Saturday, 17 March 2018

Sevika bahu

आरती और महेंद्र सबसे यही कहते, 'सुशीला मेरी बहू नहीं है, बेटी है।' जैसा उसका नाम था, वैसा ही काम। वह इतनी सुशील थी कि सास, ससुर की सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोचती। कहीं आना न जाना, बस घर के काम में व्यस्त रहना, थोड़ा बहुत समय मिल गया तो टेलीविज़न देख लेना। गली मोहल्ले में उसकी बहुत प्रशंसा होती। घर का चौखट लांघे तो उसे दस वर्ष से भी अधिक हो गए होंगे। उसकी आवाज, पास पड़ोस में किसी ने नहीं सुनी होगी। सास-ससुर का उसके ऊपर इतना शासन था कि न तो वह पास पड़ोस में कहीं जा सकती थी, न ही उससे मिलने कोई आ सकता था। पड़ोस की कोई औरत, शीला से मिलने आती भी तो बाहर के कमरे में ही चाय पानी पिला कर विदा कर दिया जाता। सुशीला तो बस चाय रखकर, नमस्ते करती और भीतर चली जाती। आरती डरती थी, वह सबसे मिलती रही तो कहीं कोई उसे बहका न दे और अच्छी भली बहू हाथ से निकल जाय।

आरती की बहन का बेटा, चिंटू इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका था। पढ़ाई पूरा करते ही उसे बैंगलोर में नौकरी मिल गयी। वह छुट्टियों में घर आया तो सोचा मौसी से भी मिल लें। एक दिन, वह मौसी से मिलने, आरती के घर पहुँच गया। चिंटू की दृष्टि जब सुशीला पर पड़ी तो उसे देखकर, उसकी सुंदरता पर मन्त्र मुग्ध हो गया। अब तो वह उससे जल्दी से जल्दी बात करने के लिए बेचैन हो उठा।
'और भाभी क्या खिला पीला रही हो? सुना है आपके हाथ में जादू है। वैसे जादू तो आपके रूप में भी है। '
'जो कहो भैया, पकौड़े खाएंगे?'
सुशीला को भी बहुत दिनों के बाद किसी से बात करने का मौका मिला था। चिंटू बहुत स्मार्ट लड़का था। उसकी बातचीत से लगता ही नहीं था कि वह सुशीला से पहली बार मिला है और सुशीला की बातों की मिठास किसी के भी कानों में मिश्री घोल देती। उदय और सुशीला के विवाह में परीक्षा होने के कारण, चिंटू नहीं आ पाया था। विवाह के दो वर्ष हो चुके थे, भाभी से मिलने का उसे पहली बार ही मौका मिला था।
'और भइया, आप को खाने में क्या पसंद है? मैं वही बनाउंगी।' सुशीला ने फिर पूछा।
'कुछ भी बना लो भाभी। आप तो जो भी बना दोगी, हॉस्टल के मेस से अच्छा ही बनाओगी।'
'फिर भी ! कुछ तो बताओ !'
'अच्छा, आप रहने दो।  मैं आपको आलू दम और शाही टोस्ट बनाकर दिखाता हूँ। बाकी रोटी, दाल वगैरह, जो बनाना हो आप बना लो।'
सुशीला हँसते हुए बोली, 'आप भी सब बना लेते हैं! अभी तो शादी भी नहीं हुई, किसने सब सिखाया?'
'अरे भाभी, वक्त सब सीखा देता है। अकेले, हॉस्टल के खाना से कभी बोर होते थे तो हम लड़के अपना कुछ एक्सपेरिमेंट कर लेते थे।'
वह एक  बार फिर हंसी, 'हमें सब पता है, कोई न कोई तो जरूर होगा, जिसने सिखाया होगा। आप नहीं बताना चाहते तो कोई बात नहीं।'
उधर आरती दोनों को घुल मिल कर बात करते देख कूढ़ रही थी, पर कुछ कह नहीं पा रही थी। उसे डर था कहीं  चिंटू को बुरा न लग जाय। हँसते बोलते दोनों ने मिलकर, खाना बना लिया। जब खाने बैठे तो महेंद्र और आरती, आलू दम व शाही टोस्ट की प्रसंशा करते नहीं अघा रहे थे। सुशीला, मौका पाकर चिंटू से धीरे से बोल दी, 'वाह भैया ! आप ने तो बाजी मार ली।'
चिंटू ने भाभी की टिपण्णी सुनकर, गर्व से कन्धा मटका दिया।
बस एक दिन रुककर, चिंटू को जाना था। जब वह चलने लगा तो सुशीला अपने आंसू रोक नहीं पायी। उसको देखकर चिंटू भी द्रवित हो उठा। फ़ोन करते रहने का वादा करके वह विदा हो गया। वह सुशीला के लिए यादगार के कुछ पल छोड़ गया। उसके जाने के बाद तो ऐसा लग रहा था जैसे सुशीला की जिंदगी के मरुस्थल में भटकर, बादल का कोई टुकड़ा आ गया हो और कुछ बूंदें टपका दिया हो। घर जाकर, अगले ही दिन चिंटू ने फोन किया, फोन आरती ने उठाया। जब चिंटू ने सुशीला से बात करवाने को कहा तो उसके काम में व्यस्त होने का बहाना कर दिया। उसके बाद भी जब कभी चिंटू का फोन आता, सुशीला के किसी काम में व्यस्त होने या कहीं जाने का बहाना करके, आरती उससे बात नहीं करने देती। एकाध बार के बाद, चिंटू ने फोन करना बंद कर दिया। सुशीला की फिर से वही रसविहीन, बंजर जिंदगी थी।   

