Friday, 3 July 2015

Paalatoo beta


पालतू बेटा 

सीमा, काम वाली की प्रतीक्षा कर रही थी।  बताओ, ये टाइम हो गया और वह अभी तक नहीं आई।  बड़बड़ाते हुए घर के गेट से, दाएं बाएं झांकने लगी। कामवाली कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहीं थी। सोची कि लगे हाथ पड़ोस से पूछ कर आये, वहां भी यही काम करती है। तभी किसी के सिसकियों की आवाज आयी। देखी तो घर के चारदीवारी पास रखे गमलों के बीच बैठा एक बच्चा रो रहा है। उससे पूछी, 'क्यों रो रहे हो?' कोई उत्तर नहीं मिला। कहाँ से आये हो, क्या नाम है; किसी भी बात का उत्तर नहीं मिल रहा था। वह बस रोये जा रहा था।  इतने में कामवाली दिख गयी।
'अरे, कुसुमा! जल्दी आ, देख तो यह पता नहीं कौन है, यहाँ बैठ कर रो रहा है। चल अंदर बुला ले, अंदर ही पूछते हैं। '
कुसुमा उसे लेकर घर के अंदर आई। उससे बार बार पूछा, कहां से आया है? नाम क्या है? पिता का नाम क्या है? किसी बात का उत्तर नहीं दे रहा था। भूख लगी है? उसने हाँ में सिर हिला दिया।
कुसुमा, 'देख रोटी सब्जी पड़ी है, लाकर इसे खिला दे।' 
कुसुमा ने रोटी सब्जी लेकर दिया, वह चुप चाप, बड़े मगन से खा लिया। दो रोटी खाने के बाद पूछा, 'और खाओगे?' बच्चे ने हां में सिर हिला दिया। कुसुमा ने एक रोटी और दिया, जिसे वह खा लिया।
सीमा, कुसुमा से कहने लगी, 'इतना छोटा बच्चा! लगता है, माँ बाप से बिछुड़ गया है।'
'मुझे  तो लगता है डांट खाकर घर से भाग गया होगा। जब कहीं खाने को नहीं मिला होगा तो भूख से तड़पकर कर रो रहा था।'
'चल अभी इसे सामान्य होने दे फिर पूछते हैं, क्या बात है। जा, तब तक फ्रिज में से एक गुलाब जामुन ले आ और इसे खिला दे।'

गुलाब जामुन खाकर उसका मन पुलकित हो गया। इससे पहले, न जाने कब ऐसा स्वादिष्ट व्यंजन खाया होगा। उसे बैठक में छोड़कर सीमा और कुसुमा अपने अपने काम में व्यस्त हो गयीं। वह बच्चा फर्श पर पड़ा ही सो गया। लगभग एक घंटे के बाद सीमा ने उसे जगाकर फिर पूछा, 'कुछ खाओगे?'
इस बार उसने बोल दिया, 'नहीं।'    
'कहाँ से आये हो?'
'चाचा के घर से।'
'चाचा कहाँ  रहते हैं?'
'बहुत दूर'
'चलो तुम्हें तुम्हारे चाचा के घर छुड़वा देते हैं।'
यह सुनकर वह फिर रोने लगता है। अब तो सीमा बड़े संकट में पड़ गयी, आखिर उसे घर से निकाले कैसे? कुसुमा ने कहा, 'मेम साहब, इसे अपने यहाँ रख लीजिए। इसके माँ बाप एकाध दिन में आएंगे तो ले जायेंगे। नहीं तो नौ दस साल का तो होगा ही, घर का कुछ काम कर लिया करेगा।
'अरे, अभी छोटा बच्चा है, ये क्या काम करेगा!'
'नहीं मेम साहब, इतनी ही बड़ी मेरी बेटी है, घर के कई सारे काम कर लेती है। इसको भी सिखा देंगे।'

दिन निकल गया, शाम तक उसके किसी परिजन का कोई सूत्र नहीं मिला। ये लोग, अटकल लगाते रहे कि घर से भाग गया होगा, कहीं माँ बाप से बिछुड़ गया होगा, कोई अपहरण करने के बाद छोड़ दिया होगा। कारण कुछ भी हो, सीमा और उसके पति साहू जी ने यही निर्णय लिया कि वह अनाथ है, और उसे अपने यहाँ शरण देना ही उचित रहेगा। धीरे धीरे घर के काम सीख लेगा तो उन्हें ही आराम रहेगा। अपना बेटा सुमेर तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके कहाँ काम करेगा, क्या पता! यह रहेगा तो छोटे मोटे काम में मदद करेगा ही। साथ ही यस भी डर सता रहा था, पता नहीं कौन है, इसके यहाँ आने के पीछे किसी की कोई चाल न हो, या अपहरण करके बाद में कोई छोड़ गया हो और हम पुलिस के झमेले में पड़ें। सावधानी बरतते हुए साहू जी ने पास पड़ोस को बता दिया कि उनको एक लावारिस बच्चा मिला है, यदि कोई ढूंढें तो बता देंगे। साहू जी और सीमा उसे रामफेर कहकर बुलाने लगे।

