Thursday, 31 March 2016

Panchhi ki shikayat


पंछी की शिकायत 

फ्लैट तो पुराना था ही, बहुत समय से मरम्मत भी नहीं हुआ था । दीवारें बहुत गन्दी हो चली थीं, एकाध जगह तो डिस्टेंपर की पपड़ी उखड़ने लगी थी। कोमल ने नागर साहब से, इस दिवाली से पहले, फ्लैट की रंगाई-पुताई के लिए जोर डाला । नागर जी के मन में भी यही घूम रहा था, अतः उन्होंने तुरंत हां कर दिया। 'आज ही जाता हूँ, सफेदी वाले से बात करता हूँ। '
तभी कोमल ने कहा, 'लेकिन सफेदी से पहले ये खिड़की बदलवा दो।'

नागर साहब का फ्लैट ऊपर का था, खिड़कियां प्राधिकरण की ही लगी हुई थीं। जब हवा तेज चलती तो उसका शीशा उखड़कर नीचे गिर जाता। हमेशा डर बना रहता, किसी को चोट न लग जाये। अब तक तीन बार ऐसा हो चुका था। प्राधिकरण की लगाई हुई खिड़कियों पर, नागर साहब को भरोसा नहीं था, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने अतिरिक्त ग्रिल लगवा दिया था। ग्रिल घना होने के कारण प्रकाश आने में बाधित हो रहा था, यह कोमल को अच्छा नहीं लगता। वह चाहती थी कि शयन कक्ष में सोते समय आकाश का स्पष्ट दृश्य समक्ष रहे। इस बार वह एल्युमीनियम के फ्रेम में, शीशे जड़े सरकने वाले पल्लों की खिड़की चाहती थी। उसने नागर साहब से खिड़कियां बदलवाकर अल्युमिनियम का लगवाने का आग्रह किया। 

उनके शयन कक्ष की खिड़की के रोशनदान में जो ग्रिल लगा था, उस पर कबूतर का एक जोड़ा आकर बैठ जाता। और वह ग्रिल पर गन्दगी फैलाता और कोमल को बार बार उसे साफ करना पड़ता। यह कोमल को बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। कभी कभी वह उड़ा भी देती, मगर वे ढीठ थे, फिर आकर बैठ जाते। कभी कभी तो लगता कि कबूतरों और कोमल के बीच, यह कोई खेल चल रहा हो।

नागर साहब और कोमल में सहमति बनी, घर की खिड़कियां बदल दी गयीं। उनके शयन कक्ष की भी खिड़की, जिसपर कबूतर बैठते थे बदल दी गयी और घर की रंगाई भी हो गयी। इस बार एल्युमीनियम के फ्रेम की खिड़की लगी, जिसमें शीशे के बड़े बड़े, सरकने वाले पल्ले लगे। प्रकाश आने में रूकावट न हो, इसलिए इस बार ग्रिल तो नहीं लगा, मगर नागर साहब सुरक्षा के प्रति सजग थे, उन्होंने खिड़की में कही कहीं स्टील की रॉड जड़वा दी ताकि कोई शीशा तोड़ कर फ्लैट में प्रवेश न कर सके। खिड़कियों के ऊपर बरसात के पानी से रूकावट के लिए प्लास्टिक शीट के शेड भी लगवा दिये। अब विस्तर पर लेटे, आसमान का अच्छा और विस्तृत नजारा दिखता। दिन में कभी लेटते तो कोमल और नागर साहब की नजर आसमान की ओर ही रहती।

जब तक काम चल रहा था, कबूतर का जोड़ा मकान खाली कर कहीं चला गया था और तैयार होते ही एक शहरी किरायेदार की भांति, जाने कहाँ से फिर आ टपका। अब तो वह कबूतर दम्पति बहुत प्रसन्न था। उन्हें बैठने के लिए एक बहुत ही उपयुक्त रॉड मिल गयी थी, ऊपर धूप, बारिश से बचने के लिए शेड। किसी बड़े शहर में पक्षी को और क्या चाहिए। अपनी दिनचर्या के काम करने के पश्चात वे वहीँ आकर विश्राम करते। उधर जहाँ कबूतर दम्पति को अच्छा आशियाना मिला, कोमल को नागर साहब पर शिकंजा कसने का सुन्दर अवसर।
 'मैंने कहा था न, केवल शीशा रहने दो। अब फिर से ये गन्दा करेंगे। '

उनकी बीट कभी कभी खिड़की के शीशे पर गिरती और शीशा गन्दा हो जाता। कोमल खिड़की की ओर देखती और नागर साहब को दो सुना देती। 'इसे रोज रोज कौन साफ़ करेगा।'

नागर साहब प्रकृति प्रेमी थे। उन्हें खिड़की से आसमान देखना, कभी बारिश हो तो उसे, और उस पक्षी के जोड़े को भी देखना बहुत अच्छा लगता। वे कहते, 'अरे, वह तो बाहर है, कभी कभी किसी को बुलवा कर साफ करवा लेंगे। नहीं तो मैं ही साफ कर दूंगा, उसमें है क्या!'

नागर साहब सेवानिवृत्त हैं।  कभी दिन के समय वे बिस्तर पर लेटते तो नभ के नजारे में खो जाते, दूर उड़ते पंछी, कहीं कहीं बादलों के टुकड़े, कभी कोई उड़ती पतंग, तो कभी जहाज और बाहर के मौसम का स्पष्ट अवलोकन। कोमल उन्हें सोच में खोया देखती तो बोल पड़ती, 'हरदम क्या सोचते रहते हो?' और खिड़की की गन्दगी दिखाने लग जाती। कभी कभी तो खूब ढेर सा सुना देती। नागर साहब सब सुन लेते और धीमी आवाज में कहते, 'अरे भाग्यवान खिड़की क्यों देखती हो? उस जोड़े को देखो, वे हमारी बातें सुनकर हँसते होंगे। सोचते होंगे, दो इंसान जहाँ भी होंगे झगड़ते ही होंगे, चाहे वे पति पत्नी ही क्यों न हों। देखो, इनका किसी ने मंत्रोच्चार के द्वारा विवाह नहीं कराया फिर भी ये यह स्थान छोड़कर साथ ही गए और साथ ही आ गए। वो बैठे कितने प्यार से चोंच में चोंच लड़ा रहे हैं। कभी एक अपनी चोंच से दूसरे की पीठ खुजला रहा है, तो कभी दूसरा। हम उनकी बीट को लेकर टेंशन में हैं और बिना बात के नोक झोंक। अरे, उन्हें भी तो कहीं न कहीं रहना है न। यहाँ नहीं तो घर का कोई और कोना ढूंढ लेंगे। वे तो पंख वाले परिंदे हैं, कहाँ कहाँ पीछे पड़े रहेंगे।'

नागर साहब की बात सुनकर कोमल कुछ नरम हुई, 'तुमसे भला, बातों में कौन जीत सकता है।' धीरे धीरे कोमल भी उनके प्रति उदार चित्त हो गयी और समय समय पर उनके आने जाने, पंख फड़फड़ाने, एक दूसरे से चोंच लड़ाने और परस्पर पीठ खुजलाने का आनंद लेने लगी। खिड़की तो साफ हो ही जाती, दस पंद्रह दिन में एक बार गीला कपड़ा घुमा देती; शीशे की खिड़की थी, चमक उठती। अब तो कोमल समय समय पर नागर साहब को उनकी हरकतें दिखती रहती और उस पंछी के जोड़े की शिकायत बंद कर दी थी।

