Friday, 27 October 2017

Naani ke desh

नानी के देश

कोयी कासिम की तीसरी पीढ़ी है। कोयी की एक नन्हीं सी बेटी है। उसे जब वह देश दुनिया के बारे में बताती है तो यही कहती है, 'यू नेवर गो टू इंडिया, मॉन्स्टर्स रेसाईड देयर।' जब कि उसे हिंदी गीत संगीत और इंडिया की संस्कृत के बारे में सुनकर, बड़ा अच्छा लगता था।
नाना कासिम और नानी अनीसा सौ साल पहले, इंडिया से स्वीडन आये और यहीं के होकर रह गए। उनकी बेटी,
खैर, वहीँ पैदा हुई और बड़ी होकर इब्राहम से शादी कर ली।
कोयी भी बड़ी हो चुकी थी और उसने किम से विवाह कर लिया।
कोयी ने अभी तक इंडिया देखा भी नहीं था।
जब वह चार पांच साल की थी तो एक बार मां के साथ मुंबई गयी जरूर थी, पर उस समय की बात का कहाँ ख्याल था। उसका बार बार मन होता कि वह एक बार अपनी नानी  के देश, इंडिया घूम  कर आये। उसे ताजमहल और काशी में गंगा घाट देखने का बड़ा जुनून था। उसने मन ही मन इंडिया जाने की योजना बननी शुरू कर दी थी। एक दिन कोयी ने किम के सामने इंडिया जाने का प्रस्ताव रख दिया, 'किम! चलो इस बार की छुट्टियां इंडिया में मनाते हैं।'
वैसे तो किम का भी मन एक बार इंडिया घूमने का था, खास तौर से ताजमहल देखने का। मगर उसने उत्तर दिया, 'नो डॉर्लिंग, इस बार नहीं, इन छुट्टियों में अफ्रीका चलते हैं। इंडिया फिर कभी चल पड़ेंगे।'
'मगर, मेरा इंडिया जाने का बड़ा मन है, यू नो मेरे एन्सेस्ट्राल वहीँ के हैं (तुम्हें पता है मेरे पूर्वज वहीँ के हैं )। अब तक एक बार भी इंडिया ठीक से नहीं देखा। इंडिया जाना मेरा एक सपना है। चलो वहीँ चलते हैं, अफ्रीका अगली बार चल पड़ेंगे। ओ. के. डॉर्लिंग!'
एक बार फिर से किम ने कहा, 'इन्डिया में ऐसा क्या रखा है, अभी अफ्रीका भी कहाँ घूमा है, चलो इन छुट्टियों में अफ्रीका चलते हैं। अगली बार इंडिया चल पड़ेंगे। पता नहीं क्यों! अभी इंडिया जाने को मेरा मन नहीं मान रहा।'

परन्तु कोयी के मन में तो इंडिया बसा हुआ था, उसका ननिहाल जो था। उसने ताजमहल के बारे में बहुत सुन रखा था, इंडिया जाने और ताजमहल देखने का सपना वह बचपन से पाले थी। इंडिया के लोगों के बारे में सुना था वे बड़े सीधे सादे होते हैं, वहां की कलाकृतियां पूरे विश्व में बेजोड़ हैं। संयोग ही था, उसे वहां जाने का अब तक अवसर नहीं मिल पाया। वह पहले भी इंडिया जाने की कई बार सोची, बस किसी न किसी कारण वश, उसका कार्यक्रम टल जाता था। इस बार तो ठान ही लिया कि इंडिया जाना है। उसने दोहराया -
' नहीं किम, अफ्रीका फिर कभी हो आएंगे। इस बार इंडिया चलते हैं। किम! तुम्हें इंडिया के बारे में पता नहीं है। कितना सुन्दर मुल्क है। वहां की वेश भूषा, कल्चर और खाना पीना देखने लायक है। ताजमहल का तो तुम्हें पता ही है, दुनिया के आश्चर्यों में से एक है। जानते हो ताजमहल को वहां के एक बादशाह, शाहजहां ने अपनी बीबी की याद में बनवाया था। देख लोगे तो तुम भी मुझसे और ज्यादा प्यार करोगे न। और इंडियन कुजीन का मजा, इंडिया जाकर लेंगे। पता है वहां सब कुछ कितना सस्ता है; रहना, खाना तो यहाँ से एक तिहाई दाम पर।''