जब सुशीला दुल्हन बनकर आयी थी, तो  दुल्हन देखने जो भी आता, उसकी सुंदरता की प्रशंसा किये बिना नहीं रह पाता। वाह, आप लोग तो चाँद जैसी बहू लाये हो, कितनी सुन्दर और सुशील। महेंद्र और आरती के तो, प्रशंसा सुनकर, गर्व का ठिकाना ही नहीं रहता। आखिर अपने बेटे के लिए, उन्होंने ही बहू पसंद किया था। अब आरती का सब दुःख गया था, रोज रोज खाना पकाने से छुट्टी मिली।  कहाँ दिन भर काम करके आरती का देह अकड़ जाता, अब तो बैठे बैठे खाली जुबान हिलानी होती। ऊपर से बहू, सुबह शाम हाथ पैर भी दबा देती। पास पड़ोस का कोई आता तो आरती, सुशीला की तारीफ करते नहीं अघाती। 'उदय को तो माँ बाप की कहाँ परवाह, उसे अपने दोस्तों से फुर्सत हो तब तो घर की चिंता करे। हाँ बहू बड़ी लायक मिली है, जबसे आयी है, मुझे कुछ नहीं करने देती ...   सुशीला! क्या कर रही है? देख, ऑन्टी आयी हैं, चल इनका भी पैर दबा दे और आशीर्वाद ले ले।'
सुशीला भी सोचती, बड़े बुजुर्गों की सेवा से तो आशीर्वाद ही मिलेगा। पैर दबाने में क्या घट रहा है। माँ-बाप ने, दहेज़ में भी तो इन लोगों को इतना कुछ नहीं दिया है, कि अकड़ से रहे। वो बेचारी, सास की आज्ञा का हृदय से पालन कराती।
महीना बीता, उदय की छुट्टी समाप्त  हो चली, और एक दिन उसे नौकरी पर वापस जाने का समय आ गया। पूरे चौबीस घंटे की रेल यात्रा थी। सुशीला को मालूम था, कि रेल में खाने पीने को अच्छा नहीं मिलेगा, और ऊपर से महंगा इतना कि पैसे बचाने के चक्कर में उदय भर पेट खायेगा भी कि नहीं। उसने रास्ते के लिए, पूड़ी सब्जी बनाकर पैक कर दिया। साथ में आरती ने कुछ मीठी पूड़ी और सूजी के लड्डू बनवा दिए, ताकि वह वहां एकाध दिन जब जी में आये, खा ले । वहां जाने के बाद, न तो माँ के हाथ का ही खाने को कुछ मिलेगा, न ही  पत्नी के। या तो वह खुद पकाये या फिर होटल में खाये।
उसके नौकरी पर जाते ही, नई नवेली दुल्हन, शुशीला अकेले रहने को विवश हो गयी। उसे तो अब तन्हाई के दिन बिताने थे, जाने उदय को फिर से कब छुट्टी मिलेगी। ननद भी कुछ दिनों की ही मेहमान थी, वह अपने ससुराल चली गयी। सुशीला को अपना समय अकेले ही काटना था। वह दिन भर बोर होती, सास ससुर से  कितनी बातें करती। अब उसके के जीवन का सहारा, बस टेलीविज़न रह गया था। लेकिन उसे अपने कर्तव्यों का पूरा एहसास था। वह अपनी तन्हाई से लड़ने के लिए, जहाँ टेलीविज़न देखती, वहीँ  अपने को काम में व्यस्त भी रखती थी। घर की सफाई, रख रखाव, तरह तरह के पकवानों से सास ससुर और अतिथियों को प्रसन्न रखना, उसका शौक हो गया था। जो उसके हाथ की बनी पकौड़ी खा लेता, प्रशंसा किये बिना नहीं रहता। महेंद्र तो उसके बनाये पकौड़ों के दीवाने थे।  सप्ताह में एक बार अवश्य ही पकौड़े बनवा लेते। बीच में कोई आया गया, तब तो बनने ही थे।