     - एस० डी० तिवारी 




Wednesday, 30 March 2016

Chudail dekha

चुड़ैल देखा

मैं गांव के स्कूल में छठी कक्षा में पढता था। एक दिन छुट्टी के दिन एक मित्र आया और बोला, पता है बगल वाले गांव में एक बहुत बड़ी चुड़ैल है। कई बड़े-बड़े ओझा शोखा आये मगर किसी के काबू में नहीं आ रही। आज एक बहुत बड़े बाबा आये हैं।  वे बड़े से बड़े भूत को भी चुटकियों में भगा देते हैं, चल देखने चलते हैं। मैंने दादी से कहा-
'दादी हम सराय, भूत देखने जा रहे हैं। उसे भगाने एक बड़े बाबा आये हैं। '
'मत जा, ऐसी जगह नहीं जाते। मुझे पता है, रामदास की पत्नी को चुड़ैल पकड़ी है।  उससे उतर कर किसी और पर भी जा सकती है। कहीं तुझे पकड़ ली तो। ' दादी बोलीं।
मैं तो डर गया। वैसे भी गांव से बाहर नदी की ओर एकाध बार मुर्दे जलते देखा था। और शाम को अँधेरा होने पर, आसमान में लपट जैसी उड़ती वस्तुएं भी कई बार देखी थीं । नदी की ओर तो दिन में भी अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती थी। मैं उसके साथ जाने में टाल मटोल करने लगा। मगर वह लड़का एक ओर बुलाया और समझाया 'अरे चल, कुछ नहीं होगा, चुड़ैल बच्चों को थोड़े ही पकड़ती है। '
मुझे भी लगा कि वह सही बोल रहा है, क्योंकि मैंने भी बड़े लोगों को ही झाड़ फूंक करवाते देखा था और वो भी ज्यादातर औरतें। कई तो अनावश्यक पारिवारिक यातनाओं से बचने के लिए भी अपने ऊपर भूत, प्रेत या चुड़ैल आने का बहाना करती थीं। कइयों के ऊपर कीर्तन आदि में देवी भी आते देखा था। उनके ऊपर देवी आतीं तो अन्य सभी औरतें नत मस्तक हो जातीं, ऐसा करने से उन्हें विशिष्ट दर्जा प्राप्त होता।
उसके कहने पर हम तीन चार बच्चों का समूह बन गया और चुपके से वहां भूत देखने चले गए। वहां पहुंचे तो देखा कि काफी भीड़ लगी हुई थी। भीड़ के बीच में एक बाबा चोला पहने, एक त्रिशूल खड़ा किये, सामने आग सुलगाये बैठा है। वह कभी कभी आग में कुछ डाल देता जिससे आग भभक उठती और ढेर सा धुआं निकालता और वह एक मोरपंख के बने झाड़ू से धुआं को हवा करता, साथ ही कुछ मंत्रोच्चारण। यह तो हमें नहीं पता था कि उसके पास क्या शक्ति थी पर लोग कह रहे थे की बड़े सिद्ध बाबा हैं, इनके सामने कोई भूत नहीं ठहर सकता।
थोड़ी देर में उसने रामदास की पत्नी को बुलवाया। वह घर से निकल कर आई। एक एक कदम बहुत संभल कर, धीरे धीरे बढ़ा रही थी। क्योकि उसका शरीर एकदम निर्बल हो चुका था। वह चल पाने में बिलकुल भी सक्षम नहीं थी। मैला कुचैला साया-ब्लाउज पहने। ब्लाउज बहुत ढीला होने के कारण उसके कन्धों से बह रही थी । ऐसा लग रहा था कि कोई नर कंकाल जो चमड़ी से ढका हो, चला आ रहा है। एक एक हड्डी बिना एक्स रे के नजर आ रही थी। किसी भूत की परिकल्पना के द्वारा, मानस में जो चित्र बन सकता था, बस, वह वही लग रही थी। उसे देख कर, हम तो उसे ही चुड़ैल समझे और जोर से भाग चले। बाबा ने किस प्रकार झाड़ फूंक किया, वह तो देखने की हिम्मत हम नहीं जुटा पाए; पर चुड़ैल ने उसकी जान को अधिक दिन उसके पास नहीं रहने दिया।  लगभग पंद्रह दिन बाद ही उसके प्राण छोड़ देने की खबर मिली ।

कई वर्षों के बाद, बड़े होने पर ही, उस भूत के बारे में कुछ समझ आया।  सम्भवतः उसे तपेदिक रोग था । उस समय आस पास कोई डॉक्टर होता नहीं था। अस्पताल दूर होते थे और आने जाने के साधन का अभाव, और साथ ही चिकित्सा के लिए धन का अभाव। एक्स रे का तो वहां किसी ने नाम भी नहीं सुना था। छोटे मोटे रोगों के लिए बस सरलता से मिलने वाली जड़ी बूटी का प्रयोग किया जाता था और असाध्य रोग होने पर लोग झाड़ फूंक का ही सहारा लेते थे।

एस० डी० तिवारी




Tuesday, 29 March 2016

Sheeshi me bhoot


शीशी में भूत

गुड्डू अपनी उलटी पुलटी  हरकतों से घर वालों को परेशान कर रखा था।  कभी आधी रात को खाना मांगना, कभी कपडे खोल देना, कभी बत्ती बंद कर देना, किसी को कुछ भी कह देना। अभी कुछ ही दिनों से यह सब चल रहा था, पहले ऐसा कुछ भी न था। महीने भर पहले तो एक दम ठीक ठाक था, अचानक ही उसे जाने क्या हो गया। उसे कोई मानसिक रोग भी नहीं था। परेशान, घर वाले उसे एक बड़े बाबा के पास ले गये।  बाबा को पता लगाने में जरा भी देर नहीं लगी कि उसे भूत पकड़ लिया है। भूत से छुटकारा दिलाने के लिए बाबा ने पूजा का उपाय और ढेर सारा खर्च बता दिया।

शर्मा जी, जो एक सरकारी विभाग में अधिकारी थे, उनका गुड्डू के आना जाना था। एक दिन शर्मा जी गुड्डू के घर पहुंचे तो गुड्डू उन्हें घूरकर देखने लगा। उसकी बड़ी बड़ी और लाल ऑंखें देख कर शर्मा जी को डर गए पर उन्होंने अपने को सम्भालते हुए बोला 'तेरी आँखों में क्या हुआ है, गुड्डू ! ' कड़क आवाज सुनकर थोड़ा वह सहमा और पलक झपका लिया। तभी गुड्डू  के पापा उन्हें खींच कर एक ओर ले गये और गुड्डू को भूत पकड़ने की बात बताई। शर्मा जी ने भूत की बात सुनकर आश्चर्य व्यक्त किया, 'दिल्ली में रहकर आप लोग भूत प्रेत में विस्वास करते हैं।  बताईये, यह कहां कहां उठता बैठता है। '
गुड्डू के पिता ने बताया, एक मोटर मैकेनिक सामू है उसी के पास जाता है और अधिक समय बिताता है।  शायद इंजिन विंजन का काम सीख रहा है।
'ठीक, पता करिये कि वह मेकैनिक नशा तो नहीं करता। '
'हाँ, पता करते हैं। ' गुड्डू के पापा बोले।
अगले दिन शर्मा जी गुड्डू का हाल चाल लेने फिर पहुंचे।
गुड्डू के पापा, उनके पहुंचते ही एक शीशी लेकर आये जिसमे कोई भूरे रंग का चिपचिपा पदार्थ था । 'ये देखिये, गुड्डू की पैंट की जेब मिला। '
शर्मा जी का शक पक्का हो गया, शायद यही वह भूत है। बोले, 'अब इसे नशा उन्मूलन केंद्र ले जाने की आवश्यकता है। इसका इलाज बाबा के पास नहीं, वहां है। कल सुबह मैं गाड़ी लेकर आता हूँ, इसे ले चलते हैं। मगर इसके अगल बगल दो लोगों को बैठना होगा ताकि गाड़ी चलाते समय कोई हरकत न कर बैठे। '
शीशी में कौन सा भूत था, गुड्डू के पापा इसकी तो जाँच नहीं कराये पर नशा उन्मूलन केंद्र मेंछः माह तक लगातार इलाज कराये। गुड्डू पूर्णतः होकर पापा के काम में हाथ बटाने लगा।

   - एस० डी० तिवारी 

Aaj ki urmila


आज की उर्मिला
बहू के आते ही सास ने अपना शासन प्रारम्भ कर दिया था। सवा महीने तो दूर, सप्ताह भी नहीं बीता कि उसे घर के काम काज में लगा दिया गया। विवाह के समय उसकी उम्र अभी कुछ भी नहीं थी, और उसे नई दुल्हन की अनुभूति तनिक भी नहीं हो पाई। आते ही घर की जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया गया। रसोई और घर की साफ सफाई का सारा काम, और ऊपर से सास की लताड़। ऐसा लग रहा था कि दुल्हन नहीं बल्कि कोई सेविका लाई गयी हो। सास की दबंगई के नीचे वह पूरी तरह से दबी हुई थी। रमेश उसे प्यार तो बहुत करता, पर, उस पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध माँ से कुछ नहीं बोल पाता। उर्मिला धीरे धीरे सब सहने की अभ्यस्त हो चुकी थी । रमेश कुछ काम धाम नहीं करता था इस कारण सब देखते हुए भी मूक दर्शक बना रहता।

विवाह के तीन महीने बीत चुके थे, रमेश अभी निठल्ला ही था। उर्मिला ने एक दिन, सहमी आवाज में उससे कहा, 'क्यों न शहर जाकर, कुछ काम कर लेते! अम्मा, बाबूजी को भी कुछ सहारा हो जायेगा।' रमेश चुप्पी साध गया। मगर इस बात से उसके मन में नौकरी करने का बीज अंकुरित हो गया। गांव के एक सज्जन, कुशवाहा जी, भोपाल में किसी कंपनी में काम करते थे, गांव आये थे। उनसे पता चला कि उनकी कंपनी में कुछ जगह खाली हैं और वहां वे किसी को भी लगवा सकते हैं। बस रमेश ने अपना आवेदन उनके समक्ष रख दिया। कुशवाहा जी रमेश को अपने साथ भोपाल ले गए। उर्मिला इतनी जल्दी उसके साथ जाने की बात भी नहीं कर  सकती थी।  रमेश के जाने के बाद, उर्मिला पर उसकी सास के अत्याचार का और बढ़ना स्वाभाविक था। रमेश, अपने वेतन  में से बचाकर कुछ पैसे घर भेजता। जब जब पैसे आते उर्मिला सुनकर बहुत खुश होती, पर उसके हाथ कुछ नहीं आता। वह सब तो सास ससुर ही रखते। उर्मिला को तो हर बात के लिए अपना मन मार के ही रहना पड़ता। 

उसकी सास हर बात पर भला बुरा कह देती। कभी काम में कमी निकालती तो कभी दहेज़ को लेकर ताने मारती। उसकी एक छोटी ननद थी, वह भी उसका साथ नहीं देती। उर्मिला एक गरीब परिवार से आयी थी। सास ससुर के मन के अनुसार दहेज़ नहीं लाई थी। मायके की गरीबी का अभिशाप वह ससुराल में भुगत रही थी। अब तो अति हो चुकी थी, उसकी सास उसके माँ बाप के बारे में भी अपशब्द कहने लगी थी, और जबाब देने पर हाथ तक उठा लेती।

