मसली फुलवा / सुलगती जिंदगी / जिंदगी सुलगती रही
नाम तो फुलवा था, मगर विवश थी, मसली हुई जिंदगी बिताने को। उसके साथ जो कुछ भी घटित होता, विधि का विधान समझ, सह लेती। उसने खुद को इतना साध लिया था कि उसके आगे दुःख बौना लगने लग गया था। दुखों में रहने की ऐसी आदत पड़ गयी थी कि सुख की कभी चाहत ही नहीं होती। श्रीमद भागवत गीता का अध्ययन तो नहीं की थी, मगर मूल मन्त्र उसके मानस पटल पर अंकित था। उसे पूरा भरोसा था, देने वाला वही है और उतना ही देगा, जितना उसे देना है, अन्यथा परिश्रम में किसी से कम कहाँ थी। लगभग पूरी उम्र, जिंदगी का लाश ही ढोई। फुलवा को जीती जागती जिंदगी जीने का तो अवसर ही नहीं मिला।
यूँ तो बचपन में सब ठीक ठाक था। एक साधारण परिवार में ही पैदा हुयी, पर माँ बाप के प्यार में कोई कमी नहीं थी। फुलवा के माँ बाप पढ़े लिखे नहीं थे और स्कूल गांव से दूर था, बेटी को भी नहीं पढ़ा पाये। अभी तो अठारह भी पूरे नहीं हुए थे कि माँ बाप ने एक लड़का ढूंढ कर विवाह कर दिया। ससुराल की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं थी, अपितु मायके से निम्नतर ही थी। फुलवा का ससुर सुमेरचंद, फेरी लगाकर कुछ सामान बेचता और उसी से परिवार चलाता। उसका पति देवचंद भी पांचवी से ऊपर नहीं पढ़ा था, और छोटे पर से ही, अपने पिता के काम में लग गया था। सुमेर के स्वर्गवास के बाद, घर का पूरा कार्यभार देवचंद पर ही आ गया। गांव गांव घूमने में परिश्रम अधिक था और लाभ बहुत कम। किसी प्रकार से परिवार का भरण पोषण हो पाता। फुलवा के मायके का एक व्यक्ति, मुम्बई रहता था, उससे बात करके देवचंद को भी मुम्बई भिजवा दी। वहां जाकर, वह चना और मूंगफली बेचने लगा। मुम्बई में गांव से अधिक कमाई हो रही थी, मगर वहां का खर्च भी उसी तरह का था, खोली का ही कितना भाड़ा लग जाता। फिर भी कुछ न कुछ बचाकर, घर भेज देता। देवचंद अपने घर को पक्का बनवाना चाहता था। जब तक वह मुम्बई में रहा, उसके भेजे पैसे से पक्के घर की नींव डाल दी गयी और एक कमरे की दीवार भी चुन ली गयी, मगर उस पर छत पड़ने का योग नहीं हो पाया। गांव वालों से घास फूस मांग कर, किसी तरह से ऊपर छप्पर ही पड़ पाया।
इधर फुलवा बड़ी कठिनाई से अकेले जीवन काट रही थी। उसे बस पड़ोस की सीता चाची का ही सहारा था। अपना सुख दुःख वह सीता चाची से कह लेती। समय बीता उसने एक पुत्री को जन्म दिया; सीता चाची के सहारे सब ठीक ठाक हो गया। तीन वर्ष बीते, उसने पुनः गर्भ धारण किया। देवचंद तो मुम्बई में ही था, इसलिए इस बार वह मायके चली गयी, और वहां एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। मुम्बई में देवचंद अस्वस्थ रहने लगा और फुलवा के बच्चों के साथ अकेले रहने की चिंता भी सता रही थी। इस कारण, कुछ वर्षों में काम धाम छोड़ कर वापस अपने गांव आ गया। आखिर फुलवा को भी पास पड़ोस पर कब तक छोड़ता। देवचंद की बीमारी ने गंभीर रूप धारण कर लिया। अभी बेटी शीला तेरह वर्ष की ही थी, देवचंद दुनिया छोड़, चल बसा। अब तो फुलवा की जिंदगी में केवल अंधकार ही था। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि वह क्या करे ? उसका एक एक पल, गीली लकड़ी की तरह सुलग रहा था। अब कमाई का कोई साधन भी नहीं था, और दो दो बच्चे साथ। देवचंद ने कोई बीमा तक नहीं करवा रखा था, ताकि उसके मरने पर, फुलवा को कुछ मिल पाता। अब, फुलवा को एक एक पैसे के लिए जूझना पड़ रहा था। मज़बूरी क्या न करवा दे। फुलवा ने पंडित शिवशंकर के घर बर्तन मांजना शुरू कर दिया। पंडित जी के यहाँ काम करने से उसका गुजर होने लगा। कभी कभी बचा खुचा खाना भी मिल जाता, जिसे खाकर बच्चे खुश हो जाते। पंडितानी उदार थीं, त्यौहार वगैरह पर साड़ी लुग्गा भी दे देती थीं।
शीला अभी अट्ठारह की भी नहीं थी कि फुलवा के मायके से सन्देश आया, कोई लड़का देख रखा है, विवाह कर दे। शीला तो अभी नासमझ थी ही, फुलवा के पास भी, ना नुकुर करने का कोई कारण नहीं था। मायके वालों की बात से लगा कि लडके वाले ठीक ठाक हैं तो फुलवा सोचने लगी, वे शीला से शादी करेंगे भी या नहीं। रुपये पैसे तो थे नहीं, मगर लडके वाले फुलवा के भाई के दबाव में थे और शीला बहुत सुन्दर थी। उन्होंने शीला की सुंदरता पर, बिना किसी लेन देन के शादी कर लिया। फुलवा को लगा कि वह एक बहुत बड़े दायित्व से मुक्त हो गयी। अब बस लड़का है, बर्तन भांडे मांज कर पाल ही लेगी। थोड़ा बड़ा हो जायेगा तो वह उसका सहारा भी बन जायेगा।
एक दिन सुबह की किरणें आते ही, उसकी जिंदगी में आग लगा दीं। अभी वह सूरज को जल चढ़ाने की तैयारी कर रही थी कि शीला के ससुराल से समाचार आया, वह पिछली रात खाना बनाते हुए जल गयी, और घर पर ही दम तोड़ दी। फुलवा के तो सिर पर पहाड़ टूट पड़ा। हे भगवान ! आज यह दिन देखने के लिए जिन्दा ही क्यों रखा था! मगर, वह रोने धोने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती थी। बेटी के ससुराल वालों के कहे का उसे विश्वास करना ही था। पुलिस से जाँच करवाने की न तो उसके पास ज्ञान था, न ही हिम्मत। उसके अपने ही कष्ट कुछ कम नहीं थे। यूँ तो उसके मन में तरह तरह के प्रश्न उठते, आखिर वह खाना बनाते समय कैसे जली होगी ? खाना बनाना तो छोटे पर से ही सिखा दिया था। कहीं उसके ससुराल वालों ने त्रास तो नहीं दिया ? अथवा वे जलाकर मार डाले हों कि और अच्छी, दान दहेज़ वाली बहू मिल जाएगी। बेटी की मृत्यु के रहस्य को वह जिंदगी भर ढोती रही। उस संकट की घड़ी में भी उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। दुखों का एक एक पल, वह पी गयी।
फुलवा बहुत सुन्दर थी, पर पढ़ी लिखी नहीं होना उसे पग पग पर चुभ रहा था। विधवा होने के कारण वह सदा सशंकित रहती कि दामन में कहीं कोई दाग न लग जाय। इसीलिए किसी से कोई मदद के लिए भी नहीं कहती।
एक बार ठाकुर बलदेव सिंह ने उसकी ओर सौ रुपये का नोट बढ़ाया तो लेने से साफ मना कर दी। 'साहब कोई काम दे दीजिये, जाने कौन से कर्म किये, ऊपर वाले ने इस जन्म में इतने दुःख दिए, अगला जन्म भी क्यों बिगड़वाना चाहते हैं। इस तरह खैरात लेकर मैं चैन से कैसे मरूँगी।'
