सुबह ८ बजे ही हलवाई अपनी कड़ाही, पौना और भगौना लेकर अपने कार्यकर्ताओं के साथ आ चुका है। टेंट और भंडारा का सारा सामान भी आ चुका है। देखते ही देखते वहां छोटा सा टेंट तन जाता है। सड़क का कुछ भाग सम्मिलित करते हुए, पटरी पर टेंट को इस तरह से लगाया जाता है कि वहां दुकानों में आने जाने में कोई रूकावट न हो। वैसे वहां के दुकानदारों से इस काम में सहयोग देने और भंडारा ग्रहण करने के लिए पहले ही कहा जा चुका था। हलवाई को सहेज दिया जाता है कि एक डेढ़ बजे तक माल तैयार हो जाना चाहिए, ताकि दोपहर के खाने के समय तक, कार्यक्रम आरम्भ किया जा सके।
धीरे धीरे दोपहर का समय आ चला है, भंडारा परोसने के लिए टेंट में चार पांच मेज लगवा दी गयी हैं। वहीँ बगल में एक बड़े भगौने में तैयार सब्जी रखी है और हलवाई पूड़ी छान छान कर एक ड्रम भर रहा है। मेजों पर सब्जी की बाल्टियां और पूड़ियों की टोकरियां सज चुकी हैं। भंडारा परोसने के लिए टीम तैयार है। कुछ बच्चे आसपास मंडराने शुरू हो चुके हैं। जैसे ही उन्हें संकेत मिले भंडारा पाने के लिए टूट पड़ें। हलवाई ने टीम को पहले ही चेतावनी दे दी है, 'अभी थोड़ा रूक जाना, पूड़ी का ड्रम भर जाए तभी शुरू करना। माल उठने में अधिक देर नहीं लगती। थोड़ी ही देर में भीड़ लग जाती है। फिर इतनी जल्दी जल्दी पूड़ी नहीं दे पाउँगा।'
भीड़ का अनुमान लगाते हुए, परोसने वालों की दो टीम बन जाती है। वे हलवाई की बात का संज्ञान लेते हुए, थोड़ी और पूड़ियाँ निकलने की प्रतीक्षा करते हैं। बस पन्द्रह मिनट की और देर थी, ड्रम लगभग भर गया। टीम ने मेज पर पूड़ी, सब्जी और दोने लगाना प्रारम्भ कर दिया। बच्चे तो प्रतीक्षा कर ही रहे थे, उन्हें बस इशारा का इंतजार था। लपक कर वहां पहुंचे, सब्जी का पहला दोना जिस बच्चे के हाथ में मिला वह मुड़ कर मुस्कराते हुये अपने साथियों की ओर देखा। उत्तर में उसे भी साथियों की मुस्कराहट मिली। अबिलम्ब भंडारा खाने वालों की भीड़ जुट गयी। देखते ही देखते दो लम्बी कतारें लग गयीं। मेज के दायीं और बायीं दोनों ओर से पूड़ी सब्जी परोसा जाने लगा। बच्चों की संख्या अधिक होना स्वाभाविक था।
भीड़ का अनुमान लगाते हुए, परोसने वालों की दो टीम बन जाती है। वे हलवाई की बात का संज्ञान लेते हुए, थोड़ी और पूड़ियाँ निकलने की प्रतीक्षा करते हैं। बस पन्द्रह मिनट की और देर थी, ड्रम लगभग भर गया। टीम ने मेज पर पूड़ी, सब्जी और दोने लगाना प्रारम्भ कर दिया। बच्चे तो प्रतीक्षा कर ही रहे थे, उन्हें बस इशारा का इंतजार था। लपक कर वहां पहुंचे, सब्जी का पहला दोना जिस बच्चे के हाथ में मिला वह मुड़ कर मुस्कराते हुये अपने साथियों की ओर देखा। उत्तर में उसे भी साथियों की मुस्कराहट मिली। अबिलम्ब भंडारा खाने वालों की भीड़ जुट गयी। देखते ही देखते दो लम्बी कतारें लग गयीं। मेज के दायीं और बायीं दोनों ओर से पूड़ी सब्जी परोसा जाने लगा। बच्चों की संख्या अधिक होना स्वाभाविक था।
