Sunday, 18 January 2015

Sath jiyenge

साथ जियेंगे

लेक्चरर इतनी तेजी से बोल गया कि कुछ बातें पल्ले ही नहीं पड़ी। जैसे ही लेक्चर समाप्त हुआ, ईशा ने
आशुतोष से पूछ लिया, तुम्हें इस प्रोग्राम का सिंटेक्स समझ आया ?
'हाँ'
'मुझे एक जगह थोड़ा कन्फूजन रह गया।'
'अच्छा, चलो कैंटीन चलते हैं, मैं क्लियर कर दूंगा।'
कैंटीन जाकर, आशुतोष ने ईशा की समस्या हल कर दिय। चाय पीने के बाद आशुतोष ने ईशा से कह दिया,
'कभी कोई प्रॉब्लम (समस्या) आये तो बता देना।'
फिर तो प्रॉब्लम आने का क्रम बढ़ता गया, बिना प्रॉब्लम के भी प्रॉब्लम आती रही और कैंटीन में जाकर हल होती रहीं। दोनों कभी कैंटीन में तो कभी लाइब्रेरी में बैठ अपनी प्रॉब्लम सॉल्व करते करते दोस्त बन गए। ईशा ने बिहार बोर्ड से उच्चतर माध्यमिक परीक्षा पास किया था और आशुतोष पंजाब बोर्ड से। इंजीनियरिंग करने के लिए दोनों को लखनऊ के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिला। समय के साथ उनकी मित्रता बढ़ती गयी और फाइनल करते करते एक दूसरे को चाहने लगे। अंतिम सत्र की परीक्षा सिर पर आ चुकी थी। परीक्षा की तैयारी जोर शोर पर थी। परीक्षा समीप आने के साथ उनकी चिंता भी बढ़ती जा रही थी कि परीक्षा के पश्चात दोनों को अपने अपने घर चले जाना होगा। फिर तो मिलना भी मुश्किल हो जायेगा। कहाँ पंजाब में जालंधर और कहाँ बिहार में पटना! फिर उसके आगे न जाने कौन क्या करेगा, कहाँ जॉब मिलेगी? खैर अभी परीक्षा पर ध्यान देना जरूरी था, आगे के कार्यक्रम की रूप रेखा परीक्षा के बाद तय की जाएगी, यह सोच कर दोनों परीक्षा में जुट गए।

उधर परीक्षा से पहले ही प्लेसमेंट (नियुक्ति) के लिए कंपनी वाले इंटरव्यू (साक्षात्कार) लेने आये थे। ईशा को इंटरव्यू में ही बता दिया कि उसका सिलेक्शन (चयन) हो गया और परीक्षा के पश्चात ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) के लिए मुंबई जाना है। ईशा अपने चयनित होने पर बहुत प्रसन्न थी, घर पर बताने की फ़ोन मिला ही रही थी कि उसे आशुतोष का ध्यान आ गया। सोची इसके बारे में वह घर बताएगी तो मम्मी पापा मुंबई जाने पर जोर डालेंगे, पहले वह आशुतोष का भी देख ले, तभी घर पर बताएगी। थोड़ी देर बाद इंटरव्यू हाल से आशुतोष भी आता हुआ दिख गया। ईशा ने पूछा, 'और कैसा हुआ इंटरव्यू ?'
'हमारा इंटरव्यू कहाँ हुआ !'
'क्यों, क्या हो गया?'
'उन्होंने बोला, जरूरत भर कैंडिडेट (उम्मीदवार) हो चुके हैं। अब दूसरी कंपनी में अवसर मिलेगा। और तुम्हारा क्या हुआ ?'
'मुझे तो बोल दिया है, एग्जाम के बाद मुंबई ट्रेनिंग के लिए जाना है।'
'चलो अच्छा हुआ, बधाई। तुम मुंबई जाओ, हमारा देखो क्या होता है।'
'तुम्हारे बिना मैं मुंबई कहाँ जाने वाली हूँ। इसीलिए तो अभी घर पर भी नहीं बताया है। तुम्हारा जहाँ होगा मैं भी वहीँ कोशिश करुँगी।'
'चलो अच्छी बात है, पहले परीक्षा देते हैं। फिर बाद में ये सब सोचेंगे।'
'मैं तो सोच रही थी परीक्षा में फेल हो जाते हैं। इसी बहाने एक साल और यहीं साथ रहेंगे।
'ईशा, लगता है तू तो पागल हो गई है। इंजीनियरिंग पूरी करके जॉब भी तो एक जगह ढूंढ सकते हैं।'
 'हा हा हा ..., वो तो मजाक कर रही थी। मैं तो उसी जगह पर जॉब ढूंढूंगी, जहाँ तुम करोगे।'
'चलो ठीक है, अब लगन से एग्जाम दो और मुझे भी डिस्टर्ब (तंग) नहीं करना।'
    
