नरेश के आते ही मीरा ने पूछा 'कितने का माल बिका ?'
माल क्या बिका! उन्होंने तो वहां बैठने तक नहीं दिया। बैठे हैं सरकारी जमीन पर और खुद को पटरी का मालिक समझते हैं। मैं तो दूर जाकर बैठा। जैसे तैसे खर्च भर निकल पाया है।'
'बताओ सप्ताह में चार छह घंटे के लिए बैठना है वो भी इंसान का कोई मान नहीं। ये इंसान भी कुत्ता से काम नहीं। जैसे कुत्ते मांस खा रहे होते हैं और नया कुत्ता आ जाता है तो सारे मिलकर भौंकने लगते हैं और उसे खदेड़ने लगते हैं। किसी प्रकार जब धीरे धीरे दुम दबाकर वह समूह में सम्मिलित हो जाता है तो वो भी वही काम करने लगता है। चलो मैं उन्हें सबक सिखाती हूँ। '
'तुम क्या करोगी। पुलिस वाले उनके साथ होते हैं, उन्हें भी जाता है।
'
'बस देखते जाओ, मैं क्या करती हूँ। घर के पीछे वाले हिस्से का पलस्तर करवाना है न ! रेत का ट्रक कल रात को आएगा, वहीँ पटरी पर गिरवा दो। रिक्शा रिक्शा दुकान से मंगवायें, इससे अच्छा वहीँ से उठवा लेंगे।'
दो दिन बाद ही साप्ताहिक बाजार लगना था। तीन चार दुकानदारों की जगह बालू ने घेर रखा था। दुकानदार आते ही हल्ला मचा दिए, 'किसने रेत गिरवा दिया ? यहाँ तो मैं बैठता हूँ।'
वहां उनके इस बात का उत्तर देने वाला कोई नहीं था। तभी बाजार लगवाने वाला थाने का ठेकेदार दिख गया। दुकानदार उस पर बरस पड़े, 'आज की तहबाजारी हम नहीं देंगे। देखो तुम हमारी जगह की रक्षा भी नहीं करवा सकते।'
ठेकेदार भी इस बात से हतप्रभ था। किसी तरह बात टालने के लिए बोला, 'अरे कोई सरकारी काम हो रहा होगा, पटरी या नाली की मरम्मत होने वाली होगी। उसके बाद जगह खली हो जाएगी।'
दो सप्ताह और बीत गए। एक दिन नरेश पहुंचा और उन दुकानदारों से बात करने लगा। बीच में रेत की बात चलने लगी।
बोला यह बालू मेरे किसी रिश्तेदार का है। बताओ उसकी यहाँ रेत डालने की कैसे हिम्मत हो गयी। इस जगह के मैं पैसे देता हूँ।'
'क्या पता उन्होंने भी पैसे दिए हों और तुमसे अधिक दिए हों। खैर मैं उनसे कहकर, अगले बाजार तक इसे हटवा दूंगा, यहाँ थोड़ी जगह मेरे लिए भी बना देना।'
लोकार्पण
लोकार्पण में साहित्यकारों के अतिरिक्त रिष्दार और मित्र भी आये। वैसे तो किसी उत्सव जन्मोत्सव में लोग अनेकों भेंट और नकद लेकर आते हैं परन्तु यहाँ सभी खाली हाथ। जबकि उन्हें पता था कि यह भी एक उत्सव है और इसमें भी जगह, चाय पानी, इत्यादि का खर्च होता है।
कुछ देना तो दूर सभी के सभी लोकार्पण के बाद खाये पीये, मुंह साफ़ किये और चल दिए। किसी ने एक किताब तक नहीं खरीदी।
कवि महोदय को लागत के बराबर प्रकाशक से पुस्तके मिली थीं। उनके सामने समस्या थी वे उसे बेचें या मुफ्त में बाँट दें। बेचारे पुस्तक लिखने में कितना परिश्रम किये और धन भी व्यय किये किन्तु उसका मोल देने वाला कोई नहीं। कवि एक तो वैसे ही फटीचर होते हैं, जब तक सरकार या किसी संस्था से कोई पुरस्कार आदि न मिले कविता से कोई आय नहीं। अब उन्होंने सोचा वे जब किसी के जाएँ मिठाई के स्थान पर एक किताब ले जाएँ और उत्सव आदि में किताब के साथ एक सौ इक्यावन और रख दें।
उनके इस कार्य की सराहना होने लगी
अब कुछ उनके पास भी किताबे आने लगीं
किताबों का ढेर लग गया
पुस्तकालय को दान
जो किताबें मिली हैं
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