सुशीला जैसी बहू की चर्चा पूरे मोहल्ले में थी। उसे ससुराल वालों का दिल जीतने में अधिक समय नहीं लगा और लगे भी क्यों! वह सुशील और गुणी, जो ठहरी। सास ससुर भी उसे बहुत प्यार से रखते थे। सुशीला को घर में कोई कष्ट नहीं था, पर उदय की अनुपस्थिति उसे सदैव खलती थी। उसे बस इसी बात का अफ़सोस रहता कि विवाह के पश्चात्, इतना समय निकल गया और वह अपने पति की तनिक भी सेवा नहीं कर पायी।  वैसे तो वह शीघ्र आने का वादा कर के गया था, पर साल से पहले कहाँ आने वाला था। सब कुछ भाग्य का वदा सोचकर, सुशीला ख़ुशी ख़ुशी सह लेती।
नौ महीने बीतते ही, चाँद सा सुन्दर पुत्र भी आ गया। महेंद्र और आरती के तो पौ बारह थे। सेवा के लिए सुशील बहू तो थी ही, बुढ़ापे में खेलने के लिए पोता भी मिल गया। महेंद्र ने पोते का नाम कुलदीप रख दिया। अब सुशीला को अधिक परेशानी नहीं थी, कुलदीप के सहारे उसका समय कहां चला जाता, पता ही नहीं चलता।
धीरे धीरे उदय को गए डेढ़ वर्ष हो गए। जब भी फोन की घंटी बजती इससे पहले कि सुशीला वहां पहुंचती, आरती उठा लेती। उदय से हाल चाल पूछ कर फिर सुशीला को पकड़ा देती। बहू को फोन पकड़ा कर भी वह वहीँ घेरे रहती, बेचारी सुशीला तो ज्यादा कुछ बात भी नहीं कर पाती। बस, बार-बार यही पूछती, 'कब आओगे?'
उत्तर मिलता, 'तुम्हें पता ही है, प्राइवेट नौकरी है, छुट्टियां अधिक कहाँ मिलती हैं। जब भी छुट्टी के लिए अप्लाई करता हूँ, कोई न कोई  काम निकल आता है। देखो शायद एक दो महीने में छुट्टी मिल जाय।'
सुशीला मुंह बना लेती और कहकर, फ़ोन रख देती, 'ठीक है, जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करना।'

