ना जी, ना!
चंद्राकर जी के बेटा, बेटी दोनों ही ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी थे। बेटा-बहू एडिलेड में बड़ा सा मकान लेकर रहता था और बेटी-दामाद कैनबरा में। वे चाहते थे, चंद्राकर भी वहां के स्थाई निवासी हो जायँ ताकि आने के लिए बार बार वीसा लेने का चक्कर समाप्त हो जाय। आखिर भारत में बच्चों के बिना, अपने भाइयों के सहारे कब तक रहेंगे। वैसे भी ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी होने पर, वहां की कई सारी सुविधाओं के अधिकारी हो जाते हैं, जैसे निःशुल्क चिकित्सा, वरिष्ठ नागरिकों की सस्ती बस व रेल यात्रा और दस वर्ष स्थाई निवासी रहने के पश्चात वृद्धा पेंशन भी। चूकि बेटा, बेटी दोनों ही ऑस्ट्रेलिया के नागरिक हो चुके हैं, उन्हें स्थाई निवासी का दर्जा मिलने में कोई अधिक समस्या नहीं थी। पर जब भी केशव उनसे पी. आर. (स्थाई निवासी) के लिए अप्लाई करने के लिए कहता, वे ना कर देते। कहते वे अपना वतन और इतने रिश्ते नाते छोड़ कर कैसे जा सकते हैं। हाँ, घूमने फिरने के लिए ठीक है, और दो तीन बार तो घूम भी चुके हैं। पूरी जिंदगी भारत में काट लिया, अब बुढ़ापे में सब कुछ छोड़ कर दूसरे देश में कैसे जी पाएंगे। बड़ी मुश्किल से, किसी तरह, केशव ने उन्हें समझाया, 'पापा! स्थाई निवासी होकर भी आप भारत में रह सकते हैं। स्थाई निवासी होकर, बार बार का वीसा का झंझट ख़त्म हो जायेगा और आप को यहां की चिकित्सा सुविधा का लाभ मिल सकेगा। आपका जब मन आये यहाँ रहिये, वहां जाना हो वहां जाईये।'
उसके बाद भी आज कल करते, चंद्राकर जी ने साल बिता दिया। अब तो दोस्त मित्र भी उनको समझाने लगे थे, 'चंद्राकर जी, यहाँ क्या रखा है! आप भी बेटे के पास ऑस्ट्रेलिया चले जाओ।''हाँ, मैं भी यही सोच रहा हूँ। केशव भी बहुत दिनों से कह रहा है। मगर आप लोगों का प्यार और आदर, वहां नहीं जाने दे रहा है।'
एक मित्र अभी समझा ही रहा था कि ये प्यार कितने दिन काम आएगा, आखिरी दम में तो बच्चे ही साथ देंगे कि चंद्राकर जी की अचानक ही तवियत ख़राब हो गयी। उनका ब्लड प्रेशर (रक्त चाप) बढ़ गया और उन्हें अपोलो अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। केशव को सूचना मिली तो अगले ही दिन छुट्टी लेकर आ पहुंचा। तीन दिन भर्ती रहने के बाद अस्पताल से छुट्टी मिली।
