Sunday, 12 July 2020

Dharm 1

,  हिन्दू धर्म (दर्शन और मंथन)

निवेदन 

हिन्दू-धर्म जो सनातन और वैदिक धर्म भी कहलाता है; एक अथाह सागर है। इसकी गहराई में जितना घुसते जाओ, नये-नये रत्न प्राप्त होते जाते हैं। हमारे ऋषि, मुनि और विद्वानों ने उन गहराईयों में जाकर अनेक प्रकार के बहुमूल्य रत्नों को ढूंढा, जिन्हें पाकर न मात्र हिन्दू समाज, अपितु पूरा विश्व लाभान्वित हुआ और सदैव उनका ऋणी रहेगा। हिन्दू धर्म सम्पूर्ण विश्व में सबसे पुरातन, व्यापक और पावनतम धर्म है। यद्यपि इसे निर्बल करने के लिए भांति भांति के षड्यंत्र होते रहे हैं। मैं यहाँ हिन्दू धर्म का संक्षिप्त दर्शन कराने के साथ, यह कहना चाहता हूँ कि इस धर्म में जो बिखराव आ रहा है और मर्यादा टूट रही है; उसके कारणों को ढूंढा जाय तथा उसे एकीकृत करने के उपाय किये जायं, अन्यथा धर्म निर्बल होता जायेगा और अधर्मी तथा प्रतिद्वंदी उसका लाभ उठाएंगे। परिणामस्वरूप हमारी सभ्यता और शांति नष्ट हो जाएगी। हमारे ऋषि, मुनि, ज्ञानी और महान विद्वानों द्वारा बड़े बड़े ग्रंथों की रचना की गयी है, जिनमें बड़े विवेक तथा विवेचना पूर्वक बहुत सी बातें कही गयी हैं। यहाँ मैं हिन्दू धर्म की लघु रूप रेखा प्रस्तुत कर रहा हूँ या यूँ कहें कि संक्षिप्त दर्शन करा रहा हूँ; वृहत दर्शन, उन धर्म-ग्रंथों और धर्माचार्यों अथवा शास्त्रियों के द्वारा किया जा सकता है। कोई एक व्यक्ति सम्पूर्ण हिन्दू धर्म के ज्ञान में पारंगत हो, संभव ही नहीं। हिन्दू धर्म विश्व का सबसे महान धर्म है। इसकी उत्पत्ति, सृष्टि के ही साथ हुई है। हिन्दू धर्म, मानव जीवन का सम्पूर्ण दर्शन कराने के साथ परलोक का भी वर्णन करता है। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का ज्ञान समेटे है, और सृष्टि को बनाने और चलाने वाले ईश्वर का दर्शन कराता है। हिन्दू धर्म मनुष्य को ईश्वर के बताये मार्ग पर चलने का उपाय बताता है, और चलने के लिए प्रेरित करता है।  जिस प्रकार शिशु के जन्म से ही सारे अंग होते हैं, हिन्दू धर्म भी अपने उद्भव से ही सम्पूर्ण है। इसमें समय के साथ बौद्धिक विकास होता रहा है।

हिन्दू धर्म जीवन का दर्शन है; 
आध्यात्मिकता का दर्पण है;  
मानवता व प्रकृति का पोषक,    
ईश्वर की लब्धि का साधन है।

सृष्टि में दैविक शक्तियों के साथ दानवी शक्तियां भी चलती रहती हैं। देवताओं और दानवों का द्वन्द अनादि काल से चलता आ रहा है। हिन्दू-धर्म दानवी शक्तियों से लड़ने और उन्हें परास्त करने की शक्ति प्रदान करता है। हिन्दू-धर्म की श्रेष्ठता का अनुभव वही कर पायेगा जो इसका दर्शन करे और इसके सिद्धांतों का अनुकरण करे। 

महान भारत का अस्तित्व निहित हिंदुत्व में। 
हिंदुत्व का अस्तित्व धर्म-ग्रंथों के प्रभुत्व में। 
धर्म-ग्रंथों की प्रभुता; उनके ज्ञान, सम्मान से,   
ज्ञान-चक्र का सतत संवेग, ग्रंथों के अमरत्व में। 

धर्म को निति के रूप में भी देखा जाता है, अध्यात्म के रूप में देखा जाता है, भावना के रूप में और संगठन या संस्था  के रूप में भी देखा जाता है। इन सभी बातों में हिन्दू धर्म श्रेष्ठतम है। सर्वोत्तम धर्म होने के पश्चात् भी, समय समय पर, हिन्दू-धर्म पर आघात होते रहे हैं और इसे निर्बल करने के निरंतर प्रयत्न होते रहे हैं। हिन्दू धर्म की महानता के कारण कई अन्य धर्म के लोग इससे ईर्ष्या रखते हैं तथा इसे निर्बल करने के लिए प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से भांति भांति का षड्यंत्र रचते रहते हैं। अनेक प्रयत्नों के पश्चात् भी वे हिन्दू धर्म को निर्बल नहीं कर सके। इसका प्रमुख कारण है हिन्दू धर्म में समाये अद्वितीय शक्ति और तत्व। इसमें समाहित दिव्य शक्तियों के कारण हिन्दू विरोधी व दानवी  शक्तियां भी हिन्दू धर्म का कुछ न बिगाड़ सकीं। यद्यपि हिन्दू समाज को हिन्दू-विरोधी शक्तियों और उनके षड्यंत्रों के प्रति सजग रहना होगा और हिन्दू धर्म पर निरन्तर हो रहे आघातों को रोकना होगा, चाहे  वो आतंरिक हों या वाह्य। 

हिन्दू-धर्म में कई प्रकार के अवांछनीय तत्व प्रवेश कर गए हैं, जिनके कारण धर्म में आस्था का पतन हो रहा है।धर्म के यथार्थ स्वरूप को न जानकर, अनेक लोग धर्म के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़ने लगे हैं तथा अज्ञानता के कारण, धर्म के नाम पर स्वार्थवश फैलाए गए पाखंड, अनाचार, ढोंग, अंधविश्वास को धर्म मानकर अन्तत: धर्म से घृणा करते हैं। जिस प्रकार हम भोजन के रूप में बहुत  से ऐसे पदार्थ ग्रहण करते हैं, जिनकी देह को आवश्यकता नहीं होती; हमारा शरीर मात्र भोजन के तत्व को ग्रहण करता है और अनावश्यक पदार्थों को मल के रूप में बहिष्कृत कर देता है, उसी प्रकार  धर्म में आयी अनर्गल बातों का त्याग कर देना चाहिए और तत्व को ग्रहण करना चाहिए। कुछ लोग धर्म की इसलिए भी उपेक्षा करते हैं कि उन्हें सच्चे धर्म का बोध नहीं है; और वे पंथों, समूहों द्वारा स्वार्थ हेतु फैलाए गए क्रियाकलापों, अनुष्ठानों को धर्म मानते हैं। आजकल धर्म का भी व्यवसायीकरण हो चुका है, धर्म के नाम पर आडम्बर परोसा जा रहा है। धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने की आवश्यकता है। 

उपदेशों का अब असर नहीं रहा।
पापों से किसी को डर नहीं रहा।
छीन झपट, सब चाहते घर भरना,
हड़पने के होड़ में सबर नहीं रहा।


प्रत्येक हिन्दू का यह भी धर्म है कि वह अपने धर्म की रक्षा करे। जिस प्रकार ईश्वर की बनाई हर रचना का अपना एक धर्म है, और उक्त धर्म निभाने के लिए ही ईश्वर ने उसे रचा है। यदि वे सभी जीव, पदार्थ या वनस्पति अपने गुण-धर्म का निर्वाह नहीं करेंगे; या तो मारे जायेंगे या तिरस्कृत हो जायेंगे। इसी प्रकार मनुष्य भी अपने धर्म का निर्वाह और रक्षा नहीं करता तो उसका भी अंत निश्चित है। चूकि मनुष्य के भीतर आत्मा का वास है, जो परमात्मा का ही अंश है इस कारण मानव-धर्म बहुत वृहत हो जाता है। पृथ्वी पर मनुष्य ईश्वर के दूत के रूप में ही प्रतिस्थापित है। सृष्टि का उद्भव और अंत तो ईश्वर स्वयं करता है, किन्तु सृष्टि का सञ्चालन वह मनुष्य के द्वारा ही कराता है। इसीलिए उसने मनुज को बुद्धि व विवेक दिया है, जो उसकी ईश्वरीय गुण व शक्ति है। मनुष्य का धर्म है कि अपने कर्मों का निर्वाह करे और ईश्वर की रचित सृष्टि को चलाने में उसकी सहायता करे। मनुष्य अपने धर्म का पालन नहीं करेगा तो सृष्टि का ही अंत हो जायेगा। वैसे ऐसी अवस्था नहीं आने पाती क्योंकि धर्म की हानि होने या आवश्यकता पड़ने पर ईश्वर, राम या कृष्ण के रूप में मनुष्य बनकर, स्वयं धरती पर प्रकट होता है और धर्म की रक्षा करता है।

गीता में भगवान् ने स्वयं कहा है :
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥ भावार्थ : हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।  

महाभारत में  यह भी कहा गया है :
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी भी नहीं करना, क्योंकि यदि धर्म मर गया तो हमको भी मार डालेगा।

हिन्दू धर्म को मैंने जिस प्रकार देखा है; उसी का संज्ञान लेकर, अपनी अल्पबुद्धि से इस पुस्तक द्वारा संक्षिप्त दर्शन कराने का प्रयत्न कर रहा हूँ, और हिन्दू धर्म में उत्पन्न विसंगतियों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। जिससे कि प्रत्येक हिन्दू अपने धर्म की अनुरक्षा के प्रति सचेत और सजग रहे। मुझे पूर्ण विश्वास है हिन्दू धर्म अपने सिद्धांतों के साथ युगों युगों तक अमर रहेगा और मानव जाति को अमृतपान कराता रहेगा। 

ईश्वर का सबसे प्यारा, हिन्दू धर्म। 
मानवता का है सहारा, हिन्दू धर्म। 
अनंत काल तक बहेगा, अनवरत ये,  
बनकर अमृत की धारा, हिन्दू धर्म। 

- सत्य देव तिवारी, एडवोकेट 

 
धर्म का मर्म 
विश्व के लगभग सभी प्राचीन धर्मों के रूप रूपांतर और काल क्रम से नामान्तर भी वैदिक सनातन धर्म के ही विकसित स्वरुप प्रतीत होते हैं। आज के प्रचलित नाम वाले रूप वाले सभी द्वीपों के देशों में भी प्रकृति संरक्षण पर जोर है, जो कि प्रकृति पूजा का ही बदलता हुआ प्रतीक लगता है। हमारे प्राचीन वृहत भारत जिसमें कुछ सदियों पूर्व ईरान, अफगानिस्तान, वर्मा, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम से लेकर बंगलादेश पाकिस्तान आदि तक भ्रमण करते ही थे।  अन्य यूरोपीय, दक्षिण अमेरिकी देशों व कुछ अफ़्रीकी देशों में भी विभिन्न रूपों में शिव, विष्णु, लक्ष्मी, गणेश, सरस्वती, राम, कृष्ण आदि के मूर्ति विग्रह चित्र, मंदिर स्थापत्य, लिङ्ग  उनकी लीलाओं के प्रभावशाली विस्तार दिखाई पड़ते हैं।
धर्म को  अपने देश समाज और परिवार के कल्याण के लिए धारण करते हुए अब तक वैयक्तिक विकास होता हुआ हम देखते हैं। पुराने ग्रन्थ, सिक्के, पुरातात्विक अभिलेख, मूर्ति शिल्प, प्रस्तर लेख, कब्रों मजारों लोहे पत्थरों के खम्भों पर चित्र विचित्र कलात्मक चिन्ह आलेख उत्कीर्ण रूप से बहुत स्थानों पर मिलते हैं। 
धर्मो धारयते प्रजाः के विमर्श पर तो सारी विश्व मानवता अपने धर्म पर टिकी है। लोक में परस्पर सहयोग, परोपकार, परहित ये सभी धर्म की अनुभूति के ही मर्म बतलाते हैं। रामचरित मानस की एक चौपाई है - परहित सरिस धर्म नहीं भाई।  पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।