दोनों तन्मयता से पढ़ाई में जुट गए और कुछ दिनों में परीक्षा समाप्त हो गयी। परीक्षा समाप्त होते ही दोनों मिले। 'और कैसे पेपर हो गए?' आशुतोष ने ईशा से पूछा।
'अच्छे हो गए। और तुम्हारे?'
'अपनी तरफ से तो मैंने भी अच्छा कर दिया बाकी कॉपी जांचने वाला जाने।'
'हा हा  ... ,  अब तो घर जाने का समय आ गया। तुम्हारा क्या कर्यक्रम है?'
'देखते हैं अभी कुछ निर्णय नहीं लिया। तुम कब जा रही हो?'
'बस, परसों।'
'परसों! टिकट हो गया?'  
'हाँ, और तुम्हारा ?'
'अभी नहीं।'
'इतनी जल्दी क्यों जा रही हो! कुछ दिन और रुकते हैं। '
'मगर, मम्मी पापा को क्या कहूँगी?'
'कह देना, अभी प्रैक्टिकल बाकी है या असाइनमेंट जमा करना है। शुक्रवार को दो नयी फिल्में आ रही हैं साथ देखते हैं। बीच में नैनीताल घूम आते हैं।'
'नैनीताल तो नहीं जा पाऊँगी हाँ एक दो दिन रुकने का देख लेती हूँ, मगर टिकट?'
'वो देख लेंगे कुछ पैसे ही तो कटेंगे।'
'ठीक है, मैं अपनी रूम पार्टनर से बात कर लेती हूँ, और टिकट एक दिन आगे का करा लेती हूँ। वैसे भी एक सप्ताह से अधिक हॉस्टल में रुकने की अनुमति कहाँ है।'
आशुतोष के आग्रह पर, ईशा एक दिन और रुक गयी। परीक्षा के अगले दिन दोनों ने साथ फिल्म देखी। और घर जाने से पहले कुछ शॉपिंग कर लिया। आज ईशा को गाड़ी पकड़नी है, आशुतोष उसे छोड़ने स्टेशन पहुँच गया। आशुतोष को तो अभी दो दिन बाद जाना है। आशुतोष के लिए आज का दिन बहुत दुःख भरा है, धीरे धीरे गाड़ी खिसकनी शुरू हो गयी। ईशा को अपने से दूर होते देख के आशुतोष के आँखों में आंसू छलक आये। ईशा भी आंसू बहाये बिना कहाँ रह पाती। नम आँखों से वह विदा हो गयी। और रूक कर आशुतोष पछताता ही रहा। उसका मन बहुत उदास था। अब वह ईशा के जाने के अगले ही दिन चला गया।  

अब तो दोनों की फोन से ही बात हो पाती। कहाँ पटना और कहाँ जालंधर, मिल पाना तो असंभव प्रायः ही था। लेकिन दोनों का एक दूसरे के बिना रहना भी कठिन था। एक दिन आशुतोष ने फ़ोन पर प्रस्ताव रखा, 'क्यों न हम दोनों लखनऊ में एम. टेक. में प्रवेश ले लें? इसी बहाने दो वर्ष और साथ रहेंगे, फिर उसके बाद देखेंगे कि क्या करना है।'
 ईशा को यह आईडिया पसंद आया और उसने हां भी कर दिया। दोनों एम. टेक. की प्रवेश परीक्षा में बैठे। मेरिट के आधार पर ईशा को तो प्रवेश मिल गया, पर आशुतोष असफल रहा। अब ईशा के सामने बड़ी समस्या हो गयी, जिस उद्देश्य से वह एम. टेक. करने की सोची वह पूरा ही नहीं हो पा रहा है। अकेले एम. टेक. करने की उसकी बिल्कुल भी इच्छा न थी। एक बार तो वह जॉब की तिलांजलि दे ही चुकी थी, अब एम. टेक. भी छोड़ने का मन बना लिया और अपने इरादे से आशुतोष को अवगत करा दिया। किन्तु आशुतोष ने उसे प्रवेश लेने पर जोर दिया, और समझाया कि वह एम. टेक. में प्रवेश ले ले तब तक वह स्वयं भी किसी न किसी बहाने लखनऊ आ जायेगा। चाहे किसी और कोर्स में प्रवेश ले ले या कोई जॉब ढूंढ लेगा। ईशा का साथ पाने के लिए आशुतोष कुछ भी करने को तैयार था। आशुतोष ने लखनऊ में एक नौकरी ढूंढ ली। समय बीता, और ईशा का एम. टेक. भी पूरा हो गया। अब साथ रहने का बहाना बनाने की और कोई गुंजाईश नहीं थी । बस या तो दोनों को एक ही स्थान पर जॉब मिले या फिर शादी कर लें। वैसे ईशा को उसी इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने का प्रस्ताव मिल रहा था किन्तु वह लेक्चरर नहीं बनना चाहती थी। 

