Thursday, 9 February 2017

Ek school ki kahani

स्कूल यहीं चलेगा

वंश नारायण जी ने सारी उम्र दिल्ली में बिताई, मगर जन्मभूमि से उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ। उनका पूरा परिवार और कई रिश्तेदार भी दिल्ली ही चले गए थे, इस कारण उनका गांव आना जाना कम हो गया था। फिर भी, साल दो साल में एकाध बार गांव का चक्कर लग ही जाता। उनके एक छोटे भाई का परिवार गांव में ही रहता था। अब वे सेवानिवृत्त हो चुके थे और पचहत्तर पार कर चुके थे। इस बार तो वे पूरे पांच साल के पश्चात् वे अपने गांव घूमने आये थे और साथ में तीनों छोटे भाई भी। वे गांव आते तो अपने बचपन की चीजें ढूंढने लगते। सब कुछ अतीत में खो चुका था। पुरानी चीजों को देखने और पुराने लोगों से मिलने में उन्हें बड़े आनंद की अनुभूति होती, मगर अपने समय की कोई भी चीज नहीं दिखती थी। सब बदल गया था, यहाँ तक कि अपना खुद का घर भी। उनके समय का बस गांव का एक पोखरा और दो तीन पेड़ बचे थे। वैसे पोखरा का रूप भी काफी कुछ बदल चुका था। पोखरा के चारों ओर, तटों पर अनेकों वृक्ष होते थे और बीच बीच में पलास की झाड़। वो सब जमीन अब खेत हो चुकी थी। जब वे पोखरा पर जाते तो देखकर मन बहुत उदास हो जाता। कभी जब पलास के टेसू दहकते थे तो देखते ही बनता था। आज लगभग सभी पेड़ कट चुके हैं, पलास नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है। तट को पोखरे के पानी के पास तक जोत लिया गया है। बचपन में रविवार के दिन, बंशनारायण, अधिकतर मित्रों के साथ, इसी पोखरे में नहाने आते और तरण ताल का भरपूर आनंद उठाते थे। लगभग सौ मीटर लंबे पोखरे को वे तैर कर, पार हो जाते थे। तटों पर छोटे मोटे कई टीले होते थे, शाम को उन्हीं टीलों पर बैठ पोखरा को निहारते घंटों बीत जाते, आज कहीं बैठने की जगह ही नहीं है।

उनके ज़माने के, गांव में अब एक दो लोग ही बचे हैं। उनके समय का कोई मिल जाता तो पुरानी यादें ताजा हो आतीं, और अपने ज़माने के किस्से सुनने सुनाने लगते। एक दिन गांव के बरगद के पेड़ के नीचे आकर, एक हाथी खड़ा हो गया और महावत पेड़ पर चढ़कर उसके लिए टहनियां काटने लगा। उसे देखकर, वंशनारायण को भगवान सिंह की याद आ गयी। उस समय दो चार कोस में केवल भगवान सिंह का ही हाथी था और यहाँ गांव में पीपल और बरगद के पत्ते लेने आया करता था। उन्होंने महावत से पूछा, 'भैया यह किसका हाथी है ?'
'वीरेंदर सिंह का। ' 
'हमारे समय में यहाँ कई कोस में मलिकपुरा के केवल भगवान् सिंह का हाथी हुआ करता था। '
'हाँ, उन्हीं का है। वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनका बेटा है, अपनी इज्जत बनाये रखने को अभी तक हाथी रखे हुए है।'
'और वो स्कूल। '
'साहब, ये कहां समय दे पाते हैं। एक संस्था बना रखी है, वही सब सम्भालती है। '
वंशनारायण  के मन में एक बार स्कूल देखने की जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने कमलापति को साथ चलने के लिए पूछा, मगर उन्हें किसी रिश्तेदारी में जाना था। अतः वे अपने भतीजे को लेकर मलिकपुरा जाने के लिए तैयार हो गए। भतीजे ने अपनी मोटरसाइकिल कसी और ताऊ जी को पीछे बिठाकर मलिकपुरा के लिए चल दिया। तब तो ढाई कोस चलकर, वे पैदल ही जाते थे।