उर्मिला गर्भवती थी, उसमें भी उसका ख्याल नहीं रखा गया। उसे आराम तो दूर, मानसिक प्रताड़ना से भी गुजरना पड़ता। उसके पास फोन तक नहीं था कि रमेश को कुछ बता सके। एक दिन रमेश का फोन आया। उसकी सास, निठुरी घर में नहीं थी, उर्मिला ने पति से अपने मन की बात कह दी। रमेश ने हिम्मत जुटाकर, अपनी माँ से उर्मिला के बारे में पूछ लिया तो वह उर्मिला पर आग बबूला हो गयी। उर्मिला सफाई देती रही, मगर उसने एक न सुनी और वहां पड़े झाड़ू को उठा कर चला दिया । उर्मिला रोने लगी और यह बात रमेश और अपने मम्मी पापा को बताने की धमकी दे डाली। अब तो उसकी निठुरी का क्रोध सातवें आसमान पर था। आँखों में खून उतर आया। वह उसे पेट साफ़ कराने के लिए दबाव डालने लगी। सास थी की पिशाचन। ठीक उसी समय वर्मा जी की पत्नी उसके घर आ गयीं। रमेश की माँ ने झट से अपने को काबू में की, और दर्शाने लगी जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं ।

समय बीता, विवाह के ठीक नौ महीने पश्चात्, उर्मिला के लड़का हुआ। निठुरी ने अनमने ढंग से गीत गाना तो करवा दिया, पर अगले ही दिन उसके ऊपर लांछन भी मढ़ दिया कि यह बच्चा रमेश का नहीं लगता, 'इसकी शक्ल तो रमेश से बिलकुल भी मेल नहीं खाती।' यही नहीं उसने उर्मिला के मायके भी शिकायत भिजवा दी। उसने उर्मिला को घर से बाहर निकालने का चक्रव्यूह रच डाला। गांव में डंका बजा दिया कि उर्मिला का सम्बन्ध किसी और से है और यह बच्चा उसी का है। उर्मिला के ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनकी कथनी, करनी में भी  बदल गयी और सास ससुर ने मिलकर, उर्मिला को घर से बाहर निकाल दिया। अब वह बच्चे को लेकर गांव के पास एक मंदिर में चली गयी। वह मंदिर रमेश के बाबा के भाई ने बनवाया था, और उसकी देख रेख उनका परिवार ही करता था। मंदिर में एक कमरा खली करके उर्मिला को रहने के लिए दे दिया गया। गांव वालों ने उसे सहारा दिया और उर्मिला मंदिर के एक कमरे में रहने लगी। उसने भी ठान लिया था कि वह मायके नहीं जाएगी, बल्कि यहीं रहकर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ेगी। मायके जाने पर लांछन की पुष्टि होने का भी डर था। उधर रमेश को, उसके माँ बाप ने हिदायत दे दी थी कि वह जब तक कहा न जाय, गांव न आये। गांव के एकाध लोगों ने उसके सास ससुर को समझाया बुझाया, पंचायत भी हुई, पर वे झुकाने को तैयार नहीं थे और उर्मिला को वापस घर में जगह नहीं दिए। पंचायत ने उसे खर्चा पानी देने को कहा, तो उसे भी सास ससुर ने धता ही बता दिया। उर्मिला के सास ससुर अपने घर से एक टूक भी देने को तैयार न थे। उन्होंने उर्मिला को घर और खेत से बेदखल कर दिया था। मायके और गांव वालों की छोटी मोटी मदद से ही उसका जीवन यापन चल रहा था। रमेश का पता भी किसी के पास नहीं था कि उसे पत्र लिखा जा सके। 

दूसरे के घर का मामला मानकर, लोग बीच में पड़ना नहीं चाहते थे। उन लोगों के सामने, इंसानियत का कोई मायने नहीं था। अपने गांव की ही किसी बहू पर अत्याचार हो रहा था, और मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। मायके वाले गरीब और अशिक्षित होने के कारण, ज्यादा कुछ करने में सक्षम नहीं थे। माँ बाप पढ़े लिखे नहीं थे और कोर्ट कचहरी का खर्च और परेशानी सोचकर, कानून का दरवाजा भी खटखटाने का प्रयत्न नहीं किये। उर्मिला को उसी के हाल पर छोड़ दिया गया। वह एकदम अकेली पड़ गयी थी, ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी उसके साथ नहीं था। कोई देखे न देखे, पर ईश्वर तो सब देखता ही है। कुछ समय बीता, गांव के एक निवासी वर्मा जी को उर्मिला की दशा पर दया आ गयी। अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए उनके जमीर ने उन्हें ललकारा। वे उर्मिला की मदद के लिए आगे आये, उनकी पत्नी ने भी इसमें उनका साथ दिया। दोनों उसके खाने पीने और अन्य आवश्यकता पूरी करने में जुट गए । उर्मिला के सास ससुर, वर्मा जी पर भी उससे अवैध सम्बन्ध होने का आरोप मढ़ दिया। 

यह तो उर्मिला के जख्म पर नमक था। वर्मा जी का इस तरह की बात सुनकर चिढ़ना  स्वाभाविक था। यह तो शुक्र था उनके इस नेक काम में उनकी पत्नी साथ थीं, नहीं तो उनका घर भी कलह में घिर जाता। वर्मा जी मदद से उर्मिला ने घर और खेत में हिस्सा देने के लिए, महिला आयोग में प्रार्थना पत्र डाल दिया। वर्मा जी के इस पवित्र काम में, कुछ और लोग भी जुट गए। महिला आयोग ने रमेश और उर्मिला के सास ससुर को सम्मन किया। रमेश सब कुछ जान कर भी, कायर की भांति अंजान बना रहा। महिला आयोग के सम्मन पर ही वह आया।

महिला आयोग में भी सास, ससुर ने अपनी कुटिल चाल नहीं छोड़ी और अवैध बच्चे का आधार बनाकर विवाह को अवैध घोषित करवाना चाहा। उन्होंने दलील दिया कि उर्मिला अपने पेट में मायके से ही बच्चा लाई थी। गाँव की बात थी न तो वहां डीएनए की जाँच की कोई सुविधा थी न ही उर्मिला के पास इतनी बुद्धि।  महिला आयोग के सामने निठुरी की यह कुटिल चाल नहीं चली। अंततः सत्य की विजय हुई, उर्मिला को तीन वर्ष निर्वासित जीवन व्यतीत करने के पश्चात, न्याय मिला । स्पष्ट निर्णय दिया गया कि उर्मिला को घर और खेत में हिस्सा मिले और रमेश तथा सास ससुर को निर्देश दिया गया कि उसके जीवन यापन के लिए दो हजार रुपये प्रति माह की दर से नकद भुगतान किया जाय। इस निर्णय से उर्मिला बहुत प्रसन्न हुई मगर फिर से उसी नरक में जाकर नहीं रहना चाहती थी। उसके पति की मति फिर गयी थी। वह अभी भी माँ के ही कहने में था। पता नहीं उसकी क्या विलक्षण बुद्धि थी कि वह सही गलत में अंतर नहीं कर पा रहा था, न ही माँ को समझा पा रहा था। विवाह के मंडप में पत्नी की रक्षा की सौगंध भी लगता है भूल चूका था। अपना स्वतंत्र निर्णय बिलकुल भी नहीं ले पा रहा था। आयोग की सुनवाई के बाद वह फिर भोपाल चला गया।

महिला आयोग के निर्णय से उर्मिला को बहुत राहत मिली। उसके पश्चात, उसने मंदिर से अलग एक कमरा ले लिया था और वहां रहकर अपने बेटे को पढ़ा रही थी। अब उर्मिला उम्र के पहाड़ की चोटी से दूसरी ओर लुढ़कने को तैयार थी और अभी तक के जीवन में, उसे वैवाहिक जीवन का बस दो माह का सुख मिला था। उसकी पूरी दुनिया मात्र उसका बेटा और संघर्ष ही रह गयी थी। उसका पति भी निर्वासित जीवन ही बिता रहा था। उसके आने पर, कहीं गांव वाले उस पर उर्मिला को साथ रखने का दबाव न बनायें, इस डर से वह गांव ही नहीं आया और शेष जीवन अविवेकी, कायर, डरपोक और कुंवारे की भांति ही व्यतीत किया। उर्मिला को जो कुछ भी मदद मिलती, अपने बेटे को पढ़ाने में लगा देती। उर्मिला की और किसी बात का चाहत नहीं थी। अब तो उसकी बस यही इच्छा थी कि उसका बेटा पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो जाय, उसे अपने बाप या दादा, दादी से आश्रय न मांगना पड़े। धीरे धीरे वह जवान हुआ और पढ़  लिख कर काम पर लग गया ।

कुछ लोगों की मदद ने उर्मिला का इंसानियत पर भरोसा बनाए रखा। वह वर्मा जी की बड़ी एहसान मंद थी, अगर वे नहीं होते तो जाने क्या होता। उर्मिला के धैर्य और अदम्य साहस ने, उसकी और उसके बेटे की जिंदगी बचा ली। 

