Friday, 14 July 2017

Assmaan ki khoj

आसमान की खोज / छोटा  आकाश

आकाश बचपन से ही बहुत होनहार और प्रतिभाशाली था। अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आता। कोई हवाई जहाज उड़ता देखता तो अपने पापा से पूछता, 'इतना बड़ा जहाज हवा में कैसे उड़ जाता है ?'
बनर्जी साहब इसका सही उत्तर तो नहीं दे पाते, पर जब उसे बताते कि जहाज, खाली उड़ता ही नहीं बल्कि अपने भीतर सैकड़ों लोगों को बिठाकर उड़ता है, तो वह बहुत रोमांचित हो जाता।
'मैं भी उसमें बैठ पाउँगा, पापा !'
'हां, क्यों नहीं।  तुम हवाई जहाज में जरूर बैठोगे। '
'कब ?'
'बस थोड़ा और बड़े हो जाओ, कुछ पढ़ लिख लो। पढ़ लोगे तो तुम्हें अच्छी सी नौकरी मिल जाएगी, तुम अफसर बन जाओगे फिर तो जहाज में देश, विदेश घूमोगे।'
आकाश अपने पापा की बात से संतुष्ट हो जाता और उन्हें खूब पढ़ने का आश्वासन देता।
'मैं आपको भी हवाई जहाज में घुमाऊंगा।'
'हां मैं भी चलूँगा, और तुम्हारी मम्मी भी चलेगी।'
'हाँ'
आकाश की जिज्ञासा बढ़ती गयी। वह कोई भी मशीन या उपकरण देखता उसके बारे में गहराई से सोचता, वह किस प्रकार बना होगा, कैसे काम करता है, क्या इससे भी अधिक उपयुक्त हो सकता है, आदि आदि। आकाश के गवेषणापूर्ण प्रश्नों को सुनकर बनर्जी साहब कहते, 'लगता है तू बड़ा होकर वैज्ञानिक बनेगा।'
धीरे धीरे, आकाश बड़ा हुआ, उच्चतर माध्यमिक में उसने विज्ञानं विषय लेकर पढ़ाई की। विज्ञानं में उसकी बहुत रूचि थी और परीक्षा में अच्छे अंक लाता। एक बार स्कूल में विज्ञान की एक प्रदर्शनी लगी। विज्ञान विषय पढ़ने वाले सभी छात्रों को प्रदर्शनी में भाग लेना था कर मॉडल बनाकर रखना था। आकाश ने सबसे कुछ अलग ही सोचा। वह सौर्य ऊर्जा से चलने वाला, छोटा सा विमान बनाना चाहता था । उसने हवाई जहाज के उड़ने की तकनिकी के बारे में अध्ययन किया और सामग्री जुटाने में लग गया। सोलर पैनल और कुछ सामान तो वह ले आया मगर और सामान के लिए काफी पैसे की आवश्यकता थी। उसे न तो घर से उतना पैसा मिल पा रहा था न ही विद्यालय ने उपलब्ध कराया। उसने अपने प्रोजेक्ट के लिए अपने एक मित्र को सहयोगी बनाने की सोचा ताकि कुछ वित्तीय मदद मिल सके। परन्तु पैसे के नाम पर वह भी विदक गया। आकाश, निराश हो गया।

फिर भी, उसकी लगन और साहस उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। वह हार मानने वाला नहीं था। यह तो जान ही चुका था अपने पास उपलब्ध साधन से वह विमान का मॉडल नहीं बना सकता था। मगर उस दिशा में उसे कुछ प्रयोग अवश्य करने थे। अब वह विमान बनाने की जगह सोलर रिक्शा बनाने में लग गया। कई विशेषताओं से परिपूर्ण, प्रदर्शनी तक उसने अपना रिक्शा तैयार भी कर लिया। थोड़ी देर धूप में रखने के बाद, बटन दबाते ही रिक्शा दौड़ पड़ता और रिमोट कण्ट्रोल से उसकी दिशा और गति नियंत्रित कर ली जाती। पूरी प्रदर्शनी में उसका वह मॉडल आकर्षण का केंद्र बन गया।  उसके बाद भी आकाश तरह तरह के प्रयोग करना चाहता, पर पैसे की जगह उसे झिड़की ही मिलती।