मलिकपुरा पहुंचते ही मुख्य सड़क पर बड़ा सा बोर्ड लगा था, 'मलिकपुरा स्नातकोत्तर महाविद्यालय'। अब महाविद्यालय के गेट तक पक्की सड़क है। अपने समय में वे खेतों के बीच, मेड़ों से होकर विद्यालय तक आते जाते थे। वे महाविद्यालय के गेट पर पहुंचे, गार्ड ने रुकने का संकेत दिया और मोटरसाइकिल रुक गयी।
'क्या काम है? साहब!'
वंशनारायण कुछ बोले बिना, कॉलेज के सामने ध्यानमग्न खड़े हो गए। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे या तो किंकर्तव्यविमूढ हो गए हों या विद्यालय की भव्यता में खो गए हों। विद्यालय के भवन को दृष्टि भर निहार लेने के पश्चात्, गार्ड से बोले, 'प्रिंसिपल साहब से मिलना है। '
'लेकिन वे अभी नहीं मिल सकते, किसी मीटिंग में हैं।'
बंशनारायण सोच में पड़ गए। पहले तो सोचा, कुछ देर प्रतीक्षा करके मिलकर जाऊं। उन्हें उम्मीद थी जब वे प्रिंसिपल से मिलेंगे और उन्हें पता चलेगा कि इस विद्यालय के सूत्रधार वे ही हैं तो वे आश्चर्य से भर जायेंगे। प्रिंसिपल के इस प्रकार मिलने से वे स्वयं गौरवान्वित होंगे। पर दूसरे ही क्षण आशंकित हुये, जमाना बीत गया, पता नहीं प्रिंसिपल उनकी बात पर विस्वास भी करे कि नहीं। उनके पास इस बात का प्रमाण भी क्या है। छोडो, चलो, वापस चलते हैं। 
गार्ड ने थोड़ा सहमते हुए बोला, 'साहब! एक बात पूछूँ ?'
'हां, बोलो। '
'आपकी उम्र देखकर तो लगता है, आप यहाँ पढ़े नहीं होंगे। क्योंकि आपसे इस कॉलेज की उम्र कुछ छोटी लग रही है। मगर, न जाने क्यों लग रहा है कि आपका कोई न कोई इस कॉलेज से गहरा सम्बन्ध है।
क्या आपके बच्चे यहीं पढ़े हैं? '
'हाँ, बहुत गहरा सम्बन्ध है। वैसे मेरे छोटे भाई और बेटे, भतीजे सब यहीं से पढ़े हैं। खैर चलते हैं। फिर कभी दुबारा आ जायेंगे।'
वापस जाते समय, महाविद्यालय के पास ही मधुबन की चट्टी पर, वंशनारायण की दृष्टि, एक चाय की दुकान पर बैठे वृद्ध पर पड़ी। चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था। वंशनारायण की घूरती नज़रों ने, उसके मन में यह जानने के लिए प्रश्न खड़ा कर दिया 'आखिर यह कौन है! इतने ध्यान से देख रहा है। ' फिर एकाएक बोल पड़ा -
'वंशनारायण  ...! '
'मातबर! वाह भाई, क्या बात है ! तुम्हारी यादाश्त तो कमाल की है, पहचान लिया। '
'अरे, इतने पुराने मित्र हो, तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ। वैसे, बुढ़ापे में तो पुरानी बातें और भी ताजा हो जाती हैं। और, तुम तो दिल्ली में बस गए हो न! यहाँ कब आये ?'
'बस एक सप्ताह ही हुआ। साथ के काफी लोग तो निकल चुके, बस एकाध लोग ही बचे हैं। उन्हीं की याद यहाँ खींच लाती है। सोचा, चलें एक बार अपने पुराने स्कूल की याद ताजा कर आयें।'
'और कमला, हरिद्वार, हरिहर कैसे हैं ? शिवशंकर के स्वर्गवास के बारे में तो पता चला था। '
'हाँ, बाकी सभी ठीक हैं। बस शिवशंकर थोड़ा पहले ही साथ छोड़ गया। '