वेदव्यास ऋषि भी कहते हैं - ऊर्ध्वबाहुः विरोमि-एषः धर्मः सनातनः। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीड़नम। धर्म रहित आचरण को पशु तुल्य अर्थात विवेकशून्य कहा गया है। धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः। धर्म एक है पर स्थान और कालभेद से रूप बदलता रहता है, ऐसा लगता है।  इसे कई क्रम उपासक उपास्य, भक्त भक्ति भगवान भगवन्ता के क्रम में अनेक विचारक प्रचारक अपने समय में उपदेशों के द्वारा प्रकट करते हैं। धर्म ते विरति योग ते ज्ञाना। ज्ञान मोक्षप्रद वेद बखाना। यह गोस्वामी तुलसीदास का मत है। धर्म से लोक परलोक लाभ तो सभी मानते हैं।  पूरी भागवद्गीता कर्मयोग ज्ञानयोग का प्रतिपादन करते हुए धर्मनिरपेक्ष लगती है, पर उसके प्रथम  अक्षर से अंतिम अक्षर तक मानव के लिए कई प्रकार कर्म-धर्म अर्थात कर्तव्य का विचार-विमर्श रखती है।  पुराणों में धर्म का सार यही कहा है - अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीड़नम। 

अर्थात समस्त १८ पुराणों में महर्षि व्यास ने केवल धर्म तो परोपकार क्या है, कैसे, कब होता है? पीड़ा देना अधर्म है यह विस्तार से विचार किया है। धर्म ही आखिर में साथ जाता है और कुछ नहीं - धर्मानुगागच्छति जीव एकः शास्त्र कहते हैं। 
सभी द्वीपों द्वीपांतरों में आज जो प्रचलित पंथ मत मजहब रूप में धर्म दीखते हैं वे सब एक ही प्राचीन सनातन धर्म के शाखा भेद हैं या परिस्थिति के अनुरूप लोगों ने अपनी सुविधा और पात्रता के अनुसार अपनाये हैं। 
धर्म के लक्षण हमारे शास्त्रों में विविध प्रकार से  मिलते हैं :
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।* *एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्।। मनु०।।*
अर्थात वेद = ज्ञानराशि, उस पर आधारित विश्लेषण, सदाचार, स्वयं तथा परहित साधक प्रिय आचरण ही धर्म  के लक्षण हैं, आचार ही धर्म का साकार रूप है। विभिन्न परिस्थितियों में मानव के लिए अपेक्षित आचरण ही उसके लौकिक प्रगति और परलौकिक कल्याण के साधक हैं। आचारहीन को वेद सम्मत विवेक सम्मत जीव में प्रयोग समाज में धर्म नहीं स्वीकारता है - आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः। 
संसार चाहे वैदिक हो या लोकाचार - वे सभी मनुष्य के दूरगामी समाज के संगठक तत्व हैं।  वे अनुष्ठान के  रूप में जन्म से पूर्व अर्थात गर्भधारण से लेकर मरणोत्तर सामाजिक आदर्श आचरण ही परिवार और कुटुंब, समुदाय, समिति, समाज, विश्व-वन्धुत्व तक को निरापद रूप से जोड़ने में सहायक है।
दशकं धर्म लक्षणम -  जहाँ सत्य, शौच, दया, दान आदि के कर्म भी धर्म के कर्म की आचरणात्मक व्यापक व्याख्यान हैं।  संतों, ऋषियों, पूर्वजों विविधमत पंथ के प्रचारकों के आचरण दिनचर्या, जीवनचर्या ही बाद में अनेक भक्तों उपासकों अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक सूत्र बनें। धर्म न दूसर सत्य समाना।  
भारत  प्राचीनतम वैदिक सनातन धर्म से पल्लवित निरूपित विकसित जैन, बौद्ध मत पंथों की शाखाएं उनके संतों शिष्यों धर्मानुयायियों तीर्थंकरों मन्त्र पूजा उपासना ध्यान आदि की पद्धतियों के रूप में प्रचलित हुए।  इनके आचरणों को सभी लौकिक समस्यायों और धार्मिक मत मतान्तरों भेदों को समझने समझाने सुलझाने में इनके उपदेशों से प्रेरणा लेकर अनुशासन व्यवस्थाएं इनके अनुयायियों ने अपनायी। 

यह कालांतर में कुछ स्वार्थपूर्ण और विदेशी आक्रमणों से विचलित समुदायों में आचरण के प्रदर्शन में भ्रम वश पाखंड और कुरीतियों के रूप में अशिक्षा, लोभ और मोह वश फैलते हुए निराशाजनक स्थिति तक भी पहुँच गया, तो समय समय पर नए आर्य-अनार्य मत भी संक्रमण काल के अंतर्गत फ़ैल गए। 
इस समय समाज अनिश्चितता के दौर से गुजरा तो खान-पान रहन-सहन शादी-व्याह जन्म-मृत्यु तथा अन्य आचार, व्यवहार में भी परिवर्तन होता गया। लेकिन वास्तव में सदाचार, शास्त्रनिष्ठा, संतों-गुरुओं के सदुपदेश तब भी शुद्ध रूप से मार्गदर्शक बने रहे, भले ही समाज में भटकाव आया। 
हमारे यहाँ धर्म के आदर्श दशरथनन्दन राजा राम ही - रामो विग्रहवान धर्मः - वे राम ब्रह्म परमार्थ रूप है मर्यादा पुरुषोत्तम माने गए। 
राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अविगत अकथ अनादि अरूपा। 
वे अपनी सत्य बात पर अडिग बने रहने के आदर्श कहे गए। सत्य के लिए सब कुछ अच्छे आचरण के लिए न्यौछार कर अपने धर्म पालक श्रुति सेतु पालक कहलाये। 
श्रुति सेतुपालक राम तुम  माया जानकी। 
अच्छे आचरण को अमल में लाने वाले को जगत का अनुशासक कहा गया। 
सारे महापुरुष, धर्माचार्य, युगप्रवर्तक मत-पंथ के अग्रणी जन ही यहाँ  आदर्श सिद्ध मानव माने गए।अतः मनुष्य भ्रान्ति वश स्वार्थ भ्रम मोह लोभ वश भले ही अपना स्वधर्म छोड़ने लगे और परधर्म को अपनाने लगे तो उसे समाज धर्मच्युत कहलाने के लायक समझता है। 
भगवद्गीता में 'स्वधर्मे निधनां श्रेयः, परधर्म भयावहः कहा गया।           
आपातकाल में कुछ आचरण अनुष्ठान आदि में शिथिलता भी शास्त्र सम्मत है। एतदर्श बौद्ध धर्म में बुद्ध निर्वाण के बाद सभा सम्मलेन करके विनय पिताक का संग्रह किया गया। जैन धर्म में अनेक कठोर नियम व्रत संयम में समय समय पर संशोधन हुए। आर्यसमाज सिक्खपन्थ आदि भी सामायिक सामाजिक धर्म के उपदेशों का प्रचार करता रहा।  संतों की परम्पराओं में पीढ़ियों के अंतर से धर्म के बदले हुए स्वरुप का आचरण वेश भूषा नियम व्रत उपासना पद्धतियों में दर्शन हमें होता है। 

श्री सत्यदेव तिवारी जी ने अपने जीवन भर के अध्ययन मनन अनुभव सत्संग आदि का नवनीत अपने विचार संग्रह रूप ग्रन्थ 'हिन्दू धर्म - दर्शन और मंथन' में बड़ी सावधानी से, बिना किसी की आलोचना किये धर्म के मर्म को शोधार्थियों, जिज्ञासुओं; सुनिश्चित नीरक्षीर विवेकी सुधि जनों के समक्ष बड़ी तत्परता और परिश्रम से प्रस्तुत किया है। यह सभी विचारशील धर्म-मर्मज्ञ जनों से लेकर धर्म  विचार करने वाले साधकों के लिए उपयोगी संक्षेप में गागर में सागर के तौर पर सरस सरल और सारगर्भित भाषा में संग्रहीत किया है। अतः सभी सुधी पाठक इसे पढ़ें, सभी अच्छे संस्थान  इसे अपने पुस्तकालय संग्रहालय  अवश्य रखें तो पढ़ने सीखने वाले धर्म के उपासकों को इससे कुछ न कुछ अवश्य धर्म लाभ होगा। यह मार्ग-दर्शक ग्रन्थ हर स्तर के व्यक्ति के लिए पठनीय अवलोकनीय संग्रहणीय और माननीय है - ऐसा इसके अनुशीलन से हमें ज्ञात होता है। 

हमारा विश्वास है कि यह ग्रन्थ स्वाध्यायी सदाचारी सनातनी हिन्दू तथा अन्य मत पंथ के अनुयायियों के लिए अवश्य ही धर्म चेतना जागृत करने में अपने धर्म के बारे में जानने में सहायक होगा। क्योंकि पाश्चात्य विद्वान भी मानते हैं कि यह भारत भूमि ही सभी प्राचीन धर्मों को श्रेष्ठ मार्ग दिखने वाली है। सभी उपासना-आराधना पद्धतियों के शंकाओं का समाधान करनेवाली है, सभी की शरणस्थली है। ऐसे शुभ धर्म विचार के सहज बोधगम्य धर्माधर्म विश्लेषण समाज के समक्ष रखने के लिए श्री सत्यदेव तिवारी जी के प्रति हम कृतज्ञ हैं।  उनके ऐसे ही अनुभव सिद्ध ग्रन्थ आगे आते रहें तो और लोकोपकार होगा। 
 
राम प्रकाश दास 
पूर्व प्रोफेस्सर, दिल्ली विश्वविद्यालय

श्री सत्यदेव तिवारी द्वारा अनुदित 'हिन्दू धर्म - दर्शन और मंथन' एक विचार उत्प्रेरक पुस्तक है। इसमें हिन्दू धर्म का संक्षित मगर समग्र दर्शन परिलक्षित होता है। श्री तिवारी ने पर्याप्त अध्ययन व मंथन के पश्चात् ही इस पुस्तक को लिखा है। इस पुस्तक में हिन्दू धर्म के प्रमुख ग्रन्थ, संस्कार, संस्कृति, परंपयायें, पूजा पद्धति आदि सभी का संक्षेप में दर्शन कराया गया है, जिनके द्वारा हिन्दू सनातन धर्म को सम्पूर्ण रूप से जानने समझने में बड़ी सहायता मिलती है। यह पुस्तक न केवल हिन्दू सनातन धर्म के विभिन्न अवयवों का दर्शन कराती है, अपितु कई विचारणीय बिंदु भी प्रस्तुत करती है जिनके कारण धर्म का चारु रूप विकृत होता दिखाई पड़ता है। इसे पढ़कर धर्म-अनुयायियों के मन में हिन्दू सनातन धर्म के प्रति और अधिक श्रद्धा जागृत होगी तथा ढोंग, पाखण्ड, अंधविस्वास आदि को दूर करने की मदद मिलेगी। श्री तिवारी ने बीच बीच में काव्यात्मक प्रस्तुति और पौराणिक ग्रंथों की कुछ सूक्तियों को दोहों के रूप में प्रस्तुत करके अपने कवित्व का सार्थक परिचय दिया है। मुझे उनकी लिखी कुछ और काव्य पुस्तकें पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, जिनमें उनकी रचना प्रतिभा की सुंदरता देखते ही बनती है। मैं श्री सत्यदेव तिवारी को इस अनुपम कृति के लिए साधुवाद देता हूँ तथा सफलता की कामना करता हूँ।

ए. एल. दूबे 
पूर्व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय  
         
                   



हिन्दू धर्म की प्रस्थिति

इस लघु-ग्रन्थ की यात्रा का श्रीगणेश, ऋग्वेद के प्रथम मंडल, प्रथम सूक्तम में दिए हुए ईश्वर की स्तुति के अपने इस हिंदी रूपांतर से करता हूँ:

हे परमेश्वर ! मेरे परमेश्वर !

