्थ विद्याविहीन मनुष्य पशु के समान है।

मनुज पशु के समान है, विद्या धन से हीन।  

हरेक कार्य में सदा, बन के रहता दीन।  

34. विभूषणं मौनमपण्डितानाम्  अर्थ मूर्खों का मौन रहना उनके लिए भूषण (अलड़्ंकार) है।

मूर्ख तभी तक सुन्दर, जब तक राखे मौन।  

मुंह खोले ही बताये, परिचय - है वो कौन!  

37. शीलं परम भूषणम्।  अर्थ यह शील बड़ा भारी आभूषण है।

शील और शालीनता, मनुज के अलंकार।  

काम बने सर्वत्र ही, पाये वो सत्कार।  

50. 'अत्यादर: शंकनीय:।'  अर्थ अत्यधिक आदर किया जाना शड़्कनीय है।

शंका से भरा होता, असीम मृदु व्यवहार।  

चापलूस करता नहीं, प्रायोजन साकार।  

58. अनतिक्रमणीया नियतिरिति। अर्थ नियति अतिक्रमणीय होती है अर्थात् होनी नहीं टाला जा सकता।

नियति का जो लेख लिखा, कोय सके ना टाल। 

होनी अपने समय पर, होती है हर हाल।  

68. काले खलु समारब्धा: फलं बध्नन्ति नीतय:। अर्थ समय पर आरंभ की गयी नीतियां सफल होती हैं।

आरम्भ किये समय पर, होते कार्य सफल।  

ऋतु के गये बोने पर, उपजे न ठीक फसल।  

69. क: कं शक्तो रक्षितुं मृत्युकाले।  अर्थ मृत्यु समीप आ जाने पर कौन किसकी रक्षा कर सकता है।

कौन किसका रक्षक हो, आये मृत्यु समीप।  

पेट फटना उसका भी, चिंतित मुक्ता सीप। 

71. गरीयषी गुरो: आज्ञा। अर्थ गुरुजनों (बड़ों) की आज्ञा महान् होती है अत: प्रत्येक मनुष्य को उसका पालन करना चाहिए।

तात मातु और गुरु की, आज्ञा मानो नित्य। 

श्रेष्ठ बनाती है सदा, मनुष्य को यह कृत्य।   

72. गुर्वपि विरह दु:खमाशाबन्ध: साहयति। अर्थ  आशा का बन्धन विरह के कठोर दु:ख को भी सहन करा देता है।

सह लेता दुख विरह का, मनुष्य सभी कठोर। 

देय बंधन आशा का, सह पाने का जोर।    

76. चारित्र्येण विहीन आढ्योपि च दुगर्तो भवति। अर्थ चरित्रहीन धनवान् भी दुर्दशा को प्राप्त होता है।

चरित्रहीन होय अगर, कितना भी धनवान।  

पाता है वह अधोगति, धन होवे निष्काम। 

 

 छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्। अर्थ छाया के समान दुर्जनों और सज्जनों की मित्रता होती है।

जब तक पाय प्रकाश को, छाया चलती साथ।  

स्वार्थ के कारण धरे, खल सज्जन का हाथ। 

धैर्यधना हि साधव:। अर्थ सज्जन लोगों का धैर्य ही धन होता है।

झंझटों के आने से, घबराये न सज्जन।  

धैर्य को बनाता नित, सबसे बड़ा वह धन।  

87. न हि सर्व: सर्वं जानाति।  अर्थ सभी लोग सब कुछ नहीं जानते हैं।

सबको ही होता नहीं, सब बातों का ज्ञान। 

कोई जो ज्ञाता मिले, पूछने में न हानि।    

 बलवता सह को विरोध:।  अर्थ बलशाली के साथा क्या विरोध?

शक्तिशाली से विरोध, गले लगाना फांस।  

मुंह पर ही आकर पड़े, थूके जो आकाश।  

 बहुभाषिण: न श्रद्दधाति लोक:।  अर्थ अधिक बोलने वाले पर लोग श्रद्धा नहीं रखते।

मिले बड़ाई नाहिं कहुँ, बोले अति के बोल। 

श्रद्धा से वंचित रहे, खोले पट्टी पोल। 

सत्सड़्गति: कथन किं न करोति पुंसाम्। अर्थ सत्संगति मनुष्यों की कौन-सी भलाई नहीं करती।