'पूरे पचास वर्षों के बाद मिले हो, ये लो पहले यहाँ पर चाय पियो, फिर घर चलते हैं; तुम्हारी भाभी से मिलवाता हूँ और बहू के हाथ की चाय पिलवाउंगा।'
घर पहुंचते ही मातबर चिल्लाने लगे, 'कामिनी! कामिनी! देखो कौन आया है। कुछ नाश्ता पानी का प्रबंध करो। वंशनारायण मेरे बचपन के साथी हैं। आज चालीस वर्ष के पश्चात मिले हैं। पानी ले आओ, फिर पूरी कहानी बताता हूँ। '

'मंगई के सन छप्पन की बाढ़ ने क्षेत्र को दो भागों में बाँट दिया था।  नदी पार कर पाना कठिन हो गया था। छपरी विद्यालय के प्रांगण में जल भर गया था। विद्यालय की कक्षाओं में, पानी में से ही होकर जाया जा सकता था। नदी के दूसरी ओर के छात्रों का विद्यालय आना असंभव हो गया था। मंगई नदी पर बना छोटा सा पुल बहुत नीचे था और पुल के ऊपर से पानी बह रहा था। जल भराव का यह तांडव महीने भर से भी ऊपर चला। पूरे क्षेत्र में पूर्व माध्यमिक स्तर का एक ही विद्यालय था। मैं और वंशनारायण दोनों ही उस विद्यालय में अध्यापक थे। छात्रों के शिक्षा के संकट को देख, वंशनारायण ने नदी के इस पार के छात्रों को एकत्र कर के, मलिकपुरा में, एक मंदिर के प्रांगण में बने एक कमरे में पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। उनके इस अभियान में, मैं और इनके भाई कमलापति भी सम्मिलित हो गए। प्रारम्भ में तो दस बारह छात्र ही थे, जिनमें से आधे इन्हीं लोगों के गांव के थे, दो तो इनके भाई ही थे, हरिहर छठी में और हरिद्वार सातवीं में। महीने भर में ही यह संख्या पचास तक हो गयी। इस बात ने हम लोगों का उत्साह बढ़ा दिया। मलिकपुरा और मधुबन के निवासियों का समर्थन मिला और नदी के इस पार के सभी छात्र इस नए विद्यालय में आने लगे। धीरे धीरे बाढ़ समाप्त हुई, नदी का जल सूखा। तब तक मलिकपुरा में छात्रों की संख्या काफी बढ़ गयी थी। इस पार  के छात्र अब छपरी नहीं जा रहे थे। क्षेत्र के सभी लोग यही जानते हैं कि मेरे पिता जी के कारण इस विद्यालय की स्थापना हुई पर इसके वास्तविक सूत्रधार तो ये वंशनारायण जी हैं।'

मातबर की बात को बीच में काटते हुए वंशनारायण बोल पड़े, 'अगर आप के पिता फौजदार तिवारी नहीं होते तो यह विद्यालय कहाँ चल पाता। मलिकपुरा के विद्यालय की सफलता देख, छपरी विद्यालय का प्रबंधन चिंतित होने लगा था और इसकी सफलता के रथ को रोकने में जुट गया। मुझे तो फिर से छपरी आने की चेतावनी दी जाने लगी। मेरे नहीं कहने पर स्कूल को बंद करवाने की धमकियां मिलने लगीं। कुछ समय के लिए तो मैं भी डर गया था, किन्तु तुम्हारा साथ और तुम्हारे पिताजी के समर्थन में खड़े हो जाने से जो साहस मिला, उसके परिणाम स्वरुप स्कूल को कोई हिला नहीं पाया। हमारे पढ़ाये बच्चों के परिणाम देखकर, नदी की दूसरी ओर के भी कई छात्र नए विद्यालय में आने लगे थे। मुझे तो देख लेने की धमकी तक मिल चुकी थी, पर तुम्हारे पिता जी ने बोला, कोई आंख उठाकर तो देखे। उसके बाद तो मेरा डर समाप्त हो गया।'

