Saturday, 27 January 2018

Bhandara

सुबह ८ बजे ही हलवाई अपनी कड़ाही, पौना और भगौना लेकर अपने कार्यकर्ताओं के साथ आ चुका है। टेंट और भंडारा का सारा सामान भी आ चुका है। देखते ही देखते वहां छोटा सा टेंट तन जाता है। सड़क का कुछ भाग सम्मिलित करते हुए, पटरी पर टेंट को इस तरह से लगाया जाता है कि वहां दुकानों में आने जाने में कोई रूकावट न हो। वैसे वहां के दुकानदारों से इस काम में सहयोग देने और भंडारा ग्रहण करने के लिए पहले ही कहा जा चुका था। हलवाई को सहेज दिया जाता है कि एक डेढ़ बजे तक माल तैयार हो जाना चाहिए, ताकि दोपहर के खाने के समय तक, कार्यक्रम आरम्भ किया जा सके।
धीरे धीरे दोपहर का समय आ चला है, भंडारा परोसने के लिए टेंट में चार पांच मेज लगवा दी गयी हैं। वहीँ बगल में एक बड़े भगौने में तैयार सब्जी रखी है और हलवाई पूड़ी छान छान कर एक ड्रम भर रहा है।  मेजों पर सब्जी की बाल्टियां और पूड़ियों की टोकरियां सज चुकी हैं। भंडारा परोसने के लिए टीम तैयार है। कुछ बच्चे आसपास मंडराने शुरू हो चुके हैं। जैसे ही उन्हें संकेत मिले भंडारा पाने के लिए टूट पड़ें। हलवाई ने टीम को पहले ही चेतावनी दे दी है, 'अभी थोड़ा रूक जाना, पूड़ी का ड्रम भर जाए तभी शुरू करना।  माल उठने में अधिक देर नहीं लगती। थोड़ी ही देर में भीड़ लग जाती है। फिर इतनी जल्दी जल्दी पूड़ी नहीं दे पाउँगा।'
भीड़ का अनुमान लगाते हुए, परोसने वालों की दो टीम बन जाती है। वे हलवाई की बात का संज्ञान लेते हुए, थोड़ी और पूड़ियाँ निकलने की प्रतीक्षा करते हैं। बस पन्द्रह मिनट की और देर थी, ड्रम लगभग भर गया। टीम ने मेज पर पूड़ी, सब्जी और दोने लगाना प्रारम्भ कर दिया। बच्चे तो प्रतीक्षा कर ही रहे थे, उन्हें बस इशारा का इंतजार था। लपक कर वहां पहुंचे, सब्जी का पहला दोना जिस बच्चे के हाथ में मिला वह मुड़ कर मुस्कराते हुये अपने साथियों की ओर देखा। उत्तर में उसे भी साथियों की मुस्कराहट मिली। अबिलम्ब भंडारा खाने वालों की भीड़ जुट गयी।  देखते ही देखते दो लम्बी कतारें लग गयीं। मेज के दायीं और बायीं दोनों ओर से पूड़ी सब्जी परोसा जाने लगा। बच्चों की संख्या अधिक होना स्वाभाविक था। 
चार चार पूड़ियों पर, दोने में सब्जी रख कर परोसी जा रही थी।
भंडारा खाने वाले, अपना-अपना दोना लेकर, कोई सड़क की पटरी पर बैठ तो कोई खड़े ही खाने लगा। बांटने वाली टीम बड़ी तन्मयता से काम कर रही थी। उनका पूरा प्रयास था कि लोगों को जल्दी से जल्दी भंडारा परोसा जाय, कहीं ऐसा न हो कि कोई प्रतीक्षा करके, अधिक समय लगने के कारण कोई खाली ही चला जाय।  भंडारा तो वैसे पटरी  पर ही चल रहा था परन्तु लेने और खाने वाले सड़क पर फैले हुए थे। अभी आधे घंटे भी नहीं हुए थे, सड़क पर यातायात बाधित होने लगा, गाड़ियों के भोंपू बजने आरम्भ हो गए। शीघ्र ही किसी आपात काल जैसा दृश्य उत्पन्न हो गया। मगर भैंस के आगे बिन बजाये और भैंस बैठी पगुराए, वाला हाल। लोग टस से मस नहीं हो रहे थे। किसी तरह, बीच बीच में गाड़ियों के निकलने की जगह दे दी जा रही थी।  
दोने फेंकने के लिए, अलग एक ड्रम रखा हुआ था, किन्तु यह बात सभी को समझ नहीं आ पायी थी। दोने सड़क पर दूर तक बिखरे हुए दिख रहे थे। स्वच्छ भारत अभियान का उन पर कोई प्रभाव नहीं था। क्षेत्र के सफाई कर्मचारी ने आकर अपना रौब दिखाया, 'भंडारा समाप्त होने पर, सब साफ़ करवा देना, अन्यथा हमें साफ़ करना हो तो बता देना।'
'ठीक है तुम्हीं साफ़ करवा देना, पैसे बता दो।'
भंडारा अपने पूरे शबाब पर था। बच्चों में रौनक देखते ही बनती थी। जिनके हाथ दोना लग जाता, वह मचलते हुए जाकर, पटरी पर कहीं बैठ जाता। कभी कभी कुछ मक्खियां भी साफ़ दोने से खाने के चक्कर में, इधर उधर बिखरे दोनों  से खाने के बजाय इन बच्चों के दोनों में हिस्सा लेने आ जातीं। पर ये बच्चे भी कौन से कि समझदार नहीं थे, इतनी मेहनत से लाइन में लग कर दोना पाये और इतनी आसानी से इनको उसमें हिस्सा दे देते, यह कैसे हो सकता था ! बेचारी उड़कर, फिर वहीं उनके लिए नियत स्थान पर पहुँच जातीं।
कुछ ही समय पश्चात्, जैसे ही दो  नन्हें हाथ, दोना लेने के लिए लपके, परोसने वाले ने बोला 'तू तो थोड़ी देर पहले भी ले गया था।'
'वो तो मैंने अपनी छोटी बहन को दे दिया, उधर बैठ के खा रही है।'
'चल ये ले, अब किसी  को मत देना, तुम्हीं खाना। जिसको खाना होगा, यहाँ से ले जायेगा।'
'हाँ अंकल, कहते, विजय की नन्हीं सी मुस्कान लिए, वह एक ओर हो गया।'
तभी साथ वाली पंक्ति में बिट्टू अपने पीछे खड़े सोनू की ओर संकेत करके बोला, 'अंकल ये पहले भी ले जा चुका है।'
'तू भी तो ले गया है', पीछे से सोनू बोल बैठा।'
'वो तो, मैंने अपने भाई को दे दिया।'
'नहीं अंकल ! घर ले जाने को उधर डब्बे में रखा है।'
तभी परोसने वाला,  बिट्टू और सोनू, दोनों को पंक्ति से हटाने लगा, ' चलो हटो। घर ले जाने के लिए नहीं है, यहीं खाओ। खा लेना तो और ले लेना।'
'लेकिन अंकल वो तो भाई खा गया, मैं कैसे खाऊंगा ?'
'अच्छा ये लो, फिर नहीं आना।'
 'हाँ, ठीक है। '
उन दोनों को देने के बाद परोसने वाले को उसका सहयोगी बताने लगा, 'इनमें से कई बच्चे यहाँ से ले जाकर, उधर  कोने में इकठ्ठा कर रहे हैं। ये अपना ही नहीं बल्कि पूरे परिवार का प्रबंध कर रहे हैं।'
'चलो कोई बात नहीं, कोई भी खाये, किसी के पेट में ही तो जायेगा। हमें तो खिलाने से मतलब है। बस नुकसान नहीं होना चाहिए।'
थोड़ी ही देर हुई थी कि बिट्टू फिर से लाइन में आ गया। परोसने वाले कार्यकर्ता ने उसे पहचान लिया, 'तुझे तो मैं दो बार दे चूका हूँ, फिर आ गया। कितना खायेगा!'
'अंकल वो मैंने अपनी बहन के लिए रखा था, कुत्ता ले गया।'
सोनू भी उसके पीछे पीछे लगा ही था, 'हां अंकल! कुत्ता, इसका डब्बा ही उठा ले गया।'
परोसने वाला भी क्या करता, दोने की सब्जी, चार पूड़ी के साथ थमा दिया।
भंडारा खाने के लिए अकरम और कल्लू भी पहुँच चुके थे। अकरम तो कतार में पीछे लग गया, लेकिन कल्लू को इतना सब्र कहाँ था। वह आगे लाइन के आस पास थोड़ी देर मंडराया और फिर उसमें घुस गया। पीछे से  किसी बालक की आवाज आयी, 'वो देखो लाइन में घुस रहा है।' पर कल्लू ढीठ होकर बोला, 'मैं तो कबसे खड़ा हूँ!'
कल्लू अपना दोना लेकर चला। अकरम के पास पहुंचा तो उसकी ओर देखता हुआ मुस्करा कर अपनी जीत दर्ज करा रहा था, तभी उधर से बबलू भी लपका चला आ रहा था। कल्लू उसे देख न पाया और टकरा गया, पूड़ियाँ सड़क पर फैलीं और सब्जी उसके कपड़ों पर। अब तो कल्लू पर भारी संकट मंडराने लगा। इन कपड़ों में फिर से लेने जाएगा तो पकड़ा जायेगा और उसे दोना  नहीं मिलेगा। अगर घर गया तो डांट पड़ेगी। अकरम ने  वस्तु स्थिति को भांप लिया। कल्लू से बोला, 'उधर जाकर तू कपड़े साफ़ कर, मैं तेरे लिए भी लेकर आता हूँ।' 