आशुतोष ने प्रस्ताव रखा, चलो शादी कर लेते हैं, फिर साथ मिलकर भविष्य की योजना तय करेंगे। आशुतोष ने कह तो दिया पर  ईशा के लिए यह इतना आसान नहीं था।  वह अपने माँ बाप से पूछे बिना ऐसा कदम नहीं उठा सकती थी।
आशुतोष से बोली - 'ठीक है मम्मी पापा से बात करूंगी।'
'अगर वे नहीं माने तो।'
'मैं मना लूंगी।'
ईशा ने घर जाकर, मम्मी पापा से शादी की बात किया, मगर उसे बड़ा स्पष्ट उत्तर मिला 'नहीं'। दोनों अलग राज्य के और जाति भी अलग अलग। यह ईशा के परिवार को कत्तई पसंद नहीं। पंजाब की संस्कृति बिहार से भिन्न, और फिर माँ बाप बेटी को इतनी दूर कैसे भेज सकते थे। वे शादी के लिए पहले ही एक लड़का देख रखे थे, बस ईशा के एम. टेक. की प्रतीक्षा थी। संभ्रांत परिवार, वह भी एम. टेक., अपने जाने सुने लोगों में, ऐसी सुन्दर  जोड़ी सरलता से कहाँ मिलती है। ईशा को जब पता चला तो उसके नीचे से जमीन खिसक गयी। उधर आशुतोष का परिवार भी ईशा के साथ शादी से सहमत नहीं था। अब तो आशुतोष और ईशा के पास एक ही विकल्प था कि अभी शादी के लिए ना कर दें,  हो सकता है कुछ समय के बाद घर वाले मान जाएँ। आशुतोष जॉब कर ही रहा था, कुछ दिनों में ईशा भी कोई जॉब ढूंढ लेगी।

 थोड़ा समय और बीता मगर, दोनों को कोई सफलता नहीं मिली। दोनों के ही परिवार इस सम्बन्ध को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। अब वे सोचने लगे कि कोर्ट मैरिज कर लें।

इसी बीच आशुतोष को एक मित्र से पता चला, ऑस्ट्रेलिया में टेक्निकल योग्यता वालों के लिए, वहां का स्थाई निवासी होने का अवसर दिया जा रहा है, उसके लिए जी.आर.ई. का स्कोर और आई.इ.एल.टी. की परीक्षा का ग्रेड प्रमुख मानदंड है। बाकी कुछ और औपचारिकतायें हैं, वो एजेंट बता देगा। आशुतोष सोचा वहीँ जाने की योजना बनाई जाय। चुपके से कोर्ट में शादी करके ऑस्ट्रेलिया के स्थायी निवासी का आवेदन पत्र दे दिया जाय। वहां जाने के बाद किसी के कहा सुनी का कोई चक्कर नहीं होगा, और धीरे धीरे दोनों के मम्मी पापा भी  सामान्य हो जायेंगे।

आशुतोष ने ईशा के बारे में बिना कुछ बताये, ऑस्ट्रेलिया के स्थायी निवासी के लिए आवेदन की बात घर पर बताया। विदेश जाने के नाम से आशुतोष का परिवार प्रसन्न हो गया। एक तो बेटा विदेश चला जायेगा, दूसरे उस बिहारन से शादी से भी छुटकारा मिल जायेगा। वहां अच्छी जॉब के साथ अच्छी कमाई होगी। आशुतोष ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी की औपचारिकताएं पूरी करने में जुट गया और उसे घर वालों से भी पूरा सहयोग मिला। साथ ही कोर्ट मैरिज करके ईशा से भी आवेदन करवा दिया। एक वर्ष प्रतीक्षा के पश्चात, एक प्रातः की किरणें उसके लिए जीवन की सबसे बड़ी खुशखबरी लेकर आई। अपना ईमेल खोलते ही आशुतोष सुखद आश्चर्य से झूम उठा, वह था ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी होने की अनुमति। वह फूले नहीं समाया, सबसे पहले ईशा को यह बात बताया और फिर फ़ोन पर, अपने मम्मी पापा को। आशुतोष ने ईशा से कहा तुम भी अपना ईमेल देखो तुम्हारा क्या हुआ। ईशा ने देखा तो उसे कोई सूचना नहीं आयी थी। आशुतोष ने एजेंट को फ़ोन मिलाया, एक पी. आर. आने का धन्यवाद करते हुए ईशा के नहीं आने की शिकायत भी की।
एजेंट ने परामर्श दिया एक दो दिन प्रतीक्षा कर लो, वो भी आ जायेगा। 

