Tuesday, 11 August 2015

Mini ki chay

मिनी की चाय

दीनानाथ जी, शाम को रिसोर्ट के आस पास चहल कदमी कर रहे थे ।  छोटी पहाड़ियों के मध्य कई एकड़ में फैला, हरा भरा पार्क, अत्यंत रमणीय स्थल, एक उसी पार्क के एक और सुन्दर प्रकृति की गोद में स्थित सुन्दर सा भवन, यहीं पर दीनानाथ व उनका परिवार ठहरा था। पार्क में आकर घास चरते कंगारू, उसकी शोभा को चरम पर पंहुचा रहे थे ।  पर्यटन के लिए गए सदस्यों का वहां से जाने का जी ही नहीं होता था। दीनानाथ टहल कर, रिसोर्ट के हॉल में पहुंचे तो लोग चाय पी रहे थे।  लड़कियां चिल्लाने लगीं, अरे, अंकल आ गए, अंकल को चाय लाओ।
चाय की सभी प्रशंशा कर रहे थे, मिनी बहुत अच्छी चाय बनाई है। पीछे  से  उनकी पत्नी की आवाज आई -
चाय तो समाप्त हो गयी। रूको, मैं  अभी बना देती हूँ।
इतने में मिनी भी अपने कमरे से बाहर आ गयी। आते ही पूछी, अंकल चाय पी लिया ?
'मुझे कहां मिली, तुम्हारी ऑन्टी बना रही हैं।' उन्होंने बोला ।
'हा!' मिनी अफसोस करने लगी।
'अरे! अंकल को चाय नहीं मिली, अब तो ऑन्टी ने बना भी दिया।  अच्छा अंकल, सवेरे, आप की चाय मैं बनाउंगी।'
'ठीक है', उन्होंने भी बोल दिया।
सुबह हुई, समूह में पांच छ लोग ऐसे भी थे जो उम्र की तीसरी अवस्था में प्रवेश पा चुके थे, वो जल्दी उठ गए थे।दीनानाथ भी अपनी स्वर्ण जयंती ५ वर्ष पूर्व मन चुके थे। सात बजे तक चाय बन कर तैयार थी। दीनानाथ मुंह धोकर चाय की प्रतीक्षा करने लगे । कुछ देर तक चाय नहीं आई तो वे अपने कक्ष से निकलकर हॉल में चले गए ।  तब तक मिनी की मम्मी चाय लेकर आ ही रही थीं   -
'लीजिये, भाई साहब! चाय।'
'अरे, भाभी जी ! आप ! मिनी कहाँ है?'
'अभी सो रही है, रात को बच्चे सब देर से सोये थे  न।'
'हा, हा,  वो बोली थी, सुबह की चाय मैं बनाउंगी। ठीक है, सोने दीजिये।'
जब सोकर मिनी उठी तो देखते ही पूछी, 'अंकल चाय पी लिया ?'
दीनानाथ बोलें, उससे पहले ही उसकी मम्मी ने उत्तर दे दिया, हाँ पी चुके, वो केतली में पड़ी है तू भी ले के पी ले।
अत्यंत ही खुशनुमा महौल में पिकनिक समाप्त हुयी।  सभी ने दृश्यावलोकन से खाने पीने तक, सब चीज में बड़ा ही आनंद उठाया।  सब वापस घर को चले, मिनी को पुनः  चाय बनाने का अवसर ही नहीं मिला। और दीनानाथ को  मौका मिल गया मिनी को छेड़ने का। चलते चलते मिनी को बोल ही बैठे - 'तुमने तो चाय पिलाई ही नहीं।'
'हाँ अंकल, आपकी चाय उधार रही।  आपको, अपने घर पर चाय पिलाऊंगी।'
'चलो ठीक है।' बोलते हुए अपनी कार की और बढ़ गए ।
लगभग महीना भर बीता था दीनानाथ को मिनी के घर जाने का अवसर मिला।  उसने कई मित्र परिवारों को रात्रि के भोजन पर बुला रखा था।  बेटे- बहू के साथ वे भी सपत्नी उसके घर पहुंचे। मिनी के स्वागत की शैली मन मुग्ध कर देने वाली थी।  ऐसा लगा कि कोई अपना सगा बहुत समय बिछुड़े रहने के पश्चात मिला हो।

