Thursday, 9 February 2017

Ek school ki kahani

स्कूल यहीं चलेगा

वंश नारायण जी ने सारी उम्र दिल्ली में बिताई, मगर जन्मभूमि से उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ। उनका पूरा परिवार और कई रिश्तेदार भी दिल्ली ही चले गए थे, इस कारण उनका गांव आना जाना कम हो गया था। फिर भी, साल दो साल में एकाध बार गांव का चक्कर लग ही जाता। उनके एक छोटे भाई का परिवार गांव में ही रहता था। अब वे सेवानिवृत्त हो चुके थे और पचहत्तर पार कर चुके थे। इस बार तो वे पूरे पांच साल के पश्चात् वे अपने गांव घूमने आये थे और साथ में तीनों छोटे भाई भी। वे गांव आते तो अपने बचपन की चीजें ढूंढने लगते। सब कुछ अतीत में खो चुका था। पुरानी चीजों को देखने और पुराने लोगों से मिलने में उन्हें बड़े आनंद की अनुभूति होती, मगर अपने समय की कोई भी चीज नहीं दिखती थी। सब बदल गया था, यहाँ तक कि अपना खुद का घर भी। उनके समय का बस गांव का एक पोखरा और दो तीन पेड़ बचे थे। वैसे पोखरा का रूप भी काफी कुछ बदल चुका था। पोखरा के चारों ओर, तटों पर अनेकों वृक्ष होते थे और बीच बीच में पलास की झाड़। वो सब जमीन अब खेत हो चुकी थी। जब वे पोखरा पर जाते तो देखकर मन बहुत उदास हो जाता। कभी जब पलास के टेसू दहकते थे तो देखते ही बनता था। आज लगभग सभी पेड़ कट चुके हैं, पलास नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है। तट को पोखरे के पानी के पास तक जोत लिया गया है। बचपन में रविवार के दिन, बंशनारायण, अधिकतर मित्रों के साथ, इसी पोखरे में नहाने आते और तरण ताल का भरपूर आनंद उठाते थे। लगभग सौ मीटर लंबे पोखरे को वे तैर कर, पार हो जाते थे। तटों पर छोटे मोटे कई टीले होते थे, शाम को उन्हीं टीलों पर बैठ पोखरा को निहारते घंटों बीत जाते, आज कहीं बैठने की जगह ही नहीं है।

उनके ज़माने के, गांव में अब एक दो लोग ही बचे हैं। उनके समय का कोई मिल जाता तो पुरानी यादें ताजा हो आतीं, और अपने ज़माने के किस्से सुनने सुनाने लगते। एक दिन गांव के बरगद के पेड़ के नीचे आकर, एक हाथी खड़ा हो गया और महावत पेड़ पर चढ़कर उसके लिए टहनियां काटने लगा। उसे देखकर, वंशनारायण को भगवान सिंह की याद आ गयी। उस समय दो चार कोस में केवल भगवान सिंह का ही हाथी था और यहाँ गांव में पीपल और बरगद के पत्ते लेने आया करता था। उन्होंने महावत से पूछा, 'भैया यह किसका हाथी है ?'
'वीरेंदर सिंह का। ' 
'हमारे समय में यहाँ कई कोस में मलिकपुरा के केवल भगवान् सिंह का हाथी हुआ करता था। '
'हाँ, उन्हीं का है। वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनका बेटा है, अपनी इज्जत बनाये रखने को अभी तक हाथी रखे हुए है।'
'और वो स्कूल। '
'साहब, ये कहां समय दे पाते हैं। एक संस्था बना रखी है, वही सब सम्भालती है। '
वंशनारायण  के मन में एक बार स्कूल देखने की जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने कमलापति को साथ चलने के लिए पूछा, मगर उन्हें किसी रिश्तेदारी में जाना था। अतः वे अपने भतीजे को लेकर मलिकपुरा जाने के लिए तैयार हो गए। भतीजे ने अपनी मोटरसाइकिल कसी और ताऊ जी को पीछे बिठाकर मलिकपुरा के लिए चल दिया। तब तो ढाई कोस चलकर, वे पैदल ही जाते थे।