एक दो लोग और उसकी मदद तो करना चाहते थे मगर डरते थे, कहीं कोई आक्षेप न लग जाये। फुलवा भी आंख उठाकर किसी की ओर नहीं देखती। पड़ोस की एक दो औरतों से बात करके, अपना मन कुछ हल्का कर लेती। इक्कीसवीं शताब्दी में भी फुलवा को इस प्रकार की जिंदगी बितानी पड़ रही थी। उसके पास न तो कोई नेता फटकता न ही कोई समाज सेवी। कहते हैं न, गरीबी में अपना साया भी साथ छोड़ देता है। पंडित शिव शंकर के घर से उसे जो कुछ सहारा मिलता था वह भी जाता रहा। पँ शिवशंकर के मरने के पश्चात बर्तन मांजने का काम उनकी बहुओं ने अपने हाथ में ले लिया और फुलवा फिर से बिना काम के हो गयी। अब तो वह दाने दाने को तरसने लगी। किसी से कुछ मांगना उसके आत्मसम्मान के विरुद्ध था।
उसके बाद तो फुलवा को ऐसा काम करना पड़ा जो न तो किसी ने देखा होगा न ही सुना होगा। गांव में कई भूमिहीन लोग किसी की जमीन लेकर अधिया पर खेती कर लेते हैं, परंतु स्त्री होने के कारण वह यह भी नहीं कर सकती थी। पंडित जी के यहाँ दो भैंसे थीं, फुलवा ने उनके बेटे पुन्नर को प्रस्ताव दिया की भैंसों का गोबर उठाकर वह उपले पाथ देगी और आधा उसे दे देगी। यह बात उसे पसंद आई, मुफ्त में ईंधन का काम जो चलना था। सौदा तय हो गया। इसके बाद वह उपले बेचकर अपना बसर करने लगी। उसे अब ईंधन का कोई अकाज नहीं है। वह दिन अभी तक याद है, जब एक दिन घर में ईंधन नहीं होने के कारण चूल्हा नहीं जला था। अब तो ईंधन के लिए पहले रख लेती है, उसके ऊपर का ही बेचती है। भाग्य ने एक बार और तमाचा मारा। पंडित जी की एक भैंस बीमार हो गयी, खाना पीना बंद कर दिया और साथ ही गोबर भी। अब मिलने वाला गोबर आधा हो गया। उसने उपले पाथा तो घनघोर घटा घिर आई। उसे बड़ी चिंता होने लगी, घर में ईंधन समाप्त हो गया था। उसने ढूंढ ढूंढ कर, टाट बोरों से उपलों को ढक दिया ताकि उपले का गोबर कहीं बारिश में बह न जाय। उपले सूख नहीं पाए। आखिरकार पंडित जी के घर से उधार मांग कर लाई। पर मुसीबत पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। जब चूल्हा जला तो पता चला, आटा समाप्त था। अब क्या करती, चाची के घर से मांग कर रोहित को दाल चावल खिला दी और अपने लिए, घर में थोड़ा चना पड़ा था, तवे पर भून कर खाई। ईश्वर ने भी किस प्रकार से भाग्य बांटे, नागफनी में भी फूल खिलते हैं पर फुलवा की जिंदगी में, बस कांटे ही कांटे।
रोहित, मुम्बई की चमक धमक देखकर बहुत प्रभावित था। उसने गरीबी को बहुत समीप से देखा था। अतः इस स्थिति से निकलने के लिए संकल्पित था। माँ को खर्च के लिए पैसे भेजने के बाद, कुछ अपनी पढ़ाई में लगा देता। उसने दूरवर्ती शिक्षा योजना के अंतर्गत बी० ए० कर लिया। उसके बाद किसी अन्य कंपनी में, उसे अच्छी नौकरी मिल गयी। इधर शीला अब बूढी हो चुकी थी, बीमार थी। बेटे की कमाई से घर की छत पड़ गयी थी। अब उसे अपनी जरूरतों के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ता था। जो कुछ पैसा वह भेजता, उसमें बड़े आराम से काम चल जाता। अब उसका काम केवल अपने घर को संवारना और राम राम जपना रह गया था।