'अरे, अंकल! आ गये', आकर पैर छूई और बगल में सट के खड़ी हो गई।  दीनानाथ ने अपना हाथ उसके कंधे  पर रख दिया।  ऐसा प्रतीत हुआ कि उससे कितना पुराना और घनिष्ठ सम्बन्ध है।  उसके आव-भाव और व्यव्हार ने, एक दो सम्पर्क में ही उन्हें अपना बना लिया था।
'अंकल आईये।'
वह हाथ पकड़ कर घर के पीछे वाले लॉन में ले गयी जहाँ सभी लोग बैठे थे। वहां ड्रिंक का कार्यक्रम पहले ही शुरू हो चुका था। जाते ही लड़के चिल्ला पड़े, आईये अंकल! आईये! कौन सा ड्रिंक लेंगे ?  पिंकी के मम्मी पापा अलग सोफे पर बैठे हुए थे, दीनानाथ को बुला लिए। भाई साहब मेरे साथ ज्वाइन  करेंगे।  खाना पीना देर रात तक चला।
मिनी दीनानाथ से आग्रह की - 'अंकल, अंशु को जाने दीजिये, आप आज यहीं रूकिये और कल सुबह चाय नाश्ता करके जाईये।  मैं आप को घर छोड़ आउंगी। '
'नहीं बेटा, चला ही जाता हूँ। '
मिनी बाहर छोड़ने आई। 'अच्छा अंकल बाय! आपकी चाय उधार रही।'
'कोई बात नहीं बेटा, कभी भी आकर पी लूँगा।'
उसके थोड़े ही दिन पश्चात दीक्षा ने सभी मित्र परिवारों को डिनर पर बुलाया। मिनी का परिवार भी वहां आया। मिनी देखते ही शीघ्रता से समीप आई पैर छुई और अपना वादा दोहरा दिया -
'अंकल आप की चाय उधार है।'
'अरे, चाय हो गयी या जाने कोई बहुत बड़े ऋण का भार हो गया।  चाय तो कभी भी तुमसे बनवा कर, पी लेंगे।'
उसके बाद भी मिनी कई बार किसी के घर, अथवा बाहर किसी अवसर पर उनसे मिली और अपनी चाय के दायित्व का स्मरण कराती रही । अब तक लगभग छ महीने बीत चुके थे, अंततः मिनी का निश्चित निमंत्रण लिए फोन आ ही गया -
'अंशु ! कल अंकल और  आंटी को लेकर, चाय पीने आ जा।'
'कल सुबह तो पापा मम्मी की इंडिया की फ्लाइट है।'
अब मिनी के पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी, उसके अफसोस का ठिकाना ही न रहा।  'बताओ इतने दिन हो गए अंकल को मैं चाय भी नहीं पिला पाई।  अच्छा अंकल से बात करा। '
अंशु ने दीनानाथ को फोन थमा दिया।
'सॉरी अंकल, आप की चाय तो ड्यू ही रह गयी।  इतने दिन हो गए, मैं आप को अपने हाथ की चाय भी नहीं पिला सकी ।'
'कोई बात नहीं बेटा इतना कुछ तुम्हारा खाया पिया, कितनी बार तो तुमने भोजन कराया, सब तुम्हारा ही तो खा पी रहे हैं। वैसे भी दो महीने के बाद फिर वापस आना है तब पी लूँगा।'
मिनी प्रसन्न हो गयी, अच्छा वापस आ रहे हैं! चलिए ठीक है, फिर तो एक नहीं दो चार बार पिलाऊंगी।

दो महीने बाद दीनानाथ इंडिया से वापस पुनः सिडनी आये।  और कुछ दिन के बाद मिनी का जन्म दिन था। उसने अपने जन्म दिन पर सभी मित्र परिवारों को डिनर पर आमंत्रित किया।  डिनर सिडनी के एक बहुत अच्छे रेस्तरां में था।  अच्छा स्वादिष्ट भारतीय व्यंजन, सबने ही भोजन की प्रशंशा की ।  उसके पश्चात केक काटने का कार्यक्रम चला। मिनी एक प्लेट में केक का टुकड़ा लेकर आई  और अपने हाथ से उठाकर दीनानाथ के मुंह की ओर बढ़ाया। केक मुंह में लेते ही, उनका ह्रदय विह्वल हो आया। लगा आँखों से अश्रु छलक आएंगे। अपने भावनाओं को छुपाने के लिए वे बोले -
'और मेरी चाय!' हा, हा, हा
मिनी भी हंस पड़ी, जैसे लगा फूल झड़ रहे हों -
'हाँ अंकल, आप की चाय ड्यू है।'
वे भी विनोदपूर्ण भाव में बोले - 'चाय फिर देखेंगे, अभी केक का स्वाद लेने दो।'
समय बीतता गया।  मिनी कई बार मिली, कभी किसी के घर पार्टियों में या पिकनिक पर। यहाँ सिडनी में भारतीय मूल के लोगों ने बड़ी सुन्दर व्यवस्था बना रखी है कि वे सप्ताहांत समूह में कहीं परस्पर मिल लेते हैं ।
इससे परस्पर प्रेम और सहयोग की भावना बनी रहती है। मिनी जब भी दीनानाथ को देखती, चाय के उधार होने की बात अवश्य कहती। उधार चाय की बात उसके मन में इतनी घर कर गयी थी की कोई बैंक के ऋण की किश्त भी इतनी तन्मयता से नहीं याद रखेगा ।