चार चार पूड़ियों पर, दोने में सब्जी रख कर परोसी जा रही थी।
भंडारा खाने वाले, अपना-अपना दोना लेकर, कोई सड़क की पटरी पर बैठ तो कोई खड़े ही खाने लगा। बांटने वाली टीम बड़ी तन्मयता से काम कर रही थी। उनका पूरा प्रयास था कि लोगों को जल्दी से जल्दी भंडारा परोसा जाय, कहीं ऐसा न हो कि कोई प्रतीक्षा करके, अधिक समय लगने के कारण कोई खाली ही चला जाय। भंडारा तो वैसे पटरी पर ही चल रहा था परन्तु लेने और खाने वाले सड़क पर फैले हुए थे। अभी आधे घंटे भी नहीं हुए थे, सड़क पर यातायात बाधित होने लगा, गाड़ियों के भोंपू बजने आरम्भ हो गए। शीघ्र ही किसी आपात काल जैसा दृश्य उत्पन्न हो गया। मगर भैंस के आगे बिन बजाये और भैंस बैठी पगुराए, वाला हाल। लोग टस से मस नहीं हो रहे थे। किसी तरह, बीच बीच में गाड़ियों के निकलने की जगह दे दी जा रही थी।
भंडारा खाने वाले, अपना-अपना दोना लेकर, कोई सड़क की पटरी पर बैठ तो कोई खड़े ही खाने लगा। बांटने वाली टीम बड़ी तन्मयता से काम कर रही थी। उनका पूरा प्रयास था कि लोगों को जल्दी से जल्दी भंडारा परोसा जाय, कहीं ऐसा न हो कि कोई प्रतीक्षा करके, अधिक समय लगने के कारण कोई खाली ही चला जाय। भंडारा तो वैसे पटरी पर ही चल रहा था परन्तु लेने और खाने वाले सड़क पर फैले हुए थे। अभी आधे घंटे भी नहीं हुए थे, सड़क पर यातायात बाधित होने लगा, गाड़ियों के भोंपू बजने आरम्भ हो गए। शीघ्र ही किसी आपात काल जैसा दृश्य उत्पन्न हो गया। मगर भैंस के आगे बिन बजाये और भैंस बैठी पगुराए, वाला हाल। लोग टस से मस नहीं हो रहे थे। किसी तरह, बीच बीच में गाड़ियों के निकलने की जगह दे दी जा रही थी।
दोने फेंकने के लिए, अलग एक ड्रम रखा हुआ था, किन्तु यह बात सभी को समझ नहीं आ पायी थी। दोने सड़क पर दूर तक बिखरे हुए दिख रहे थे। स्वच्छ भारत अभियान का उन पर कोई प्रभाव नहीं था। क्षेत्र के सफाई कर्मचारी ने आकर अपना रौब दिखाया, 'भंडारा समाप्त होने पर, सब साफ़ करवा देना, अन्यथा हमें साफ़ करना हो तो बता देना।'
'ठीक है तुम्हीं साफ़ करवा देना, पैसे बता दो।'
भंडारा अपने पूरे शबाब पर था। बच्चों में रौनक देखते ही बनती थी। जिनके हाथ दोना लग जाता, वह मचलते हुए जाकर, पटरी पर कहीं बैठ जाता। कभी कभी कुछ मक्खियां भी साफ़ दोने से खाने के चक्कर में, इधर उधर बिखरे दोनों से खाने के बजाय इन बच्चों के दोनों में हिस्सा लेने आ जातीं। पर ये बच्चे भी कौन से कि समझदार नहीं थे, इतनी मेहनत से लाइन में लग कर दोना पाये और इतनी आसानी से इनको उसमें हिस्सा दे देते, यह कैसे हो सकता था ! बेचारी उड़कर, फिर वहीं उनके लिए नियत स्थान पर पहुँच जातीं।
