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मंजुला और मृदुला, दोनों एक ही कोख से और एक ही समय पर हुईं, परंतु दोनों की किस्मत और स्वाभाव में जमीन आसमान का अंतर था। जहाँ मंजुला गंभीर लड़की थी, वहीं मृदुला नटखट। मंजुला घर की जिम्मेदारियों पर अधिक ध्यान रखती, और अपनी माँ के काम में हाथ बंटाती, मगर मृदुला को अपनी सहेलियों से गपशप में अधिक मन लगता। दोनों साथ साथ खेलीं, साथ साथ पढ़ीं और साथ साथ बढ़ीं। दोनों का एक ही घर, एक ही बिस्तर और यहाँ तक उदय नारायण उनके लिए कपडे भी एक जैसे ही लाते। यह तो उन्हें पता ही था बेशक एक साथ जन्मी हों पर बड़ी होने पर अलग अलग घर में जाना होगा और किसके भाग्य में क्या लिखा है, किसको पता।
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धीरे धीरे दोनों बड़ी हो गयीं। उदय नारायण को उनके विवाह की चिंता सताने लगी। उन्हें अपने एक पुराने मित्र पारसनाथ की याद आयी। उनका पुत्र अतुल, इनकी बेटियों से एक वर्ष ही बड़ा था। पारसनाथ का गाँव उनके गांव से लगभग बीस किलोमीटर की ही दुरी पर था। उदय ने अपनी पत्नी से मंजुला उनके यहाँ रिश्ता करने की राय बात की तो उसे भी अच्छा लगा। मंजुला का मृदुला की अपेक्षा थोड़ा भरा पूरा देह था इसलिए वे पहले उसी का विवाह करना चाहते थे। उदयनारायण एक दिन पारस के घर जा धमके। पुराने मित्र को अचानक अपने द्वार पर पाकर पारसनाथ की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। उनका बड़ा ही आदर सत्कार हुआ। उदय ने जब मंजुला का विवाह का प्रस्ताव रखा तो तो पारसनाथ का उत्तर मिला -
'तुम्हारे यहाँ सम्बन्ध करने में तो मुझे प्रसन्नता ही है। तुम्हारी बेटियां सुन्दर हैं, पुराने मित्र हो, मित्रता सम्बन्ध में बदल जाय तो इससे बड़ी बात क्या होगी ! किन्तु अतुल अभी आगे पढना चाहता है। अभी तो वह बी०सी०ए० के अंतिम सत्र की परीक्षा दे रहा है। बस दो साल रुक जाओ।'
वापस आकर उदय ने अपनी पत्नी से सारी बात बताई तो उसने कहा, 'दो साल तो बहुत अधिक समय है, इसके बाद मृदुला की भी करनी है। उनको समझा बुझा लो कि शादी कर लें, लड़का शादी के बाद भी पढ़ सकता है। वह होनहार है, पढ़ कर, कहीं अच्छी जगह लग जायेगा। नौकरी वाला लड़का ढूंढो तो, दहेज़ के लिए मुंह बाये रखते हैं। यही जब नौकरी पर लग जायेगा तो वे हमें अपने दरवाजे पर कहाँ बैठने देंगे। उदय नारायण ने फिर से जाकर पारसनाथ के सामने प्रस्ताव रखा तो उनका वही उत्तर था। अधिक कहने पर, उन्होंने यह कह कर टाल दिया कि अतुल से बात करके बताएँगे। इतने में उनकी पत्नी शीला भी आ गयी। यह सब सुनकर भुनक पडी, 'मंजुला को मैंने एक बार देखा है, वह बहुत ही सुन्दर और सुशील लड़की है। मुझे तो बहुत पसंद है। व्याह कर के भी अतुल पढ़ाई कर लेगा, वो कौन सी पढने से रोक देगी। ' शीला को यह भी डर सता रहा था, अतुल पढने के लिए शहर में रहेगा, किसी को फंसा ही लाया तो क्या करेंगे। विवाह के लिए 'हाँ' हो गयी। अब अतुल को मनाना था । अतुल ने भी वही बात दोहराई। उसका कहना था, अभी कोई कमाई-धमायी है नहीं, वह पत्नी की आवश्यकताएं कैसे पूरी करेगा। माँ बाप के समझाने पर वह मान गया। शीला ने उसे आश्वस्त किया कि विवाह, उसकी पढ़ाई में कोई व्यवधान नहीं बनेगी। और जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता उसकी पढ़ाई और बहू दोनों की ही जिम्मेदारी पारसनाथ और शीला की है। मंजुला का अतुल से विवाह तय हो गया।