एस० डी० तिवारी 







Monday, 28 March 2016

Sanno ki pankhen


सन्नो की पाँखें

सन्नो को कभी गुमान भी न था कि वह भी हवाई जहाज में बैठेगी। बेटियों के प्यार ने उसे इतना कुछ दिया कि बखान करते नहीं अघाती। दोनों बेटियां कितनी अच्छी नौकरी करती हैं और बड़ी मम्मी का भरपूर ख्याल। बड़ी बेटी, स्वीटी सरकारी अस्प्ताल में नर्स है और छोटी, मीठी स्कूल में अध्यापिका। स्वीटी का बहुत दिनों से एक सपना था कि वह अपनी कमाई से बड़ी मम्मी को एक बार हवाई जहाज में घुमाएगी। मगर हवाई जहाज का किराया सुनकर, उसे दूर की कौड़ी लगती । पड़ोस में विजेंदर मास्टर रहते थे। वे गांव वालों को देश दुनिया की नई बातें बताते रहते थे। एक दिन घर के सामने से गुजर रहे थे, स्वीटी ने मास्टर जी से पूछ लिया, 'मास्टर जी! मुंबई का हवाई जहाज का किराया कितना होगा ?' मास्टर जी ने बताया कि अभी कल ही अख़बार में पढ़ा था आजकल किराए में विशेष छूट चल रही है। एक एयरलाइन्स लखनऊ से मुंबई का हवाई टिकट साढ़े तीन हजार में दे रही है। बस फिर क्या था, स्वीटी के लिए मन मांगी मुराद। मौसी के यहाँ मुंबई जाने की योजना बन ही रही थी । स्वीटी ने घर में जाकर कहा, 'बड़ी मम्मी! इस बार मुंबई हम, हवाई जहाज से चलेंगे। ' बड़ी मम्मी बोलीं, 'नहीं, नहीं, बहुत पैसा लगेगा, अभी तुम दोनों की शादी करनी है।' फालतू के कामों में पैसे नहीं खर्च करने हैं, जोड़ के रख। पर स्वीटी कहाँ सुनने वाली थी। उसके गांव से सबसे नजदीक का शहर लखनऊ था। उसने पूछ जाँच कर लखनऊ से मुंबई का, जाने का टिकट तो हवाई जहाज से करा दिया और आने का ट्रैन से।  खर्च भी तो देखना था।

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सन्नो जब एकांत में बैठती तो बीती जिंदगी की सोच में डूब जाती -
आज सन्नो बड़ी खुश है।  घूम घूम कर गांव में सबको बता रही है और मिठाई बाँट रही है।
'अरे चाची! गोलू भाभी! दीदी जी! सुन रही हो, डिंपल के बच्चा हुआ है। '
'बहुत बधाई' जो भी सुनता, बोल देता और सन्नो का चहकना देखता ही रह जाता। गांव की सभी औरतें सन्नो के इस ख़ुशी पर आश्चर्य कर रही थीं । अभी तक तो वह मुंह लटकाये रहती थी, घर में जब देखो कलह; आज वह अपनी सौत के बच्चा होने पर इतना खुश ! यह बात सबके ही समझ से परे थी।
दरअसल, सन्नो के तीन लड़कियां ही थीं, अल्ला ने कोई लड़का नहीं बख्शा। मन्ना, माँ बाप का एकलौता बेटा था । सन्नो की सास हमेशा कोसती कि अगर बेटा नहीं हुआ तो आगे वंश कैसे चलेगा ! बेचारी बनी सन्नो कह देती, क्या करें अम्मा जी कोई बश की बात थोड़े ही है। मगर वह समय समय पर ताने कसने से बाज नहीं आती थी। अब सौत के भी बेटी होगी तो खुश होगी ही।

मन्ना की माँ ने उसके दिमाग में भी यह कूट कूट कर भर दिया था कि बेटा नहीं होगा तो वंश कैसे चलेगा, मन्ना को समझाती कि वह एक और शादी कर ले। मन्ना कहता 'क्या गारंटी है कि दूसरी से बेटा ही होगा।' पर नई दुल्हन किसे नहीं भाती। मां के बार बार कहने से उसकी मति फिर ही गयी। उसे भी लगने लगा था कि बेटा नहीं हुआ तो उसका वंश यहीं ख़त्म हो जायेगा। एक बार मन्ना ससुराल गया।  जब वह घर लौटा तो उसके साथ एक युवती। सभी देखकर अचंभित। 'यह कौन?' सन्नो ने पूछा।
'तुम्हारे लिए आया लाया हूँ, ये डिंपल है, तुम्हारी सेवा करेगी,' मन्ना बोला।
सन्नो के तो पांव के तले से जमीन ही खिसक गयी। उसको सब समझने में देर नहीं लगी, जोर से चिंघाड़े मारने लगी।  'हाय मेरी सौत! हाय मेरी सौत!'
सन्नो की तो दुनिया ही बदल गयी, कभी सोचा भी नहीं था उसकी जिंदगी में कोई सौत भी आएगी।
मन्ना की माँ भी हतप्रभ थी, वह पूछ बैठी, 'भगा कर लाया है ?'
'नहीं माँ, गरीब घर की है, इसके माँ बाप की रजामंदी से लाया हूँ। सन्नो के मायके के पास ही एक गांव है वहीँ की है। तू वंश चलाने को कहती थी न, इसीलिये। चलकर किसी पूजास्थल पर विवाह कर लेंगे। इसके माँ बाप भी वहीँ आ जायेंगे । '
मन्ना जब ससुराल जाता था  तो पास के उस गांव में भी टहलते चला जाता। डिंपल के परिवार से जान पहचान हो गयी। प्यार तो नहीं पर मन्ना के व्यक्तित्व पर वह आकर्षित हो गयी थी।  बस उसके कहने भर की देर थी उसके साथ चल दी।
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सन्नो के तो रो कर पागल सी हुई जा रही थी। यह सब क्या हो गया, अल्ला ! कैसा दिन दिखा दिया। वह सुबह उठते ही अपना सामान बांधी और मायके चल दी। इधर गांव में मन्ना की थू थू होने लगी। दो चार दिन हुए, पास पड़ोस ने मन्ना को समझाया, जो किया, सो किया अब जाकर अपनी बीबी को मनाकर ले आ। सन्नो के मायके वाले गुस्से में मन्ना के यहाँ आये। उसे ऐसा न करने के लिए कहा।  पर मन्ना शांति भाव से उन्हें समझ लिया कि उसे कोई परेशानी नहीं होने वाली है। बेटियां तो ससुराल चली गयीं, अगर बेटा  होगा तो उसकी भी तो देख भाल करेगा। फिर मान मनव्वल हुआ, सबने सन्नो को समझाया बुझाया और मना फुसला कर मन्ना  उसे वापस ले आया।
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खैर, समय के साथ कुछ तो घाव भरा पर सौत तो सौत। वह गर्भवती हुई तो घर में उसकी मान मर्यादा का बढ़ना स्वभाविक था और साथ ही सन्नो की डाह। अब डिंपल के आराम वगैरह का पूरा ख्याल रखा जाने लगा। मन्ना, जहाँ पहले कहता कि डिंपल सन्नो की सेवा करेगी अब उलटा सन्नो को ही उसकी देख भाल करने को कहता रहता। सन्नो अब पहले से और अधिक दुखी रहने लगी। घर में अब नैंसी के अलावा, उसका साथ कोई नहीं देता। जैसे जैसे डिंपल का समय समीप आता, बाकी तो सब खुश होते पर सन्नो की बेचैनी बढ़ती जाती। सोचती, अभी यह हाल है कल को इसका बेटा हो जायेगा तो ये लोग क्या हाल करेंगे। कभी सोच कर बहुत दुखी हो जाती तो कभी किस्मत को कोसती। यही किस्मत में लिखा है तो कोई क्या कर लेगा।
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नौ महीने पूरे हुये, डिंपल अस्पताल गयी।  कुछ ही समय बीता, अस्प्ताल से समाचार मिला। सन्नो को यह सुन कर, मानो कितनी ख़ुशी मिल गयी कि डिम्पल के लड़की हुई है फिर तो सब काम छोड़ कर गांव में सबको बताने निकल पड़ी। और वक्त गुजरा, और खुदा ने उसे एक और लड़की नवाजा। अब सन्नो और डिंपल का दर्जा लगभग बराबर हो चुका था। हाँ, नयी और पुरानी का अंतर तो रहेगा ही। सन्नो की तीनों बेटियों की शादी हो चुकी थी।  सन्नो हालात से समझौता कर चुकी थी। वह समझदार थी, उसने सोचा कि झंझट करने से नुकसान ही है। डिंपल की बेटियों को प्यार करेगी तो उसे बेटियों के आलावा डिंपल और मन्ना का भी सम्मान मिलेगा।वह सौतिया डाह छोड़कर, डिंपल की बेटियों से प्यार करने लगी। उनकी देख भाल और उनकी पढ़ाई पर जोर देने लगी। स्वीटी और मीठी दोनों स्कूल जाती थीं और घर आते ही बड़ी मम्मी से लिपट जातीं।