कुछ ही समय पश्चात्, जैसे ही दो नन्हें हाथ, दोना लेने के लिए लपके, परोसने वाले ने बोला 'तू तो थोड़ी देर पहले भी ले गया था।'
'ठीक है तुम्हीं साफ़ करवा देना, पैसे बता दो।'
भंडारा अपने पूरे शबाब पर था। बच्चों में रौनक देखते ही बनती थी। जिनके हाथ दोना लग जाता, वह मचलते हुए जाकर, पटरी पर कहीं बैठ जाता। कभी कभी कुछ मक्खियां भी साफ़ दोने से खाने के चक्कर में, इधर उधर बिखरे दोनों से खाने के बजाय इन बच्चों के दोनों में हिस्सा लेने आ जातीं। पर ये बच्चे भी कौन से कि समझदार नहीं थे, इतनी मेहनत से लाइन में लग कर दोना पाये और इतनी आसानी से इनको उसमें हिस्सा दे देते, यह कैसे हो सकता था ! बेचारी उड़कर, फिर वहीं उनके लिए नियत स्थान पर पहुँच जातीं।
कुछ ही समय पश्चात्, जैसे ही दो नन्हें हाथ, दोना लेने के लिए लपके, परोसने वाले ने बोला 'तू तो थोड़ी देर पहले भी ले गया था।'
'वो तो मैंने अपनी छोटी बहन को दे दिया, उधर बैठ के खा रही है।'
'चल ये ले, अब किसी को मत देना, तुम्हीं खाना। जिसको खाना होगा, यहाँ से ले जायेगा।'
'हाँ अंकल, कहते, विजय की नन्हीं सी मुस्कान लिए, वह एक ओर हो गया।'
तभी साथ वाली पंक्ति में बिट्टू अपने पीछे खड़े सोनू की ओर संकेत करके बोला, 'अंकल ये पहले भी ले जा चुका है।'
'तू भी तो ले गया है', पीछे से सोनू बोल बैठा।'
'वो तो, मैंने अपने भाई को दे दिया।'
'नहीं अंकल ! घर ले जाने को उधर डब्बे में रखा है।'
तभी परोसने वाला, बिट्टू और सोनू, दोनों को पंक्ति से हटाने लगा, ' चलो हटो। घर ले जाने के लिए नहीं है, यहीं खाओ। खा लेना तो और ले लेना।'
'लेकिन अंकल वो तो भाई खा गया, मैं कैसे खाऊंगा ?'
'अच्छा ये लो, फिर नहीं आना।'
'हाँ, ठीक है। '
उन दोनों को देने के बाद परोसने वाले को उसका सहयोगी बताने लगा, 'इनमें से कई बच्चे यहाँ से ले जाकर, उधर कोने में इकठ्ठा कर रहे हैं। ये अपना ही नहीं बल्कि पूरे परिवार का प्रबंध कर रहे हैं।'
'चलो कोई बात नहीं, कोई भी खाये, किसी के पेट में ही तो जायेगा। हमें तो खिलाने से मतलब है। बस नुकसान नहीं होना चाहिए।'
थोड़ी ही देर हुई थी कि बिट्टू फिर से लाइन में आ गया। परोसने वाले कार्यकर्ता ने उसे पहचान लिया, 'तुझे तो मैं दो बार दे चूका हूँ, फिर आ गया। कितना खायेगा!'
'अंकल वो मैंने अपनी बहन के लिए रखा था, कुत्ता ले गया।'
सोनू भी उसके पीछे पीछे लगा ही था, 'हां अंकल! कुत्ता, इसका डब्बा ही उठा ले गया।'
परोसने वाला भी क्या करता, दोने की सब्जी, चार पूड़ी के साथ थमा दिया।
भंडारा खाने के लिए अकरम और कल्लू भी पहुँच चुके थे। अकरम तो कतार में पीछे लग गया, लेकिन कल्लू को इतना सब्र कहाँ था। वह आगे लाइन के आस पास थोड़ी देर मंडराया और फिर उसमें घुस गया। पीछे से किसी बालक की आवाज आयी, 'वो देखो लाइन में घुस रहा है।' पर कल्लू ढीठ होकर बोला, 'मैं तो कबसे खड़ा हूँ!'
