Friday, 10 July 2020

Dharm 3



निष्कर्ष और कुछ विचारणीय बिंदु  


हिन्दू धर्म में समाया, परम ब्रह्म का सत्व।

ईश, आत्मा, मोक्ष के, सिखलाता है तत्व। 


हिन्दू धर्म की परिकल्पना है कि पृथ्वी पर एक ही धर्म हो - 'मानवता का धर्म'; जो प्रेम, सत्कार, संस्कार, सदाचार, दया, शांति, अक्रोध, मित्रता, मानव कल्याण आदि से परिपूर्ण हो। हिन्दू धर्म विश्व-शांति और अहिंसा में विश्वास रखता है, और सबको यही सन्देश देता है। यह धर्म अपना प्रसार, आस्था और श्रद्धा के रूप में करता है, थोपा नहीं जाता। यह ईश्वर की परम शक्ति को मानता है, श्रीराम के आदर्शों को मानता है, श्रीकृष्ण के उपदेशों और वेद, गीता के ज्ञान को मानता है। यह नितांत आवश्यक है कि पूरे विश्व में धार्मिक सिद्धांतों पर मतैक्य हो और प्रेम तथा शांति का वातावरण बने। किन्तु इतिहास हमें यही बताता है कि या तो हिन्दू धर्म के मानवतावादी, शांति और अहिंसा के सिद्धांतों को कई अन्य धर्म निर्बलता समझ, इस पर कुठाराघात करते रहे अथवा हिन्दू धर्म में सशक्त संगठनात्मक ढांचा का लोप रहा। भय और लोभ दिखाकर बड़ी संख्या में हिन्दुओं का धर्मांतरण कराया गया। अभी भी राजनितिक कारणों से हिन्दुओं द्वारा ही हिन्दू धर्म उपेक्षित है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि हिन्दू धर्म मानवतावादी, शांतिप्रिय और अहिंसक है, किन्तु निर्बल नहीं। प्रभु श्रीराम ने क्षमाशील, दयालु और कृपालु होने पर भी दुष्टों के दलन में संकोच नहीं किया और धरती को बढ़ते अधर्म से बचाया। कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान का बल दिया जिससे अधर्म पर चल रहे, बल व संख्या में अधिक होने पर भी कौरवों का संहार किया।

हिन्दू धर्म, राम के आदर्शों का आधार है।
हिन्दू धर्म, श्रीकृष्ण के ज्ञान का भंडार है।
धरती को पाप, अधर्म से बचाने के लिए,
समय समय पर करता दानवों का संहार है। 

मैंने हिन्दू धर्म के संस्कारों, परम्पराओं, पूजा पद्धति आदि की विविधताओं पर चिंतन किया तो ज्ञान, सुंदरता और आनंद के अतिरिक्त कुछ भी नहीं पाया। हिन्दू धर्म का दर्शन करके ऐसा प्रतीत होता है कि यह रंग-विरंगे,  सुगन्धित पुष्पों से भरी एक अनंत वाटिका है, जो दर्शनार्थियों को अपने दिव्य सौंदर्य और सुगंध से परमानन्द का अनुभूति कराती है। हिन्दू धर्म में जीवन बिताकर मुझे ऐसा लगा कि धर्म के एक विशाल महासागर में संस्कार रुपी पुष्पों की नौका पर आसीन; नीचे लहराते पावन जल में क्रीड़ा करते रंगीन मत्स्य,  जीव और नाना रत्न, तथा गगन में रश्मि बिखेरते चन्द्रमा और सितारों के रूप में ईश्वर की अनुपम रचनाओं को विलोकते हुए, अपने सह-यात्रियों के साथ तैरता एक अलौकिक संसार की ओर चला जा रहा हूँ। 

मैं ईश्वर का बहुत ही कृतज्ञ हूँ कि उसने हिन्दू धर्म में जन्म दिया जो पूर्णतः मानवता, प्रकृति संरक्षण और दया भाव  का धर्म है। हिन्दू धर्म के दर्शन से ही भगवान राम के आदर्शों और श्रीकृष्ण के ज्ञान का बोध होता है; विभिन्न शक्तियों और गुणों के स्वरुप, देवी-देवताओं के नामों में ही परिलक्षित होते हैं। जैसा कि पहले ही कह चुका हूँ -

हिन्दू धर्म जीवन का दर्शन है, 
आध्यात्मिकता का दर्पण है,  
मानवता व प्रकृति का पोषक,    
ब्रह्म की लब्धि का साधन है।

ऐसे भी लोग हैं जो हिन्दू संस्कृति का आनंद तो लेते हैं, किन्तु हिन्दू-धर्म को निर्बल करने के प्रयत्नों से चूकते भी नहीं। वे येन केन प्रकारेण धर्म की आलोचना करते रहते हैं। उन्हें कुछ पाखंडियों द्वारा परोसे ढोंग ही दृष्टिगत होते हैं; वे हिन्दू धर्म का दर्शन कदापि नहीं कर पाते। कुछ लोगों ने तो भिन्न भिन्न खान-पान, भाषा, परिधान, रहन-सहन आदि होने के कारण, हिन्दू धर्म को एक जीवन शैली के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया; जो कि सही नहीं है। उन्हें पता होना चाहिए कि हिन्दू-धर्म सभी धर्मों का जनक है। संस्कृति, परम्पराएं, आहार, रहन-सहन, परिधान, वेश-भूषा आदि में भिन्नता क्षेत्र, जलवायु और भाषा आदि के कारणों से हैं। हिन्दू-धर्म की यही तो विशेषता है कि इतनी विविधता होने के पश्चात् भी यह एक धर्म है, अनेक देवी देवता हैं किन्तु ईश्वर एक है, मान्यताएं और संस्कार एक हैं। इससे तो यही लगता है कि हिन्दू धर्म एक विशाल महासागर की भांति है, जिसमें अनेकों सरिताएं आकर समाती हैं। हिन्दू-धर्म, अनेकता में एकता का एक अद्भुत उदहारण है। हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति कहना, उसकी सीमाओं को संकीर्ण करने का एक षड्यंत्र प्रतीत होता है। यदि हिन्दू-धर्म का भली से दर्शन करें तो यह भ्रम टूट जायेगा। हिन्दू धर्म जीवन पद्धति नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन दर्शन है, आत्मा का अवलोकन है और ईश्वर की प्राप्ति का साधन है। हिन्दू धर्म के अपने सिद्धांत हैं और उन सिद्धांतों पर चलता है, यह किसी दल की घोषणापत्र पर नहीं चलता। हिन्दू धर्म में गर्भधारण से अंतिम संस्कार, यहाँ तक कि पुनर्जन्म तक का दर्शन है। जन्म के पश्चात् प्राणी की दो गति होती है - जीवन और मोक्ष। मोक्ष की प्राप्ति तक प्राणी का सही मार्ग पर चलना ही धर्म है।

हिन्दू-धर्म करवाता, स्वयं से पहचान। 
आत्मदर्शन से मिले, साक्षात् भगवान। 

यह देखकर बड़ी बहुत विक्षुब्धि होती है कि कुछ लोग हिंदू धर्म के पावनतम सरोवर में खर-पतवार फेंककर उसे मलिन करने से भी परहेज नहीं करते। बहुत से लोगों ने धर्म को व्यापार बना लिया है। कुछ लोग साधु के वेश में पाखंड, मिथ्या और आडम्बर का सहारा लेकर ढोंग और अन्धविश्वास परोसते हैं।आज के वैज्ञानिक युग में भी ऐसे ढोंग करने वालों का बोलबाला है। यहाँ तक कि टेलीविजन पर भी झूठे प्रचार के द्वारा अनुयायियों को पाखंड परोसा जाता है। धन कमाने के लिए जादू, टोना, ढोंग, रूढ़िवादिता आदि का अवलंब लिया जाता है। इन सभी प्रवृत्तियों से धार्मिक आस्था और श्रद्धा का ह्रास हो रहा है। धर्म के प्रति आस्था कम होने से समाज में अपराधों की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। 

राम, कृष्ण की जन्म भूमिशिवशंकर का वास।
मद्धम हुआ प्रभाव अब, दिखता नहीं प्रकाश
रावणकंस के वंशज दिखते, यत्र, तत्र, सर्वत्र;
किसका ये अभिशापहुआ, पावनता का नाश।

समय समय पर, हिन्दू धर्म में पनपी बहुत सी कुरीतियों का निराकरण होता रहा है, यद्यपि धर्म को निर्बल करने वाले कई कारक अभी भी विद्यमान हैं; जैसे धर्म गुरुओं का पाखंड और अन्धविश्वास, वर्ण व्यवस्था, रूढ़िवादी परम्पराएं, शिक्षा का अभाव, संगठनात्मक निर्बलता, राजीनीति, संवैधानिक असमानता, अंग्रेजी शिक्षा, अन्य धर्मों का आक्रमण इत्यादि। इन सबको रोकने के लिए प्रभावशाली उपाय करने की आवश्यकता है। हमारी पौराणिक कथाएं सीख देने के लिए और चरित्र निर्माण के उद्देश्य से लिखी गयी हैं। समय के अनुसार उनके चरित्र अप्रासंगिक हो सकते हैं, किन्तु उन कथाओं में समाये तत्व हर काल के लिए सत्य हैं। आज सुचारु रूप से मिलती रोटी ने हिन्दुओं के भी मति को भ्रमित कर रखा है; कई बार कुछ लोग इस बात से अनभिज्ञ हो जाते हैं कि लाखों वर्ष से चली आ रही संस्कृति को यहाँ तक लाने के लिए हमारे पूर्वजों ने कितना त्याग किया होगा। समय समय पर पनपी कुरीतियों को भी धर्म का अंग माना जाने लगा और पूरे हिन्दू धर्म को कलंकित करने का प्रयास किया जाने लगा। जब सृष्टि उत्पन्न हुई तब ये सामाजिक बुराईयां नहीं थीं; ये सब, जब समाज बढ़ा तो साथ साथ पनपती गयीं, और समय समय पर सुधार भी होते रहे। राजनितिक और स्वार्थी तत्वों ने हिन्दू धर्म को मलिन करने का भरपूर प्रयास किया।  
  
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है :
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। वेद विदूषक परधन स्वामी।
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिशेषा। दम्भ कपट जियै धरैं सुबेषा।
(अर्थात वे अवगुणों के समुद्र, मंदबुद्धि, कामी, वेदों के निंदक और बलपूर्वक पराये धन के स्वामी होते हैं। दूसरों से द्रोह तो करते ही हैं, परन्तु ब्राह्मण द्रोह विशेषता से करते हैं। उनके हृदय में दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे सुन्दर वेश धारण किये रहते हैं।)

कहाँ तो हिन्दू धर्म का सिद्धांत है 'वसुधैव कुटुम्बकम' पर हिन्दू स्वयं ही कई धार्मिक और सामाजिक कारणों से छिन्न भिन्न है। हिन्दू धर्म में पूजा पद्धति, परम्पराओं, संस्कारों, कर्मकांडों आदि की विभिन्नताओं, राजनीति और वर्ण व्यवस्था के कारण हिन्दू संप्रदाय बिखरा हुआ है। आवश्यकता है, ऐसे उपाय करने की कि लगे सभी हिन्दू एक परिवार के हैं। ऋषि-मुनि, साधु, संतों, विद्वानों और राजाओं द्वारा अनादि काल से रक्षित हिन्दू धर्म आज कई प्रकार के संकटों से घिरा हुआ है । धर्मद्रोही और हिन्दू-द्वेष रखने वाले लोग हिन्दू धर्म पर निरंतर आघात करते चले आ रहे हैं। बहुत से हिन्दू भी हिन्दू-धर्म की गोद में पल तो रहे हैं, किन्तु स्वयं को धर्म-निरपेक्ष, आधुनिक और विज्ञानवादी कहकर, धर्म के प्रति उदासीनता रखते हैं तथा यदा कदा आघात भी पहुंचाते हैं। हमें हमारे महान हिन्दू-धर्म की रक्षा और संरक्षा के लिए दृढ़ता से कृत संकल्प होना होगा और संगठित होकर कार्य करना होगा। 
करो ना कर्म, जो करो शर्म
स्वार्थ में लिप्त, धरो ना धर्म।

बहुत से लोग, धर्म की विकृत हो गयी परम्पराओं की आलोचना तो करते हैं, किन्तु सुधार करने के लिए अग्रसर होने वाले थोड़े ही हैं। कई बार तो वे विपक्षी राजनितिक पार्टियों की भांति हिन्दू परम्पराओं और संस्कारों की आलोचना करना ही अपना धर्म बना लेते हैं। भोले  भाले हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ कर, हजारों करोड़ कमाने वाले बाबा भी हिन्दू धर्म को संगठित करने और सही मार्गदर्शन करने का कार्य नहीं करते। वे अपने लिए वैभव जुटाने और पृथक सत्ता स्थापित करने के फेर में लगे रहते हैं। हिन्दू धर्म में पनप रही कुरीतियों और विकृतियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया। धन कमाने के भांति भांति के हथकंडे अपनाये गए। आजकल तो धन को ही धर्म समझा जाने लगा है। कोई बाबा जितना ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता है, उतना बड़ा धर्मात्मा माना जाता है। धार्मिक संस्थाओं की भूमिका भी अपने संस्थागत उद्देश्यों तक सिमटी रहती है।

एक बार पुनः महाभारत के इस श्लोक को स्मरण कराता हूँ।

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
(धर्म मरने पर मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी भी नहीं करना, क्योंकि यदि धर्म मर गया तो हमको भी मार डालेगा।)

धर्म  के अनुपालन में,  सुख, समृद्धि का सार।  
धर्म को यदि मारोगे, तुमको देगा मार। 

धर्म की अवहेलना करने वाला और धर्म का विनाश देखने वाला दोनों ही पापी होते हैं। जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करता है; क्योंकि धर्म जीव को ईश्वर की एक अनुपम भेंट है। धर्म एक ऐसी धुरी है जो करोड़ों मनुष्यों को जोड़े रखती है। अनुमान लगाओ, यदि यह धुरी उखड़ गयी तो लोग किस प्रकार और कहाँ छिटक कर जायेंगे।