भंडारा चलते, अब तक डेढ़ दो घंटे हो चुके थे। भंडार की हुई पूड़ी समाप्त हो चुकी थीं। ताज़ी पूड़ी आने का क्रम धीमा पड़ गया था। पंक्ति में खड़े सबको अंटाने के ध्येय से अब चार के स्थान पर दो दो पूड़ियाँ दी जाने लगी थीं। सब्जी का भंडार भी थोड़ा ही दिख रहा था। वैसे अब तक काफी भीड़ निबट चुकी थी। टोकरी की पूड़ी समाप्त होने पर, पंक्ति में खड़े लोगों को कुछ देर प्रतीक्षा करनी पड़ रही थी। नयी घान आते ही समाप्त हो जा रही थी। आयोजकों द्वारा भरोसा दिलाया जा रहा था, 'सब्र करो सबको मिलेगा, पूड़ी छनने में थोड़ा समय लग रहा है।'
कुछ लोगों के मन में तो पूरी निष्ठा थी और वे भंडारे के प्रसाद के दीवाने थे, उनके मन में था कि वे प्रसाद का स्वाद लेकर  ही रहेंगे, चाहे थोड़ी प्रतीक्षा ही क्यों न करनी पड़े। परन्तु कई लोग ऐसे भी थे कि यह सोच कर जाने लगे, दो पूड़ी के लिए इतना समय कौन नष्ट करे।
धीरे धीरे बड़ों की भीड़ लुप्त होने लगी थी। अब बच्चे ही अधिक थे, वे अभी भी पूरी तरह तटस्त थे। भाग्य वश छुट्टी का दिन था, उन्हें समय का कोई आभाव नहीं  था। बीस पच्चीस मिनट प्रतीक्षा से क्या अंतर पड़ता है; मन पसंद का और वो भी मुफ्त, कुछ खाने को मिल रहा था। पूड़ी की अगली घान आ गयी, वो भी दस बारह लोगों को ही अंट पायी; पूड़ी समाप्त हो गयी। भंडारा लेने वालों का ताँता समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था।
बनवारी आज घर से देर से निकला था। अपने अड्डे पर जा ही रहा था कि उसे भंडारे की भनक लग गयी। वह जाकर कतार में खड़ा हो गया। उसका नंबर अभी बहुत पीछे था। वह पंक्ति छोड़ कर आगे मेज की ओर बढ़ गया, 'सेठ जी! मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया, भूख लगी है। अल्ला की मेहरबानी से, इस बार मुझे मिल जायेगा क्या ?'
पंक्ति में खड़े लोग चिल्लाने लगे, 'अरे ये तो उस चौराहे वाला भिखारी है, लाइन में आ जा, बाबा!'
भंडारा परोसने वाला उनकी बात सुनकर, बनवारी को लौटा दिया, 'बाबा लाइन में आ जाओ। ये सब लाइन में खड़े हैं, बेवकूफ थोड़े ही हैं। जब नंबर आएगा, तुम्हें भी मिल जायेगा।'
'या अल्ला! लगता है, आज भूखे ही रहना पड़ेगा या किसी गुरूद्वारे में जाना पड़ेगा।' कहते हुआ वहाँ से चल दिया। बनवारी ने भांप लिया था, सब्जी भी थोड़ी ही है। पता नहीं पूरी पड़ेगी या नहीं, उसका वहाँ खड़ा होना भी व्यर्थ ही होगा। आज घर से देर से निकलने के कारण, अभी तक कोई कमाई भी नहीं हो पायी थी।
उसके जाने के बस पांच मिनट में ही पूड़ी की नई घान आ गयी। कुछ लोगों को देने के बाद भंडारा परोसने वाले ने चार पूड़ी अलग कर दी और बच्चों पूछने लगा अरे वो भिखारी कहाँ गया ?
बच्चे चिल्लाने लगे, 'वो तो चला गया।'
एक बच्चे की और इशारा करते हुए, 'जाओ देखो यहीं कहीं होगा, बुला लाओ। तुम्हें मैं लाइन से अलग दे दूंगा।'
वह बच्चा आस पास देखा मगर बनवारी नहीं मिला, तब तक पता  नहीं कहाँ अंतर्ध्यान हो गया था। तभी भंडारा करवा रहे, सेठ जी आ गए। परोसने वाले ने उन्हें बता दिया, 'एक भिखारी आया था, पूड़ी तैयार नहीं थी, पता नहीं कहाँ चला गया? एक बच्चे को भेजा था पर वो दिखा नहीं।'
सेठ जी के दिल में करुणा जागी, बोले, 'तुम खुद जाकर देख लो, कहीं आस पास ही होगा।  बुला कर खिला दो। '
'बच्चों में से आवाज आई, 'वो आगे वाले चौराहे पर बैठता है। वहीँ गया होगा।'
सेठ जी ने उस कार्यकर्ता को थोड़ी सब्जी और कुछ पूड़ियाँ एक पन्नी में डाल कर वहीं ले जाने को कहा। वह कार्यकर्ता अविलम्ब अपना स्कूटर उठाया और उधर गया, मगर थोड़ी ही देर में, वह सब लेकर वापस आ गया, 'सेठ जी वो तो वहां भी नहीं मिला।'
अब सेठ जी भंडारे का विश्लेषण करने लगे, 'वैसे काफी लोग निबट गये। तुम लोगों ने बड़ा सहयोग दिया। देखो! दो बोरा आटा खप गया! चलो, अब हो गया, सब समेटो।'
सेठ जी की बात सुनकर, एक सहयोगी बोल पड़ा, 'हां, लाला जी ! खाने की भी सभी लोग बहुत तारीफ कर रहे थे। एक हजार से भी ऊपर, लोग खा चुके होंगे। बस वही, एक भिखारी भूखा चला गया। वह बेचारा तो कह भी रहा था कि बहुत भूखा है।'
घर जाकर सेठ जी ने भिखारी वाली बात अपनी पत्नी को बताई तो वह सोच में पड़ गयी, 'बताओ हजारों को तो खिला दिया और एक भूखे को नहीं खिला पाए। अब तो मुझे पश्चाताप करना पड़ेगा। आज शाम का भोजन मैं नहीं करुँगी।'
उसके अनशन की बात सुन सेठ जी भी चिंता में पड़ गए, अब पत्नी नहीं खायेगी तो वे भी कैसे खाएंगे! और खाये बिना सेठ जी को नींद कैसे आएगी ! उन्होंने उसका निराकरण सोचा।  पत्नी से बोले, 'क्यों परेशान हो रही हो? वह भिखारी था कहीं मांग  कर खा लिया होगा। फिर भी, आज का दिन तो गया; तुम ऐसा करना कल सुबह उसका भोजन बनाकर पैक कर देना। अब मैं काम पर जाऊंगा तो उसे देते हुए चला जाऊंगा।'
पत्नी को यह बात उचित नहीं लगी कि वह कहीं मांग कर खा लिया होगा, आखिर हम तो पाप के भागी बने। मगर, उसे भोजन भेजने के प्रस्ताव पर, अनशन तोड़ दिया। अगले दिन प्रातः उठकर उसने खाना बनाकर पैक कर दिया और सेठ जी से बोली, 'ये लो, उस भिखारी का पता करके खिला देना, यह नहीं करना कि वापस लिए चले आओ ।'
सेठ जी को भिखारी का ठिकाना तो पता लग ही चुका था, वे डिब्बे में बंद भोजन ले गए। भाग्य वश बनवारी उसी चौराहे पर बैठा मिल गया। उसकी ओर खाने का डब्बा बढ़ाते हुए सेठ जी ने कहा, 'ये लो बाबा! भोजन कर लो।'
बनवारी इस प्रकार से अचानक उसके पास भोजन आने पर चौंक गया, 'लेकिन, मैं तो आज खा पीकर आया हूँ। मुझे तनिक भी भूख नहीं है।'
'ठीक है, रख लो, किसी और को दे देना।'
'वाह साहब ! जो चीज मेरी नहीं है, मैं क्यों रख लूँ ? और मैं किसको दूंगा, चले जाओ पास में ही मंदिर है, कोई न कोई भिखारी मिल जायेगा, खिला देना। बाकी आपकी किस्मत। आपने मेरे बारे में सोचा, मैं आपके लिए दुआ करता हू, अल्ला आपकी खैर करे।'