सृष्टि की उत्पत्ति करने वाले
इस संसार को रचने  वाले,
सभी पदार्थों के देने वाले,
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड धरने वाले,
हे परमेश्वर! सुखी विश्व कर।

सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व विधाता,
कुछ भी न था, तब तू ही तू था,
समस्त ब्रह्माण्ड तेरी संपत्ति,
सर्वोच्च, सृष्टि में तू ही दाता,
हे परमेश्वर! कृपा हो मुझ पर।

सबको शरण में लेने वाले,
वेदों का ज्ञान  देने वाले,
सत्यस्वरूप अद्भुत यश वाले,
स्वयं में सब समा लेने वाले,
हे परमेश्वर! कर हृदय में घर।

सत्पदार्थों में होता जो स्थित,
सब प्रकार के दोषों से रहित,
जिसका भजन सुखकर है नित,
ऋषियों, विद्वानों से पूजित,
हे परमेश्वर! पाप, विघ्न हर।  

आत्मा को तू धारण करता,
सभी ऋतुओं को तू ही धरता,
सर्वसुख व ऐश्वर्य से भरता,
अपने आप स्वयं तू पलता,
हे परमेश्वर! वैभव से भर।

प्रकाशस्वरूप, सबका प्रकाशक;
तू उपकारी जो है उपासक;
सर्वस्वादनशील, जग का पालक;
अंतरिक्ष, ब्रमांड, जगत में व्यापक;
हे परमेश्वर! प्रकाशमय जग कर।

यहाँ और परलोक में सुखकर;
अंग-अंग, तू प्राणों के भीतर;
व्यवस्था, कर्मफल का रक्षक
स्थित तू, सदैव परमपद पर;
हे परमेश्वर! थाम ले आकर।   

सृष्टि और प्रलय का कारक;
सर्वसुखदाता, कष्ट निवारक;
कीर्तिजानक, विघ्नों के हर्ता, 
ऋषि, मुनि, देव सब तेरे उपासक;
हे परमेश्वर! तार भवसागर।

हे ज्ञानवान! वायु समान!
ज्ञानियों को देने वाले ज्ञान;
ज्ञान दृष्टि से देखने योग्य,
सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान;
हे परमेश्वर! अपने अंक में धर।

देने वाले सब पदार्थ पृथ्वी पर,
उत्तम पदार्थों से सब शुभ कर,
बल, बुद्धि, भक्ति, ज्ञान से भर,
सफल, सुरक्षित कर, दुःख हर,
हे  परमेश्वर! हो सदैव श्रेयष्कर।
हे परमेश्वर ! मेरे परमेश्वर!
 

जबसे सृष्टि है तभी से हिन्दू धर्म है, जिसका स्रोत वेद हैं; इसीलिए, इसे सनातन धर्म या वैदिक धर्म भी कहा जाता हैवेद, स्वयं सृष्टि रचयिता ब्रह्मा के कहे शब्द हैं। यह धर्म सत्य, अहिंसा, नम्रता, दया, दान, क्षमा, यम-नियम, जप, तप व व्रत के संस्कार सिखाता है। हिन्दू-धर्म, विश्व का सबसे प्राचीन और भारत का सर्वप्रमुख धर्म है, जिसे इसकी प्राचीनता, व्यापकता एवं विशालता के कारण 'सनातन धर्म' भी कहा जाता है। आरम्भ में पृथ्वी पर मात्र एक ही धर्म था, सनातन धर्म, जिसे में चलकर हिन्दू-धर्म के भी नाम से जाना जाने लगा।  इस धर्म के सनातन होने के कारण, ही इसका नाम सनातन धर्म है। धार्मिक साहित्य के अनुसार हिंदू धर्म का आरम्भ, करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ था। कहते हैं सृष्टि के साथ ही वेद का ज्ञान भी प्रकट हुआ। ऋषि, मुनि, संतों और ब्राह्मणों ने अपने धार्मिक स्मृतियों और मान्यताओं को गाकर, रटकर और सूत्रों के आधार पर न केवल इसे जीवित रखा, अपितु आगे भी बढ़ाया। द्वापर युग तक तक तो सनातन धर्म के अतिरिक्त अन्य कोई धर्म था ही नहीं। कलियुग में कुछ ईसा पूर्व कई अन्य धर्म भी पनपे, किन्तु भारत का सर्वप्रमुख धर्म, हिन्दू धर्म ही रहा। इस  युग में हिन्दू-धर्म के विषय में कई प्रकार के दुष्प्रचार और भ्रांतियां फैलाई गयीं। सर्वप्रथम तो इसके नाम के विषय में ही भ्रान्ति फैलाई जाती है। इतिहासकारों ने अनर्गल साहित्य को आधार बनाकर हिन्दू शब्द की उत्पत्ति फारसी काल से बताया गया है। उन इतिहासकारों को संस्कृत साहित्य और पुराणों का कतिपय ज्ञान नहीं था। इस बात का पर्याप्त प्रमाण मिलता है कि हिन्दू शब्द सहस्रों वर्ष पुराना है और इसकी उत्पत्ति  का सिन्धु नदी से कोई सम्बन्ध नहीं है। हिन्दू शब्द के आविर्भाव के विषय में ग्रंथों में निम्न उल्लेख मिलता है। 

ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:
गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दूर्हिंसनदूषक:।
हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दूरितीरित:।
(प्राचीन ग्रन्थ बृहस्पति आगम' का एक श्लोक)

अर्थात 'ॐकार' जिसका मूल मंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, जो गोभक्त है (गौ की सेवा और रक्षा करता है), भारत का गुरु अथवा श्रेष्ठ है (यानि भारत उसकी बताई राह पर चलता है), तथा हिंसा की जो निंदा करता है, वह हिन्दू धर्म है। हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा प्रियता है। 

 
सनातन धर्म के अनुयायी आर्य थे। आर्य का अर्थ होता है - 'श्रेष्ठ', जिसका प्रयोग कुलीन, सज्जन, सभ्य, साधु आदि के लिए होता है। आर्य किस प्रकार हिन्दू कहलाने लगे, इतिहासकारों ने पुराणों की अनदेखी कर अंग्रेजों द्वारा लिखे  इतिहास को आधार बनाकर, सिंधु नदी के आस पास रहने वाले आर्यों को हिन्दू नाम दिया; और माना कि 'हिन्दू' अरबों द्वारा दिया गया फारसी शब्द है। किन्तु हिन्दू शब्द का उल्लेख फारसी सभ्यता से पूर्व और इस्लाम के आगम से पूर्व भी मिलता है, जो इस बात का प्रमाण है कि हिन्दू नाम हिन्दुओं के ऋषि मुनियों द्वारा ही दिया गया है।

विशालाक्ष शिव द्वारा लिखित बार्हस्पत्य शास्त्र यानी बृहस्पतिजी में हिन्दू शब्द मिलता है। वराहमिहिर रचित 'बृहत्संहिता' और बृहस्पति आगम ने भी इस धर्म का उल्लेख है। 'बृहस्पति आगम' जो अति प्राचीन ग्रन्थ है, में 'हिन्दूस्थान' का उल्लेख है और इसका वर्णन ऋषियों ने किया है। बृहस्पति आगम' में एक और श्लोक है:

'हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दूस्थानं प्रचक्षते॥ '

अर्थात हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (जो अब हिन्द महासागर है) तक यह देव निर्मित देश हिन्दूस्थान कहलाता है। हिन्दु में हिमालय का पहला वर्ण 'हि' और इन्दु के दूसरे वर्ण 'न्दु' को मिलाकर 'हिन्दु' शब्द का निर्माण हुआ। इस प्रकार इसमें कोई संशय नहीं कि हिन्दू-धर्म ही सनातन धर्म है, क्योंकि इससे पहले कोई अन्य धर्म था ही नहीं।  

हिमाद्रि से हिन्द सागर, हिन्दू धर्म व्याप्त।   
सर्व पुरातन भुवन का, सब धर्मों का तात। 

ग्रंथों में ऋषि-मुनियों की परम्परा के पूर्व मनुओं की परम्परा का उल्लेख मिलता है। हिन्दू धर्म में १४ मनु माने गए हैं, जिनमें हरेक का काल एक मन्वन्तर होता था और एक मन्वन्तर कई महायुग के बराबर था। एक महायुग में चारों  युगों यानि सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग का चक्र पूरा हो जाता है। हिन्दू धर्म को निर्बल करने के लिए कई प्रकार के आक्रमण होते रहे, परन्तु इसके विशालतम, प्रबलतम, पावनतम और जड़ें बहुत गहरी होने के कारण वो सभी प्रयास निरर्थक सिद्ध हुए। कालांतर में कुछ लोगों के अपनी पृथक विचारधारा के कारण, इससे कई अन्य धर्म संस्फुटित हुए। हिन्दू धर्म अपनी अच्छाईयों और विशेषताओं के बल, लाखों वर्ष से मन्दाकिनी की भांति अनवरत चलता चला आ रहा है। इसमें कोई संशय नहीं कि हिन्दू धर्म एक अथाह सागर है, शेष सभी धर्म इसी से संस्फुटित हुए हैं। उन सभी धर्मों में वेदों के सिद्धांतों के दर्शन होते हैं। 

हिन्दू धर्म के अनुसार ईश्वर एक है; वही स्रष्टा, रचयिता, प्रभु, स्वामी, उपास्य, पूज्य है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और यह सृष्टि उसी की रचना हैं। सभी देवता उसके भिन्न रूप हैं और सभी जीवात्मा उसके अंश हैं। प्रत्येक जीव उस ईश्वर के द्वारा निर्देशित धर्म को निभाता है। हमारे लिए, हमारे जीवन संबंधी उसके आदेश, आज्ञाएँ , पद्धति, आयाम, सीमाएँ आदि पालन के क्या विधान हों; अर्थात् हमारे और ईश्वर के बीच संबंधों की रूपरेखा क्या हो, हमें उसी की ओर से वेदों के द्वारा प्रदान की गयी हैं

