Friday, 9 September 2016

Kuchh din aur ruk jate

कुछ दिन और रुक जाते


विद्या को जर्मन गए चार वर्ष हो चुके थे। दिव्यांश के मम्मी पापा तो जर्मनी घूम आये, मगर विद्या के मम्मी पापा अभी तक जर्मनी नहीं जा पाए थे। विद्या ने उन्हें कई बार कहा, मगर इंडिया में कोई न कोई काम होने की बात कहकर, वे टाल देते। विद्या और दिव्यांश दोनों ही कहकर हार गए कि पापा जी, समय निकालिये और एक बार यूरोप घूम लीजिये, बड़ी सुन्दर जगह है, पर यादव जी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।  एक दिन यादव जी नाश्ता पानी करके एक बार फिर से अखबार उठा लिए, इतने में ही फ़ोन की घंटी बजी। कोमल ने आवाज लगाई, 'देखो जी फ़ोन बज रहा है, विद्या का ही होगा।'
यादव जी अख़बार रखकर, चार्ज में लगे फोन को निकालने लगे। इतने में फ़ोन कट गया। कोमल फिर से बोली, 'उसी का है न !'
'अरे, कट गया, अभी देखता हूँ।'
नंबर देखकर यादव जी ने बताया, 'हां, उसी का था। चलो फिर से कर लेगी।'
फिर से घंटी बजी, यादव जी ने अबिलम्ब उठाकर हेलो किया। विद्या की आवाज आई, 'पापा! नमस्ते, कैसे हैं आप लोग ?'
'ठीक हैं बेटी, तुम अपना बताओ। इतनी जल्दी उठ गयी! और भारत कब आना है। '
'हम भी ठीक हैं पापा। बस आप लोगों की याद आ रही थी। और इस बार हम नहीं, आप यहां आ रहे हैं। मैं आज ही टिकट करवाने जा रही हूँ। सितम्बर में आप लोग आ जाईये। अकेले नहीं आ सकते तो दिव्यांश को भेज देती हूँ। वैसे आने में कोई परेशानी नहीं है, क्षितिज है न ! वीसा लेने में मदद करवा देगा और दिल्ली हवाईअड्डे तक छोड़ देगा। बाकी हम यहाँ  एयरपोर्ट से ले ही लेंगे।'
'ठीक है बेटी, आ जायेंगे कभी।'
'कभी नहीं, इस सितम्बर में आना ही है। शाम तक टिकट और वीसा  आमंत्रण भेज देती हूँ और क्षितिज को भी कह देती हूँ।'
'चलो इतना कह रही हो तो ठीक है।'    
फ़ोन रखकर, यादव जी कोमल के पास गए, 'सुन रही हो! विद्या हमें बुलाने के लिए जिद्द कर रही है। चलो घूम ही आते हैं। फिर धीरे धीरे बुढ़ापा घेर लेगा तो कहां जा पाएंगे।'
कोमल मन में मुस्करायी, 'वो तो कबसे बुला रही है, तुम्हीं तो नखरे दिखाते रहते हो। कब जाना है ?'
'सितम्बर में।' 
शाम को फिर से विद्या का फ़ोन आया, 'पापा, टिकट हो गया है और मैंने आपके मेल पर भेज दिया है। बस जल्दी से जल्दी वीसा के  लिए आवेदन कर दीजिये।'
यादव जी को पता चला कि उनका वापिसी का टिकट, पूरे तीन महीने बाद का है, तो वे उसे एक महीने बाद का ही कराने के लिये कहने लगे। उन्हें तीन माह का समय लम्बा लग रहा था। यदि वे तीन महीने वहां रह गए तो उनके  बिना भारत में बड़ा अकाज होगा। लेकिन विद्या ने उनकी एक न सुनी, बोली, 'पापा! पहले आ तो जाओ, फिर जब जाना चाहोगे, टिकट की तारीख बदलवा देंगे।'
विदेश घूमने का मन तो यादव जी का भी बहुत था मगर वे बड़े सामाजिक और मिलनसार व्यक्ति थे। अपने कस्बे के लोगों में उनका समय बहुत अच्छा कट रहा था। उन्हीं लोगों के साथ समूह में घूमने फिरने भी चले जाते। इसके अलावा दो तीन निर्धन बच्चों को पढ़ाने का भी जिम्मा ले रखा था। उनके विदेश नहीं जाने का कारण यही सब था और कुछ वहां के माहौल व भाषा का डर। इस बार वे बेटी दामाद के आग्रह के आगे झुक ही गए। यादव जी, अब वीसा बनवाने में जुट गए। विद्या ने उन्हें फ़ोन पर सब कुछ समझा दिया था और अपने ममेरे भाई क्षितिज को इसमें मदद के लिए बोल दिया था। यादव जी ने जर्मनी के वीसा के लिए आवेदन किया और उन्हें तीन महीने का टूरिस्ट वीसा मिल गया।
यादव जी सपत्नी बर्लिन पहुंचे। जर्मन की ठण्ड के बारे में उन्होंने सुन तो रखा था, पर इतनी ठण्ड पड़ती है, इसका अनुमान नहीं था। जाते ही हाड़ कंपाने वाली ठण्ड से जूझना पड़ा। विद्या ने पहले ही बता दिया था कि यूरोप में बड़ी ठण्ड पड़ती है और वे अपने गरम कपडे लेकर आएं परन्तु जो गरम कपड़े इत्यादि वे ले गए, अपर्याप्त थे। विद्या को वहां के मौसम के अनुकूल, मम्मी पापा के लिए और जैकेट, लोअर, मोज़े  आदि खरीदने पड़े।
वहां की प्राकृतिक सौंदर्य से, यादव जी अभिभूत थे। वहां की हरियाली और भारत से पृथक मौसम व पेड़ पौधों के प्रति वे बहुत आकर्षित थे। शांतिपूर्ण वातावरण में उनका मन लग रहा था। कहीं कोई शोर शराबा नहीं, यहाँ तक कि गाड़ियों का हॉर्न तक नहीं। इतनी शांति कि देखकर लग रहा था मानो तपोस्थली हो। वे टहलने निकल जाते तो पार्क की साफ, सफाई और सुंदरता देखकर, मंत्र मुग्ध हो जाते। इसी बीच विद्या और दिव्यांश ने उन्हें फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड भी घुमा दिया। एक महीना तो क्या, कब तीन महीने बीतने को आ गया, पता ही नहीं चला। अब उनके वापस लौटने का समय समीप आ गया। विद्या और दिव्यांश ने उनसे कुछ समय और रुकने का आग्रह किया, इनके वहां रहने से उन दोनों को भी बहुत अच्छा लग रहा था। कम से कम चार लोग मिलकर, कुछ बात चीत कर लेते, वरना बस एक दूसरे का मुंह देखते रहो। पास पड़ोस से इतना कुछ मेल जोल तो था नहीं। इनके जाने के बाद फिर वही अकेले। दिव्यांश ने कहा, 'मैं वीसा बढ़वा देता हूँ। कम से कम छः महीने तो यहां रुकिए। असली ठण्ड का मौसम तो अब आ रहा है। यहाँ की बर्फ़बारी भी देख लीजिये।' मगर, यादव जी अपने इण्डिया के काम गिनाने लगे। वहां की प्राकृतिक छटा, उन्हें आने से तो रोक रही थी, पर इंडिया का काम धाम अपनी ओर खींच रहा था। अपने काम और मातृभूमि से अधिक लगाव के कारण यादव जी शीघ्र से शीघ्र वापस आने को विवश थे।