Naro ya kunjaro


नरो या कुंजरो

रामकरण बनारस से जब भी आता पूजन का हाल बिना पूछे ही बताता। 'बाबा!  पूजन बाबा का हाल तो बहुत दयनीय है। रीना और उसके पति उनका ध्यान बिलकुल भी नहीं करते।  न तो उन्हें समय से खाने पीने को देते न ही दवाई। बदन में दर्द से कराहते रहते हैं। बताईये यहाँ का सब बेच कर बेटी के यहाँ रह रहे हैं।'
तभी विन्देश टपक पड़ता - 
 'मुझे तो पहले ही पता था उनका यही हाल होना था। अरे बेटी-दामाद के यहाँ किसको सुख मिला है! '
यह सुनकर विनोद के मन में और डर समा जाता। वे तो पहले ही निर्णय ले चुके थे - चाहे कुछ भी हो वे अपना गांव नहीं छोड़ेंगे और गांव में रहना है तो रामकरण पर ही निर्भर रहना था। पूजन का समाचार विनोद को सीधे नहीं मिल पाता था। कंचन ने विनोद को मोबाइल फ़ोन दे रखा था लेकिन विन्देश उसे अपने पास ही रखता कि किसी से वे बात न कर पाएं। अपने मन की बात वे किसी से साँझा  नहीं कर पाते थे। कंचन जब भी फोन करती सदाशिव यही कहता,  'मैं तो बाजार आया हूँ, बाबा घर पर हैं।'  उन्हें तो कंचन के फ़ोन के बारे में बताता भी नहीं था। यहाँ तक कि उनसे कोई मिलने भी आता तो रामकरण के परिवार का कोई न कोई उन्हें घेरे रहता। 
विनोद को अपने मन के कष्ट को दबा के ही रखना पड़ता।  वे डरते थे यदि किसी से रामकरण के परिवार की बुराई किया तो बाद में उन्हें ही उनके दुर्व्यवहार का भाजन बनना पड़ेगा।    
 