दोनों ऑस्ट्रेलिया की पी. आर. (परमानेंट रेजिडेंट) मिलने की ख़ुशी में शाम को रेस्तरां में खाने चले गए। आशुतोष के पी. आर. से दोनों बहुत खुश थे पर, ईशा के नहीं आने से चिंतित भी। ईशा को चिंता सताने लगी कि कहीं आशुतोष उसे छोड़कर अकेला न चला जाय और उसे भूल न जाय। बात बात में वह अपनी चिंता प्रकट भी कर दी। आशुतोष समझाता रहा कि यह सब वह उसी के लिए कर रहा है, जब तक उसका पी. आर. नहीं आ जाता, वह ऑस्ट्रेलिया नहीं जायेगा। फिर भी आशुतोष ने ऑनलाइन ही एक ऑस्ट्रेलियाई कंपनी में जॉब के लिए अप्लाई कर दिया। बस दो ही दिन बीते थे, ईशा ने जैसे ही अपना लैपटॉप खोला वह भी ख़ुशी से चिल्ला उठी। उसने तुरंत आशुतोष को बताया कि उसका भी पी. आर. आ गया। बस फिर था अब तो ऑस्ट्रेलिया जाने की तयारी आरम्भ।

ईशा ने अपने मम्मी पापा को बताया तो उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। उसके मम्मी पापा उसे अकेले विदेश नहीं जाने देना चाहते थे। उन्होंने ईशा को बहुत समझाया कि वह अकेले विदेश कहाँ जाएगी। फिर बाद में इंडिया में शादी होने में बड़ी परेशानी आएगी। उन्हें क्या पता था कि ईशा अब ईशा कौर हो चुकी है। ईशा ने इस अवसर का लाभ उठाना चाहा, उसने अपने मम्मी पापा के समक्ष दो शर्तें रख दी। या तो वे आशुतोष से शादी कर दें या वह ऑस्ट्रेलिया जाएगी। उसकी जिद्द के आगे, मम्मी पापा को आशुतोष से विवाह करना अधिक उचित लगा। जब दोनों के परिवार को पता चल गया कि उन्हें अब ऑस्ट्रेलिया जाने से उसे कोई नहीं रोक सकता, और वहां जाकर दोनों शादी कर ही लेंगे। इससे अच्छा यहीं अच्छी तरह से शादी कर दें, ताकि वे ख़ुशी ख़ुशी यहाँ जांय और सुखपूर्वक रहें। साथ ही समाज में प्रतिष्ठा भी बची रहे।
सभी बाधाओं को पार करते हुए, दोनों का धूमधाम से विवाह संपन्न हो गया, और ऑस्ट्रेलिया में सुख पूर्वक जीवन बिताने लगे ।  
  




Apana kam khud

अपना हाथ जगन्नाथ

'रूबी, तू रोटी बना रही है, हम तो बाजार से रेडीमेड ही लाते हैं। वही चूल्हा चक्की में लगे रहें तो विदेश आने का फायदा ही क्या। ' सुमन ने कटाक्ष भरे अंदाज में कहा।

'अरे चूल्हा चक्की में नहीं लगे तो, अपने देशी स्वाद से वंचित भी तो रहेंगे। बाजार का खाना रोज रोज तो खाया नहीं जाता। वही पिज्जा, बर्गर, पास्ता और पाई। हम लोगों को तो, घर का पकाया ही पसंद आता है। '

'अरे यार सब बनाने में कितना तो बर्तन हो जाता है।  फिर सारा अपने आप धोओ। वैसे बनी बनाई सब्जी, रोटी और पराठे भी तो मिलते हैं। ' सुमन बोली।

'रेडी मेड पराठे का पैकेट रखा है, मगर ताजा खाने का स्वाद तो और ही होता है। लंदन में, काम वाली तो रखना सपना है। हम दोनों में से एक की तनख्वाह वही ले जाएगी। तू भी घर का सब काम खुद ही करती होगी ?'

'हां यार, करना ही पड़ता है, कपड़े, फ्लोर की सफाई सब कुछ। इंडिया में ये सुख तो है।  घर की साफ़ सफाई से कोई मतलब नहीं, बस गप्पें लगाते रहो।  बाई आ जाती है, कर जाती है; ऊपर से थोड़ा डांट डपट भी लो तो कोई फर्क नहीं। यहाँ किसी को बुलाओ तो इतना सारा पैसा भी लेगी, और सही गलत करे तो कुछ कह भी नहीं सकते।'

'अपना हाथ जगन्नाथ। बाकी काम जब करते ही हैं, झाड़ू, पोंछा, कपडे सब अपने आप ही करना होता है, तो बर्तन कौन सा बड़ा पहाड़ है। कभी ज्यादा हो जाते हैं तो डिश-वॉशर है ही। मुझे तो खाना बनाना अच्छा लगता है। सुदेश को भी घर का इंडियन खाना ही पसंद आता है। बाहर भी जाते हैं तो इंडियन रेस्तरां ही जाते हैं। हां, कभी कभी मन किया तो पिज्जा वगैरह खा लिया, वैसे बहुत कम।' रूबी बोली।

'चल ठीक है तुझे अच्छा लगता है तो कोई बात नहीं। आज सब्जी क्या बनाई है ?'