साहू जी के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी, साथ ही वे पति पत्नी दोनों बड़े अच्छे स्वाभाव के थे। वे उस बच्चे के खाने पीने का ध्यान देने लगे। उसके लिए नए कपडे भी खरीद लाये। एक सप्ताह में तो उसकी रंगत ही बदल गयी। एक सप्ताह के पश्चात साहू जी के घर एक व्यक्ति आ टपका। घंटी की आवाज सुनकर जैसे ही सीमा ने दरवाजा खोला; उसने पूछा, 'घूरन यहीं रहता है।'
'भईया ये तो पता नहीं घूरन है कि कौन है। हाँ, एक आठ नौ वर्ष का लड़का एक हफ्ते पहले आया था, तबसे वह यहीं है। वह अपना अता पता ठीक से नहीं बता रहा है नहीं तो उसे उसके घर भिजवा देते। बुलाती हूँ, खुद ही देख लो कौन है।'
सीमा ने बुलाया 'रामफेर।'
वह दौड़ा आया।  जैसे ही उस व्यक्ति को देखा, चिल्लाता अंदर भाग गया 'मुझे नहीं जाना इनके साथ।' बात-चीत से पता चला कि वह व्यक्ति घूरन का चाचा था। घूरन के माता पिता दोनों की मृत्यु हो चुकी थी।  इसलिये उसके पालन पोषण की जिम्मेदारी चाचा पर आ गयी थी। घूरन के साथ चाचा चाची का वर्ताव अच्छा नहीं था। बात बात पर वे उसे मारते पीटते थे, इसीलिए वह घर से भाग गया था। उन्होंने उसे बहुत ढूंढा, तब जाकर पता चला कि वह यहाँ है। सीमा ने रामफेर को समझाया कि वह अपने चाचा के साथ चला जाय पर वह जाने को तैयार ही नहीं था। वह चिल्ला चिल्लाकर कहने लगा, 'मुझे नहीं जाना ये मुझे मारते हैं।' शायद घूरन के मन में यही चल रहा था, उसके चाचा चाची उससे काम भी लेते हैं और भर पेट भोजन तक नहीं देते, उस पर भी प्रताड़ना। इससे अच्छा तो इन लोगों के यहाँ रहना है, इतना अच्छा खाना पीना, जब  से आया है एक बार भी मार नहीं पड़ी। चाचा ने भी स्थिति को भांप लिया। मन ही मन सोचा, अच्छा मौका है, घूरन को यहीं छोड़ देते हैं, अच्छा घर द्वार है, अच्छे लोग हैं। इसकी जिंदगी चैन से कटेगी और खुद की भी पालने पोषने से जान छूटेगी। चाचा ने कह दिया, 'अगर यहाँ खुश है तो यहीं रख लीजिए। आपके घर का थोड़ा बहुत काम भी कर देगा। इसके काम के पैसे मुझे दे दिया करना।'
सीमा के मन में भी यही चल रहा था। किन्तु पैसे देने की बात वह नहीं मानी। 'भैया अभी यह काम करने लायक कहाँ है, अभी इसे सिखाएंगे तो हो तो काम करेगा। अभी तो खाना कपड़ा ही देंगे। साल, दो साल बाद पैसे की बात सोचेंगे। पैसे देने की जगह इसे पढ़ाने की कोशिश करेंगे। खैर, घूरन का चाचा लौट गया। फिर दुबारा किराया भाड़ा लगाकर आना उसके लिए आना कठिन था। 
इधर साहू जी ने उसका नाम सरकारी स्कूल में लिखवा दिया, मगर रामफेर का पढ़ने में जी नहीं लगा। पढ़ने पर वे जोर न दें, इसलिए घर का काम दौड़ दौड़ कर करता। साहू जी के यहाँ का खाना-पीना, सुख-सुविधा देखकर तो उसे स्वर्ग सा लग रहा था। इतना सब तो सपने में भी नहीं सोच सकता था। वहां वह बहुत प्रसन्नता से रहने लगा। वह साहू जी और उनकी पत्नी को पापा मम्मी ही कहता। कुछ और बड़ा हो गया तो उसे इस बात का तनिक भी एहसास नहीं था वह कहीं बाहर से आया है। सीमा और साहू जी भी उसे प्यार करने लगे और अपने बेटे की तरह ही मानने लगे। पांच छः वर्ष ही बीते थे कि घूरन के चाचा चाची भी चल बसे थे। अब तो घूरन की खोज खबर लेने वाला कोई भी नहीं था।  