उच्चतर माध्यमिक परीक्षा में भौतिक शास्त्र में, उसके शत प्रतिशत अंक थे। बारहवीं के बाद, परिवार वालों ने उसे इंजीनियरिंग कराना चाहा, पर आकाश वैज्ञानिक बनने की ठान चुका था। वह बी० एससी० और उसके उपरांत एम० एससी० करना चाहता था, ताकि आगे चलकर कोई शोध कार्य करे। उसका मन अभी से कोई नया अविष्कार करने का था।  भौतिकी से स्नातक करने के बाद, उसकी पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी हुई और साथ ही, कनिष्ठ वैज्ञानिक के पद के लिए, उसका चयन हो गया।

राष्ट्र के अंतरिक्ष अनुसन्धान केंद्र में आकाश को नियुक्ति मिली तो उसे लगा कि मन  की मुराद मिल गयी। वह स्वयं को विज्ञान के लिए समर्पित कर देना चाहता था। उसके मन में था कि देश के लिये ऐसे ऐसे अविष्कार करे कि दुनिया मुंह ताके। कुछ समय तक सब ठीक चलता रहा । अनुसन्धान केंद्र में उसकी प्रतिभा को काफी सम्मान मिला और काफी कुछ सीखने को मिला। उसने अंतरिक्ष और अंतरिक्ष यान के बारे में बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वह और नए नए प्रयोग करना चाहता था पर यहां भी वही बजट का प्रश्न था। शोध व प्रयोग के लिए, आवश्यक सामग्री नहीं मिल पाती। शोध के नाम पर विदेशों से उपकरण मंगाए जाते तो उन्हें खोल खाल कर रख दिया जाता और उसके पुर्जों का विवरण नोट करने के अतिरिक्त कुछ नहीं  होता। आकाश के प्रस्ताव भी लालफीता शाही के शिकार होने लगे। कुछ समय के बाद, वह अनुसन्धान केंद्र, सरकार का एक सफ़ेद हाथी लगने लगा। हर साल बजट आता, विदेशों से कुछ उपकरण मंगाया जाता और उसे खोल खाल कर रख दिया जाता।
केंद्र में राजनीति पूरी थी। वह कोई नया प्रयोग करने की सोचता तो वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा हतोत्साहित कर दिया जाता। एक बार ने अंतरिक्ष राकेट के इंजन में सुधार के लिए एक शोध किया। उसका यह शोध कार्य, अनुसन्धान केंद्र की बुलेटिन में प्रमुख वैज्ञानिक के नाम से छापा गया, उसमें आकाश का नाम मात्र सहयोग देने भर के लिए दर्शाया गया। आकाश को राजनीति की समझ नहीं थी। वह अपनी बात सीधे तरीके से कहता जिसका लाभ और लोग उठा लेते। इस तरह की बातों से वह क्षुब्ध रहने लगा। केंद्र में जातीय समीकरण के चलते उसका स्थान्तरण एक महत्वहीन परियोजना में कर दिया गया। अब उसे लगने लगा कि यह उसके लिए उपयुक्त स्थान नहीं है।