एक दिन बेटे का फोन आया, 'माँ, मैं अगले सप्ताह आ रहा हूँ, तेरे खाते में मैंने बीस हजार रुपये डाल दिया है। इस बार तेरे लिए गैस का कनेक्शन और नल लगवा दूंगा, और तुझे मुम्बई घुमाने ले चलूंगा।' फुलवा पास पड़ोस को बड़ी खुश होकर, रोहित के फ़ोन की बात बताती। पूरे गांव में ढिंढोरा पिट गया था कि फुलवा मुम्बई जा रही है। अभी तीन दिन ही बीते थे, फुलवा की तबियत अचानक बिगड़ गयी। पड़ोसियों ने डॉक्टर को बुलाया, हजारों रुपये की दवा आई, मगर कोई लाभ नहीं हुआ। पड़ोस की महिलाएं बार बार आकर उससे हाल चाल पूछ जातीं, वह यही कहती 'अब कोई चिंता नहीं बस दो दिन में रोहित आ जायेगा। सब सम्हाल लेगा।' उसकी नाजुक हालत देखकर सीता चाची की बहू, आज फुलवा के ही घर सोयी। उसे रात में भी कई बार दवा देनी थी। कल रोहित को भी आना था। सुबह होते ही फुलवा की जोर जोर से सांसें चलने लगी। बहू ने अपने घर से सबको बुला लिया। देखते ही देखते पास पड़ोस के कई लोग एकत्र हो गए। डॉक्टर को तुरंत ही बुलाया गया। मगर फुलवा किसी का एहसान अपने सिर पर नहीं लेने वाली थी। रोहित के आने तक, उसकी लाश घर के बाहर निकाल दी गयी थी।
पूरे गांव ने उसकी जिंदगी को तिल तिल सुलगते देखा था। उसका सब्र, उसकी सहनशक्ति, उसकी सादगी, उसके सात्विक विचार, ईश्वर में अटूट विस्वास, सभी के लिए उदारहण बन गए थे। कहते हैं, गरीब की भी कोई जिंदगी होती है! परंतु मौत तो सभी की होती है। अब पूरे गांव की सहानुभूति उसके साथ थी। आज सारा गांव, उसके यहां उमड़ पड़ा था। उसके शव पर लोग फूल और चादर चढाने लगे। शव पर चादरों का अम्बार लग गया। लग रहा था उसकी जिंदगी अब शुरू हुई है। उसकी शव यात्रा के लिए पचासों लोग एकत्र हो गए। पुन्नर ने शव यात्रा के लिए अपने खर्चे पर बैंड बाजा भी बुलवा लिया। सभी कह रह रहे थे, इतनी भव्य शव यात्रा तो अभी तक यहाँ के कई गांव के लोगों की नहीं निकली होगी। और उसके चिता की लौ तो इतनी ऊँची कि जैसे आसमान छू रही हो। फुलवा, जिंदगी से तो कुछ नहीं पाई, परंतु जो मौत पाई, दुनिया ने देखा।
नाम तो फुलवा था, मगर विवश थी, मसली हुई जिंदगी बिताने को। उसके साथ जो कुछ भी घटित होता, विधि का विधान समझ, सह लेती। उसने खुद को इतना साध लिया था कि उसके आगे दुःख बौना लगने लग गया था। दुखों में रहने की ऐसी आदत पड़ गयी थी कि सुख की कभी चाहत ही नहीं होती। श्रीमद भागवत गीता का अध्ययन तो नहीं की थी, मगर मूल मन्त्र उसके मानस पटल पर अंकित था। उसे पूरा भरोसा था, देने वाला वही है और उतना ही देगा, जितना उसे देना है, अन्यथा परिश्रम में किसी से कम कहाँ थी। लगभग पूरी उम्र, जिंदगी का लाश ही ढोई। फुलवा को जीती जागती जिंदगी जीने का तो अवसर ही नहीं मिला।
यूँ तो बचपन में सब ठीक ठाक था। एक साधारण परिवार में ही पैदा हुयी, पर माँ बाप के प्यार में कोई कमी नहीं थी। फुलवा के माँ बाप पढ़े लिखे नहीं थे और स्कूल गांव से दूर था, बेटी को भी नहीं पढ़ा पाये। अभी तो अठारह भी पूरे नहीं हुए थे कि माँ बाप ने एक लड़का ढूंढ कर विवाह कर दिया। ससुराल की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं थी, अपितु मायके से निम्नतर ही थी। फुलवा का ससुर सुमेरचंद, फेरी लगाकर