मलिकपुरा पहुंचते ही मुख्य सड़क पर बड़ा सा बोर्ड लगा था, 'मलिकपुरा स्नातकोत्तर महाविद्यालय'। अब महाविद्यालय के गेट तक पक्की सड़क है। अपने समय में वे खेतों के बीच, मेड़ों से होकर विद्यालय तक आते जाते थे। वे महाविद्यालय के गेट पर पहुंचे, गार्ड ने रुकने का संकेत दिया और मोटरसाइकिल रुक गयी।
'क्या काम है? साहब!'
वंशनारायण कुछ बोले बिना, कॉलेज के सामने ध्यानमग्न खड़े हो गए। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे या तो किंकर्तव्यविमूढ हो गए हों या विद्यालय की भव्यता में खो गए हों। विद्यालय के भवन को दृष्टि भर निहार लेने के पश्चात्, गार्ड से बोले, 'प्रिंसिपल साहब से मिलना है। '
'लेकिन वे अभी नहीं मिल सकते, किसी मीटिंग में हैं।'
बंशनारायण सोच में पड़ गए। पहले तो सोचा, कुछ देर प्रतीक्षा करके मिलकर जाऊं। उन्हें उम्मीद थी जब वे प्रिंसिपल से मिलेंगे और उन्हें पता चलेगा कि इस विद्यालय के सूत्रधार वे ही हैं तो वे आश्चर्य से भर जायेंगे। प्रिंसिपल के इस प्रकार मिलने से वे स्वयं गौरवान्वित होंगे। पर दूसरे ही क्षण आशंकित हुये, जमाना बीत गया, पता नहीं प्रिंसिपल उनकी बात पर विस्वास भी करे कि नहीं। उनके पास इस बात का प्रमाण भी क्या है। छोडो, चलो, वापस चलते हैं। 
गार्ड ने थोड़ा सहमते हुए बोला, 'साहब! एक बात पूछूँ ?'
'हां, बोलो। '
'आपकी उम्र देखकर तो लगता है, आप यहाँ पढ़े नहीं होंगे। क्योंकि आपसे इस कॉलेज की उम्र कुछ छोटी लग रही है। मगर, न जाने क्यों लग रहा है कि आपका कोई न कोई इस कॉलेज से गहरा सम्बन्ध है।
क्या आपके बच्चे यहीं पढ़े हैं? '
'हाँ, बहुत गहरा सम्बन्ध है। वैसे मेरे छोटे भाई और बेटे, भतीजे सब यहीं से पढ़े हैं। खैर चलते हैं। फिर कभी दुबारा आ जायेंगे।'
वापस जाते समय, महाविद्यालय के पास ही मधुबन की चट्टी पर, वंशनारायण की दृष्टि, एक चाय की दुकान पर बैठे वृद्ध पर पड़ी। चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था। वंशनारायण की घूरती नज़रों ने, उसके मन में यह जानने के लिए प्रश्न खड़ा कर दिया 'आखिर यह कौन है! इतने ध्यान से देख रहा है। ' फिर एकाएक बोल पड़ा -
'वंशनारायण  ...! '
'मातबर! वाह भाई, क्या बात है ! तुम्हारी यादाश्त तो कमाल की है, पहचान लिया। '
'अरे, इतने पुराने मित्र हो, तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ। वैसे, बुढ़ापे में तो पुरानी बातें और भी ताजा हो जाती हैं। और, तुम तो दिल्ली में बस गए हो न! यहाँ कब आये ?'
'बस एक सप्ताह ही हुआ। साथ के काफी लोग तो निकल चुके, बस एकाध लोग ही बचे हैं। उन्हीं की याद यहाँ खींच लाती है। सोचा, चलें एक बार अपने पुराने स्कूल की याद ताजा कर आयें।'
'और कमला, हरिद्वार, हरिहर कैसे हैं ? शिवशंकर के स्वर्गवास के बारे में तो पता चला था। '
'हाँ, बाकी सभी ठीक हैं। बस शिवशंकर थोड़ा पहले ही साथ छोड़ गया। '