कोयी को अपनी नानी के हाथों बने इंडियन व्यंजन अभी तक याद हैं। इण्डिया के बारे में नानी ने जो कहानियां बताई थीं, कोयी के मन में बस गयी थीं। भारतीय व्यंजन की तो वह दीवानी थी। स्वीडन में भी वह इंडियन कुजीन, अक्सर जाया करती थी। कोयी की माँ को तो भारतीय खाना बनाना विरासत में मिला था, मगर कोयी ने खाना बनाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं ली। उसे अपनी पढ़ाई और खेल कूद में ज्यादा अच्छा लगता था। बस एकाध भारतीय व्यंजन ही बनाना जानती थी। बनाने में और बर्तन धोने में उसे झंझट लगता था। वो लोग तो वही सॉसेज, नगेट्स, सैंडविच, बर्गर आदि बना बनाया, खाकर ही काम चलाते थे। वैसे किम को भी भारतीय खाना पसंद था। बस थोड़ा मिर्च, मसालों से उसे परहेज था। कम मसाले वाली सब्जी बड़े चाव से खाता था। राजमा राइस भी उसका फेवरिट (पसंदीदा) था।

इंडिया हो या यूरोप, जोरू के आगे तो सभी को झुकना पड़ता है।  ना चाहते हुए भी किम को 'हाँ' बोलना पड़ा।   
कार्यक्रम फाइनल हो गया, स्टॉकहोम से मुंबई का टिकट बुक हो गया।

धीरे धीरे यात्रा का दिन आ गया। उनके वायुयान ने उड़ान भरी और कुछ घंटों में वे मुंबई पहुँच गए। मुंबई में होटल का कमरा और वहां की आव भगत से वे बड़े प्रसन्न थे। जगह का भरपूर आनंद उठाने के ध्येय से उन्होंने सोचा कि एकाध बार, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी प्रयोग किया जाय। उन्होंने सोचा कि किसी स्थल का सही माने में अनुभव करना हो तो वहां के सार्वजानिक यातायात का प्रयोग करना उत्तम रहेगा। एक बार उन्होंने मुंबई का नक्शा लिया और लोकल ट्रैन में चढ़ गए। चढ़ तो गए, उन्हें ट्रैन की भीड़ के बारे में अंदाजा था नहीं, लग रहा था कि दम ही घुट जायेगा। भीड़ के बीच दबे किसी तरह चर्चगेट पहुंचे। शाम का समय था, चढ़ने वालों की भीड़ पहले ही जमा थी; उनके उतरने से पहले ही लोग चढ़ने लगे। वे उतरने की कोशिश करते रहे, परन्तु भीड़ ने ढकेल कर उन्हें भीतर कर दिया और ट्रेन चल दी। अब वे क्या करते, किसी तरह अगले स्टेशन पर उतर कर, फिर टैक्सी करके नरीमन पॉइन्ट आये। इसके बाद तो वे लोकल ट्रांसपोर्ट से हाथ जोड़ लिए।  

मुंबई के बाद वे दिल्ली पहुंचे। यहाँ उन्होंने पब्लिक ट्रांसपोर्ट का झंझट नहीं रखा। दिल्ली घूमने के बाद, वे आगरा के लिए टैक्सी बुक कराये। दुनिया का सातवां आश्चर्य देखने के लिए किम और कोयी बहुत रोमांचित थे। ताजमहल देखकर उन दोनों वर्षों का सपना पूरा हुआ। जाने कितने ही साल से, वे यह सपना संजोये हुए थे।इतनी सुन्दर ईमारत और वो भी प्रेम की निशानी। क्या कोई अपनी महबूबा की याद में इतनी सुन्दर ईमारत बनवा सकता है, और उसी में उसकी कब्र! यह सोचकर, दोनों बड़े हैरान थे।
कोयी, किम हाथ पकड़ कर बोली, 'तुम भी मेरे नाम का ऐसा ही महल बनवाओगे न !'
किम भी हाजिरजवाब था। बोला, 'इसी को तुम्हारे नाम कर देता हूँ और इसका नाम रख देता हूँ 'कोयीमहल'। 
'मुझे पता है, तुम इसके अलावा और कर भी क्या सकते हो। चलो बनवा नहीं सकते तो यहाँ से ताजमहल का मॉडल तो ले सकते हो।'    
उन्होंने यादगार स्वरुप, अपने देश ले जाने के लिए ताजमहल का छोटा सा मॉडल खरीद लिया। अब उन्होंने मन ही मन सोच लिया जब उनके बच्चे बड़े होंगे तो, एक बार पुनः उनको साथ लेकर, वे ताजमहल देखने अवश्य आएंगे।  अब उनकी टैक्सी वापस दिल्ली के लिए चल दी। राह में टैक्सी ड्राइवर ने उन्हें सीकरी के बुलंद दरवाजा के बारे में बताया तो उन्होंने उसे भी देखने का मन बना लिया।