मन्ना उन्हें आगे नहीं पढ़ाना चाहता था जब कि पढ़ने में वे दोनों ही तेज थीं। मन्ना अपने थोड़े से खेत से परिवार के पेट भरने भर पैदा कर लेता था । मन्ना सोचता कि बेटियों को दूसरे के घर जाना है अतः उनकी पढ़ाई पर खर्च करना बेकार होगा । पढ़ाने में जो खर्च करेगा वह पैसा शादी के खर्च के लिए काम आएगा। सन्नो उन दोनों की पढ़ाई की अकेले ही समर्थक थी। वह पढ़ाई का महत्व जानती थी। उसका मानना था कि अपनी बेटियों को तो पढ़ा नहीं पायी, कम से कम ये ही पढ़ लें। पिछले जन्म में  कौन सा पाप किया कि सौत का मुंह देखना पड़ा। ये पढ़ लिख लेंगी तो अपने पैरों पर खड़ी हो जाएँगी, पुण्य भी हो जायेगा । बिजेंदर मास्टर भी कभी मिलते तो उनकी पढ़ाई की प्रशंशा करते और आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करते। सन्नो तो उन्हें पढ़ाने लिखाने पर अधिक जोर देती पर मन्ना और डिंपल उनका जल्दी से शादी व्याह करके छुटकारा पाना चाहते थे। सन्नो की बेटियां भी जब आतीं तो पढ़ाई की ही सलाह देतीं। बहनों सौतेला व्यौहार बिलकुल भी नहीं था। सन्नो ने स्वीटी और मीठी का हौसला बढ़ाये रखा और उसके जिद्द के कारण उनकी पढ़ाई चलती रही।  
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अब वे दोनों बड़ी हो गयी हैं।  पढ़ लिख कर दोनों अच्छी नौकरी कर रही हैं। हर महीने तनख्वाह पाकर घर लाना उनके लिए बड़े फक्र की बात है। उन्हें इस बात का एहसास है कि बेटियों को जन्म देने के कारण बड़ी माँ ने कितना दुःख सहा, ताने सहे, जब कि इसमें उनका कोई अपराध नहीं था। उन्हें इस बात का भी ज्ञान हो चुका है कि औरत की दुश्मन औरत भी होती है। उनकी तकलीफ में खाली मर्दों का हाथ नहीं होता।  हम लड़कियां अगर एक औरत का दर्द नहीं समझेंगी तो कौन समझेगा? दोनों के मन में यह संकल्प उपज जाता है कि उन्हें उनकी खोई खुशियां लौटाने के लिए सब कुछ करेंगी। दोनों ही अपनी बड़ी मम्मी को अपनी माँ से भी ज्यादा सम्मान देती हैं और प्यार करतीं हैं। उन दोनों के आगे बढ़ने में सन्नो की बड़ी भूमिका है, इस बात को वे नहीं भूलतीं। हमारे लिए अल्ला ने उन्हें कितनी तकलीफ दिया है । हम भी उन्हें जीते जी कोई तकलीफ नहीं होने देंगी।
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सन्नो उनके प्यार और मान सम्मान से पूरी तरह ओत प्रोत थी। अपनी सगी बेटियां तो ससुराल की होकर रह गयीं और हों भी क्यों नहीं उनके कन्धों पर जिम्मेदारी जो डाल दी। मगर स्वीटी, मीठी ने तो सन्नो को आसमान में उड़ा दिया। जिस तरह से उसकी जिंदगी उड़ने लग पड़ी उसे लगता कि दो पाखें मिल गयी हों।  गांव या रिश्तेदारी का जो भी मिलता स्वीटी, मीठी की तारीफ के पुल बाँध देती। उसकी समझदारी, धैर्य और प्यार ने जिंदगी में नया रंग भर दिया था। जहाँ वे लोग लड़कियां होने से खिन्न थे, अब पूरा परिवार कहता है लड़का लड़की में क्या फर्क है ! बस लायक होना चाहिए।

एस० डी० तिवारी 

Sunday, 6 March 2016

Asahishnuta intolernce

असहिष्णुता

चार पांच दिन हो गए थे ।  देख कर समझ नहीं आता था कि वो व्यायाम कर रही हैं या कोई नृत्य। हमारे यहाँ जिस प्रकार नृत्य की मुद्रायें होती हैं और शरीर के एक एक अंग को विशेष प्रकार की मुद्रा बनाकर नृत्य को  दर्शाया जाता है, ठीक उसी प्रकार वे अपने अंगों की मुद्रा बनाकर संगीतमय वातावरण में व्यायाम में तल्लीन हो जातीं। उम्र की रेखाएं किसी के चेहरे पर प्रकट ही नहीं होती।  

हार्बर पर जगह जगह बेंच लगे थे। प्रातः ही सागर की ओर मुंह करके बैठने पर अनुपम दृश्य का अवलोकन हो जाता।  जी चाहता, घंटो वहीँ बैठे रहें। वहीँ हार्बर के बगल में ही एक हरा भरा सुन्दर सा पार्क था। उसमें भी जगह जगह बेंच लगे थे। पार्क में दो तीन मंडप भी बने थे, जिसमे शाम को कई समूह, संगीत व नृत्य प्रस्तुत करते। कार्यक्रम देखने के लिए कोई शुल्क आदि नहीं था। हम तो थोड़ा टहल कर बेंच पर बैठ जाते, मगर हांगकांग के निवासी, घंटा भर तो व्यायाम करते ही। बारी बारी से प्रत्येक अंग का। लोगों का अनेकों प्रकार के व्यायाम का तरीका था, कोई भाग कर, कोई कदम ताल, कोई दिवार पकड़ , कोई हार्बर की रेलिंग पकड़, कोई बेंच को पीछे से पकड़, कोई अपनी छतरी को नचाते, कोई हाथ का, कोई पैर का, कोई सर का, अँगुलियों का, पिंडली का, मांशपेशियों का। प्रातः तो लगता वह बीच (समुद्री तट) नहीं बल्कि कोई व्यायामशाला है। पार्क में भांति भांति की व्यायाम की मशीनें लगी हैं, जिम में जाकर पैसे खर्च करने की भी आवश्यकता नहीं। खर्च करना है तो बस समय और थोड़ी शक्ति। वहां का कोई निवासी मोटा या आलसी नहीं दिखता। 

 एक युवक अपने पिता को प्रतिदिन, पहिये वाली कुर्सी पर लेकर, व्यायाम करने आता। उसे देखकर श्रवणकुमार की याद आ जाती। श्रवणकुमार भी आज होता तो कांवर नहीं बल्कि व्हील चेयर का ही प्रयोग करता।

मेरा मोटापा और लम्बाई देख कर, उनके लिए यह अनुमान लगा लेना बहुत सहज था कि मैं विदेशी हूँ। वहां का तो एक भी व्यक्ति मोटा नहीं दिखा।  क्या पुरुष, क्या स्त्री सभी स्लिम व ट्रिम यानि छरहरे बदन वाले। यह अनुपम दृश्य देखकर, हम पति पत्नी सुबह शाम दोनों समय उस स्थल पहुंच जाते और वातावरण का आनंद उठाते। यहां एक समस्या तो थी कि हम बस उनके मुख देख सकते थे और वे हमारे। एक दूसरे की भाषा समझना टेढ़ी खीर थी। बस संकेतों से हेल्लो हो जाती।

एक स्त्री मुझे बहुत ध्यान से देखती और मेरी दृष्टि उसकी ओर होते ही एक सुन्दर सी मुस्कान फेंक देती। वह अधेड़ उम्र की थी मगर देह की बनावट कोई पच्चीस वर्ष के युवती सी थी। मैं प्रतिदिन प्रातः ही पार्क में पहुँच जाता। एक दिन पार्क में, मैं उससे पहले ही पहुँच गया।  बेंच पर बैठा था, उसने आते ही 'गुड मॉर्निंग' बोल दी।  मैंने भी 'गुड मॉर्निंग' कहकर उत्तर दिया। लोग कई समूहों में बंटे, संगीत बजाकर सामूहिक व्यायाम (ऐरोबिक) भी करने लगे। मुझे तो व्यायाम से अधिक, उनका  यह नृत्य का शो लगता।  थोड़ा बहुत टहल कर बेंच पर बैठ जाता और उनका व्यायाम देखने लगता।

एक सप्ताह बीत चूका था । एक दिन वह मेरी ओर बढ़ी और हाथ पकड़ ली। मैं कुछ समझ पाता कि मुझे खींच कर बेंच से उठा दी और खींच  कर ले जाने लगी। एक सुखद आश्चर्य की अनुभूति हुई, मानो मरुभूमि में बरसात हो रही हो। सोच ही रहा था कि वह क्या करना चाह रही है, खींच कर ले गयी और एक स्थान पर खड़ा कराके इशारे से समझाने लगी कि मैं भी वैसा करूँ।  वह सब करने का तो पहले ही मन होता, पर उनके समूह में कैसे सम्मिलित हो सकता था। बस, मैं भी शुरू हो गया।  वहां आदमी, औरत सब साथ ही व्यायाम करते थे। न तो किसी को कोई झिझक, न संकोच। उसके बाद अब रोज प्रातः जाकर उस ऐरोबिक व्यायाम में सम्मिलित होने लगा। वहां किसी को कैसे भी व्यायाम करने में कोई झेंप नहीं थी। मुझे भी कोई संकोच नहीं लगा, क्योंकि कोई हंसने वाला नहीं था। वैसे भी सभी अपरिचित ही थे। तीन चार दिन बीत जाने पर तो कुछ और लोगों की मुस्कराहट मिलने लगी थी। उनकी मुस्कराहट देखकर लगने लगा कि वे मेरा स्वागत कर रहे हैं और समूह में मेरा भी स्थान बन गया है। एकाध लोग गरदन हिला कर अभिवादन करते; कोई, कुछ बोल भी देता पर मैं क्या समझता। मुझे तो लगता कि कई चिड़ियों की आवाज एक ही मुंह से निकल रही हो। मेरी भाषा उन्हें नहीं समझनी थी, इसलिए मैं चुप रहना ही उचित समझता। बस मुस्कराहटों में बात चीत हो जाती। 