भगवान् ने यह भी कहा हैं -

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥
(भावार्थ : भारत में जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं धर्म के उत्थान के लिए साकार रूप में प्रकट होता हूँ॥)

धर्म का जब क्षय होता, करने को उत्थान। 
साकार रूप में स्वयं, आता है भगवान। 

ईश्वर का यह प्राकट्य अनायास ही नहीं होता। वह इस कार्य का सञ्चालन मनुष्य के द्वारा ही करता है। ईश्वर ने मनुष्य को मस्तिष्क, शक्ति और विवेक दे रखा है; जिससे कि वह इनका प्रयोग करके अपने धर्म की रक्षा स्वयं करे। भगवान हर समय प्रकट नहीं होता। भगवान् का यह प्राकट्य तब होता है, जब उसे लगता है कि अधर्म का बोलबाला इतना हो चुका हो कि मनुष्य को प्रदत्त शक्तियां उसे रोक पाने में अक्षम हो गयी हैं तथा इसके लिए अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता है। 
अब आवश्यकता है उन बिंदुओं को खोजने और उनका निराकरण करने की, जो हिन्दू-धर्म को निर्बल और निस्तेज कर रहे हैं। हिन्दू-धर्म में समाहित अवांछित तत्वों की खोज करने और उनका निराकरण करके धार्मिक परम्पराओं, संस्कारों और क्रिया-कलापों को शुद्ध करने की आवश्यकता है। इसके लिए धर्मगुरुओं, धर्माचार्यों, विद्वानों, संस्थाओं और शोध कार्य में लगे विद्यार्थियों को अपनी शक्ति को इस ओर उन्मुख करना होगा तथा हिन्दू धर्म को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए कार्य करना होगा; विश्वव्यापी जनजागरण करना होगा; हिन्दुओं के बिखराव को थामना होगा और आंतरिक तथा बाह्य किसी भी प्रकार के आक्रमण को पराजित करना होगा।

सनातन धर्म के सपूतों, उर में श्रद्धा जगाओ तुम।
त्याग आलस्य, निद्रा को, धर्म की ज्योति जलाओ तुम।
जगत में सबसे है सुन्दर, हिन्दू-धर्म ये तुम्हारा,  
लगे न कुदृष्टि शोभा को, प्राण की भांति बचाओ तुम। 
 
ज्ञान के कोष वेदों में, सभी का लाभ उठाओ तुम 
पुष्पों से चारु कानन के, जीवन अपना सजाओ तुम।  
प्रभु का प्रताप है तुम पर, हृदय रखना बसा कर के,    
श्रेष्ठतम है सनातन धर्म, जगत भर को जताओ तुम।

पाठ, शान्ति अहिंसा का, विश्व भर को पढ़ाओ तुम।  
विरोधी षड्यंत्र न रच लें, सजग सचेत हो जाओ तुम। 
हिन्दू-धर्म की जय हो, उपायों को करो ऐसे, 
रुधिर बह जाये रक्षा में, तनिक न हिचकिचाओ तुम। 

हिन्दू धर्म को सशक्त करने और हिन्दुओं को एकीकृत करने के लिए निम्न विन्दुओं पर विचार करना आवश्यक है तथा एक हिन्दू धर्म संहिता की आवश्यकता है, जिससे हिन्दू धर्म का संगठनात्मक ढांचा सुदृढ़ बने और धार्मिक क्रियाओं व प्रक्रियाओं का समुचित नियमन हो सके। हो सकता है हिन्दू-धर्म को एकीकृत करने के प्रयास कुछ लोगों को अच्छा न लगे और वे इसका विरोध भी करें क्योंकि बहुत से लोग धर्म का  व्यवसायीकरण करके लाभ अर्जित कर रहे हैं, उन्हें भी तथ्यों से अवगत कराना होगा; साथ ही सुधारात्मक कार्यक्रम में उनके हितों को भी ध्यान में रखना होगा।

१. संकल्प संस्कार : अभी तक हिन्दू-धर्म का ज्ञान और संस्कार परिवार से मिलता है। परिवार ही उसे धार्मिक परम्पराओं और संस्कारों से परिचित कराता है। हिन्दू धार्मिक संस्कारों में संकल्प संस्कार भी सम्मिलित होना चाहिए, जिसमें सभी हिन्दू बालक-बालिकाओं को जीवन पर्यन्त हिन्दू-धर्म के अनुपालन का एक संकल्प दिलाना चाहिए। यह चौदह वर्ष की अवस्था से पहले किसी भी मंदिर में या पूजा स्थल पर संकल्प संस्कार के रूप में  किया जा सकता है। हर हिन्दू का यह संकल्प हो कि वह हिन्दू-धर्म की रक्षा करेगा, संकट में पड़ने पर संघर्ष करेगा, और किसी भी हिन्दू के संकट में पड़ने पर उसकी यथासंभव मदद करेगा। भय या लोभ के कारण धर्म परिवर्तन की सोचेगा भी नहीं।

हिन्दू कुल में जन्म मेरा,
धर्म-रक्षा ही धर्म मेरा।
वेदों का ज्ञान हमें वरदान,
ईश्वर का ध्यान, कर्म मेरा।

ब्रह्माण्ड है समाया जिसमें 
परमब्रह्म की माया जिसमें 
जीवन का सर्वोत्तम मार्ग  
पर उपकार दया परहित जिसका उपदेश 
कर्तव्य परम 
गहनतम 
जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म स्वयं करता है। धर्म की रक्षा से ईश्वर की प्राप्ति होती है।

२. पूजा पद्धति :  हिन्दुओं में क्षेत्र और सुविधा के अनुसार, पूजा-उपासना की अनेक विधियां प्रचलित हैं, और उन सभी विधियों की अपनी पृथक सुंदरता और महत्व है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है - हिन्दू धर्म एक अनंत वाटिका है और इसकी विभिन्न क्रियाएं रंग बिरंगे पुष्प हैं। पुष्प कोई हो, रंग या गंध कोई हो, पुष्प तो पुष्प ही है तथा पुष्प का अनुपम धर्म है सुगंध और छटा बिखेरना। यद्यपि पूजा की विविध विधियों की स्वतंत्रता होने के साथ, कुछ क्रियाएं ऐसी भी होनी चाहिए जो सभी हिन्दू अनिवार्यतः करें और एकरूपता दर्शाएं, इससे अनुयायियों को लगेगा कि वे सभी एक साथ चल रहे हैं और सभी का लक्ष्य एक है।धार्मिक क्रियाओं में एकरूपता, सरलता और मितव्ययिता हो। कई बार अनुष्ठानों को कर्मकांडी विद्वानों द्वारा इतना जटिल बना दिया जाता है कि उसे करने से लोग परहेज करने लगते हैं। कई बार सही ज्ञान देने की अपेक्षा अन्धविश्वास भी बढ़ चढ़ कर परोसा जाता है।  


बहुत से लोग प्रतिदिन मंदिर जाते होंगे और कितने ही लोग होंगे, जिन्हें धार्मिक आस्था होते हुए भी मंदिर गए महीनों बीत जाते होंगे। यह ठीक है कि आस्था रखने वाले के मन में ही ईश्वर होता है; किन्तु हम हिन्दू हैं तो हमें हिन्दू दिखना भी चाहिए। हिन्दुओं में अभिवादन में 'राम-राम', 'जय श्रीराम', 'जय श्रीकृष्ण', 'प्रणाम', 'नमस्ते' 'नमन', 'नमस्कार' आदि कहकर किया जाता है; इन शब्दों के पीछे गहरे भाव हैं। हमारे अभिवादन के शब्दों में हिंदुत्व झलकता है। किन्तु आजकल 'हेलो' और 'हाय, बाय' का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अभिवादन ही हमारी संस्कृति का प्रथम सोपान है। अपने संस्कार और संस्कृति से विमुख नहीं होना चाहिए।  

अधिकतर हिन्दू नियमित पूजा पाठ करते हैं, किन्तु बहुत से लोग इसके प्रति उदासीन भी रहते हैं। उच्चपदस्थ व धनवान लोगों को लगता है, सब कुछ उन्हीं से चल रहा है। वे, यह भूल जाते हैं कि उन्हें वह सब करने की शक्ति, ईश्वर ही देता है। उन्हें जो कुछ प्राप्त है वह सब ईश्वर की कृपा से है। उच्च पद पर आसीन व ऐश्वर्यवान व्यक्ति भी ईश्वर के कुपित होने से घोर कष्ट का भागी बन जाता है। ईश्वर का नियमित स्मरण करना सबका धर्म भी है और कर्म भी। सभी को प्रातः और सायं, अपने इष्टदेव की मन्त्रों द्वारा स्तुति करनी चाहिए। हमारे ग्रंथों में बहुत से मन्त्रों का उल्लेख है। अपनी कामना के अनुसार मन्त्र का चयन किया जा सकता है। यदि मन्त्र चयन में दुविधा हो तो 'गायत्री मंत्र' सर्वोत्तम है, जिसे परम माना गया है।

माता पिता, देवालय जाने के लिए बचपन से ही प्रेरित करें। आधुनिक युग में बहुत से लोग अपने कार्य में इतने व्यस्त होते हैं कि उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं। इसका दीर्घकाल में विपरीत परिणाम होता है। मंदिर या पूजा-स्थल पर जाने से मन का द्वन्द शांत हो जाता है और एक आत्मिक शक्ति मिलती है। मंदिर में प्रवेश करते समय देवता के नाम का जयघोष और कुछ न कुछ दान अवश्य करें। दान आत्म संतुष्टि और पुण्य के साथ धर्म के प्रचार और प्रसार में भी सहायक होगा। 

मंदिर में दर्शन करे, मिलती मन को शांति। 
मिटाय प्रभु का स्मरण, सभी आत्मिक ग्लानि। 

बच्चों के जन्मदिन पर पहले कथा पूजा होती थी, अब केक काटने की प्रथा चल पड़ी है। बच्चों के जन्मदिन पर मंदिर के दर्शन और कुछ दान करें। मंदिर में दर्शन अथवा घर में पूजास्थल पर ईश्वर को नमन करने के पश्चात् ही केक काटें। बच्चे के आयुष्मान और गुणवान होने की प्रार्थना करें। समय समय पर विधिवत पूजन, हवन, कीर्तन आदि और कुटुंब जनों के साथ भोजन करें। 

हिन्दुओं में सामूहिक पूजा और अनुष्ठान का विशेष महत्व है। अनुष्ठान आदि में परस्पर जुड़ाव और संगठित रहने की भावना उत्पन्न होती है। तीर्थ यात्रा पर भी समूह में जाने से आपसी विचार विमर्श से ज्ञान वर्धन होता है, परस्पर जुड़ाव होता है, एक दूसरे के साथ से बल मिलता है और मदद होती रहती है, यात्री भय-मुक्त रहते हैं।  

व्यक्तिगत पूजा में तो भिन्नता होती ही है, कई बार भिन्न पुजारियों द्वारा कराई गयी पूजा की विधि भी पृथक हो जाती है। मंदिरों में अपनायी जाने वाली पूजा पद्धति उल्लिखित हों तथा दर्शन, हवन, अर्पण, पाठ, आरती इत्यादि के विधि व समय का उल्लेख हो। पूजा-पाठ की भिन्नताओं को न्यून करने के लिए हमें कुछ उपाय करने होंगे। क्षेत्र, जाति, पंथ आदि में पूजा की अलग अलग पद्धति और परम्पराओं का अध्ययन करके उन्हें एकरूपता प्रदान करने की आवश्यकता है। यह तभी संभव होगा जब पंडित या पुजारियों को धर्म की औपचारिक शिक्षा दी जाय और पूजा की विधि उल्लिखित हो ताकि सभी भक्त एक पद्धति का अनुसरण कर सकें।

पूजा के समय कम से कम एक ऐसा परिधान हो, जिसे सभी धारण करें। कई समूहों में कंधे या सिर पर कोई वस्त्र रखने की प्रथा है। आधुनिक पहनावा के कारण पारम्परिक परिधानों का लोप हो चुका है। परिधान की एकरूपता संगठन का प्रतीक है।  

हिन्दुओं में व्रत रखने की परंपरा आदि काल से चली आ रही है। कुछ लोग कई पर्वों के अवसर पर व्रत रखते हैं तो कई लोग सप्ताह में एक दिन या एक जून के भोजन अथवा अन्न का त्याग करते हैं। अलग अलग देवी देवताओं की व्रत कथाएं भी प्रचलित हैं। व्रत का अपना एक आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और वैयक्तिक लाभ है, जिसका एक निश्चित और सरल नियम होना चाहिए और सभी को पालन करना चाहिए। 

३. एक चिन्ह और पहचान : हिन्दू धर्म में ॐ और स्वास्तिक के चिन्ह को मन्त्रों के रूप में प्रयोग किया जाता हैं। ॐ की उत्पत्ति वेदों से है और प्रत्येक वेद का नाम ॐ से ही आरम्भ होता है। हिन्दू धर्म के द्योतक के रूप में भी ॐ का प्रयोग होता है। ॐ प्रयोग करने के लिए एक निश्चित दिशा निर्देश होना चाहिए। हिन्दू मंदिरों पर लगे ध्वजों में भी ॐ का प्रयोग होता है। ध्वज का भी एक निश्चित मान दंड होना चाहिए और प्रत्येक मंदिर पर हिन्दू ध्वज लगा होना चाहिए। ॐ को हिन्दू धर्म का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। 

