Sunday, 5 April 2015

Chacha Ashik Ali ki holi


आशिक अली, इतने मजाकिया किस्म के इंसान थे कि उनकी चुटकुलेदार बातें सुनकर, हंसने के लिए बच्चे उनके आगे पीछे घूमते रहते।  नूरा अपने माँ बाप की इकलौती बेटी थी। जुम्मन मियां के अंतकाल के बाद, आशिक अली, ससुराल में ही आन बसे।  ससुराल में रहने के नाते वे सबसे हंसी मजाक कर लिया करते, और गांव वाले भी उनसे चिकारी करते रहते। उनकी किसी बात का कोई भी बुरा नहीं मानता। वे रहते तो ससुराल में थे, पर गांव के बच्चे उन्हें चाचा ही कहते। बालों के साथ वे खुद भी पके हुए इंसान बन गए थे, मगर उनके साथ गुजारा समय कत्तई पकाऊ नहीं होता। कई बार तो उनके मजाकिया कटाक्ष ऐसे होते कि आगे वाला सोचता ही रह जाता।
एक बार एक युवक ने कह दिया, 'चाचा जब मर जाओगे तो पूरा गांव बहुत उदास हो जायेगा। '
तो उन्होंने तपाक से उत्तर दिया, 'लड़की ढूंढे रखना, अगले जन्म में भी इसी गांव में ससुराल बनाऊंगा, वैसे जन्नत से भी तुम लोगों को देखता रहूँगा। '

 उनकी कई बातों का लोग तोड़, नहीं ढूंढ पाते। जहाँ कहीं भी गांव में वे दिखते, लड़के कुछ ना कुछ कहकर, छेड़ देते, और बदले में उन्हें ढेर सी सुननी पड़ती, उनको क्या! हा.. हा.. हा करते भाग जाते। उनसे मिलकर लड़कों के आनंद का कोई ठिकाना नहीं रहता। दिन में अगर एक बार, आशिक चाचा नहीं मिले तो लगता था कि वह दिन ही बेकार गया। हंसी मजाक में भी उनके सम्मान व मर्यादा का पूरा ख्याल रखा जाता।  क्या मजाल कि उनसे कोई अभद्र व्यवहार कर दे।
पूरे गांव में उनका इकलौता गैर हिन्दू परिवार था।  जितने उत्साह से वे ईद मनाते, होली, दीवाली पर उनका उत्साह उससे कम नहीं होता। उनके त्यौहार में तो गिने चुने लोग ही सम्मिलित होते परन्तु वे हिन्दुओं के हर पर्व में खुलकर सरीक होते। होली में तो उनका रंग देखते ही बनता।
'इतने कम पटाखे और मिठाई, भाई क्या दिवाली मनाई।'
वे जुमला कस देते, बच्चे सुन कर हंस देते, 'तो चाचा, आप की तरफ से ही कुछ हो जाय। '
'वाह, भई! वाह, उलटी गंगा हिमालय की ओर।'
इसी प्रकार उनका होली का जुमला था, 'खाली चेहरा रंगा तो क्या होली मनी, मुझे देखो मन भी रंगा है. भंग का गोला-ओला खाया कि नहीं!'
'ही ही, चाचा, सदानन्द अंकल के छन रही है, जाऊं एक गोला ला दूँ?'
'नहीं, वहीँ चला जाऊंगा। '
जैसा उनका नाम था, आशिकी की बातें भी कर लेते, युवा लड़कों को सुनकर मजा आ जाता।
बाबू कैश नहीं तो ऐश नहीं।
बिना कॉलेज के नॉलेज कहाँ।
नो लाइफ विदाउट वाइफ। 
इश्क न किया तो क्या खाक जिया। 
उनके ये कुछ जुमले, गांव के लडके बार बार सुनना चाहते। उनको याद भी दिलाते रहते चाचा जरा वो वाला...
 
