Monday, 26 February 2018

Khandahar ki khudai


वह टीला प्रह्लाद के चक के बीच में था परन्तु बीस फ़ीट से भी अधिक ऊंचाई होने के कारण, प्रह्लाद जोत बो भी नहीं पाता था। इतना ऊपर पानी चढ़ाना असंभव था, जिस कारण एक बीघा का वह जमीन का टुकड़ा वर्षों तक बंजर पड़ा रहा । टीले पर एक नीम का पेड़ जम गया था और कुछ जंगली घास। वहां तक जाने का किसी किसी को ही साहस हो पाता। टीले पर, कभी कभी गाय, बकरी चरते दिख जाते। गांव वालों को विस्वास था कि वह टीला भूतहा है। उस पर जाने से कुछ भी अनिष्ट घट सकता है। यह जोखिम लेने का साहस कौन उठाये। टीले के भूतहा होने के डर से प्रह्लाद के खेत की ओर देखने की तो चोरों की भी हिम्मत नहीं होती। उसकी उतनी जमीन बेशक बंजर थी, परन्तु उसे उसका बहुत लाभ मिलता। उसके खेतों की चोरों से स्वतः ही रक्षा हो जाती।

प्रह्लाद ने दादा से सुन रखा था, इस टीले के नीचे एक खँडहर है, जो कभी किसी राजा का आवास हुआ करता था। सुना है, इसमें बड़ा धन दबा पड़ा है, लेकिन इस जगह के भूतहा होने के कारण, कोई खोदने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।  अगर किसी ने खोदने की जुर्रत किया तो उसके परिवार का कोई न कोई सदस्य, काल का ग्रास बन गया। प्रह्लाद जब पूछता, पहले किसने खोदने की कोशिश की तो दादा के पास सही उत्तर नहीं होता। वे बस यही कहते, 'हमारे खानदान से तो इस बारे में किसी ने नहीं सोचा, पर सुना है गांव के ही संकठा ने जो मेरे दादा के चाचा लगते थे, एक रात चुपके से कुदाल लेकर उस टीले को खोदने गए, वहां एक सांप कुंडली मारे बैठा था, वे तो उलटे पाँव वापस आ गए। और तो और, उनकी माँ साल के भीतर ही चल बसी थीं। तब से डर के मारे कोई भी टीले की खुदाई का नाम नहीं लेता।'
प्रह्लाद को कई लोग चढ़ाते भी रहते, 'अगर हिम्मत करके टीले को खोद लिया तो मालामाल हो जायेगा। इसके नीचे एक खँडहर दबा पड़ा है।  कहते हैं यहाँ एक राजा रहता था, और उसने बहुत सा सोना चांदी गाड़ रखा है।'
कोई कहता, 'पता नहीं किस ज़माने का गड़ा होगा, अब तक तो वो सांप बन चुका होगा।'
प्रह्लाद भय और उत्सुकता के बीच जी रहा था। इतना बड़ा खजाना उसकी अपनी जमीन में छुपा है, और वह तंगी के हाल में जीवन व्यतीत कर रहा है। खेती से इतनी परिश्रम के बाद भी आखिर क्या मिल पाता है, बस परिवार के लिए रोटी और कपड़ा। घर भी किसी तरह, बस गुजर करने लायक ही बन पाया है। अगर खजाना हाथ लग जाए तो उसकी और परिवार की जिंदगी बदल जाएगी। घर तो पूरा ही ढाह कर नए सिरे से बनवाएगा। बच्चों को पढ़ने के लिए शहर भेज देगा। खर्चे की चिंता नहीं रहेगी, पढ़ा लिखा कर डॉक्टर या इंजीनियर बनाएगा। खुद प्रीति को साथ लेकर चारों धाम कर आएगा। यही सब सपने बुनते उसने खजाने की बात अपने कई दोस्तों और रिश्तेदारों से की। यदि उनका समर्थन मिल जाय तो टीले को खुदवा ही देगा। खजाना मिलेगा, एक अच्छा सा बड़ा भोज कर देगा, सभी रिश्तेदार, मित्र भी खुश हो जायेंगे। थोड़ा बहुत गांव के गरीब परिवार की लड़कियों की शादी व्याह में भी दे देगा। क्षेत्र के धनाढ्य व्यक्तियों में उसका नाम होगा। वैसे धनी तो और भी लोग हैं पर किसी रजवाड़े की तो अकूत संपत्ति होगी।