टैक्सी ड्राइवर उन्हें बुलंद दरवाजा ले गया। इतना बड़ा गेट देखकर, वे दोनों बड़े अचंभित थे। फ़तेह पुर सीकरी का बुलंद दरवाजा देखकर वापस आने में अँधेरा होने लगा था। किम को पेशाब लगी। आस पास कोई मूत्रालय नहीं दिखा। जहाँ लोग कार पार्क किये हुए थे, थोड़ा हटकर एक व्यक्ति खुले में पेशाब कर रहा था। किम ने भी वही क्रिया अपनाना उचित समझा। वह पेशाब करने लगा और कोयी धीरे धीरे टैक्सी की ओर आगे बढ़ती चली गयी। तभी सामने से एक युवक आया और बोला, मैडम! आपकी गाड़ी उधर खड़ी है। जब कोयी उधर को बढ़ी तो देखा काफी सुनसान सा था। उधर दो और लडके खड़े थे। वे दोनों कोयी के समीप आ गए। 'वैरी ब्यूटीफुल, आज हम लोगों के साथ रुक जाओ।'

कोयी कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वे क्या कह रहे हैं। इतने में एक ने कोयी का हाथ पकड़ लिया और दूसरा चुम्बन लेने के लिए उसके गाल की ओर मुंह बढ़ाया। अब तो कोयी हतप्रभ थी, उसने जोर से दोनों को झटक दिया और चिल्लाने लगी, ''किम! किम! कम सून।'
किम ने आवाज सुन लिया और उधर को दौड़ा।
इतने में तीनों कोयी को पकड़कर खेत में खींचने लगे। वह चिल्लाती रही बचाओ, बचाओ। किम आते ही उन पर टूट पड़ा। किम के आ जाने से कोयी की भी हिम्मत बढ़ गयी। अब दोनों मिलकर, उनसे मुकाबला करने लगे। तभी आवाज सुनकर टैक्सी ड्राइवर भी रॉड लेकर दौड़ा। और लोगों को आते देख वे लड़के भाग गए, मगर इतने में कोयी के वस्त्र कई जगह से फट गए थे, और दोनों को कुछ चोट भी लग चुकी थी। अब वे रिपोर्ट लिखवाने थाने पहुंचे। थाना में वही ढुलमुल वाली निति। पहले तो उन्हें यह कहा गया कि कोई खास नुकसान नहीं है, बेकार में रिपोर्ट लिखवाकर क्या फायदा। पर जब किम ने एफ. आई. आर. लिखने पर जोर डाला तो पुलिस वाले कहने लगे आप लोगों ने १०० नंबर पर फोन क्यों नहीं किया?
ड्राइवर ने समझाया, 'बदमाश तो भाग गए, थाना पास था, सोचे सीधे थाने में  रिपोर्ट लिखवा देते हैं। कहिये तो अबसे १०० नंबर पर फोन कर देते हैं।
'ठीक है, वे कैसे कपड़े पहने थे ?'
'एक नीली टी शर्ट और सलेटी पेंट और एक पिली शर्ट और नीली जींस पैंट पहने था, तीसरे का ध्यान नहीं।'
'क्या आप उन्हें पहचान सकते हैं ?'
'वे खौफनाक चेहरे तो कभी भूल ही नहीं सकते। सामने होंगे तो अवश्य।'
'लेकिन आप लोग तो अपने देश चले जाओगे, उन्हें पहचानने कोर्ट में आना पड़ेगा।'
'पहले उन्हें पकड़ो तो! तब की तब देखी जाएगी।'
खैर रिपोर्ट लिखी गयी, मामला विदेशियों का था। पुलिस को भी पता था, इसमें अधिक टाल मटोल नहीं कर सकते, यह मीडिया न्यूज़ भी बन सकती है।  किम और कोयी वापस दिल्ली आ गए। अगले दिन, समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ पर उनका नाम था। यहाँ तक कि उनके देश तक के अख़बारों में यह समाचार छप गया,
'कोयी के साथ बलात्कार की नाकाम कोशिश।'
 एक बुरा सपना लेकर, किम और कोई स्वदेश लौटे। कुछ समय बीते आगरा कोर्ट से ईमेल द्वारा सम्मन आया, अपराधियों की  पहहचान के लिए निर्दिष्ट तिथि को वे आगरा जिला सत्र न्यायलय में उपस्थित हों।
सम्मन पढ़कर, कोयी का दुःस्वप्न फिर से ताजा हो गया। अब तो वह इंडिया आने के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती थी। अपने बच्चों को भी बार बार यही कहती, 'तुम लोग कभी इंडिया घूमने नहीं जाना। वहाँ हैवान रहते हैं।'