धीरे धीरे दीनानाथ के वीसा का समय समाप्त होने को आया और इंडिया वापस जाने का समय समीप।  जब मिनी को पता लगा कि वे वापस इंडिया जाने वाले हैं तो उसने आने वाले रविवार को विशेष तौर से चाय पर आमंत्रित किया।  उनकके साथ दो और भी परिवार आमंत्रित थे।
रविवार आ गया लेकिन मिनी की चाय अभी दीनानाथ से दूर थी। उसी दिन अचानक उनकी तवियत बिगड़ गयी जिस कारण चाय पार्टी में वे जा ही नहीं सके । चुकि कार्यक्रम पहले से तय था और दो अन्य अंकल औंटी भी आने वाले थे, दीनानाथ की पत्नी व बेटे-बहु उन्हें घर पर ही छोड़ कर मिनी के यहाँ गए । 
उनके वहाँ पहुंचते ही मिनी का फ़ोन आया - 'अंकल आप के लिए ही मैंने चाय की पार्टी रखी और आप ही नहीं आये।'
'क्या करें बेटा, लगता है तुम्हारी चाय अभी भाग्य में नहीं है। मगर चाय की आड़ में जो कुछ मुझे मिल रहा है, उसका कोई मोल नहीं है।'
दीनानाथ अब बेटी होने के माधुर्य व सुख का एहसास करने लगे थे। वापस आने पर उनकी  श्रीमती जी ने बताया, जितनी बार चाय का कप मुंह लगाने के लिए उठाया होगा, मिनी अंकल को याद की होगी।
अब तो वापस इंडिया जाने का समय आ गया और मिनी की चाय पीने का संयोग नहीं बन पाया।
जाने से पहले मिनी, परिवार के साथ मिलने आई। कुछ देर में ही उसे चाय की बात याद आई -
'अंकल आप की चाय!' हे राम ! मैं इस जन्म में पिला पाऊँगी कि नहीं। '
'अच्छा, अभी यहीं बना देती हूँ। कितने दिन तक यह कर्ज अपने सिर पर रखूंगी !'
तभी दीनानाथ की बहू बोल पड़ी, 'ये क्या अपनी चाय पिलाओ तब तो।  हमारी ही चाय हमें पिलाओगी ! यह तो उचित नहीं।' फिर तो मिनी का मुंह छोटा सा हो गया।   
'अंकल अब कब आएंगे?'
'अब क्या पता पुनः कब आना ईश्वर ने तय किया है। अब तो एकाध वर्ष बाद ही हो पायेगा।  इतनी दूर बार बार कहाँ आना होता है।  वहां भी कई काम देखने हैं।'