आकाश को अपनी जगह तलाशनी थी। उसे वैज्ञानिक का तमगा नहीं चाहिए था, अपितु वास्तव में वैज्ञानिक बनना था। वह अपने रास्ते ढूंढने लगा। उसे यही लगा कि वह अमेरिका चला जाये और वहां जाकर पी०एच०डी० कर ले। यहाँ के माहौल में वह जो चाहता था, नहीं कर पा रहा था। उसने अमेरिका जाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी। न्यूयार्क के एक विश्वविद्यालय ने अंतरिक्ष विज्ञानं में पी०एच०डी० करने के लिए प्रवेश दे दिया। पी०एच०डी० करने के क्रम में उसने एक ऐसी खोज की जिससे राकेट की गति बढ़ने के साथ उसकी दिशा भी बिलकुल सटीक होती। उसके इस शोध को वहां के राष्ट्रीय विमानन और अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) ने पेटेंट करा लिया तथा उसके बदले आकाश को लाखों डालर मिले। पी०एच०डी० पूरी होने पर आकाश बनर्जी उसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो गए और साथ ही नासा के निर्माण सलाहकार।
अब प्रो. आकाश बनेर्जी को धन की कमी नहीं थी। वे कमाये हुए पैसों से एक शोध संसथान खोल लिये, जिसका नाम रखा, 'आकाश बनर्जी अंतरिक्ष अनुसन्धान केंद्र'। वे चाहते थे उनके जैसे धन के अभाव में प्रतिभाशाली छात्र  आगे बढ़ने से वंचित न रह जायें। वे भारतीय प्रतिभाशाली बच्चों का बहुत ध्यान देते।
तभी नासा ने एक राकेट यान अंतरिक्ष में भेजने की परियोजना बनाई। इस यान में शोध कार्य के लिए तीन वैज्ञानिकों को भी जाना था। राकेट के निर्माण का कार्य भार प्रो. बनर्जी को सौंपा गया। प्रो. बनर्जी और उनकी टीम अपने कार्य में जुट गयी। प्रोफेसर साहब चाहते थे उनका यह यान सभी आवश्यक आधुनिक उपकरणों से युक्त हो ताकि अच्छे से अच्छा परिणाम लेकर आये। यान तैयार हुआ तो नासा की निरिक्षण टीम उसकी परीक्षा के लिये आई। टीम ने यान को फेल कर दिया। प्रोफेसर साहब ने यान में कुछ नए फीचर जोड़ दिए थे जिसके अनुसार वैज्ञानिक यान से बाहर जिधर देखते यान का एक कैमरा उसे भांप कर उधर को घूम जाता और पलक झपकते ही वह दृश्य कैमरे में कैद हो जाता। इस विशेषता के बारे में निरीक्षण समिति को पता नहीं था। जब इस विशेषता के बारे में बताया गया और दिखाया गया तो राकेट यान को उड़ने की अनुमति मिल गयी। प्रोफेसर साहब अपनी इस सफलता से बहुत प्रसन्न हुए।  
प्रोफेसर साहब के मन में एक और सपना जागृत हुआ कि वे अपने बनाये राकेट में उड़ कर अंतरिक्ष की सैर कर के आयें। उन्होंने अपनी यह इच्छा नासा प्रशासन के समक्ष व्यक्त किया, परन्तु नासा ने उनकी उम्र के कारण इसकी अनुमति दी।
प्रोफेसर बनर्जी की बेटी, मीता अब बड़ी हो गयी थी, और अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान से ग्रेजुएट भी। प्रो. बनर्जी के अंतरिक्ष में, खुद के उड़ने का सपना तो ध्वस्त हो चुका था, अब वे मीता को इसके लिए तैयार करने में जुट गए। मीता, अंतरिक्ष में उड़ने की आवश्यक प्रशिक्षण, एक अच्छे अंतरिक्ष संस्थान से पहले ही ले रही थी। इधर प्रोफेसर साहब का मार्गदर्शन मिला तो  उसे और निपुणता प्राप्त हो गयी। मीता की लगन और तन्मयता रंग लाई। नासा के उस अंतरिक्ष अभियान में उसका चयन हो गया। मीता और प्रो. बनर्जी इस बात से बड़े प्रसन्न और उत्साहित थे। कुल छः सदस्यों की टीम का चयन हुआ था जिनमे से केवल तीन सदस्यों को ही यान में स्थान मिलना था, और मीता उन छः में से एक थी।