अब केशव को कहने का मौका मिल गया, 'बताईये, जब से कह रहा हूँ, अप्लाई किये होते तो अब तक पी. आर. आ भी गया होता। अभी तो अस्पताल का पचास हजार ही लगा, कुछ सीरियस होता तो ये अस्पताल वाले लाखों ऐंठ लेते।'
अब तक चंद्राकर जी को समझ आ चुका था। उन्होंने स्थाई निवासी के लिए अप्लाई कर दिया। अप्लाई करने के कुछ महीनों के पश्चात् ही वे ऑस्ट्रेलिया के पी. आर. (स्थाई निवासी) हो गए।
उनके पी. आर. होते ही केशव ने, चंद्राकर जी को ऑस्ट्रेलिया बुला लिया। वहां बेटे की सम्पन्नता और सुख सुविधा देखकर वे प्रसन्न तो थे, पर कुछ दिनों के बाद ऊबन होने लगी। उनका जी वहां नहीं लगता। उन्हें बार बार इंडिया के दोस्त मित्र याद आते। कहाँ इंडिया में पार्क में बैठ कर, घंटों गप सड़ाके करते; वहां पास पड़ोस से कोई खास मेल जोल भी नहीं, बस दूर से ही हाय हेल्लो होती थी। अभी घर में कोई पोता, पोती भी नहीं कि उनके साथ मन बहल जाय। बस टेलीविज़न पर, या अपने लान के रख रखाव में समय बिताना होता था। बेटी दामाद के यहाँ तो फिर भी मन लग जाता, उसके दो छोटे बच्चे थे। परंतु चंद्राकर जी पुराने विचार के व्यक्ति थे, वे बेटी के यहाँ अधिक रुकना पसनद नहीं करते थे।
उनका बेटा केशव वीकएन्ड पर (सप्ताहांत) अपने एक मित्र के यहाँ खाने पर गया। मित्र ने विशेष रूप से चंद्राकर जी के स्वागत में ही निमंत्रित किया था।
'अंकल! पी. आर. की बहुत बहुत बधाई। '
'थैंक यू बेटा।'
'चलिए अच्छा हो गया, अब बेटे के साथ रहेंगे। इंडिया से तो यहाँ अच्छा ही है। शांति है, कोई ज्यादा झंझट नहीं। क्या लेंगे स्कॉच या बीयर?'
'ना जी, ना ! कभी छुआ तक नहीं।'
'अच्छा आपके लिए ठंडा लाता हूँ।'
चन्द्राकर जी को ठंडा और कुछ नाश्ता देकर, वे स्कॉच पीने लगे।
'ये चिकन नगेट तो ले लेंगे!'
'ना जी, ना ! मैं बिल्कुल शाकाहारी हूँ।' चंद्राकर जी बोले।
'और अंकल, दिन में तो आपके बेटे, बहू काम पर चले जायेंगे, आप समय कैसे बिताएंगे?'
'थैंक यू बेटा।'
'चलिए अच्छा हो गया, अब बेटे के साथ रहेंगे। इंडिया से तो यहाँ अच्छा ही है। शांति है, कोई ज्यादा झंझट नहीं। क्या लेंगे स्कॉच या बीयर?'
'ना जी, ना ! कभी छुआ तक नहीं।'
'अच्छा आपके लिए ठंडा लाता हूँ।'
चन्द्राकर जी को ठंडा और कुछ नाश्ता देकर, वे स्कॉच पीने लगे।
'ये चिकन नगेट तो ले लेंगे!'
'ना जी, ना ! मैं बिल्कुल शाकाहारी हूँ।' चंद्राकर जी बोले।
'और अंकल, दिन में तो आपके बेटे, बहू काम पर चले जायेंगे, आप समय कैसे बिताएंगे?'
