Saturday, 28 March 2015

Bachche ki pooja


बच्चे की पूजा

दादा को आये दो महीने बीत चुके थे। चार साल का सचिन दादा से घुल मिल गया था। जब वह शिशु सदन से आता तो दादा से इंडिया की बातें करता और सुन कर बड़ा रोमांचित होता। दादा प्रातः नहा धो कर पूजा पर बैठते तो वह भी साथ बैठ जाता। विजय ने घर में पूजा के लिए अलग स्थान बना रखा था। सचिन को पूजा स्थल पर रखे, सभी देवताओं की पहचान भली भांति थी। दादा को सबके नाम बताता रहता, ये गणेश भगवान हैं, ये शंकर भगवान हैं, ये हनुमान जी हैं; तो दादा और चित्रों को दिखाकर पूछ लेते, ये कौन हैं? वो भी बता देता। तुम्हें कौन से भगवान सबसे अच्छे लगते हैं ? 'हनुमान जी। '
'हनुमान जी क्यों ?'
'वो सुपरमैन से भी ताकत वाले हैं और भगवन जी हैं। '
एक दिन दादा जी पूजा आरम्भ किये ही थे कि वह भी साथ बैठ गया और बड़ी उत्सुकता से पूजा की एक एक बात पूछने लगा।
'दीप क्यों जला रहे हैं ?'
'इससे भगवान् प्रसन्न होते हैं। '
जब अगरबत्ती जलाने लगते तो 'व्हाट आर यू डूइंग बाबा, यू आर गोइंग टु ब्रेथ द स्मोक (ये क्या कर रहे हैं बाबा, सांसों में धुंआ जायेगा)'
'हाँ, पर भगवान जी को सुगंध अच्छा लगता है। '
'ओ. के. (ठीक), पर स्मोक से तो अलार्म बज जायेगा और फायर वाले आ जायेंगे। '
दादा छत की ओर देखते हैं तो स्मोक डिटेक्टर (धुआं सूचक यन्त्र) लगा हुआ है। 'नीलम देखो तो बेटा, जरा इसे बंद कर दो। '
नीलम सारी खिड़कियां खोल देती है और एग्जॉस्ट चला देती है। 'ठीक है इतने से नहीं बोलेगा। '
'बाबा, पूजा से क्या होता है ?'
'भगवान जी खुश होते हैं, बुद्धि देते हैं, तुम भी हाथ जोड़ कर प्रार्थना करो और बुद्धि मांगो।'

सचिन ने नवरात्रों में बाबा को दुर्गा शप्तशती का पाठ करते देखा। उसे भी उत्सुकता होती कि वह किताब पढ़े, किताब में झांकता तो कोई चित्र आदि नहीं देख पीछे हट जाता। एक दिन नीलम खड़े खड़े ही पूजा स्थान पर दीप  जलाकर, हाथ जोड़े प्रार्थना कर रही थी। सचिन मम्मी का कुर्ता खींच कर कहने लगा - 'मम्मी वैसे करो जैसे बाबा करते है। '
'बाबा कैसे करते हैं ?'
'किताब से।'
'नहीं वैसे बड़े लोग करते हैं ' कह कर बात को टाला। सचिन जिद्द करने लगा नहीं किताब पढ़ो और मुझे भी पढ़ना सिखाओ। '
नीलम चक्कर में पड़ी, उसे मन ही मन हंसी भी आ रही थी।  दुर्गा शप्तशती आज तक तो कभी पढ़ी नहीं तो वह बच्चे को कैसे समझाए।  'अभी बाबा टहलने गए हैं। आएंगे तो तुम बाबा के साथ पढ़ लेना। '
बाबा के आते ही सचिन जोर से उन्हें पकड़ लिया। 'बाबा बाबा मुझे पूजा करनी है। '
'मम्मी के साथ कर लो।'
'नहीं आप के साथ करनी है, किताब से। '
यह सुनकर दादा गदगद हो गए, 'अच्छा ठीक है, जब मैं  करूंगा तो मेरे साथ कर लेना। '
दादा जी नीलम से कह रहे थे कि पार्क की ओर गया था, कहीं फूल नहीं दिखा। सचिन तपाक से बोला, 'मेरे शिशु सदन के लान में बहुत से फूल हैं, मगर मैडम बोलती हैं फूल तोड़ना गलत है। '
अगले दिन सचिन शिशु सदन से एक गुलाब का फूल लेकर आया और दादा जी को दे दिया। दादा जी चौंके, यह क्या? क्यों तोड़ लाये ? तुम्ही कह रहे थे न फूल तोड़ना गलत है। '
'बट आई आस्कड मैडम, टोल्ड हर आई नीड अ फ्लावर फॉर माय ग्रैंडपा एंड शी गेव वन' (मैंने मैडम से बोला, मेरे बाबा को फूल चाहिए तो उन्होंने तोड़कर ये दे दिया।) 
कुछ दिनों में दादाजी ने श्री दुर्गा शप्तशती का मुख्य मंत्र व गायत्री मंत्र सचिन को सिखा दिया। सचिन का जन्म अमेरिका में ही हुआ था अतः वह विदेशी नागरिक हो गया था। दादा जी उसे अपने ये मंत्र सिखाकर बड़े गौरवान्वित अनुभव कर रहे थे। विजय और नीलम भी जब किसी भारतीय के यहाँ जाते या कोई उनके यहाँ आता तो वे सचिन को गायत्री मंत्र सुनाने को अवश्य कहते और सचिन स्पष्ट व शुद्ध उच्चारण के साथ मंत्र सुना देता तो वे सभी चंभित होते और मम्मी पापा गर्वित।   

फूल 

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