Monday, 3 April 2017

Laghu katha 2


निमंत्रण

ब्रह्मभोज देर रात तक चलता रहा। सैकड़ों लोग निमंत्रित थे और लगभग सभी आये, नहीं आये तो बस देवचंद और गंगा, जो मात्र दो घर छोड़कर रहते थे। भीड़-भाड़ में  किसी ने ध्यान भी नहीं दिया कि वे नहीं आये। सुबह जब मिठाई और बची हुई पूड़ी लेकर विवेक पहुंचा तो गंगा खाना बना रही थी।
'क्या हुआ चाची? इतनी जल्दी खाना!'
'हाँ, तुम्हारे चाचा रात भी ऐसे ही सो गए थे।'
'पर क्यों ? बाबा की तेरहवीं में खाने नहीं गए थे क्या ?'
'नहीं, काफी देर तक न्यौता का प्रतीक्षा करते रहे। कोई निमंत्रण नहीं आया तो मैं खिचड़ी बनाने चली। वे बनाने से मना कर दिए, दिन का थोड़ा चावल पड़ा था, वही दूध से खाकर सो गए।'
'अरे ऐसा कैसे हो गया! मैं अभी जाकर पापा से बोलता हूँ। ये तो रख लीजिये।'
'पर खाना तो लगभग बन ही गया है, रखकर क्या करूंगी ?'
'मुझे नहीं पता। ये रख देता हूँ, और पापा को भेजता हूँ।'
विवेक जाते ही योगेंद्र को सब बताया।
'हूँ, कैसे कह रहे हैं न्यौता नहीं दिया। मैं खुद सुरेश को बोल कर आया था। अभी जाता हूँ।' कहकर, सारा काम छोड़, योगेंद्र तुरंत देवचंद के घर गया।
'देवचंद भाई! क्या हो गया? पता चला है आप लोग कल खाने नहीं आये।'
'हाँ, बिना बुलाये कैसे आते। '
'मैं तो खुद सुरेश को बोल कर गया था।  तुम लोग खेत पर गये थे। उसने बताया नहीं? '
'ना, उसने तो नहीं बताया। सुरेश  .. सुरेश  .. '
सुरेश के आते ही योगेंद्र  पूछा, 'बेटा! कल मैं आया था तो तुमने ही कहा था न, मम्मी-पापा घर पर नहीं हैं, और मैं तुम्हें बोल कर गया था, शाम को पूरे परिवार का खाना है।'
'हाँ। '
इतने में देवचंद बरस पड़ा, 'तो बताया क्यों नहीं? बता! ऐसे ही तो रिश्ते ख़राब होते हैं।'
'भूल गया था।'
'हाँ खेलना थोड़े ही भूला होगा।'
'क्षमा करना, देवचंद भाई! गलती हमारी ही है। मैंने तुम्हें हलवाई के पास देखा तो समझा कि न्यौता मिल ही गया होगा।'
'नहीं योगेंद्र, पड़ोसी होने के नाते, मैंने अपना धर्म निभाया। तुम्हारी व्यवस्था पर एक नजर मार के आ गया, लेकिन न्यौता के बिना खाने कैसे आता!'
'अपनी जगह तुम भी सही हो। अब क्षमा के अलावा कुछ भी नहीं कर सकते।'
'चलो कोई बात नहीं, मगर आगे से ध्यान रखना।  बच्चों की बात पर इतना भरोसा मत करना।'
'हां, अवश्य,  गलती से भी सबक न ले तो इंसान कैसा!'