अब वापस जाने में बस कुछ ही दिन बचे थे। यादव जी के भाग्य में यह भी अद्भुत नजारा देखना बदा था। प्रातः उठकर, जब खिड़की से देखे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, पूरी धरती श्वेत चादर से ढक चुकी थी। पेड़, पौधे, सड़क, घरों की छत सब जगह बर्फ ही बर्फ। पेड़ ऐसे लग रहे थे, मानो चांदी के नकली पेड़ खड़े कर दिए गए हों। यादव जी ने पहली बार हिमपात का दृश्य देखा। लान, मकान, दुकान आदि सभी बर्फ के नीचे दबे हुए थे, बर्फ के अतिरिक्त कुछ नहीं दिख रहा था। उन्होंने तुरंत कोमल और फिर विद्या व दिव्यांश को जगाया। सब के सब यह दृश्य देखकर आश्चर्य से झूम उठे। यह था बर्लिन का माइनस अटैक, तापमान ऋण १० डिग्री। जितना सुन्दर नजारा था विद्या और दिव्यांश की उतनी ही बड़ी चिन्ता। रात की भारी बर्फ़बारी के कारण सभी रास्ते बंद हो गए थे। यहाँ तक कि गैराज से गाड़ी निकाल पाना भी असंभव था। शुक्र था की उस दिन शनिवार था और विद्या तथा दिव्यांश को काम पर नहीं जाना था पर घर के कुछ जरूरी सामान लाने थे। विद्या बोली, 'अब तो कहीं दोपहर बाद तक ही सड़क साफ हो पायेगी, ऐसे में कहीं जा तो सकते नहीं, चलो घर पर ही बनाते खाते हैं। आप लोग नजारा देखिये, तब तक चाय बनती हूँ। '