'तुम्हे पता है! छपरी वाले मुझे दूने वेतन का प्रलोभन भी दिए थे। स्कूल तोड़ने  के लिए क्या क्या चाल नहीं चले। उस बंजर भूमि को खाली कराने के लिए, कुछ लोगों ने भगवान् सिंह को भड़काना प्रारम्भ कर दिया था। सीधे नहीं माने तो उनके साले के द्वारा भी कहलवाए कि वे मलिकपुरा में विद्यालय को न चलने दें।  किन्तु इस पूरे क्षेत्र में वे ही सबसे अधिक पढ़े लिखे थे और शिक्षा के महत्त्व को भली जानते थे। अपने गांव में चल रहे स्कूल को कैसे बंद करवा देते। और तो और, उनके शिक्षा विभाग में कार्यरत होने का विद्यालय को भरपूर लाभ मिला। वे, न ही केवल दृढ़ होकर बोले 'स्कूल यहीं चलेगा', अपितु इसको मान्यता भी दिलवा दिये। यह विद्यालय तो कालांतर में डिग्री कालेज हो गया और छपरी का विद्यालय बंद ही हो गया। तुम तो दिल्ली चले गए, मैं यहीं लगा रहा और उप प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत्त होकर पेंशन ले रहा हूँ।'

'क्या करता, उस समय मात्र बारह रुपये का तो वेतन मिलता था, और उस बारह रुपये वेतन के लिए ढाई कोस पैदल चलकर आना पड़ता। हमारे पास साइकिल तक नहीं थी। बच्चों से दो दो आना फीस ली जाती और उसी में से अध्यापकों का वेतन दिया जाता। मेरी बहन दिल्ली में थी, उसने बुलवा कर पचास रुपये की नौकरी दिलवा दी। फिर मैंने वहां जाकर, कमला को भी बुलवा लिया। कमला को भगवान सिंह ने बहुत रोका, पर अधिक कमाने की ललक नहीं रोक पाई। वैसे भगवान सिंह ने बहुत कहा, आगे चलकर वेतन बढ़वा देंगे और यहाँ मुख्याध्यापक बनने का भी अवसर है। पर मैंने ही वहां अधिक वेतन होने के कारण दिल्ली आने पर जोर दिया। कुल मिलाकर जिंदगी तो अच्छी रही, पर इस बात का मलाल रहा कि अपने लगाए पौधे को सींच नहीं पाए।'

'वैसे रुक जाते तो बुरा नहीं था। बाद में तो यहाँ भी अच्छा वेतन हो गया था। भगवान सिंह के सहयोग से विद्यालय को सरकारी अनुदान मिल गया और भवन भी बन गया। भगवान सिंह के शिक्षा विभाग में होने के कारण विद्यालय ने मुड़ कर वापस नहीं देखा। सरकार की मदद से, पूर्व माध्यमिक से माध्यमिक, माध्यमिक से डिग्री कॉलेज और फिर पोस्ट ग्रेजुएट, आगे बढ़ता ही गया। और आज कम से कम भी तो कुल चार हजार बच्चे इस संस्थान से प्रति वर्ष शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यहाँ के पढ़े छात्र कई जगह ऊँचे पदों पर भी जा पहुंचे हैं। '

'यही होता है, पेड़ लगाने वाला, खुद कहाँ फल खाता है। अभी आई।' कहते हुए मातबर की पत्नी उठकर चल दीं
और तुरंत ही कटोरे में पकौड़े लेकर आ गयी।
'अरे, वाह भाभी, अभी गयी और इतनी जल्दी पकौड़े!' वंशनारायण ने बड़े आश्चर्य से पूछा।
'हाँ, हम यहाँ बैठे थे तो अंदर बहू  बना रही थी। आज, पुराने ज़माने के दो शिक्षक मिले हैं, वो भी मलिकपुरा स्नातकोत्तर महाविद्यालय के संस्थापक, उनका मैं, और किस वस्तु से स्वागत करूँ। तब तक पकौड़े खाइये, अभी हलवा लेकर आती हूँ। हमारी और इनकी तो अभी नहीं हुई है, आप दोनों के मिलने की स्वर्ण जयंती भी हो चुकी है।'
एक दूसरे से मिलकर बंशनारायण और मातबर दोनों ही बहुत भाव विभोर थे।