ऐसी साड़ी पहनती हूँ ?
उत्सव समाप्त हुआ, सब कुछ ठीक ठाक निपट गया। अब रिश्तेदारों की विदाई होने लगी। उत्सव में रिश्तेदारियों की जितनी महिलाएं आई थीं, उमा ने सबके विदाई के लिए साड़ी और ब्लॉउज का सेट खरीद रखा था। संजना भी चलने को तैयार हुई। बड़ी बहन, उमा, दौड़ी कमरे में गयी और साड़ी ब्लॉउज का सेट लेकर आई, उस पर पांच सौ एक रूपये रखकर, उसे विदाई में देने लगी। संजना ने झटक कर साड़ी फेंक दिया, 'तू देखती है! मैं ऐसी ही साड़ी पहनती हूँ !'
'वाह बहन! मैं जैसी पहनती हूं, तू तो मुझे वैसी ही देती है; पर जैसी तू पहनती है, मैं इतनी महँगी साड़ी कैसे दे पाऊँगी। मेरे इनकी आमदनी तो देख। हां, मैं जैसी पहनती हूँ, उससे अच्छा ही तेरे लिए रखती हूँ। मेरी आमदनी के हिसाब से जो मेरे वश में है, मैं कहाँ कमी रखती हूँ।'
'अच्छा ठीक है, तो मैं कौंन सा तेरे से मांग रही हूँ, मेरी तरफ से किसी और को दे देना।'  संजना नाक चढ़ा के बोली, और चल दी।
उमा देखती रह गयी। उमा के पास अब रोने के सिवा कुछ न था।
मुकुल ने माँ को रोते देखा तो बहुत दुखी हुआ। वह माँ को समझाने लगा, 'मौसी पता नहीं क्या समझती है, हम थोड़े कम में हैं, पर इतने भी गए गुजरे नहीं, कल ही महँगी से महँगी साड़ी लेकर मौसी को दे आऊंगा। चुप हो जा।'
'अरे नहीं बेटा! उसे साड़ी ओड़ी कुछ नहीं चाहिए, उसकी आदत है। वो इसी तरह से जताती है कि अमीर घर में व्याही है। मैं रो कहाँ रही हूँ, ये तो मेरी ख़ुशी के आंसू हैं, मेरी छोटी बहन सुखी और संपन्न घर में है।'




पुस्तक के विमोचन समारोह में सर्वेश चंदौसवी जी भी आये थे। महान गजलकारों के लिए अलग से आरक्षित पंक्ति थी और पहचान के लिए, उस पंक्ति में बैठने वालों को बिल्ला लगाया गया था।  उस समारोह में चंदौसवीं जी के परम मित्र मदन मोहन भी आये थे जो एक उभरते लेखक और गजलकार भी थे। चंदौसवी जी मित्र मदन मोहन को वहां अचानक पाकर बड़े प्रसन्न हुये। प्रसन्नता पूर्वक वे मदन का हाथ पकड़े साथ ले गए और अपने बगल वाली कुर्सी पर बैठने का आग्रह करने लगे। मदन मोहन जी ने चुटकी लेते हुए बोला 'यह सीट विशिष्ट लोगों के लिए है, मैं तो एक आम आदमी की भाँति आमंत्रित हूँ, मुझे पीछे ही बैठने दीजिये।'
'अरे ऐसा कुछ नहीं, यहां मेरे पास बैठो, आज नहीं तो कल तुम भी विशिष्ट हो जाओगे।'
नहीं, नहीं, आप बैठिये, देखिए आप के बिल्ला भी लगा है।
चंदौसवी जी अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए और अपना बिल्ला उतार कर मदन मोहन के ऊपर लगा दिया, 'चलो जहाँ तुम बैठोगे, मैं भी वहीँ बैठूंगा। मेरे हाथ में तो बस यही है, वरना इस देश में तो सत्ताधारी लोग अपने मित्रों को कौन सी कुर्सी और क्या क्या पद नहीं दे देते। '
यह कहते हुए दोनों जाकर पीछे वाली पंक्ति में बैठ गए। तभी आयोजकों में से एक नजर चंदौसवी जी पर पड़ गयी। उनका हाथ पकड़ कर, 'अरे चंदौसवी जी आप यहाँ कैसे! चलिए आगे वाली पंक्ति में बैठिये। ये लीजिये एक और बिल्ला।'
चंदौसवी जी ने तब भी मदन मोहन का हाथ नहीं छोड़ा।