एक माह, एक अलग दुनिया में रहने के पश्चात इंडिया वापस लौटने का समय आ गया। अब तो अगले दिन ही मेरी इंडिया की फ्लाइट थी। उनसे मैं बताना चाहता था कि कल इंडिया चले जाना है, लेकिन बोलकर या लिखकर बताया नहीं जा सकता था। इसलिए बहू से केक बनवा कर ले गया उनको एक एक टुकड़ा देकर इशारों से बताया की मुझे उड़ान भरनी है। केक खाकर वे झूम उठे और प्रसन्नता दर्शाने के लिए व्यायाम की कुछ कड़ियाँ बड़ी तेजी से करने लगे।  

एक माह में तो मेरा वजन पांच किलो कम हो गया था। मुझे अब समझ आया कि उन्हें मोटापा और आलस कत्तई सह्य नहीं था।  

Saturday, 5 March 2016

khul ja sim sim


खुल जा सिमसिम

कैलाश के पापा चौधरी साहब बेटे के पास, हांगकांग  घूमने आये। कैलाश उन्हें हवाई अड्डे से लेकर अपने फ्लैट पर आया और नीचे से ही तीस मंजिले भवन में इक्कीसवीं मंजिल पर अपना फ्लैट दिखाने लगा तो चौधरी साहब की टोपी सरक कर पीछे गिर गयी। भवन में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार पर इलेक्ट्रॉनिक्स ताला लगा था । कैलाश ताले का कोड नंबर दबाया, दरवाजा खुला और टोपी उठाकर चैधरी साहब ने भवन की लॉबी में प्रवेश किया, जहाँ से लिफ्ट के द्वारा इक्कीसवीं मंजिल पर जाना था। कैलाश का फ्लैट इक्कीसवीं मंजिल पर था।

जब चौधरी साहब फ्लैट में घुसे तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतने छोटे से फ्लैट में तीन व्यक्ति कैसे अंट गए। कैलाश और उसकी पत्नी इस छोटे से फ्लैट में रहते हैं। क्षेत्रफल पांच सौ वर्गफीट और किराया एक लाख रुपये महीना। आखिर वो हांगकांग में क्यों है। मगर थोड़ी ही देर में उन्हें समझ आ गया कि वह पूरा स्थान इस प्रकार व्यवस्थित है, जैसे की वह फ्लैट नहीं किसी मशीन का बॉक्स हो जो डिज़ाइन करके मशीन के पुर्जे फिट करने भर के लिए बनाया गया हो। एकदम छोटा सा, कहने को तीन कमरे का फ्लैट। शयन कक्ष का आकार बस ५ फ़ीट ७ फीट, कमरे में डबल बेड भी नहीं आ सकता। वहां के डबल बेड भी साढ़े चार फ़ीट चौड़े ही होते हैं। बेड रूम में घुसो तो सीधे बिस्तर पर। हाँ,  बेड के पैर वाले हिस्से में दो फ़ीट छोड़कर शेष ऊपरी हिस्से में अलमारी अवश्य है, जिसमें कपड़े वगैरह आराम से रख सकते हैं। इतने छोटे से स्थान में कैलाश रहता है। इंडिया में तो चौधरी साहेब का फ्लैट यहाँ के दस फ्लैटों से भी बड़ा अकेले का ही होगा।  देख कर मन ही मन कभी हंसी आती तो कभी दुखी होते इतना पैसा उसकी कंपनी देती है, अपने दोस्त मित्रों, रिश्तेदारियों में कितना नाम है कि चौधरी साहब का बेटा विदेश में काम कर रहा है और वे यह फ्लैट देख लें तो कितना बड़ा मजाक होगा।
कहने को तो डबल बेड के दो कमरे थे, मगर एक कमरे में चौधरी साहब जैसा एक ही आदमी सो सकता था। चौधरी साहब देखकर, हैरान, परेशान -
'अरे कैलाश इतने छोटे फ्लैट में कैसे रह लेते हो ?'
'क्या करें पापा, यहाँ इसी तरह के फ्लैट मिल पाते हैं।  सभी इसी तरह के फ्लैट में रहते हैं, मेरा तो फिर भी बड़ा है। और देखेंगे तो इससे भी छोटा। मगर कोई परेशानी नहीं है। यहाँ सब कुछ मकान मालिक का है। देखिये टी वी, फ्रीज, ए.सी., वाशिंग मशीन, ओवन, गैस स्टोव, सोफा, बेड। '
'अच्छा, किराया कितना देते हो ?
'अगर इंडिया के हिसाब से देखें तो यही कोई एक लाख रुपये महीना। '
किराया सुनकर तो चौधरी साहब अवाक् रह गए।  'बताओ इतनी महंगाई। '
' इसी छोटी जगह में सब कुछ है। कोई कमी महसूस नहीं होती।' कैलाश बोला।
'मगर मुझे तो घुटन सा लग रहा है। अगर ए.सी. नहीं होता तो रह ही नहीं पाते।'
'पापा, थोड़े दिन रहने के बाद आदत पड़ जाएगी। यहाँ सभी लोग ऐसे ही रहते हैं। यहाँ के लोग खाना पीना बाहर हीं करते हैं या पैक करा के बाहर से लाते  हैं। घर पर खाना बनाने का प्रचलन नहीं है, इसलिए घर में ज्यादा सामान नहीं रखते। छुट्टी के दिन भी घूमने फिरने चले जाते हैं। घर में तो बस सोने के लिए ही होते हैं । '
वास्तव में दो तीन दिन के बाद चौधरी साहब को वहां अच्छा लगने लगा। अंदर फ्रिज, वाशिंग मशीन, बड़े परदे वाला टेलीविज़न, ओवन, गैस का चूल्हा, सोफा, बेड सब अपनी जगह बड़े व्यवस्थित ढंग से था। फ्लैट तो आसमान से बातें कर रहा है, खिड़की खोलते ही दूर तक का नजारा दिखता है। कमरे से बैठे बैठे, आसमान में बादल देखने में बहुत अच्छा लग रहा था। जी चाहता था ऑंखें आकाश में ही गड़ाए रखें।  
घर के पास ही हार्बर था। दिन में जब कैलाश ड्यूटी जाता चौधरी साहब हार्बर पर घूमने निकल जाते। समुद्र के तट पर जगह जगह बेंच लगे थे। कहीं बेंच पर बैठ के एकाध घंटा लहरें और आते जाते जहाज देखते, समय जाते पता ही नहीं चलता । जी चाहता, इस शांत वातावरण में एकाध घंटे यूँ ही बैठे रहें। पास में एक पार्क भी है जिसमे व्यायाम की मशीन लगी हैं। अगर इन्डिया में होता तो लोग तोड़ ताड एक और करते और नहीं तो एकाध सामान  घर भी ले जाते।
उन्होंने कहावत तो सुनी थी कि दिल में जगह होनी चाहिये वो यहाँ पर दिख रही है।  इन्डिया में तो लोगों के पास इतनी जगह हो के भी और हड़पने के लिए ही लगे रहते हैं। बहुत से लोग अपने घर के आगे चबूतरा, छजली, कबाड़ आदि रख के कब्ज़ा जमाये रहते हैं, दुकानदार भी दुकान के बाहर तक सामान फैला के रखते हैं।  यहाँ कोई एक इंच भी अतिरिक्त जगह कब्ज़ा नहीं किया है।

कैलाश जिस बिल्डिंग में रहता था, उसका मुख्य द्वार कोड से खुलता था।  कैलाश और उसकी पत्नी को तो दिन में अपने काम पर जाना होता, इसलिए कैलाश ने पापा को द्वार का कोड बता दिया ताकि यदि दिन में वे कहीं बाहर निकलें तो भवन में पुनः प्रवेश पा सकें।

एक दिन कैलाश और बहू के जाते ही चौधरी साहब सोचे, चलो हार्बर तक टहल आते हैं फिर खाना वाना  खायेंगे। जाकर हार्बर पर कुछ देर बैठे, कुछ समय पार्क में बिताये उसके पश्चात दोपहर तक घर वापिस आये। उन्होंने गेट का कोड दबाया पर दरवाजा खुला ही नहीं।  कोड में एक अक्षर और चार संख्याएँ थीं ।  यह सोचकर संभवतः वे नम्बर गलत दबा रहे होंगे, उसे उलट पलट कर दबा के देखा, पर दरवाजा खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था। अक्षर को पहले लगा के फिर बाद में लगा के कई तरह से देख लिया पर दरवाजा नहीं खुला। इतने में सुरक्षा गार्ड आ गया। चौधरी साहब को लगा की वह इनकी मदद करेगा, पर वह इन्हें पहचाना तक नहीं, और दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। जब चौधरी साहब ने अंदर जाने का प्रयत्न किया तो उन्हें वहीँ रोक दिया। जब चौधरी साहब आये थे तो दूसरे गार्ड की ड्यूटी थी। चौधरी साहब उसे अपनी बात समझा भी नहीं सकते थे, क्योंकि उसे चीनी भाषा के अतिरिक्त और कोई भाषा नहीं आती। अब तो इधर उधर करते, शीशे के दरवाजे से इशारों में समझाते, पर कोई लाभ नहीं। शाम होने को आ गयी, इधर चौधरी साहब भूख से तड़प रहे थे।  वहां रेस्तरां में भी उनके खाने लायक कुछ है या नहीं, पता नहीं। इस कारण चीनी रेस्तरां में जाना उन्हें गवारा नहीं।