अतुल, एम० सी०ए० में प्रवेश की परीक्षा दिया था, उसका चयन हो गया। अब यह निश्चय हुआ कि दिसंबर में पहला सत्र पूरा हो जायेगा और जनवरी में विवाह संपन्न होगा। अतुल का एम० सी०ए० में प्रवेश होने से
घर के सभी लोग मंजुला को भाग्यशाली मानने लगे। समय बीतते देर नहीं लगी, जनवरी आ गयी और दोनों विवाह सूत्र में बंध गए।
मंजुला बहुत ही गंभीर और सुशील लड़की थी। ससुराल में जाकर, अपने व्यवहार और काम धाम से, उसने सबका दिल जीत लिया। अतुल भी उसके व्यवहार से बहुत प्रसन्न था और उसे खूब प्यार करने लगा। अभी कोई काम नहीं करने के कारण अतुल अपनी पत्नी को न तो ठीक से घुमा फिरा पाता न ही उसके लिए कोई अच्छा गिफ्ट ला पाता। मंजुला को इस बात की कोई म्लानि नहीं थी। वह चाहती थी, अतुल और पढ़े ताकि सास ससुर के साथ उसे भी अच्छी जिंदगी दे सके। अतुल को भी आभास था कि ठीक से पढ़ाई करके ही मंजुला को अच्छी जिंदगी दे पाएगा। अब एम० सी० ए० के अगले सत्र की पढ़ाई करने के लिए अतुल को शहर जाना था। मंजुला ने उसे खूब समझाया, उसका ध्यान छोड़कर पढ़ाई में ध्यान लगाना। उसे यहाँ घर में कोई कठिनाई नहीं है और वह बहुत प्रसन्न है। अतुल ने पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। मंजुला ने भी इसमें उसका भरपूर साथ दिया, और कभी अवसर मिलता तो भी, वह घूमने फिरने या सिनेमा आदि देखने को ना ही कहती। यह नहीं था कि मंजुला को घूमना फिरना अच्छा नहीं लगता, अपितु, वह अपने आज को, भविष्य के लिए निवेश कर रही थी। अतुल छुट्टियों में आता तो भी अपनी किताब लेकर पढता रहता, मंजुला कभी उसकी किताब की ओर देखती, कभी छत पर टहल आती। कभी कोई पकवान बनाने में व्यस्त हो जाती, कभी घर की साफ सफाई में, और जैसे तैसे अपना समय काट लेती। इसी बीच मंजुला के बी० ए० का एक साल रह गया था, पूरा कर डाली। मंजुला ने अपने विवाह या ससुराल के विषय में उदय नारायण से कभी भी कुछ नहीं कहा, परंतु उसकी स्थिति से वे संतुष्ट नहीं थे और अपने निर्णय पर पश्चाताप कर रहे थे।
मंजुला की परेशानियों से सबक लेकर, उदय नारायण ने निश्चय कर लिया था कि भले ही देर हो, किन्तु मृदुला का विवाह वे संपन्न परिवार में करेंगे। पहले, भली भांति जांच परख लेंगे कि लड़का ठीक ठाक कमाता है या नहीं। अब मृदुला के साथ ऐसा नहीं होने देंगे कि हर चीज के लिए मुंह ताके। उन्होंने वर की खोज प्रारम्भ की, कई घर परिवार देखा, अंततः सुयोग्य वर मिल ही गया। दीनानाथ एक संपन्न वयापारी हैं, उनका बेटा हेमंत ज्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं है पर दीनानाथ का इकलौता पुत्र है। बारहवीं पास करके उन्हीं के काम में लग गया है, फिर दीनानाथ के बाद तो सब कुछ उसी का है। उदय नारायण की दीनानाथ की सम्पन्नता देख कर, उनके यहां जाने की हिम्मत तो नहीं थी, मगर मृदुला के सुन्दर होने और पढ़ी लिखी होने के कारण, साहस बटोर ही लिया। उन्होंने, दीनानाथ से विवाह की बात चलायी। मृदुला सुन्दर लड़की थी और बी०ए० पास थी, दीनानाथ के परिवार को भा गयी और विवाह तय हो गया। उदयनारायण ने पहले ही बता दिया था, उनके पास अधिक कुछ लेने देने के लिए नहीं है। हां, बारात की अच्छी सेवा सत्कार कर देंगे। अच्छी बहू पाने के लिए दीनानाथ ने समझौता कर लिया, और विवाह में खुद बढ़ चढ़कर खर्च किया। और तो और, दीनानाथ ने दुल्हन का लहंगा अपने यहाँ से भिजवाया था, वैसा लहंगा पूरे क्षेत्र की किसी दुल्हन ने अब तक नहीं पहना होगा। उसके अलावा मृदुला को गहने और कपड़ों से लाद दिया था। मृदुला का विवाह बड़ी धूम धाम से हुआ। सभी रिश्तेदार और मित्र, यही कह रहे थे, उदय ने अपने से काफी ऊँचा रिश्ता ढूंढा है।