कल्लू अपना दोना लेकर चला। अकरम के पास पहुंचा तो उसकी ओर देखता हुआ मुस्करा कर अपनी जीत दर्ज करा रहा था, तभी उधर से बबलू भी लपका चला आ रहा था। कल्लू उसे देख न पाया और टकरा गया, पूड़ियाँ सड़क पर फैलीं और सब्जी उसके कपड़ों पर। अब तो कल्लू पर भारी संकट मंडराने लगा। इन कपड़ों में फिर से लेने जाएगा तो पकड़ा जायेगा और उसे दोना नहीं मिलेगा। अगर घर गया तो डांट पड़ेगी। अकरम ने वस्तु स्थिति को भांप लिया। कल्लू से बोला, 'उधर जाकर तू कपड़े साफ़ कर, मैं तेरे लिए भी लेकर आता हूँ।'
भंडारा चलते, अब तक डेढ़ दो घंटे हो चुके थे। भंडार की हुई पूड़ी समाप्त हो चुकी थीं। ताज़ी पूड़ी आने का क्रम धीमा पड़ गया था। पंक्ति में खड़े सबको अंटाने के ध्येय से अब चार के स्थान पर दो दो पूड़ियाँ दी जाने लगी थीं। सब्जी का भंडार भी थोड़ा ही दिख रहा था। वैसे अब तक काफी भीड़ निबट चुकी थी। टोकरी की पूड़ी समाप्त होने पर, पंक्ति में खड़े लोगों को कुछ देर प्रतीक्षा करनी पड़ रही थी। नयी घान आते ही समाप्त हो जा रही थी। आयोजकों द्वारा भरोसा दिलाया जा रहा था, 'सब्र करो सबको मिलेगा, पूड़ी छनने में थोड़ा समय लग रहा है।'
कुछ लोगों के मन में तो पूरी निष्ठा थी और वे भंडारे के प्रसाद के दीवाने थे, उनके मन में था कि वे प्रसाद का स्वाद लेकर ही रहेंगे, चाहे थोड़ी प्रतीक्षा ही क्यों न करनी पड़े। परन्तु कई लोग ऐसे भी थे कि यह सोच कर जाने लगे, दो पूड़ी के लिए इतना समय कौन नष्ट करे।
धीरे धीरे बड़ों की भीड़ लुप्त होने लगी थी। अब बच्चे ही अधिक थे, वे अभी भी पूरी तरह तटस्त थे। भाग्य वश छुट्टी का दिन था, उन्हें समय का कोई आभाव नहीं था। बीस पच्चीस मिनट प्रतीक्षा से क्या अंतर पड़ता है; मन पसंद का और वो भी मुफ्त, कुछ खाने को मिल रहा था। पूड़ी की अगली घान आ गयी, वो भी दस बारह लोगों को ही अंट पायी; पूड़ी समाप्त हो गयी। भंडारा लेने वालों का ताँता समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था।
बनवारी आज घर से देर से निकला था। अपने अड्डे पर जा ही रहा था कि उसे भंडारे की भनक लग गयी। वह जाकर कतार में खड़ा हो गया। उसका नंबर अभी बहुत पीछे था। वह पंक्ति छोड़ कर आगे मेज की ओर बढ़ गया, 'सेठ जी! मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया, भूख लगी है। अल्ला की मेहरबानी से, इस बार मुझे मिल जायेगा क्या ?'
पंक्ति में खड़े लोग चिल्लाने लगे, 'अरे ये तो उस चौराहे वाला भिखारी है, लाइन में आ जा, बाबा!'
भंडारा परोसने वाला उनकी बात सुनकर, बनवारी को लौटा दिया, 'बाबा लाइन में आ जाओ। ये सब लाइन में खड़े हैं, बेवकूफ थोड़े ही हैं। जब नंबर आएगा, तुम्हें भी मिल जायेगा।'
'या अल्ला! लगता है, आज भूखे ही रहना पड़ेगा या किसी गुरूद्वारे में जाना पड़ेगा।' कहते हुआ वहाँ से चल दिया। बनवारी ने भांप लिया था, सब्जी भी थोड़ी ही है। पता नहीं पूरी पड़ेगी या नहीं, उसका वहाँ खड़ा होना भी व्यर्थ ही होगा। आज घर से देर से निकलने के कारण, अभी तक कोई कमाई भी नहीं हो पायी थी।
उसके जाने के बस पांच मिनट में ही पूड़ी की नई घान आ गयी। कुछ लोगों को देने के बाद भंडारा परोसने वाले ने चार पूड़ी अलग कर दी और बच्चों पूछने लगा अरे वो भिखारी कहाँ गया ?