Dukh ki maari Rajkumari

मसली फुलवा / सुलगती जिंदगी / जिंदगी सुलगती रही

नाम तो फुलवा था, मगर विवश थी, मसली हुई जिंदगी बिताने को। उसके साथ जो कुछ भी घटित होता, विधि का विधान समझ, सह लेती। उसने खुद को इतना साध लिया था कि उसके आगे दुःख बौना लगने लग गया था। दुखों में रहने की ऐसी आदत पड़ गयी थी कि सुख की कभी चाहत ही नहीं होती। श्रीमद भागवत गीता का अध्ययन तो नहीं की थी, मगर मूल मन्त्र उसके मानस पटल पर अंकित था।  उसे पूरा भरोसा था, देने वाला वही है और उतना ही देगा, जितना उसे देना है, अन्यथा परिश्रम में किसी से कम कहाँ थी। लगभग पूरी उम्र, जिंदगी का लाश ही ढोई। फुलवा को जीती जागती जिंदगी जीने का तो अवसर ही नहीं मिला।

यूँ तो बचपन में सब ठीक ठाक था। एक साधारण परिवार में ही पैदा हुयी, पर माँ बाप के प्यार में कोई कमी नहीं थी। फुलवा के माँ बाप पढ़े लिखे नहीं थे और स्कूल गांव से दूर था, बेटी को भी नहीं पढ़ा पाये। अभी तो अठारह भी पूरे नहीं हुए थे कि माँ बाप ने एक लड़का ढूंढ कर विवाह कर दिया। ससुराल की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं थी, अपितु मायके से निम्नतर ही थी। फुलवा का ससुर सुमेरचंद, फेरी लगाकर कुछ सामान बेचता और उसी से परिवार चलाता। उसका पति देवचंद भी पांचवी से ऊपर नहीं पढ़ा था, और छोटे पर से ही, अपने पिता के काम में लग गया था। सुमेर के स्वर्गवास के बाद, घर का पूरा कार्यभार देवचंद पर ही आ गया। गांव गांव घूमने में परिश्रम अधिक था और लाभ बहुत कम। किसी प्रकार से परिवार का भरण पोषण हो पाता। फुलवा के मायके का एक व्यक्ति, मुम्बई रहता था, उससे बात करके देवचंद को भी मुम्बई भिजवा दी। वहां जाकर, वह चना और मूंगफली बेचने लगा। मुम्बई में गांव से अधिक कमाई हो रही थी, मगर वहां का खर्च भी उसी तरह का था, खोली का ही कितना भाड़ा लग जाता। फिर भी कुछ न कुछ बचाकर, घर भेज देता। देवचंद अपने घर को पक्का बनवाना चाहता था। जब तक वह मुम्बई में रहा, उसके भेजे पैसे से पक्के घर की नींव डाल दी गयी और एक कमरे की दीवार भी चुन ली गयी, मगर उस पर छत पड़ने का योग नहीं हो पाया। गांव वालों से घास फूस मांग कर, किसी तरह से ऊपर छप्पर ही पड़ पाया।

इधर फुलवा बड़ी कठिनाई से अकेले जीवन काट रही थी। उसे बस पड़ोस की सीता चाची का ही सहारा था। अपना सुख दुःख  वह सीता चाची से कह लेती। समय बीता उसने एक पुत्री को जन्म दिया; सीता चाची के सहारे सब ठीक ठाक हो गया। तीन वर्ष बीते, उसने पुनः गर्भ धारण किया। देवचंद तो मुम्बई में ही था, इसलिए इस बार वह मायके चली गयी, और वहां एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। मुम्बई में देवचंद अस्वस्थ रहने लगा और फुलवा के बच्चों के साथ अकेले रहने की चिंता भी सता रही थी। इस कारण, कुछ वर्षों में काम धाम छोड़ कर वापस अपने गांव आ गया। आखिर फुलवा को भी पास पड़ोस पर कब तक छोड़ता। देवचंद की बीमारी ने गंभीर रूप धारण कर लिया। अभी बेटी शीला तेरह वर्ष की ही थी, देवचंद दुनिया छोड़, चल बसा। अब तो फुलवा की जिंदगी में केवल अंधकार ही था। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि वह क्या करे ? उसका एक एक पल,  गीली लकड़ी की तरह सुलग रहा था। अब कमाई का कोई साधन भी नहीं था, और दो दो बच्चे साथ। देवचंद ने कोई बीमा तक नहीं करवा रखा था, ताकि उसके मरने पर, फुलवा को कुछ मिल पाता। अब, फुलवा को एक एक पैसे के लिए जूझना पड़ रहा था। मज़बूरी क्या न करवा दे। फुलवा ने पंडित शिवशंकर के घर बर्तन मांजना शुरू कर दिया। पंडित जी के यहाँ काम करने से उसका गुजर होने लगा।  कभी कभी बचा खुचा खाना भी मिल जाता, जिसे खाकर बच्चे खुश हो जाते। पंडितानी उदार थीं, त्यौहार वगैरह पर साड़ी लुग्गा भी दे देती थीं।