एक दिन, सुबह ही उदय का फोन आ गया। आरती और महेंद्र ने बात करके सुशीला को पकड़ा दिया। आज वह सुशीला को आश्चर्य में डालने वाला था। जैसे फोन पर बोला, 'आज मैं तुम्हें सरप्राइज देने वाला हूँ।'
सुशीला तबाक से बोली, 'कब आ रहे हो !'
'अरे! तुमने कैसे जान लिया, मैं यही बताने वाला हूँ।'
'क्यों ? तुम्हारी पत्नी नहीं हूँ क्या !'
'बस अगले ही हफ्ते। मेरी एक महीने की छुट्टी मंजूर हो गयी है। देखूंगा तो आकर पंद्रह बीस दिन और बढ़ा लूंगा। वहां से इमारी बीमारी का कोई बहाना चल जायेगा, यहाँ तो एक  महीने से अधिक की छुट्टी एक साथ मिल नहीं सकती।'
बस फिर क्या था, सुशीला के ख़ुशी का ठिकाना न रहा, वह दौड़ी गयी, 'अम्मा जी! अगले सप्ताह, वो रहे हैं।'
'हं, हमसे तो बताया ही नहीं।  बीबी से ही सब कुछ बताता है। चल अच्छा हुआ, एक साल से भी ज्यादा हो गया है। कुलदीप भी अपने पापा से पहली बार मिलेगा।'
आरती, अपनी खुशी प्रकट करने के लिए,  कुलदीप को गोदी में उठा लेती है और बार-बार दोहराने लगती है, 'कुलदीप का पापा आ रहा है, बाबू पापा से मिलेगा ... '                  
धीरे धीरे उदय के आने का समय समीप आ गया। उसे अब कल ही गाड़ी पकड़नी है, परसों तक तो घर भी आ जायेगा। आरती ने सुशीला को खाने में उसकी पसंद की चीजें बनाने के निर्देश दे दिए। महेंद्र इस बात की पुष्टि करने के लिए कि वह वास्तव में आ रहा है न, कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी कारण वश कार्यक्रम में कोई परिवर्तन हो, बार बार फ़ोन मिलाया, मगर उदय का फोन नहीं मिल पाया। कहीं घर के फोन में कोई खराबी हो, यह सोचकर, वह बाजार जाकर भी कोशिश किया परन्तु उदय का फ़ोन नहीं मिल पाया। महेंद्र ने उसके किसी मित्र या सहकर्मी का भी फोन नंबर नहीं लिया था, जिससे वह उसके बारे में पता करे। अब महेंद्र के पास गाड़ी के आने  की प्रतीक्षा के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था। आज सुबह ही सुशीला के साथ आरती भी रसोई में जुट गयी क्योंकि उदय की पसंद का आरती को ही ज्यादा पता था। गाड़ी आने का समय हो चुका। घर में सभी लोग उदय की जोरदार स्वागत की तैयारी में जुट गए। उधर से जो भी गुजरता, महेंद्र अवश्य पूछ लेता, क्यों भैया औरंगाबाद वाली गाड़ी आ गयी। रमेश ने बताया, हां चाचा वो एक घंटे पहले ही आ चुकी।
'परन्तु उदय नहीं आया, स्टेशन से तो आधा घंटा ही लगता है।'
आरती बोली, 'हो सकता है पिछले स्टेशन पर उतर गया हो, और मौसी से मिलता आये।'
इतने में फोन की घंटी बजी।
'देख तो लग रहा उसी का फोन है।' यह कहते हुए महेंद्र ने खुद ही फोन उठा लिया।
'कौन? उदय के पापा बोल रहे हैं।'
'हाँ! तुम कौन?
'अंकल, मैं उदय के साथ काम करता हूँ। उसका कल शाम स्टेशन जाते हुए एक्सीडेंट हो गया। उसका फोन नष्ट हो जाने के कारण, आपका नंबर भी नहीं मिल पा रहा था। हम लोग आज कंपनी के दफ्तर से नंबर निकवाये हैं।
उसके शव को, कंपनी, हवाई जहाज से भिजवाने का प्रबंध कर रही है। शव लेकर आज ही हम आप के यहाँ पहुंच जायेंगे।'
इतना बड़ा वज्रपात। रोना धोना शुरू। सुशीला रोते रोते मूर्छित हो गयी।  हे ईश्वर! तूने क्या एक ही महीने के लिए उदय को दिया था! फिर सावित्री जैसी शक्ति भी क्यों न दी, कि अपने सत्यवान को जीवित कर लेती। कितना बड़ा अन्याय। तेरा क्या बिगाड़ा था ! किस बात की इतनी बड़ी सजा ! अब तो रोने के  अतिरिक्त कुछ नहीं शेष था।