'राजमा, भिंडी और भरवा बैगन '

'हा! ये तो मुझे बहुत पसंद है। चल तेरे यहाँ से ही खा के जाउंगी। ' एक पतीले का ढक्कन उठाती है, और इसमें क्या है ?'

'दही बड़े' रूबी ने कहा।

'वाह ! दही बड़े भी बनाए हैं; मजा आ गया, यार! इंडियन डिश की बात ही और है।  यहाँ तो कुछ भी खाओ घूम फिर कर वही। सूखा खाना, पिज्जा, बर्गर या ब्रेड में लपेट कर कुछ भी दे देते हैं। इंडियन खाने जैसा न स्वाद न रस। '

फिर तो सुमन का लेक्चर चलता रहा  -
'भारतीय व्यंजन में जो रस है और कहीं नहीं, न ही इतने प्रकार के पकवान मिलते हैं। क्षेत्र के अनुसार अलग अलग खाना, और स्वाद। उनसे भारत की सभ्यता और संस्कृति जुडी होती है। भोजन में तरह तरह के मसाले पड़े होते हैं, जो पौष्टिक और कई औषधीय गुणों से परिपूर्ण होते हैं।  और तो और ताजा बना खाने की परंपरा।
सही बात है, अपना काम करने में क्या बुराई। सभी अपना काम  करते हैं।'

'अब बस भी कर, चल खाना तैयार हो गया है।  ये, ले चल, खाने की मेज पर लगा, सुमित भी आते होंगे। और हाँ, खाने के बाद बर्तन साफ करा के जाना। ये नहीं कि नैपकिन से हाथ पोंछा और चल दिए। '


Friday, 2 January 2015

Hawksbari ki picnic

हॉक्सबरी की  पिकनिक

पूरे ही ऑस्ट्रेलिया में, सप्ताह में दो दिन, यानी शनिवार व रविवार को, लगभग सभी कार्यालयों में छुट्टी होती है।  गोरे तो धूप सेंकने या सर्फिंग के लिए, समुद्र तट पर चले जाते हैं, लेकिंन भारतीयों का सप्ताह के अंत में, कम से कम एक दिन, अपने अपने समूहों में परस्पर मिलने जुलने का सिलसिला रहता है। सप्ताह की दो छुट्टियों में से एक दिन, घर के सब काम निबटा लेते हैं, तथा एक दिन परस्पर तय करके समूह में किसी रेस्टोरेंट, किसी पिकनिक स्थल या फिर किसी के घर पर एकत्र हो जाते हैं और छोटी मोटी पार्टी हो जाती है। वैसे तो बच्चों के जन्म दिन या खुद के जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि पर पार्टियां होती ही रहती हैं जिसमें परस्पर मिलने और सामूहिक भोज का पर्याप्त अवसर मिल जाता है। पर बीच बीच में कोई न कोई बहाना लेकर, आपस में मिलने और खाने पीने की पार्टी रख लिया जाता है। इस प्रकार जहाँ मनोरंजन हो जाता है आपसी सहयोग की भावना जागृत होती है। पूरा का पूरा समूह एक परिवार की भांति लगता है।

कई बार समूचा समूह अपने अपने घर से खाने का एक एक या दो दो मद बना कर, किसी पार्क या सिंधु तट पर  हैं, वहां सबकी पिकनिक होती है और मिलजुल कर, साथ में खा पी लेते हैं। पिकनिक स्थल पर भी अपना कूड़ा, बचा सामान आदि नियमानुसार निश्चित कूड़ेदान में ही डालना होता है। यानि कि कचरा, कचरे वाले बॉक्स में और पुनः प्रयोग में आने वाली सामग्री, उसके लिए अलग से निश्चित बॉक्स में।

यदि किसी के घर पर भी पार्टी होती है तो ये नहीं कि खाने के बाद हाथ पोंछा और चल दिए। मेजबान की रसोई, बर्तन आदि, सभी लोग मिल जुल कर साफ़ करते हैं। परस्पर मित्रता व सहयोग का यहाँ अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है। वैसे भी यहाँ कामवाली तो होतीं नहीं, अपना काम स्वयं ही करना पड़ता है। सभी के मिल जुल कर, कर लेने से सारा काम चुटकियों में हो जाता है। 