अलग अलग मुंह, अलग अलग बात। कोई समर्थन देता तो कोई डरा भी देता कि इसकी खुदाई का अधिकार तो केवल सरकार का ही है।  खुदाई  करने में अगर पकड़ा गया तो संपत्ति, सरकार ले लेगी और हो सकता है सजा भी मिले। इस तरह की बात से उसका हौसला पस्त हो जाता। वह टीले की खुदाई की  चिंता में डूबा रहता। उसकी पत्नी प्रीति ने समझाया, 'टीले और उसमें दबे खजाने की चिंता छोड़ो। ऐसी जगहों पर भूत प्रेत रहते हैं। चैन से दो रोटी खा रहे हैं। हमें इससे अधिक कुछ नहीं चाहिए। कहीं टीले को खोदने के चक्कर में लेने का देना न पड़े।  देखो चिंता के मारे तुम्हारा शरीर घटता जा रहा है। उसे ऐसे ही पड़े रहने दो। ऊपर वाले की माया होगी तो वो वैसे ही दे देगा।'
ये सब बातें, पत्नी से वह सुन भर लेता। उसके मन में खजाने की ललक और पाने की धुन पूरी तरह घर कर गयी थी। 
लोगों के मुंह से सुनकर, प्रह्लाद को पूर्ण विस्वास हो चुका था कि टीले के नीचे खजाना गड़ा है, और एक न एक दिन उसे पाकर रहेगा। एक दिन उसकी मुलाकात आजम से हुई। आजम ने भी प्रह्लाद से टीले की बात छेड़ दी। उसने बताया, 'वह अपने पुरखों से सुन रखा है, यहाँ किसी नबाब की कोठी थी। नबाब के कोई औलाद नहीं थी। उसके मरने के बाद उसका कोई रिश्तेदार भी यहाँ नहीं आया, और धीरे धीरे उसका मकान खंडहर हो गया। इसको चुपके से खोद डालो, तुम्हारी हिम्मत नहीं पड़ रही तो हमें बताओ।  लेकिन कुछ निकला तो हिस्सा देना पड़ेगा।'
प्रह्लाद ने अभी किसी को मिलाना उचित नहीं समझा। अगर थोड़ा ही कुछ निकला और उसमें से भी हिस्सा दे दिया तो उसके लिए क्या बचेगा। कहीं अधिक निकला तो उतना ही अधिक ये हिस्सा मांगेगा। 'देखेंगे' कह कर, प्रह्लाद ने बात टाल दिया।
प्रह्लाद, आजम से फिर पूछ बैठा, 'इतना बड़ा टीला है, खोदने में  बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और कुछ नहीं निकला तो सारी मेहनत बेकार, ऊपर से जगहंसाई अलग। मुझे सब लालची कहेंगे।'
'तुम एक काम क्यों नहीं करते, खोदने से पहले शास्त्री जी को दिखवा लो। वे ज्योतिष के अच्छे ज्ञाता हैं। उन्होंने  बहुत से लोगों को एकदम सही बात बताई है। हनीफ का बेटा खो गया था तो उन्होंने उसकी कमीज हाथ में लेकर बता दिया कि वह दक्षिण पश्चिम की दिशा में गया है। बाद में पता चला कि उसी दिशा में वह दिल्ली में किसी दुकान पर काम कर रहा था। शास्त्री जी अपनी ज्योतिष विद्या से सब बता देंगे, यहाँ कुछ है या नहीं। उसके बाद तुम खुदाई करवा लेना।'
यह सलाह प्रह्लाद को उचित लगी। उसने घर आकर प्रीति से बात किया और शास्त्री जी से मिलने चल दिया।
शास्त्री जी ने बताया, यह पता लगाने के लिए एक अनुष्ठान करना पड़ेगा, जिसमें ग्यारह हजार का खर्च आएगा। यदि प्रह्लाद ग्यारह हजार का प्रबंध कर ले तो आने वाले वृहस्पतिवार को शास्त्री जी अनुष्ठान कर देंगे। प्रह्लाद ग्यारह हजार जुटाने में जुट गया।
शास्त्री जी आये, उनके बताये पूजा की सामग्री का प्रबंध हो चुका था। शास्त्री जी ने और अपना अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया, और अपने देवता को जगाया। देवता अब शास्त्री जी के सिर पर आ गया था। प्रह्लाद से कहा गया कि अपने प्रश्न पूछे।
प्रह्लाद ने पूछा, बाबा! क्या इस टीले के नीचे खजाना दबा पड़ा है ?'