 अभी दस भी नहीं बजे थे, किसी ने दरवाजा खटखटाया ..
'कौन है ! आज तो होली का दिन है,'  कहते हुए, शब्बो चाची ने दरवाजा खोला। देखा तो गली में आठ दस युवक रंग में सराबोर खड़े हैं।
'अरे बेटा रमेश! कैसे हो ? आओ गुलगुले बनाई हूँ, खा लो।' चाची, बनाने में अधिक झंझट के कारण, होली पर गुजिया तो नहीं बना पाती, पर गुलगुले और दही-बड़े जरूर बनाती।
'नहीं चाची, बहुत खा लिया है, घर पर भी बना है। होली खेलने जाना है, चाचा कहाँ हैं।'
'अरे बेटा घर में हैं, उनकी तवियत थोड़ी ठीक नहीं है।'
'चाची! उन्हें बाहर भेजो, आज होली है।'
'बेटा, तुम्हे पता ही है वे होली के कितने शौक़ीन हैं।  ठीक होते तो खुद ही जाते।'
युवक जिद्द करने लगे। आवाज सुनकर मियां बाहर आ गए। वे सारी कहानी पहले ही समझ चुके थे।
साथ लेकर आये मुट्ठी भर गुलाल युवकों के ऊपर उड़ा दिया, फिर क्या था पूरी गली हो-हल्ले से गूँज गयी। एक उल्लास सा भर गया। लडके जिद्द करने लगे, चलो चाचा! टोली में हमारे साथ रंग खेलने। चाचा बोले, 'नहीं, तुम लोग जाओ, मैं थक जाऊंगा। मगर लड़कों ने एक न सुनी, ' चाचा! कौन सी रोज होली आती है। '
आवाज सुनकर, आसपास के और लडके निकल आये।  'चलो भाई, चाचा की होली की सवारी निकलेगी।  चाचा ने और अधिक आनाकानी नहीं की, और टोली के साथ चल दिए। गली में थोड़ा ही आगे निकले थे, नौबत का गदहा बंधा दिख गया। एक हुड़दंगी लड़का दौड़ा गया, और उसे खोल ले आया।
'चाचा! इस पर बैठ जाओ।'
चाचा भी पूरी तरह होली के जोश में आ चुके थे, और बड़े आराम से उस गधे पर बैठ गए। फिर तो लोग जुटते गए और चाचा का जुलुस बड़ा होता गया। ढोल, झाल भी टोली में शामिल हो गयी।
'केकरा हाथे कनक पिचकारी, केकरा हाथे अबीरा, होली खेलें रघुबीरा अवध में, होली खेलें रघुबीरा'
गीत गूंजने लगा।
जुलुस में संग बह रहे आनंद में खुद को भी बहा देने से, कोई नहीं रोक पा रहा था। चाचा का जुलुस देखकर, लग रहा था, जैसे किसी बहुत बड़े विजयी नेता का जुलुस जा रहा हो। किसी किसी के घर से कुछ खाने पीने का भी सामान आ जाता, चाचा गदहे पर बैठे ही खा पी लेते। गांव की गलियों से घूमता, जलूस पंचायत भवन के प्रांगण में एकत्रित हुआ। फिर तो पूरा प्रांगण एक रंगमंच बन गया। नाच गाने का सिलसिला चला, गुलाल उड़ा, गुजिया नमकीन चली, भंग छनी और आखिर में चाचा ने अपने शेरों से सबको चित्त कर दिया।
फगुआ के गान में लोग झूम उठे, और खामोशियों में चाचा के शेर दहाड़ते रहे। वहां उपस्थित हरेक जन चाहने लगा कि यह दिन समाप्त ही ना हो।
फगुआ के गीत जो नहीं सुना, वह संगीत का मजा क्या जान पाया। फिल्मो में तो एकाध ही होली के गीत होते हैं, होली के रोचक व संजीदगी भरे गीत तो लोक गीतों में ही सुनने को मिलते हैं।
कुछ लोगों को लग रहा था कि गदहे पर बिठा के चाचा के साथ ज्यादती हो रही है, पर चाचा इसका भरपूर आनंद ले रहे थे। और तो और पैदल नहीं चलना पड़ रहा था। उन्होंने यहाँ तक भी कह दिया -
'ससुराल वालों! तुमने फिर से मुझे घोड़ी पर बिठा दिया। घोड़ी पर ही घुमाओगे या दुल्हनिया भी दिलाओगे?'