शीला अभी अट्ठारह की भी नहीं थी कि फुलवा के मायके से सन्देश आया, कोई लड़का देख रखा है, विवाह कर दे। शीला तो अभी नासमझ थी ही, फुलवा के पास भी, ना नुकुर करने का कोई कारण नहीं था। मायके वालों की बात से  लगा कि लडके वाले ठीक ठाक हैं तो फुलवा सोचने लगी, वे शीला से शादी करेंगे भी या नहीं। रुपये पैसे तो थे नहीं, मगर लडके वाले फुलवा के भाई के दबाव में थे और शीला बहुत सुन्दर थी। उन्होंने शीला की सुंदरता पर, बिना किसी लेन देन के शादी कर लिया। फुलवा को लगा कि वह एक बहुत बड़े दायित्व से मुक्त हो गयी। अब बस लड़का है, बर्तन भांडे मांज कर पाल ही लेगी। थोड़ा बड़ा हो जायेगा तो वह उसका सहारा भी बन जायेगा।

एक दिन सुबह की किरणें आते ही, उसकी जिंदगी में आग लगा दीं। अभी वह सूरज को जल चढ़ाने की तैयारी कर रही थी कि शीला के ससुराल से समाचार आया, वह पिछली रात खाना बनाते हुए जल गयी, और घर पर ही दम तोड़ दी। फुलवा के तो सिर पर पहाड़ टूट पड़ा। हे भगवान ! आज यह दिन देखने के लिए जिन्दा ही क्यों रखा था! मगर, वह रोने धोने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती थी। बेटी के ससुराल वालों के कहे का उसे विश्वास करना ही था। पुलिस से जाँच करवाने की न तो उसके पास ज्ञान था, न ही हिम्मत। उसके अपने ही कष्ट कुछ कम नहीं थे। यूँ तो उसके मन में तरह तरह के प्रश्न उठते, आखिर वह खाना बनाते समय कैसे जली होगी ? खाना बनाना तो छोटे पर से ही सिखा दिया था। कहीं उसके ससुराल वालों ने त्रास तो नहीं दिया ? अथवा वे जलाकर मार डाले हों कि और अच्छी, दान दहेज़ वाली बहू मिल जाएगी। बेटी की मृत्यु के रहस्य को वह जिंदगी भर ढोती रही। उस संकट की घड़ी में भी उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। दुखों का एक एक पल, वह पी गयी।

फुलवा बहुत सुन्दर थी, पर पढ़ी लिखी नहीं होना उसे पग पग पर चुभ रहा था। विधवा होने के कारण वह सदा सशंकित रहती कि दामन में कहीं कोई दाग न लग जाय।  इसीलिए किसी से कोई मदद के लिए भी नहीं कहती।
एक बार ठाकुर बलदेव सिंह ने उसकी ओर सौ रुपये का नोट बढ़ाया तो लेने से साफ मना कर दी। 'साहब कोई काम दे दीजिये, जाने कौन से कर्म किये, ऊपर वाले ने इस जन्म में इतने दुःख दिए, अगला जन्म भी क्यों बिगड़वाना चाहते हैं। इस तरह खैरात लेकर मैं चैन से कैसे मरूँगी।'