बच्चे चिल्लाने लगे, 'वो तो चला गया।'
एक बच्चे की और इशारा करते हुए, 'जाओ देखो यहीं कहीं होगा, बुला लाओ। तुम्हें मैं लाइन से अलग दे दूंगा।'
वह बच्चा आस पास देखा मगर बनवारी नहीं मिला, तब तक पता नहीं कहाँ अंतर्ध्यान हो गया था। तभी भंडारा करवा रहे, सेठ जी आ गए। परोसने वाले ने उन्हें बता दिया, 'एक भिखारी आया था, पूड़ी तैयार नहीं थी, पता नहीं कहाँ चला गया? एक बच्चे को भेजा था पर वो दिखा नहीं।'
सेठ जी के दिल में करुणा जागी, बोले, 'तुम खुद जाकर देख लो, कहीं आस पास ही होगा। बुला कर खिला दो। '
'बच्चों में से आवाज आई, 'वो आगे वाले चौराहे पर बैठता है। वहीँ गया होगा।'
सेठ जी ने उस कार्यकर्ता को थोड़ी सब्जी और कुछ पूड़ियाँ एक पन्नी में डाल कर वहीं ले जाने को कहा। वह कार्यकर्ता अविलम्ब अपना स्कूटर उठाया और उधर गया, मगर थोड़ी ही देर में, वह सब लेकर वापस आ गया, 'सेठ जी वो तो वहां भी नहीं मिला।'
अब सेठ जी भंडारे का विश्लेषण करने लगे, 'वैसे काफी लोग निबट गये। तुम लोगों ने बड़ा सहयोग दिया। देखो! दो बोरा आटा खप गया! चलो, अब हो गया, सब समेटो।'
सेठ जी की बात सुनकर, एक सहयोगी बोल पड़ा, 'हां, लाला जी ! खाने की भी सभी लोग बहुत तारीफ कर रहे थे। एक हजार से भी ऊपर, लोग खा चुके होंगे। बस वही, एक भिखारी भूखा चला गया। वह बेचारा तो कह भी रहा था कि बहुत भूखा है।'
घर जाकर सेठ जी ने भिखारी वाली बात अपनी पत्नी को बताई तो वह सोच में पड़ गयी, 'बताओ हजारों को तो खिला दिया और एक भूखे को नहीं खिला पाए। अब तो मुझे पश्चाताप करना पड़ेगा। आज शाम का भोजन मैं नहीं करुँगी।'
उसके अनशन की बात सुन सेठ जी भी चिंता में पड़ गए, अब पत्नी नहीं खायेगी तो वे भी कैसे खाएंगे! और खाये बिना सेठ जी को नींद कैसे आएगी ! उन्होंने उसका निराकरण सोचा। पत्नी से बोले, 'क्यों परेशान हो रही हो? वह भिखारी था कहीं मांग कर खा लिया होगा। फिर भी, आज का दिन तो गया; तुम ऐसा करना कल सुबह उसका भोजन बनाकर पैक कर देना। अब मैं काम पर जाऊंगा तो उसे देते हुए चला जाऊंगा।'
पत्नी को यह बात उचित नहीं लगी कि वह कहीं मांग कर खा लिया होगा, आखिर हम तो पाप के भागी बने। मगर, उसे भोजन भेजने के प्रस्ताव पर, अनशन तोड़ दिया। अगले दिन प्रातः उठकर उसने खाना बनाकर पैक कर दिया और सेठ जी से बोली, 'ये लो, उस भिखारी का पता करके खिला देना, यह नहीं करना कि वापस लिए चले आओ ।'