मसीहा

'रज्जाक बहुत बड़ा नेता है। वह जाति धर्म नहीं देखता, सबकी मदद करता है। किसी के यहाँ भी लड़की की शादी-विवाह पड़ जाय, कुछ न कुछ जरूर देता है। किसी को पांच तो किसी को दस हजार; किसी किसी की शादी में बीस हजार तक खर्च कर देता है। अगले चुनाव में विधायक के लिए खड़ा होगा। उसकी जीत तो पक्की है।' सुदामा, अरविन्द को समझाने लगा।
'मगर इतना पैसा, उसके पास आता कहां से है ?'
'उसके कई ठेके चलते हैं। इस क्षेत्र के सरकारी सड़क, पुल जो भी बनता है, उन सबका ठेका वही लेता है। क्या मजाल उसके आगे किसी और को ठेका मिल जाय। हाँ, उसके अंतर्गत छोटे ठेके लेकर या फिर उसको उसका हिस्सा देकर ही कोई ठेका ले सकता है।'
'तो, ये तो वही बात हुई जनता का धन लूट कर जनता में बाँट रहा है और समाजसेवी भी बना हुआ है। उसका एकाधिकार है और बाँट भी रहा है तो सड़कें भी वैसी ही होंगी।'
'हां, ये तो है। बस बिल पास होने तक ही ठीक रहती हैं। एक साल के बाद ही मरम्मत की जरूरत पड़ जाती है।'
'वही तो कह रहा हूँ। जनता को अपना अधिकार भी भीख के रूप में मिल रहा है। जो काम सरकार को करना चाहिए वो ठेकेदार करते हैं और फिर ये खुद सरकार में शामिल हो जाते हैं। जो पैसा जहाँ लगना चाहिए, वहां नहीं लग रहा है। वह जो बाँट रहा है, वो भी तो अपना घर भरने के बाद ही कर रहा होगा। लोग समझते हैं उनकी मदद कर रहा है, क्योंकि उन्हें अपना अधिकार पता नहीं है। ख़राब सडकों के चलते जन धन का जो नुकसान होता है, उसका आंकलन करें तो लोगों को समझ आ जायेगा और इस तरह की मदद नहीं लेंगे। बल्कि सही काम चाहेंगे।'


बड़ा ठेकेदार

सुमेर सिंह अब बड़ा ठेकेदार हो चुका था। उसे सड़क बनाने के कई ठेके मिले हुए थे। एक दिन सुमेर सिंह निगम के जूनियर इंजीनियर के सामने गिड़गिड़ा रहा था।
'सर, बड़ा नुकसान हो जायेगा, सब आपके हाथ में है। पास कर दीजिये। मैं तो लुट जाऊंगा।'
जूनियर इंजीनियर था कि झिड़की पर झिड़की दिए जा रहा था, 'इतना ख़राब काम करते हो। फोकट का पैसा लेना चाहते हो? क्या समझते हो सरकार अंधी है? हम लोग फालतू में बैठे हैं ! इसे दुबारा से बनाना होगा।'
सुमेर सिंह ने बोल दिया 'गलती तो हो ही गयी है, आप नहीं सुनेंगे तो चीफ इंजीनियर से बात कर लेता हूँ। '
जूनियर इंजीनियर और चिढ गया, 'ठेकेदार जी! तुम चाहे जिससे बात कर लो, काम दुबारा ही करना पड़ेगा, अंधेरगर्दी नहीं है। चीफ इंजीनियर भी क्या तुम्हारे लिए मानक बदल देंगे। अभी तो सोच रहा था कोई रास्ता निकालें जिससे तुम्हारा कम नुकसान हो पर जाओ चीफ साहब ही देखेंगे। '
मुंह बनाकर सुमेर सिंह जेइ के कमरे से बाहर निकले। मोतीलाल गांव की सड़क टूटने की शिकायत लेकर जूनियर इंजीनियर से मिलने गया था। कक्ष के द्वार पर खड़े वह भीतर जाने की प्रतीक्षा कर रहा था।
मोतीलाल को वहां खड़े देख, सुमेरसिंह शर्म से पानी पानी हो गया। सुमेर सिंह को मोतीलाल की वह बात याद आ गयी।

एक बार सुमेर सिंह का ड्राइवर छुट्टी पर था, तो उन्होंने मोती लाल को बोल दिया कि उन्हें कहीं जाना है, एक दिन के लिए गाड़ी चला देना। पर मोती लाल ने पहले ही व्यस्तता की बात  कर दी।
सुमेर सिंह नाराज हो गए, 'तुम्हारा बेटा इंजीनियर क्या बन गया, तुम्हारा दिमाग आसमान पर चढ़ गया है। उसके जैसे इंजीनियर हमारे यहाँ नौकर हैं।
'नौकर काहे के मालिक! यह तो उनकी योग्यता है जिसकी बदौलत आपका काम चल रहा है।'