कई बार समूह के लोग शहर से दूर कैम्पिंग के लिए चले जाते हैं। इस बार मुझे भी एक कैंपिंग में जाने का अवसर मिला। लगभग दस परिवार, कैम्पिंग में जाने के लिए तत्पर थे। हॉक्सबरी नदी के तट पर एल्डरिओ नामक रिसोर्ट जो सिडनी से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर था,  हमें वहीं कैंप करना था। सब लोग शुक्रवार की ड्यूटी पूरी करके अपनी अपनी गाड़ी उठाये, और लगभग डेढ़ घंटे में वहां पहुँच गए। अपने गंतव्य तक पहुँचने हेतु हॉक्सबरी नदी भी पार करनी थी। नदी बहुत चौड़ी थी और उस पर कोई पुल भी नहीं बना था। नदी को पार करने के लिए कार फेरी का ही प्रयोग करना था। पूरी फेरी एक बड़े प्लेटफार्म जैसी थी जिस पर कार चलाकर ही अंदर प्रवेश मिल जाता कार में  बैठे बैठे उस पार। पार पहुँच कर बस एक्सीरेटर दबाओ और गंतव्य हेतु निकल जाओ। सैकविल्ले मार्ग पर, चौबीसों घंटे चलने वाली यह फेरी, सरकार की ओर से निःशुल्क व्यवस्था है। दर्जन भर कार एक बार में ले जाने वाली यह फेरी महीने में मात्र तीन घंटे लिए, रखरखाव हेतु बंद किया जाता है, अन्यथा यह चैबीसों घंटे चलती है और  पांच मिनट में नदी को पार करा देती है। नदी पार करके लगभग दस मिनट में गंतव्य स्थल पर पहुँच गए। 

पहाड़ियों के बीच, छोटी सी घाटी; एक अत्यंत रमणीय स्थल था।  पहुंचने में थोड़ा अँधेरा हो गया था जिस कारण उस स्थल दृश्य का स्पष्ट अवलोकन नहीं हो पा रहा था, कहीं कहीं पहाड़ी जंगलों में वापस लौटते हुए कंगारू अवश्य दिख रहे थे। सात साढ़े सात बजे तक हम हॉक्सबरी, अपने लॉज पहुँच गए। दस बारह कमरों वाला एक बड़ा सा लॉज, जो बहुत साफ़ सुथरा था और उसमें रसोई, फ्रिज, बिजली का चूल्हा, गैस, बर्तन सभी कुछ था, पर भोजन स्वयं ही बनाना था। वहां आस पास कोई बाजार नहीं था। बस एक रेस्तरां भर था जो हमारे रिसोर्ट से लगभग एक किलोमीटर पर था, उसमें भी ऑस्ट्रेलिया के अनुसार ही खाने पीने की सामग्री थी। चूकि यह पहले से ज्ञात था, अतः हम लोग गाड़ियों में भर भर कर सामान ले गए थे, ताकि कहीं कुछ कम न पड़ जाये। रिसोर्ट पर पहुँच कर निर्दिष्ट स्थान पर रखी चाभी उठाई और लॉज खोल कर सबने अपने अपने कक्ष का चयन कर लिया। मौसम का सुहाना समां मन को अत्यंत भा रहा था। शाम का समय तो खाना बनाने और खाने पीने में ही बीत गयी। सबने मिलजुल कर बनाया खाया और गप शप करके सो गए।

प्रातः नींद खुलते ही जब मैं अपने कक्ष से बाहर निकला तो नजारा देखकर दंग रह गया। हरे भरे वृक्षों से ढकी हुई, चारों ओर पहाड़ियां, बीच में हरी वादियां, बिलकुल सामने ही हरा भरा विशाल पार्क, जिसमें झुण्ड के झुण्ड कंगारू आकर घास चर रहे थे। पार्क पूरी तरह से सज्जित और घास एकदम समतल। मन मुग्ध कर देने वाला दृश्य था। ऐसा लग रहा था किसी और ही लोक में आ गए हों। मैं लॉज के अंदर गया और यह अनुपम दृश्य दिखाने के लिये अपनी पत्नी और पी. एस. सिंह को बुला लाया फिर सभी साथ होकर और समीप से जाकर, कंगारुओं को देखने लगे। जब और आगे बढे तो समीप ही हॉक्सबरी नदी अपने पूरे शबाब पर बह रही थी। अपने पहलगाम से भी सुन्दर दृश्य था। बस हॉक्सबरी बिना किसी कोलाहल के ही बह रही थी, जबकि पहलगांव में फागुनी नदी के कल कल छल छल का संगीत भी होता है। हॉक्सबरी, अतीव सुन्दर और पूरी तरह सौम्य; चंचलता का कोई नामोनिशान नहीं था। वहां कोई शोर था तो मोटर बोट से सर्फिंग करने वाली जलपरियों का। नदी के किनारे जगह जगह बेंच और मेज लगे हुए थे, जहाँ बैठ कर, कुछ देर तक तसल्ली से सम्पूर्ण दृश्य का अवलोकन कर सकें।  कुछ समय तक तो हम उन्हीं वादियों में खोये रहे। बेंच पर तब तक बैठे रहे, जब तक सूर्य देवता हटाने के हठ पर उतारू न हो गये। हॉक्सबरी, हम तीन दिन रुके पर लगा कि तीन घंटे में ही वापस चल दिए हों।