सेठ जी को भिखारी का ठिकाना तो पता लग ही चुका था, वे डिब्बे में बंद भोजन ले गए। भाग्य वश बनवारी उसी चौराहे पर बैठा मिल गया। उसकी ओर खाने का डब्बा बढ़ाते हुए सेठ जी ने कहा, 'ये लो बाबा! भोजन कर लो।'
बनवारी इस प्रकार से अचानक उसके पास भोजन आने पर चौंक गया, 'लेकिन, मैं तो आज खा पीकर आया हूँ। मुझे तनिक भी भूख नहीं है।'
'ठीक है, रख लो, किसी और को दे देना।'
'वाह साहब ! जो चीज मेरी नहीं है, मैं क्यों रख लूँ ? और मैं किसको दूंगा, चले जाओ पास में ही मंदिर है, कोई न कोई भिखारी मिल जायेगा, खिला देना। बाकी आपकी किस्मत। आपने मेरे बारे में सोचा, मैं आपके लिए दुआ करता हू, अल्ला आपकी खैर करे।'
'हाँ अंकल, कहते, विजय की नन्हीं सी मुस्कान लिए, वह एक ओर हो गया।'
तभी साथ वाली पंक्ति में बिट्टू अपने पीछे खड़े सोनू की ओर संकेत करके बोला, 'अंकल ये पहले भी ले जा चुका है।'
'तू भी तो ले गया है', पीछे से सोनू बोल बैठा।'
'वो तो, मैंने अपने भाई को दे दिया।'
'नहीं अंकल ! घर ले जाने को उधर डब्बे में रखा है।'
तभी परोसने वाला, बिट्टू और सोनू, दोनों को पंक्ति से हटाने लगा, ' चलो हटो। घर ले जाने के लिए नहीं है, यहीं खाओ। खा लेना तो और ले लेना।'
'लेकिन अंकल वो तो भाई खा गया, मैं कैसे खाऊंगा ?'
'अच्छा ये लो, फिर नहीं आना।'
'हाँ, ठीक है। '
उन दोनों को देने के बाद परोसने वाले को उसका सहयोगी बताने लगा, 'इनमें से कई बच्चे यहाँ से ले जाकर, उधर कोने में इकठ्ठा कर रहे हैं। ये अपना ही नहीं बल्कि पूरे परिवार का प्रबंध कर रहे हैं।'
'चलो कोई बात नहीं, कोई भी खाये, किसी के पेट में ही तो जायेगा। हमें तो खिलाने से मतलब है। बस नुकसान नहीं होना चाहिए।'
थोड़ी ही देर हुई थी कि बिट्टू फिर से लाइन में आ गया। परोसने वाले कार्यकर्ता ने उसे पहचान लिया, 'तुझे तो मैं दो बार दे चूका हूँ, फिर आ गया। कितना खायेगा!'
'अंकल वो मैंने अपनी बहन के लिए रखा था, कुत्ता ले गया।'
सोनू भी उसके पीछे पीछे लगा ही था, 'हां अंकल! कुत्ता, इसका डब्बा ही उठा ले गया।'
परोसने वाला भी क्या करता, दोने की सब्जी, चार पूड़ी के साथ थमा दिया।
भंडारा खाने के लिए अकरम और कल्लू भी पहुँच चुके थे। अकरम तो कतार में पीछे लग गया, लेकिन कल्लू को इतना सब्र कहाँ था। वह आगे लाइन के आस पास थोड़ी देर मंडराया और फिर उसमें घुस गया। पीछे से किसी बालक की आवाज आयी, 'वो देखो लाइन में घुस रहा है।' पर कल्लू ढीठ होकर बोला, 'मैं तो कबसे खड़ा हूँ!'