कुछ सामान बेचता और उसी से परिवार चलाता। उसका पति देवचंद भी पांचवी से ऊपर नहीं पढ़ा था, और छोटे पर से ही, अपने पिता के काम में लग गया था। सुमेर के स्वर्गवास के बाद, घर का पूरा कार्यभार देवचंद पर ही आ गया। गांव गांव घूमने में परिश्रम अधिक था और लाभ बहुत कम। किसी प्रकार से परिवार का भरण पोषण हो पाता। फुलवा के मायके का एक व्यक्ति, मुम्बई रहता था, उससे बात करके देवचंद को भी मुम्बई भिजवा दी। वहां जाकर, वह चना और मूंगफली बेचने लगा। मुम्बई में गांव से अधिक कमाई हो रही थी, मगर वहां का खर्च भी उसी तरह का था, खोली का ही कितना भाड़ा लग जाता। फिर भी कुछ न कुछ बचाकर, घर भेज देता। देवचंद अपने घर को पक्का बनवाना चाहता था। जब तक वह मुम्बई में रहा, उसके भेजे पैसे से पक्के घर की नींव डाल दी गयी और एक कमरे की दीवार भी चुन ली गयी, मगर उस पर छत पड़ने का योग नहीं हो पाया। गांव वालों से घास फूस मांग कर, किसी तरह से ऊपर छप्पर ही पड़ पाया।
इधर फुलवा बड़ी कठिनाई से अकेले जीवन काट रही थी। उसे बस पड़ोस की सीता चाची का ही सहारा था। अपना सुख दुःख वह सीता चाची से कह लेती। समय बीता उसने एक पुत्री को जन्म दिया; सीता चाची के सहारे सब ठीक ठाक हो गया। तीन वर्ष बीते, उसने पुनः गर्भ धारण किया। देवचंद तो मुम्बई में ही था, इसलिए इस बार वह मायके चली गयी, और वहां एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। मुम्बई में देवचंद अस्वस्थ रहने लगा और फुलवा के बच्चों के साथ अकेले रहने की चिंता भी सता रही थी। इस कारण, कुछ वर्षों में काम धाम छोड़ कर वापस अपने गांव आ गया। आखिर फुलवा को भी पास पड़ोस पर कब तक छोड़ता। देवचंद की बीमारी ने गंभीर रूप धारण कर लिया। अभी बेटी शीला तेरह वर्ष की ही थी, देवचंद दुनिया छोड़, चल बसा। अब तो फुलवा की जिंदगी में केवल अंधकार ही था। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि वह क्या करे ? उसका एक एक पल, गीली लकड़ी की तरह सुलग रहा था। अब कमाई का कोई साधन भी नहीं था, और दो दो बच्चे साथ। देवचंद ने कोई बीमा तक नहीं करवा रखा था, ताकि उसके मरने पर, फुलवा को कुछ मिल पाता। अब, फुलवा को एक एक पैसे के लिए जूझना पड़ रहा था। मज़बूरी क्या न करवा दे। फुलवा ने पंडित शिवशंकर के घर बर्तन मांजना शुरू कर दिया। पंडित जी के यहाँ काम करने से उसका गुजर होने लगा। कभी कभी बचा खुचा खाना भी मिल जाता, जिसे खाकर बच्चे खुश हो जाते। पंडितानी उदार थीं, त्यौहार वगैरह पर साड़ी लुग्गा भी दे देती थीं।
शीला अभी अट्ठारह की भी नहीं थी कि फुलवा के मायके से सन्देश आया, कोई लड़का देख रखा है, विवाह कर दे। शीला तो अभी नासमझ थी ही, फुलवा के पास भी, ना नुकुर करने का कोई कारण नहीं था। मायके वालों की बात से लगा कि लडके वाले ठीक ठाक हैं तो फुलवा सोचने लगी, वे शीला से शादी करेंगे भी या नहीं। रुपये पैसे तो थे नहीं, मगर लडके वाले फुलवा के भाई के दबाव में थे और शीला बहुत सुन्दर थी। उन्होंने शीला की सुंदरता पर, बिना किसी लेन देन के शादी कर लिया। फुलवा को लगा कि वह एक बहुत बड़े दायित्व से मुक्त हो गयी। अब बस लड़का है, बर्तन भांडे मांज कर पाल ही लेगी। थोड़ा बड़ा हो जायेगा तो वह उसका सहारा भी बन जायेगा।