कार्यक्रम पूरा होने के पश्चात वापस चलने के लिए जब सामान पैक हो गया और अपनी अपनी गाड़ी में रख लिया तो देखा लॉज में कई जगह गन्दगी पड़ीं थी, एकाध प्लेट व प्लास्टिक की गिलास वैसे ही फर्श पर बिखरे पड़े थे। मैं सोच ही रहा था कि हम आये थे तो यह लॉज कितना साफ सुथरा था और इस हालत में छोड़ के जायेंगे! कोई सफाई करने वाला भी नहीं दिख रहा था। मगर यह क्या, सभी के सभी गाड़ी में सामान रखने के पश्चात लॉज में वापस आ गए और एक एक सामान बिनकर, कूड़ेदान में डालने लगे उसके पश्चात वैक्यूम क्लीनर उठाकर उसे पूरी तरह साफ कर दिया। सभी उच्च पदस्थ कार्यरत थे, कोई इंजीनियर, कोई मैनेजर, कोई अधिकारी, मगर किसी में किसी प्रकार का संकोच का भाव नहीं था, बड़ी तन्मयता से सफाई में जुटे थे। यहाँ तक कहीं जूठन आदि का निशान भी था, उसे भी पोंछा लगाकर साफ कर दिया गया। जिस दशा में लॉज हमें मिला था उसी दशा में साफ करके वापिस छोड़ा और बंद करके चाभी उसी स्थान पर वापस रख दिया। कोई निरीक्षण करने तक नहीं आया। 

मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय था। अधिकारी होकर भी लोग झाड़ू पोंछा लगा रहे हैं, और लॉज को कोई देखने तक नहीं आ रहा है कि किस दशा में वापस छोड़ा है! मैंने बच्चों से पूछ ही लिया, भई! चाभी लेने कोई नहीं आएगा क्या ? नहीं अंकल, यहाँ ऐसे ही होता है।  कोई गड़बड़ नहीं करता, अगर किया भी तो लॉज वाला उसकी पेनल्टी का बिल भेज देगा जिसका भुगतान करना ही पड़ेगा। यह सब देख कर मुझे अपने देश में पार्टियो का दृश्य समक्ष आ गया, जहाँ पार्टी के बाद में इतनी गन्दगी दिखती है, कुत्ते घूमते हैं और मक्खियाँ भिनभिनाती हैं। खड़ा होना दूभर हो जाता है। कई लोग धर्म या समाज सेवा का काम करते है, सड़क पर या गली में भंडारा चलाते है, और जूठे प्लेट, पत्तल वहीं छोड़ जाते हैं। यहाँ तक कि सार्वजानिक पार्कों को भी गन्दा करने से नहीं चूकते। कोई कूड़ेदान रखकर, प्रसाद लेने वालों को अपने पत्तल उसमें डालने के लिए प्रेरित तक नहीं करते। किसी को कह भी दिया जाय तो उसके शान के विरुद्ध हो जाता है। मेरे लिए, यह जहाँ एक अति मनोरम यात्रा थी, इस यात्रा ने बहुत कुछ सिखाया भी।



    




Makan ki shifting मकान बदला


मकान बदला

वीरेंदर के मकान की लीज इस महीने पूरी हो रही है। मकान मालिक उसे और बढ़ाना नहीं चाहता, अतः इस महीने के अंत तक खाली ही करना है। वीरेंदर और नुपुर बड़ी चिंता में हैं, सब कैसे होगा।  सामान पैक करना, गाड़ी, मजदूर; यहाँ मजदूर भी सरलता से नहीं मिलते, एजेंसी के द्वारा लेना होता है और मजदूरी तो बाप रे, एक दिन की मजदूरी में अपने देश में पखवाड़े भर काम करा लो। वीरेंदर और नुपुर अभी हिसाब ही लगा रहे थे कि शिफ्टिंग में कुल कितना खर्च आएगा, इस महीने का तो बजट ही बिगड़ जायेगा, तभी कुलदीप का फोन आ जाता है ।
'हेलो'
'हां, वीरेंदर! कैसे हो?
'बिल्कुल ठीक और तुम कहाँ हो?'
 'मैं इधर से ही गुजर रहा था, अभी आता हूँ, तुम्हारे यहाँ चाय पीकर, जाऊंगा।'
'अच्छी बात है, आ जा, घर पर ही हैं हम।'
बस थोड़ी ही देर में कुलदीप आ धमका ।
आते ही नुपुर चाय बनाने में लग गयी। वीरेंदर ने कुलदीप से सामान की  शिफ्टिंग की बात शुरू कर दिया।
'यार ये एजेंसी वाले तो लेबर के बड़े पैसे मांग रहे हैं।'
'लेबर तो यहाँ है ही महँगी। तू लेबर क्यों कर रहा है! अरे सेल्फ ड्राइव वाली गाड़ी ले लेते हैं और हम दोस्त लोग मिल कर पैकिंग, शिफ्टिंग सब कर लेंगे। यहाँ तो हम लोग ऐसे ही करते हैं। मजदूरी के कौन इतने पैसे खर्च करेगा! तेरे लेबर लेबर के हजार डॉलर (पचास हजार रुपये) लग जायेंगे। इतने की तो पार्टी हो जाएगी।
'ये तो तू ठीक कह रहा है, फिर इस शनिवार और रविवार को और कोई कार्यक्रम नहीं बनाना।'
'तू चिंता मत कर, मैं सुनील, नवीन, विक्रम और सुरेश को भी बोल देता हूँ। देखते ही देखते तेरा सामान शिफ्ट हो जायेगा।'     
   