एक दो लोग और उसकी मदद तो करना चाहते थे मगर डरते थे, कहीं कोई आक्षेप न लग जाये। फुलवा  भी आंख उठाकर किसी की ओर नहीं देखती। पड़ोस की एक दो औरतों से बात करके, अपना मन कुछ हल्का कर लेती। इक्कीसवीं शताब्दी में भी फुलवा को इस प्रकार की जिंदगी बितानी पड़ रही थी। उसके पास न तो कोई नेता फटकता न ही कोई समाज सेवी। कहते हैं न, गरीबी में अपना साया भी साथ छोड़ देता है। पंडित शिव शंकर के घर से उसे जो कुछ सहारा मिलता था वह भी जाता रहा। पँ शिवशंकर के मरने के पश्चात बर्तन मांजने का काम उनकी बहुओं ने अपने हाथ में ले लिया और फुलवा फिर से बिना काम के हो गयी। अब तो वह दाने दाने को तरसने लगी। किसी से कुछ मांगना उसके आत्मसम्मान के विरुद्ध था।

उसके बाद तो फुलवा को ऐसा काम करना पड़ा जो न तो किसी ने देखा होगा न ही सुना होगा। गांव में कई भूमिहीन लोग किसी की जमीन लेकर अधिया पर खेती कर लेते हैं, परंतु स्त्री होने के कारण वह यह भी नहीं कर सकती थी। पंडित जी के यहाँ दो भैंसे थीं, फुलवा ने उनके बेटे पुन्नर को प्रस्ताव दिया की भैंसों का गोबर उठाकर वह उपले पाथ देगी और आधा उसे दे देगी। यह बात उसे पसंद आई, मुफ्त में ईंधन का काम जो चलना था। सौदा तय हो गया।  इसके बाद वह उपले बेचकर अपना बसर करने लगी। उसे अब ईंधन का कोई अकाज नहीं है। वह दिन अभी तक याद है, जब एक दिन घर में ईंधन नहीं होने के कारण चूल्हा नहीं जला था। अब तो ईंधन के लिए पहले रख लेती है, उसके ऊपर का ही बेचती है। भाग्य ने एक बार और तमाचा मारा। पंडित जी की एक भैंस बीमार हो गयी, खाना पीना बंद कर दिया और साथ ही गोबर भी। अब मिलने वाला गोबर आधा हो गया। उसने उपले पाथा तो घनघोर घटा घिर आई। उसे बड़ी चिंता होने लगी, घर में ईंधन समाप्त हो गया था। उसने ढूंढ ढूंढ कर, टाट बोरों से उपलों को ढक दिया ताकि उपले का गोबर कहीं बारिश में बह न जाय। उपले सूख नहीं पाए। आखिरकार पंडित जी के घर से उधार मांग कर लाई। पर मुसीबत पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। जब चूल्हा जला तो पता चला, आटा समाप्त था। अब क्या करती, चाची के घर से मांग कर रोहित को दाल चावल खिला दी और अपने लिए, घर में थोड़ा चना पड़ा था, तवे पर भून कर खाई। ईश्वर ने भी किस प्रकार से भाग्य बांटे, नागफनी में भी फूल खिलते हैं पर फुलवा की जिंदगी में, बस कांटे ही कांटे।

सरकारी योजनाओं का उसे कोई ज्ञान नहीं था। एक दिन पुन्नर के यहाँ गांव का प्रधान आया था। पुन्नर ने प्रधान से बात करके विधवा पेंशन के लिए फॉर्म भरवा दिया। डूबते को तिनके का सहारा, उसे तीन सौ रुपये महीना पेंशन मिलने लगी, इससे रोहित की पढ़ाई का खर्च निकल जाता। बेटा अब कुछ समझदार हो चुका था। माँ का गोबर पाथना, उसे अच्छा नहीं लगता। उसने जिद्द करके, माँ से यह काम छुडवा दिया और गांव के पास चट्टी पर, चाय की दुकान खुलवा दी। सड़क की पटरी पर बैठ, माँ बेटे दोनों चाय बेचने लगे। इस काम में भी बस खाने भर को ही मिल पाता। धीरे धीरे रोहित बारहवीं पास कर चुका था। फुलवा ने उसे मुम्बई भिजवा दिया । उसे छोटी मोटी नौकरी तो मिल गयी, पर पगार बहुत कम थी। फुलवा अब घर में अकेले रहती। अकेले का खाना बनाने का भी जी नहीं होता। कभी गांव में किसी के यहां जाती, पूछ देता तो खा लेती, कभी भूखे भी सो जाती। कोई भी खाने को पूछता तो बदले में कुछ न कुछ काम अवश्य कर देती। वह किसी का  मुफ्त का नहीं खाना चाहती थी।