४. केंद्रीय हिन्दू संगठन : यूँ तो हिन्दुओं की हजारों धार्मिक संस्थाएं हैं जो अपने विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए गठित हैं। हजारों की संख्या में ट्रस्ट हैं जो किसी मंदिर के निर्माण या प्रबंधन से सम्बंधित हैं अथवा किसी विशेष धार्मिक या सामाजिक कार्य या शिक्षा के उद्देश्य से स्थापित की गयी हैं। आवश्यकता है एक ऐसी राष्ट्रीय स्तर की केंद्रीय संस्था की, जो पूजा पाठ व संकीर्तन से हट कर हिन्दू धर्म को संगठित करने, उसके प्रचार-प्रसार, नियमन और सञ्चालन का कार्य भार उठाये और सम्पूर्ण हिन्दू-धर्म व समाज को समग्र रूप से लेकर आगे बढ़े। हिन्दू धर्म और संस्कृति की शिक्षा के पाठ्यक्रम निर्धारित करे। संस्था का कार्यों के अनुसार विभागीकरण हो जैसे हिंदुत्व बोध, पुजारी या पुरोहिती, कर्मकांड, अध्यात्म, वेदांत, विधि आदि। संस्था की सम्पूर्ण राष्ट्र में इकाइयां हों जो हिन्दू धर्म के विषय में जन-जागरण करे और धर्म बोध दे। धर्म के प्रचार प्रसार के साथ कर्मकांडी पंडित और पुजारियों को शिक्षित करे। 
संगठन के उद्देश्य:
क. सभी हिन्दू संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित करना और समय समय पर दिशा निर्देश।
ख. धर्म की शिक्षा का मानकीकरण करना तथा कर्म कांड, पूजा व अध्यात्म सम्बन्धी पाठ्यक्रम तैयार करना। 
ग. प्रशिक्षित पुजारियों की आजीविका में सहायता करना।
घ. संकट में पड़े हिन्दू या हिन्दू वर्ग की सहायता करना।
च. निःशुल्क या मितव्ययी धार्मिक यात्राओं / तीर्थ पर्यटनों का प्रबंध।
छ.  धर्मशाला आदि का निर्माण व प्रबंध।
ज. धर्म ग्रंथों के पुस्तकालयों की व्यवस्था।
झ. हिन्दुओं के अन्य धार्मिक संस्थाओं की मार्गदर्शक संस्था। 
ट. सरकारी व शासकीय उत्पीड़न से बचाव।
ठ. धार्मिक विवादों या पचड़ों में विधिक सहायता।
ड.  भू माफियाओं  द्वारा मंदिरों की भूमि पर अवैध अधिग्रहण को हटाना। 
ढ. प्रकृति की रक्षा के उपाय।
त. अन्य धर्मों व शक्तियों के आक्रमण से बचाव।
थ. प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान के साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का अध्ययन करवाना।
द. रूढ़िवादिता, पाखंड, अन्धविश्वास आदि के विषय में जागरूकता बढ़ाना। 
ध. चरित्र निर्माण। इत्यादि। 

उसकी संगठनात्मक ढांचा :
क : वैश्विक या केंद्रीय, राष्ट्रीय 
ख. विभाग: शिक्षा, मंदिर निर्माण व प्रबंधन, साहित्य व प्रचार, कर्मकांड नियमन, समाज कल्याण, वित्त, विधि 
ग. इकाईयां : प्रादेशिक, जनपदीय, क्षेत्रीय
घ. प्रबंधन व नियंत्रण : व्यावसायिक संस्थानों की भांति चयनित/मनोनीत समिति  द्वारा
च. वित्त : भक्तों द्वारा दान व सरकारी अनुदान

जनपद के सभी मंदिर, जिला स्तर के संगठन से जुड़े हों। उनके नियमित प्रबंधन और किसी प्रकार के आपात की अवस्था में संगठन उसका मार्गदर्शन करे। जिला स्तर की सभी इकाईयां, क्षेत्रीय स्तर से जुड़ी हों और क्षेत्रीय स्तर केंद्रीय संगठन से। 

५.  धर्म की  शिक्षा : 
मंदिरों में पंडित या पुजारी भी प्रायः अप्रशिक्षित ही होते हैं और पूजा विधि तथा कर्म कांड आदि अपने परिवार से सीखते हैं। इस कारण से न तो पूजा की पद्धति का, न ही धर्म की शिक्षा का मानकीकरण हो पा रहा है। बचपन में बच्चा मंदिरों में जाकर हाथ जोड़ना सीख जाता है, किन्तु अपने धर्म, संस्कारों और परम्पराओं को ठीक से नहीं जान पाता। धर्म के संवैधानिक अधिकार की सुरक्षा तभी हो पायेगी, जब सबको समान रूप से बिना भेद-भाव, धर्म की सही शिक्षा प्राप्त हो। कई विश्वविद्यालय और संस्थाएं संस्कृत तथा वेद पढ़ाते हैं और उसी को हिन्दू धर्म की शिक्षा मान लिया जाता है। यह सत्य है कि संस्कृत भाषा और वेद दोनों ही हिन्दू धर्म की मूल है, किन्तु ये आम जन से दूर हैं। आवश्यकता है कि सभी हिन्दू अपने धर्म की मूलभूत बातों का ज्ञान प्राप्त करें। अभी तक हिन्दू धर्म के विषय में जानने के लिए प्रवचनों पर निर्भर होना पड़ता है। जहाँ प्रवचनकर्ता अपने अपने ढंग से हिंदुत्व का ज्ञान देते हैं। कई बार वे अपना पंथ विकसित करने में लग जाते हैं। 

 धर्म की शिक्षा में सरकारी भेदभाव समाप्त होना किये। सरकार सभी धर्मों की शिक्षा का व्यय वहन करे। किसी धर्म को पूर्ण रूप से स्वतंत्र और किसी धर्म में सरकारी हस्तक्षेप जैसा भेदभाव नहीं हो। सरकार, किसी धर्म द्वारा अन्य धर्मों के प्रति घृणा या वैमनस्यता का पाठ पढ़ाने पर अंकुश रखे। यदि सरकार हिंदुत्व की शिक्षा देने में संकोच करती है तो इसके लिए हिन्दू संगठनों को यह कार्य स्वयं करना चाहिए। सरकार को इसके सञ्चालन के लिए धन की व्यवस्था करनी चाहिए। इसमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इस प्रकार की शिक्षा से संकीर्ण मानसिकता और सांप्रदायिक भावना उत्पन्न न हो, जिससे कि इनके पृथक दुष्परिणाम भुगतने पड़ें। धर्म को आधार बनाकर धर्म-गुरुओं का उद्देश्य शोषण और सत्ता प्राप्ति न हो जाय।

धर्म-शास्त्र के पाठ्यक्रम चलाये जाने चाहिए। पंडिताई, पुरोहिती व कर्मकांड के डिप्लोमा या प्रमाणपत्र प्रदान किये जा सकें। विश्वविद्यालयों से सम्बन्ध स्थापित करके या स्वतंत्र विद्यालयों द्वारा माध्यमिक, स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम भी स्थापित किये जायँ। पाठ्यक्रम में हिन्दू धर्म क्या है? धर्म का महत्व, धर्म के तत्व, धर्म व मानवता / समाज, हमारे देवी देवता, हमारे धार्मिक ग्रन्थ, हमारे त्यौहार और पर्व, पूजा या उपासना के प्रकार व महत्व, पूजा स्थल, स्वच्छता, प्रार्थना, ईश्वर और प्रमुख देवता, हिन्दुओं के संस्कार और उनका महत्व, चरित्र निर्माण, धर्म के प्रति हमारे कर्तव्य, हमारे तीर्थ स्थल, प्रकृति और धर्म, पूजा की विधि, कर्मकांड, पुरोहिती, ज्योतिष, कुप्रथाएं, धर्म और विज्ञान, हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता, धर्म की रक्षा के उपाय, वेद, वेदांत, अध्यात्म, दर्शन, शोध इत्यादि विषय सम्मिलित किये जा सकते हैं। 

६. वित्तीय व्यवस्था : किसी भी संस्थान या संगठन को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है। हिन्दू संगठन के पास पर्याप्त धन हो जिससे वह पुजारियों का वेतन दे, धार्मिक कार्यों को चलाये, शिक्षा की व्यवस्था करे, धर्म के प्रचार प्रसार और सुधार, धर्मशाला आदि की व्यस्था करे। मंदिरों के रख रखाव में मदद करे, निर्धन हिन्दुओं की मदद के अतिरिक्त अन्य सामाजिक कार्य करे। अभी तक धन की पूर्ति मंदिरों में चढ़ावा व दान के द्वारा ही किया जाता है। चढ़ावा तो मंदिर का ही हो जाता है। हिन्दू धर्म के वृहत उद्देश्यों को पूर्ण करने हेतु, धन की आपूर्ति के लिए निम्न उपाय करने चाहिए :
१.  सरकार से वित्तीय अनुदान।
२. प्रत्येक हिन्दू अपनी आय का सवा प्रतिशत धर्म के लिए दान करे। सरकार को हम तीस प्रतिशत तक कर (टैक्स) देते हैं। कर देने के कारण, करदाता अपने अधिकार की बात करता है। इसी प्रकार दान देने से अनुयायी की पुण्य लाभ के साथ धर्म से आत्मीयता भी जुड़ी रहेगी।
३. विवाह, जन्मोत्सव आदि में व्यय की जाने वाली राशि का सवा प्रतिशत राशि धर्म को दान किया जाय।
४. मंदिरों पर उनकी आय के अनुसार कुछ शुल्क लगाया जाय। 
५.  जिन मंदिरों का सरकारीकरण हो चुका है, उनकी आय से हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार और उत्थान के लिए धन व्यय हो।
६. धार्मिक विषयों पर आधारित फिल्म बनाने पर शुल्क या रॉयल्टी लिया जाय। सभी धार्मिक ग्रन्थ, संस्कार, परम्पराएं हिन्दू धर्म की धरोहर हैं। उनका कुछ लोगों द्वारा धन कमाने के लिए निःशुल्क उपयोग नहीं होना चाहिए।
७. धार्मिक आयोजनों, धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन, पूजा सामग्री इत्यादि के द्वारा धन अर्जन। 
  
वैसे हिन्दू संस्थाओं में धन की कमी नहीं है। कितने ही मंदिर हैं जहाँ करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है; कितने ही आश्रम हैं जो अरब-पति हैं। कई बाबा सोने चांदी के सिंहासन पर बैठते हैं और अरबों रुपये के स्वामी है। अब प्रश्न यह है, क्या इस धन का सदुपयोग भी होता है? गुरद्वारों में सिक्ख समुदाय दान देता है तो वह धन; धर्म, समुदाय व समाज के विकास तथा सुरक्षा के लिए व्यय होता है। हिन्दू मंदिरों के चढ़ावा का कुछ लोग ही स्वामी होते हैं और उस धन का सही प्रबंधन नहीं होता।   

७. मंदिरों का निर्माण व प्रबंधन : भारत में लाखों की संख्या में मंदिर हैं, इनमें से कईयों का प्रबंध संस्थाओं या ट्रस्टों द्वारा किया जाता है और कई का निजी लोगों द्वारा। अधिकतर मंदिर छोटे ही होते हैं, जहाँ मात्र दर्शन और संक्षिप्त पूजा की सुविधा होती है। कई मंदिर लोक मान्यता के कारण, तो कुछ मंदिर भव्यता के कारण, भक्तों का आकर्षण होते हैं। बड़े मंदिरों की आय छोटे मंदिरों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। निजी मंदिरों का जो चढ़ावा होता है, वह पुजारी का हो जाता है और ट्रस्ट या संस्था द्वारा प्रबंधित मंदिर की आय उन ट्रस्ट या संस्था का ही होता है। मंदिर की व्यवस्था और रख रखाव उसी आय से होती है। बड़े मंदिर में प्रचुर मात्रा में धन एकत्र हो जाता है और कई छोटे मंदिरों में पुजारी का भरण पोषण भी नहीं हो पाता। छोटे मंदिर, बड़े मंदिर से सम्बंधित होने चाहिए, जिससे उन्हें बड़े मंदिरों का सरंक्षण प्राप्त हो। 

समुन्दर का जग ऐसा, बड़ा छोट को खाय। 
समाज में जो है बड़ा, लघु का होय सहाय। 

केंद्रीय संगठन के पास मंदिरों की सूची हो जिसमें निम्न सूचना उपलब्ध हो। यह सूचना इंटरनेट पर भी उपलब्ध हो :
१. मंदिर का नाम व पता, २. प्रमुख देवी, देवता, ३. मंदिर की भूमि व अन्य सम्पदा, ४. प्रबंधन का प्रकार, ट्रस्ट/समिति/सरकार/निजी, ५. प्रबंधकों व पुजारियों के नाम, ६. धर्मशाला या अन्य सार्वजनिक सेवाएं 

नए मंदिरों का निर्माण योजना बद्ध और भव्य हो। पूजा पाठ के लिए प्रशिक्षित पुजारी की व्यवस्था हो। भक्तों की सुविधा के उपाय संस्थागत विधि से किये जायं। मंदिर में मन को शांति मिलती है और भव्यता से मन प्रसन्न होता है। भव्य मंदिर बनने से हिन्दू समाज के लिए एक निधि का भी निर्माण होगा। पुराने मंदिरों का भी, जहाँ संभव है विस्तार होना चाहिए। इन मंदिरों के द्वारा शिक्षित पंडितों के रोजगार का भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

दक्षिण भारतीय मंदिर अपने आकार और भव्यता के कारण भक्तों के आकर्षण का केंद्र बने रहे। आकार के अतिरिक्त उनकी अद्वितीय वास्तुकला और शैली भी भक्तों के अतिरिक्त पर्यटकों को भी आकर्षित करती रही है। उत्तर भारत के मंदिरों की तुलना में दक्षिण के मंदिर बहुत बड़े होते हैं। इस संबंध में यह कहना उचित होगा कि दक्षिण भारतीय राजाओं ने अपने महलों की तुलना में मंदिरों पर अधिक ध्यान दिया, और पर्याप्त धन व्यय किया। उत्तर भारत के मंदिर दक्षिण के मंदिरों की तुलना में देखने में अधिक भव्य नहीं है, किन्तु उनके पास दक्षिण के मन्दिरों तुलना में प्राकृतिक सौंदर्य अधिक है। जैसे ऋषिकेश में गंगा बहती हैं, केदारनाथ और बद्रीनाथ में हिमालय की पृष्ठभूमि होने से इन मंदिरों में शांति का वास है, वैष्णो देवी मंदिर भी पर्वतों की रमणीयता के बीच है।

