Monday, 24 July 2017

Door ke dhol


दूर के ढोल

राकेश परीक्षा में सदा अच्छे परिणाम लाता।  इस कारण माता पिता को भी उससे बहुत अच्छी उम्मीद रहती थी।  १० वीं १२ वीं सभी परीक्षा अव्वल दर्जे से पास किया। उसके बाद मिश्र जी ने इंजीनियरिंग करवा दिया। मिश्रा जी अच्छे स्तर के अधिकारी थे।  वे चाहते थे की पुत्र भी कोई सरकारी अधिकारी बने।  परन्तु अपने यहाँ तो इतनी कठिन प्रतियोगिता है और हर कदम पर अनिश्चितता बनी रहती है। कहीं पैसे के बल तो कहीं सिफारिश के बल अयोग्य लोग नौकरी पा जाते हैं और योग्यता धरी रह जाती हैं। एकाध जगह प्रतियोगिता में परीक्षा दिया पर सफलता नहीं मिली। सरकारी नौकरी में आधी  सीट तो आरक्षित हो जाती हैं। आधे में ही भाग्य अजमाना था।

कितना भी पढ़ लिख लो, उच्च अधिकारी बन जाओ, मगर अनपढ़ नेताओं के आगे झुकना पड़ता है। स्वयं को विषय का ज्ञान न होने पर भी उन्हीं की चलती है।  यहाँ तक कि कई बार अपमान का भी सामना करना पड़ता है। एकाध बार असफल होने के कारण राकेश कुछ उदास रहने लगा।  इन बातों से क्षुब्ध मिश्रा जी को यही निर्णय सही लगा कि  राकेश को और आगे की पढ़ाई करने लिए विदेश भेज दिया जाय। वहां कम से कम कानून व्यवस्था तो ठीक है और मानवाधिकार का सम्मान है। एक दिन उन्होंने राकेश की मम्मी के समक्ष यह बात रख दी।  उसे तो लगा की सांप सूंघ गया।
'इकलौता बेटा है वो भी दूर रहेगा ? विदेश क्यों भेजना ? यहाँ क्या रोटी नहीं मिलेगी ? और भी सभी तो इस देश में ही कमा खा रहे हैं ?' उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
'देखो जी हमने तो तंगी में जिंदगी काट ली, अगर बच्चे कुछ करना चाहते हैं तो उन्हें प्रोत्साहन देने में क्या जाता है। हाँ, जाने के लिए रुपये पैसे की जरूरत किसी तरह पूरा कर लेंगे।'
उस समय तो मिश्रा जी चुप हो गए पर बीच बीच में राकेश की मम्मी से इस विषय पर चर्चा करते रहते। उनकी नौकरी में आई तरह तरह की परेशानियों से वह परिचित थी। बार बार तबादला, राजनीतिज्ञों का गलत काम करने का दबाव, किसी राजनीतिज्ञ के प्रसन्न न होने पर हंगामा, गलती होने पर फंसने का डर अनेकों अनिश्चितताओं से घिरे, सदा भय में ही नौकरी करनी पड़ती थी। उसने अमेरिका व यूरोप के कई देशों में साफ सुथरा प्रशासन के बारे में सुन रखा था।  सभी बड़े नेताओं, उद्योगपतियों, बड़े अधिकारीयों के बच्चे विदेश पढने जाते हैं। यह सब देख कर उसका भी मन राकेश को विदेश भेजने के लिए चुगला रहा था मगर यही बात सता रही थी की एक बार विदेश गया तो वापिस नहीं आएगा।
'देखो जी भेज तो दें पर सुना है जो बच्चे विदेश पढने गए वहीँ के होकर रह गए।  हम लोग बुढ़ापे में अकेले कैसे रहेंगे?'
'अरे, अकेले क्या ? आते जाते रहेंगे और आजकल  यहाँ रहके भी  कोई क्या करता है? सब अपने अपने में व्यस्त हैं।  बीबी आई नहीं की बच्चे बीबी के हो  जाते हैं, माँ बाप की कौन सुनता है। '
तभी राकेश आ जाता है।  अमेरिका के बारे में तो मित्रों से वह पहले ही सुन रखा था और उसका भी मन अमेरिका जाने के लिए लालायित था।  मम्मी पापा के तर्क वितर्क सुन कर बीच में कूद पड़ता है -
'क्यों मम्मी, आप लोग भी साथ चलना, सब वहीँ रहेंगे। '
'इसका अर्थ कि तू भी हमें छोड़ कर जाना चाहता है। '
'मम्मी, वहां बड़ी अच्छी लाइफ है।  वृजेश, आदित्य, आलोक वहां गए, सब वहीँ सेटल हो गए। वहां की लाइफ इतनी अच्छी है, अब वे वापस आना ही नहीं चाहते। वहां उत्तम आय के साथ रोजगार के बड़े अच्छे अवसर हैं। '
'अच्छा ठीक है, जाना ही चाहता है तो हमें क्या।  हम तो यही चाहते हैं कि तू सुखी रह। '
फिर क्या, राकेश प्रसन्न हो जाता है।  दोस्त मित्रों से काना फूसी शुरू कर देता है।  दोस्तों से बात करने पर पता लगता है अमेरिका जाना इतना सरल नहीं है। बहुत पैसा लगता है, हाँ. एक बार चले गए तो वसूल भी हो जाता है।  वहां पढ़ाई चलते, पार्ट टाइम छोटा मोटा काम भी मिल जाता है।  समझदार बच्चे कुछ करके अपना खर्च निकाल लेते हैं। यह जानकर राकेश का उत्साह और बढ़ जाता है। मन में विचार करता है मैं मम्मी पापा पर अधिक बोझ नहीं डालूँगा, मेहनत करके खर्च निकाल लूँगा। फिर पढने के बाद जॉब मिल जाएगी तो इतना पैसा भेजूंगा कि इन लोगों को पैसे की कमी कभी नहीं खलेगी।
मिश्रा जी भी राकेश को पढ़ाने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। उन्होंने पहले ही सोच रखा था राकेश जहाँ तक पढ़ेगा, पढ़ाएंगे। वह चाहेगा तो अमेरिका, इंग्लैंड भी भेज देंगे। तैयारी प्रारम्भ हो जाती है, मिश्रा जी अपने निवेश का हिसाब लगाना शुरू कर देते हैं। कौन से सावधि जमा (एफ डी ) कब पूरी होगी, कितनी राशि मिलेगी। सब मिला के जो राशि बन पा रही है अमेरिका जाने के लिए भारी भरकम आवश्यकता के लिए कम पड़ रही थी। मिश्रा जी चिन्तित थे बाकी पैसे कहाँ से लायें। बैंक भी पता नहीं कितना ऋण देगा। राकेश की मम्मी कोई नौकरी वगैरह तो करती नहीं थी, पर इधर उधर से बचा कर एक लाख रुपये एकत्र कर लिए थे उसे देने का प्रस्ताव रख दिया। इधर राकेश जीआरई और टोफेल करने में जुटा था, जिसे वह पास कर लिया।  

मिश्रा जी ने एक बैंक से बात किया। उनके सरकारी नौकरी होने के कारण ऋण मिलने अधिक परेशानी नहीं हुई। एक दिन राकेश अमेरिका के लिए उड़ गया।

     

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