यह तो सभी धर्म मानते हैं कि सबसे पहले एक ही धर्म था, शेष धर्मों की उत्पत्ति उसके पश्चात् ही हुई। यदि हम अतीत में चलें तो हिन्दू धर्म के अतिरिक्त सभी धर्मों के उत्पत्ति का काल या समय मिलता है, और सभी धर्मों का जन्म, ईसवी आरम्भ होने के पश्चात् या कुछ ईसा-वर्ष पूर्व ही हुआ है। किन्तु हिन्दू-धर्म का कोई ओर-छोर नहीं है। कहते हैं महाभारत काल का समय जो द्वापर युग में था, लगभग पांच हजार ईसा-पूर्व है। त्रेता तो उससे भी कई हजार वर्ष पहले और सतयुग लाखों वर्ष पहले के युग हैं। इससे पहले चौदह मन्वन्तर बीत चुके हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समय का उल्लेख, हमारे लाखों वर्ष पुराने वेद-पुराणों में भी नहीं मिलता। वे अजन्मा, अनादि और अनंत हैं। 

मानवता का संदेश देने वाले वैदिक धर्म के अलावा दूसरे अन्य धर्म, किसी व्यक्ति विशेष द्वारा चलाये गए। धर्म चलाते समय उनको ईश्वर का दूत या ईश-पुत्र बताया गया। जैसे – ईसाई धर्म ईसा-मसीह द्वारा, बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध द्वारा, इस्लाम धर्म पैगंबर मुहम्मद द्वारा,  सिक्ख धर्म गुरु नानक देव द्वारा आदि। इसमें कोई संशय नहीं कि गौतम बुद्ध, ऋषभदेव, ईसा-मसीह, पैगंबर मुहम्मद, और गुरुनानक देव द्वारा बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम और सिक्ख धर्म की स्थापना से पूर्व भी हिन्दू धर्म था। विश्व के लगभग सभी धर्मों के सिद्धांत वेदों तथा हिन्दू धर्म की मान्यताओं और सिद्धांतों से मिलते हैं।

इस्लाम के विषय में मुग़ल सम्राट शाहजहां के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह ने  लिखा है :

'बाद अज़ तहकीइन इमरातिब मालुकशुद कि दरमियान इकौमे क़दीम पेश अज़ कुतब समावी चाहर कुतब अस्मावी कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, व सामवेद व अथर्वेद बाशद बर इब्नाये आ वक्त के बुजुर्गेतर आहा आदम सफ़ी
अल्लाह व अलीस्सलाम अस्त बरज़मी अहकाम नाज़िल शुदा। ' - दारा शिकोह

अर्थात क्रमशः अनुसन्धान करने के  पश्चात् यह ज्ञात हुआ कि इस प्राचीन (हिन्दू) जाति में समस्त 'ईश्वरीय पुस्तकों' (अर्थात कुरान, इंजील, तौरेत तथा जबूर आदि) के पूर्व चार ईश्वरीय पुस्तकें जिनके नाम १. ऋग्वेद, २. यजुर्वेद, ३. सामवेद, ४. अथर्वेद हैं, उस समय के ऋषियों पर जिनमें  सबसे बड़े आदम (ब्रह्माजी) थे, समस्त आज्ञाओं के साथ ईश्वर की ओर से प्रकट हुई थीं।

दाराशिकोह ने संस्कृत भाषा का स्वयं अध्ययन किया और संस्कृत में अपनी योग्यता इतनी कर ली कि वह वेदों और उपनिषदों का अध्ययन कर उनके रहस्यों को हृदयंगम किया। उन्होंने उस समय के वेद-उपनिषद-विशेषज्ञ, पंडितों और सन्यासियों को एकत्रित करके उनकी सहायता से स्वयं उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद किया।
ईशोपनिषद के विषय में दाराशिकोह ने फारसी में लिखा है -

'किताब क़दीम कि बेषको शुबह अव्वलीन किताब समावि व सरे चश्मए तहक़ीक़ व बहरे तो ही दस्त। '
अर्थात यह पुस्तक अनादि है और निस्संदेह समस्त ईश्वरीय पुस्तकों में प्राचीनतम है तथा परम सत्य का स्रोत एवं ब्रह्मज्ञान का सागर है।

वेद हिन्दू धर्म का सर्वप्रमुख और प्राचीनतम ग्रन्थ है। वेद में ईश्वर के वर्णन के साथ ज्ञान और विज्ञान की बहुत सी बातें मिलती हैं। वेद में परमेश्वर और अन्य देवताओं के वर्णन अतिरिक्त निराकार ब्रह्म का गूढ़ दर्शन मिलता है। तथा हिन्दू धर्म के विकासशील धर्म होने के कारण, इसमें विभिन्न कालों में नये-नये आयाम जुड़ते गये। कालांतर में अन्य धर्मों में भी वेदों के ही सिद्धांतों पर आधारित उनके धर्म ग्रन्थ रचे गए।  

अन्य धर्मों की भांति हिन्दू धर्म का कोई एक प्रवर्तक नहीं है। इसे वेदों के अध्ययन के अनुसार ऋषि-मुनि आगे बढ़ाते गए। वेदों के अत्यंत वृहत और जटिल होने के कारण इसके पृथक खण्डों को पृथक विद्वानों ने बढ़ाया। प्रवर्तक के रूप में, एक नाम नहीं होने के कारण इसमें कई शाखाएं फूटीं और अनेक परम्पराओं ने जन्म लिया, फलस्वरूप कई विकृतियां और भ्रांतियां भी उत्पन्न हुईं। वेदों के आधार पर उपनिषदों और पुराणों की रचना हुई और आगे चलकर अन्य धर्म-ग्रंथों की भी रचना हुई। पुराणों के द्वारा धर्म में आस्था बढ़ाने के उद्देश्य से कथाएं कही गयीं, जिनके द्वारा पुण्य और पाप युक्त कार्यों को समझाया गया। कई कथाएं चमत्कारी और अविश्वसनीय प्रतीत होती हैं, किन्तु उनके द्वारा दिए गए सन्देश आज भी सत्य और प्रासंगिक लगते हैं। ये कथाएं पाप कर्म करने से निरुत्साहित करती हैं। वैसे भी आज के वैज्ञानिक युग में भी प्रकृति के चमत्कार होते रहते हैं, जिनका रहस्य विज्ञान नहीं ढूंढ पाता।    

हिन्दू धर्म में जीवन के सभी तत्व विद्यमान हैं। उन सभी तत्वों का अनुपालन किसी एक व्यक्ति के लिए असंभव है; इस कारण, उन तत्वों में से जो व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार जितना भी पालन कर सके, स्वयं को उतने में ही धन्य समझता है। ऐसे स्वार्थी लोग भी हैं जो हिन्दू संस्कृति का आनंद तो लेते हैं, किन्तु उसे निर्बल करने के प्रयत्नों से चूकते भी नहीं। वे येन केन प्रकारेण धर्म की आलोचना करते रहते हैं। उन्हें कुछ पाखंडियों द्वारा परोसे ढोंग ही दृष्टिगत होते हैं; वे हिन्दू धर्म का दर्शन कदापि नहीं कर पाते। कुछ लोगों ने तो भिन्न भिन्न खान-पान, भाषा, परिधान, रहन-सहन आदि होने के कारण, हिन्दू धर्म को एक जीवन शैली के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया। उनका मत है कि हिन्दू, धर्म नहीं, अपितु हिंदुत्व एक जीवन पद्धति है। इस उक्ति में कोई तथ्य नहीं है। यह बात वही कह सकता है जिसे हिन्दू-धर्म का ज्ञान नहीं है अथवा उसे भटकाना चाहता है। उन्हें पता होना चाहिए कि हिन्दू-धर्म सभी धर्मों का जनक है, जो धर्म के सभी सिद्धांतों को और ईश्वर के आदेशों को समाहित किये हुए है। संस्कृति, परम्पराएं, आहार, रहन-सहन, परिधान, वेश-भूषा आदि में भिन्नता क्षेत्र, जलवायु और भाषा आदि के कारणों से हैं। हिन्दू-धर्म की यही तो विशेषता है कि इतनी विविधता होने के पश्चात् भी यह एक धर्म है, अनेक देवी देवता हैं किन्तु ईश्वर एक है, मान्यताएं और संस्कार एक हैं। इससे तो यही लगता है कि हिन्दू धर्म एक विशाल महासागर की भांति है, जिसमें अनेकों सरिताएं आकर समाती हैं। हिन्दू-धर्म, अनेकता में एकता का एक अद्भुत उदाहरण है। हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति कहना, उसकी सीमाओं को संकीर्ण करने का एक षड्यंत्र प्रतीत होता है। यदि हिन्दू-धर्म का भली से दर्शन करें तो यह भ्रम टूट जायेगा। हिन्दू धर्म जीवन पद्धति नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन दर्शन है, आत्मा का अवलोकन है और ईश्वर की प्राप्ति का साधन है। हिन्दू धर्म के अपने सिद्धांत हैं और यह उन्हीं सिद्धांतों पर चलता है, यह किसी दल की घोषणापत्र पर नहीं चलता। हिन्दू-धर्म में गर्भधारण से अंतिम संस्कार, यहाँ तक कि पुनर्जन्म तक का दर्शन है। जन्म के पश्चात् प्राणी की दो गति होती है - जीवन और मोक्ष। मोक्ष की प्राप्ति तक प्राणी का सही मार्ग पर चलना ही धर्म है। 

हिन्दू-धर्म करवाता, स्वयं से पहचान। 

आत्मदर्शन से मिले, साक्षात् भगवान।  

यह देखकर बड़ी बहुत विक्षुब्धि होती है कि कुछ द्वेषी लोग हिंदू-धर्म के पावनतम सरोवर में खर-पतवार फेंककर उसे मलिन करने से भी परहेज नहीं करते। बहुत से लोगों ने धर्म को व्यापार बना लिया है। कई स्वार्थी तत्व पाखंड, मिथ्या और आडम्बर का सहारा लेकर ढोंग और अन्धविश्वास परोसते हैं। आज के वैज्ञानिक युग में भी ऐसे ढोंग करने वालों का बोलबाला है। यहाँ तक कि  झूठे प्रचार के द्वारा अनुयायियों को टेलीविजन पर भी पाखंड परोसा जाता है। धन कमाने के लिए जादू, टोना, ढोंग, रूढ़िवादिता आदि का अवलंब लिया जाता है। इन सभी प्रवृत्तियों से धार्मिक आस्था और श्रद्धा का धूमिल होना स्वभाविक है। धर्म के प्रति आस्था में कमी होने से समाज में अपराधों की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।  

राम, कृष्ण की जन्म भूमि, शिवशंकर का वास।

मद्धम हुआ प्रभाव अब, दिखता नहीं प्रकाश।

रावण, कंस के वंशज दिखते, यत्र, तत्र, सर्वत्र;