कंचन आज चार वर्ष के बाद अमेरिका से बनारस आयी है। वैसे मुकदमे की पैरवी तो वकील कर ही रहा था, मगर इस बार उसे पेश होने का समन जारी हो गया था। वकील ने बता दिया था, केस लगभग निर्णायक दौर में पहुँच चुका है एक बार बनारस आ जाओ। कंचन को बच्चों से फुर्सत नहीं थी, परन्तु किसी तरह समय निकाल कर आ ही गयी। तारीख पर वह कोर्ट में पेश हुई।
पेश होने पर कंचन से जज साहब ने पूछा, 'जब तुम्हारे पिता जी ने जमीन रामकरन के नाम लिखी तो विरोध क्यों नहीं किया ?'
'सर, मैं अमेरिका में थी, मुझे पता नहीं चला। मैं तो उनके मरने में आयी थी, तब गांव के एक व्यक्ति ने बताया।'
'मगर इस वारीसनामा में तो लिखा है, विनोद के कोई औलाद नहीं है।'
'सर मैं तो इल्लाहाबाद बोर्ड से माध्यमिक पास हूँ। यह मेरे प्रमाणपत्र की प्रति है, इसमें मेरे पिता का नाम पढ़ लीजिये और गांव के लोग भी तो जानते हैं।'
वकील की ओर देखते हुए, 'फिर तो यह धोखाधड़ी का मामला बनता है, वकील साहब! क्यों न प्रतिवादी के खिलाफ धोखाधड़ी का आपराधिक मामला चलाया जाय?'
यह सुनते ही कंचन घबरा गयी, कहीं ऐसा न हो रामकरन को सजा हो जाय। ऐसा हुआ तो अनर्थ हो जायेगा। उसका तो बस यही ध्येय था कि वे लोग इस बात का एहसान मानें कि कंचन की संपत्ति उनके पास है। इसके अलावा उसे कुछ नहीं चाहिए था। उसने पहले भी रामकरन को बोल रखा था, पिताजी की ठीक प्रकार से देखभाल करना। उनकी जमीन-जायदाद में से वह कुछ नहीं लेगी। वह अमेरिका खाली हाथ गयी थी और ईश्वर की कृपा से, अमेरिका में  उसका बहुत कुछ बन गया था। उसके बच्चे भी, अब इंडिया कहाँ वापिस आने वाले!
कंचन ने वकील से कान में कहा, 'आपराधिक मामला नहीं चलाना है। मुझे तो यह जमीन भी अपने नाम करवा के फिर इन्हीं लोगों को देना था। बस इन्हें इनके किये का सबक सिखाना था। चाहे जैसे भी हो, इन लोगों ने पिताजी की जिंदगी तो पार लगा ही दी। हमें तो बस इस बात का क्षोभ है कि आखिर इन्होंने कैसे कह दिया, विनोद गुप्ता के कोई औलाद नहीं, यह तो हमारे लिए सरासर गाली है। मुझे तो बस इतना था, कि मैं पिता जी की संपत्ति इन लोगों को दे दूंगी, तो मेरा भी कभी मायके आने का मन करेगा, और मैं शान से आउंगी। पर इन लोगों ने तो  . . . .  '
वकील ने कंचन को कोर्ट रूम से बाहर ले जाकर समझाया, 'अब तो कोई चारा नहीं, जज ने बोल दिया तो यह केस अब पुलिस के पास जायेगा। हो सकता है धोखाधड़ी के मामले में, पुलिस जाँच के दौरान रामकरन, गवाह और उसके परिवार के एकाध लोगों को गिरफ्तार भी कर ले। बस अब एक ही विकल्प है कि मुक़दमा वापस लेने के लिए प्रार्थना पत्र दाखिल किया जाय।'
इस बात पर कंचन तैयार हो गयी। मुक़दमा वापस करने का प्रार्थना पत्र दाखिल कर दिया गया। इस पर जज ने मुकदमा वापस लेने की अनुमति दे तो दिया, किन्तु कोर्ट का इतना समय बर्बाद करने के लिए कंचन पर पचास हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया। रामकरन स्थिति को समझ रहा था और वह इस बात पर कंचन का कृतज्ञ भी था, पर उसकी फटेहाली विनोद की जमीन लेने के बाद भी वैसी की वैसी थी। यह पचास हजार भी कंचन को ही भरना पड़ा। कंचन बड़बड़ाती रही, ' देखो इन लोगों ने मुझ पर तनिक भी भरोसा नहीं किया। मैं बार बार कहती रही, कि खेत लेकर मुझे क्या करना है ! मैं तुम्हीं लोगों को दूंगी, पर  इन्होंने  धोखे और कपट से लिखवा लिया। यह तो पूर्वजों की जमीन थी, पिता जी मेरे हिस्से का लिख नहीं सकते थे, इसलिए इन्होंने झूठ का सहारा लिया कि विनोद का कोई नहीं है। बताओ, ये हमारे खेत का भी खा रहे थे, और पापा की पेंशन भी इन्हीं लोगों के हक़ में जाती थी, जिस थाली में खाये उसी में  छेद कर दिया। मैं तो इन लोगों को अपने सगे से भी अधिक समझती थी। क्या रामकरन अपनी सगी बहनों के हिस्से  की जमीन भी उनकी सहमति के बिना लिखवा सकता है?' रामकरन मुंह लटकाये चुप सब सुनता रहा। उसकी आँखों में आंसू की धार थी।  वह मन ही मन सोच रहा था, उसने अपने पुत्र और बीबी के कहने पर एक देवी के साथ छल किया। इतना बड़ा पाप किया, जिसका कोई लाभ नहीं। वह कंचन को मनाने लगा, 'जो हो गया सो गया, यह सब हमारी मूर्खता भर थी, इन बातों को भुला दो, तुम अब भी अधिकार के साथ रहो, अभी भी सब तुम्हारा ही है।'
पर अब इन बातों का कंचन पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं था। उसने बस इतना कहा, 'तुम लोगों ने मुझे इस गांव से बेदखल तो किया ही, हराम की औलाद भी बना दिया, अब किस मुंह से तुम्हारे यहाँ जाऊं !'  कहकर, उसने गाँव तो क्या इंडिया से ही अलविदा कर लिया।
   