उत्तर मिला, 'अवश्य।'
'खजाने में क्या है ?'
'कोई धातु है। '
'क्या बाबा? सोना, चांदी !'
'संभव है।'
'क्या वो मुझे मिल सकता है ?'
'यदि डीह बाबा प्रसन्न होंगे तो अवश्य मिलेगा। मगर, उसे निकालने में बहुत बड़ा खतरा मोल लेना होगा। इस धरती पर एक दैत्य का वास है, वह तेरे काम में बाधा उत्पन्न करेगा। पहले उसे मनाना होगा तभी खुदाई में सफलता मिलेगी, अन्यथा कोई न कोई अनिष्ट अवश्यम्भावी है।'
'दैत्य को मनाने का उपाय भी तो होगा बाबा !'
'हर समस्या का उपाय होता है बच्चा। परन्तु यह काम मैं नहीं कर सकता, इसके लिए किसी ओझा को बुलाना पड़ेगा। 'वैसे, मैं एक ओझा को जनता हूँ, तू चाहे तो मैं उसे बुलवा दूंगा।'
'ठीक है बाबा।'
'उसका खर्च भी इक्कीस हजार का आएगा।'
'ठीक है बाबा। '
प्रह्लाद को शास्त्री जी की इसी बात से तसल्ली मिल गयी कि टीले के नीचे सोना दबा है।  वैसे इक्कीस हजार प्रह्लाद के लिए तो बड़ी राशि थी, इक्कीस हजार वह कहाँ से लाये, मगर प्रश्न खजाने का था। उसके लिए इक्कीस हजार का खर्च तो क्या, कुछ भी करेगा। चाहे जो भी हो उसे पैसे का प्रबंध करना ही है। उसने शास्त्री जी को हां कर दिया और पैसे के प्रबंध में जुट गया। पहले सोचा, कुछ खेत बंधक रखकर किसी से उधार ले ले। पर यही तो रोजी रोटी थी। इससे अच्छा, पत्नी की सोने की जंजीर बेच दे। जंजीर का क्या है, खजाना मिलेगा, फिर से बन जाएगी। प्रीति के लाख मना करने पर भी उसके मायके की वह निशानी प्रह्लाद ने हथिया लिया। प्रीति की चेन अच्छी खासी भारी थी, प्रह्लाद, उसे सुनार के पास ले गया तो डेढ़ तोले की निकली। पंद्रह हजार उसे चेन का ही मिल गया। अब यह काम सरल प्रतीत होने लगा। कर करा के पैसे पूरे हो गए। ओझा को बुलाया गया। ओझा ने अपना झाड़ फूंक आरम्भ कर दिया। टीले के आस पास भीड़ का जमावड़ा लग गया। अब प्रह्लाद को लोग बहुत बड़े आदमी के रूप में देख रहे थे। जिस प्रकार किसी राजनैतिक पार्टी के मुखिया को, पार्टी के चुनाव जीत जाने पर विशिष्ट व्यक्ति के रूप में देखा जाता है, उसी प्रकार प्रह्लाद को आने वाले समय में होने वाले कुबेर की भांति देखा जाने लगा। सभी लोग उसके आस पास मंडराने लगे। कौन जाने कल को धन की आवश्यकता पड़े तो इसी के पास मांगने आना पड़े। तीन दिन तक झाड़ फूंक चलता रहा।  ओझा ने संकेत दे दिया, यहाँ पर किसी बहुत ही बड़े दैत्य का वास है। उसे भगाना या मनाना इतना आसान नहीं है। वह दैत्य बार बार ओझा से सवाल भी कर रहा था कि वह अभी तक किसी गांव वाले का अहित तो नहीं किया। वह केवल वहां रह भर रहा है क्योंकि वहीँ पर उसकी आत्मा बसी हुई है, फिर उसे वहां से भगाया क्यों जा रहा है। उस स्थान से हट कर, वह आत्मा कहीं न कहीं भटकेगी और हो सकता ही इससे किसी का अहित हो। परन्तु ओझा को अपनी शक्ति पर भरोसा था, उसने दैत्य की एक न सुनी और उसे वह स्थान छोड़ने को मजबूर कर दिया।