धीरे धीरे, इस घटना के सालों गुजर गए। उसे अपने वैवाहिक जीवन का सुख मात्र एक माह ही मिल पाया। प्रभु की बिडम्बना, उसके आगे किसी की कहाँ चलती। सुशीला तन्हाई का जीवन व्यतीत कर रही थी। अब तो वह कुएं का मेढक हो चुकी थी। वह उस छोटे से घर को ही पूरी दुनिया समझती थी। उसे दुनिया के बारे में अधिक कुछ नहीं पता था। कोई घुमाने फिराने वाला नहीं था। वह अपने छोटे से कस्बे के बाहर कभी जा ही नहीं पायी। माँ बाप गरीब होने के कारण नहीं घुमा सके। सोचे थे उदय बाहर नौकरी में है, सुशीला को घूमने फिरने का खूब अवसर मिलेगा पर विधाता को यह भी स्वीकार नहीं था!  पहले तो कभी कभी मायके भी चली जाती थी, उसकी माँ के देहांत के बाद, वहां जाना भी बंद हो गया। किसी से मिल भी सकती थी तो, बस सास ससुर और अपना बेटा। किस्मत को ही सब कुछ मानकर, आरती कैदियों का सा जीवन व्यतीत कर रही थी। उसे अपनी जिंदगी का सहारा बस कुलदीप दिख रहा था।

उदय की ताई का भी घर कुछ ही दूरी पर था।  उसने महेंद्र और आरती को समझाया कि सुशीला की अभी उम्र ही क्या है, वह युवती है, उसे पूरी जिंदगी बितानी है, कहीं अन्यत्र उसका विवाह कर दें, पर उन्हें यह बात कहाँ गवारा थी। वे बोलते नहीं सुशीला घर की इज्जत है, उसे वे घर से बहार नहीं जाने देंगे। वे पोते का भी बहाना बना लेते, कुलदीप को पढ़ा लिखा कर, बड़ा आदमी बनाएंगे, वह सुशीला की देख भाल करेगा। और अभी हमारे पास भी किसी चीज की कमी नहीं है। जमीन, जायदाद है, बहू और पोते के लिए हमने पैसे भी रखे हैं। कुलदीप जितना पढ़ेगा, पढ़ाएंगे। उसे डॉक्टर या इंजीनियर बनाएंगे। सुशीला यह सब सुनकर, संतोष कर लेती। उसका ध्यान केवल कुलदीप में था, बस किसी तरह वह पढ़ लिख कर, अपने पैरों पर खड़ा हो जाय। वह पूर्ण रूप से अपने सास-ससुर और बेटे को समर्पित थी। अपनी जिंदगी से, उसे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए था।

सुशीला बंधुआ मजदूर की भांति जीवन काट रही थी, वो भी केवल पेट पर। परिवार की सेवा के अतिरिक्त उसके जीवन में और कुछ नहीं था। उसे बस रिश्तों की डोर ने बांध रखा था, अन्यथा जीवन के आनंद का कोई भी रस, उसके भाग्य में नहीं वदा था। सास ससुर तो अपने स्वार्थ में थे, उसके अतिरिक्त उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं था। वे चिकनी चुपड़ी बातों से सुशीला को प्रसन्न रखते। सुशीला को भी उनकी मीठी बातों से बड़ा संतोष मिलता।  उसे लगता कि इस घर में जब सास ससुर का प्यार मिल ही रहा है तो फिर किस बात की कमी।
 
एक दिन तो ताई महेंद्र को काफी कुछ सुना गयी, 'बताओ इस बच्ची को अभी से विधवा बनकर रहने को मजबूर कर रखा है। इसका पूरा यौवन अभी धरा रखा है, इस तरह ये कैसे जीवन काटेगी। तुम लोगों को मात्र अपना स्वार्थ दिख रहा है, इसे अपनी सेविका बना रखा है। यह इतनी सुन्दर है। अरे, इसका कहीं विवाह क्यों नहीं कर देते।'
ताई की यह बात सुशीला के कानों तक पहुँच गयी, वह लक्ष्मण रेखा पार कर उनके यहाँ आ गयी और ताई से बोली, 'नहीं ताई जी! हम जैसे हैं, खुश हैं। मैं विवाह कर लूंगी तो अम्मा बाबूजी के देखरेख कौन करेगा। अगर वो जीवित होते तो इन लोगों का सहारा वे ही तो बनते।  मैं उनकी कमी इन लोगों को महसूस नहीं होने दूंगी। मेरा जीवन, अम्मा बाबूजी और कुलदीप के साथ बहुत अच्छा बीत रहा है।'
'जिसमें तुझे सुख मिले बेटी। मैं तो इस उम्र के दर्द को समझती हूँ, इसलिए कह दिया।'