बचपन में, कंचन को कभी लगा ही नहीं कि वह माँ बाप की इकलौती संतान है। उसका अधिकतर समय अपने चाचा के यहाँ ही बीतता था। चाचा शम्भू के दो पुत्र और दो ही पुत्रियां भी थीं। कंचन अपने को पांच भाई बहनों में से एक समझती थी । शम्भू की पत्नी भी उसे अपनी बेटी सा प्यार देती थी। कंचन का खाना, खेलना, स्कूल जाना आदि  सब कुछ उसके बच्चों के ही साथ होता था। वह अपनी माँ से अधिक, चाची को जानती थी।
विनोद गोयल और शम्भू चचेरे भाई थे, मगर दोनों में प्यार और मान-सम्मान सगे से भी बढ़कर। बनारस से कोई पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर ही गांव था, विनोद के बगल में भाई शंभू का घर। कहने को ही उनके दो अलग मकान थे। विनोद का घर शम्भू के परिवार के लिए और शम्भू का विनोद के लिए हमेशा खुला रहता था। वैसे भी विनोद नौकरी में होने के कारण, घर पर कम ही रह पाता था । शंभू की अपने सगे भाई आदर्श से उतनी नहीं पटती थी, जितना प्यार विनोद से था।
विनोद का घर शम्भू से काफी बड़ा था, जिसमें अलग से एक बैठक भी थी। शम्भू के बच्चे तो एक तरह से उसी के घर में रहते  थे, अपने घर बस खाना खाने जाते थे । उसका एक कारण, बड़ी मम्मी से लगाव भी था। शम्भू के मेहमान भी आते तो सोने बैठने, विनोद के बैठक में ही जाते। विनोद को भी इस बात का एहसास था, कल को कंचन अपने ससुराल चली जाएगी तो उसका और उसकी बुढ़िया का गुजर, शम्भू के परिवार के साथ ही भली से हो पायेगा।
विनोद की पत्नी अधिकतर बीमार रहती थी। उसने सोच रखा था कि कंचन की माँ के रहते, उसका विवाह आस पास के ही क्षेत्र में किसी योग्य वर से हो जाय ताकि बुढ़ापे में उसकी देख भाल भी हो सके। वैसे वह पुराने विचार का व्यक्ति था, बेटी दामाद के यहाँ रहना उसे परंपरा के प्रतिकूल लगता था। हाँ, बेटी दामाद उसके यहाँ आकर रहें तो कोई बात नहीं। वह कंचन का विवाह  बड़े धूम धाम से करना चाहता था। विनोद तो घर कभी कभी ही आता था, इसलिए रिश्तेदारियों में आने जाने का काम कम ही कर पाता था। रिश्तेदारियों में नहीं आने जाने से, कंचन के लिए वर के लिए भी, किसी से बात नहीं चला पाता था। उसके लिए वर ढूंढने का काम, विनोद ने शम्भू पर ही छोड़ रखा था।
एक बार विनोद छुट्टी पर आया तो शम्भू ने बताया, 'मुकेश शाह मेरे साथ काम करता है, उसका भी एक लड़का है।  वैसे, रहने वाला तो वह भोपाल का है, पर नौकरी बनारस में कर रहा है। उसका लड़का अम्बर, इंजीनियरिंग कर चुका है, और उसे एक कम्पनी से नियुक्ति का प्रस्ताव भी मिल चुका है। कहो तो बात चलाऊं। वह बहुत आगे निकलेगा। मुकेश मुझसे सीनियर है, मगर उससे अच्छी दोस्ती है, काफी उम्मीद है कि बात बन जाय।'

'है तो अच्छा, लड़का इंजीनियर है, वे बनारस में रह भी रहे हैं; अच्छा रहेगा। बस यही डर है वह इंजीनियर है, नौकरी के चलते कहीं दूर न चला जाय। वे दूर चले गए तो, मुझे बेटी दामाद से मिलने के लिए प्रतीक्षा करती रहनी पड़ेगी।'
'अरे वो तो बाद की बात है। कल को भाग्य में क्या लिखा है, किसने देखा ! आप, अपनी सोचते रहो, अच्छे घर में चली जाएगी, बिटिया की जिंदगी संवर जाएगी। तुम हाँ करो या ना..., अगर मुकेश मान जाता है तो मैं कंचन का विवाह तय कर दूंगा। अभी दो भवानी और हैं, एक एक करके निबटाएंगे तभी तो।'
विनोद चुप रह गया। मुकेश ने उसकी मौन स्वीकृति को भांप लिया।

बस फिर क्या था, विनोद छुट्टी पर आया ही था; शम्भू उसे लेकर मुकेश के यहाँ गया। मुकेश को भी शम्भू के परिवार के बारे में मालूम था, सार्थक बातचीत हुई, मुकेश सैद्धांतिक रूप से अम्बर के कंचन से विवाह के लिए तैयार हो गया। औपचारिकता के लिए, अपनी पत्नी और अम्बर से बात करके उत्तर देने के लिए बोल दिया। इसमें मुकेश को अधिक समय नहीं लगा, दो तीन दिन में ही विवाह की सहमति दे दिया। विवाह की औपचारिकताएं पूरी हुईं तथा अम्बर और कंचन का विवाह संपन्न हो गया।