ईश्वर के भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है न जीत सकता है।

सत्संग से होय सदा, मनुष्य का कल्याण। 

ईश्वर के भक्तों की, होती कभी न हानि।  

1) न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन ।। ऋ०१०/१५२/१

कोई मार नहीं सके, हरि का जो है मीत। 

प्रभु की कृपा से कोई, सके उसे न जीत। 

14) तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योः ।। अ० १०/८/४४* आत्मा को जानने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।

जो मनुष्य जगत में, आत्मा को ले जान। 

 मृत्यु से वो ना डरे, खुद को ले पहचान।  

 मा प्रगाम पथो वयम् ।। अ० १३/१/५९* सन्मार्ग से हम विचलित न हों।

धर्म सिखाता है हमें, पथ से ना हों भ्रष्ट।  

सन्मार्ग पर यदि चलें, दूर रहें सब कष्ट।  

 उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति ।। ऋ० १०/११७/१* दानी का दान घटता नहीं।

दानी का घटता नहीं, धन, देने से दान। 

उसकी झोली को स्वयं, भरता है भगवान।   

त्वं जोतिषा वि तमो ववर्थ ।*(ऋ० १/९१/२२) अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।

हे ईश्वर! अन्तः को, कर दे प्रकाशमान। 

फैला दे ज्योति ऐसा, मिटे सभी अज्ञान। 

 पितेव नः श्रृणुहि हूयमानः ।*(ऋ० १/१०४/९) पुकारे जाने पर पिता की भाँति हमारी टेर सुनो।

जब भी तुम्हें पुकारूँ, मेरे हे भगवान। 

मेरी टेर को सुनना, हरि हे! पिता समान।  

यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।*(अथर्व० ७/१८/२) जहाँ परमेश्वर की ज्योति है, वहाँ कल्याण ही है।

ईश्वर की ज्योति जहाँ, होता सब कल्याण। 

पथ में लगें पुष्प माहिं, कंटक या पाषाण।  

40) मा प्र गाम पथो वयम् ।*(ऋ० १०/५७/१) हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों ।

धर्म-पथ से पृथक न हों, हे प्रभु देना शक्ति। 

तनिक नहीं संकोच हो, करूँ तिहारी भक्ति। 

45) अघमस्त्वघकृते ।*(अथर्व० १०/१/५) पापी को दुःख ही मिलता है।

दुख पाता अति घोर है, जो करता है पाप।

धारण करके ही धरम, मिटता सब संताप।   

58) हवामहे त्वोपगन्तवा उ -(२०/९६/५)* हे प्रभु ! हम तेरे समीप पहुँचने के लिए पुकार रहे हैं।

भक्त तुझे पुकार रहे, आने खातिर पास। 

तू सभी का पालनहारा, पूरी करना आस।  


48) उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।*(ऋ० १०/१३७/१) हे विद्वानो ! गिरे हुओं को ऊपर उठाओ।

गिरे हुये को उठाओ, फिर से तुम विद्वान।

इसी लिए हरि ने दिया, विशेष तुमको ज्ञान।  

2) द्यावाभूमी जनयन् देव एकः -(१३/२/२६)* आकाश-भूमि को पैदा करने वाला देव एक ही है।

भू, आकाश का उद्भव, करने वाला एक। 

जग का स्वामी देव वो, लिखता सबके लेख।  

79) वि द्विषो वि मृधो जहि -(अथर्व० १९/१५/१)* हमारी द्वेषवृत्तियों और हिंसकवृत्तियों को नष्ट कर।

नष्ट करना तू हे प्रभु, जन की द्वेष प्रवृत्ति। 

हिंसा भाव मन न आय, उपजे रति की वृत्ति।  

81) मा त्वायतो जरितुः काममूनयोः -(अथर्व० २०/२१/३)* हे प्रभु ! तेरी चाह वाले मुझ भक्त के मनोरथ को अपूर्ण मत रख।

तुझे चाहते हृदय से, तेरे जो भी भक्त। 

उनके मनोरथ हे प्रभु! अपूर्ण कभी न रख।  

82) न स्तोतारं निदे करः -(अ० २०/२३/६)* मुझ स्तोता को निन्दा का पात्र मत कर।

तेरे लिए हे भगवन!, मुझ पे स्तुति मात्र। 

विनती - कभी ना मुझको, कर निंदा का पात्र।    

107) न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डिता ।।-(ऋ० १/८४/१९)* हे ईश्वर !तुम्हारे सिवाय सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।