यूँ तो ऑस्ट्रेलिया में जॉब करने वाले कुछ ही समय में मकान ले लेते हैं, क्योंकि वहां आय अच्छी है और मकान खरीदने के लिए ऋण, सस्ता और सरलता से मिल जाता है। परन्तु जो लोग नए आते हैं, उन्हें शुरू में तो किराये पर ही मकान लेना होता है। यहां किराए के मकान के नियम व शर्तें बड़ी कड़ी होती हैं तथा इन्हें एजेंसी के द्वारा ही हैंडल किया जाता है। किराये के मकान में कील तक नहीं गाड़ सकते। भारतीय दीवारों पर, लोग आदतन कैलेंडर तो टांगते ही हैं, बिना किसी कैलेंडर या देवी, देवता, दृश्य या परिवार के सदस्यों के फोटो के बिना, दीवार सूनी लगती  है। ऑस्ट्रेलिया में यह एक सपना भर रह जाता है। यदि फोटो सजाना ही है तो उसे मेज या रैक पर रखकर, या वैक्युम वाली खूंटी से ही दीवार पर लटका सकते हैं। मकान जिस दशा में लिया है उसी हाल में वापिस भी करना होता है, अन्यथा दण्ड भरना पड़ सकता है, जो कि जमानत की राशि से काट ली जाती है। और तो और, मकान बदलने की समस्या भी बड़ी विकट है। मजदूर बहुत महंगे होते है, अतः सामान को पैक  करने और ले जाने में अधिक से अधिक कार्य स्वयं करना पड़ता है। 

वीरेंदर ने मकान बदलने का दिन शनिवार निश्चित कर लिया था। कुलदीप की मदद से सभी मित्रों को सूचित कर दिया गया। निश्चित समय पर सभी एकत्र हो गए। कहते हैं न 'ग्यारह की लाठी एक का बोझ।' हाथों हाथ सारा सामान पैक हो गया और गाड़ी में रख दिया गया। सभी के पास अपनी गाड़ी तो थी ही, थोड़ा थोड़ा करके मित्र मंडली ने बहुत सा सामान तो अपनी अपनी गाड़ी से ही पहुंचा दिया गया। केवल वह सामान जो गाड़ी ने नहीं अंट पाया, सेल्फ ड्रिवेन (स्वयं चलाने वाली) किराए पर ली हुई गाड़ी से ले आया गया। ये सभी मित्र उच्च पदस्थ कार्यरत थे, और अच्छी आय अर्जित करने वाले थे किन्तु अपना काम करने में किसी को कोई संकोच नहीं। यह देख कर मुझे अपना बचपन का गांव याद आ गया। जब मैं छोटा था, गांव में रहता था, लोगों के मकान एक दूसरे के सहयोग से ही बनते थे। लोगों में इतना अपनापन था कि कुछ सामान यानि बांस, बल्ली परस्पर सहयोग से जुटा लिया जाता था। बस खपड़ैल कुम्हार से खरीदा जाता था, या बुलवाकर पथवा लिया जाता था। बिना अधिक खर्च के रहने लायक मकान, सरलता से बन जाता था। छप्पर डालने के लिए भी जिनके पास पत्ते, पुआल होते, थोड़ा थोड़ा सभी दे देते, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को भी परेशानी नहीं होती थी। बस छप्पर छाने के लिए कुशल मजदूरों की आवश्यकता होती, और छप्पर उठाने के लिए पूरा गांव एकत्र हो जाता था।  इस काम में कोई अमीर, गरीब, जाति धर्म का भेद नहीं होता था।  

उसी प्रकार की सहयोग की भावना यहाँ देखने को मिली। मित्र मंडली गपशप करते शफ्टिंग का काम भी कर देती ली और अवसर का भरपूर आनंद भी उठायी। यह कार्य उन्हें किसी पिकनिक से कम नहीं लगा। इस प्रकार एक का बोझ कइयों के लिए लाठी के भार जैसा हो गया। आपसी सहयोग से यह कार्य बड़ी सरलता से पूरा हो गया और वीरेंदर की टेंशन तथा काफी पैसे भी बच गए। कार्य संपन्न होने पर यह जुटी मंडली एक पार्टी में परिवर्तित हो गयी। हंसी-मजाक, खाना-पीना और रौनक के साथ, एक छोटा मोटा उत्सव संपन्न हो गया।