एक दिन सुबह की किरणें आते ही, उसकी जिंदगी में आग लगा दीं। अभी वह सूरज को जल चढ़ाने की तैयारी कर रही थी कि शीला के ससुराल से समाचार आया, वह पिछली रात खाना बनाते हुए जल गयी, और घर पर ही दम तोड़ दी। फुलवा के तो सिर पर पहाड़ टूट पड़ा। हे भगवान ! आज यह दिन देखने के लिए जिन्दा ही क्यों रखा था! मगर, वह रोने धोने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती थी। बेटी के ससुराल वालों के कहे का उसे विश्वास करना ही था। पुलिस से जाँच करवाने की न तो उसके पास ज्ञान था, न ही हिम्मत। उसके अपने ही कष्ट कुछ कम नहीं थे। यूँ तो उसके मन में तरह तरह के प्रश्न उठते, आखिर वह खाना बनाते समय कैसे जली होगी ? खाना बनाना तो छोटे पर से ही सिखा दिया था। कहीं उसके ससुराल वालों ने त्रास तो नहीं दिया ? अथवा वे जलाकर मार डाले हों कि और अच्छी, दान दहेज़ वाली बहू मिल जाएगी। बेटी की मृत्यु के रहस्य को वह जिंदगी भर ढोती रही। उस संकट की घड़ी में भी उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। दुखों का एक एक पल, वह पी गयी।
फुलवा बहुत सुन्दर थी, पर पढ़ी लिखी नहीं होना उसे पग पग पर चुभ रहा था। विधवा होने के कारण वह सदा सशंकित रहती कि दामन में कहीं कोई दाग न लग जाय। इसीलिए किसी से कोई मदद के लिए भी नहीं कहती।
एक बार ठाकुर बलदेव सिंह ने उसकी ओर सौ रुपये का नोट बढ़ाया तो लेने से साफ मना कर दी। 'साहब कोई काम दे दीजिये, जाने कौन से कर्म किये, ऊपर वाले ने इस जन्म में इतने दुःख दिए, अगला जन्म भी क्यों बिगड़वाना चाहते हैं। इस तरह खैरात लेकर मैं चैन से कैसे मरूँगी।'
एक दो लोग और उसकी मदद तो करना चाहते थे मगर डरते थे, कहीं कोई आक्षेप न लग जाये। फुलवा भी आंख उठाकर किसी की ओर नहीं देखती। पड़ोस की एक दो औरतों से बात करके, अपना मन कुछ हल्का कर लेती। इक्कीसवीं शताब्दी में भी फुलवा को इस प्रकार की जिंदगी बितानी पड़ रही थी। उसके पास न तो कोई नेता फटकता न ही कोई समाज सेवी। कहते हैं न, गरीबी में अपना साया भी साथ छोड़ देता है। पंडित शिव शंकर के घर से उसे जो कुछ सहारा मिलता था वह भी जाता रहा। पँ शिवशंकर के मरने के पश्चात बर्तन मांजने का काम उनकी बहुओं ने अपने हाथ में ले लिया और फुलवा फिर से बिना काम के हो गयी। अब तो वह दाने दाने को तरसने लगी। किसी से कुछ मांगना उसके आत्मसम्मान के विरुद्ध था।
उसके बाद तो फुलवा को ऐसा काम करना पड़ा जो न तो किसी ने देखा होगा न ही सुना होगा। गांव में कई भूमिहीन लोग किसी की जमीन लेकर अधिया पर खेती कर लेते हैं, परंतु स्त्री होने के कारण वह यह भी नहीं कर सकती थी। पंडित जी के यहाँ दो भैंसे थीं, फुलवा ने उनके बेटे पुन्नर को प्रस्ताव दिया की भैंसों का गोबर उठाकर वह उपले पाथ देगी और आधा उसे दे देगी। यह बात उसे पसंद आई, मुफ्त में ईंधन का काम जो चलना था। सौदा तय हो गया। इसके बाद वह उपले बेचकर अपना बसर करने लगी। उसे