Tuesday, 3 October 2017

Producer


वृक्षेश का फोन आया तो अर्निका को बड़ा आश्चर्य हुआ
दोनों ने फिल्म इंस्टिट्यूट से साथ ही डिग्री किया था लेकिन बस दुआ सलाम ही थी। उतनी घनिष्ठता नहीं थी।
'और कैसे है वृक्षेष ? कहीं कोई फिल्म मिली ?'
प्रोफाइल का खर्च
कल क्या कर रहा है? इंडिया पैलेस आ जा।  साथ काफी पिएंगे।
वृक्षेष को तो जैसे मन की मुराद मिल गयी
अगले दिन काफी हाउस में कॉलेज की पुराणी बातें
बता तेरे जैसे इतने अच्छे मेरिटोरियस कलाकारों को भी काम नहीं मिल रहा है तो हमें कौन देगा
वैसे एक प्रोडूसर ने एक साइड रोल के लिए मुझे बुलाया है। अगर मेरी बात बनती है तो तेरे लिए भी बात करुँगी। याद है तुझे एक बार मैंने तुझे कॉलेज से बाहर निकलवा दिया था।
तुझे मैं सचमुच की ही भिखारी समझ बैठी थी।

2
सिन समझने के लिए कमरे में बुलाया है
उसने इनकी व्यभिचार की इतनी कहानियां सुन रखीं थीं कि उसे कदम कदम पर डर लगता था।
आज कल तो रेप सीन के बिना कोई फिल्म ही नहीं पूरी होती। 
 जैसे तैसे फिल्म बानी

३. पहले ही मना किया था।  इस लाइन में फिल्म वालों के बच्चे ही रहेंगे। इसे हेरोइन बनाना था।
इतना तो पढ़ाई का खर्च।  पढ़ लिख लो तो ऊपर से शोषण।

४.
बीमारी का बहाना


५ मेरा बेटा है।  मेरिट  एकाध लाख दे भी दूंगा



Monday, 2 October 2017

Yah din bhi ana tha

यह दिन भी आना था ,

प्रतीक और लीला अपनी बेटी, शेषा के साथ बड़े हंसी ख़ुशी कैनबेरा में जीवन बिता रहे थे। लीला के पापा-मम्मी के कैनबेरा आ जाने पर, उनकी ख़ुशी चार गुना बढ़ गयी। उनके आने से, अब शेषा को अकेलापन नहीं लग रहा था। स्कूल से आने के बाद वह नाना, नानी की अंगुली पकड़ आस पास घूम आती, कभी कहानी सुनाने का आग्रह करती। वह इतनी बातूनी थी कि उसके साथ रामचंद्रन और उनकी पत्नी का भी खूब जी लग रहा था। स्कूल से आते ही, एक एक बात नाना-नानी को बताती , फिर वे हेमंत व लता को ड्यूटी से आने पर हंस हंस कर बताते।