तभी चौधरी साहब को एक उपाय सूझा। वे प्रतीक्षा करने लगे कि कोई व्यक्ति जब गेट से घुसे तो साथ वे भी घुस जांय। तभी एक व्यक्ति के  दरवाजा खोलकर घुसते ही, ये भी पीछे से अंदर चले गये। गार्ड ने उन्हें रोका तो उसे अपने फ्लैट की चाभी दिखा दिया ताकि उसे विश्वास हो जाय कि वे वहीं रहते हैं। गार्ड उनकी बात समझ गया और उनके साथ फ्लैट तक गया। जब चाभी सही लग गयी तो वह वापस आ गया। अब चौधरी साहब के जान में जान आयी। वे काफी थक गए थे और भूखे थे ही। बहू सुबह ही पराठे सब्जी बना कर गयी थी, चौधरी साहब ने दो पराठा लिया और गरम करके खाया। कैलाश कुछ जल्दी छुट्टी कर के, थोड़ी देर बाद ही आ गया। 
चौधरी साहब ने उसे सारी बात बताईं। कैलाश सुनकर बहुत दुःखी हुआ। दरअसल इस सारी घटना में उसी की गलती थी और वह अपने किये पर बहुत पछता रहा था। भवन के मुख्य द्वार का पासवर्ड, सुरक्षा कारणों से हर महीने के पहले बुधवार को बदल दिया जाता था और सभी निवासियों को मैसेज कर दिया जाता था। आज महीने का पहला बुद्धवार था। नया पासवर्ड का मैसेज तो कैलाश को आया था परन्तु वह पापा को बताना भूल गया। चौधरी साहब के पास पहले वाला ही पासवर्ड था। 
अब कर भी क्या सकते थे जो होना था हो चुका, कैलाश पछताने और पिता जी से माफी मांगने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता था । हाँ, नया पासवर्ड एक कागज पर लिख कर उन्हें दे दिया।  


Friday, 4 March 2016

Dakaiti / jeene bhi doge

जीने भी दोगे ?

झुम्मन मिया के घर यह तीसरी बार डकैती पड़ी थी। शुक्र है कि तीनों ही बार कोई खून खराबा नहीं हुआ, बस सामान ही गया। झुम्मन मिया ने डाकुओं से कोई तकरार नहीं किया। सामान तो लुट जाने का झुम्मन मिया को कोई गम नहीं था, वे इस बात से संतुष्ट थे कि डाकुओं ने कोई शारिरिक हानि नहीं पहुंचाई थी। जान बची तो लाखों पाये।  घर में खाने पीने के लिए अनाज वगैरह की कोई कमी नहीं थी। अल्ला ने बहुत दे रख था। और उनको पूरा भरोसा था कि वह आगे भी देता ही रहेगा। खेत तो थोड़ा ही था, पर खाने भर को पैदा कर लेते थे। एकाध बकरी और कुछ मुर्गियां दरवाजे पर हमेशा रहती थीं। वे अल्ला के बड़े शुक्रगुजार थे। छोटे भाई मुनव्वर को दरजी की दुकान करा रखी थी। दरजी की दुकान से भी वह ठीक ठाक कमा लेता था। दोनों भाईयों में बड़ा प्रेम था। दोनों मिल जुल कर परिवार चलाते थे। मुनव्वर के तो दो बेटियां ही थीं। वह ज्यादा चिंता नहीं करता, कहता था, अल्ला का बड़ा रहम है, 'ये दो बेटियां हैं इनकी निकाह कर दूंगा, छुट्टी हो जाएगी।'  झुम्मन मियां के दो बेटे और एक बेटी थी। उनका सपना था कि वे बेटों, सलीम और कमाल को छोटे मोटे काम में नहीं लगाएंगे बल्कि पढ़ा लिखा कर कोई अफसर बनाएंगे।

झुम्मन मिया की जिंदगी बड़ी सादगी और भाई चारे के साथ बीत रही थी। जो कोई भी इनके द्वार से गुजरता या वे जिसके दरवाजे से गुजरते, दुआ सलाम जरूर हो जाती। गांव घर में उनकी बड़ी इज्जत थी।  पढ़ाई लिखाई के बारे में उन्हें ज्यादा कुछ पता नहीं था, बारहवीं के बाद दोनों बेटों को ही पोलेटेक्निक करा दिया। सोचे, टेक्निकल रहेंगे, जल्दी नौकरी मिल जाएगी; और हुआ भी वही। दोनों की ही एक बड़ी कंपनी में नौकरी लग गयी। चूकि कंपनी का काम अरब देशों में भी चल रहा था, सलीम और कलाम को दुबई भेज दिया गया। इससे पूरा परिवार खुश था विदेश चले जाने से आमदनी अच्छी हो गयी।

दोनों बेटे खूब पैसे कमाते और इंडिया भी भेजते। झुम्मन मियां ने आलीशान मकान बनवा लिया। अब तो क्षेत्र में उनके जैसा संपन्न कोई भी नहीं था। उनके रहन सहन और मकान का आस पास के लोगों की आँखों में चुभना स्वाभाविक था। एकाध कोस में उनके जैसा किसी का मकान नहीं था। मुनव्वर की दोनों बेटियों की धूम धाम से शादी हो चुकी थी। झुम्मन मिया की बिटिया सलमा अभी छोटी थी। उन्होंने निश्चय किया था, सलमा की शादी ऐसी करेंगे कि दुनिया देखेगी।

लोग मुंह पर बहुत प्रशंसा करते, पर मन ही मन जलते थे। पता नहीं किसकी बुरी नजर लगी, झुम्मन मियां के घर डाकुओं ने धावा बोल दिया। डाकू, घर का सारा कीमती सामान लूट ले गए। झुम्मन की बीबी रो रोकर पागल हो रही थी। मियां ने समझाया, जान बची तो लाखों पाए, सामान ही तो गया है, फिर आ जायेगा। पुलिस में रिपोर्ट किया गया। पुलिस वाले झुम्मन से कहते, 'किसी पर शक हो तो बताओ।'  झुम्मन मियां किसका नाम लेते।  नतीजा कि डाकू पकड़े नहीं गए, न ही उनका सामान मिला।

सबको पता था, इनके यहाँ अरब से पैसा आता है। उत्सव त्यौहार में चंदा माँगने वाले भी आते तो ये खुले हाथ से देते। फिर भी इनके दुश्मन हो जायेंगे, सोच से भी परे था। लोगों के जलन के कारण उन्हें यह दिन देखना पड़ा या कि बेटों के बाहर होने से इन्हें सभी कमजोर समझते थे। खैर झुम्मन की यह स्थिति ज्यादा दिन तक नहीं रही। थोड़े ही समय में फिर से सारा सामान बना लिए। चार पांच साल बीते कि एक बार फिर डाकुओं का दल आ धमका। पिछली बार सबक लेकर झुम्मन ने कुछ सामान इधर उधर रख लिया था, इस कारण इस बार कम नुकसान हुआ। पिछली बार झुम्मन मियां ने पुलिस वालों को खूब सुनाया था। इस बार भी पुलिस का वही राग था, 'क्या हम एक एक घर में पुलिस लगाएंगे? किसी पर शक हो तो बताओ। ' कहकर पल्ला झाड़ लिए।

बेटों ने झुम्मन को बहुत समझाया, गांव छोड़कर शहर में मकान बना लो, यहाँ  देहात में सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं। पुलिस वाले तो सीधे सादे लोगों को ही तंग करते हैं। यहाँ आलीशान मकान लेकर क्या करेंगे जब शांति और सुरक्षा ही नहीं। उन्होंने चाचा मुनव्वर से भी उन्हें समझाने का आग्रह किया। लाख समझाने पर भी झुम्मन मिया पुरखों की जगह छोड़ने को तैयार नहीं होते। 

झुम्मन मिया ने सलमा की शादी तय कर दी। शादी के अब कुछ दिन ही बाकी हैं। शादी के लिए सामान खरीदने की तैयारी जोरों पर है। गहने वगैरह बन चुके हैं। झुम्मन मिया के यहाँ चहल पहल होने लगी है। गांव के लोग आकर काम धाम के बारे में पूछ जाते।  टेंट वगैरह का बयाना बट्टा हो चुका है। बस दो दिन बाद ही सलीम और कमाल भी आने वाले हैं। मियां जी का तो जोश देखते ही बनता है। गांव वाले भी अच्छी दावत की उम्मीद लगाए बड़े प्रसन्न हैं। झुम्मन मियां सबसे सहयोग का आग्रह करते, सबकी भूमिका तय करने में लगे हैं। बारातियों के स्वागत और खान पान में कोई कमी नहीं हो, इसके लिए मुनव्वर और अपनी पत्नी से राय मशविरा कर चुके हैं।
बारात आने के अब दो ही दिन बाकी हैं। आज रात अचानक ही घर में हो हल्ला शुरू हो जाता है, 'डाकू आ गए, डाकू आ गए।'

इस बार झुम्मन मिया ने बड़ी समझदारी से काम लिया था। उन्हें पता था कि शादी व्याह का घर है, उन्हें इस परिस्थिति का अंदेशा पहले ही था। झुम्मन मिया का घर गांव के एक ओर है, उन्होंने गांव वालों को आगाह कर रखा था और गहने आदि किसी रिश्तेदार के यहाँ रखवा दिया था। शोर सुनते ही, गांव वाले लाठी बन्दूक लेकर दौड़े आ गए। झुम्मन ने अपने एक रिश्तेदार, जिसके पास बंदूक का लाइसेंस था, पहले ही बुला रखा था। उसने भी हवाई फायर कर दिया। डाकुओं के हाथ कुछ भी नहीं लगा, वे सिर पर पैर रख कर भागे। सलमा ने हिम्मत करके एक डाकू का पांव पकड़ लिया, मगर वह उसकी पीठ पर बंदूक का कुंदा मारकर खुद को छुड़ा लिया और भागने में सफल हो गया।