रोहित, मुम्बई की चमक धमक देखकर बहुत प्रभावित था। उसने गरीबी को बहुत समीप से देखा था। अतः इस स्थिति से निकलने के लिए संकल्पित था। माँ को खर्च के लिए पैसे भेजने के बाद, कुछ अपनी पढ़ाई में लगा देता। उसने दूरवर्ती शिक्षा योजना के अंतर्गत बी० ए० कर लिया। उसके बाद किसी अन्य कंपनी में, उसे अच्छी नौकरी मिल गयी। इधर शीला अब बूढी हो चुकी थी, बीमार थी। बेटे की कमाई से घर की छत पड़ गयी थी। अब उसे अपनी जरूरतों के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ता था। जो कुछ पैसा वह भेजता, उसमें बड़े आराम से काम चल जाता। अब उसका काम केवल अपने घर को संवारना और राम राम जपना रह गया था। 

एक दिन बेटे का फोन आया,  'माँ, मैं अगले सप्ताह आ रहा हूँ, तेरे खाते  में मैंने बीस हजार रुपये डाल दिया है। इस बार तेरे लिए गैस का कनेक्शन और नल लगवा दूंगा, और तुझे मुम्बई घुमाने ले चलूंगा।' फुलवा पास पड़ोस को बड़ी खुश होकर, रोहित के फ़ोन की बात बताती। पूरे गांव में ढिंढोरा पिट गया था कि फुलवा मुम्बई जा रही है। अभी तीन दिन ही बीते थे, फुलवा की  तबियत अचानक  बिगड़ गयी। पड़ोसियों ने डॉक्टर को बुलाया, हजारों रुपये की दवा आई, मगर कोई लाभ नहीं हुआ। पड़ोस की महिलाएं बार बार आकर उससे हाल चाल पूछ जातीं, वह यही कहती 'अब कोई चिंता नहीं बस दो दिन में रोहित आ जायेगा। सब सम्हाल लेगा।' उसकी नाजुक हालत देखकर सीता चाची की बहू, आज फुलवा के ही घर सोयी। उसे रात में भी कई बार दवा देनी थी। कल रोहित को भी आना था। सुबह होते ही फुलवा की जोर जोर से सांसें चलने लगी। बहू ने अपने घर से सबको बुला लिया। देखते ही देखते पास पड़ोस के कई लोग एकत्र हो गए। डॉक्टर को तुरंत ही बुलाया गया। मगर फुलवा किसी का एहसान अपने सिर पर नहीं लेने वाली थी। रोहित के आने तक, उसकी लाश घर के बाहर निकाल दी गयी थी।

पूरे गांव ने उसकी जिंदगी को तिल तिल सुलगते देखा था। उसका सब्र, उसकी सहनशक्ति, उसकी सादगी, उसके सात्विक विचार, ईश्वर में अटूट विस्वास, सभी के लिए उदारहण बन गए थे। कहते हैं, गरीब की भी कोई जिंदगी होती है! परंतु मौत तो सभी की होती है। अब पूरे गांव की सहानुभूति उसके साथ थी। आज सारा गांव, उसके यहां उमड़ पड़ा था। उसके शव पर लोग फूल और चादर चढाने लगे।  शव पर चादरों का अम्बार लग गया। लग रहा था उसकी जिंदगी अब शुरू हुई है। उसकी शव यात्रा के लिए पचासों लोग एकत्र हो गए। पुन्नर ने शव यात्रा के लिए अपने खर्चे पर बैंड बाजा भी बुलवा लिया। सभी कह रह रहे थे, इतनी भव्य शव यात्रा तो अभी तक यहाँ के कई गांव के लोगों की नहीं निकली होगी। और उसके चिता की लौ तो इतनी ऊँची कि जैसे आसमान छू रही हो।  फुलवा, जिंदगी से तो कुछ नहीं पाई, परंतु जो मौत पाई, दुनिया ने देखा।