एक बार शेषा को एग्जिमा की शिकायत हुई। लीला ने घरेलू उपचार से ही काम चलना चाहा। एग्जिमा बढ़ता जा रहा था, पर वे डॉक्टर के यहाँ जाने का समय नहीं निकाल पा रहे थे। धीरे धीरे जब काफी बढ़ गया तो वे समीप के चिकित्सा केंद्र ले गए, वहां डॉक्टर ने एग्जिमा को गंभीर बता दिया और विशेषज्ञ को दिखाने के लिए बड़े अस्पताल को रेफर कर दिया। फिर समयाभाव के कारण वे कई दिन तक उसे अस्पताल नहीं ले जा पाये।
रामचंद्रन होमियोपैथी के डॉक्टर थे। उन्होंने सोचा कि वे ही इसका उपचार कर दें । उनके विचार के अनुसार होमियोपैथी में एग्जिमा का अच्छा उपचार उपलब्ध था। वे शेषा को विशेषज्ञ के पास ले जाने की जगह घर पर होमियोपैथी उपचार करने लगे।
रामचंद्रन उपचार करते रहे दो तीन महीने बीत गए और कोई लाभ नहीं मिला। अपितु एग्जिमा का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था। वहां पर सही होमियोपैथी दवाइयां भी नहीं मिल पा रही थीं।  कुछ दवाई उन्होंने अपने के मित्र के द्वारा माँगा लिया था, पर वह समाप्त हो चुकी थी। अब प्रतीक व लीला उसे अस्पताल ले जाने में भी झिझक रहे थे कि इतना समय हो गया अब तो अस्पताल से भी सुननी पड़ेगी।
इधर चिकित्सा केंद्र ने शेषा की फाइल ऑनलाइन बड़े अस्पताल को भेज दी थी। इतने समय तक नहीं दिखाने पर, अस्पताल से पत्र आ गया, जिसमें प्रतीक से अनुरोध किया गया था कि वह शेषा को शीघ्रातिशीघ्र वहां दिखाए।  यदि उसकी उचित चिकित्सा चल रही है तो उसकी सूचना भेजे। प्रतीक शेषा को न तो वहाँ ले ही गया न ही उस पत्र का उत्तर भेजा।
इसी बीच पूरे परिवार को  समारोह में भाग लेने इंडिया जाना था। तभी रामचंद्रन ने सलाह दिया कि इंडिया जा ही रहे हैं, वहां होमियोपैथी के और बड़े डॉक्टर हैं और दवाइयां सरलता से मिल जाएँगी। और तो और हैदराबाद में उनके गुरु डॉ. बनर्जी भी हैं, कोई चिंता की बात नहीं है वहां, ठीक हो जायेगा।
सभी लोग इंडिया चले आये, डॉ. बनर्जी से समय लेकर दिखाया गया उनकी दवा से कुछ लाभ होना आरम्भ तो हुआ पर इतने में वापस कैनबेरा जाने का समय हो चला। प्रतीक लम्बी अवधि की दवा लेकर वापसी की तैयारी करने लगा। इसी बीच शेषा को इंडिया में कोई और इन्फेक्शन हो गया। उसकी तवियत निरंतर ख़राब रहने लगी। डॉक्टर को दिखाया तो उसने कहा, एक्जिमा के अतिरिक्त कोई और इन्फेक्शन है, इसकी गहन जांच करनी पड़ेगी और कई टेस्ट कराने होंगे, तभी बीमारी का सही कारण पता चल पायेगा। अब कैनबेरा जाने में दो तीन दिन का ही समय रह गया था। प्रतीक के लिए सारे जाँच कराना संभव नहीं था। उसने सोचा कि अब कैनबेरा ही जाकर पूरा इलाज कराएगा।

जब वह वापस कैनबेरा आया तो देखा कि इस बीच अस्पताल के दो और पत्र आये हुए हैं। ऐसा लग रहा था कि माँ बाप से अधिक चिंता अस्पताल को ही है। अब तो हालात ऐसे हो चुके थे, अबिलम्ब अस्पताल जाना पड़ा।प्रतीक अस्पताल पहुंचा, तब तक शेषा की हालत काफी बिगड़ चुकी थी।  अस्पताल ने बहुत कोशिश किया, पर शेषा को बचाया नहीं जा सका।
प्रतीक और लीला अपनी बेटी के शोक में डूबे थे तभी उनके घर पुलिस आ गयी। शेषा की चिकित्सा में लापरवाही के कारण, प्रतीक को गिरफ्तार कर लिया गया। घर का डॉक्टर उन्हें बहुत मंहगा पड़ा।