परचा दाखिल
नेता लोगों की मौज बहार देख, श्यामल का भी पढ़ाई लिखाई से अधिक नेतागिरी में चाव था। वह कॉलेज से ही छात्र नेता के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने लगा था। पढ़ाई पूरी होने के पश्चात नौकरी ढूंढने का कोई खास प्रयास नहीं किया और न ही अपनी खेती बारी में मन लगाया। हाँ, अपना समय समाज सेवा और जन-संपर्क में अधिक व्यतीत करता था। मित्रों के प्रोत्साहन स्वरुप चुनाव लड़ने की प्रबल इच्छा उतपन्न होती, परन्तु, एक साधारण परिवार से होने के कारण धन के अभाव का सामना करना पड़ता और इस कारण चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा पाता।
धीरे धीरे समय बीतता गया, लोग उसके साथ जुड़ते गए और जन संपर्क बढ़ता गया, मगर धनाभाव के चलते चुनाव लड़ पाना उसके लिए अभी भी संभव नहीं था। श्यामल अपने क्षेत्र की बिजली, पानी आदि से सम्बंधित समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाता रहता तथा लोगों की सरकारी कार्यालयों में फंसे कार्यों में उनकी मदद करता रहता। कई लोग कार्य हो जाने से प्रसन्न होकर, उसे चंदा भी दे देते और साथ ही चुनाव में खड़ा होने के लिए प्रेरित करते । चंदे की राशि को श्यामल संचित कर रख लेता ताकि जब भी उचित समय आएगा चुनाव के लिए परचा दाखिल कर देगा।
दो चार मित्र उसे हमेशा घेरे रहते और चुनाव में खड़ा होने को उकसाते रहते।
एक दिन उल्लास में भरा रामधन अख़बार लहराता दौड़ा हुआ आया। 'अरे श्यामल! देख, पंचायत चुनावों की घोषणा हो गयी। बस डेढ़ महीने में चुनाव होने हैं, इस बार तो तुझे खड़ा होना ही है। प्रचार की चिंता मत कर, हम दोस्त सब किस काम आएंगे ! '
'और पैसा कहाँ से आएगा ?'
' हम लोग चंदा एकत्र करेंगे । तेरे काम की चर्चा दूर दूर तक हो रही है, तू अवश्य ही जीतेगा। '
'परन्तु किसी पार्टी का टिकट मिल जाता तो अच्छा होता, कुछ खर्च बर्च का पैसा मिल जाता और प्रचार भी हो जाता। एक पार्टी से बात किया था, पर पता चला कि सुरेश कुमार ने पैसे देकर उस पार्टी का टिकट ले लिया है। अपने पास कहाँ पैसे कि पार्टी को दें। हाँ पार्टी कोई पैसे खर्च करे तो चुनाव लड़ लेंगे। '
'तू चिंता मत कर, सब हो जायेगा। तू स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में खड़ा हो जा। हम जी जान लगा देंगे। तुझे जीतना ही है।'
'चल ठीक है। '
सभी मित्र जुट गए। निर्वाचन आयोग के कार्यालय से फॉर्म आया। पहले चुनाव लड़ चुके उम्मीदवारों से सलाह ली गयी और बड़ी सावधानी से फॉर्म भरा गया। आज फॉर्म भरने का अंतिम दिन है। भरपूर जज्बे के साथ श्यामल की मित्र मंडली परचा दाखिल करने चल पड़ी। निर्वाचन कार्यालय पहुंचते ही 'श्यामल जिंदाबाद' के नारे से वातावरण गूँज उठा। निर्वाचन अधिकारी के समक्ष परचा दाखिल हो गया।
अब चुनावी गणित शुरू हो गयी। मित्र चंदा जुटाने में लग गए। सम्बन्धी, सलाहकार आने लगे।
किस किस क्षेत्र में अपने पक्ष के कितने लोग हैं, अपनी जाति के कितने वोट हैं, और जातियों का समर्थन मिल सकता है, विरोध में रहने वाले कौन से लोग होंगे, कहाँ के वोट पक्ष में नहीं आने वाले हैं, रिश्तेदारियां कहाँ कहां हैं, रिश्तेदारों की रिश्तेदारियां कहाँ कहाँ हैं, उन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव है या नहीं, नहीं तो उन्हें कैसे जोड़ा जाय। तरह तरह का जोड़ तोड़ प्रारम्भ हो गया।
परचा भरने की अंतिम तिथि बीत जाती है तभी निर्वाचन अधिकारी का फोन आता है कि श्यामल के पर्चे में कुछ कमियां हैं अतः नामांकन निरस्त हो सकता है। शयामल यह सुन कर भौचक्का रह जाता है। वह अपना दल बल लेकर निर्वाचन कार्यालय पहुँच जाता है। जाने पर ज्ञात होता है कि फॉर्म में जन्म तिथि गलत लिखी गयी है। श्यामल फॉर्म देखता है तो पता चलता है की जन्मतिथि के ऊपर किसी ने पुनः कुछ लिखा है, स्याही भी पहले वाली स्याही से मेल नहीं खा रही थी। फॉर्म के साथ संलग्न प्रमाण पत्र से सही जन्म तिथि की पुष्टि हो रही थी। समझाने बुझाने पर परचे को स्वीकार कर लिया जाता है।