तेरे बिन हे ईश्वर! जग में नाहीं कोय।  

कर ऐसा उपकार तू, जीवों को सुख होय।

परोपकाराय सतां विभूतय:।

परोपकार के निमित्त, जन्मे सज्जन संत।

सज्जनों के प्रताप से, होय पाप का अंत। 

मा पुरा जरसो मृथाः ।।-(अथर्व० ५/३०/१७) हे मनुष्य ! तू बुढ़ापे से पहले मत मर।

जी ले जगत में हे नर!, आनंद उमंग भर।   

बुढ़ापा से पहले ही, तू नहीं जाना मर।  

निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु ।।-(ऋ० ५/२/६) निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।

दशा निंदक की ऐसी, सबसे निन्दित होय।  

महिमा को जो बखाने, जग में पंडित सोय।  

मातृ देवो भव। पितृ देवो भव। आचार्य देवो भव। अतिथि देवो भव।

मातु, पिता, गुरु अरु अतिथि, देवता के समान।   

उनका जीवन स्वर्ग है, दें इन्हें सम्मान।  

परोपकारार्थमिंद शरीरं  - मानव शरीर परोपकार के लिए मिला है

शरीर मिला मनुष्य का, करने हेतु उपकार। 

स्वयं के लिए जो जिए, जीवन है धिक्कार।  

सहसा विंदधीत न क्रियां। अचानक से बिना सोचे समझे कोई काम नहीं करना चाहिए।

सोच समझ कर जो करे, होंय सफल सब काम।  

औचक करने से कभी, सुचारु ना परिणाम।    


संसर्गजा दोषगुणाः भवन्ति  संगती से ही दोष और गुण होते हैं।

संगति से हैं उपजते, मनुष्य में गुण दोष। 

क्रिया देखता और का, लेता है वो पोष।  


हितं मनोहारी च दुर्लभं वचः  भलाई के और मन को अच्छे लगनेवाले वचन कठिनाई से प्राप्त होते हैं।

मनोहारी, हितकारी, दुर्लभ होते वचन। 

बोले जो वाणी मधुर, श्रद्धा पाता नित जन।  

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। धर्म का पालन करने वालों की धर्म ही रक्षा करता है।

धर्म को यदि मारोगेतुमको देगा मार। 

धर्म के अनुपालन मेंसुख, समृद्धि का सार।  


अलसस्य कुतः विद्या अविद्यस्य कुतः धनम। अधनस्य कुतः मित्रम अमित्रस्य कुतः सुखम। 

आलसी को विद्या ना, अविद्व निर्धन मांहि।   

धन के बिना मित्र नहीं, मित्र बिना सुख नाहिं।   


विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाध्दनमाप्नोति धनाध्दर्मं ततः सुखम् ।।

विद्या विनम्रता प्रदान करती है ,विनम्रता से मनुष्य योग्यता प्राप्त करता है,अपनी योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से सुख मिलता है।

विद्या देती विनम्रता, विनय सुयोग्य बनाय 

योग्यता से धन मिले, जीवन में सुख लाय

संस्कृति संस्कृताश्रिता

संस्कृत भाषा जग में, संस्कृति का आधार। 

आदि काल से सजाये, ग्रंथों, मन्त्रों का सार। 


कृषितोनास्ति दुर्भिक्षं।  

किया परिश्रम किसी का, व्यर्थ कभी ना जाय। 

आज नहीं तो कल सही, उत्तम फल ही लाय। 


गतशोकं न कुर्वीत भविष्यं नैव चिन्तयेत। 

वर्तमानेशु कार्येशु वर्तयन्ति विचक्शनः। 

भविष्य की चिंता नहीं, बीते की ना शोक। 

वर्तमान जीते सदा, बुद्धिमान सब लोग।   

गीता

(२) रत्नं रत्नेन संगच्छते । ( रत्न , रत्न के साथ जाता है )

शोभा होती रत्न की, सदा रत्न के साथ।  

पहने नहीं मणि कोई, सस्ते धागे बांध।   

(३) गुणः खलु अनुरागस्य कारणं , न बलात्कारः । केवल गुण ही प्रेम होने का कारण है , बल प्रयोग नहीं )

कदापि न बल के चलते, गुण से उपजे प्यार।

फूल शूल एकहि डाल, बस फूलों का हार। 

(५) अपेयेषु तडागेषु बहुतरं उदकं भवति ।

( जिस तालाब का पानी पीने योग्य नहीं होता , उसमें बहुत जल भरा होता है । )