विनोद जैसा चाहता था कंचन के लिए वैसा ही घर और वर दोनों मिल गया। वह इस विवाह से बहुत प्रसन्न था। अम्बर की बहुत अच्छी नौकरी लग गयी थी। मगर उसकी पोस्टिंग नोएडा में हुई। नोएडा में होने के बावजूद, कंचन और अम्बर का आना जल्दी जल्दी होता, वे जब भी आते सबके लिए कुछ न कुछ ले आते।
अम्बर को विनोद क्या शम्भू के भी पूरे परिवार से प्यार और सत्कार मिलता। और वह भी अपनी ससुराल के सभी लोगों का बहुत सम्मान करता।
विवाह के चार वर्ष बीत चुके थे। अम्बर जिस कंपनी में काम कर रहा था, उसका एक प्रोजेक्ट अमेरिका में चल रहा था। उस प्रोजेक्ट को सम्हालने के लिए, अम्बर को अमेरिका जाने के लिए कहा गया। विदेश जाने के नाम पर अम्बर के मम्मी पापा अति उत्साहित हो उठे। उसके अमेरिका जाने का समाचार, सभी रिश्तेदारियों में चिंगारी की भांति फ़ैल गया। मुकेश और विनोद दोनों की रिश्तेदारियों में अम्बर पहला व्यक्ति था, जिसे विदेश जाने का अवसर मिल रहा था। इस बात से अम्बर के घर और ससुराल दोनों जगह ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। एक दिन अम्बर छः महीने के लिए, अमेरिका उड़ गया। अब कंचन बनारस अपने सास-ससुर के पास आ गयी तो माता पिता से जल्दी जल्दी मिलना हो जाता।
अम्बर के इस दौरे के बाद, उसे अक्सर ही अमेरिका आना जाना पड़ता। अब तो वह अपने साले, सालियों के लिए अमेरिका वाला जीजा था। फिर वही हुआ जिसका विनोद को डर था, बार बार जाने से, अम्बर को अमेरिका इतना भा गया कि उसने अपना और कंचन के लिए वहां का ग्रीन कार्ड बनवा लिया। वहां के लाभ और सुविधाओं को देखते हुए वह वहीँ रहने का मन बना चुका था। कुछ ही समय पश्चात् दोनों अमेरिका चले गए।  धीरे धीरे समय बीता, दोनों ने वहां पर घर खरीद लिया और अपने पुत्र के मम्मी, पापा भी बन गए।

इधर विनोद सेवानिवृत्त होकर घर आ गया। इसी बीच, कंचन की माँ का देहावसान हो गया। अब विनोद पूरी तरह शम्भू के परिवार पर निर्भर हो गया था। शम्भू के भी सभी बच्चों का विवाह हो चुका था। उसकी बेटियां अपने ससुराल जा चुकी थीं। दोनों बेटों रामकरन और जवाहर को भी दो दो पुत्र रत्न प्राप्त हो चुके थे।
जवाहर तो नौकरी करने अपने परिवार के साथ शहर चला गया, परन्तु रामकरन और उसके बच्चे घर पर रह गए। रामकरन ही खेती का सारा काम देखता था। कंचन अमेरिका से जब भी आती तो रामकरन और उसके बेटों के लिए कुछ न कुछ अवश्य ले आती। विनोद को किसी चीज की आवश्यकता नहीं थी, उसका जीवन बहुत ही साधारण था और पेंशन से बड़े मजे से काम चल रहा था। वह अपने पेंशन में से ही शम्भू के परिवार के लिए भी कुछ न कुछ करता रहता। कंचन अपने पिता को बार बार कहती कि उसके साथ अमेरिका चलें, पर विनोद को अपना गांव छोड़ कर जाना कत्तई गवारा न था। यहाँ तक कि कंचन के बार बार कहने पर भी, विनोद ने पासपोर्ट तक नहीं बनवाया। वह कहता, मोक्ष की प्राप्ति के लिए लोग बनारस आते हैं, और मैं बुढ़ापे में ऐसी पावन भूमि छोड़कर दूसरे देश जाऊं! मुझे नरक नहीं जाना।
अमेरिका से तो कंचन का दो तीन साल से पहले, आना कहाँ हो पाता। वह जब भी आती अपने चाचा के परिवार के लिए काफी कुछ सामान ले आती। इस बार वह रामकरन के लिए अमेरिका से बहुत ही सुन्दर जैकेट लाई थी और  बेटे चिंटू के लिए यहीं मोटर साइकिल खरीद दिया। विनोद ने कंचन की शादी में जितना खर्च किया होगा, उससे कहीं अधिक का सामान तो वह अपने मायके दे चुकी होगी।
विनोद, अब काफी बूढ़ा और अस्वस्थ हो चुका था। कंचन जब कभी स्वदेश आती तो वह अपने को अच्छा महसूस करने लगता। वह चाहता था कि कंचन लम्बे समय तक उसके पास रहे, किन्तु कंचन के लिए यह संभव नहीं था। उसके ऊपर अपने बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी इतनी थी कि उनकी सेवा करने के लिए समय निकाल कर यहाँ रहना कठिन था। वह रामकरन को ही उनकी सम्पत्ति का लोभ देकर अपने पापा की ठीक से देख भाल करने को प्रेरित करती। रामकरन का परिवार विनोद की सेवा में तन्मयता से जुटा रहता। वैसे रामकरन और उसकी पत्नी, माया सबसे यही कहते, कि वे मानवता और अपना कर्तव्य समझ कर, विनोद की सेवा कर रहे हैं; परन्तु लक्ष्य तो उसकी संपत्ति ही थी। माया उसे बार बार समझाती कि विनोद के जीते जी उसकी संपत्ति लिखवा ले। मर जाने के बाद, क्या पता अम्बर और कंचन के क्या विचार बने।  कहीं वे यहाँ की संपत्ति बेच कर किसी और जगह कुछ खरीद लें या पैसा साथ ले जायँ। आदर्श वैसे तो शंभू से ईर्ष्या रखता था, पर वह भी यही चाहता था की विनोद अपना खेत आदि शंभू को दे दे। कम से कम संपत्ति परिवार से बाहर न जाय और शंभू सगा भाई भी तो है।
जब शंभू और आदर्श, सम्पत्ति शम्भू के नाम लिखने को कहते तो विनोद साफ मना कर देता,  'जीते जीते नहीं लिखूंगा, मर जाने पर जो मर्जी करना। वैसे भी मर जाने पर सब तुम्हारा ही है, कंचन थोड़े ही लेने आएगी।'
इस बात पर, रामकरन की पत्नी और उनके बेटे चिंटू को भरोसा नहीं होता। वे दोनों मिलकर, विनोद पर, संपत्ति को उनके नाम लिखने का दबाव बनाने लगे। इस दबाव के कारण, विनोद दिमागी रूप से परेशान रहने लगा, परन्तु कंचन को यह बात नहीं बताता था।  उसे  डर था कि उसको बताने पर, कहीं वो इन्हें कुछ सुना देगी और ये लोग मेरी फजीहत करेंगे। लोभ वश ही सही, कम से कम, ये लोग देख रेख तो कर रहे हैं। कंचन बेटी ही है तो क्या! कोई मुसीबत आई तो वह अमेरिका से तुरंत कहाँ आ पायेगी ! ये ही लोग तो साथ रहेंगे।