दक्षिण भारत में मुग़लों का प्रभाव कम रहा, अतः उधर भव्य मंदिर बचे रहे। उत्तर भारत में जो बड़े मंदिर थे उन्हें मुगलों ने नष्ट कर दिया। मथुरा, हरिद्वार, अयोध्या, प्रयाग और काशी जैसे तीर्थ स्थल उत्तर भारत में होने के पश्चात् भी भव्य मंदिर नहीं बन पाए, इन स्थलों पर मंदिरों की संख्या की अधिकता अवश्य है।  काशी, मथुरा, अयोध्या और हरिद्वार तो मंदिरों के ही नगर हैं। इन स्थलों पर कुछ मंदिर अपनी मान्यताओं के आधार पर बहुत प्रसिद्द हैं, किन्तु अपनी भव्यता के कारण कोई मंदिर प्रसिद्ध हो, नहीं दिखता। अब हिन्दुओं का इस और ध्यान गया है और मथुरा वृन्दावन में कुछ नए भव्य मंदिर बने हैं, दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर बना है, अयोध्या में श्रीराम जन्म-भूमि स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है, काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हो रहा है आदि। द्वारका एक धाम होने के पश्चात् भी, द्वारिकाधीश मंदिर जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। इन सभी तीर्थ स्थलों के मंदिरों पर समुचित और नियमित ध्यान देने की आवश्यकता है। मंदिर की भव्यता भक्तों में गर्व का अनुभव और उनसे जुड़ाव का बोध कराती है। भक्तों के लिए समुचित धर्मशालाओं का भी निर्माण होना चाहिए तथा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलना चाहिए। प्राचीन काल में मंदिर निर्माण का कार्य राजाओं द्वारा किया जाता था। अब यदा कदा चंदा जुटा कर मंदिर निर्माण हो पाता है। दक्षिण भारत के कई मंदिरों के पास अकूत निधि है। उन्हें भी चाहिए, उसमें से कुछ भाग भारत के अन्य क्षेत्रों में मंदिरों के निर्माण व प्रसार में लगायें। 

. अन्य धर्मों के षड्यंत्र और आक्रमण से रोकथाम : अन्य धर्म के षड्यंत्रों के प्रति सजग और सचेत रहना होगा। कई धर्म अपना क्षेत्र और अपनी शक्ति बढ़ाने के उद्देश्य से हिन्दू धर्म पर कुठाराघात करते रहे हैं। यहाँ तक कि समय समय पर बहुत से हिन्दुओं का धर्मानान्तरण भी कराया जाता रहा है। ऐसी अवस्थाओं की पुनरावृत्ति न हो, यह देखना हिन्दू संगठनों का कर्तव्य है। भारत एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र है, और यहाँ अभी तक हिन्दुओं का बहुमत है। संभवतः इस बात को ध्यान में रख कर मुसलमान अपनी जनसँख्या में निरंतर वृद्धि कर रहे हैं। २०११ की जनगणना के अनुसार २००१ से २०११ के बीच मुस्लिम जनसँख्या की  वृद्धि दर २४.७ % थी जबकि हिन्दुओं की जनसँख्या का वृद्धि दर १६.८ % थी। वहीं बंटवारे के पश्चात, पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या निरंतर गिरती गयी, जो चिंता का विषय है। जनसँख्या की इस असमान वृद्धि के दूरगामी परिणाम के प्रति सचेत और सजग रहना होगा। चुनाओं में धर्म और जाति के प्रयोग पर रोक के बाद भी इनका खुलकर प्रयोग होता है। कुछ नेताओं को लगता होगा कि जनसँख्या बढ़ाने से एक दिन उनका बहुमत हो जायेगा, किन्तु विकास का रथ उलटा न चलने लगे, यह भी सोचना होगा।  

सोशल मीडिया के द्वारा हिन्दू धर्म के विषय में भ्रांतियां फैलाई जाती हैं और दुष्प्रचार किया जाता रहा है। इसे रोकने के लिए उपाय करने होंगे। हिन्दू तो अन्य धर्मों के विषय में अपना निष्पक्ष विचार भी नहीं रख सकता क्योंकि उसे आतंक का शिकार होने का भय है; वहीं हिन्दू धर्म का सार्वजानिक परिहास तक करने से भी परहेज नहीं किया जाता। प्राचीन भारतीय संस्कृति, धार्मिक साहित्य और यहाँ तक कि हिंदी भाषा पर भी आघात होता रहा है। धर्म के अनादर को रोकने के लिए कानून बने हुए हैं, जिनका प्रयोग यदा कदा ही होता है। यह मान लिया जाता है, 'इससे मुझे क्या हानि?' ऐसी बातों को धार्मिक संगठनों के संज्ञान में लाना चाहिए और वैधानिक कार्यवाही की जानी चाहिए। अपने धर्म का अनुपालन और रक्षा हमारा कर्तव्य है, साथ ही यह भी  कर्तव्य है कि अन्य धर्मों का सम्मान करें। हिन्दुओं को सांप्रदायिक कहकर आक्रमण किया जाता है, जिससे कि वे धर्म से विमुख हों। दूसरे धर्म के लोग गर्व से अपने धर्म पर आचरण करते हैं, मगर सांप्रदायिक नहीं कहे जाते। हिन्दू-धर्म ने अन्य धर्मों के आक्रमण को तो सहा, किन्तु दूसरे धर्मों के प्रति विद्वेष की भावना कभी नहीं रखी। हमें सर्वश्रेष्ठ धर्म का अनुयायी होने पर गर्व करना चाहिए।  

९. देवी-देवताओं, साधु संतों और विप्रों के अनादर को रोकना : हिन्दू धर्म के उदार होने के कारण, बहुत से लोग हिन्दू धर्म का परिहास करने से नहीं चूकते, यहाँ तक कि हिन्दू भी हिन्दू-धर्म का अनादर करते देखे जाते हैं। इसके पीछे उनका स्वार्थ और धन कमाने की लालसा होती है। मंदिर में स्थापित मूर्ति को पत्थर तक कहते हैं। हिन्दू परम्पराओं और संस्कारों का परिहास करते हैं, क्योंकि धर्म क्या है? उन्हें ज्ञान ही नहीं होता। अन्य धर्म  में फतवा का डर है, किन्तु हिन्दू धर्म में इस प्रकार का कोई भय नहीं। केवल संवेदनशील और धर्म में आस्था रखने वाले लोग ही धर्म और परम्पराओं का श्रद्धा पूर्वक सम्मान करते हैं। हिन्दू धर्म की परम्पराओं पर अपमान जनक फिल्में तक बनायीं जाती हैं। जब कि अन्य धर्मों की ढकोसलावादी या रूढ़िवादी परम्पराओं को प्रदर्शित करने की वे साहस नहीं कर सकते। 

हिन्दू धर्म के ऊपर कटाक्ष करते हुए लेख लिखे जाते हैं, कहानियां लिखी जाती हैं, फिल्में बनती हैं, धारावाहिक बनाते हैं; जिन्हें रोकने के लिए कदम उठाया जाना चाहिए। यह सच है कि हिन्दू धर्म में लोगों के भोलेपन का लाभ उठाने के उदेश्य से, समय समय पर बहुत सी ठगी वाली विद्या पनपीं। इस प्रकार की कमियां अन्य धर्मों में भी हैं, किन्तु वहां किसी प्रकार का कटाक्ष या परिहास करने का किसी में साहस नहीं है। इसका प्रमुख कारण है कि हिन्दू धर्म का कोई निश्चित संरक्षक नहीं है। शंकराचार्य, मठाधीश, मंदिरों या आश्रमों के स्वामी धर्म के गंभीर विषयों तक ही सिमटे रह जाते हैं तथा इस ओर उनका ध्यान नहीं जा पाता। भारतीय दंड संहिता में किसी भी धर्म के अनादर के विरुद्ध कानूनी प्रावधान भी हैं, किन्तु उसके प्रयोग का दायित्व कौन ले? हिन्दू धर्म में केंद्रीय संगठन होने से अनादर करने वाले नाटक, कहानी, फिल्म, साहित्य, अभिव्यक्ति आदि का संज्ञान लेकर, शीघ्र वैधानिक कार्यवाही की जा सकती है। 

१०. संवैधानिक समानता व सरकारी सहयोग : लोकतंत्र तो  बहुमत से चलता है, किन्तु भारत में कई वैधानिक प्रावधान अल्पसंख्यकों के पक्ष में हैं। भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को धार्मिक संस्थान चलाने की विशेष अनुमति देता है, इस कारण मदरसों के अतिरिक्त मस्जिदों से भी धर्म की शिक्षा दी जाती है। भारत के अतिरिक्त अन्य किसी देश में अल्पसंख्यकों के लिए पृथक कानून नहीं है।  

चूकि संविधान लिखने में हिन्दुओं का बाहुल्य था, यह मान लिया गया कि उनका वर्चस्व सदा बना रहेगा और हिन्दुओं के मर्म की उपेक्षा करने में किसी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुमत में होने के पश्चात् भी स्वतंत्रता के बाद से हिन्दू-धर्म को सतत संघर्ष करना पड़ा। अंग्रेजी और पाश्चात्य सभ्यता का वर्चस्व बढ़ता रहा। दूसरे धर्म सशक्त होते रहे। क्योंकि उन्हें संवैधानिक सुरक्षा और प्राथमिकता दी गयी। हिन्दुओं को भी संवैधानिक समानता मिलनी चाहिए और संविधान के अनुच्छेद ४४ का पालन होना चाहिए। शासन द्वारा अल्पसंख्यकों को सुरक्षा तो मिले किन्तु बहुसंख्यकों का तिरष्कार न हो। केंद्रीय हिन्दू संगठन में कानूनी प्रकोष्ठ होना चाहिए जो धर्म से सम्बंधित कानून पर दृष्टि रखे और धर्म की रक्षा हेतु कानूनी मदद करे। 

धर्म राजनीति से अछूता नहीं रह सकता। धर्म और राजनीति एक दूसरे के पूरक हैं। बहुत से धार्मिक आयोजन, मेले, उत्सव इत्यादि सरकार के सहयोग के बिना सफल नहीं हो सकते। प्राचीन काल में मंदिरों का निर्माण और कई हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान, राजाओं या शासकों द्वारा किया जाता था, किन्तु आज की भारतीय राजनीति धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दू धर्म को निरंतर उपेक्षित कर रही है। हिन्दू धर्म से हुई आय पर तो सरकारों की दृष्टि गड़ी रहती है, परन्तु हिन्दू-धर्म के लिए रचनात्मक कार्य करने में धर्म निरपेक्षता बीच में आ जाती है। धर्म और वर्ण व्यस्था का उपयोग राजनितिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खूब बढ़-चढ़ कर होता है। जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगने पर कानून द्वारा रोक लगाए जाने के बाद भी वोट मांगने के लिए नेता इसका उत्साह पूर्वक प्रयोग करते हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् लगा था कि वर्ण विभेद कम हो जायेगा, परन्तु वोट की राजनीति ने इसे और बढ़ावा दिया। राजनीति में हिन्दू धर्म को दोहरी मार पड़ी है। तथाकथित अल्पसंख्यक राजनेता तो अपने धर्म की ही बात करते हैं, किन्तु हिन्दू नेता हिन्दुओं की उपेक्षा। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, पद-प्राप्त हिन्दू नेता भी हिन्दुओं को सांप्रदायिक कहकर चिढ़ाते हैं। वे अपने पद के नशे में यह भी भूल जाते हैं कि यदि धर्म की रक्षा नहीं होगी तो उनकी आने वाली पीढ़ियों पर क्या बीतेगी। किसी अन्य धर्म का अनुयायी, यदि बड़ा नेता, मंत्री, अधिकारी आदि बन जाता है, तो भी वह अपने धर्म को धारण किये रखता है; किन्तु हिन्दू का हिंदुत्व क्षीण होने लग जाता है। वह गर्व के मारे उसी पद का होकर रह जाता है और पद के मद में अँधा हो जाता है।  हिन्दू धर्मनिरपेक्षता का चोला पहन कर अहिन्दू का रूप ले लेता है। राजनीतिज्ञों को सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करना चाहिए और अपने धर्म के व्यक्तिगत अनुपालन में संकोच नहीं करना चाहिए। राजनितिक उद्देश्य और स्वार्थ सिद्ध करने के लिए धर्म-निरपेक्षता के ढोंग से बचना चाहिए। 
सांप्रदायिक कहलाने से हिन्दुओं को डरना या लज्जित नहीं होना चाहिए।
सरकारी पद प्राप्त होने पर भी अपने धर्म की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। 
धर्म का स्थान राजनीति से ऊपर है। 
सरकारी साधनों का प्रयोग निष्पक्ष रूप से होना चाहिए।
अपना धर्म अवश्य निभाना चाहिए और सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। 
किसी के द्वारा धार्मिक भावना को आघात पहुँचाने पर कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। 
धर्म और राजनीति का घाल मेल न हो। दोनों साथ चलें किन्तु धर्म का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। 
सरकार द्वारा आर्थिक मदद मिलनी चाहिए तथा मंदिरों के सभी पुजारियों के लिए वेतन सुनिश्चित होना चाहिए। 

वेदों में है उल्लिखित, राजा का कर्तव्य। 
स्वार्थ तज प्रजा पालन, सुरक्षा, न्याय, सत्य।  


११. हिन्दू संस्कृति व साहित्य की चोरी को रोकना : हिन्दू-धर्म के पौराणिक साहित्य का अंग्रेजी आदि में मनमाने ढंग से अनुवाद हो रहा है। उनमें समाहित तत्वों की कोई जाँच नहीं होती। हमें तो यह लगता है कि इससे हिन्दू धर्म का प्रचार हो रहा है, किन्तु इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इसी की आड़ में हमारे धार्मिक साहित्य और सिद्धांत एक ओर तो विकृत हो रहे हैं, दूसरी और इनकी चोरी भी हो रही है। उन पर कुछ और कलेवर चढ़ाकर दूसरे धर्मों में आत्मसात कर लिया जाता है, धीरे धीरे उन धर्म के लोग अपना कहने लगते हैं। वैसे तो हिन्दू धर्म और उसके सिद्धांत सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हैं, किन्तु किसी भी रूप में उसका विकृत होना सम्पूर्ण मानवता के लिए घातक है। 
 
