Monday, 2 October 2017

Yah din bhi ana tha

यह दिन भी आना था ,

प्रतीक और लीला अपनी बेटी, शेषा के साथ बड़े हंसी ख़ुशी कैनबेरा में जीवन बिता रहे थे। लीला के पापा-मम्मी के कैनबेरा आ जाने पर, उनकी ख़ुशी चार गुना बढ़ गयी। उनके आने से, अब शेषा को अकेलापन नहीं लग रहा था। स्कूल से आने के बाद वह नाना, नानी की अंगुली पकड़ आस पास घूम आती, कभी कहानी सुनाने का आग्रह करती। वह इतनी बातूनी थी कि उसके साथ रामचंद्रन और उनकी पत्नी का भी खूब जी लग रहा था। स्कूल से आते ही, एक एक बात नाना-नानी को बताती , फिर वे हेमंत व लता को ड्यूटी से आने पर हंस हंस कर बताते।

एक बार शेषा को एग्जिमा की शिकायत हुई। लीला ने घरेलू उपचार से ही काम चलना चाहा। एग्जिमा बढ़ता जा रहा था, पर वे डॉक्टर के यहाँ जाने का समय नहीं निकाल पा रहे थे। धीरे धीरे जब काफी बढ़ गया तो वे समीप के चिकित्सा केंद्र ले गए, वहां डॉक्टर ने एग्जिमा को गंभीर बता दिया और विशेषज्ञ को दिखाने के लिए बड़े अस्पताल को रेफर कर दिया। फिर समयाभाव के कारण वे कई दिन तक उसे अस्पताल नहीं ले जा पाये।
रामचंद्रन होमियोपैथी के डॉक्टर थे। उन्होंने सोचा कि वे ही इसका उपचार कर दें । उनके विचार के अनुसार होमियोपैथी में एग्जिमा का अच्छा उपचार उपलब्ध था। वे शेषा को विशेषज्ञ के पास ले जाने की जगह घर पर होमियोपैथी उपचार करने लगे।
रामचंद्रन उपचार करते रहे दो तीन महीने बीत गए और कोई लाभ नहीं मिला। अपितु एग्जिमा का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था। वहां पर सही होमियोपैथी दवाइयां भी नहीं मिल पा रही थीं।  कुछ दवाई उन्होंने अपने के मित्र के द्वारा माँगा लिया था, पर वह समाप्त हो चुकी थी। अब प्रतीक व लीला उसे अस्पताल ले जाने में भी झिझक रहे थे कि इतना समय हो गया अब तो अस्पताल से भी सुननी पड़ेगी।
इधर चिकित्सा केंद्र ने शेषा की फाइल ऑनलाइन बड़े अस्पताल को भेज दी थी। इतने समय तक नहीं दिखाने पर, अस्पताल से पत्र आ गया, जिसमें प्रतीक से अनुरोध किया गया था कि वह शेषा को शीघ्रातिशीघ्र वहां दिखाए।  यदि उसकी उचित चिकित्सा चल रही है तो उसकी सूचना भेजे। प्रतीक शेषा को न तो वहाँ ले ही गया न ही उस पत्र का उत्तर भेजा।
इसी बीच पूरे परिवार को  समारोह में भाग लेने इंडिया जाना था। तभी रामचंद्रन ने सलाह दिया कि इंडिया जा ही रहे हैं, वहां होमियोपैथी के और बड़े डॉक्टर हैं और दवाइयां सरलता से मिल जाएँगी। और तो और हैदराबाद में उनके गुरु डॉ. बनर्जी भी हैं, कोई चिंता की बात नहीं है वहां, ठीक हो जायेगा।
सभी लोग इंडिया चले आये, डॉ. बनर्जी से समय लेकर दिखाया गया उनकी दवा से कुछ लाभ होना आरम्भ तो हुआ पर इतने में वापस कैनबेरा जाने का समय हो चला। प्रतीक लम्बी अवधि की दवा लेकर वापसी की तैयारी करने लगा। इसी बीच शेषा को इंडिया में कोई और इन्फेक्शन हो गया। उसकी तवियत निरंतर ख़राब रहने लगी। डॉक्टर को दिखाया तो उसने कहा, एक्जिमा के अतिरिक्त कोई और इन्फेक्शन है, इसकी गहन जांच करनी पड़ेगी और कई टेस्ट कराने होंगे, तभी बीमारी का सही कारण पता चल पायेगा। अब कैनबेरा जाने में दो तीन दिन का ही समय रह गया था। प्रतीक के लिए सारे जाँच कराना संभव नहीं था। उसने सोचा कि अब कैनबेरा ही जाकर पूरा इलाज कराएगा।

जब वह वापस कैनबेरा आया तो देखा कि इस बीच अस्पताल के दो और पत्र आये हुए हैं। ऐसा लग रहा था कि माँ बाप से अधिक चिंता अस्पताल को ही है। अब तो हालात ऐसे हो चुके थे, अबिलम्ब अस्पताल जाना पड़ा।प्रतीक अस्पताल पहुंचा, तब तक शेषा की हालत काफी बिगड़ चुकी थी।  अस्पताल ने बहुत कोशिश किया, पर शेषा को बचाया नहीं जा सका।
प्रतीक और लीला अपनी बेटी के शोक में डूबे थे तभी उनके घर पुलिस आ गयी। शेषा की चिकित्सा में लापरवाही के कारण, प्रतीक को गिरफ्तार कर लिया गया। घर का डॉक्टर उन्हें बहुत मंहगा पड़ा।


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