माया, अपने कार्य को सफल न होते देख, एक कुटिल योजना सोची। उसे लगा कि सीधी उंगली से घी नहीं निकलने वाला। एक दिन उसने पकौड़े बनाये और चिंटू से विनोद को खाने के लिए भिजवा दिया। विनोद को प्याज के पकौड़े बहुत पसंद थे। पकौड़े देख कर वह बहुत प्रसन्न हुआ। माया ने पहले थोड़े पकौड़े भेजे तथा फिर आकर, दुबारा और ले जाने के लिए बोल दिया। साथ ही वह यह भी बोली कि 'जब बाबा अकेले हों तभी देना, ये उनकी खास पसंद के हैं। तब तक मैं और तल रही हूँ।'
चिंटू कुछ समझा नहीं बल्कि माँ के निर्देश का पालन किया। पकौड़े खाने के कुछ देर बाद विनोद का मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि वह मूर्छित होकर गिर पड़ा। रामकरन ने अस्पताल ले जाकर भर्ती करवा दिया, लेकिन इसकी सूचना कंचन को नहीं दिया गया। अस्पताल में जाँच से पता चला कि तनाव के कारण मस्तिष्क में मामूली रक्त स्राव हो गया है। डॉक्टर ने बताया कि विनोद कोमा में जा चुका है। कोशिश तो कर रहे हैं, परन्तु अब उसका पूरी तरह से स्वस्थ होना मुश्किल है। अब तो रामकरन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। वह डॉक्टर से बोला, 'डॉक्टर साहब, कैसे भी इनको ठीक कर दो, बस एक बार होश में आ जायँ।' वह डर गया था, काम भी नहीं बना और बाद में कभी इसका भेद खुल गया तो वह कहीं का नहीं रहेगा।
'होश में तो आ जायेंगे, मगर फिर कब कोमा में चले जायेंगे, कहना मुश्किल है। इसका एक मात्र उपाय ऑपरेशन है। और इस उम्र में ऑपरेशन भी सफल होगा या नहीं, कह नहीं सकते।'
इधर घर पर हाल चाल पूछने वालों की भीड़ जुट गयी। रामकरन सबको यही सफाई देता, 'पता नहीं क्या हो गया, अचानक ही मूर्छित होकर गिर गए। इससे पहले तो वे चेंज भले थे। बैठे सबसे बातें कर रहे थे।'
बीच में रामकरन की माँ टपक पड़ी, 'क्या पता पकौड़े नुकसान कर दिए हों।'
'हं, सबने तो वही पकौड़े खाये और वो खाये भी कितना बस तीन चार ही तो।'
यह तो रामकरन को भी पता नहीं था कि माया ने पकोड़ों में नशे की बूटी मिला दी थी।
चार पांच दिन के बाद विनोद के स्वास्थ में कुछ सुधार हुआ। उसे बीच-बीच में होश आ जाता फिर मूर्छित हो जाता। अब रामकरन ने कंचन को भी बता दिया। कंचन आने के लिए व्याकुल होने लगी, पर उसे तुरंत आना संभव नहीं था। उसने आठ दस दिन के बाद, आने के लिए बोल दिया।
अब रामकरन और चिंटू ने सोचा कि यह सही समय है, विनोद की संपत्ति को लिखवा ले। कंचन के आने के पश्चात्, पता नहीं फिर अवसर मिले या न मिले। उन्होंने चिंटू के एक परम मित्र को गवाह के लिए तैयार किया, और रजिस्ट्रार कार्यालय में रिश्वत देकर, इस काम को करने की पृष्ठभूमि तैयार कर ली। अब समस्या थी कि विनोद से सम्पत्ति के हस्तांतरण के लिए 'हां' कैसे बुलवाया जाय। इस हालत में वह, दस्तखत तो कर नहीं सकता था, बस अंगूठा लगेगा और उसे जायदाद के रामकरन के नाम करने की हामी भरनी होगी। चिंटू तिकड़मी और खुराफाती लड़का था ही, उसने एक तरकीब निकाली। उसे मदारी के बन्दर का खेल याद आया। विनोद की सोचने समझने की शक्ति तो अब थी नहीं। उसने एक पांच सौ का नोट दिखाकर बोला, 'बाबा ये पांच सौ का नोट, मैं अलमारी में रख देता हूँ, इसे रामकरन को देना है।'
'अच्छा।'
'किसको देना है ?'
'रामकरन को।'
'किसको देना है ?'
'रामकरन को।'
अब चिंटू और उसकी मम्मी, दिन भर में कई बार विनोद से इसका अभ्यास कराते और पूछते, किसको देना है ? जबाब में विनोद बोलता -
'रामकरन को।'
बस अब तो काम बन गया था। हस्तांतरण के दस्तावेज तैयार कराये गए। इस कार्य की श्रृंखला में जो लोग शामिल थे, सबको पैसा देकर पटाया गया। गांव में यह बोलकर की विनोद की फिर से सी-टी स्कैन के लिए ले जाना है, रजिस्ट्रार के कार्यालय ले जाया गया।
वहां अधिकारी ने पूछा, क्या आप अपनी जायदाद रामकरन के नाम करना चाहते हैं ?
विनोद कुछ नहीं बोला।
अधिकारी ने दूसरी बार पूछा तो भी वह मौन ही रहा। ऐसा लग रहा था, विनोद कुछ सुन ही नहीं रहा हो।
अब तो रामकरन और उसके साथ गए सभी परेशान होने लगे। लग रहा है सारे किये कराये पर पानी फिर जायेगा। रामकरन जाकर रजिस्ट्रार के कान में बोला, ठीक है साहब, कर दीजिये। देखिये, आपकी बात को मना नहीं  कर रहे हैं, इस समय वो बोलने के अवस्था में भी नहीं हैं।  '
'अरे भाई ! हमें भी नौकरी करनी है।  एक बार हाँ तो बोलें, उनकी फोटो भी खींचनी है। इनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। किसी ने शिकायत कर दी और मेडिकल जाँच हो गयी तो, तुम लोग भी फंसोगे, मेरी नौकरी भी जाएगी।'
रामकरन का साला भी गवाही के लिए गया था। वह बोला, 'चिंटू को बुलवा लो वही कोई तिकड़म लगाएगा। अगर यह काम अभी नहीं हुआ तो आगे मुश्किल हो जाएगी। कंचन भी आने वाली है और पता नहीं ये अंकल कब तक जीवित रहें।'
चिंटू को बुलवाया गया। रजिस्ट्रार के सामने जब चिंटू ने पूछा, 'बाबा किसको देना है ?'
विनोद अपने अभ्यास के अनुसार लड़खड़ाती जुबान से बोल दिया, 'रा... म... करन को।'
बस फिर क्या था, कृष्ण की तरह शंखनाद हो गया, सब एक स्वर में बोल उठे, 'हो गया, हो गया। चलो।'
विनोद और रामकरन की फोटो खिंच गयी।
कंचन के आने से पहले, जायदाद के हस्तांतरण का कार्य पूरा हो चुका था। इस बात को अत्यंत गुप्त रखा गया क्योंकि दाखिल ख़ारिज होने में दो महीने का समय लगना था। तब तक इस बात की कानों कान भनक नहीं लगने देनी थी।
ईश्वर की विडम्बना, जिस दिन कंचन पहुंची, उसी दिन विनोद चल बसा। वह, अपने पिता के शव का ही दर्शन कर पायी। दस दिन के लिए आई थी, पर अब तो तेरहवीं बिता के ही जाना पड़ेगा। लगभग पंद्रह दिन वहां रहने के बाद भी उसे किसी बात की भनक नहीं लगी।
तेरहवीं बीतने के बाद, कंचन रामकरन से बोली, 'पिता जी की जमीन जायदाद काका के नाम करवा लेना। मुझे छः महीने बाद फिर आना है, जहाँ हस्ताक्षर करने होंगे, कर दूंगी।'
इस बात पर, रामकरन मौन धारण किये रहा । तेरहवीं बीतते ही कंचन अमेरीका चली गयी।