आजकल अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई के कारण, हमारी संस्कृति और भाषा की शुद्धता का ध्यान नहीं रखा जाता। इस कारण धार्मिक साहित्य की भाषा और संस्कृति दोनों ही विकृत हो रहे हैं। सही भाषा का प्रयोग नहीं होने से कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है। अब तो इंटरनेट पर कुछ का कुछ डाल दिया जाता है, समय बीतने के साथ उसी को सत्य माना जाने लगेगा। अंग्रेजी शिक्षा के कारण हमारी संस्कृति का लोप होता जा रहा है। आज अंग्रेजी शिक्षा, हिन्दू संस्कृति को छीन रही है, लोग हिन्दू पर्व और त्यौहारों के दिन भूलते जा रहे हैं और मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, न्यू ईयर डे, फ्रेंड डे, यूथ डे, पीस डे, गर्ल डे, वीमेन डे, कैंसर डे, चॉक्लेट डे, पिज्जा डे, प्रॉमिस डे, किश डे,  फूल्स डे, पोएट्री डे, अर्थ डे, रेड क्रॉस डे, डॉक्टर डे, लिकर डे, फोटोग्राफी डे, टीचर्स डे, इंजीनियर डे, आदि आदि याद हैं। सूची बहुत लम्बी है। हिन्दू धर्म में  इन सभी बातों का महत्व पहले से ही है।  

भाषा - भारत में अंग्रेजी भाषा का प्रसार यह कहकर किया गया था कि इसके बिना, विज्ञान की पढ़ाई सुचारु रूप से नहीं हो पायेगी और भारत विकास में पीछे रह जायेगा। जो कि असत्य है, इसमें मात्र राजनितिक स्वार्थ था। जापान, कोरिया, रूस, चीन आदि ने यह सिद्ध कर दिया कि अंग्रेजी के बिना भी विज्ञान और विकास दोनों संभव है। उर्दू साहित्य देवनागरी लिपि में लिखा जा रहा है। हिंदी साहित्य में संस्कृत के शब्द आने पर 'कठिन' कहकर आलोचना होती है। मार्गों के सूचनापट्ट पर, मार्ग का नाम तो उर्दू की लिपि में लिखने की मांग होती है। हिंदी के लेखकों व कवियों को हिंदी विद्वानों द्वारा समुचित प्रशंसा व मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण, तालियों के लिए उर्दू की शरण ले रहे हैं। भारत में भाषा के प्रयोग का मूल्यांकन करने और अन्य भारतीय भाषाओँ के विकास के साथ हिंदी को राष्ट्रव्यापी व राष्ट्र-भाषा बनाने की आवश्यकता है। 


१२. सोसियल मीडिया द्वारा हो रहे सांस्कृतिक प्रदूषण को रोकना: आजकल कोई भी, कोई उटपटांग सामग्री  इंटरनेट पर डालने में संकोच नहीं करता। इंटरनेट पर कई आलेखों के द्वारा हिन्दू धर्म का परिहास होता है, हिन्दू धर्म को निर्बल बनाने  के उद्देश्य से विरोधी तत्वों द्वारा भांति भांति के मिथ्या और भ्रामक प्रचार किये जाते हैं; इस प्रकार की गतिविधियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। यह भी देखा जा रहा है कि हिन्दू सिद्धांतों व विचारों को बड़ी निपुणता से अन्य धर्मों द्वारा अपना बताकर, इंटरनेट पर डाल दिया जा रहा है। हिन्दुओं की कई पौराणिक कथाओं और सिद्धांतों को कुछ संपादन करके उन धर्मों द्वारा अपना प्रदर्शित कर दिया जाता है। इस प्रकार हिन्दू धार्मिक साहित्य की चोरी भी हो रही है। नई पीढ़ी न तो धार्मिक ग्रन्थ पढ़ती है, न ही उन्हें नियमित शिक्षा के अंतर्गत धर्म का ज्ञान दिया जाता है। वह सोसिअल मीडिया और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को ही सर्वथा सत्य मान लेती है। भविष्य में चलकर यह हिन्दू साहित्य और संस्कृति के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इस प्रकार की कृतियों के प्रति सजग  सचेत रहना होगा। सोसिअल मीडिया पर किसी भी प्रकार के असत्य और भ्रामक सामग्री का विरोध होना चाहिए। हमारे हिंदुत्व की सामग्री समुचित प्रकार से जाँच परख कर सोसिअल मीडिया के द्वारा प्रचारित होनी चाहिए। हिन्दू संगठनों में सोसिअल मीडिया हेतु एक प्रकोष्ठ होना चाहिए, जो इन बातों की देख रेख करे; भ्रामक और अनर्गल प्रचारों की जांच करता रहे और इनकी रोक थाम के आवश्यक उपाय करे। 

१३. अन्धविश्वास, ढोंग, रूढ़िवादिता से मुक्ति ढोंग, अंधविश्वासों और रूढ़िवादिता को रोकने के लिए आवश्यक उपाय करने होंगे। अन्धविश्वास मनुष्य के मानसिक निर्बलता का परिचायक है। अंधविश्वासों के प्रति अनुयायियों को शिक्षित करना चाहिए, जिससे वे अंधविश्वासों और ढोंग के आडम्बर से बचें। अन्धविश्वास, ढोंग, पाखंड, जादू-टोना, टोटका, तंत्र-मन्त्र, झाड़-फूंक और आडम्बर आदि का अध्ययन करके उनके बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है, जिससे के उन्हें दूर किया जा सके। इसके लिए विज्ञान की भी मदद ली जाय। भारत में जादू, टोना, तंत्र-मन्त्र के ढोंग आदि रोकने के लिए कानून भी बने हैं किन्तु शिक्षा के अभाव में उनका विस्तृत प्रभाव नहीं दिखता। अन्धविश्वास शोषण को जन्म देता है। इसके निराकरण के लिए कानून, शिक्षा और जनजागरण आवश्यक है। हिन्दू धर्म को ढोंग और अंधविश्वासों का नहीं अपितु पूर्ण रूप से वैज्ञानिक धर्म बनाना है। जीव के बलि-प्रथा पर रोक लगनी चाहिए।   

किसी को भी सभी विषयों का ज्ञान नहीं हो सकता। बहुत सी बातों के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है। यहाँ तक कहीं जाने के लिए भी यदि कोई मार्ग बताता है तो उस पर विश्वास करके जाना पड़ता है। लोगों को शिक्षित करके और ढोंगियों के ढोंग को उजागर करके अंधविश्वासों को रोकना होगा। क्षेत्रीय मंदिरों का यह पवित्र कार्य भी होना चाहिए कि समाज में फैली धार्मिक भ्रांतियों को दूर करें। फलित ज्योतिष, राशिफल, तंत्रों आदि द्वारा परोसे जा रहे अनावश्यक बातों पर, जिन पर विश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं होता, नियंत्रण होना चाहिए। ये अधिकतर भविष्यफल गोल मोल करके बताये जाते हैं और कभी तुक्का लग जाय तो ज्योतिषी जी की शाख बन जाती है। ज्योतिष के अप्रमाणित बातों को प्रकाश में लाना चाहिए, जिससे की अन्धविश्वास का निराकरण हो। टोना टोटका जैसी क्रियाओं पर रोक लगनी चाहिए। 

भारतीय दंड संहिता की धारा ५०८ के अनुसार, जो कोई किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करता है या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करता है कि यदि वह उसके द्वारा कही बात को न करेगा,  दैवी अप्रसाद का भाजन हो जाएगा, या बना दिया जाएगा तो वह दंड का भागी होगा। इसी प्रकार जादू-टोना एवं अंधविश्वासों पर रोक लगाने के लिए कई राज्यों ने अलग कानून बनाये हैं। 


१४. धर्म व विज्ञान का समन्वय: लोगों में विज्ञान का ज्ञान कम होने के कारण धर्म के कई अंधविश्वास और रूढ़िवादिता आज भी प्रचलित हैं। हमारी शिक्षा के पाठ्यक्रम में दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई में विज्ञान को अनिवार्य किया गया है। देखा जाय तो विज्ञान में भी अन्धविश्वास है। सभी को विज्ञान का ज्ञान तो होता नहीं, बहुत सी बातों पर उन्हें विश्वास ही करना पड़ता है। डॉक्टर रोग को बढ़ा चढ़ाकर बताये या किसी रोग को कुछ और बताये तो रोगी को विश्वास करना पड़ता है। अन्धविश्वास तो ज्ञान के अभाव से उत्पन्न होता है तथा ज्ञान के साथ समाप्त हो सकता है। धर्म का अंधविश्वास आस्था पर टिका होता है, उसे वैज्ञानिक प्रमाण के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। वेदों के साथ विज्ञान की शिक्षा भी दी जाय, जिससे की विज्ञान और धर्म का समन्वय स्थापित किया जा सके।

धर्म और विज्ञान का समन्वय आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य है। धर्म की शिक्षा के साथ विज्ञान और विज्ञान की शिक्षा के साथ धर्म का ज्ञान दिया जाना चाहिए। प्रायः देखा गया है कि धर्म द्वारा या तो विज्ञान को नकार दिया जाता है या फिर उसका दुरूपयोग होता है। मन्त्रों का स्मरण शांति पूर्वक भी किया जा सकता है या लाउडस्पीकर के द्वारा भी। आजकल भजन, कीर्तन या अन्य कार्क्रम लाउडस्पीकर के द्वारा किया जाता है, जिससे कि अधिक लोग लाभान्वित हों, किन्तु बहुत से लोगों जैसे रोगी, वृद्ध, विद्यार्थी आदि को  इन सब के कारण समस्या भी होती है। इस बात से भी सभी परिचित हैं कि विज्ञान का विकास विनाश की ओर ले जा रहा है। विज्ञान एक साधन के रूप में ही विकसित होना चाहिए, मानवता के विनाश में नहीं। विनाशकारी शस्त्र अब वैश्विक फैशन बन चुका है, इसका उन्मूलन होना चाहिए। इस क्षेत्र में भारत को विश्व गुरु बनना होगा। सुरक्षा के नाम पर ऐसे घातक अस्त्र बना लिए गए हैं जो पूरे विश्व को कई बार नष्ट कर सकते हैं। किसी भी दशा में युद्ध होने पर रक्षा तो कहाँ हो पायेगी, सर्वनाश अवश्य हो जायेगा। 

विज्ञान सुविधा से युक्त करता, पर आत्मिक रूप से निर्बल करता है।
अंधाधुंध प्रकृति का दोहन करके, पर्यावरण व ऋतु खलबल करता है।

किन्तु यह भी एक सत्य है :
विज्ञान का ज्ञान न होता, मनुष्य ईश्वर को कोसता। 
इस विशाल संसार का पेट, धर्म अकेले  कैसे पोषता?

विज्ञान में शस्त्रों का नहीं, अपितु शास्त्रों का समावेश होना चाहिए। वैज्ञानिक तकनीक और उपकरणों का समाज कल्याण में और धर्मार्थ उपयोग हो। विज्ञान के द्वारा अंधविश्वास और रूढ़िवादिता को रोकना चाहिए और धर्म के द्वारा प्रकृति के अंधाधुंध दोहन को रोकना है। विज्ञान के द्वारा मनुष्य के कर्म को समझा जाय तो धर्म के द्वारा मनुष्य के मर्म को। विज्ञान द्वारा मनुष्य की वेदना का निदान हो तो धर्म के द्वारा संवेदना का। 

विज्ञान हमें शस्त्र देता, धर्म देता शास्त्र। 
शस्त्र से वध कर सकते, शास्त्र से परास्त। 

आने वाले समय में विज्ञान इतना विकसित हो जायेगा और विध्वंसक कार्य करने लगेगा कि बिना धर्म के उस पर नियंत्रण कर पाना असंभव हो जायेगा। रोबोट आप के शब्द कुछ का कुछ सुन ले तो क्या कुछ कर देगा अनुमान लगाना कठिन है। मोबाइल फोन पर ही देखा होगा कई बार उंगली कहीं अन्यत्र छू जाती है तो अनचाहा परिणाम मिलता है। कई मशीनों में तो पीछे आने का बटन होता ही नहीं। 

विज्ञान के प्रमाण से, थमे अन्धविश्वास। 
धर्मानुकूल आचरण, रोकता है विनाश।

हमें विज्ञान के इन भावी घातक परिणामों से भी सावधान रहना है :

१. मशीनों और रोबोट के अनियंत्रित होने पर दुर्घटनाओं के प्रति। 
२. रसायनों व रासायनिक क्रियाओं के दुरुपयोग के प्रति। 
३. मशीनों और रोबोट के दुरुपयोग के प्रति। 
४. सॉफ्टवेयर और प्रोग्राम के किसी कारण वश अव्यवस्थित ढंग से काम करने के कारण। 
५. आणविक शक्ति  दुरुपयोग के प्रति। 
६. विकिरण से होने वाली क्षति के प्रति। 
७. मानवीय विकसित जीवाणुओं के अनियंत्रित होने के प्रति।  
८. प्रकृति से खिलवाड़ और उससे उत्पन्न संकटों के प्रति। 
९. दूसरे ग्रहों के प्राणियों की खोज में अनजान खतरों के प्रति। पहले मनुष्य भू विस्तार के लिए युद्ध करता रहा है। ऐसा न हो भविष्य में अंतरग्रही युद्ध हों और पृथ्वी के विनाश का कारण बनें। इत्यादि। 