गुरु जी

'आईये पंडित जी बैठिये कैसे आना हुआ।' अधिकारी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया। और उन्हें बैठने का अनुरोध किया। पंडित जी सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए किन्तु अधिकारी के इस प्रकार परिचित जैसी बात सुनकर, हतप्रभ थे। 'आखिर यह अधिकारी मुझे कैसे जानता है !' अपनी बात रखते हुए बोले -
'जी सर, मेरे चकबंदी के कागज में मेरा नाम गलत लिख दिया है, उसे ठीक कराना है। '
'कोई बात नहीं एक एप्लीकेशन लिख कर दीजिये, अभी हो जायेगा।'
पंडित रामधन प्रार्थना पत्र पहले ही तैयार रखे थे, थमा दिए।
अधिकारी ने बाबू को बुलाया और बोला, 'ये एप्लिकेशन लो और इसे अभी ठीक कर दो। '
'सर इनका पहचान पत्र?'
अधिकारी ने पंडित जी की ओर देखते हुए कहा, 'सर लाये हैं तो कापी दे दीजिये, नहीं तो मैं प्रमाणित कर देता हूँ। तब तक चकबंदी अधिकारी ने चाय भी माँगा लिया था। अधिकारी के इस सत्कार ने पंडित जी को और भी अचंभित कर दिया था। सरकारी कर्यालय में इस तरह का व्यवहार, पंडित जी के गले नहीं उतर रहा था। अभी सोच ही रहे थे कि पूछूं, क्या मुझे जानते हो ? तब तक आरिफ ही बोल दिया,
'सर, आप पहचान नहीं रहे होंगे। प्राथमिक कक्षा में आपने मुझे पढ़ाया था। प्राथमिक शिक्षा के पश्चात् मैं गांव से शहर चला गया और आगे कि पढ़ाई लिखाई वहीँ से हुई। आप लोगों का आशीर्वाद ही था कि आज मैं इस कुर्सी पर बैठा हूँ।'
पंडित जी यह सुनकर गद्गद थे।


गिफ्ट का डिब्बा

कूड़े वाली के आते ही सोनम पूछने लगी, 'अरे, कल का कूड़ा तूने कहाँ फेंका था।'
'वहीँ मेम साहब! कूड़े घर में और कहाँ !'
'तब तो उसमें मिलना अब मुश्किल होगा।'
'हाँ मेम साहब, कई दिनों से कूड़े वाली गाड़ी नहीं आयी थी, हो सकता है आज सुबह उठा ले गयी हो। किन्तु कूड़े में ऐसा क्या चला गया, जिसके लिए आप इतना परेशान हैं?'
'अरे क्या बताऊँ, उसमें एक गत्ते का डिब्बा था।'
'हाँ मेम साहब ! एक गत्ते का बड़ा सा डिब्बा था, उसे निकाल कर मैंने रख लिया है। उसी में मैंने गिफ्ट पैक कर के रख दिया है। आज शाम को एक शादी में जाना है। मुझे वह डिब्बा बड़ा अच्छा लगा था, सोची कूड़े में फेंकने से अच्छा, उसी में गिफ्ट पैक कर दें। जब आप को पसंद था तो फेंका ही क्यों ?'
'अरे क्या बताऊँ! उसे मेरे जीजा ने मेरे जन्म दिन पर सौगात में दिया था। वे एक बेहतरीन चित्रकार हैं। उन्होंने मेरी एक तस्वीर बनाई और मुझे अचंभित करने के ध्येय से उसी डिब्बे में उलटा कर के रख दिया। मैं समझी कि मजाक स्वरुप उन्होंने मुझे खाली डिब्बा दे दिया है और मैं फेक डाली। अब तो तू अपना गिफ्ट किसी और डिब्बे में पैक कर ले उसे मुझे वापस कर दे। जब वे फोन पर पूछे कि तस्वीर कैसी लगी, उसके बारे में तब पता चला।'



डॉक्टर बहू

बहू दवाई खा ली।
नहीं मम्मी जी! अभी दूसरी दवा खाई हूँ, थोड़ा गैप देकर खा लूंगी।' कुसुम बोली
'अरे, असली दवा तो यही है, कई बार टॉयलेट जा चुकी, खा लेती तो आराम मिल जाता। दूसरी बाद में खा लेती।'
 बीच पिंकी बोल पड़ी 'मम्मी क्या समझा रही हो, भाभी डॉक्टर हैं, उन्हें नहीं पता कौन सी दवा कब लेनी है !'
जगन सेंगर सब सुन रहे थे, बोले 'अरे बहू तो डॉक्टर ही है न, सास तो ये ही हैं।'
कुसुम मन ही मन हँसते हुए कोकिला के पास गयी, नहीं मम्मी जी आप सही कह रही हैं, बस खाने ही जा रही हूँ।





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