कल्लू अपना दोना लेकर चला। अकरम के पास पहुंचा तो उसकी ओर देखता हुआ मुस्करा कर अपनी जीत दर्ज करा रहा था, तभी उधर से बबलू भी लपका चला आ रहा था। कल्लू उसे देख न पाया और टकरा गया, पूड़ियाँ सड़क पर फैलीं और सब्जी उसके कपड़ों पर। अब तो कल्लू पर भारी संकट मंडराने लगा। इन कपड़ों में फिर से लेने जाएगा तो पकड़ा जायेगा और उसे दोना नहीं मिलेगा। अगर घर गया तो डांट पड़ेगी। अकरम ने वस्तु स्थिति को भांप लिया। कल्लू से बोला, 'उधर जाकर तू कपड़े साफ़ कर, मैं तेरे लिए भी लेकर आता हूँ।'
भंडारा चलते, अब तक डेढ़ दो घंटे हो चुके थे। भंडार की हुई पूड़ी समाप्त हो चुकी थीं। ताज़ी पूड़ी आने का क्रम धीमा पड़ गया था। पंक्ति में खड़े सबको अंटाने के ध्येय से अब चार के स्थान पर दो दो पूड़ियाँ दी जाने लगी थीं। सब्जी का भंडार भी थोड़ा ही दिख रहा था। वैसे अब तक काफी भीड़ निबट चुकी थी। टोकरी की पूड़ी समाप्त होने पर, पंक्ति में खड़े लोगों को कुछ देर प्रतीक्षा करनी पड़ रही थी। नयी घान आते ही समाप्त हो जा रही थी। आयोजकों द्वारा भरोसा दिलाया जा रहा था, 'सब्र करो सबको मिलेगा, पूड़ी छनने में थोड़ा समय लग रहा है।'
कुछ लोगों के मन में तो पूरी निष्ठा थी और वे भंडारे के प्रसाद के दीवाने थे, उनके मन में था कि वे प्रसाद का स्वाद लेकर ही रहेंगे, चाहे थोड़ी प्रतीक्षा ही क्यों न करनी पड़े। परन्तु कई लोग ऐसे भी थे कि यह सोच कर जाने लगे, दो पूड़ी के लिए इतना समय कौन नष्ट करे।
धीरे धीरे बड़ों की भीड़ लुप्त होने लगी थी। अब बच्चे ही अधिक थे, वे अभी भी पूरी तरह तटस्त थे। भाग्य वश छुट्टी का दिन था, उन्हें समय का कोई आभाव नहीं था। बीस पच्चीस मिनट प्रतीक्षा से क्या अंतर पड़ता है; मन पसंद का और वो भी मुफ्त, कुछ खाने को मिल रहा था। पूड़ी की अगली घान आ गयी, वो भी दस बारह लोगों को ही अंट पायी; पूड़ी समाप्त हो गयी। भंडारा लेने वालों का ताँता समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था।
बनवारी आज घर से देर से निकला था। अपने अड्डे पर जा ही रहा था कि उसे भंडारे की भनक लग गयी। वह जाकर कतार में खड़ा हो गया। उसका नंबर अभी बहुत पीछे था। वह पंक्ति छोड़ कर आगे मेज की ओर बढ़ गया, 'सेठ जी! मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया, भूख लगी है। अल्ला की मेहरबानी से, इस बार मुझे मिल जायेगा क्या ?'
पंक्ति में खड़े लोग चिल्लाने लगे, 'अरे ये तो उस चौराहे वाला भिखारी है, लाइन में आ जा, बाबा!'
भंडारा परोसने वाला उनकी बात सुनकर, बनवारी को लौटा दिया, 'बाबा लाइन में आ जाओ। ये सब लाइन में खड़े हैं, बेवकूफ थोड़े ही हैं। जब नंबर आएगा, तुम्हें भी मिल जायेगा।'
'या अल्ला! लगता है, आज भूखे ही रहना पड़ेगा या किसी गुरूद्वारे में जाना पड़ेगा।' कहते हुआ वहाँ से चल दिया। बनवारी ने भांप लिया था, सब्जी भी थोड़ी ही है। पता नहीं पूरी पड़ेगी या नहीं, उसका वहाँ खड़ा होना भी व्यर्थ ही होगा। आज घर से देर से निकलने के कारण, अभी तक कोई कमाई भी नहीं हो पायी थी।
उसके जाने के बस पांच मिनट में ही पूड़ी की नई घान आ गयी। कुछ लोगों को देने के बाद भंडारा परोसने वाले ने चार पूड़ी अलग कर दी और बच्चों पूछने लगा अरे वो भिखारी कहाँ गया ?
