पृथ्वी का ब्रह्मा को सन्देश
दुखी होकर, पृथ्वी ने ब्रह्मा जी के पास रेडियो सन्देश भेजा और कहा -
'हे प्रभु! आप तो देख ही रहे होंगे, पृथ्वी पर रह रहे प्राणी मेरी छाती पर मूंग दल रहे हैं। मैं सभी प्राणियों का यथाशक्ति पालन कर रही हूँ, पहले से अधिक अन्न और रत्न दे रही हूँ, परन्तु मानव जाति को संतोष ही नहीं होता। वह और अधिक के होड़ में मेरे शरीर को क्षत विक्षत करने से बाज नहीं आता। उसका जहाँ मन होता है वहीँ ऊँचे-ऊँचे भवन खड़ा कर लेता है, जहाँ होता है वहीँ मेरे तन में सुरंगें खोद डालता है, जंगलों को काट डालता है, पर्वतों को उखाड़ फेंकता है, अब तो समुद्र को भी पाटने लगा रहा है। इसने मशीनें क्या बना लीं, खुद को ही ब्रह्मा समझने लगा। क्या यह सब देख कर आप को क्रोध नहीं आता।'
'क्रोध तो आता है देवि! किन्तु तुम्हें इन सबसे कोई कष्ट नहीं तो मैं तुम्हारे प्राणियों पर क्यों क्रोध करता?'
'नहीं भगवन! कुछ तो करिये। देखिये, करोड़ों गाड़ियां बनाकर मेरे ऊपर दौड़ा रहा है, पवन देव के तन में भी विष घोल दिया है। अब पवन देव भी मेरा साथ छोड़ने के धमकी देते हैं। कई बार तो वे भूमि कक क्षेत्र छोड़कर समुद्र की ओर चले जाते हैं। मुझे डर है कि समुद्र की ओर जाकर हिलने-डुलने लगे तो अनायास ही तूफान खड़ा करेंगे, और भूमि पर रहने वाले प्राणियों का विनाश होगा। कई बार मन में आता है कि मैं ही एक झटका दे दूँ , किन्तु सोचती हूँ कि मेरे एक ही झटके से लाखों करोड़ों मनुष्य और अन्य कितने ही प्राणी काल के गाल समा जायेंगे। इसलिए इतना कुछ होते हुए भी मैं सहे रही हूँ। हे ब्रह्मा! अब और अधिक सहना कठिन हो रहा है, आप ही कुछ उपाय करिये जिससे मनुष्य अपने उत्पातों से बाज आ जाय।'
ब्रह्मा जी बोले, 'हे पृथ्वी घबराओ नहीं तुम अपने स्थान पर उसी प्रकार अडिग, अचल रहो। सम्वत २०७६ के उत्तरार्ध में, मैं कोरोना नाम के रोगाणु पृथ्वी पर प्रकट करूँगा, जो चीन से उत्पन्न होकर पूरी पृथ्वी पर फ़ैल जायेगा। यह एक महामारी के रूप में उभरेगा और जीवों का विनाश करेगा। मानव जाति को उसके किये की सजा मिल जाएगी।'
'मगर, हे प्रभु इसमें अन्य प्राणियों का क्या दोष! जो मैं नहीं करना चाहती, वही आप करेंगे तो क्या लाभ? मैं तो बस इतना चाहती हूँ कि मनुष्य को कुछ सीख मिले।'
'अच्छा तो ठीक है, तुम वहीँ अपने स्थान पर रहो, मैं ऐसा करता हूँ कि इस कोरोना का प्रकोप छः माह तक रहे और इसका प्रभाव मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों पर न हो। मनुष्य जब इस महामारी का शिकार होने लगेगा तो वह स्वयं ही सुधारात्मक कार्य करेगा। इस अवधि में तुम्हारे ऊपर हो रहे सभी प्रकार के अत्याचार थम जायेंगे और पवन देव भी स्वच्छ और पवित्र होकर स्वांस लेंगे।'
'जो उचित समझें, देव! आप तो सृष्टि के रचयिता हैं। आप से अधिक और कौन समझ सकता है?'
'तथास्तु। '
एस. डी. तिवारी