इस बात ने तो मिनी को हिलाकर रख दिया, वह बहुत उदास हो गयी। इतना समय बीत गया, आप मेरे परिवार के सगे जैसे लगे और मैं आपको चाय तक नहीं पिला सकी, कहते वह भाव विभोर हो गयी। उसकी आंखें भर आईं ।
'मगर आप को एक बार पुनः ऑस्ट्रेलिया अवश्य आना है।  मैं अगले जन्म के लिए आपकी चाय उधार नहीं रखूंगी।  आप बतायेगा, आपका टिकट मैं भेज दूँगी। '
दीनानाथ की आंखें भी नम हो आईं और उन्होंने उसे गले लगा लिया ।
'बेटी, तेरी उधार चाय में मैं तेरा ढेर सारा प्यार, तेरी बहुत बड़ी याद और जीवन की एक महत्वपूर्ण कड़ी लेकर जा रहा हूँ।  यह मेरे लिए अनमोल है।  चाय न पीकर जो कुछ मैंने पा लिया, पीकर कहाँ मिलता। सब तुम्ही लोगों का ही तो खा पी रहे थे। तुमने इतना खिलाया पिलाया, इतना प्यार दिया, मान-सम्मान दिया, तुम्हें हम कभी भूल ही नहीं सकते। तुम्हारी चाय पीकर इतना आनंद कहाँ आता जितना उसके उधार होने में है। तुम्हारी चाय ने तो 'उधार प्रेम की कैंची है' वाली कहावत को झुठला दिया। इस उधार चाय ने तो प्रेम का विशाल वृक्ष खड़ा कर किया है। और जब जब चाय पिएंगें, तुम अवश्य याद आओगी।  हाँ, अपनी मम्मी का फोन नंबर दे दो, अहमदाबाद जायेंगे तो उनसे मिलेंगे।    
'हाँ अंकल! जरूर जाना, वो बहुत खुश होंगी।'

इण्डिया लौटने के बाद दीनानाथ जी का द्वारकाधीश जाने का कार्यक्रम बना।  गांधी नगर भी दो दिन रूकना था। सोचे, मिनी की मम्मी से भी मिल लेंगे। फोन पर मिनी की मम्मी को अपने कार्यक्रम से अवगत कराया। उन्होंने झट बोला आप गांधीनगर आएंगे तो हमारे यहाँ ही रूकेंगे। उनका आग्रह देखकर, उन्हें भी हाँ बोलना पड़ा।
समय बीता, वे गांधीनगर पहुंचे।  स्टेशन पर, लेने के लिए मिनी के पापा ने गाड़ी भिजवा दिया था ।
घर पहुंचकर सामान उनके कमरे में भिजवा दिया। और वे बैठक में सोफे पर बैठे।
मिनी के मम्मी, पापा आये -
चाय नाश्ता कर लीजिये, फिर अपने कमरे में थोड़ा विश्राम करिये, उसके पश्चात खाना पीना करते हैं।
सामने वाले सोफे पर वे भी बैठ गये।
उनकी नौकरानी नमकीन, नाश्ता लाकर मेज पर रख दी।  मिनी की मम्मी उन्हें  देने के लिए प्लेट में डालने लगी। नौकरानी की और देखकर, 'और चाय ?'
'आ रही है', मैडम।
यह क्या ?
दीनानाथ के आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा । वे देखकर चौंक गए।
चाय की तश्तरी मेज पर रखकर पैर छूने आई। वह कोई और नहीं, मिनी थी।
वे विस्मित सोफे से उठ गए।
'अरे यह कैसा सुखद आश्चर्य, तुम कब आई '
'कल ही आई हूँ, अंकल!'
'मम्मी ने एक पूजा रखा था। सोची मैं भी इंडिया घूम आती हूँ। अंकल कम से कम सप्ताह भर तो रूकेंगे न।'
'नहीं बेटा! दो दिन यहाँ रूकेंगे फिर द्वारका जाना है।'
'अगले सप्ताह मम्मी ने पूजा रखा है, तब तक रूकते तो अच्छा होता।'
'मगर हमारा कार्यक्रम पहले से तय है और इतने कम समय में टिकट का आरक्षण कठिन हो जाता है।
'अच्छा तो आप और आंटी को गांधी नगर मैं घुमाऊँगी।'
'हाँ, ये लाख रूपये की बात है।  लेकिन तुमने मेरे करोड़ों छीन लिए।'
'वो कैसे अंकल !'
'चाय पिलाकर, मेरा तो तकादा ही समाप्त कर दिया। हा, हा  …
'नहीं अंकल! आपको तो चाय मैं रोज पिलाऊंगी, खाना भी खिलाऊँगी।'
'तुम्हारी चाय तो मेरे लिए अमृत बन चुकी है । इस चाय में मैंने जो कुछ पा लिया उसका शब्दों में वर्णन करना भी कठिन है । ईश्वर तुम्हे सुखी रखे, दीर्घायु करे,  तुम्हारा दमन खुशियों से भरा रखे । फिर हम सिडनी आएंगे तो अवश्य मुलाकात होगी।'
'हां अंकल, वहां भी आप का ही सब कुछ है। जल्दी से जल्दी आना। ' 


(C ) एस० डी० तिवारी




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