इस बार गांव वालों का सहयोग देखकर, झुम्मन की हिम्मत और बढ़ गयी। वे पहले से अधिक सावधान हो चुके थे इस कारण अब डाकुओं का अधिक भय नहीं था। मरते दम तक अपनी पुश्तैनी जमीन नहीं छोड़ने का उनका अडिग फैसला था, वैसे उन्होंने शहर में भी एक मकान  बनवा लिया था।

Hong kong ki bas natra


हांगकांग में सड़कें तो बहुत चौड़ी नहीं हैं पर ट्रैफिक जैम भी ना के बराबर ही देखा और ना ही कहीं चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस वाला नजर आया। सडकों पर दो मंजिली बसें नई नवेली दुल्हन की तरह दौड़ती नजर आयीं।  सड़क से मात्र ६ -७ इंच ऊँची सतह, चढ़ने में यात्री को कोई परेशानी नहीं।  इतनी नीची बस तो अपने देश में स्पीड ब्रेकर पर ही अटक जाएँगी।
जहाँ जहाँ सड़क पर कोई मरम्मत आदि का काम होता है; लाल, नीली, पीली प्लास्टिक ब्लॉक के विभाजक लगा  दिए जाते हैं और दिशा निर्देश के साथ पृथक रास्ता दे दिया जाता है। पूरी सड़क को बंद नहीं किया जाता। पटरी बिलकुल खाली रहती है, न तो दुकानदारों का कब्ज़ा न रेडी वालों का, न ही पटरी पर कोई गाड़ी खड़ी कर सकता।लोग गाड़ी निश्चित लेन में और नियमानुसार ही चलाते हैं, जिससे ट्रैफिक जाम होने का अवसर कम रहता है।यदि किसी ने नियमों का उलंघन किया है तो उसे जुर्माना देना ही होगा, यहां कोई यादव जी का फोन काम नहीं करता।
अधिक आबादी होने के कारण बहु मंजिले भवन और उनमे छोटे छोटे फ्लैट।  निजी कार रखना तो सपने जैसा है, क्योंकि गाड़ी खड़ी करने की जगह ही नहीं है।  वैसे निजी गाड़ी रखने की कोई आवश्यकता भी नहीं है, सार्वजानिक यातायात की प्रणाली बहुत अच्छी है। अधिक से अधिक लोग सार्वजनिक साधनों का ही प्रयोग करते हैं। सार्वजनिक साधन अति सुविध और धक्का मुक्की से रहित हैं। मेट्रो, रेल बस और फेरी तीनों का सुन्दर और सुविध प्रचालन।  इतनी जनता सार्वजानिक वाहनों में चलती है पर कोई  धक्का मुक्की नहीं करता, अपने आप ही पंक्तिवद्ध होकर बस या ट्रैन में चढ़ते हैं। लोग अनुशासित हैं और नियम पालन को प्राथमिकता देते हैं। घर और दफ्तर से बस स्टाप तक पैदल जाना पड़ता है, इस कारण शारीरिक रूप से स्वस्थ भी रहते हैं।

किराया के लिए ओपल कार्ड का प्रयोग करते हैं।  बस, मेट्रो या फेरी में चढ़े, मशीन से कार्ड सटाया और किराया कट गया। यहां बसों में कंडक्टर नहीं होते। कार्ड स्वैप करने की मशीन ड्राइवर के पास लगी होती है। वह बस कार्ड पंच होने की आवाज भर सुनता है उसे पता लग जाता है कि यात्रा का किराया जमा हो गया। जिसके पास कार्ड नहीं होता वह वहीँ लगे बॉक्स में निश्चित किराया डाल देता है।  ड्राइवर पैसे गिनता तक नहीं, बस सिक्कों की खनक से ही अनुमान लगाता है कि किराया दे दिया।

एक दिन मुझे कहीं घूमने जाना था, बेटे ने ओपल कार्ड पकड़ा दिया।  मैं बस में चढ़ा, मशीन से कार्ड सटाया बीप की ध्वनि के साथ ७ डॉलर कट गये। सीधे ऊपर वाली मंजिल पर चढ़ कर सबसे आगे वाली सीट पर बैठ गया। ऊपर से बस स्टॉप का नाम देखने में आसानी थी। उतरने के लिए बड़ा सतर्क रहना था क्योंकि अमुक बस स्टैंड कोई बताने वाला नहीं था।  अगली बार उसी जगह जाना हुआ, इस बार १९ डॉलर कट गए। मैं अवाक् रह गया, बहुत गुस्सा आया पर किससे शिकायत करता।  ड्राइवर को बात समझनी ही नहीं थी। वहां तो अंग्रेजी बोलने वाला भी कोई नहीं मिलता । घर आकर, बेटे को बताया कि आज तो बस में बहुत पैसे कट गये।  उसने पूछा किस नंबर की बस में बैठे थे ? जब उसको नम्बर बताया तो उसने बताया कि यहां बस में अंतिम स्थान तक का किराया देना होता है, उतरो चाहे कहीं भी।  अगर कम दूरी की यात्रा करनी हो तो कम दूर जाने वाली बस में सवार होना ही बुद्धिमानी है।  जिस बस में मैं दूसरी बार बैठा था वो लम्बी दूरी तक जाने वाली थी।

एक दिन हम बस में सवार हुए।  बस में दीप का एक दोस्त भी मिल गया। दीप ने  मेरे बारे में बताया, उसने नमस्ते किया। 'कब आये अंकल' पूछा।
'अभी एक हफ्ते पहले ' दीप ने ही उत्तर दे दिया। फिर उसने दीप से दो डॉलर खुला माँगा।
वह आश्चर्य से उसकी और देखा और पूछा, 'ओपल कार्ड तो लिए हो पैसे क्या होंगे ?'
दीप बोला - 'कल मैं कार्ड लाना भूल गया था, किराये के लिए पूरे खुले पैसे नहीं थे जिसके कारण दो डॉलर कम पड़ गया था।  अब क्या करता, ड्राइवर को पता लगता तो बस से उतार देता।अतः उसे बताये बिना १२ की जगह ११ डॉलर ही डाल दिया। छोटी छोटी रेजगारी थी, इस कारण उस महिला ड्राइवर को अंदाज नहीं चला। अगर जरा भी शक होता तो जाने क्या करती। मैं कल से ही परेशान था कि कहीं भूल न जाऊं।  इसीलिए
ओपल कार्ड से भुगतान नहीं कर रहा हूँ। '
आज ११ डॉलर की जगह १२ डॉलर बॉक्स में डालना है।  अगली बार जब मिलेंगे, दो डॉलर मैं लौटा दूंगा।
   

Wednesday, 2 March 2016

Samajhaunga, aur kya


समझाऊंगा, और क्या

बस स्टैंड पर खड़े प्रतीक्षा का समय समाप्त हुआ, गंतव्य को जाने वाली बस आ ही गयी। वह बूढ़ा व्यक्ति बस में सवार हुआ। पीछे की सीट वरिष्ठ नागरिक हेतु आरक्षित और उसके आगे की सीटों की पांच कतार महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। एक युवती वरिष्ठ नागरिक वाली सीट पर बैठी थी जबकि आगे की दो तीन महिला सीटें खाली थीं।
बूढ़े व्यक्ति ने युवती से कहा, ' आप आगे वाली महिला सीट पर चले जायं तो मैं यहाँ बैठ जाऊं।'
युवती ने उत्तर दिया - 'आप ही उस पर बैठ जाइये, खाली ही तो है।'
बूढ़े व्यक्ति ने पुनः आग्रह किया और कहा 'महिला सीट तो खाली है आप उस पर क्यों नहीं चली जातीं?' उन्हें यह डर था कि बैठने पर आगे कोई महिला आ गयी तो उठना पड़ेगा।
मगर युवती को सीट से उठना शान के विरूद्ध लग रहा था।
कंडक्टर यह सब सुन रहा था पर कुछ बोला नहीं, वह भी असमंजस में था, एक तरफ बुजुर्ग तो दूसरी तरफ महिला। उसके लिए दोनों ही सम्मान व सहानुभूति के अधिकारी थे।
बूढ़े व्यक्ति के कई बार आग्रह करने पर युवती चिढ़ कर बोली, 'नहीं उठूंगी तो क्या कर लोगे अंकल?'
बूढ़े व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा, 'क्या कर लूँगा! समझाऊंगा, और क्या। अब तुम बैठी रहो। देखता हूँ कैसे बैठी रहती हो। '
अगले  स्टैंड पर कुछ लोग चढ़े, उनसे बूढ़े व्यक्ति ने बोला, 'देखो ये महिला बुजुर्ग सीट पर बैठी हैं'।
उनमे से एक दो लोग सुनकर मुस्करा दिये और आगे बढ़ गये।
उसके अगले स्टैंड पर भी ऐसा ही हुआ। फिर तेन चार स्टैंड तक ऐसा ही हुआ। अब युवती परेशान होने लगी थी।
अंत में वह परेशान होकर सीट छोड़ ही दी और एक महिला-सीट पर बैठने को लपकी, ठीक उसी समय एक अन्य महिला उस सीट पर बैठ गयी। बेचारी युवती मुंह ताकने लगी।
वे बुजुर्ग यह देख रहे थे, सीट से खड़े हो गए, 'आ जाओ, यहाँ बैठ जाओ।'
अब युवती लौट कर कैसे आती, वह शर्म से पानी पानी थी, उधर देखा तक नहीं।