किसका ये अभिशाप; हुआ पावनता का नाश।

समय समय पर, हिन्दू धर्म में पनपी बहुत सी कुरीतियों का निराकरण होता रहा है, यद्यपि धर्म को निर्बल करने वाले कई कारक अभी भी विद्यमान हैं; जैसे पाखंड, अन्धविश्वास, वर्ण व्यवस्था, रूढ़िवादी परम्पराएं, शिक्षा का अभाव, संगठनात्मक निर्बलता, राजीनीति, संवैधानिक असमानता, अंग्रेजी शिक्षा, अन्य धर्मों का आक्रमण इत्यादि। समय समय पर पनपी कुरीतियों को भी धर्म का अंग माना जाने लगा और सम्पूर्ण हिन्दू-धर्म को कलंकित करने का प्रयास किया जाने लगा। जब सृष्टि उत्पन्न हुई तब ये सामाजिक विकार नहीं थे, जब समाज बढ़ा तो साथ ही बुराईयां भी पनपती गयीं। समय समय पर इनमें सुधार भी होते रहे। स्वार्थी और राजनीति प्रेरित तत्वों ने हिन्दू धर्म को मलिन करने का भरपूर प्रयास किया। हमारी पौराणिक कथाएं सीख देने के लिए और चरित्र निर्माण के उद्देश्य से लिखी गयी हैं। समय के अनुसार उनके चरित्र अप्रासंगिक लग सकते हैं, किन्तु उन कथाओं में समाये तत्व हर काल के लिए सत्य हैं। आज सुचारु रूप से मिलती रोटी ने हिन्दुओं के भी मति को भ्रमित कर रखा है; कई बार कुछ लोग इस बात से अनभिज्ञ हो जाते हैं कि लाखों वर्ष से चली आ रही संस्कृति को यहाँ तक लाने के लिए हमारे पूर्वजों ने कितना त्याग किया होगा, और हम जो जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उनके त्याग और मार्गदर्शन का ही परिणाम है।   

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है :

अवगुन सिंधु मंदमति कामी। वेद विदूषक परधन स्वामी।

बिप्र द्रोह पर द्रोह बिशेषा। दम्भ कपट जियै धरैं सुबेषा।

 

(अर्थात वे अवगुणों के समुद्र, मंदबुद्धि, कामी, वेदों के निंदक और बलपूर्वक पराये धन के स्वामी होते हैं। दूसरों से द्रोह तो करते ही हैं, परन्तु ब्राह्मण द्रोह विशेषता से करते हैं। उनके हृदय में दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे सुन्दर वेश धारण किये रहते हैं।)


मुझे हिन्दू-धर्म ऐसा मार्ग प्रतीत होता है, जो किसी मनहर दिव्य उद्यान से होकर निकलता है; जिसमें सत्य रुपी कल्पवृक्ष है, पाप और पुण्य रुपी विविध फल हैं, संस्कार रूपी सुन्दर और सुगंध भरी फूलों की क्यारी हैं, आनन्द रूपी कभी नहीं कुम्हलाने वाले मोहक पुष्प हैं, परंपरा रुपी लताएं हैं, मन्त्र रुपी कलरव गान हैं, चेतना रूपी शुद्ध वायु है, आनंदित करने वाला दिव्य संगीत है, मार्गदर्शक सूचक लगे हैं, और उसमें से होकर जीवन रुपी पथिक अपने लक्ष्य (ब्रह्म) की ओर बढ़ता चला जा रहा है। बस आवश्यकता है इन्द्रियों और मस्तिष्क को खोले रखने की। यह दायें-बायें आवरण लगे मार्ग की भांति नहीं है, जिस पर चलने वाले को, सिर उठाये ऊँट की भांति मार्ग की सुंदरता का अवलोकन ही नहीं हो सके। 

बौद्धिक सम्पदा जग की, हिन्दू धर्म अनंत।  
संजो लाये युगों से, ऋषि, ब्राह्मण व संत।  

विश्व में हिन्दू के अतिरिक्त दर्जनों धर्म व्याप्त हैं; जिनमें प्रमुख हैं - ईसाई, जैन, बौद्ध, इस्लाम, सिक्ख, इत्यादि। इन धर्मों में ऐसी कौन सी ऐसी अच्छी बात है, जो हिन्दू धर्म में नहीं है; फिर कैसे कह सकते हैं कि हिन्दू धर्म नहीं, जीवन व्यतीत करने की एक पद्धति है। हाँ, किसी एक प्रवर्तक का नाम नहीं लिया जा सकता। इसकी सुंदरता और महानता का इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि हिन्दू-धर्म में जीवन आरम्भ होने के पूर्व से लेकर जीवन-अंत के पश्चात् तक के संस्कार विद्यमान हैं; आत्मा के परमात्मा से पृथक होने और पुनः विलीन होने तक का सम्पूर्ण दर्शन और विधान है। 

सबसे सुन्दर जगत में, हिन्दू धर्म महान। 
जन्म से मरण तक, संस्कार विद्यमान। 
आत्मा से परमात्मा के संबंधों का दर्शन,
जीवन सुगम करने का है सम्पूर्ण विधान। 

चूकि वेदों के स्रोत ब्रह्मा हैं और हिन्दू धर्म वेदों पर आधारित है, तो हिन्दू धर्म के उद्गमकर्ता या जन्मदाता स्वयं ब्रह्मा हुए। पौराणिक काल में ऋषि-मुनियों ने वेद की अपनी-अपनी व्याख्या और विधान से इसे आगे बढ़ाया, यही कारण है हिन्दू धर्म के प्रणेता के रूप में कोई एक नाम आगे नहीं बढ़ा। और यह सच्चाई भी है कि हिन्दू-धर्म किसी प्रवर्तक या संस्थापक का थोपा हुआ धर्म नहीं है; अपितु ईश्वर द्वारा स्थापित, लाखों ऋषियों, मुनियों, ब्राह्मणों और विद्वानों का अन्वेषण है। हिन्दू धर्म का वर्तमान स्वरुप, उन लाखों ऋषि, मुनि, संत और विद्वानों के अध्ययन, चिंतन, मंथन, साधना, तप और शोध का परिणाम है। कई संतों ने अपना अलग पंथ बनाने का प्रयत्न किया, किन्तु हिन्दू-धर्म के विस्तृत, गूढ़ और शक्तिशाली सिद्धांतों के आगे वे सफल नहीं हो सके।   

आरम्भ में हिन्दू-धर्म, एक धर्म निरपेक्ष धर्म था; क्योंकि इसके विरोध में कोई अन्य धर्म था ही नहीं। जो भी नियम या व्यवस्था थी सबके लिए सामान थी। यही कारण है कि वेद, पुराण, गीता आदि में किसी धर्म का नाम नहीं मिलता। परन्तु पूजा-पद्धति और वर्ण व्यवस्था का वर्णन मिलता है, जो आज भी किसी न किसी रूप में सभी धर्मों में विद्यमान है। अन्य धर्मों की भी मान्यता है कि पहले सभी मनुष्यों का धर्म एक ही था, बाद मे उनमें विभेद हुआ।  इसमें कोई संशय नहीं कि हिन्दू धर्म सबसे पुरातन धर्म है। सभी धर्मों के उद्गम का इतिहास मिलता है, किन्तु हिन्दू-धर्म यानि सनातन-धर्म के उद्गम का कोई ओर-छोर नहीं मिलता है। 

सनातन धर्म चिरंतन, जिसका ओर न छोर। 
थमाया है मनुष्य को, मानवता की डोर। 

अब प्रश्न यह उठता है कि जब ईश्वर ‘एक’ है और हर जीव-निर्जीव की संरचना उसी ईश्वर ने की है; यह सृष्टि और ब्रह्माण्ड उसी ईश्वर के सत्ता के अधीन है; मनुष्यों की संरचना और उनका व्यवहार एक सा है; पृथ्वी 'एक' है, वायुमंडल ‘एक’ है; जल एक सा है, सत्य एक है, तो फिर धर्म भिन्न क्यों हैं? मेरे विचार से इसका उत्तर मनुष्य का स्वार्थ, भ्रम, अहं और अज्ञानता है। ईश्वर ने वेदों के द्वारा एक ही धर्म, सत्य और मानवता का धर्म दर्शाया है, किन्तु उसी ईश्वर ने मनुष्य का स्वभाव इतना जटिल और स्वार्थी बना दिया कि उसे समझना सरल नहीं। अपने जटिल और स्वार्थी स्वभाव के कारण ही वह ईश्वर द्वारा बताये मार्ग पर नहीं चलता, अपितु भटकता रहता है; तथा सत्य से विमुख रहकर कई बार पृथकतावाद की निति पर चल पड़ता है। उसके पृथक पन्थ पर चलने के प्रमुख कारण निम्न हैं :
१. प्रभुत्व व प्रतिष्ठा की आकांक्षा,  २. आक्रोश और घृणा, ३. प्रतिद्वंदिता, ४. वैचारिक मतभेद, ५. उपेक्षा और एकतंत्रीय निर्णय, ६. स्वार्थ, ७. अहंकार ८. भाषा या परंपरा का संरक्षण,  ९. उत्पीड़न,।  

शेष सभी धर्मों का कोई न कोई प्रवर्तक है किन्तु हिन्दू धर्म का कोई एक प्रवर्तक नहीं है। अन्य धर्मों के प्रवर्तक अपने को ईश्वर का दूत या ईश्वर का पुत्र के रूप स्थापित किये। जब ईश्वर ने पृथ्वी पर एक सृष्टि की रचना की और वेदों के द्वारा एक धर्म की स्थापना कर दी, तो पुनः दूत भेजकर पृथक धर्म बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी होगी? ईश्वर के पहले से दिए सिद्धांतों और विचारों को ही और आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया? संभवतः ईश्वर भी यही धारणा रही होगी कि पृथ्वी पर एक से अधिक विचारधारा पनपे, ताकि धर्म के बारे में अधिक से अधिक मंथन हो सके।

सबसे सुन्दर हिन्दू धरम है।
हर जीव का रखता मरम है,
मेरा पावन हिन्दू धरम है।

ब्रह्मा, विष्णु अरु शिव यहाँ हैं।
मानवी गुणों की नींव यहाँ है।
सत्य का है प्रतीक धर्म ये,
प्रभु को प्रिय हर जीव यहाँ है।
वैदिक धर्म, पावन परम है।

यहाँ ॐ मन्त्र का उच्चारण।  
ब्रह्म तत्व करता है धारण।
ईश्वर की भक्ति और श्रद्धा,
पर-उपकार पुण्य का कारण।
परपीड़न तो पाप चरम है। 

जीवन का पूर्ण यह दर्शन।
ईश्वर का विनम्र यह वंदन।
वेदों का ज्ञान, सिद्धांत यहाँ,  
शुचि संस्कारों का यह उपवन। 
मानव-धर्म उसका ही करम है। 

संचालक स्वयं नारायण हैं। 
हरि-वचन गीता, रामायण हैं।
दान, दया, अध्यात्म नीतियां, 
प्रभु के घर का पथ पावन है। 
मिटा देता मिथ्या भरम है। 
सबसे सुन्दर हिन्दू धरम है।