'पूरे पचास वर्षों के बाद मिले हो, ये लो पहले यहाँ पर चाय पियो, फिर घर चलते हैं; तुम्हारी भाभी से मिलवाता हूँ और बहू के हाथ की चाय पिलवाउंगा।'
घर पहुंचते ही मातबर चिल्लाने लगे, 'कामिनी! कामिनी! देखो कौन आया है। कुछ नाश्ता पानी का प्रबंध करो। वंशनारायण मेरे बचपन के साथी हैं। आज चालीस वर्ष के पश्चात मिले हैं। पानी ले आओ, फिर पूरी कहानी बताता हूँ। '

'मंगई के सन छप्पन की बाढ़ ने क्षेत्र को दो भागों में बाँट दिया था।  नदी पार कर पाना कठिन हो गया था। छपरी विद्यालय के प्रांगण में जल भर गया था। विद्यालय की कक्षाओं में, पानी में से ही होकर जाया जा सकता था। नदी के दूसरी ओर के छात्रों का विद्यालय आना असंभव हो गया था। मंगई नदी पर बना छोटा सा पुल बहुत नीचे था और पुल के ऊपर से पानी बह रहा था। जल भराव का यह तांडव महीने भर से भी ऊपर चला। पूरे क्षेत्र में पूर्व माध्यमिक स्तर का एक ही विद्यालय था। मैं और वंशनारायण दोनों ही उस विद्यालय में अध्यापक थे। छात्रों के शिक्षा के संकट को देख, वंशनारायण ने नदी के इस पार के छात्रों को एकत्र कर के, मलिकपुरा में, एक मंदिर के प्रांगण में बने एक कमरे में पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। उनके इस अभियान में, मैं और इनके भाई कमलापति भी सम्मिलित हो गए। प्रारम्भ में तो दस बारह छात्र ही थे, जिनमें से आधे इन्हीं लोगों के गांव के थे, दो तो इनके भाई ही थे, हरिहर छठी में और हरिद्वार सातवीं में। महीने भर में ही यह संख्या पचास तक हो गयी। इस बात ने हम लोगों का उत्साह बढ़ा दिया। मलिकपुरा और मधुबन के निवासियों का समर्थन मिला और नदी के इस पार के सभी छात्र इस नए विद्यालय में आने लगे। धीरे धीरे बाढ़ समाप्त हुई, नदी का जल सूखा। तब तक मलिकपुरा में छात्रों की संख्या काफी बढ़ गयी थी। इस पार  के छात्र अब छपरी नहीं जा रहे थे। क्षेत्र के सभी लोग यही जानते हैं कि मेरे पिता जी के कारण इस विद्यालय की स्थापना हुई पर इसके वास्तविक सूत्रधार तो ये वंशनारायण जी हैं।'

मातबर की बात को बीच में काटते हुए वंशनारायण बोल पड़े, 'अगर आप के पिता फौजदार तिवारी नहीं होते तो यह विद्यालय कहाँ चल पाता। मलिकपुरा के विद्यालय की सफलता देख, छपरी विद्यालय का प्रबंधन चिंतित होने लगा था और इसकी सफलता के रथ को रोकने में जुट गया। मुझे तो फिर से छपरी आने की चेतावनी दी जाने लगी। मेरे नहीं कहने पर स्कूल को बंद करवाने की धमकियां मिलने लगीं। कुछ समय के लिए तो मैं भी डर गया था, किन्तु तुम्हारा साथ और तुम्हारे पिताजी के समर्थन में खड़े हो जाने से जो साहस मिला, उसके परिणाम स्वरुप स्कूल को कोई हिला नहीं पाया। हमारे पढ़ाये बच्चों के परिणाम देखकर, नदी की दूसरी ओर के भी कई छात्र नए विद्यालय में आने लगे थे। मुझे तो देख लेने की धमकी तक मिल चुकी थी, पर तुम्हारे पिता जी ने बोला, कोई आंख उठाकर तो देखे। उसके बाद तो मेरा डर समाप्त हो गया।'