साहू जी और सीमा सबसे कहते, मेरे तो दो बेटे है सुमेर और रामफेर।   सुमेर तो बड़ा था ही और ऊपर से असली बेटा, वह मटरगस्ती करता रहता।  घर का कोई भी काम होता, रामफेर को सौंप दिया जाता। रामफेर को इस बात का एहसास था कि वह काम की बादौलत ही यहाँ है, इसलिए उसे यह सब भार सा नहीं लगता। वह मगन होकर सब काम करता। उसे तो इतना ही बहुत था, सबके जैसा खाना, पहनना और रहना मिल रहा था। साहू जी बातों से, उसे बार बार एहसास दिलाते रहते कि रामफेर को सुमेर से तनिक भी कम प्यार नहीं करते।  वैसे तो सुमेर के पुराने कपड़ों से भी उसका काम चल जाता, पर साहू जी समय समय पर उसे भी नए कपडे खरीद देते ताकि उसे किसी प्रकार से अलग व्यवहार का एहसास न हो। उनकी पास पड़ोस, सगे-सम्बन्धी सब जगह प्रशंसा होने लगी। देखो कहां का किसका लड़का, उन्होंने अपने बेटे के जैसा रखा है। 

रामफेर के रहने से साहू जी और सीमा को बड़ा सुख मिलता। और तो और सुमेर भी कभी घर आता तो अपने काम में उसे लगा देता। बाजार आदि से कोई सामान लाना होता, उसे दौड़ा दिया जाता। सब्जी वगैरह साफ करके काट देता, कपड़े धोने, सुखाने का काम उसी का था। जहाँ साहू जी के परिवार को आराम था, ये सब काम करने में रामफेर को भी मजा आता ताकि कोई पढ़ने के लिए न कहे। इधर, सुमेर पढ़ लिख कर, नौकरी करने लगा और उसकी शादी हो गयी। जवान तो रामफेर भी था, सीमा ने सोचा उसकी भी शादी कर दें ताकि घर के भीतर का काम उसकी पत्नी कर दिया करे और बाहर का स्वयं रामफेर। एक दिन सीमा ने साहू जी के समक्ष यह प्रस्ताव रख दिया कि रामफेर की भी किसी गरीब दुखिया की लड़की से शादी कर देते हैं। शाहू जी ने उसे समझा दिया, उसकी बीबी आएगी तो उसे भी अपने घर में ही रखना पड़ेगा। अभी तो रामफेर कहीं भी कैसे भी रह लेता है जब उसका परिवार हो जायेगा तो उसके लिए रहने का अलग से स्थान देना पड़ेगा और इसका भी ध्यान अपने परिवार में ही रहेगा। रामफेर ने यह बात सुन लिया। वह मन ही मन एक लड़की को चाहता भी था, सोचा अच्छा हुआ बात अभी ज्यादा आगे नहीं बढ़ी है। रामफेर के लिए हर चीज से ऊपर मम्मी पापा की इच्छा थी।

एक बार  फिर से साहू जी का पुराना रोग अचानक उभर आया। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, बीमारी गम्भीर थी, उन्हें खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ गयी। सुमेर इतनी छुट्टी कैसे लेता। जाँच की गयी तो रामफेर के खून का ग्रुप साहू जी से मेल खा गया। रामफेर ने अपना खून दिया, साहू जी उस समय तो ठीक हो गए, पर डॉक्टर ने साहू साहब की विस्तृत जाँच के लिए बोल दिया और साथ ही ऑपरेशन की आशंका भी व्यक्त की। जब उनकी विस्तृत जाँच हुई तो साहू जी पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। पता चला कि साहू जी बीमारी ने गंभीर रूप ले लिया है, और उसका आपरेशन यथाशीघ्र करना पड़ेगा। अब साहू परिवार की और से रामफेर के प्रति प्यार और आदर बढ़ गया था। सभी लोग कहते, 'रामफेर तो साहू जी के लिए भगवान बनकर आया है, ये था तभी उनकी जान बची, वरना जाने क्या होता। सुमेर तो नालायक है, उसे पिता की बीमारी में भी छुट्टी नहीं मिलती। अब तो वह बीबी को छोड़कर माँ बाप की देखभाल कहाँ करने वाला।' यह सब बातें रामफेर को खुश कर देतीं और साहू परिवार के लिए सब कुछ लुटा देने के लिए उमंग भर देतीं।