धन संचित किया अपार, दान बिना सब व्यर्थ। 

जल भरा तालाब बड़ा, पीने के ना अर्थ।  

(८) अति सर्वत्र वर्जयेत् ।  ( अति ( को करने ) से सब जगह बचना चाहिये । )

अति है वर्जित सर्वदा, कुपरिणाम ले आय।   

अधिक वृष्टि अनिष्ट करे, बाढ़ नदी में लाय।    

(११) अल्पविद्या भयङ्करी. ( अल्पविद्या भयंकर होती है । )

अल्पविद्या ग्रहण किये, घातक ही बन जाय।  

चक्रव्यूह में घुस गये, वापस निकल न पाय।  

(१२) कुपुत्रेण कुलं नष्टम्‌. ( कुपुत्र से कुल नष्ट हो जाता है । )

पैदा हुआ कुपुत्र यदि, होवे कुल का नाश। 

हरे पेड़ पर ज्यों चढ़ी, दुष्ट बेल-आकाश।  

(१६) मधुरेण समापयेत्‌. ( मिठास के साथ ( मीठे वचन या मीठा स्वाद ) समाप्त करना चाहिये । )

मधुरता से पूर्ण हो, अंत वार्तालाप।  

कथा होय समाप्त जब, बंटता नित्य प्रसाद।  

(१९) सत्यं शिवं सुन्दरम्‌  

( सत्य , कल्याणकारी और सुन्दर । ( किसी रचना/कृति या विचार को परखने की कसौटी ) )

विधाता सृजित कृति सभीसत्य, शुभ अरु सुन्दर। 

अन्तः-चक्षु से देखो, उसे मन में धरकर।     

(२०) सा विद्या या विमुक्तये. ( विद्या वह है जो बन्धन-मुक्त करती है । )

बंधनों से भांति अनेक, विद्या करती मुक्त। 

संकट से निकलने को, करे ज्ञान से युक्त।  

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्। न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् ।

सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये ।

सत्य बोलना चाहिए, हर मनुष्य को नित्य।  

वाणी मगर मधुर लगे, कदापि नहीं अप्रिय।  

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर...

फल की चिंता किये बिन, धरो कर्म पर ध्यान। 

जो समझेगा उचित वह, फल देगा भगवान। 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ - 2/22

ज्यूँ पहनते नूतन हम, तज जीर्ण परिधान।  

त्याग पुराने देह को, नवीन धरता प्राण।   


पास जो कुछ यहीं मिला, सब जायेगा छूट। 

साथ जायेगा पीया, सत्कर्मों के घूंट। 


त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। ...

काम, क्रोध व लोभ। यह तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात् अधोगति में ले जान...

काम, क्रोध व लोभ सभी, तीन नरक के द्वार। 

ले जाते अधोगति को, कर विवेक का नाश।   


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् 

जब जब होती मही पर, सत्य धर्म की हानि। 

धर्म स्थापित करने, प्रकट होय भगवान। 


अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता अच्छी तरह बोली गई वाणी अलग अलग प्रकार से मानव का कल्याण करती है
उत्तम वाणी बोलना, सज्जन की पहचान।
प्रिय वचन वक्ता की, करे विविध कल्याण।


लोभमूलानि पापानि । सभी पाप का मूल लोभ है
लोभ को जानो जग में, सब पापों का मूल। 
अंततोगत्वा चुभता, बनकर के ये शूल।  

श्रध्दा ज्ञानं ददाति । नम्रता मानं ददाति । योग्यता स्थानं ददाति ।
श्रद्धा देती ज्ञान और देय नम्रता मान।
योग्यता की महत्ता, दिलाये उच्च स्थान।


अपूर्वः कोऽपि कोशोड्यं विद्यते तव भारति ।
जितना अधिक खर्च होय, बढे  विद्या का कोष 


व्ययतो वृद्धि मायाति क्षयमायाति सञ्चयात् हे सरस्वती ! तेरा खज़ाना सचमुच अद्भुत है; जो खर्च करने से बढ़ता है, और जमा करने से कम होता है
तेरा देवि सरस्वती!, अतिशः कोष विचित्र।  
जितना चाहे व्यय करो, नहिं होता है रिक्त। 


व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम्
धनों में है विद्याधन, सबसे बड़ा प्रधान। 
और अधिक बढ़ता जाय, जितना भी दो दान।   