'तुम्हे पता है! छपरी वाले मुझे दूने वेतन का प्रलोभन भी दिए थे। स्कूल तोड़ने  के लिए क्या क्या चाल नहीं चले। उस बंजर भूमि को खाली कराने के लिए, कुछ लोगों ने भगवान् सिंह को भड़काना प्रारम्भ कर दिया था। सीधे नहीं माने तो उनके साले के द्वारा भी कहलवाए कि वे मलिकपुरा में विद्यालय को न चलने दें।  किन्तु इस पूरे क्षेत्र में वे ही सबसे अधिक पढ़े लिखे थे और शिक्षा के महत्त्व को भली जानते थे। अपने गांव में चल रहे स्कूल को कैसे बंद करवा देते। और तो और, उनके शिक्षा विभाग में कार्यरत होने का विद्यालय को भरपूर लाभ मिला। वे, न ही केवल दृढ़ होकर बोले 'स्कूल यहीं चलेगा', अपितु इसको मान्यता भी दिलवा दिये। यह विद्यालय तो कालांतर में डिग्री कालेज हो गया और छपरी का विद्यालय बंद ही हो गया। तुम तो दिल्ली चले गए, मैं यहीं लगा रहा और उप प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत्त होकर पेंशन ले रहा हूँ।'

'क्या करता, उस समय मात्र बारह रुपये का तो वेतन मिलता था, और उस बारह रुपये वेतन के लिए ढाई कोस पैदल चलकर आना पड़ता। हमारे पास साइकिल तक नहीं थी। बच्चों से दो दो आना फीस ली जाती और उसी में से अध्यापकों का वेतन दिया जाता। मेरी बहन दिल्ली में थी, उसने बुलवा कर पचास रुपये की नौकरी दिलवा दी। फिर मैंने वहां जाकर, कमला को भी बुलवा लिया। कमला को भगवान सिंह ने बहुत रोका, पर अधिक कमाने की ललक नहीं रोक पाई। वैसे भगवान सिंह ने बहुत कहा, आगे चलकर वेतन बढ़वा देंगे और यहाँ मुख्याध्यापक बनने का भी अवसर है। पर मैंने ही वहां अधिक वेतन होने के कारण दिल्ली आने पर जोर दिया। कुल मिलाकर जिंदगी तो अच्छी रही, पर इस बात का मलाल रहा कि अपने लगाए पौधे को सींच नहीं पाए।'

'वैसे रुक जाते तो बुरा नहीं था। बाद में तो यहाँ भी अच्छा वेतन हो गया था। भगवान सिंह के सहयोग से विद्यालय को सरकारी अनुदान मिल गया और भवन भी बन गया। भगवान सिंह के शिक्षा विभाग में होने के कारण विद्यालय ने मुड़ कर वापस नहीं देखा। सरकार की मदद से, पूर्व माध्यमिक से माध्यमिक, माध्यमिक से डिग्री कॉलेज और फिर पोस्ट ग्रेजुएट, आगे बढ़ता ही गया। और आज कम से कम भी तो कुल चार हजार बच्चे इस संस्थान से प्रति वर्ष शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यहाँ के पढ़े छात्र कई जगह ऊँचे पदों पर भी जा पहुंचे हैं। '

'यही होता है, पेड़ लगाने वाला, खुद कहाँ फल खाता है। अभी आई।' कहते हुए मातबर की पत्नी उठकर चल दीं
और तुरंत ही कटोरे में पकौड़े लेकर आ गयी।
'अरे, वाह भाभी, अभी गयी और इतनी जल्दी पकौड़े!' वंशनारायण ने बड़े आश्चर्य से पूछा।
'हाँ, हम यहाँ बैठे थे तो अंदर बहू  बना रही थी। आज, पुराने ज़माने के दो शिक्षक मिले हैं, वो भी मलिकपुरा स्नातकोत्तर महाविद्यालय के संस्थापक, उनका मैं, और किस वस्तु से स्वागत करूँ। तब तक पकौड़े खाइये, अभी हलवा लेकर आती हूँ। हमारी और इनकी तो अभी नहीं हुई है, आप दोनों के मिलने की स्वर्ण जयंती भी हो चुकी है।'
एक दूसरे से मिलकर बंशनारायण और मातबर दोनों ही बहुत भाव विभोर थे।

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