अब मैं उन तथ्यों पर आता हूँ, जिसके लिए यह पुस्तक लिखने को उद्यत हुआ; और यह विचार करने के लिए आह्वान करता हूँ कि क्या घटक हैं, जिनके कारण अन्य धर्मों के अनुयायी तो प्रबल रूप से आस्थावान होते जा रहे हैं, किन्तु इतना सुन्दर होने के पश्चात् भी हिन्दू-धर्म के अनुयायिओं में धर्म के प्रति आस्था उसके अनुपालन में ह्रास का आभास होता है। वैसे हिन्दू-धर्म की शक्ति स्वयं ईश्वर है, यह कभी आशक्त नहीं हो सकता। यद्यपि मानवीय मूल्यों का ह्रास देखकर यही लगता है कि धर्म में आस्था गिरती जा रही है। भौतिकतावाद के आगे धर्म के प्रति रुझान कम हो रहा है, आडम्बर बढ़ता जा रहा है, धर्म-रक्षकों और पंडित विद्वानों की अवहेलना तथा निरादर बढ़ रहा है। अन्य किसी धर्म की तो आलोचना भी करना संभव नहीं, किन्तु हिन्दू धर्म का परिहास तक होने लगा है। यद्यपि ईश्वर ने धर्म की रक्षा का कार्य मनुष्य के हाथों में दे रखा है, किन्तु जब मनुष्य अपने कर्तव्य निर्वाह से विमुख होने लगता तो धर्म की रक्षा हेतु, ईश्वर का प्राकट्य भी होता है। हिन्दू-धर्म, मानव जाति के लिए अनंत बौद्धिक सम्पदा है, अतः इसकी रक्षा करना हर मनुष्य का कर्तव्य है। इस पुस्तक के द्वारा, मैंने कुछ उन बिंदुओं पर, जो मुझे लगे कि हिन्दू धर्म के अग्रसर होने में बाधक हैं, यहाँ प्रकाश डालना चाहा है। इनके अतिरिक्त और भी कारण हो सकते हैं जो धर्म को निर्बल बनाने के घटक के रूप में कार्य कर रहे हों, उन सबको खोजने और उनका निराकरण करने की आवश्यकता है। 

हिन्दू धर्म को निर्बल और आशक्त करने के लिए जहाँ कई प्रकार के आक्रमण होते आये हैं, जिसमें बाह्य शक्तियों के अतिरिक्त कई आतंरिक स्वार्थी तत्व भी उत्तरदायी हैं। धर्म को निर्बल और रुग्ण करने वाले घटकों को पहचानने  की आवश्यकता है, ताकि समय रहते उनको रोका जा सके। वैसे हिन्दू-धर्म एक अत्यंत विशाल महासागर है, जिसका जल कभी समाप्त नहीं होने वाला है; किन्तु उस महासागर में रहने वाले कुछ जीवों का पलायन होने लगेगा तो उसका महत्त्व घट जायेगा। जिस सनातन-धर्म को हमारे पूर्वज, अथक प्रयास करके यहाँ तक लाये हैं, उसे बिखरने रोकने का प्रत्येक हिन्दू का परम कर्तव्य है। उन्हें अपने धर्म के सशक्तिकरण हेतु अपना भरपूर योगदान देना चाहिए। इस सन्दर्भ में निम्न कुछ बिंदुओं पर विचार की आवश्यकता है :

१. वैज्ञानिक अन्वेषणों और उपकरणों के कारण तृष्णा में वृद्धि और धर्म के प्रति उदासीनता। आधुनिक युग में भौतिकतावाद की होड़ में धर्म से विमुख होना और नैतिकता का पतन होना। ( विस्तृत चर्चा हिन्दू धर्म और विज्ञान शीर्षक के अंतर्गत ) ।

२. अत्याधिक उदारता (विस्तृत चर्चा 'हिन्दू धर्म की उदारता और बिखराव' शीर्षक के अंतर्गत) । 


३. ढोंगियों,  पाखंडियों और स्वार्थी तत्वों द्वारा लायी गयीं अनेक कुरीतियां, कुप्रथाएं, ढोंग, पाखंड, अंधविश्वास, टोना-टोटका इत्यादि। 

४. वैचारिक युद्ध : कई अन्य धर्मों द्वारा हिन्दू धर्म को अपना प्रतिद्वंदी समझना और हिन्दू धर्म पर कुठाराघात करते रहना। ( विस्तार 'अन्य धर्म' शीर्षक के अंतर्गत ) 

५. वर्ण व्यवस्था : स्वतंत्रता  से पूर्व जहाँ मुग़लों और अंग्रेजों ने हिन्दुओं में वर्ण-व्यवस्था का लाभ उठाकर राज किया; स्वतंत्रता के पश्चात् भी इसका लाभ राजनीतिज्ञों द्वारा खूब उठाया गया और विभिन्न जातियों में वैमनस्यता पैदा की गयी। (विस्तृत चर्चा 'राजनीति, आधुनिकता और वर्ण व्यवस्था' शीर्षक के अंतर्गत)।
  
६ . राजनितिक कारणों, वोट बैंक और तुष्टिकरण की निति के कारण हिन्दू-धर्म का उपेक्षित होना। (विस्तृत चर्चा 'राजनीति, आधुनिकता और वर्ण व्यवस्था' के अंतर्गत) ।

७.  संविधान और विधि : (विस्तृत चर्चा 'हिन्दू धर्म और कानून' शीर्षक के अंतर्गत)।

. पूजा पद्धति की विविधता व एक रूपता का अभाव: (विस्तृत चर्चा 'हिन्दू धर्म और पूजा पद्धति' तथा 'हिन्दुओं के देवी-देवता' शीर्षकों के अंतर्गत)। 

. धर्म का व्यवसायीकरण : कई स्वार्थी लोगों ने धर्म को धनोपार्जन का माध्यम बना लिया। धन अर्जित करने के साथ वे राजनितिक गठजोड़ कर सत्ता के भागीदार बने और धर्म की छवि को मलिन किया। 

१०. शिक्षा : धर्म का सही ज्ञान नहीं होने और समुचित शिक्षा नहीं मिलने के कारण, कुछ गलत परम्पराओं और मान्यताओं का अभी भी प्रचलन है। समुचित मार्गदर्शन और शिक्षा  के अभाव में, लोगों को हिन्दू धर्म के महत्व का पता नहीं चलता। (विस्तृत चर्चा 'हिन्दू धर्म और शिक्षा' शीर्षक के अंतर्गत)।

११. अन्य धर्मों का कट्टरपंथ : कई धर्मों का कट्टरपंथ इस सीमा तक उदण्ड है कि वो अन्य धर्मों को आशक्त करने हेतु आक्रमण तक करने से नहीं चूकता, धर्मान्तरण करवाता है। (और चर्चा 'अन्य धर्म' शीर्षक के अंतर्गत)।

१२. सुदृढ़ संगठन व संस्थागत ढांचा : (विस्तृत चर्चा 'हिन्दू संगठन और संस्थाएं' शीर्षक के अंतर्गत)

१३. धार्मिक कार्यक्रम व्यक्तिगत उद्देश्यों को ध्यान में रखकर, जैसे नाम और प्रतिष्ठा के लिए किया जाना। इन कार्यक्रमों का लाभ सम्पूर्ण हिन्दू समाज को नहीं मिल पाना। ('भोज भंडारा' शीर्षक भी देखें) ।

१४. सीमापार से आतंक : मात्र भारतवर्ष ही हिन्दू बहुल राष्ट्र है। आजकल हिन्दुओं को डराने के लिए, अहिन्दू  पड़ोसी देश आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं। विदेशियों के तार हमारे देश के भीतर तक जुड़े हुए हैं,  जिनके द्वारा वे यहाँ अस्थिरता फैलाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। उन विदेशी शक्तियों का उद्देश्य राष्ट्र और हिन्दू-धर्म दोनों को निर्बल बनाना है। वे विदेशी शक्तियां हिन्दुओं के जातिगत विभेद का भी लाभ उठाना चाहती हैं। 

१५. क्षेत्रीय कारक : भारत में भाषाओँ की विविधता होने के कारण संचार में कठिनाई होती है अतः हिन्दू एकीकरण में बाधा का अनुभव होता है। वैसे यह हम भारतीयों की विशेषता है कि हजारों वर्षों से इन विभिन्न भाषाओँ को  जीवित रखते हुए हम एक हैं और वेद, पुराण, गीता, रामायण और अन्य सभी पौराणिक ग्रंथों की सामग्री तथा हिन्दू धर्म के सिद्धांत हर भाषा में उपलब्ध हैं।

१६. हिन्दू धर्म पर पाश्चात्य सभ्यता का भी निरंतर आक्रमण होता रहा है। कुछ बातों का तो अनुकरण ठीक है किन्तु अँधा होकर हर बात का अनुसरण हमारी हिन्दू और भारतीय संस्कृत पर आघात करती है।

१७. इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया। (विस्तृत चर्चा 'सोसिअल मीडिया' शीर्षक के अंतर्गत) ।

१८. प्रकृति से खिलवाड़। (विस्तृत चर्चा प्रकृति मंदिर शीर्षक के अंतर्गत)।  

हिन्दुओं के उदासीन और लापरवाह रहने से हिन्दू धर्म संकट में पड़ सकता है। हर हिन्दू को धर्म के रक्षार्थ सजग और सचेत रहने के आवश्यकता है। अपने धर्म की रक्षा करना हरेक हिन्दू का धर्म है, चाहे इसके लिए युद्ध ही क्यों न करना पड़े। गीता में धर्म की रक्षा के लिए युद्ध तक करने के लिए कहा गया है और युद्ध धर्मयुक्त भी होना चाहिए :

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ 
यदि तू इस धर्मयुक्त्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा ।
 
धर्म-रक्षा के निमित्त, होय धर्म से युक्त। 
पाप, अपयश पायेगा, नहीं करेगा युद्ध।  

धर्म के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं है। ईश्वर ने सृष्टि की रचना के साथ ही वेद आदि के द्वारा धर्म का ज्ञान दिया है। अपने धर्म की अनुपालना के साथ उसकी रक्षा भी  प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। धर्म की रक्षा का महत्त्व महाभारत के इस श्लोक में बताया गया है :
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी भी नहीं करना, क्योंकि यदि धर्म मर गया तो हमको भी मार डालेगा।

उपरोक्त विन्दुओं पर विस्तारपूर्वक चर्चा करने से पहले, धर्म का अर्थ समझ लेते हैं।


धर्म का अर्थ
ईश्वर की बनाई हर रचना का अपना एक स्वभाविक धर्म है, और उक्त धर्म निभाने के लिए ही ईश्वर ने उसे रचा है।
सभी जीव, पदार्थ, वनस्पति अपने स्वभाविक धर्म का निर्वाह करते हैं। जैसे सर्प का धर्म है विष का निर्माण और आवश्यकता पड़ने पर उसका प्रयोग, क्षुधा मिटाने के लिए शेर व बाघ का धर्म शिकार करना; गाय का धर्म दूध देना; वृक्ष का धर्म फल, छाया व लकड़ी देना; घास का धर्म पशुओं का पेट भरना; जड़ी बूटियों का धर्म औषधि में काम आना; अग्नि का धर्म जलाना; जल का धर्म भिगोना; वायु का धर्म स्वांस देना, इत्यादि। इसी प्रकार खट्टा, मीठा, कड़वा, रंग, गंध, ध्वनि, गर्म, ठंडा, जो जैसा है वही उसका धर्म है, जैसे गन्ने के रस का मीठा होना तो नीबू का खट्टा होना ही उनका धर्म है। यदि मिर्च तीखी न हो तो वह अच्छी मिर्च नहीं है। यदि ये सभी जीव, पदार्थ अपने गुण-धर्म का निर्वाह नहीं करेंगे, या तो मारे जायेंगे या तिरस्कृत हो जायेंगे।