विद्या को तभी ध्यान आया, दूध तो घर पर है ही नहीं, अब चाय कैसे बनेगी। कल ही लाने वाली थी, मगर उसे काम पर से लौटने में थोड़ी देर हो गयी, इसलिए सोची अगले दिन सुबह ले आएगी। समाचार भी नहीं देख पाई कि अगले दिन के मौसम के बारे में जान पाती। बर्फ के कारण बाहर निकल पाना बहुत कठिन था, परंतु अब आवश्यक हो गया। फ्रिज में देखी तो एक नीबू पड़ा था।  ये हुआ कि आज नीबू की चाय पीते हैं। चाय पीकर, उसने बाहर देखा तो सड़क से बर्फ हटाई जा रही थी। सोची, तब तक वो भी अपने ड्राइव वे की बर्फ हटा ले ताकि सड़क साफ होने पर बाजार से घर के सामान ले आये। विद्या के साथ, यादव जी भी मदद करने में जुट गए। वो बार बार कहती रही, 'पापा, आप आराम से बैठो, हम और दिव्यांश साफ कर लेंगे।' पर यादव जी नहीं माने, उन्होंने बेलचा उठाया और बर्फ हटाने लगे। यह काम उनके लिए अनोखा था और बड़े मुदित मन से सलग्न हो गए। यादव जी को बर्फ का अनुभव तो था नहीं, एक जगह बर्फ जम गयी थी और हटाते समय उनका पांव फिसल गया। बर्फ हटी, गाड़ी निकली और यादव जी सीधे अस्पताल। वहां जाकर, पता चला कि पैर की हड्डी में क्रेक आ गया है और उस प्लास्टर करना पड़ेगा। भरने में एक महीने से भी अधिक समय लग सकता है।
दिव्यांश दौड़ भाग करके, यादव जी का वीसा तीन महीने के लिए और बढ़वा दिया। 
अब तो यादव जी को काम धाम की चिंता छोड़ रुकने के लिए वाध्य होना पड़ा। उधर अस्पताल का खर्च लाखों का। यादव जी बीमा करवा के नहीं गए थे। यह तो शुक्र था विद्या ने उनके पहुंचते ही, उनके लिए स्वस्थ्य चिकित्सा बीमा की पालिसी ले ली थी जिस कारण चिकित्सा के भारी भरकम खर्च से बच गयी।

यादव जी को जर्मन की कड़क ठण्ड में तीन महीने और बिताने पड़े, और वो भी घर में ही।



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