भूत भाग चुका था। अब तो बच्चे भी नीम के पेड़ तक हो आते। वैसे अकेले जाने में अभी भी भकसावन सा लगता था। कोई अनायास वहां तक जाने की हिम्मत नहीं करता। ओझा ने तो कह दिया की भूत चला गया, पर जाते हुए किसी ने देखा तो नहीं।  क्या पता छुप कर कहीं यहीं रह रहा हो। इधर प्रह्लाद भी अनिष्ट के भय  से अकेले खुदाई करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। साथ ही उसे यही भी डर था कि किसी को मिलाएगा तो उसे भी कुछ न कुछ देना पड़ेगा। पता नहीं क्या निकले और कितना निकले। इसको गोपनीय रखना भी आवश्यक था। अगर माल कम निकला तो उसके हिस्से में थोड़ा ही रह जायेगा और अधिक माल मिल गया तो चोर डाकुओं से सुरक्षा कैसे होगी। यही सब ताने बाने बुनते, मंथन करते, उसने एक विस्वासपात्र मित्र निहाल से बात किया। भूत उस स्थान से बेशक भाग गया था पर निहाल के मन से डर नहीं। उसने तो भूत के डर से साफ मना कर दिया। वह लोभ के वश इस तरह का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं हुआ। फिर प्रह्लाद ने सोचा, एक दो मजदूर लेकर, अकेले ही इस काम को कर डाले, मगर उसकी हिम्मत जबाब दे देती। तब प्रह्लाद ने एक और मित्र, चन्द्रिका से संपर्क बनाया, चंद्रिका इस बात पर राजी हो गया कि उसकी बेटी की शादी में सभी गहने, टीले से निकले सोने से बनेंगे। दोनों में समझौता हो गया। पंडित जी से मुहूर्त निकलवाया गया और दो मजदूर लेकर, दोनों ने मिलकर खुदाई आरम्भ कर दिया। खुदाई, पीछे की ओर से शुरू किया गया, ताकि आने जाने वालों की नजर न पड़े। दिन भर खुदाई के बाद, कुछ भी हाथ नहीं लगा। दूसरे दिन एक मजदूर ने जैसे ही कुदाल चलाई, टन्न की आवाज आई। किसी धातु से टकराने की ध्वनि सुनकर वह चौंका। उसके मन में उम्मीद की किरण जग गयी। तुरंत ही उसने प्रह्लाद को बुलाया और उसके बारे में बताया। हां, यह तो कोई धातु लग रही है! प्रह्लाद और चन्द्रिका, ख़ुशी के मारे झूम उठे, उन्हें लगा, यह अवश्य ही सोने से भरा घड़ा होगा।

प्रह्लाद उस मजदूर को रोककर कसम दिलाने लगा, 'इसके बारे में और किसी को खबर न लगे।' उसने झट, दो सौ रुपये निकाले और उस मजदूर थमा दिया।
'ये लो इनाम, अब बाकी काम अँधेरा होने पर करेंगे। इसे दिन में निकालने पर कहीं कोई देख न ले। अगर हमारा लक्ष्य पूरा हुआ तो इनाम से तुम्हारी जेब भर देंगे।'
थोड़ी मिट्टी डालकर उसे फिर ढक दिया गया। अँधेरा होते ही सभी वहां पहुँच गए। जब ये वहां पहुंचे तो उस स्थान पर बैठी एक काली बिल्ली कूदकर भागी। अब तो प्रह्लाद के मन में फिर से डर समा गया। वो इतनी फुर्ती से गई कि उसे पता ही नहीं चला, कि वह क्या था। वो तो शुक्र था एक मजदूर ने उसे देख लिया, वरना वह शंका में ही मर जाता। पहुंचते ही उन्होंने मिट्टी हटाकर देखा कि वह धातु अपने स्थान पर है कि नहीं। जब वे टार्च जलाये तो जला ही नहीं। प्रह्लाद चक्कर में पड़ा, आखिर यह टार्च क्यों नहीं जल रहा! उसे लग रहा था कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है। तभी उसे याद याया, टार्च की बैटरी