Friday, 2 January 2015

Makan ki shifting मकान बदला


मकान बदला

वीरेंदर के मकान की लीज इस महीने पूरी हो रही है। मकान मालिक उसे और बढ़ाना नहीं चाहता, अतः इस महीने के अंत तक खाली ही करना है। वीरेंदर और नुपुर बड़ी चिंता में हैं, सब कैसे होगा।  सामान पैक करना, गाड़ी, मजदूर; यहाँ मजदूर भी सरलता से नहीं मिलते, एजेंसी के द्वारा लेना होता है और मजदूरी तो बाप रे, एक दिन की मजदूरी में अपने देश में पखवाड़े भर काम करा लो। वीरेंदर और नुपुर अभी हिसाब ही लगा रहे थे कि शिफ्टिंग में कुल कितना खर्च आएगा, इस महीने का तो बजट ही बिगड़ जायेगा, तभी कुलदीप का फोन आ जाता है ।
'हेलो'
'हां, वीरेंदर! कैसे हो?
'बिल्कुल ठीक और तुम कहाँ हो?'
 'मैं इधर से ही गुजर रहा था, अभी आता हूँ, तुम्हारे यहाँ चाय पीकर, जाऊंगा।'
'अच्छी बात है, आ जा, घर पर ही हैं हम।'
बस थोड़ी ही देर में कुलदीप आ धमका ।
आते ही नुपुर चाय बनाने में लग गयी। वीरेंदर ने कुलदीप से सामान की  शिफ्टिंग की बात शुरू कर दिया।
'यार ये एजेंसी वाले तो लेबर के बड़े पैसे मांग रहे हैं।'
'लेबर तो यहाँ है ही महँगी। तू लेबर क्यों कर रहा है! अरे सेल्फ ड्राइव वाली गाड़ी ले लेते हैं और हम दोस्त लोग मिल कर पैकिंग, शिफ्टिंग सब कर लेंगे। यहाँ तो हम लोग ऐसे ही करते हैं। मजदूरी के कौन इतने पैसे खर्च करेगा! तेरे लेबर लेबर के हजार डॉलर (पचास हजार रुपये) लग जायेंगे। इतने की तो पार्टी हो जाएगी।
'ये तो तू ठीक कह रहा है, फिर इस शनिवार और रविवार को और कोई कार्यक्रम नहीं बनाना।'
'तू चिंता मत कर, मैं सुनील, नवीन, विक्रम और सुरेश को भी बोल देता हूँ। देखते ही देखते तेरा सामान शिफ्ट हो जायेगा।'     
   
यूँ तो ऑस्ट्रेलिया में जॉब करने वाले कुछ ही समय में मकान ले लेते हैं, क्योंकि वहां आय अच्छी है और मकान खरीदने के लिए ऋण, सस्ता और सरलता से मिल जाता है। परन्तु जो लोग नए आते हैं, उन्हें शुरू में तो किराये पर ही मकान लेना होता है। यहां किराए के मकान के नियम व शर्तें बड़ी कड़ी होती हैं तथा इन्हें एजेंसी के द्वारा ही हैंडल किया जाता है। किराये के मकान में कील तक नहीं गाड़ सकते। भारतीय दीवारों पर, लोग आदतन कैलेंडर तो टांगते ही हैं, बिना किसी कैलेंडर या देवी, देवता, दृश्य या परिवार के सदस्यों के फोटो के बिना, दीवार सूनी लगती  है। ऑस्ट्रेलिया में यह एक सपना भर रह जाता है। यदि फोटो सजाना ही है तो उसे मेज या रैक पर रखकर, या वैक्युम वाली खूंटी से ही दीवार पर लटका सकते हैं। मकान जिस दशा में लिया है उसी हाल में वापिस भी करना होता है, अन्यथा दण्ड भरना पड़ सकता है, जो कि जमानत की राशि से काट ली जाती है। और तो और, मकान बदलने की समस्या भी बड़ी विकट है। मजदूर बहुत महंगे होते है, अतः सामान को पैक  करने और ले जाने में अधिक से अधिक कार्य स्वयं करना पड़ता है। 

वीरेंदर ने मकान बदलने का दिन शनिवार निश्चित कर लिया था। कुलदीप की मदद से सभी मित्रों को सूचित कर दिया गया। निश्चित समय पर सभी एकत्र हो गए। कहते हैं न 'ग्यारह की लाठी एक का बोझ।' हाथों हाथ सारा सामान पैक हो गया और गाड़ी में रख दिया गया। सभी के पास अपनी गाड़ी तो थी ही, थोड़ा थोड़ा करके मित्र मंडली ने बहुत सा सामान तो अपनी अपनी गाड़ी से ही पहुंचा दिया गया। केवल वह सामान जो गाड़ी ने नहीं अंट पाया, सेल्फ ड्रिवेन (स्वयं चलाने वाली) किराए पर ली हुई गाड़ी से ले आया गया। ये सभी मित्र उच्च पदस्थ कार्यरत थे, और अच्छी आय अर्जित करने वाले थे किन्तु अपना काम करने में किसी को कोई संकोच नहीं। यह देख कर मुझे अपना बचपन का गांव याद आ गया। जब मैं छोटा था, गांव में रहता था, लोगों के मकान एक दूसरे के सहयोग से ही बनते थे। लोगों में इतना अपनापन था कि कुछ सामान यानि बांस, बल्ली परस्पर सहयोग से जुटा लिया जाता था। बस खपड़ैल कुम्हार से खरीदा जाता था, या बुलवाकर पथवा लिया जाता था। बिना अधिक खर्च के रहने लायक मकान, सरलता से बन जाता था। छप्पर डालने के लिए भी जिनके पास पत्ते, पुआल होते, थोड़ा थोड़ा सभी दे देते, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को भी परेशानी नहीं होती थी। बस छप्पर छाने के लिए कुशल मजदूरों की आवश्यकता होती, और छप्पर उठाने के लिए पूरा गांव एकत्र हो जाता था।  इस काम में कोई अमीर, गरीब, जाति धर्म का भेद नहीं होता था।  

उसी प्रकार की सहयोग की भावना यहाँ देखने को मिली। मित्र मंडली गपशप करते शफ्टिंग का काम भी कर देती ली और अवसर का भरपूर आनंद भी उठायी। यह कार्य उन्हें किसी पिकनिक से कम नहीं लगा। इस प्रकार एक का बोझ कइयों के लिए लाठी के भार जैसा हो गया। आपसी सहयोग से यह कार्य बड़ी सरलता से पूरा हो गया और वीरेंदर की टेंशन तथा काफी पैसे भी बच गए। कार्य संपन्न होने पर यह जुटी मंडली एक पार्टी में परिवर्तित हो गयी। हंसी-मजाक, खाना-पीना और रौनक के साथ, एक छोटा मोटा उत्सव संपन्न हो गया।  

    

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