Monday, 17 November 2014

Bete ke sahare videsh

बेटे के सहारे विदेश  

अपनी नौकरी के बूते तो ठाकुर साहब का विदेश घूमना सपना था। जब बेटा समीर ऑस्ट्रेलिया गया तो उन्होंने और उनकी पत्नी दोनों ने ही ना नुकुर की पर आज, सबसे बड़े गर्व से बताते हैं, 'बड़ा वाला विदेश है न।' जब कोई पूछता, कहाँ ? तो बताते, ऑस्ट्रेलिया में मेलबर्न में है।'
'आप अभी गए की नहीं। '
'वो तो रोज ही बुलाता है, देखते हैं अब तो कभी न कभी जाना होगा ही।'
बीच में टोकते हुए, उनके एक मित्र महेंद्र बाबू बोले, 'सुना है, ऑस्ट्रेलिया बड़ी अच्छी जगह है। मेरा बेटा वहां होता तो अब तक चूकता नहीं, एक बार जरूर घूम आता। वैसे कोई कहां जा पाता है! इतना महंगा देश, भारत का  वेतनभोगी तो सोच भी नहीं सकता कि अपने खर्चे पर विदेश घूम आये। विदेश में अगर कोई अपना रहता हो तथा रहने और खाने की व्यवस्था हो तो घूमना फिरना आसान है ।'
'हाँ, समीर कहता तो है। देखो इस बार गर्मियों में जाने का विचार हो रहा है। समीर कहता है जब यहाँ गर्मी पड़ती है तो वहां ठंडक। प्रकृति का यह भी अचम्भा देख कर आएंगे।'
समीर ने उनका मई के महीने का टिकट करवा के भेज दिया।  चुकि बेटा वहां था ही, रहने, खाने और घूमने की ठाकुर साहब को कोई परेशानी नहीं थी।  ठाकुर साहब की उड़ान सिंगापुर होकर जानी थी। दिल्ली से सिडनी की सीधी उड़ान में लगभग १३ घंटे लग जाते। सीधी उड़ान में एक तो टिकट महँगी, दूसरे बारह तेरह घंटे एक ही जगह बैठे रहो। बदल कर जाने में दो तीन घंटे अधिक लगे, पर कम किराया के साथ बीच में थोड़ा चहलकदमी करने और सुस्ताने का अवसर भी मिल गया। 

हवाई अड्डे पर समीर कार लेकर आ गया था।  हवाई अड्डे से चलते ही गाड़ी दनादन सत्तर अस्सी की गति से दौड़ने लगी। वहां की साफ सफाई और गाड़ियों की गति देख कर ठाकुर साहब आश्चर्य चकित थे । सडकों  पर न तो कहीं कूड़ा दिख रहा था, न ही पटरी पर दुकानदारों का कब्ज़ा।  पैदल चलने वालों के लिए, पटरी पूरी तरह से उन्हीं के लिए समर्पित और एकदम स्वच्छ। सभी गाड़ियां अपनी लेन में ही चल रही थीं। सड़क पर खींची रेखा का पालन लक्ष्मण रेखा की भांति हो रहा था। कोई भी उसका उलंघन नहीं करता था। यह सब देखकर वे वहां की व्यवस्था की तुलना अपने देश से करने लगते। भारत के शहरों में पटरी पर न तो लोगों को चला सकते न चल सकते। यहाँ पटरी पर या तो दुकानदारों  का कब्ज़ा होता है या खोमचे वालों का।  कहीं कोई जगह खाली हो तो गाड़ी पार्क कर दी जाती है। और तो और ईंट रोड़ी की दुकान वालों का भण्डारण भी पटरी पर ही हो जाता है। कभी नेता लोगों के वोट बैंक का सवाल होता है, तो कभी अधिकारी कहते हैं गरीब की रोजी रोटी का सवाल है। मगर प्रश्न यह उठता है कि सब क्या व्यवस्थित ढंग नहीं किया जा सकता? हमारे यहाँ जितना नियमों का उलंघन करके कार्य हो, सरकारी कर्मचारियों की मुट्ठी गरम होती है, और नियम तोड़ने वालों की शान में वृद्धि। बिना पैसे दिए किसी ने नियम तोड़ लिया, तो वह उसे अपना अतिरिक्त आय समझता है। वहां तो गाड़ी से उतरने के लिए भी, यह नहीं था कि जहाँ मन आया, खड़ी कर दिया। केवल चिन्हित स्थानों पर ही गाड़ी रोक सकते हैं और निर्दिष्ट स्थल पर ही पार्क कर सकते हैं। अपने देश में तो गाड़ी खड़ी करके, सड़क के किनारे लघु शंका भी मिटा लो तो कोई समस्या नहीं।