काफी समय से बदली नहीं, हो सकता है खत्म हो चुकी हो। लाने से पहले उसने उसकी जाँच भी नहीं किया था। खैर, अब करते भी क्या! हाथ लगाकर, अनुभव किया गया, वह घड़ा उसी प्रकार से मिट्टी में ढका था। एक मजदूर के पास माचिस थी। उसने एक तीली जलाकर, सभी को इस बात  से आश्वस्त कर दिया। अब धीरे धीरे उस धातु के चारों ओर की मिट्टी हटाई जाने लगी। सभी ईश्वर से बार बार प्रार्थना लगे, डीह बाबा से मन्नत मांगते, 'हे डीह बाबा, अगर सोना वगैरह निकला तो तुम्हारे मंदिर का जीर्णोद्धार करवा देंगे।'
 जब थोड़ी और मिट्टी हटी तो पता लगा कि घड़ा उल्टा पड़ा है। पेंदी ऊपर की ओर है और मुंह नीचे। प्रह्लाद और चन्द्रिका सोचने लगे इसे गाड़ने वाला भी कितना समझदार रहा होगा, देखो घड़ा उलटा करके गाड़ा है, ताकि घड़े में मिट्टी और नमी एकत्र होकर, उसमें पड़े खजाने को अधिक हानि न पहुंचाए। मिट्टी हटाई गयी, फिर कुदाल फंसा कर उस धातु के बर्तन को बाहर निकाला गया। जब उन दोनों ने देखा तो मुंह लटक गया। वह तो लोहे की औंधी पड़ी एक कड़ाही थी, जो काफी गल भी गयी थी। यहाँ तक कि उसके कड़े भी नहीं थे। मजदूर अपनी हंसी नहीं रोक पा रहे थे, 'वाह साहब! खोदा पहाड़, और निकली चुहिया।'

चलो अभी तो शुरुआत ही थी। अभी दस प्रतिशत खुदाई भी नहीं हो पायी थी। उसके अगले दिन भी काम चालू रहा। जाने कहाँ से गांव के प्रधान को इस बात की भनक लगी और वह आ धमका। प्रधान ने प्रह्लाद को बताया
कि जमीन के नीचे का खजाना सरकार का होता है, जो कुछ निकलेगा उसे सरकार जब्त कर लेगी। लेकिन गांव की बात है, उसमें से कुछ हिस्सा अगर प्रधान को भी मिल जाय तो वह इस बारे में चुप रहेगा। मरता क्या न करता। प्रह्लाद अपनी कड़ी सी शर्त रखकर मान गया। उसने प्रधान को साफ़ बता दिया दस तोले में से एक तोला प्रधान को दे देगा और कितना भी सोना निकला कुल मिलाकर दस तोले से अधिक नहीं देगा, सोने के अलावा और किसी सामान में उसका हिस्सा नहीं होगा। हाँ, थाने को भी प्रधान को ही सम्हालना होगा। प्रधान का इन सब में अपना क्या जा रहा था। वह इस शर्त को मान गया।
तीसरे दिन घर आने के बाद प्रह्लाद बीमार पड़ गया। अचानक ही एकदम तेज बुखार, प्रीति घबरा गयी। वह प्रह्लाद को कोसने लगी, 'बार बार मना कर रही थी, वह भुतहा जगह है, मत जाओ। पर आप अपने मन के हो। नहीं चाहिए हमें धन।'
आगे काम रोक दिया गया। उधर प्रधान ने समझा, उसे देने से बचने के लिए काम रोक दिया गया है और उसने  इस बात की खबर पुरातत्व विभाग को दे दी। निरिक्षण के लिए पुरातत्व विभाग की टीम आ धमकी। सर्वे से पता चला कि इस टीले के नीचे कोई न कोई पुराना निर्माण अवश्य है। प्रह्लाद को एक पुरानी कड़ाही मिल ही चुकी है, जो इस बात का संकेत देती है, यहाँ पहले कोई रहता होगा।  पुरातत्व विभाग ने भी उस टीले की खुदाई में दिलचस्पी दिखाई। खुदाई का काम अब पुरातत्व विभाग ने अपने हाथ में ले लिया।