अब प्रचार का सिलसिला बड़े जोर शोर से शुरू हो गया। श्यामल के युवा नेता होने के कारण युवाओं में बहुत उत्साह था। उसके शील और मिलनसार स्वाभाव के कारण सभी पसंद करते थे। प्रचार अभियान में लोगों से बड़ा समर्थन मिल रहा था। वह घर घर जाता, सभी बड़े बुजुर्ग से आशीर्वाद लेता। श्यामल जहाँ भी जाता वोट मिलने का भरोसा मिल जाता। अब तो लोग श्यामल को अन्य उम्मीदवारों से बहुत आगे आंक रहे थे। बस मनवीर से थोड़ी टक्कर की उम्मीद थी। क्योंकि वह पहले भी प्रधान का चुनाव लड़ चुका था। प्रदेश के मंत्री यादव जी का बेटा तो कहीं और पीछे ठहर रहा था।
परचा भरने की अंतिम तिथि बीत जाती है तभी निर्वाचन अधिकारी का फोन आता है कि श्यामल के पर्चे में कुछ कमियां हैं अतः नामांकन निरस्त हो सकता है। शयामल यह सुन कर भौचक्का रह जाता है। वह अपना दल बल लेकर निर्वाचन कार्यालय पहुँच जाता है। जाने पर ज्ञात होता है कि फॉर्म में जन्म तिथि गलत लिखी गयी है। श्यामल फॉर्म देखता है तो पता चलता है की जन्मतिथि के ऊपर किसी ने पुनः कुछ लिखा है, स्याही भी पहले वाली स्याही से मेल नहीं खा रही थी। फॉर्म के साथ संलग्न प्रमाण पत्र से सही जन्म तिथि की पुष्टि हो रही थी। समझाने बुझाने पर परचे को स्वीकार कर लिया जाता है।
अब प्रचार का सिलसिला बड़े जोर शोर से शुरू हो गया। श्यामल के युवा नेता होने के कारण युवाओं में बहुत उत्साह था। उसके शील और मिलनसार स्वाभाव के कारण सभी पसंद करते थे। प्रचार अभियान में लोगों से बड़ा समर्थन मिल रहा था। वह घर घर जाता, सभी बड़े बुजुर्ग से आशीर्वाद लेता। श्यामल जहाँ भी जाता वोट मिलने का भरोसा मिल जाता। अब तो लोग श्यामल को अन्य उम्मीदवारों से बहुत आगे आंक रहे थे। बस मनवीर से थोड़ी टक्कर की उम्मीद थी। क्योंकि वह पहले भी प्रधान का चुनाव लड़ चुका था। प्रदेश के मंत्री यादव जी का बेटा तो कहीं और पीछे ठहर रहा था।
धीरे धीरे चुनाव का दिन आ ही गया, मतदान प्रारम्भ हुआ। रुझान श्यामल के पक्ष में स्पष्ट रूप से दिख रहा था।
मतों की गणना शुरू हुई। परिणाम आशाओं के अनुरूप ही था। श्यामल काफी आगे चल रहा था। अब तक लगभग तीन चौथाई वोटों की गड़ना हो चुकी थी । अब तो उसकी विजय निश्चित ही थी । श्यामल के खेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी, उत्सव मनाने की तयारी भी शुरू हो गयी। इधर मंत्री जी का बेटा जो दूसरे क्रम पर था चिंतित होने लगा था। क्षेत्र का थानाध्यक्ष जो उसी की जाति का था उसका परम मित्र भी था। वह यादव जी के बेटे के पास जाकर चिंता जताने लगा। उसको पुलिस की नौकरी मंत्री जी ही दिलाये थे। तभी मंत्री जी का ताजा हाल जानने के लिए फोन आ जाता है । बेटे ने उन्हें हालात से अवगत कराया। मंत्री जी ने थानाध्यक्ष को फ़ोन देने को कहा। फोन थामते ही थानाध्यक्ष कांपने लगा।
'तुमने कुछ नहीं किया। तुम इस थाने पर रहने लायक नहीं हो।'
'नहीं सर, हमने जो भी हो सका, किया। सारे स्टाफ को इनको जीतने के लिए लगा रखा था। मैं तो आपका बड़ा एहसान मंद हूँ, सर!, आप के कृपा से ही मैं पुलिस में भर्ती हुआ था। इतनी कोशिश की मगर इस बार तो उसकी हवा ही बनी हुई थी ' 'मुझे कुछ नहीं पता' यह कहते हुए मंत्री जी ने फोन रख दिया। थानाध्यक्ष का मुंह बन गया।
थोड़ी ही देर के बाद चुनाव के परिणाम की घोषणा भी हो गयी। श्यामल नौ सौ मतों से विजयी हो गया। मंत्री का बेटा झुंझला गया। वह निर्वाचन अधिकारी से पुनर्गणना का आग्रह करने लगा । निर्वाचन अधिकारी ने असहमति जताई क्योंकि विजय का अंतर पर्याप्त मतों से था। थोड़ा बहुत अंतर होता तो करवा भी देते। उपस्थित लोगों ने भी पुनर्गणना का विरोध किया। मगर तभी सारा दृश्य एकदम बदल जाता है । उपस्थित भीड़ पर लाठी चार्ज हो जाती है । भगदड़ मच जाती है और लाठी चार्ज के बीच ही पुनः मतगणना शुरू हो जाती है । बहुत ही अल्पकाल में दुबारा मतगणना हो जाती है और मंत्री जी का बेटा दो सौ मतों से विजयी होता है ।
मंत्री जी के घर पटाखे, फूलझड़ी छूटने लगे । अगले दिन के समाचार पत्र में मुख पृष्ठ पर छपा है 'पंचायत चुनावों में धांधली '
पूरे जनपद में इस बात पर चर्चा है। बताओ सत्ता का कितना दुरुप्रयोग । समाचार पत्र पढ़कर रद्दी में फेंक दिया जाता है। एक दो दिन काना फूसी के बाद सब कुछ सामान्य।बेचारा श्यामल .....
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