'देखेंगे, यहाँ तो बस तुम्हीं लोगों का सहारा है। ऐसे ही मिलते जुलते समय कट जायेगा।'
'क्लब चले जाया करिये। केशव अंकल को मेंबर बनवा दे।'
'ना जी, ना! वहां पर हमारे लायक क्या है? दारू हमें पीना नहीं, कैसिनो में मशीनों पर पैसे लुटाते रहो, यह सब मुझसे तो नहीं होगा। '
अगले दिन प्रातः ही आशा ने एक सुन्दर से बालक को जन्म दिया। दो दिन भर्ती रहने के बाद आशा को अस्पताल से छुट्टी मिली। जब केशव और आशा नवजात पुत्र को लेकर घर आये, तभी देखा कि पोस्टमैन लेटर बॉक्स में कोई चिट्ठी डाल रहा है। चंद्राकर जी उत्सुकता वश, उसे तुरंत ही निकाल कर लाये और केशव को थमा दिया। केशव ने प्रेषक के रूप में काउंसिल का नाम देखा तो सोचा, कि काउंसिल ने कोई मांगपत्र भेजा होगा, मगर उसके ऊपर किसी तरह की कोई भी राशि बकाया नहीं थी। फिर भी सहम के ही वह लिफाफा खोला। जब पत्र को पढ़ा तो उसके हर्ष का ठिकाना न रहा। वह चंद्राकर के गले लिपट गया।
'पापा! आप ने तो कमाल कर दिया। देखो, सुंदरता में हमारा लान को द्वितीय स्थान पर आया है और कौंसिल की ओर से दो सौ डॉलर का पुरस्कार भी।'
'वाह क्या कहने, हमारे पोते के आते ही यह अच्छी खबर आयी, बस ये समझो कि इसका यह शुभ लक्षण है।'
केशव और आशा को पुत्र की प्राप्ति की बधाई देने के लिए, दोस्त, मित्रों का घर पर ताँता लगा हुआ था। जो भी आता, केशव उसे सबसे पहले लान के पुरस्कृत होने की सूचना देता। अब चंद्राकर जी ऑस्ट्रेलिया के एक गौरवान्वित निवासी थे। उन्हें एक पोता भी मिल गया था। अब उन्हें कोई समस्या नहीं थी और पूरी तरह से वहां रस बस गए थे।
'क्लब चले जाया करिये। केशव अंकल को मेंबर बनवा दे।'
'ना जी, ना! वहां पर हमारे लायक क्या है? दारू हमें पीना नहीं, कैसिनो में मशीनों पर पैसे लुटाते रहो, यह सब मुझसे तो नहीं होगा। '
कहीं घूमने फिरने जाना होता तो चंद्राकर जी पहले ना नुकुर करते, मगर उन स्थानों की सुंदरता देखकर, मुग्ध हो जाते।
समय के साथ चंद्राकर जी की मुश्किलें बढ़ती गयीं। गाड़ी चलानी आती नहीं थी, मंदिर घर से काफी दूर था। बस का किराया इतना कि सुनकर ही होश उड़ जाते। पास पड़ोस कोई बोलता-बतियाता नहीं। उनकी दुनिया बस परिवार तक ही सिमट कर रह गयी थी। दिन में बेटा-बहू दोनों काम पर चले जाते। चंद्राकर जी कुछ समय सो लेते या घर से बाहर निकल कर टहल लेते। यहाँ तो ऐसा लग रहा था कि काला पानी हो। भारतीय मूल के लोग भी दूर दूर ही रहते थे। सप्ताह के अंत में ही मिल जुल पाते थे। हाँ, बच्चों ने एक अच्छी परंपरा चला राखी थी कि इंडिया से किसी के माँ बाप आते थे तो वे बारी बारी से खाने पर बुलाते थे। इसी बहाने वे एक दूसरे से मिल लेते और थोड़ी बहुत मन की बात हो जाती। चंद्राकर जी सुनते कि इंडिया से कोई बुजुर्ग आया है तो उनकी आत्मा के लिए संजीवनी सा काम करता। उसके अलावा भी कभी किसी यहां पार्टी आदि होती तो सभी बच्चे अपने मम्मी पापा को भी साथ ले जाते।
एक दिन चंद्राकर जी आत्मचिंतन कर रहे थे। यहाँ बच्चों का उत्तम रहन सहन है, अच्छा खा पहन रहे
हैं पर उसका क्या लाभ! कोई अपना तो उसे देख भी नहीं रहा। मोटा खा पीकर भी
अपने गांव में कितने प्रसन्न थे। मगर क्या करें, बच्चों के लिए सब करना पड़ता