खुदाई करने की टीम लगा दी गयी। खुदाई की कई प्रकार की मशीनें और औंजार आ गए। उस जगह को बाड़ लगाकर घेर दिया गया। खुदाई में मीडिया भी  बहुत बड़ी चुनौती थी। निकले सामान के बारे में मिडिया को पता न चले। कहीं ऐसा न हो खुदाई से निकली वस्तुओं के बारे में वो कुछ का कुछ फैला दे, और बात का बतंगड़ बन जाय। पूरी सावधानी के साथ पुरातत्व विभाग ने खुदाई आरम्भ किया।

प्रह्लाद का साला, प्रेम वकील था। जब उसे पता चला तो प्रह्लाद को सजग कर गया कि खुदाई के समय वह भी उपस्थित रहा करे। बेशक खजाना सरकार का होगा, कुछ न कुछ भाग अथवा मुआवजा के लिए सरकार पर दावा तो करेंगे ही।

दो दिन तक खुदाई होती रही, मिट्टी के अलावा कुछ नहीं निकला। पुरातत्व के एक वैज्ञानिक ने सुझाया खुदाई की गहराई को और बढ़ाया जाय, किन्तु और नीचे से कुछ निकलने की संभावना से विशेषज्ञ ने मना कर दिया।खुदाई की गहराई टीले के अतिरिक्त जमीन की सतह से छः फुट नीचे तक रखी गयी थी। इतनी सारी मिट्टी पलटने के बाद कुछ कंकड़ों के अलावा और कुछ भी नहीं मिला। एकाध मिट्टी के टूटे पुराने बर्तन अवश्य मिले जिससे वैज्ञानिकों ने वहां अतीत में मनुष्य के निवास होने का अनुमान लगाया। एक दिन सलेटी रंग की कोई गोलाकार चीज दिखी। उस वस्तु ने सबका ध्यान आकृष्ट किया। जीर्ण शीर्ण अवस्था में पड़ी अंडाकार पत्थर जैसी वह वस्तु लगभग ईंट जीतनी लम्बी और उससे थोड़ी मोटी थी। उसे देख वैज्ञानिक रोमांचित हो उठे। हो न हो यह डायनोसोर का अंडा हो। खुदाई रोककर विदेश से विशेषज्ञ बुलाने का निर्णय लिया गया। डायनासोर का अंडा, कितनी दुर्लभ चीज! अब विशेषज्ञों की सलाह से ही काम किया जायेगा। उस स्थान पर शेड दाल दिया गया और विशेषज्ञों को बुलाने प्रबंध किया गया।
सप्ताह भर बीता, विदेशी विशेषज्ञ भी आ गए। आगे की खुदाई उनके निर्देशानुसार होने लगी।
 बहुत सावधानी पूर्वक खुदाई करने का निर्देश दिया गया ताकि उस वस्तु को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचे। अब उस वस्तु के इर्द गिर्द छोटे उपकरणों से खुदाई की जाने लगी और ब्रश से साफ़ कर के अनुमान लगाया जाने लगा कि वह है क्या। कड़ापन देखकर, वह एक पत्थर जैसी चीज ही प्रतीत हो रही थी। अगर यह अंडा होता तो इतना कड़ा और इतना सुरक्षित नहीं होता। अब तक तो सड़ गल गया होता। जैसे जैसे उस वस्तु का और भाग उभर कर सामने आता, उसके अंडा होने की संभावना धूमिल होती जाती।  फिर भी वैज्ञानिकों को उसकी तह तक तो पहुंचना ही था। धीरे धीरे उस पूरी वस्तु को निकाला गया। उसे देखकर, वैज्ञानिक अपनी पूरी जिंदगी में जितना नहीं  हँसे थे, हँसे। पता चला कि वह सील का एक बड़ा सा बट्टा था।

प्रह्लाद के हाथ में तो अब कुछ नहीं था। बड़ी मिन्नत करके कभी कभी खुदाई के स्थल तक पहुँच पाता। और बड़ी निराशा लेकर वापस आता। घर आते ही उसकी पत्नी और बच्चे पूछते, 'आज क्या क्या निकला।' उसकी छोटी सी एक मुस्कान सारा उत्तर दे देती। उसे संतोष था चलो उसको नहीं कुछ मिल रहा तो सरकार के हाथ भी कुछ नहीं लग रहा। एक ओर तो प्रह्लाद को कुछ मिलने की उम्मीद धूमिल होती जा रही थी, दूसरी ओर आने जाने वालों से उसकी खड़ी फसल धांगी जा रही थी। ऊपर से खुदाई की मिट्टी भी उसके खेतों में फैला दी गयी थी।  इस साल की तो उसकी सारी फसल चौपट हो गयी।