ससुराल आते ही मृदुला के ठाट बाट देखने लायक थे। अच्छे-अच्छे कपडे पहनना, घूमना फिरना, रेस्तरां में खाना, घर में कामवाली, खाना बनाने वाली। वह जब, यह सब मंजुला को बताती, तो वह बहुत प्रसन्न होती। मृदुला के बताने के ढंग से लग जाता कि उसे अपनी किस्मत पर बड़ा गरूर है और वह एक बहुत संपन्न परिवार में है। वह कहां कहां घूमी, किस रेस्तरां में खाया, घर में क्या नया सामान आया, यहां तक काम वाली को कुछ देती उसे भी बताती। उसकी बातें सुन कर, मंजुला ईर्ष्या नहीं करती, अपितु प्रसन्न होती। मंजुला के चकित और प्रसन्न होने पर, मृदुला अपने ससुराल की एक एक बात याद करके बताती। आज सालगिरह पर सास ने कान का दिया है, तो जन्मदिन पर हेमंत ने सोने की चेन बनवाई इत्यादि। इतना कुछ होते हुए भी मृदुला, कभी मंजुला के मदद की बात नहीं करती।
इधर अतुल की परिश्रम और मंजुला का त्याग रंग लाया और अतुल ने एम० सी० ए० भी अच्छे अंकों से कर लिया। उसके बाद, उसे एक कंपनी में अस्थायी जॉब भी मिल गयी थी। वह इस नौकरी से संतुष्ट नहीं था, और कैरियर की चिन्ता लगी रहती थी। वह सरकारी नौकरी के लिए कई प्रतियोगिताओं में बैठा मगर सफल नहीं हो पाया। मगर इन प्रतियोगितओं ने उसका अनुभव और ज्ञान काफी बढ़ा दिया था। अंततः उसे एक बहुत बड़ी अंतराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी मिल गयी। अब अतुल अपने लक्ष्य को पा चुका था। घर में मंजुला का मान सम्मान और बढ़ गया था। पारसनाथ भी कभी कभी बोल देते, 'हमारे घर के लिए मंजुला बड़ी भाग्यशाली है। जबसे आई है, अतुल आगे ही आगे बढ़ रहा है।' यह सुनकर वह फूले नहीं समाती।
अपनी कंपनी में बड़ी ईमानदारी और लगन से काम करके उसने अपनी धाक जमा लिया। उस कंपनी के कुछ प्रोजेक्ट विदेशों में भी चल रहे थे। कुछ ही समय के बाद अतुल को एक प्रोजेक्ट पर, अमेरिका जाना हुआ। पहले तो वह तीन महीने के लिए गया, पर, वहां भी उसके प्रशंसनीय कार्य के कारण और अधिक समय तक रोक लिया गया। बाद में चलकर उसे अमेरिका की ही एक अन्य कंपनी में नियुक्ति मिल गयी। अब तो मंजुला के भी दिन बहुर गए थे। अमेरिका से डालर आने लगे। प्रसन्न तो होती, पर मंजुला पर इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। वह संतोषी प्रकृति की थी. थोड़े में भी खुश रह लेती, अब तो उसके पास भी बहुत कुछ था। कुछ ही अंतराल पर, अतुल को अमेरिका का ग्रीन कार्ड मिल गया। धीरे धीरे समय आया, मंजुला को भी अमेरिका जाने का अवसर मिल गया। मंजुला को भी वहां एक जगह जॉब मिल गयी। अब तो दोनों ने मिलकर खूब डॉलर कमाने लगे। थोड़े ही समय में अतुल ने कार और वहां घर खरीद भी लिया। दोनों की जिंदगी, बहुत अच्छी बीत रही थी। मंजुला अपने पिछले सब कष्ट भूल चुकी थी। अतुल कुछ पैसे बचाकर अपने पिताजी के पास, इंडिया भी भेज देता। अब उनके घर का भी कायाकल्प हो चुका था।