सभी प्राणियों का उसके स्वभाव के अनुसार स्वाभाविक धर्म होता है; किन्तु मनुष्य का धर्म बहुत वृहत है। ईश्वर ने मनुष्य को इसलिए बनाया है कि वह उसकी रचना का उपभोग करे और उसकी रक्षा भी करे। ईश्वर ने सृष्टि की रक्षा का दायित्व मनुष्य को दिया है, इसी प्रयोजन से उसने मनुष्य को देह और प्राण के अतिरिक्त इन्द्रियां, मन, मस्तिष्क और विवेक प्रदान किया है। इसके कारण मनुष्य का धर्म बहुत जटिल हो जाता है। मनुष्य को स्वाभाविक धर्म के अतिरिक्त मानव-धर्म का भी निर्वाह करना पड़ता है जिसे चार भागों में बांटा जा सकता है, स्वाभाविक, सामाजिक, नैतिक व दैविक।
 
स्वाभाविक धर्म - लगभग सभी जीवों का अपना स्वाभाविक धर्म है, जिसका वे निर्वाह करते हैं। मनुष्य भी अपनी दैहिक और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति अपने स्वाभाविक क्रियाओं के द्वारा करता है, जैसे भूख लगने पर भोजन, तन के लिए वस्त्र, रहने के लिए आवास की निर्माण, थकान होने पर विश्राम तथा उपचार, स्वच्छता इत्यादि।इन क्रियाओं के करने के भी नियम होते हैं। भोजन के प्रकार व समय, रहने का नियम, सोने जागने का समय, विचारों का आदान प्रदान आदि के निर्धारित नियम और धर्म हैं, जिसका ज्ञान मनुष्य अपने वातावरण से स्वाभाविक रूप से प्राप्त कर लेता है।  

सामाजिक धर्म - मनुष्य जिस समाज में रहता है उसके प्रति, उसके कर्तव्य और दायित्व हैं। मनुष्य का कुल, पिता, पुत्र, भाई, मित्र, सम्बन्धी, पड़ोस, स्त्री, गुरु आदि के प्रति कर्तव्य होता है और उसका निर्वहन करना धर्म है। सामाजिक धर्म से मनुष्य मानवीय गुणों का ग्रहण, सामाजिक संगठन, सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक कल्याण, शिक्षा इत्यादि का सञ्चालन करता है। राजनीति भी सामाजिक धर्म का अंग है जिससे प्रजा पालन, रक्षा और न्याय की आश्वस्तता प्राप्त होती है। 

नैतिक धर्म - यह कर्तव्य की आंतरिक भावना है और उन आचरण के प्रतिमानों का समन्वित रूप है जिसके आधार पर सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित का निर्णय किया जा सकता है और यह विवेक के बल से संचालित होती है। हमारे द्वारा किए गए किसी भी निर्णय में नैतिक धर्म का पालन करना होता है। नैतिकता की भूमिका वांछित या अवांछित क्या है, यह निर्धारित करने में निहित है। सत्य, शम, दम, यम, नियम, सत्कर्म, क्षमा, कल्याण आदि मनुष्य के नैतिक धर्म हैं।   

दैविक धर्म - जिस ईश्वर ने हमें जीवन दिया और जीवन-यापन के लिए इतना सब कुछ दिया, उपासना के द्वारा उसकी कृतज्ञता व्यक्त करना मनुष्य का धर्म है। जीवन में आने वाले अनेक संकट और दुःखों से मुक्ति तथा सुख व प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए ईश्वर की उपासना और आराधना आवश्यक है। इतना ही नहीं, मोक्ष प्राप्ति का साधन भी प्रभु की उपासना ही है। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए मनुष्य भक्ति, अध्यात्म, साधना, आराधना, उपासना, जप, तप, व्रत, दान आदि करता है।   

मानव धर्म निभाना कोई सरल क्रिया नहीं है। उसके अति जटिल स्वभाव के अनुसार, मनुष्य का व्यवहार भी  जटिल व कभी-कभी कुटिल हो जाता है। अपने स्वाभाव की जटिलताओं के कारण ही वह ईश्वर द्वारा निर्धारित मार्ग पर नहीं चल पाता, जिसके कारण अनेक प्रकार के दुःखों का भोग भोगता है। मनुष्य धर्म के अनुरूप भी कर्म कर सकता है, और प्रतिकूल भी। मनुष्य धर्म के अनुरूप भी कर्म कर सकता है और प्रतिकूल भी। अपने  धर्म  के प्रतिकूल अग्नि कभी शीतलता नहीं पहुंचा सकती; नीबू, मीठा स्वाद नहीं दे सकता; काला रंग पीला नहीं दिख सकता; किन्तु मनुष्य झूठ भी बोल सकता है और सत्य भी, दयालु  भी हो सकता है निर्दयी भी, चोट भी पहुंचा सकता है और दवा भी लगा सकता है इत्यादि। मनुष्य को धर्म के विषय में ज्ञान अध्ययन और अनुभव से मिलता है। उसे वैदिक धर्म के अतिरिक्त व्यक्तिगत धर्म का भी निर्वाह करना पड़ता है। बुद्धि और विवेक होने के कारण, मनुष्य को अच्छे-बुरे में अंतर करने का ज्ञान है, अतः मनुष्य का धर्म है कि वह ईश्वर द्वारा निर्देशित कार्यों का पालन करने के साथ अपना जीवन यापन, जीवन की रक्षा, शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास, प्रगति, कल्याण एवं उत्थान, तथा ईश्वर द्वारा रचित सम्पूर्ण प्रकृति की रक्षा करे। मनुष्य के जीवन, उसकी सभी क्रियाओं तथा दायित्यों और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ध्यान में रखते हुए ही हिन्दू-सनातन-धर्म का प्रादुर्भाव हुआ है, जो मानव धर्म में सर्वोत्तम है और सभी धर्मों का जनक है। उचित और सत्य कर्म को करना और अनुचित कर्म से विमुख रहना ही मनुष्य का धर्म है। मानव-धर्म मनुष्य के सार्थक और सुखमय जीवन जीने की पद्धति है। धर्म मोक्ष प्राप्त करने का साधन है। धर्म, व्यक्ति का जीवन भर मार्गदर्शक होता है। यह प्रदर्शन नहीं अपितु दर्शन है। धर्म, मनुष्य को पशुता से मानवता की ओर ले जाता है। धर्म संयम और अनुशासन से पवित्र वातावरण में चलने का मार्ग है। वैदिक-धर्म में मनुष्य के जीवन और मोक्ष के सभी सिद्धांत समाहित हैं। मनुष्य को धर्म के विषय में ज्ञान अध्ययन और अनुभव से मिलता है।

हिन्दू धर्म प्रदर्शन नहीं, दर्शन है। 
सुचिता, संयम व अनुशासन है। 
सुखमय जीवन का मार्गदर्शक,   
मोक्ष प्राप्त करने का साधन है। 


विभिन्न विद्वानों ने मानव धर्म की अलग अलग परिभाषाएं बताई हैं। किन्तु कोई एक ऐसी परिभाषा जो सर्वमान्य हो शायद ही किसी ने कही हो। इसका कारण है कि धर्म को कुछ शब्दों में बांधना या परिभाषित करना कठिन ही नहीं अपितु एक असंभव कार्य है। कुछ लोग धर्म को ईश्वर की उपासना तक ही सिमित मानते हैं। अलग अलग धर्मों व सम्प्रदायों के लिए भी धर्म का अर्थ अलग अलग और उनके धर्म या संप्रदाय के उद्देश्यों के अनुसार भी होता है। किन्तु आवश्यकता है धर्म को इस प्रकार परिभाषित करने की जो सार्वभौमिक और सर्वमान्य हो। यहाँ, धर्म का अभिप्राय हिन्दू धर्म से है।

मेरे विचार से मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही धर्म है। ईश्वर ने मनुष्य को विवेक और बुद्धि प्रदान किया है अतः मनुष्य का कर्तव्य, प्रतिदिन की दिनचर्या धर्म के अनुरूप होनी चाहिए। जीवन में हम क्या करें?, क्या न करें?, कब करें?, कहाँ करें?, और किस प्रकार करें?; यही धर्म है। धर्म वह सैंद्धांतिक, सांस्कृतिक और रचनात्मक प्रणाली है जो मनुष्य को जीवन यापन का सही मार्ग बताने के साथ अन्य जीवों के जीने में सहायक होता है। एक ओर धर्म से हमें मानवीय गुणों की शिक्षा मिलती है तो दूसरी ओर आत्मा के परमात्मा में पुनः विलीन होने के मार्ग का ज्ञान होता है। धर्म के अनुपालन के बिना, जीवन संकटमय व कष्टप्रद बन जाएगा। धर्म का ज्ञान पुण्य कार्य करने को प्रेरित करता है और पाप कार्यों से दूर करता है। मानव धर्म में मनुष्य के जीवन के अतिरिक्त, अन्य जीव-जंतुओं का पालन व अनुरक्षा तथा प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा भी सम्मिलित है।

मनुस्मृति में महर्षि मनु द्वारा दी गयी धर्म की परिभाषा निम्न प्रकार है -

धृतिः क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम॥

(1)  धृति : धृति (धैर्य ) अथवा कठिनाइयों से  घबराना।
(2)  क्षमा : शक्ति होते हुए भी दूसरों को अपराधों को भुला देना करना या अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना।
(3)  दम : मन को वश में करना हमेशा और संयम से धर्म में लगे रहना 
(4)  अस्तेय : चोरी  करना। मनवचन और कर्म से किसी भी परपदार्थ या धन का लोभ  करना 
(5)  शौच : तनमन एवं बुद्धि को पवित्र रखना।
(6)  इंद्रिय-निग्रह : इंद्रियों को अपने वश में रखना और वासनाओं से बचना।
(7)  धी : सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना और अच्छी बुद्धि धारण करना तथा प्रत्येक कर्म को सोच-विचारकर करना।
(8)  विद्या : सत्य  धर्म का ज्ञान ग्रहण करना।
(9)  सत्य : सदा सत्य का आचरण करना।
(10) अक्रोध : क्रोध को त्याग कर, शांत बने रहना। 

मनु के अनुसार इन दस नियमों का पालन करना धर्म है। यही धर्म के दस लक्षण है। किसी भी व्यक्ति में यदि ये गुण या लक्षण हैं तो वह धार्मिक है। ईश्वर ने अन्य जीवों को कुछ स्वाभाविक ज्ञान दिया है, जिससे उनका जीवन चल सके। उनको कुछ सिखाना या बताना नहीं पड़ता। पशु स्वतः ही चलना, खाना, तैरना आदि सीख जाता है जबकि मनुष्य को ये क्रियाएं सिखानी पड़ती हैं उसे बिना सिखाये न चलना आता है, न बोलना, न तैरना और न ही खाना आदि। ईश्वर ने मनुष्य को विवेक और बुद्धि दी है जिसके कारण उसका धर्म स्वभाविक क्रियाओं से ऊपर मानवता के गुण धारण करना भी है। मनु के अनुसार, धर्म के वे दस गुण हैं, जो मनुस्मृति में उल्लिखित हैं। 