खुदाई का काम आगे चलता रहा। आधे से भी अधिक टीला खोदा जा चुका था। अब वैज्ञानिकों को वैसा कुछ दिखने लगा जिसकी उन्हें तलाश थी। उन्हें एक टूटी फूटी दीवार की रेखा दिखाई दी तो उनकी जान में जान आयी। दीवार पूरी तरह से जर्जर हो चुकी थी, नींव से मात्र डेढ़ दो फुट की ही ऊंचाई रह गयी थी। बाकी की दीवार ढह गयी थी, ढही ईंटों का भी कहीं अता पता नहीं था। सैकड़ों साल पुरानी होने के कारण वे गाल गयी थीं।अब उन्हें लगने लगा कि उनका यह अभियान निरर्थक नहीं जायेगा। दीवार के समीप ही कुछ हड्डियां नजर आईं। हड्डियां काफी सड़ी गली अवस्था में थीं। हड्डियों के टुकड़ों को देख कर टीम को नर कंकाल की आशंका हुई। वैसे हड्डियां मनुष्य की अस्थि से कुछ मोटी थीं। हड्डियों का अंश कई फ़ीट की लम्बाई में फैला हुआ था। टीम ने अनुमान लगाया कि बहुत पुराने समय का व्यक्ति रहा होगा जिसकी लम्बाई, कम से कम सात फुट रही होगी। मिली हड्डियों के टुकड़ों को सरंक्षित कर लिया गया। वह किस प्रजाति का कंकाल है, उसकी सही उम्र, लिंग आदि का पता लगाने के लिए प्रयोगशाला में भेजा गया। नर कंकाल मिलने की बात, पूरे क्षेत्र में आग की तरह फ़ैल गयी। क्षेत्र के मुसलमान एकत्र हो गए उन्होंने वहां पर नर कंकाल और दीवार पाए जाने के फल स्वरुप, किसी पीर की मजार होने का दावा कर दिया। वैज्ञानिकों ने बताया कि हड्डियों का परीक्षण किये बिना स्पष्ट तौर से नहीं कहा जा सकता कि वह मानव अस्थियां ही हैं, मगर नेता लोग कहाँ मानने वाले। बड़े बड़े नेता आने लगे और मजार होने का प्रचार करने लगे।

दीवार के आगे की खुदाई हुई तो हनुमान जी की एक छोटी मूर्ति निकली। अब हिन्दुओं का जमावड़ा शुरू हो गया। हनुमान जी भूमि के अंदर से और स्वतः प्रकट हुए हैं। उनके दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आने लगे। वैज्ञानिकों को लगा इन सब से आगे की खुदाई में व्यवधान उत्पन्न होगा तो मूर्ति को टीले के एक ओर स्थापित करवा दिया। लोग आकर, धूप-अगर बत्ती जलाने लगे और हनुमान चालीसा का पाठ होने लगा। अब हिन्दू और मुसलमानों में ठन गयी।  हिन्दू कहने लगे यहाँ मंदिर बनेगा और मुसलमान कहने लगे यहाँ मजार बनेगी। उनकी इन मांगों ने आंदोलन का रूप ले लिया। दोनों समूहों के बड़े बड़े नेता आने लगे। बात विधानसभा तक पहुँच गयी।  