अतुल के मम्मी पापा अमेरिका घूम आये थे। मंजुला की इच्छा थी कि उसके मम्मी पापा भी एक बार घूम लें। उन्होंने इतनी तंगी में रहकर भी उसके लिए कितना कुछ किया। दबी जबान से उसने, अपने मन की बात अतुल से कह दिया। अतुल बोल दिया इसमें पूछने की क्या बात है। उनसे बात कर लो, मैं उनका टिकट और वीसा के लिए कागजात भेज देता हूँ। इस बात से मंजुला बहुत प्रसन्न हुई और मम्मी पापा से बात करके टिकट भेज दी।
जब उदय नारायण अमेरिका पहुंचे तो अपनी बेटी का रहन सहन देख कर फूले न समाये। मंजुला से वे अकेले में बोले -
'देख बेटा! योग्यता, धन से अधिक मूल्यवान होती है। योग्यता हो तो धन कमाया जा सकता है, धन से योग्यता नहीं खरीदी जा सकती। मैंने तो अतुल की योग्यता देखकर ही तेरी शादी की थी। तूने वहां कष्ट उठाये मगर ईश्वर ने सुन ली, आज तुझे देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।'
मंजुला ने उनकी कृतज्ञता व्यक्त की, 'नहीं पापा ! मुझे कभी कोई कष्ट नहीं हुआ। अतुल जी बहुत अच्छे हैं। ससुराल के सभी लोग कितने अच्छे हैं। '
इधर मृदुला, जब मंजुला की प्रगति के बारे में सुनती तो ईर्ष्या से जलने लगती। उसके मम्मी पापा भी कभी मंजुला की बात करते तो, मृदुला अधिक रूचि नहीं दिखाती। लेकिन किसी की स्थिति सदैव एक समान नहीं रहती। अगले पल किसके भाग्य में क्या होना है, क्या पता! मृदुला जहां कभी धन के गर्व में चूर रहती और सबको जताती रहती, समय ने करवट बदला और भाग्य ने साथ देना छोड़ दिया। उसके पति का कारोबार अब मंदा हो चला था, वह कर्ज के बोझ में दब गया था। पहले वाला ठाट, अब नहीं रह गया था। एक एक पैसा बड़ा सोच समझ कर खर्च करना होता था। मृदुला का एक बेटा था, वह भी बड़ा हो गया था और उसकी पढ़ाई लिखाई का खर्च भी सिर पर। वह उसे इंजीनियरिंग करवाना चाहती थी, पर किसी सरकारी कालेज में प्रवेश नहीं मिल पाया। प्राइवेट कॉलेजों की फीस, वश से बाहर की बात लग रही थी। पहले तो सोची की अपने कुछ गहने बेच दे, पर किसी को पता चला तो बेइज्जती की बात होगी। सच्चाई को कोई कितना छुपा सकता है। स्थिति के बारे में, उदय नारायण को पता चला तो मृदुला की यथा संभव मदद करते रहते।
उदय नारायण ने मंजुला को मृदुला की स्थिति के बारे में बताया तो वह द्रवित हो गयी। उसने मृदुला से आग्रह किया कि इंजीनियरिंग करने के लिए अंकित को अमेरिका भेज दे। मोहित के साथ रहकर वह भी पढ़ लेगा। पढ़ाई के खर्च की चिंता न करे, वह सम्हाल लेगी। यह मृदुला के शान के विरुद्ध लग रहा था, पर अंकित के भविष्य की बात थी। थोड़ा ना नुकुर करके उसे भेजने को मान गयी। मगर अमेरिका जाने में तकनिकी समस्या सामने आ गयी। आगे की पढ़ाई करने के लिए कम से कम १५ साल की पढ़ाई स्वदेश में होनी आवश्यक थी। तब मंजुला ने उसे इंडिया से बी० टेक० करके मास्टर्स करने के लिए वहां आने को कहा और उसका खर्च उठाने को तैयार हो गयी। इंजीनियरिंग पूरा होने के बाद, अंकित मास्टर्स कोर्स करने के लिए, अमेरिका चला गया। अंकित पढ़ाई के साथ, पार्ट टाइम जॉब भी करने लगा। कोर्स पूरा होते ही उसे अच्छी जॉब मिल गयी। अब तो मृदुला के दिन फिर से बहुर आये। मुरझाई बगिया फिर से खिल गयी। अंकित वहां से कुछ पैसा भेजा तो उसके पति के कारोबार में भी जान आ गयी। कहते हैं, रस्सी जल जाय पर बट नहीं जाता। मृदुला अभी भी मंजुला का एहसान कम मानती और अंकित की काबिलियत को अधिक। खैर मंजुला और मृदुला दोनों का परिवार सुख पूर्वक रह रहा था ।
एक के बच्चे विदेश
कैंसर गुर्दा
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