तीसरे पहर तक जलसा चला,  गाने बजाने का दौर ख़त्म हुआ. खाने पीने का वहीँ अच्छा प्रबंध था। कुछ लोगों ने पैसे एकत्र कर, चाचा को कुर्ता पाजामा और चाची के लिए साड़ी तथा बचे हुए पैसे नकद देकर बिदाई की। चाचा को बड़े मान सम्मान के साथ उनके घर तक छोड़ा। चाचा अपने आदर और अपनेपन से गदगद हो गए। दिन की सारी थकान मिट गयी। उन्हें एक अनोखे मुहब्बत का एहसास हुआ। किसी को गधे पर बैठना अजीब लगे तो लगता रहे, चाचा को तो बड़ा आनंद आया और वे अपने इस क्रिया के कारण सैकड़ों लोगों को आनंदित देख, जीवन की एक बहुत बड़ी संतुष्टि को प्राप्त कर रहे थे।

उस जुलुस की कई दिनों तक चर्चा होती रही। जुलुस में सम्मिलित होने वाले को चलते फिरते जो भी मिल जाता, 'इस बार होली में, चाचा के जुलुस में थे कि नहीं!' सामने वाला गर्व भरी भरी मुस्कान फेंकता और बोल पड़ता, भई! बड़ा मजा आया। अब तो हर बार ही ऐसी होली होनी चाहिए।' जो नहीं शामिल हो पाया, अपनी किस्मत को कोसता, और जलसे की बातें सुनकर ही संतोष करता रहा।

अब तो यह सिलसिला ही चल पड़ा, हर होली को सुबह ही चाचा के दरवाजे पर गदहा खड़ा हो जाता, वे उस पर बैठ जाते और कारवां चल देता,  पीछे-पीछे छोटे, बड़े, बच्चे, बूढ़े व युवकों की टोली और बीच में ढोल मजीरा बजाती मंडली। ऐसा लगता कि वे दूल्हा बनकर घोड़ी पर बैठे हों, और पीछे पीछे उनकी बारात चल रही हो। शाम को उन्हें होली का तोहफा दिया जाता।
चाचा की होली की टोली में, जो एक बार शामिल हो जाता, वह सदैव के लिए उसका अभिन्न अंग बन जाता। उसे उस जुलुस के बिना होली नहीं भाती। कई बार, गांव वालों की कई रिश्तेदारियों से भी लोग, होली का पर्व मनाने वहां आ जाते।
अब तो वर्षों बीत चुके थे। गदहे पर सवार, दूल्हा बने चाचा की बारात, होली पर हर साल निकलती, और वे अपनी शादी की बारात को याद करके उसका भरपूर लुत्फ़ लेते। ढोल, झाल, नगाड़ा भी बजता बस मंगल गीत के स्थान पर होली गीत व फगुआ गाये जाते। 