स्वभावो दुरतिक्रमः स्वभाव को बदलना सम्भव नहीं होता
बदला नहीं जा सकता, जैसा होय स्वभाव। 
क्षीर पिलाये सर्प को, गरल नहीं विलगाय।    

प्रीणाति यः सुचरितैः पितरौ स पुत्रः। जो अच्छे कृत्यों से मातापिता को खुश करता है वही पुत्र है 
अच्छे कृत्यों से रखे, माता पिता प्रसन्न। 
आदर्श पुत्र  है वही, सदाचार संपन्न। 


अन्तो नास्ति पिपासायाः       
परम आवश्यक सभी को, संतोष रखना मन।  
कष्ट देता बहुत भांति, तृष्णा का ना अंत। 


लोकरझ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः    प्रजा को सुखी रखना यही राजा का सनातन धर्म है
न्याय व पालन प्रजा का, है राजा का कर्म। 
सुखपूर्वक सभी रहें, यही सनातन धर्म। 

भार्या दैवकृतः सखा । भार्या दैव से किया हुआ साथी है । जीवन-भर जो साथ दे, पत्नी ऐसा मित्र। स्वयं विधाता तय किया, रखो बसाये चित्त। यद् धात्रा लिखितं ललाटफ़लके तन्मार्जितुं कः क्षमः । विधाता ने जो ललाट पर लिखा है उसे कौन मिथ्या कर सकता है ? कोई नहीं मिटा सके, लिखा माथ का लेख। खींची स्वयं ब्रह्मा की, दिव्य शिला पर रेख। बह्वाश्र्चर्या हि मेदनी । पृथ्वी अनेक आश्र्चर्यों से भरी हुई है । आश्चर्यों से पृथ्वी, भरी अनेक प्रकार। आकाश सा इसका भी, दुष्कर पाना पार। अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः । कोई भी पुरुष अयोग्य नहीं, पर उसे योग्य काम में जोडनेवाला पुरुष दुर्लभ है होता नहीं कोई जन, इस जग में निष्काम। ऐसे व्यक्ति दुर्लभ अति, उस लायक दें काम।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति । पात्रता होने से इन्सान धन प्राप्त करता है
प्रभु से पाने के लिए, होना पड़ता पात्र। 
नियति में जो है निमित्त, देता यद्यपि मात्र।   
चराति चरतो भगः । चलेनेवाले का भाग्य चलता है ।
चलने वाले के सदा, भाग्य चलता साथ। 
नियति भरोसे जो पड़ा,  मलता रहता हाथ। 

लक्ष्मीवन्तो न जानन्ति प्रायेण परवेदनाम्।  लक्ष्मीवान मनुष्य दूसरों की वेदना नहीं समज सकते । 
धनवान न समझे जग में, पीड़ धरे जो दीन।  
लील जाय बड़ी मछली, लघु सागर की मीन। 

मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति । मन व्याकुल हो तब आँख देखने के बावजूद देख नहीं सकती । ऑंखें देख नहीं सकें, व्याकुल मन जब होय। 
राह सही सूझे नहीं, भटक जाय हर कोय।    

विना गोरसं को रसो भोजनानाम् । बिना गोरस भोजन का स्वाद कहाँ ? गोरस बिना मिले नहीं, पौष्टिकता व स्वाद। बच्चों को अति प्रिय लगे, भात दूध के साथ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रम् । शास्त्र सबकी आँख है । शास्त्र होते हैं सदा, मनुज जाति की दृष्टि। दर्शाते जीवन डगर, करके पथ प्रदीप्त।
रूपेण किं गुणपराक्रमवर्जितेन। 
उस रूप का क्या लाभ, गुण न हो विद्यमान।  
सुन्दर फूल बबूल का, पूजा के ना काम।  
उद्योगसम्पन्नं समुपैति लक्ष्मीः 
उद्यमी के घर सदैव, लक्ष्मी करतीं वास। जातीं वहां यदा-कदा, जो भाग्य के आस।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवताः

जिस कुल में मिलता है, स्त्री को सम्मान। 

उस कुल बसते देवता, करें समृद्धि प्रदान।

अतिभक्ति चोरलक्षणम्‌ दर्शाती है अति-भक्ति, मन में बैठा चोर।

करनी तो कुछ और ही, नीयत है कुछ और।    

ओ३म् खं ब्रह्म ।।-(यजु० ४०/१७)
ओ३म् परमात्मा सर्वव्यापक है।
ॐ, अम्बर और ब्रह्म, व्याप्त हैं सर्वत्र। 
ज्ञान चक्षु को खोलना, पाने का है मन्त्र।  