१५. सस्ते साहित्य और ग्रंथों की विवेचना : हिन्दू-धर्म में कई प्रकार के सस्ते बाजारू साहित्य का भी समावेश हो गया है, जिनके कई प्रावधान निरर्थक अथवा अप्रांसगिक हैं, उनकी छंटनी करके प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। कई बातें अथवा प्रावधान ऐसे हैं जिनका कोई वैज्ञानिक या वैचारिक आधार नहीं है और रूढ़िवादिता तथा अन्धविश्वास को बढ़ावा देते हैं; इस प्रकार की अप्रासंगिक व अप्रमाणित बातों का निराकरण होना चाहिए। वैसे भोजन में मनुष्य बहुत से पदार्थ ग्रहण करता है, किन्तु उनका तत्व ही शरीर में काम आता है; शेष अवयव मल के रूप में विसर्जित हो जाते हैं। उसी प्रकार बाद में आये कई ग्रंथों और प्रवचनों में बहुत सी बातें बढ़ा चढ़ा कर कही गयी हैं। विकास और समग्र ज्ञान के लिए, विज्ञान व विवेचना पर आधारित, धर्म का मार्गदर्शन आवश्यक है। आजकल धर्म और हिंदी साहित्य पर भी कुठाराघात होने लगा है, जिससे हिन्दू संस्कृति प्रभावित हो रही है।

१६. भोज भंडारा का नियमन : हिन्दू साम्प्रदाय में सामाजिक उत्सवों और संस्कार के अवसरों पर भोज का कार्यक्रम होता है। इस प्रकार के आयोजनों से सामाजिक सद्भाव और परस्पर प्रेम बढ़ता है। भोज हमारे संस्कारों का आवश्यक अंग है। सामूहिक भोज का अपना एक पृथक ही आनंद है। भोज के आयोजन से उत्सव या संस्कार का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। भोज प्रायः निमंत्रित व्यक्तियों के लिए होता है।  

इसी प्रकार बहुत से लोग भंडारा करते हैं। इस प्रकार के आयोजनों से वहाँ उपस्थित लोगों को निःशुल्क भोजन प्राप्त होता है। भंडारा, कई बार व्यक्तिगत व्यवस्था के द्वारा हो जाता है, कई बार किसी संस्था या समूह के द्वारा चंदा एकत्र करके। कुछ लोग यह सोचकर भी भंडारा करते हैं कि लोग कहें 'यह व्यक्ति बहुत धार्मिक, दानी और समाजसेवी है'। यह सोच मस्तिष्क से निकाल देनी चाहिए, बस यही समझना चाहिए कि वह ईश्वर का एक कार्य कर रहा है और अपने ही परिवार के सदस्यों को भोजन करा रहा है। ऐसा नहीं लगना चाहिए कि खिलाने वाला व्यक्ति महान है और खाने वाला दरिद्र। भंडारा की कोई निश्चित प्रणाली नहीं होने के कारण, कई बार  नियमित और सुचारु रूप से सबको भोजन नहीं मिल पाता। भोजन की जितनी मात्रा उपलब्ध होती है, उतने में भंडारा निपटा दिया जाता है, उसके पश्चात् आने वाला व्यक्ति चाहे भूखा हो। 


भंडारे व्यवस्थित और नियमित रूप से होने चाहिए जिससे कि इसका लाभ अधिक लोगों को और नियमित रूप से मिल सके, साथ ही आयोजन का कुशल प्रबंधन हो सके और भोजन का अपव्यय न हो। हमारे गुरुद्वारों में इस प्रकार की व्यवस्था है, जहाँ संगठित रूप से बिना किसी ऊंच-नीच या धनी-निर्धन के भेद भाव के, लोगों को भोजन कराया जाता है। गुरुद्वारों में नियमित रूप से लंगर चलता है, अतः वहां आने वालों को भोजन मिलने की निश्चितता बनी रहती है। इसी प्रकार वैष्णोदेवी जाते समय, बाण गंगा में भी नियमित रूप से भंडारा चलता है। वहां भी पहुँचने वाले व्यक्ति को भोजन मिलने की निश्चितता रहती है। इन स्थानों पर भक्त व्यक्तिगत भंडारा करने के स्थान पर, संस्थाओं को द्रव्य या अन्न का दान करते हैं, जिससे ये कार्यक्रम अनुभवी व कुशल व्यक्तियों के द्वारा नियमित रूप से संचालित होता है। प्रत्येक हिन्दू को अपनी क्षमता के अनुसार विप्रों व निर्धन व्यक्तियों को भोजन कराना चाहिए। वर्ष में कम से कम  एक बार सभी को ग्यारह विप्रों / निर्धन व्यक्तियों को भोजन कराना चाहिए या इस उद्देश्य के लिए दान देना चाहिए।व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करने वाले हिन्दू जैसे डॉक्टर, वकील, अध्यापक आदि;  प्रति माह न्यूनतम एक दिन का समय किसी धार्मिक संस्थान के द्वारा आयोजित, समाज के अभावग्रस्त लोगों को अपनी सेवा प्रदान करे। किसी अभावग्रस्त व्यक्ति की मदद करना, धर्म के निर्वाह की परम संतुष्टि का बोध कराएगा और यह निष्काम कार्य उसे पुण्य प्रदान करेगा।

१७. पर्यावरण मंदिर बनें : भारत के पठारी और बंजर क्षेत्र के बड़े भूखण्ड लेकर, पर्यावरण या वन मंदिर बनाया जाय जहाँ भक्तों द्वारा वृक्षारोपण का कार्यक्रम चलाया जाय। उस स्थल पर एक छोटे भाग में मंदिर और विश्राम गृह का निर्माण हो और शेष भाग में वृक्षारोपण। उस मंदिर का दर्शन करने वाला भक्त, कम से कम एक वृक्ष अवश्य लगाये और उसके पूर्ण रूप से विकसित होने तक का व्यय उसी के निमित्त हो। इससे भक्त को वृक्षारोपण का पुण्य मिलेगा, पर्यावरण और प्रकृति की संरक्षा होगी और भविष्य के लिए निधि का निर्माण होगा। यह मंदिर संस्थागत हो और वन सम्पदा उसी संस्था की हो। एक व्यक्ति यदि अकेले वृक्ष न लगा पाये तो समूह या कुटुंब द्वारा भी लगाने का प्रावधान हो। प्राकृतिक स्थलों पर एकांत में बने मंदिरों पर अधिक भक्त जाना चाहते हैं, जैसे माता वैष्णो देवी मंदिर। इस प्रकार मानवीय कृत वन-मंदिर, पर्यावरण निर्माण में सहायक होंगे। हिन्दुओं में जल, वायु, पर्वत, कई पशु, पक्षी व जंतुओं को देवता तुल्य माना गया है।

ईश्वर-जीव के मध्यप्रकृति मिली है सेतु। 

प्रभु ने दिया प्रकृति हमें, पावन जीवन हेतु।   


१८.. पशु पालन व पशु सेवा : पशु पक्षी भी हमारे जीवन के अंग हैं। पशु, पक्षी जहाँ हमारे संसार को सुन्दर और शोभायमान रखते हैं; मनुष्य की सेवा अनादिकाल से करते आ रहे हैं। प्राचीन काल में पशु-धन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था। हाथी, घोड़े, ऊंट इत्यादि सभी राजाओं तथा संपन्न व्यक्तियों के प्रमुख धन होते थे। श्री रामचरित मानस में पशु धन का वर्णन है। आज मशीनों के युग में पशु का महत्व नगण्य हो चुका है। किन्तु इनके उपयोग का महत्व, आज भी जंगल, पहाड़, रेगिस्तान जैसे दुर्गम स्थलों पर पता चलता है। गाय, भैंस, बकरी, भेंड़ आदि पशु, अपने दूध आदि के कारण मनुष्य के लिए उपयोगी बने हुए हैं। कुत्ता, बिल्ली व कई पक्षियां हमारे घर की शोभा बढ़ाते हैं और सुरक्षा के लिए उपयुक्त हैं। पहले इन पशुओं को प्रेम पूर्वक पाला जाता था और इनकी सेवा को पुण्य कार्य समझा जाता था। बैल व गधा जो मानव जाति की सेवा आदि काल से करते चले आ रहे हैं, आज तिरष्कृत पड़े हैं। मनुष्य के अधिकतर कार्य अब मशीनों से होने लगे। मशीनों से फसल काटकर पुआल और डंठल खेतों में छोड़ दिया जाता है और जला कर हवा में धुआं भर दिया जाता है, जिससे लोगों को साँस लेने में कठिनाई होती है। पहले डंठल और पुआल का भूसा बनता था जो पशुओं का आहार होता था। धीरे धीरे पशु पालन की प्रथा समाप्त हो रही है। पशुओं की उपयोगिता के विकल्प ढूंढे जाने चाहिए, जिससे कि इनका संरक्षण हो सके। जिस प्रकार पहले कोल्हू आदि में पशुओं को जोता जाता था, विद्युत् उत्पादन के ऐसे उपकरण निर्मित किये जाएँ, जहाँ इनका प्रयोग हो सके। आज भी बहुत से धर्मानुयायी गोशाला चलाते हैं, जो पुण्य और व्यावसायिक, दोनों ही कार्य है। डंठल, जलाने के स्थान पर पशुओं के आहार के रूप में प्रयुक्त हो। पशु सेवा केंद्रों की स्थापना होनी चाहिए और पशु शक्ति के प्रयोग के साधन भी, जहाँ ये पशु अपनी सेवा प्रदान कर सकें और सुख पूर्वक जी सकें।


१९. कला और कलाकार : प्राचीन काल से अनेक कलाएं धर्म से जुड़ी हुई हैं। चित्रकला, मूर्तिकला, शिल्पकला, वास्तुकला, नृत्यकला, संगीतकला, निर्माणकला आदि के अतिरिक्त पाक-शास्त्र, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, रंगाई इत्यादि का हिन्दू धर्म में विशेष स्थान है। धर्म को मानव जीवन में प्रतिष्ठित करने में प्राचीन काल से ही इन कलाओं का सहारा लिया जाता रहा है। धार्मिक कार्यकलापों को अधिक प्रभावी, रोचक तथा आकर्षक बनाने के लिए कलाओं को बहुत महत्व दिया जाता था। किसी भी कलाकार को कला एक ईश्वरीय देन है। कलाकार ही अपनी कृतियों द्वारा विश्व को सुन्दर बनाता है। कलाकार, शास्त्रों और पुराणों के अनुरूप अपने कला की रचना और प्रस्तुति करते थे। अपनी कला के कारण, कलाकार विशेष सम्मान पाता था। आज के आभासी युग में कला और कलाकार दोनों ही तिरस्कृत हो रहे हैं। हम वास्तविकता और प्राकृतिक वातावरण से दूर होते जा रहे हैं। जिन कलाओं का व्यवसायीकरण हो गया वो तो जीवित रहे, शेष ने दम तोड़ दिया। ईश्वर द्वारा कला के रूप में मनुष्य को दिए गए अनुपम वरदान का संरक्षण आवश्यक है। हिन्दू समाज, मंदिरों और संगठनों को इस ओर ध्यान देना चाहिए और इन कलाकारों की कृतियों को धर्म के उत्थान में प्रयोग में लाना चाहिए।              


२०. वृद्ध वर्ग का विशेष महत्व : इसमें संदेह नहीँ कि धर्म को चलाने व प्रचार प्रसार में विद्वानों, ब्राह्मणों, संतों के अतिरिक्त वृद्धों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। वृद्ध ही अपने धार्मिक अनुभवों को अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करते हैं। वृद्ध, ईश्वर के स्मरण और अपने पूजा-पाठ के अतिरिक्त धर्म के विषय में चिंतन मनन करता है। वृद्धों को भरपूर सम्मान मिलना चाहिए जिससे कि उन्हें जीवन का अंतिम पड़ाव, सुख पूर्वक बिताने का अवसर प्राप्त हो और धार्मिक गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग ले सकें। उनके लिए तीर्थ पर्यटन और तीर्थ स्थलों पर धर्मशालाओं आदि की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। भारत में वृद्धों के लिए आश्रम, मनोरंजन केंद्र, चिकित्सा की सुविधा आदि, ना के बराबर हैं। इसके लिए उसे अपने पुत्र-पुत्रियों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस क्षेत्र में हिन्दू संगठन और सरकार को मिलकर कार्य करना चाहिए। वृद्धों की सामाजिक सुरक्षा सरकार का उत्तरदायित्व भी है, जो कि भारत में सरकारी कर्मचारियों तथा विधायक व सांसदों तक सीमित है। जहाँ वृद्धों को पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए, वहीँ वृद्धों को धर्म के प्रचार प्रसार में अपना योगदान देना चाहिए।   

२१. विदेशों में बसे हिन्दू : विदेशों में बसे हिन्दू, वहां भी हिन्दू-धर्म की सुगंध को निरंतर फैला रहे हैं। उनके कारण ही हिन्दू धर्म विश्वव्यापी बना हुआ है। जैसा देश वैसा वेश की अवधारणा के साथ रहते हुए भी वहां वे अपने धर्म का पूर्ण रूप से आचरण करते हैं तथा अपने धर्म और संस्कार का प्रसार भी। वर्षों विदेश में रहने के पश्चात् भी वे अपनी संस्कृति और सभ्यता को भूल नहीं पाते। विदेशों में रहने वाले हिन्दुओं के प्रयास से लगभग प्रत्येक देश में मंदिर बने हुए हैं, जो देवी देवताओं की उपासना के साथ, हिन्दू सभ्यता और संस्कृति के प्रसार के केंद्र भी हैं। भारतीय हिन्दू संगठनों को ऐसे विदेशों में स्थित मंदिरों की सूची तैयार करनी चाहिए और पुजारियों आदि को दूर संचार आदि के माध्यम से हिन्दू धर्म के विषय में आवश्यक ज्ञान और धर्म-शास्त्र की सामग्री से अद्यतन रखना चाहिए। हिन्दू धर्म की अपनी ऐसी वेबसाइट भी होनी चाहिए जिसके द्वारा विदेशों में बसे हिन्दू पूजा-पाठ, मुहूर्त आदि के लिए सहायता प्राप्त कर सकें।        