सस्ते बाजार विदेशों में भी लगते हैं परन्तु निर्धारित स्थान पर ही, सड़क या पटरी पर कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होता और न ही कोई गन्दगी होती है। उसके कारण न तो यातायात वाधित होता है न ही निवासियों को कोई समस्या झेलनी पड़ती है।

ठाकुर साहब घर पहुंचे तो समीर का घर देखकर उनकी प्रसन्नता और बढ़ गयी। हरी घासों से सजा, बड़ा सा लान, चारों ओर से बाड़, एक किनारे पर गैराज में जाने का गेट। सीधे गैराज में गाड़ी घुसी। उन्हें लगा कि किसी बड़े रईस के बंगले पर आ गए हैं। घर में घुसने से पहले ही एक ओर रखे दो बड़े  कूड़ेदान रखे दिखे, एक पर लाल ढक्कन था दूसरे पर पीला।  ठाकुर साहब उधर देख ही रहे थे की उनका चार साल का पोता बॉबी अंदर से दौड़ा आया, ठाकुर साहब ने झट गोदी उठाया। 
'बाबा यू हैव कम ! ममा टोल्ड मी। दैट रेड वन इज़ फॉर नार्मल गार्बेज एंड येलो इज़ फॉर रेसाइक्लेबल थिंग्स।  (बाबा आप आ गए! मम्मा ने बताया था। उस लाल वाले कूड़ेदान में साधारण कूड़ा पड़ता है और पीले वाले में पुनः प्रयोग होने वाला। )
'वाह, कहाँ से सब सीखा? माय ग्रैंडसन!' 
'माय चाइल्ड केयर' (शिशु सदन में)
समीर ने स्पष्ट किया दोनों तरह के कूड़े के लिए अलग गाड़ी आती है।
ठाकुर साहब वहां के मौसम से भी बड़े रोमांचित थे।  मई के महीने में वहां का मौसम जैसे भारत का दिसंबर, जनवरी का मौसम हो। खूब ठण्ड, बिना गरम कपड़े के रह नहीं सकते थे। मई में भी रजाई ओढ़ते थे। ठाकुर साहब ने धरती पर मौसम की विविधताओं के बारे सुना तो था पर ऐसा पहली बार अपनी आँखों से देखा। 

समीर का बड़ा सा अच्छा घर देखकर, ठाकुर साहब को और अच्छा लगा। बहू ने घर को बड़े अच्छे तरीके से सजाया हुआ था। घर देखकर ठाकुर साहब ने गहरी सांस ली। उन्हें इस बात का बहुत बड़ा संतोष मिला कि समीर और बहू बड़े अच्छी तरह से रह रहे हैं। उस समय तो ठाकुर साहब भी नहीं चाहते थे कि समीर ऑस्ट्रेलिया आये पर उसका यहां आने का निर्णय सही था। जैसे ही वे सोाफा पर बैठे, बॉबी हाथ पकड़ कर, पिछले दरवाजे से पीछे के गार्डन में ले गया जहाँ समीर ने टमाटर और बैगन लगा रख था।
'बाबा, लुक टोमेटो।  माय डैड हैज ग्रोन। (बाबा देखिये टमाटर, मेरे पापा ने उगाया है )'
'ठाकुर साहब बोले हां अब तो मन लग जायेगा मेरे पास बॉबी भी होगा और ये किचन गार्डन भी।'


डॉक्टर

रेस्ट एरिया


No comments:

Post a Comment