आज होली का दिन है,
सुबह ही चाचा अपने काम से फारिक होकर, नमाज वगैरह पढ़कर, तैयार बैठ गए है। चाची भी गुलगुले बना चुकी है।
'ये लो गुलगुले खा लो, अभी गरम हैं।'
'अभी नहीं, मेरा शाम के लिए रख दो।  घर पर ही सब खा लूंगा, तो टोली में क्या खाऊंगा!'
चाचा अब होली की टोली का इन्तजार करते दोपहर होने को आ गयी, मगर उन्हें होली के लिए बुलाने अभी तक  कोई नहीं आया। धीरे धीरे चाचा का मन व्याकुल होने लगा, और भांति भांति की आशंकाओं से भर गया। लगता है, पिछली होली में कोई गलती हो गयी। वे याद करने लगे, परन्तु ऐसा कुछ नहीं दिख रहा था। उनका दिल उदास और हताश होता जा रहा था।
तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, चाचा ने लपक कर खोला।
पडोसी की लड़की बोली, 'चाची कहाँ हैं? माँ ने सेवई बनाने वाली मशीन माँगा है।'
चाचा मुंह बनाकर अपने स्थान पर लौट आये। 'चाची अंदर हैं, चली जाओ।'
जरा सी भी आहट होती, चाचा दरवाजे की ओर झांक लेते। कई बार तो दरवाजा खोलकर बाहर देखा भी, मगर ना गदहा ना ही कोई आदमी। बारह से ऊपर हो गए, मगर कोई नहीं आया। चाचा मायूस हो चुके थे। अब उनकी चिंता विस्वास में बदलने लगी थी, अवश्य ही कोई न कोई गलती हुई है, जिसके कारण, गांव के लोग मुझसे नाराज हो गए हैं। हंसी मजाक तो सबसे करते ही रहते थे, कहीं किसी को कोई अभद्र बात तो नहीं कह दिया! आखिर इस बार, कोई क्यों नहीं आया। भांति भांति की भ्रान्ति मन में आने लगी। यदि उन्हें पता चले क्या त्रुटि हुई  है तो क्षमा मांगने में तनिक भी देर नहीं लगाएंगे।
दोपहर होने तक, वे इस कदर उदास हो गये कि चाची के मायके जाने पर भी, कभी इतना उदास नहीं हुए होंगे।  अभी तक कुछ खाया पिया भी नहीं था। चूकि जगह- जगह गुजिया, पुआ, पकौड़े खाना पड़ता, वे बिना खाए ही घर से निकलते। इंतजार करते पहर लटक गयी, तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। अब तो, चाचा का द्वार की ओर देखने को भी मन भी नहीं हो रहा था।
'चाची बोली देखो जी! कोई है। '
'कोई नहीं है, हवा होगी।'
खटखटाने की फिर आवाज आई, चाची उठकर दरवाजा खोली -
अरे बेटा! आज कहाँ रह गये तुम लोग? देखो, तुम्हारे चाचा कैसे मुंह लटका के बैठे हैं, लग रहा है मातम छा गया है। अब तक होली नहीं खेली, लग रहा है इनका सब कुछ लुट गया है।'
'चाची, क्या करें! चाचा के लिए सवारी का बंदोबस्त नहीं हो पाया। गांव तो गांव, दूसरे गांव तक भी हम गये पर कोई गदहा नहीं मिला। मुंह माँगा किराया देने को तैयार थे। नौबत के मरने के बाद. उनके लड़के ने अपना काम बदल लिया, और 'भोलू' को बेच दिया। अब तो हम सब मिल कर, चाचा को अपने कंधे पर घुमाएंगे।'
अब था कि भोलू के बिना, चाचा जाने को तैयार नहीं थे। अब तक उनका मन वैसे ही टूट चुका था। बड़ी मिन्नत करने पर चाचा चले तो, मगर पैदल ही। लग ही नहीं रहा था कि यह चाचा की होली की टोली है। टोली में न तो वो रौनक थी, न ही झाल-मजीरे में वो तान। चाचा का जुलुस आगे बढ़ तो रहा था, मगर किसी को मजा नहीं आ रहा था। उनके जुलुस की जान तो 'भोलू' ही था, उसके साथ चाचा की जोड़ी जमती थी। आज वे अधूरे लग रहे थे। एक तो वैसे ही वक्त ज्यादा हो चुका था, ऊपर से लोग भी मुरझाये से लग रहे थे। यह किसी उत्सव का जुलुस नहीं लग रहा था, बल्कि लग रहा था जैसे कोई मय्यत जा रही हो।
जुलुस थोड़ा और आगे बढ़ा ही था कि एक हुड़दंगी लड़के को करन का तांगा दिख गया। तांगा दो साल से एक ही जगह पड़ा, मरम्मत का इंतजार कर रहा था। करन के पास उसके मरम्मत का इंतजाम नहीं हो पा रहा था। फिर क्या था, दो तीन लडके लपके और उसे ही खिंच लाये, अब चाचा का उस पर बिठा दिया गया। होली की टोली का काम कुछ आसान हो गया और चाचा भी थकान से बच गए। चाचा की रथ यात्रा चल पड़ी।  इस बार समय कम रह जाने के कारण, उतनी अधिक रौनक तो नहीं रह गयी थी, मगर चाचा के लिए आने वाली होलियों के लिए रथ का इंतजाम हो गया था।

चाचा आशिक अली, अब तो नहीं रहे; मगर उनके साथ जिये लोगों को, होली चाहे भूल जायं, चाचा को भूल पाना असंभव है।

(C) एस० डी० तिवारी    

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