२२. आधुनिकता : परिवर्तन सृष्टि का नियम है किन्तु धर्म के सिद्धांत अपरिवर्तनीय हैं और अनादि काल से उसी रूप में अनवरत चले आ रहे हैं। परम्पराएं या प्रथाएं समय और स्थान के अनुरूप परिवर्तनीय होती हैं। वैज्ञानिक अनुसन्धान और आधुनिकीकरण के कारण ज्ञान में वृद्धि हुई है, जिससे कई रूढ़िवादी परम्पराओं और मान्यताओं में परिवर्तन भी आया है। मशीनों व यंत्रों द्वारा बड़े कार्य भी सरलता से हो जाते हैं। इन उपकरणों की तकनीक भी मनुष्य के मस्तिष्क में स्थित ईश्वर की देन हैं। इसी प्रकार आधुनिकता के कारण खान पान, परिधान और रहन-सहन में भी परिवर्तन आया है। इन परिवर्तनों को हमें स्वीकार करते हुए रूढ़ि धार्मिक मान्यताओं को भी बदलना होगा। धर्म पालन, हमें अनुशासन सिखाता है और अनुशासन के बिना समाज नहीं चल सकता है। किन्तु हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि धर्म के अतिवादियों द्वारा कुछ ऐसा न थोपा जाय जो अन्य लोगों के कष्ट का कारण बने। हमें धर्मान्धता से भी बचना होगा और आधुनिकता की अंधी दौड़ से भी। नई पीढ़ी का उचित मार्गदर्शन होना चाहिए तथा उनकी आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं का सम्मान भी होना चाहिए। 

अब सभी का एक ही धर्म रह गया है - येन केन प्रकारेण पैसा कमाना। अधिक धन कमाने के लिए मन की शांति खो रहे हैं, अनावश्यक होड़ कर रहे हैं, अधर्म के कार्य कर रहे हैं। आवश्यकताएं बढ़ गयी हैं जिन्हें पूरा करने के लिए अनेक मानसिक यातना सहनी पड़ती है। आधुनिक जीवन शैली के कारण क्रोध बढ़ता जा रहा है। धैर्य व सहनशक्ति का लोप होता जा रहा है। विचार संकुचित होते जा रहे हैं, सोच बस अपने तक सीमित होती जा रही है। ईश्वर के बनाये नियमों को लोग भूल रहे हैं। उन नियमों से खिलवाड़, अनर्थ को न्योता देना है। अकूत धन का स्वामी, रावण भी स्वर्ग तक सोने की सीढ़ी तो नहीं बना पाया मगर पाप की राह पर चल पड़ा। अनावश्यक होड़ से यदि हम स्वयं नहीं रुके तो कहीं न कहीं प्रकृति सब कुछ रोक देगी।   


क्यों न ऐसा हम कर लें !

कुछ अधिक समय चलने के लिए, 

जीवन की गति कम कर लें। 


२३. आत्मिक शक्ति और आत्म रक्षा : विज्ञान का सिद्धांत है 'तत्व को न तो बनाया जा सकता है, ना ही मिटाया जा सकता है'। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। किसी को कुछ मिलता है तो उसे देने वाला भी कोई होता है। सुविधा पाने के लिए परिश्रम करना होता है। सुविधा मिल जाने पर शक्ति क्षीण होने लगती है। साधन नहीं होने पर मनुष्य स्वतः कार्य करता है, साधन होने पर उसका दास हो जाता है और कार्य करने की क्षमता क्षीण हो जाती है। मनुष्य की लालसा होती है धन हो तो वह सुविधा के साधन एकत्र कर ले, साधन होने पर उससे उत्तम साधन की इच्छा होती है। फिर वह और अधिक धनवान बनने का प्रयत्न करता है, इसी लालसा में ईश्वर और धर्म से विमुख होता रहता है और सुख और शांति से वंचित होता जाता है। उसकी व्यग्रता बढ़ती जाती है, अधिक धन की प्राप्ति के प्रयत्न में संयम खो बैठता है, गर्व के कारण कर्तव्यों को भूल जाता है, धन छिन जाने का भय सताने लगता है, सहन-शक्ति के अभाव में हर समस्या बड़ी लगने लगती है। वह धन व्यय करके अपनी सभी समस्यायों का समाधान ढूंढता है, किन्तु धन से हर समस्या का समाधान नहीं मिलता। हमें ज्ञान और निरंतर अभ्यास से अपनी आत्मिक, आध्यात्मिक और धार्मिक शक्तियों को सुदृढ़ रखना चाहिए तथा परिस्थियों का सामना करने में सदैव सक्षम रहना चाहिए। 

हिन्दू अनुयायियों को दयालु और कृपालु होने के साथ वीर और साहसी भी होना चाहिए। उन्हें समुचित प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए, जिससे कि किसी भी संकट में पड़ने पर आत्म-रक्षा कर सकें। भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण ने, भक्तवत्सल, कृपालु, दया के सागर होते हुए भी दुष्टों और दानवों का संहार किया। एक कहावत है, भगवान भी बहादुरों का ही साथ देता है। ईश्वर ने मनुष्य को अपने सभी कार्य करने के लिए शक्तियां प्रदान की है। उन शक्तियों का सही और समुचित प्रयोग, मनुष्य का कर्तव्य है। शक्ति का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए। सही और गलत क्या है? ईश्वर सब देखता है। ईश्वर सत्कर्म करने वाले को पुरस्कृत और दुष्कर्म करने वाले को दण्डित भी करता है। 


२२. संसाधनों का सदुपयोग : प्रकृति ने मनुष्य को जीवन यापन करने के लिए कई प्रकार के संसाधन दिए हैं, उनका सदुपयोग और संरक्षा हमारा धर्म है। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन सम्पूर्ण मानव जाति को विनाश की ओर ले जायेगा। उन प्राकृतिक संसाधनों पर भी कुछ दबंग लोग अधिपत्य जमाकर धन अर्जित करते हैं। कई बार देखा गया है कि त्यौहार या धार्मिक उत्सव मनाते समय प्रचुर धन का अपव्यय होता है, जिसका उपयोग धर्म के उत्थान और अभावग्रस्त लोगों की सहायता में किया जा सकता है। दिवाली पर ही करोड़ों-अरबों रुपये, मात्र पटाखे जलाने में व्यय कर दिया जाता है, जबकि पटाखे जलाना पर्व मनाने का आवश्यक अंग नहीं है। इस धन का उपयोग लोकहित कार्यों में किया जाना चाहिए। कुछ लोगों को धन के अभाव में तुच्छ समझा जाता है, वहीं अन्य कुछ लोग धन के प्रभाव से न्याय तक को अपने पक्ष में कर लेते हैं। निर्धन न्याय के लिए भटकता रहता है। वही व्यक्ति अधिक कुशल समझा जाता है, जिसके पास अधिक धन है। कई बार अधिक धन कमाने के लिए छल और स्वार्थ का सहारा लेना पड़ता है और धर्म विरुद्ध आचरण करना पड़ता है। इस असमानता को न्यून करने के उपाय करना चाहिए। त्यौहारों को इस प्रकार मनाना चाहिए कि प्रसन्नता के साथ एकजुटता को बल मिले। दिवाली लक्ष्मीजी का त्यौहार है, जिसमें शांतिपूर्वक ज्योति जलाकर लक्ष्मीजी का आह्वान किया जाता है। समाज के निर्बल लोगों को भेंट देने चाहिए। पटाखे, विस्फोटक पदार्थ होने के कारण अशुभ हैं, और हमारे पर्यावरण के लिए घातक तो हैं ही। और भी कई पर्व या उत्सव हैं जिनमें साधनों के विवेकपूर्ण विधि से उपयोग की आवश्यकता है। हिन्दुओं द्वारा धन के अपव्यय को रोककर, हिन्दू समाज को सशक्त करने में लगाना चाहिए।  



ईश्वर ने ऋग्वेद का उपसंहार इस भाव के साथ किया है :

हे मनुष्योंपरस्पर अच्छे से मिल के रहो। 
दुर्भावना छोड़करएक समान वचन कहो। 
द्वेषघृणा से रहित होपरस्पर रोष  हो।  
एक दूजे से क्षोभ  होआपसी विरोध  हो।  

एक समान चित्त करकेज्ञान ग्रहण करो।   
परस्पर साथ होसमान अंतःकरण करो। 
विद्वानों की भांति ज्ञान प्राप्त मानव बनो,   
ज्ञान संपादन करते हुएप्रभु का भजन करो। 

सबके मन सम-विचार व समभाव निहित हो। 
पापविद्वेषघृणा  दुष्कर्मों से रहित हो।  
उपास्य ईश्वर की नित्य स्तुतिवंदन हो,
परस्पर संगति होचित्त प्रेम के सहित हो।

सब लोगों के एक से भाव व निश्चय हों।  
आप सभी के एक समान ही हृदय हों।    
एक सा अभिप्राय होएक साम्प्रदाय हो,
प्रभु की उपासना करोजीवन सुखमय हो।   

पृथ्वी पर मैं आप सबको समान रखता हूँ।  
एक समान के भोजन से पोषण करता हूँ।  
आप के परस्पर कार्य अच्छे से साकार हों,
मिलकर प्रेम से रहो, सभी से यही कहता हूँ। 


              ॐ
 

हिन्दू धर्म है ऐसा, जिसका आदि न अंत।  

शाश्वत और सनातन, मोक्ष प्राप्ति का पंथ। 


    हरि ॐ तत्सत 


आत्मा : आत्मा अदृश्य है। मनुष्य द्वारा किये गए कार्यों व सुख दुःख का अनुभव उसकी आत्मा को ही होता है। आत्मा ही मनुष्य को प्राण देती है।  आत्मा के शरीर छोड़ देने पर जीव, निर्जीव हो जाता है। जीव के कार्य उसके मन, विवेक और देह के द्वारा संपन्न होता है, जिसकी अनुभूति आत्मा को मिलती है। इसीलिए, मनुष्य आत्मा की संतुष्टि के लिए भांति भांति के कर्म करता है। 

हिन्दू धर्म में आत्मा की तीन गति बताई गयी हैं। एक - आत्मा, परमात्मा का एक अंश है; जिसे वह किसी शरीर में प्रवेश कराकर जीवन देता है और भौतिक कार्य कराता है। जीव की मृत्यु के पश्चात् आत्मा किसी अन्य नवीन देह को धारण कर लेती है। दूसरा - मृत्यु के पश्चात् आत्मा उसी ईश्वर में पुनः विलीन होकर मोक्ष को प्राप्त हो जाती है। तीसरा - आत्मा का न तो पुनर्जन्म होता है न ही वो मोक्ष को प्राप्त होती है, इस कारण भटकती रहती है। यह स्थिति बहुत भयानक और दुष्कर है। भटकती आत्मा की  शांति के लिए, हिन्दू धर्म में उपाय भी बताये गए हैं।  

  
हिन्दू धर्म में समाया, परम ब्रह्म का सत्व।  
ईश, आत्मा, मोक्ष के, सिखलाता है तत्व। 


देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानानाम उपासते। 
करते ईश उपासना, पहले के विद्वान। 
ज्ञान संपन्न हो करो,  प्रभु का नित तुम ध्यान। 

सङ्गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम। 
परस्पर प्रेम से रहो, कहो एक सी बात। 
एक समान होकर तुम, कर लो ज्ञान प्राप्त ।  


क्या पाया क्या खोया 

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। सुविधा पाने के लिए परिश्रम करना होता है। सुविधा को प्राप्त कर लेने पर शक्ति को खोना पड़ता है।  साधन नहीं होने पर लोग पैदल भी चले जाते हैं किन्तु साधन होने पर मनुष्य उसका दास हो जाता है और  पैदल चलने की क्षमता क्षीण हो जाती है। मनुष्य की लालसा होती है धन हो तो वह सुविधा के साधन एकत्र कर ले, साधन होने पर उससे उत्तम साधन की इच्छा होती है।  फिर समय आता है वह सबसे बड़ा धनवान बनने का प्रयत्न करता है  इसी  लालसा में ईश्वर से विमुख रहता है।  उसे यह गर्व होता है कि वह बहुत धनवान है किन्तु सुख और शांति से वंचित रहता है। उसका धन कहीं छिन न जाय इसी में व्यग्र रहता है। उसके पास सहन शक्ति का अभाव हो जाता है छोटी समस्या आने पर भी व्यग्रता अधिक होती है। हिन्दू धर्म इन सब बातों पर नियंत्रण रखना सिखलाता है।

हिन्दू-धर्म की कुछ सूक्तियां और सुविचार
  • अलसस्य कुतो विद्या , अविद्यस्य कुतो धनम् | आलसी व्यक्ति को विद्या प्राप्त नहीं होती और बिना विद्या के धन नहीं मिलता।

    विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाध्दनमाप्नोति धनाध्दर्मं ततः सुखम् ।। विद्या विनम्रता प्रदान करती है ,विनम्रता से मनुष्य योग्यता प्राप्त करता है,अपनी योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धार्मिक कार्य समपन्न होते हैं,धार्मिक कार्य आनन्द प्रदान करते हैं।

     1. अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ: अर्थ अप्रिय किंतु परिणाम में हितकर हो ऐसी बात कहने और सुनने वाले दुर्लभ होते हैं।

    2. 'अतिथि देवो भव' अर्थ अतिथि देव स्वरूप होता है।

    4. 'अहिंसा परमो धर्म:।' (महाभारत-अनुशासनपर्व)

    अर्थ अहिंसा परम धर्म है।

    12. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। अर्थ जननी और जन्मभूमि और स्वर्ग से भी बड़ी होती है।

    7. असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय। (बृहदारण्यक-1.3.28)

    अर्थ मुझे असत् से सत् की ओर ले जायें, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जायें।

    6. 'आचार परमो धर्मः।' (मनुस्मृति 01/108) अर्थ आचार ही परम धर्म है।

    5. 'अहो दुरंता बलवद्विरोधिता।' (किरातार्जुनीयम् 1/23) अर्थ बलवान् के साथ किया गया वैर-विरोध होना अनिष्ट अंत है।