धीरे धीरे अंतिम उड़ान का समय आ गया। मीता अपने को बिल्कुल चुस्त, तंदरुस्त और उत्साह से भरे हुए थी। अब उसका अंतरिक्ष में उड़ने का सपना पूरा होने में कुछ दिन का ही समय था। एक दिन वह अपनी उड़ान के बारे में सोचकर प्रो. बनर्जी से पूछ बैठी, 'डैड! अगर मैं, अंतरिक्ष से वापस नहीं लौट पायी तो क्या आप रोयेंगे?'
'ऐसा कुछ नहीं होगा, बेटी। तेरा यान अपना लक्ष्य पूरा करके, जरूर वापस आएगा।'
'अगर मैं नहीं भी आउंगी तो आप रोना नहीं, और मेरे बलिदान को, आप अपना काम और आगे बढ़ने में लगाना।'
'मैं कह रहा हूँ न, ऐसा कुछ नहीं होने वाला। बड़ी मेहनत से ये राकेट यान बनाया गया है, एक एक बात का बड़ी बारीकी से ध्यान  रखा गया है। बस एक महीने की बात है। किसी प्रकार की चिंता मन से निकाल दे, हम अंतरिक्ष केंद्र के द्वारा संपर्क में रहेंगे। और इतना महान काम करने वाला, कभी मरता है क्या ?'
तभी एक टेलीफोन आया जो मीता और प्रो. बनर्जी को हिला दिया। अंतरिक्ष केंद्र से फ़ोन आ गया कि मीता का नाम अंतिम तीन सदस्यों में नहीं है, किन्तु उड़ान के समय उसे पूरे समय अंतरिक्ष केंद्र पर उपस्थित रहना है। इस बात ने प्रोफेसर साहब को बहुत आहत कर दिया।  वे सोचने लगे इंडिया में तो जाति और राजनीति का भेदभाव झेलना ही होता है, लगता है अमेरिका भी इससे अछूता नहीं। संभवतः यहाँ भी गोरे और मूल निवासियों को वरीयता दी जा रही है। मगर वे प्रशासन के निर्णय के आगे, कर भी क्या सकते थे। उनकी वह रात अफ़सोस करते ही बीती। अगले दिन मीता, मुंह लटकाकर अंतरिक्ष केंद्र पहुंची तो उसके घाव पर नमक छिड़का जाने लगा।
'व्हाट हैपेंड मीता? व्हाई हैव यू बीन ड्रॉपड? ( क्या हुआ मीता, तुम्हें ड्राप क्यों कर दिया गया?)' एक एक कर सभी पूछने लगे।
'आई डोंट नो  (मुझे नहीं पता)।' मुंह बनाकर बोलती।
 शाम होते होते एक बार फिर मीता के भाग्य ने पलटी मारा, और अचानक उसे नासा के प्रमुख ने बुला लिया। मीता उदास मन से प्रमुख के पास पहुंची।
'आर यु रेडी टू फ्लाई, मीता? (मीता तुम उड़ने के लिए तैयार हो?' प्रमुख ने पूछा।
'बट आई एम ड्रॉप्ड, सर (किन्तु मुझे रोक दिया गया है, सर)। '
'नो, यू आर इन फाइनल लिस्ट (नहीं, तुम अंतिम सूची में हो।)
उड़ने वाले सदस्यों की सूची को अंतिम रूप देते समय, पता चला कि निर्धारित सदस्यों में से एक का वजन कुछ बढ़ गया था, और ऊपर से प्रशासन ने यह भी निर्णय ले लिया था कि उड़ान भरने वाली टीम में एक महिला सदस्य अवश्य होगी। मीता का चेहरा इस समाचार से खिल उठा। उसे बधाईयां मिलनी शुरू हो गयीं। इधर प्रसन्न प्रोफेसर बनर्जी  ने चाहा कि बेटी के अंतरिक्ष यान का नियंत्रण वे नासा के अंतरिक्ष केंद्र से स्वयं करें मगर उनका यह भी सपना पूरा न हो सका। जिस दिन मीता को उड़ान भरना था उसी दिन प्रो. बनर्जी को सेवा से निवृत्त भी होना था।
निर्धारित दिन, यान अंतरिक्ष के लिए उड़ा, प्रो. बनर्जी ख़ुशी और गर्व से झूम उठे। अमेरिका और भारत के सभी अख़बारों के पहले पृष्ठ की पहली पंक्ति बनी -
'भारत की बेटी अंतरिक्ष में'

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