साहू जी को पता था कि आपरेशन के समय रामफेर ही काम आएगा। ऑपरेशन की बात होने के बाद, रामफेर के लिए प्यार बढ़ जाना स्वाभाविक था। उसके जन्म दिन पर सौगात के रूप में मोटरसाइकिल पहले ही मिल गयी थी, वैसे उसका उपयोग घर के काम निबटाने में अधिक होता था। वह सामान वगैरह लाने के लिए, परिवार के ही काम आती। रामफेर मोटरसाइकिल का क्या करता, उसे घूमने फिरने के लिए समय ही कहाँ मिल पाता। अब खाने पीने में साहू जी व उनकी पत्नी अपनी पसंद को छोड़, रामफेर की पसंद पूछते। इतना प्यार संभवतः उसके सगे माँ बाप होते तो भी कभी नहीं मिलता। रामफेर की मान मर्यादा बहुत बढ़ गयी थी। घर के हर काम में उससे सलाह ले जाती।  रामफेर को पूर्णतः एहसास हो चुका था कि वह सुमेर का छोटा भाई है। 

अब आपरेशन का समय आ चुका था। बस एक सप्ताह बाद ही आपरेशन होना था। बीमारी का भेद खोला गया। घर में चर्चा होने लगी, साहू जी का एक गुर्दा ख़राब है, और उसे बदलना पड़ेगा। गुर्दा कहाँ से लाएं? नियमानुसार कोई सगा सम्बन्धी ही गुर्दा दे सकता था। गुर्दा कौन देगा, कहाँ से आएगा। सुमेर की पत्नी तो उसे पहले ही कह चुकी थी, 'कहीं गुर्दा देने के लिए हां नहीं कर देना।'
फिर भी दिखावे के लिए सुमेर ने अपना गुर्दा देने को बोल दिया। उसकी माँ तुरंत बरस पड़ी, 'तुझे नौकरी करनी है, इतनी छुट्टी कहाँ मिलेगी, अभी नई नई शादी हुई है। इसी उम्र में गुर्दा निकलवाएगा, अभी पूरी जिंदगी पड़ी है।' उसको समझा बुझा कर शांत कर दिया। आगे बोली, 'सुना है अस्पताल में दलाल होते हैं, पैसे से जुगाड़ हो जाता है। पैसे ही तो लगेंगे। चल खोज बीन कर, दलाल का पता लगा।'  
'मगर इसके लिए काफी पैसे लगेंगे, आखिर दानी भी ऐसा लाना है कि फेल न हो।'
'कितने लग जायेंगे। ' सीमा ने पूछा। 
'यही कोई आठ दस लाख तो लग ही जायेंगे। वो भी गारंटी नहीं को स्वीकार भी हो जाय। केवल सगा संबंधी ही गुर्दा, दान कर सकता है।'
सीमा थोड़ी एक्टिंग करते हुए बोली, 'बताओ आठ दस लाख गुर्दे का, और उसके ऊपर ऑपरेशन का खर्च होगा। मगर यहाँ पापा के जान का सवाल है। कुछ तो करना ही पड़ेगा। मैं अपने जेवर बेच दूंगी, देखते हैं उसका क्या मिलता है। '
फिर रामफेर की ओर देखते हुए, 'रामफेर भी तो हमारा सगा बेटा ही है! हम्हीं ने तो पाल पोष कर इसे बड़ा किया है, आखिर किस दिन काम आएगा । ये अपना खून तो दे ही चुका है।'

रामफेर को इस स्थिति का पहले से ही अनुमान था। वह आगे बढ़कर बोला, 'मम्मी, अपने ने तो मेरे मुंह की बात छीन ली।' रामफेर तो साहू परिवार के लिए प्राण तक देने को तैयार था। मगर उसे ऑपरेशन के नाम से बहुत डर  लगता था। फिर भी उसने इस बात को अपना सौभाग्य  ही समझा और स्वयं को समर्पित कर दिया। 


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