छः मास पश्चात् वह अपने ससुराल एक उत्सव में आयी तो वहीँ उसे सुदेश मिल गया। कंचन को सुदेश से पता चला कि रामकरन ने तो विनोद की जमीन अपने नाम करवा ली है। कंचन को किसी के कहने सुनने पर विश्वास नहीं हुआ। उसने तुरंत ही रामकरन को फ़ोन कर दिया, 'भइया मैं बनारस आ चुकी हूँ। जमीन कब लिखवाना है, बता देना।'
'सब हो चुका है!' उधर से उत्तर मिला।
'पर कैसे ? मैंने तो कहीं दस्तखत नहीं किये, न ही कोई सहमति दी है। क्या सब हो गया? किसके नाम हो गयी, जमीन ?'
रामकरन के समीप ही, चिंटू भी खड़ा था।  उसने रामकरन से फ़ोन लेकर बताया, 'बाबा ने सब पापा के नाम कर दिया है।'
कंचन चौंकी, 'उनकी संपत्ति रामकरन के नाम कैसे हो गयी। पिता जी की जमीन जायदाद तो पूर्वजों की थी, कोई उनकी खरीदी थोड़े ही थी कि अपनी मर्जी से सारी जमीन लिख देते। वे हमेशा यही कहते थे, जीते जी मैं किसी को नहीं लिखूंगा। इसीलिए मैं भी निश्चिन्त थी, वरना आधे पर तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। उनके मरने के बाद तो पूरी संपत्ति पर मेरा ही हक़ है। वे किसी और को कैसे लिख सकते थे।'
'नहीं, कचहरी में उन्होंने कह दिया कि उनकी बेटी बहुत संपन्न परिवार में है, इसलिए इस जायदाद में से उसे कुछ नहीं चाहिए।  चूकि रामकरन और उसके परिवार ने मेरी सेवा की है यह सब उसी को दे दिया जाय।'
'मगर रामकरन को ही क्यों, जवाहर को क्यों नहीं? वैसे भी वो काका के साथ रहते थे, रामकरन के साथ थोड़े ही थे। सेवा के बदले तुम लोग उनकी जमीन का खाते भी तो थे, साथ ही पेंशन भी।'
'वो तो जैसी उनकी इच्छा, हम्हीं उनका ख्याल अधिक करते थे। उन्हें मुझसे बहुत लगाव था, अपने आप सब लिख दिए। हमने लोचन के जैसे थोड़े ही किया है कि अपने मरे हुए चाचा का सादे कागज पर अंगूठा लगवा लिया और पुरानी तिथि में वसीहत लिख ली।' रामकरन बोला।
रामकरन और कंचन की फोन पर बात समाप्त होने के बाद, सुदेश ने और खुलासा कर दिया, 'पता है बहन! विनोद जी, जब पिछली बार बीमार पड़े थे, तो इन लोगों ने धोखे से स्टाम्प पेपर पर इनके दस्तखत करवा लिए थे। उसमें इन लोगों ने लिख लिया था कि विनोद के कोई नहीं है, इसलिए रामकरन को अपना वारिस बनाना चाहते हैं, क्योंकि वही उनकी देखरेख कर रहा है।'
जब यह बात कंचन के कानों तक गयी तो वह आग बबूला हो गयी, 'इसका मतलब हम विनोद की संतान न होकर हराम की संतान हैं। यह तो सरासर मुझे और मेरी माँ को गाली है। अब तो कोर्ट में मुक़दमा करके इसकी जाँच करवाएंगे। इन्होंने उनकी देख रेख की तो क्या उनके खेत की उपज नहीं खाये! और तो और उनके पेंशन का भी सारा कुछ, इन्हीं लोगों पर ही खर्च होता था। पिता जी अपने और हमारे पर क्या खर्च करते थे।'
'लेकिन इसके लिए तो पहले सभी कागज निकलवाने पड़ेंगे। फिर केस दाखिल करने पर सालों बाद तो कहीं सुनवाई होगी।'
'जो भी हो, कागज निकलवाना मेरा अधिकार है, सूचना अधिकार का भी तो कानून है। कोई अच्छा सा वकील करके, इन बेईमानों को सबक तो सिखाना ही पड़ेगा। मैंने तो इनको पहले ही बोल रखा था, यहाँ जो कुछ है हम लेने नहीं आएंगे, सब तुम लोगों का ही है, फिर भी इन्होंने ऐसा किया। मुझ पर तनिक भी भरोसा नहीं किया। सारी जमीन रामकरन ने अपने नाम करा ली, जवाहर भी तो शंभू काका का बेटा है। यह जरूर बड़ी भाभी और चिंटू की कुटिल बुद्धि का परिणाम होगा। उन्हें लगा होगा कि इसमें से आधा, जवाहर भी न ले ले, या कंचन आकर बेच न दे। बताओ जो चीज वैसे ही उनकी होनी थी वह उन्होंने चुराकर ली। जिनका मैं हमेशा सम्मान करती थी, मेरी नजर में जिंदगी भर के लिए चोर और बेईमान बन गए। अब इनको इसका परिणाम भी भुगतना पड़ेगा।'

एस० डी० तिवारी