है। यहाँ अच्छी कमाई है तो महंगाई भी कितनी है। लान की एक बार घास काटने के लिए ही सौ डॉलर (लगभग पांच हजार रुपये) तक देना पड़ जाता है। घास की बात पर उनके मन में आया, क्यों न वे अपना समय फूल, फुलवारी में लगाएं! उन्होंने केशव से कहकर खुरपी और कुछ अन्य औंजार मंगवा लिया। फिर क्या था, उन्होंने लान के सौंदर्यीकरण का कार्य प्रारम्भ कर दिया। घास काटने की मशीन, केशव के पास पहले से ही थी। अब घास काटने के पैसे नहीं देने होते, यह जिम्मा चंद्राकर जी ने ले लिया। उन्होंने लान में, कुछ सुन्दर फूल और नारंगी के दो पेड़ लगा दिए। धीरे धीरे उनके लान की शोभा बढाती गयी। घर के पिछवाड़े के प्रांगण में उन्होंने सब्जियां बो दीं। मेथी, धनिया, मिर्ची, टमाटर, जहाँ पहले फ्रिज की जमाई हुई आती थी अब घर की उगाई, ताजा मिलने लगी।
चंद्राकर जी अब पूरी तरह से अपने लान के लिए समर्पित थे। वे टहलने के लिए निकलते तो औरों के लगाए पेड़ पौधों को ध्यान से देखते। उनके मन में इच्छा जागृत होने लगी कि वे एक दिन अपना लान सबसे सुन्दर बना कर रहेंगे। जब भी नर्सरी जाते पौधों के बारे जानकारी लेते और पसंद आने पर ले आते। अब तक उनके लान में नारंगी, चेरी, बलूत, खजूर और अशोक के पेड़ अपने यौवन पर थे, और न जाने कौन कौन से शोभनीय पौधे, उनके बीच हरी कचनार घास। उधर से जो भी गुजरता, चंद्राकर जी के लान की ओर गर्दन घुमाये बिना नहीं रह पाता।
बसंत ऋतु में जहां पूरा एडिलेड रंग बिरंगे फूलों से सजा हुआ, दुल्हन की तरह सुन्दर लग रहा था; उसी सुंदरता का एक नन्हां सा टुकड़ा चंद्राकर जी के लान में भी था। एक दिन चंद्राकर जी को पता चला कि अगले दिन, एडिलेड काउंसिल के द्वारा, कालोनी के लानों का निरिक्षण होना है। चंद्राकर जी भी खर पतवार साफ़ करके, अपने लान को चमका रखे थे। इधर चंद्राकर जी की बहू आशा, गर्भवती थी, और डॉक्टरों के अनुसार उसी दिन अस्पताल में दिखाना था। डॉक्टर की सलाह के अनुसार, केशव सुबह ही आशा को लेकर अस्पताल चला गया। अस्पताल जाने पर आशा को भर्ती कर लिया गया। भर्ती कराके, अस्पताल दिखाने के ध्येय से, वह चंद्राकर जी को भी लेने आ गया। जैसे ही चंद्राकर जी अस्पताल जाने को तैयार हुए, पता चला कि काउंसिल की टीम निरीक्षण के लिए आ चुकी है। केशव की जल्दी के मारे, चंद्राकर जी टीम को अपने काम के बारे में कुछ बताने के लिए रुक नहीं पाए, और अस्पताल चले गए। सूचना पाकर उनकी बेटी, चंदा भी अस्पताल आ गयी थी।
'पापा! आप ने तो कमाल कर दिया। देखो, सुंदरता में हमारा लान को द्वितीय स्थान पर आया है और कौंसिल की ओर से दो सौ डॉलर का पुरस्कार भी।'
'वाह क्या कहने, हमारे पोते के आते ही यह अच्छी खबर आयी, बस ये समझो कि इसका यह शुभ लक्षण है।'
केशव और आशा को पुत्र की प्राप्ति की बधाई देने के लिए, दोस्त, मित्रों का घर पर ताँता लगा हुआ था। जो भी आता, केशव उसे सबसे पहले लान के पुरस्कृत होने की सूचना देता। अब चंद्राकर जी ऑस्ट्रेलिया के एक गौरवान्वित निवासी थे। उन्हें एक पोता भी मिल गया था। अब उन्हें कोई समस्या नहीं थी और पूरी तरह से वहां रस बस गए थे।
No comments:
Post a Comment