    8. ''ईशावास्यमिदं सर्वं'' (ईशावास्योपनिषद्-मंत्र 1)

    अर्थ संपूर्ण जगत् के कण-कण में ईश्वर व्याप्त है।

    3) स नः पर्षद् अतिद्विषः ।। अ० ६/३४/१ ईश्वर हमें द्वेषों से पृथक कर दे।

    यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।। अ० ७/१८/२* जहां परमेश्वर की ज्योति है वहां सदा ही कल्याण है।

    *7) स एष एक एकवृदेक एव ।। अ० १३/४/२०* वह ईश्वर एक और सचमुच एक ही है।

    *10) एको विश्वस्य भुवनस्य राजा ।। ऋ०६/३६/४* वह सब लोकों का एक ही स्वामी है।

    25. मा गृधः कस्यस्विद्धनम् (ईशावास्योपनिषद्) अर्थ 'किसी के भी धन का लोभ मत करो।'

    26. मा कश्चिद् दुख भागभवेत अर्थ कोई दु:खी न हो।

    27. मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्।

    अर्थ माता पिता की भली प्रकार से सेवा करनी चाहिये।

    9. उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत (कठोपनिषद्)

    अर्थ हे मनुष्य! उठो, जागो और श्रेष्ठ महापुरुषों को पाकर उनके द्वारा परब्रह्म परमेश्वर को जान लो।

    15. तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते। (रघुवंशम् 11/1) अर्थ तेजस्वी पुरुषों की आयु नहीं देखी जाती है।

    31. वसुधैव कुटुंबकम अर्थ सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है।

    28. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवताः (मनुस्मृति) अर्थ  जिस कुल में स्त्रियां सम्मानित होती हैं, उस कुल से देवगण प्रसन्न होते हैं। जिस कुल में मिलता है, स्त्री को सम्मान। 

    उस कुल बसते देवता, समृद्धि करें प्रदान।

    30. लोभः पापस्य कारणम् अर्थ (लालच) लोभ पाप का कारण है। कारण अनेक पाप का, जग में होता लोभ। व्यग्र रखता मनुष्य को, मन को देता क्षोभ।

    45. अशांतस्य कुत: सुखम्। (श्रीमद्भगवद्गीता 2/26) अर्थ अशांत (शांति रहित) व्यक्ति को सुख कैसे मिल सकता है?

    32. वाग्भूषणं भूषणम्। (नीतिशतकम्) अर्थ वाणी रूपी भूषण (अलड़्कार) ही सदा बना रहता है, कभी नष्ट नहीं होता।

    16. दीर्घसूत्री विनश्यति। (महाभारत शान्तिपर्व 137/1)

    अर्थ प्रत्येक कार्य में अनावश्यक विलंब करने वाला नष्ट होता है। नहिं होवे कार्य सिद्ध, करने से कर देर। सींचे से फिर क्या भला? सूख जाय जब खेत।  

    21. नास्ति विद्या समं चक्षु। (महाभारत शान्तिपर्व) अर्थ् संसार में ब्रह्मविद्या के समान कोई नेत्र नहीं है।

    14) तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योः ।। अ० १०/८/४४* आत्मा को जानने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता। मृत्यु से डरता नहीं, आत्मा का हो बोध 

    21) मा प्रगाम पथो वयम् ।। अ० १३/१/५९* सन्मार्ग से हम विचलित न हों।

    23) उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति ।। ऋ० १०/११७/१* दानी का दान घटता नहीं।

    32) त्वं जोतिषा वि तमो ववर्थ ।*(ऋ० १/९१/२२) अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।

    33) पितेव नः श्रृणुहि हूयमानः ।*(ऋ० १/१०४/९) पुकारे जाने पर पिता की भाँति हमारी टेर सुनो।

    37) यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।*(अथर्व० ७/१८/२) जहाँ परमेश्वर की ज्योति है, वहाँ कल्याण ही है। ईश्वर की ज्योति जहाँ, वहां सदा कल्याण। 

    40) मा प्र गाम पथो वयम् ।*(ऋ० १०/५७/१) हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों ।

    45) अघमस्त्वघकृते ।*(अथर्व० १०/१/५) पापी को दुःख ही मिलता है। दुख पाता अति घोर है, जो करता है पाप। धारण करके ही धरम, मिटता सब संताप।   

    48) उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।*(ऋ० १०/१३७/१) हे विद्वानो ! गिरे हुओं को ऊपर उठाओ।

    58) हवामहे त्वोपगन्तवा उ -(२०/९६/५)* हे प्रभु ! हम तेरे समीप पहुँचने के लिए पुकार रहे हैं।

    2) द्यावाभूमी जनयन् देव एकः -(१३/२/२६)* आकाश-भूमि को पैदा करने वाला देव एक ही है।

    79) वि द्विषो वि मृधो जहि -(अथर्व० १९/१५/१)* हमारी द्वेषवृत्तियों और हिंसकवृत्तियों को नष्ट कर।

    81) मा त्वायतो जरितुः काममूनयोः -(अथर्व० २०/२१/३)* हे प्रभु ! तेरी चाह वाले मुझ भक्त के मनोरथ को अपूर्ण मत रख।

    82) न स्तोतारं निदे करः -(अ० २०/२३/६)* मुझ स्तोता को निन्दा का पात्र मत कर।

    107) न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डिता ।।-(ऋ० १/८४/१९)* हे ईश्वर !तुम्हारे सिवाय सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।

    मा पुरा जरसो मृथाः ।।-(अथर्व० ५/३०/१७) हे मनुष्य ! तू बुढ़ापे से पहले मत मर।

    निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु ।।-(ऋ० ५/२/६) निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।

    मातृ देवो भव। पितृ देवो भव।

    आचार्य देवो भव। अतिथि देवो भव।

    माता, पिता, आचार्य और अतिथि देवताओं के रूप हैं।

    विद्या ददाति विनयम्  विधा विनामर्ता देती है

    परोपकारार्थमिंद शरीरं  - मानव शरीर परोपकार के लिए मिला है

    लोभः पापस्य कारणं   लालच (लोभ) पाप का कारण है।

    हितं मनोहारी च दुर्लभं वचः  भलाई के और मन को अच्छे लगनेवाले वचन कठिनाई से प्राप्त होते हैं।

    संसर्गजा दोषगुणाः भवन्ति  संगती से ही दोष और गुण होते हैं।

    श्रद्धावन् लभेत ज्ञान श्रद्धा रखने वालों को ज्ञान प्राप्त होता है।

    सहसा विंदधीत न क्रियां

    अचानक से बिना सोचे समझे कोई काम नहीं करना चाहिए।

    धर्मो रक्षीत रक्षितः धर्म का पालन करने वालों की धर्म ही रक्षा करता है।

    संस्कृति संस्कृताश्रिता

    कृषितोनास्ति दुर्भिक्षं Hard work is never wasted

    दंडं दश गुणम् भवॆत्

    विनाश काले विपरीत बुद्धि During ones ruin his wisdom wouldn’t pay off

    गीता

    (२) रत्नं रत्नेन संगच्छते । ( रत्न , रत्न के साथ जाता है )

    (३) गुणः खलु अनुरागस्य कारणं, न बलात्कारः ।

    ( केवल गुण ही प्रेम होने का कारण है , बल प्रयोग नहीं )

    (४) निर्धनता प्रकारमपरं षष्टं महापातकम् ।

    ( गरीबी दूसरे प्रकार से छठा महापातक है । )

    (५) अपेयेषु तडागेषु बहुतरं उदकं भवति ।

    ( जिस तालाब का पानी पीने योग्य नहीं होता , उसमें बहुत जल भरा होता है । )

    (११) अल्पविद्या भयङ्करी. ( अल्पविद्या भयंकर होती है । )

    (१२) कुपुत्रेण कुलं नष्टम्‌. ( कुपुत्र से कुल नष्ट हो जाता है । )

    (१३) ज्ञानेन हीना: पशुभि: समाना:. ( ज्ञानहीन पशु के समान हैं । )

    (१६) मधुरेण समापयेत्‌. ( मिठास के साथ ( मीठे वचन या मीठा स्वाद ) समाप्त करना चाहिये । )

    (१८) शठे शाठ्यं समाचरेत् । ( दुष्ट के साथ दुष्टता का वर्ताव करना चाहिये । )

    (१९) सत्यं शिवं सुन्दरम्‌.

    ( सत्य , कल्याणकारी और सुन्दर । ( किसी रचना/कृति या विचार को परखने की कसौटी ) 

    (२०) सा विद्या या विमुक्तये. ( विद्या वह है जो बन्धन-मुक्त करती है । ) भांति अनेक बंधनों से, विद्या करती मुक्त। संकट से निकलने को, करे ज्ञान से युक्त।  

    सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्। सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये । सत्य बोलना चाहिए, हर मनुष्य को नित्य। वाणी मगर मधुर लगे, कदापि ना हो अप्रिय।  

    वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ - 2/22         



  • (८) अति सर्वत्र वर्जयेत् ।  ( अति ( को करने ) से सब जगह बचना चाहिये । )


    • (१०) अतिभक्ति चोरलक्षणम्‌. ( अति-भक्ति चोर का लक्षण है । )

    • दर्शाती है अतिभक्ति, मन में बैठा चोर।  
    • करनी तो कुछ और ही, नीयत है कुछ और।    

  • 22. परोपकाराय सतां विभूतय:। (नीतिशतक)अर्थ सज्जनों की विभूति (ऐश्वर्य) परोपकार के लिए है।  कारण परोपकार के, जन्मे सज्जन संत। सज्जनों के प्रताप से, होय पाप का अंत।     

  • कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर... 

    कर्म करना मनुष्य का, होता है अधिकार। देने वाला फल सदा, सबको है करतार।    

  • 13. जीवेम शरद: शतम्। (यजुर्वेद 36/24) अर्थ हम सौ वर्ष तक देखने वाले और जीवित रहने वाले हों। जिएं सभी संसार में, कम से कम सौ वर्ष।  करता रहे प्रदान हरि, हमें सुख और हर्ष। 

  • 18. न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य। (कठोपनिषद् 1/1/27) अर्थ मनुष्य कभी धन से तृत्प नहीं हो सकता।  धन से कभी मनुष्य ये, नहिं होता है तृप्त। धारे लालसा धन की, बुरे काम में लिप्त ।   

    19. नास्तिको वेदनिन्दकः। (मनुस्मृति 2/11) अर्थ वेदों की निन्दा करने वाला नास्तिक है।  

  • नास्तिक करता निंदा, कुछ न वेद की हानि। वेद सदियों से तटस्थ, धरे धर्म के प्रान।     

  • (१७) मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना. ( हर व्यक्ति अलग तरह से सोचता है । ) अनेक व्यक्ति से सलाह, लाय न निर्णय ठोस। रखता है व्यक्ति हरेक, अपनी अपनी सोच।  

  • नोशन प्रेस 

  

इस पुस्तक में लेखक के अपने विचार समाहित हैं। लेखक की मदद से इसके त्रुटिरहित प्रकाशन के सभी प्रयास किये गए हैं। यद्यपि किसी प्रकार की त्रुटि अथवा भूल चूक से किसी को किसी भी प्रकार की क्षति की अवस्था में लेखक और प्रकाशक उसके लिए उत्तरदायी  नहीं है। इस पुस्तक का उद्देश्य विषय के बारे में लेखक के विचार से अवगत कराना है तथा किसी व्यक्ति, सम्प्रदाय, वर्ग या समूह की भावनाओं को किसी प्रकार का ठेस पहुँचाना, हस्तक्षेप करना या आहत करना नहीं है। 


श्री सत्यदेव तिवारी का जन्म सन १९५५ में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद में हुआ। प्राथमिक शिक्षा अपने गांव में लेने के पश्चात् उच्च शिक्षा के लिए वे दिल्ली आ गए, जहाँ से उन्होंने वाणिज्य में स्नातकोत्तर और विधि (एल एल बी.) की उपाधि प्राप्त किया। एक सार्वजनिक उपक्रम में प्रबंधकीय पदों पर सेवा के उपरांत उन्होंने दिल्ली में वकालत किया। तिवारी जी को बचपन से ही साहित्य में रूचि थी। सूरदास के पद और कबीर रहीम के दोहे उन्हें अत्यंत प्रिय लगते थे। 

सेवानिवृत्ति के पश्चात् मात्र सात वर्षों में उन्होंने दो दर्जन से भी अधिक पुस्तकें लिख दीं। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं : हिंदी भाषा में - हाइकु शास्त्र, कविता तो बोलेगी, क्या सखि साजन, चाँद के गांव, दुनिया गिर गयी, नन्हीं, बोलते मोती,  दिल्ली के झरोंखे, गुनगुनाती हवा, मुहब्बत के मोती, तेरे नाम के मोती, मोतियन की लड़ी, पांच दाने मोती, गीत गुंजन, प्यार का पिंजरा, हाइकु रामायण, आशिक अली की होली, बसे विदेश, विदेश की चटनी, इनकी उनकी, राम का वकील, त्रिपदी रामायण, जी लो बचपन, भगवती माई; और 

अंग्रेजी भाषा में - द सिंगिंग ब्रीज और बर्ड्स ऑफ़ चांटिंग वर्ड्स (The singing breeze, Birds of chanting words)

तिवारी जी ने काव्य की अनेक विधाओं का प्रयोग किया। हिंदी में हाइकु, गीत, गजल, दोहा, मुक्तक, कुंडलियां, कह-मुकरी, तांका, त्रिपदी-छंद, छंद मुक्त काव्य एवं कहानियां तथा अंग्रेजी में कपलेट्स, क्वट्रैंट, ट्रिओलेट, गजल, लिमरिक, हाइकु, टांका आदि। 

तिवारी जी को कई साहित्यिक समूहों द्वारा सम्मानित किया गया। हिंदी साहित्य के कार्य के लिए उनका नाम 'इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स' में अंकित है।      

फोन  : 9868924139      ईमेल : sdtiwari1@rediffmail.com

 

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