अब ईंधन का कोई अकाज नहीं है। वह दिन अभी तक याद है, जब एक दिन घर में ईंधन नहीं होने के कारण चूल्हा नहीं जला था। अब तो ईंधन के लिए पहले रख लेती है, उसके ऊपर का ही बेचती है। भाग्य ने एक बार और तमाचा मारा। पंडित जी की एक भैंस बीमार हो गयी, खाना पीना बंद कर दिया और साथ ही गोबर भी। अब मिलने वाला गोबर आधा हो गया। उसने उपले पाथा तो घनघोर घटा घिर आई। उसे बड़ी चिंता होने लगी, घर में ईंधन समाप्त हो गया था। उसने ढूंढ ढूंढ कर, टाट बोरों से उपलों को ढक दिया ताकि उपले का गोबर कहीं बारिश में बह न जाय। उपले सूख नहीं पाए। आखिरकार पंडित जी के घर से उधार मांग कर लाई। पर मुसीबत पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। जब चूल्हा जला तो पता चला, आटा समाप्त था। अब क्या करती, चाची के घर से मांग कर रोहित को दाल चावल खिला दी और अपने लिए, घर में थोड़ा चना पड़ा था, तवे पर भून कर खाई। ईश्वर ने भी किस प्रकार से भाग्य बांटे, नागफनी में भी फूल खिलते हैं पर फुलवा की जिंदगी में, बस कांटे ही कांटे।
सरकारी योजनाओं का उसे कोई ज्ञान नहीं था। एक दिन पुन्नर के यहाँ गांव का प्रधान आया था। पुन्नर ने प्रधान से बात करके विधवा पेंशन के लिए फॉर्म भरवा दिया। डूबते को तिनके का सहारा, उसे तीन सौ रुपये महीना पेंशन मिलने लगी, इससे रोहित की पढ़ाई का खर्च निकल जाता। बेटा अब कुछ समझदार हो चुका था। माँ का गोबर पाथना, उसे अच्छा नहीं लगता। उसने जिद्द करके, माँ से यह काम छुडवा दिया और गांव के पास चट्टी पर, चाय की दुकान खुलवा दी। सड़क की पटरी पर बैठ, माँ बेटे दोनों चाय बेचने लगे। इस काम में भी बस खाने भर को ही मिल पाता। धीरे धीरे रोहित बारहवीं पास कर चुका था। फुलवा ने उसे मुम्बई भिजवा दिया । उसे छोटी मोटी नौकरी तो मिल गयी, पर पगार बहुत कम थी। फुलवा अब घर में अकेले रहती। अकेले का खाना बनाने का भी जी नहीं होता। कभी गांव में किसी के यहां जाती, पूछ देता तो खा लेती, कभी भूखे भी सो जाती। कोई भी खाने को पूछता तो बदले में कुछ न कुछ काम अवश्य कर देती। वह किसी का मुफ्त का नहीं खाना चाहती थी।
पूरे गांव ने उसकी जिंदगी को तिल तिल सुलगते देखा था। उसका सब्र, उसकी सहनशक्ति, उसकी सादगी, उसके सात्विक विचार, ईश्वर में अटूट विस्वास, सभी के लिए उदारहण बन गए थे। कहते हैं, गरीब की भी कोई जिंदगी होती है! परंतु मौत तो सभी की होती है। अब पूरे गांव की सहानुभूति उसके साथ थी। आज सारा गांव, उसके यहां उमड़ पड़ा था। उसके शव पर लोग फूल और चादर चढाने लगे। शव पर चादरों का अम्बार लग गया। लग रहा था उसकी जिंदगी अब शुरू हुई है। उसकी शव यात्रा के लिए पचासों लोग एकत्र हो गए। पुन्नर ने शव यात्रा के लिए अपने खर्चे पर बैंड बाजा भी बुलवा लिया। सभी कह रह रहे थे, इतनी भव्य शव यात्रा तो अभी तक यहाँ के कई गांव के लोगों की नहीं निकली होगी। और उसके चिता की लौ तो इतनी ऊँची कि जैसे आसमान छू रही हो। फुलवा, जिंदगी से तो कुछ नहीं पाई, परंतु जो मौत पाई, दुनिया ने देखा।
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