(8) विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि।।-(ऋ०२/२३/२)
सम्पूर्ण विद्याओं का आदि मूल तू ही है।
सब विद्याओं का मूल, तू ही है भगवान। 
कोई जाने बिन तुझे, हो न सके विद्वान।  
गोस्तु मात्रा न विद्यते ।।-(यजु० २३/४८)
गौ का मूल्य नहीं है।
अनमोल गाय का मोल, पशु ना समझो लोग। 
तन उसका वैद का घर, कई भगाये रोग।    
विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि ।।-(अथर्व० २/१६/५)
प्रभो ! अपनी शक्ति से मेरी रक्षा करो।
हे प्रभो! जग में तेरी, करते जो भी भक्ति। 
उन सबकी रक्षा करो, देकर अपनी शक्ति। 
मिथो विघ्नाना उपयन्तु मृत्युम् ।।-(अथर्व० ६/३२/३)
परस्पर लड़ने वाले मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
लड़ते हैं जो परस्पर, पाते नाना विघ्न। कष्ट में जीवन बीते, मिले मृत्यु भी निम्न।
मा जीवेभ्यः प्रमदः ।।। अ०८/१/७*
प्राणियों की और से बेपरवाह मत हो।
प्राणियों के प्रति, हे प्रभु! होना न उदासीन। पल पल सबका पल रहा, तेरे नित्य अधीन।
जाया तप्यते कितवस्य हीना ।। ऋ० १०/३४/१०*
जुएबाज की स्त्री दीन हीन होकर दुःख पाती रहती है।

दुःख पाय जुआरी की, पत्नी हो लाचार।   
द्रौपदी का हाल बुरा, देख चुका संसार।   
उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।*(ऋ० १०/१३७/१)
हे विद्वानो ! गिरे हुओं को ऊपर उठाओ।
गिरे हुओं को उठाओ, कर्म जान विद्वान।   
इसीलिए प्रभु ने दिया, तुमको उत्तम ज्ञान।  
न स्तेयमद्मि ।*(अथर्व० १४/१/५७)
मैं चोरी का माल न खाऊँ।
उद्यम की शक्ति देना, हे भगवन! हर हाल। खाना ना कदापि पड़े, प्रभु चोरी का माल।  महस्ते सतो महिमा पनस्यते -(२०/५८/३)*
तुझ महान की महिमा का सर्वत्र गान हो रहा है
महानतम ब्रह्माण्ड में, तू ही है भगवान। नित्य तेरी महिमा का, होता रहता गान। सद्यः सर्वान् परिपश्यसि -(११/२/२५)*
तुरन्त तू सबको देख लेता है।
कितना भी छुप के रहे, कोई धरके भेष।  
दिव्य अपनी आँखों से, वह सबको लेता देख।   
प्राता रत्नं प्रातरिश्वा दधाति ।।-(ऋ० १/१२५/१)
प्रातः जागने वाला प्रभात बेला में ऐश्वर्य पाता है।
ऐश्वर्य पाता वही, उठे नित्य जो प्रात । दरिद्रता से हो घिरा, जागे रवि पश्चात। मा दुरेवा उत्तरं सुम्नमुन्नशन् ।।-(ऋ २/२३/८)
दुराचारी उत्तम सुख को मत प्राप्त करें।
दुराचारी पाय नहीं, उत्तम सुख आनंद। 
दे व्यथा बहु भांति उसे, घेरे मन का द्वन्द।  
सत्या मनसो मे अस्तु ।।-( ऋ० १०/१२८/४)
मेरे मन की भावनाएं सच्ची हों
मन को करना विमल प्रभु,! ज्यूँ कि स्वच्छ आकाश। दुर्भावना दूर बसें, रहे सत्य का वास। सनातनमेनमाहुरुताद्य स्यात् पुनर्णवः -(१०/८/२३)*
प्रभु सबसे पुरातन है, पर आज भी वह नया है।
सर्व सबसे पुरातन सृष्टि में, सबसे मगर नवीन वि द्विषो वि मृधो जहि -(अथर्व० १९/१५/१)*
हमारी द्वेषवृत्तियों और हिंसकवृत्तियों को नष्ट कर।
आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ।।-(यजु० १९/३८)
दुष्ट पुरुषों को दूर भगाओ।


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