बच्चे चिल्लाने लगे, 'वो तो चला गया।'
एक बच्चे की और इशारा करते हुए, 'जाओ देखो यहीं कहीं होगा, बुला लाओ। तुम्हें मैं लाइन से अलग दे दूंगा।'
वह बच्चा आस पास देखा मगर बनवारी नहीं मिला, तब तक पता नहीं कहाँ अंतर्ध्यान हो गया था। तभी भंडारा करवा रहे, सेठ जी आ गए। परोसने वाले ने उन्हें बता दिया, 'एक भिखारी आया था, पूड़ी तैयार नहीं थी, पता नहीं कहाँ चला गया? एक बच्चे को भेजा था पर वो दिखा नहीं।'
सेठ जी के दिल में करुणा जागी, बोले, 'तुम खुद जाकर देख लो, कहीं आस पास ही होगा। बुला कर खिला दो। '
'बच्चों में से आवाज आई, 'वो आगे वाले चौराहे पर बैठता है। वहीँ गया होगा।'
सेठ जी ने उस कार्यकर्ता को थोड़ी सब्जी और कुछ पूड़ियाँ एक पन्नी में डाल कर वहीं ले जाने को कहा। वह कार्यकर्ता अविलम्ब अपना स्कूटर उठाया और उधर गया, मगर थोड़ी ही देर में, वह सब लेकर वापस आ गया, 'सेठ जी वो तो वहां भी नहीं मिला।'
अब सेठ जी भंडारे का विश्लेषण करने लगे, 'वैसे काफी लोग निबट गये। तुम लोगों ने बड़ा सहयोग दिया। देखो! दो बोरा आटा खप गया! चलो, अब हो गया, सब समेटो।'
सेठ जी की बात सुनकर, एक सहयोगी बोल पड़ा, 'हां, लाला जी ! खाने की भी सभी लोग बहुत तारीफ कर रहे थे। एक हजार से भी ऊपर, लोग खा चुके होंगे। बस वही, एक भिखारी भूखा चला गया। वह बेचारा तो कह भी रहा था कि बहुत भूखा है।'
घर जाकर सेठ जी ने भिखारी वाली बात अपनी पत्नी को बताई तो वह सोच में पड़ गयी, 'बताओ हजारों को तो खिला दिया और एक भूखे को नहीं खिला पाए। अब तो मुझे पश्चाताप करना पड़ेगा। आज शाम का भोजन मैं नहीं करुँगी।'
उसके अनशन की बात सुन सेठ जी भी चिंता में पड़ गए, अब पत्नी नहीं खायेगी तो वे भी कैसे खाएंगे! और खाये बिना सेठ जी को नींद कैसे आएगी ! उन्होंने उसका निराकरण सोचा। पत्नी से बोले, 'क्यों परेशान हो रही हो? वह भिखारी था कहीं मांग कर खा लिया होगा। फिर भी, आज का दिन तो गया; तुम ऐसा करना कल सुबह उसका भोजन बनाकर पैक कर देना। अब मैं काम पर जाऊंगा तो उसे देते हुए चला जाऊंगा।'
पत्नी को यह बात उचित नहीं लगी कि वह कहीं मांग कर खा लिया होगा, आखिर हम तो पाप के भागी बने। मगर, उसे भोजन भेजने के प्रस्ताव पर, अनशन तोड़ दिया। अगले दिन प्रातः उठकर उसने खाना बनाकर पैक कर दिया और सेठ जी से बोली, 'ये लो, उस भिखारी का पता करके खिला देना, यह नहीं करना कि वापस लिए चले आओ ।'
सेठ जी को भिखारी का ठिकाना तो पता लग ही चुका था, वे डिब्बे में बंद भोजन ले गए। भाग्य वश बनवारी उसी चौराहे पर बैठा मिल गया। उसकी ओर खाने का डब्बा बढ़ाते हुए सेठ जी ने कहा, 'ये लो बाबा! भोजन कर लो।'
बनवारी इस प्रकार से अचानक उसके पास भोजन आने पर चौंक गया, 'लेकिन, मैं तो आज खा पीकर आया हूँ। मुझे तनिक भी भूख नहीं है।'
'ठीक है, रख लो, किसी और को दे देना।'
'वाह साहब ! जो चीज मेरी नहीं है, मैं क्यों रख लूँ ? और मैं किसको दूंगा, चले जाओ पास में ही मंदिर है, कोई न कोई भिखारी मिल जायेगा, खिला देना। बाकी आपकी किस्मत। आपने मेरे बारे में सोचा, मैं आपके लिए दुआ करता हू, अल्ला आपकी खैर करे।'
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