उस जगह को देखने कई नेता और अधिकारी आये। बड़ी बड़ी गाड़ियों आयीं। प्रह्लाद की खड़ी फसल को धांग डाला। बड़ी मुश्किल से पुरातत्व के कर्मियों ने समझाया कि पहले खुदाई पूरा हो जाने दो, देख लें और क्या रहस्य छुपा है, तब तुम लोग मंदिर या मजार आपस में फैसला करके बना लेना। आगे की खुदाई में किसी गाय की गर्दन का अस्थि-कंकाल मिला। अब समझ में आ गया कि वह नर कंकाल नहीं था, अपितु वहां किसी मरी गाय को दफनाया गया होगा। उधर परिक्षण हेतु जो अस्थियां भेजी गयी थीं उसकी भी किसी पशु की हड्डी होने की पुष्टि हुई। अब पुरातत्व विभाग के सामने यह रहस्य था आखिर यह मिट्टी का पहाड़ कहाँ से आया होगा। दूर दूर तक की शेष सभी जमीन तो समतल है, बस यहीं पर यह मिट्टी का पहाड़। वे आपस में विचार विमर्श कर ही रहे थे कि एक मजदूर बोल बैठा, 'वो देखिये साहब! वो पोखरा कितना बड़ा और पुराना है। यहाँ से मुश्किल से दो फर्लांग पर होगा। हमें तो लगता है, जो भी वो पोखरा खुदवाया होगा, बंजर देखकर मिट्टी को यहाँ फिकवा दिया होगा ताकि उसके आस पास की खेती लायक जमीन बेकार न हो। वैज्ञानिकों को भी ऐसा ही लगा।

प्रह्लाद बड़े असमंजस में था, जमीन उसकी, उससे कोई नहीं पूछ रहा इस जमीन पर क्या होगा। ये लोग अपने आप ही फैसला कर रहे हैं कि मंदिर बनेगा और मजार बनेगी। पैसे तो पहले ही ठिकाने लग चुके थे, अब इस साल की फसल से भी वह हाथ धोया। वो बेचारा किसकी माँ को माँ कहे। घर में दाम न कौड़ी, अब वह मदद भी मांगे तो किससे। यह मेला महीनों तक चलता रहा। धीरे धीरे लोगों का जोश ठंडा पड़ गया। पुरातत्व विभाग का अभियान असफल बताकर बंद कर दिया गया। अब तो हनुमान जी के यहाँ अगरबत्ती जलाने वाले भी इक्का दुक्का ही रह गए। प्रह्लाद, अपने हाल पर अकेला पड़ गया था। अब उस टीले से, उसके मन का भय निकल चुका था। भूत तो पहले ही ओझा ने भगा दिया था, और हनुमान जी भी जो दबे पड़े थे, प्रकट हो गए। अब भूत की क्या मजाल, वहां ठहरे। प्रह्लाद, आखिरकार थक हार कर, हनुमान जी से मदद माँगा। एक दिन वह टीले वाले हनुमान जी की पूजा कर रहा था, तभी उधर से ठाकुर सूरजमल गुजर रहे थे। वे प्रह्लाद को पूजा करते देख वहां रुक गए। प्रह्लाद की पूजा समाप्त होते ही उन्होंने पूछा, 'हमें भट्ठे की ईंट के लिए मिट्टी चाहिए, कोई अपने खेत की मिट्टी देना चाहे तो बताना।'
'कौन देगा ठाकुर साहब ! ऊपर की मिट्टी निकल जाने से पैदावार एकदम से घट जाती है। किसान लोगों का खेत ही तो सहारा होता है। अपने खेत की मिट्टी तो शायद ही कोई बेचना चाहे। फिर भी कोई मजबूरी में बेचना चाहेगा तो बता दूंगा।'
तभी ठाकुर साहब की नजर टीले की खुदी मिट्टी पर पड़ी। वे उसमें से एक मुट्ठी उठाकर देखने लगे। 'अरे यह मिट्टी तो ठीक ही लग रही है। बेचोगे ?'
यह बात तो प्रह्लाद को मुंह मांगी मुराद सी लगी। कहाँ उसकी इतनी जमीन फंसी हुई है, उसे जोत बो नहीं पा रहा है। अगर सारी मिट्टी हटवाए तो काफी खर्च भी करना पड़ेगा, यहाँ तो मिट्टी का कुछ मिल भी जाएगा।
'अगर आपके काम आएगा तो क्यों नहीं ठाकुर साहब! क्या देंगे ?'
'भाई आजकल तो कुछ मंदा ही चल रहा है, पचास हजार ले लेना।'
यह तो प्रह्लाद कभी सोचा भी न था। उसे तो खजाना मिल गया। इतना खेत अब उसके जोतने बोने के काम आएगा। नकद मिल रहा है वो अलग। 'जय हनुमान जी! तुमने सुन लिया।'