मेरा मानना है धर्म के इन लक्षणों के अतिरिक्त ये निम्न बातें भी धर्म की परिभाषा में सम्मिलित होनी चाहिए; जैसे -

१. ईश्वर के प्रति श्रद्धा व उसकी उपासना : जिस ईश्वर ने सृष्टि की रचना की, मनुष्य को बनाया और उसके लिए सृष्टि में इतनी बड़ी निधि प्रदान किया उसका आभार प्रकट करने के लिए उसकी आराधना करना भी आवश्यक धर्म है। वैसे भी मनुष्य, धर्म का अर्थ साधारणतया ईश्वर की उपासना ही मानता है। ईश्वर को प्राप्त करने का एक मात्र साधन उसकी उपासना है। वैसे उपरोक्त परिभाषा में 'सत्य के आचरण' से यह बात परिलक्षित होती है।  

२. प्रकृति का संरक्षण : ईश्वर द्वारा रचित प्रकृति का संरक्षण भी मनुष्य का धर्म है। प्रकृति की रक्षा के बिना पर्यावरण नष्ट हो जायेगा और जीवन संकट में पड़ जायेगा। प्रकृति के अतिरिक्त जीवन, परिवार व राष्ट्र की रक्षा भी मानव धर्म है। वैसे मनुष्य द्वारा धर्म के अनुपालन से धर्म की रक्षा स्वतः हो जाएगी और धर्म की रक्षा में सबकी रक्षा है।  

३. कल्याण : मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह निर्बल और असहाय जीवों की सहायता करे। इसके अतिरिक्त अपना जीवन परमार्थ में लगाए। परहित मनुष्य का परम धर्म है। वैसे क्षमा भी कल्याण का एक रूप है।  

४. प्रेम : मनुष्य में परस्पर प्रेम और भाई-चारा होना भी मानव धर्म है। प्रेम ही है जो मनुष्य से मनुष्य को जोड़े रखता है। वैसे सत्य और क्षमा से सद्भाव उत्पन्न होता है और सद्भाव से प्रेम।  

धर्माचार्यों व विद्वानों  के अनुसार धर्म का शाब्दिक अर्थ होता है, 'धारण करने योग्य' या सबसे उचित धारणा, अर्थात जिसे सबको धारण करना चाहिये'। अब मनुष्य को क्या धारण करना चाहिए? विभिन्न जीव जंतुओं के गुण धर्म के विषय में हम जानते हैं; ईश्वर ने जो जिस जीव को साधारण स्वाभाव दे रखा है, वही उसका धर्म भी है। किन्तु मनुष्य को उसने बुद्धि, विवेक और मन दे रखा है।  मनुष्य का कोई एक निश्चित स्वाभाव नहीं है। बुद्धि और विवेक होने के कारण मानव जाति का धर्म उसी ईश्वर द्वारा निर्धारित मार्ग पर चलना है। ईश्वर द्वारा निर्धारित मार्ग पर चलने के लिए मनुष्य को जो धारण करना है, वह है - सत्य, कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, अस्तेय, अपरिग्रह, धैर्य, संतोष, शौच, दया, क्षमा, प्रेम, अक्रोध, सदाचरण, सद्गुण, साहस, स्वाध्याय, चेतना इत्यादि। धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है। किसी भी वस्तु का स्वाभाविक गुण ही उसका धर्म है, जैसे अग्नि का धर्म उसकी गर्मी और तेज है। गर्मी और तेज के बिना अग्नि की कोई सत्ता नहीं। ईश्वर ने मनुष्य को विवेक दिया है अत: मनुष्य का स्वाभाविक गुण मानवता है। यही उसका धर्म है। 

जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। अब प्रश्न उठता है, धारण करने योग्य क्या है? निम्न उदाहरणों से स्पष्ट है जो जिसका कार्य है, उसी प्रकार का गुण धारण किये हुए है। पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण किये हुए है। पृथ्वी का धर्म है उस पर रहने वालों को स्थान देना और जीवों को भोजन देना; जल तरलता और शीतलता धारण किये हुए है तथा उसका धर्म है प्यास बुझाना; अग्नि ऊष्मा धारण  किये हुए है अतः अग्नि का धर्म है ताप देना व जलाना; मेघ जल धारण किये हुए है और उसका धर्म है वर्षा करना; वायु ऑक्सीजन व शक्ति धारण  किये हुए है, उसका धर्म है स्वांस देना और भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करना, यदि वायु प्रदूषित हो जाय तो घुटन होने लगेगी।  

इन बातों को धारण करने की बात तो कह दी गयी, किन्तु क्या यह इतना सरल है। यदि यह सब सरल होता तो इतने ग्रंथों की रचना नहीं होती। मानव धर्म का परम शास्त्र है - वेद; और वेदों के आधार पर अनेक उपनिषद, पुराण, ब्राह्मण, अरण्यक, शास्त्र, गीता आदि धर्मग्रंथ लिखे गए हैं, जो धर्म के नियमों की व्याख्या करते हैं। परमात्मा ने सृष्टि के आरंभ में ही मानव कल्याण के लिए वेदों के माध्यम से सृष्टि के सही संचालन व संसाधनों के सदुपयोग के लिए दिव्य ज्ञान प्रदान किया।  वेद में सभी धर्मों के सञ्चालन का सिद्धांत है। वेदों के सिद्धांतों को अन्य धर्मों ने भी किसी न किसी रूप में अनुकरण किया है। वेद जितना हिंदुओं का है उतना ही मुस्लिम या ईसाईयों का भी है। ब्रह्मा ने जो वेद में कहा है, उन्हीं बातों को अन्य धर्मों में ईश्वर ने कोई अन्य रूप धारण करके कहा है। 

वेद पूर्णतः मानव धर्म से संपन्न है। चूकि हिन्दू, वेदों में बताये गए मार्ग का अनुसरण करता है, वह सम्पूर्ण मानवता की बात करता है, जब कि अन्य धर्म मात्र अपने धर्म की। कुरान मुसलमान की बात करता है, बाइबिल ईसाई की बात करता है; किन्तु वेद पूरी मानवता की बात करता है और कहता है –  मनुष्य बनो। 

संत तुलसीदास ने धर्म को एक ऐसा रथ माना है जिसमें  शौर्य, धैर्य, सत्य, शील, बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना), परोपकार, क्षमा, दया, दान, ईश भजन, वैराग्य, संतोष, श्रेष्ठ विज्ञान, निर्मल और अचल मन, शम (वश में मन) जड़े हों । तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में लंका कांड की निम्न चौपाइयों के द्वारा धर्म की विशेषताओं का वर्णन किया है; जिनमें प्रभु श्रीराम ने विभीषण के इस आशंका का शमन किया है कि - रावण के पास रथ हैं, महारथी हैं, विशाल सेना है, दिव्यास्त्र हैं और श्रीराम पैदल, वो भी  नंगे पांव तो किस प्रकार विजय प्राप्त करेंगे !   

सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥
कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है, शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥
ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है॥
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥
निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है॥
सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥
हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिए जीतने को कहीं शत्रु ही नहीं है॥

वास्तव में धर्म श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों, उत्तम कर्तव्यों की समष्टि का नाम है। मानव मात्र की शारीरिक, मानसिक, आत्मिक प्रगति के जो विधि विधान एवं आदेश, उपदेश एवं कर्तव्य हैं वे सब धर्म के अन्तर्गत आते हैं। समय व स्थान के अनुसार धर्म का रूप परिवर्तित हो जाता है। माता, पिता, भाई, पुत्र, गुरु, विद्यार्थी, शिक्षक, नृप, नागरिक के प्रति धर्म कर्तव्यपरक होता है। अहिंसा, सत्य, दया, शिष्टाचार, आचरणपरक धर्म है। जब अपराधी को दण्ड देने की बात कहें तो न्याय धर्म है। जब कहा जाय शौच, संतोष और तप धर्म है तो अध्यात्मपरक धर्म है। इसी प्रकार स्वाध्याय, ईश्वर की उपासना, योग, यज्ञ, प्रार्थना आदि साधनापरक धर्म है। व्यक्ति के अपने जीवन के मूल्यों अथवा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये निर्धारित धर्म, व्यक्तिगत धर्म होता है। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों में ये सब कर्तव्य, बड़े ही सुन्दर ढंग से समाहित हैं। हिन्दू धर्म में वैयक्तिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कर्तव्यों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इन्हीं बातों को मैंने इन पंक्तियों में कहने का प्रयास किया है :    

धर्म तो आचरणपरक है; 
मानव मूल्यों का कनक है;
नियमों से है ये बंधा हुआ, 
धर्म तो जीवन की सड़क है। 

धर्म, जीवन का दर्शन है;  
सम्यक ज्ञान व चिंतन है;
परमात्मा की गवेषणा में,  
धर्म, आत्मा का मंथन है।  

मानवता की साधना में है, 
धर्म संयम-अनुपालना में है; 
धर्म, परहित में समाहित, 
ईश्वर की उपासना में है। 

नहीं टीका, ना छत्रों में है; 
धर्म, न रंगीन वस्त्रों में है; 
ना ही किसी आडम्बर में ये, 
धर्म तो वेद-मन्त्रों में है।  

धर्म, पाप के वारण में है;
नैतिकता के धारण में है; 
सत्पुरुषों के आचरण में, 
धर्म, सत्य के कारण में है। 

धर्म सुखों का आधार है; 
धर्म श्रेष्ठतम व्यवहार है; 
परमात्मा की ओर उन्मुख,
धर्म ही जीवन का सार है। 

वेदों के अभिमन्त्रण में है; 
ईश्वर के आमंत्रण में है; 
धर्म है मानवता की धुरी,  
धर्म आत्मनियंत्रण में है।  

परहित चिंतन एवं लोक कल्याण धर्म की मूल भावना है। धर्म मानवता की धुरी है, और जीवन संजीवनी है; जिसके बिना मनुष्य में मानवता का अभाव दिखता है। सुख का मूल, धर्म है। जहां धर्म है वहीं ओज, तेज, बल, जितेन्द्रिय, यश, ऐश्वर्य एवं जय है। धर्म के बिना मनुष्य पशु समान है। वस्तुत: सत्य के अनुसार आचरण ही धर्म है।

कुछ विद्वानों ने कई बार यह कहकर, निरर्थक बहस चलाया कि हिन्दू धर्म नहीं अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है। धर्म की उपरोक्त परिभाषा से मैं यही समझ पाया हूँ कि धर्म की उपरोक्त सभी विशेषताएं मात्र हिन्दू धर्म में ही समाहित हैं। हिन्दू धर्म सम्पूर्ण जीवन का दर्शन है, परमात्मा की खोज करता है, जन्म, मृत्यु और जीवन के चक्र को परिभाषित करता है और मानव तथा प्रकृति के कल्याणार्थ कार्य करता है; यह कभी किसी धर्म की आलोचना नहीं करता, अपने प्रसार के लिए किसी अन्य पंथ का हनन नहीं करता। शास्त्रों में हिन्दू धर्म की शिक्षा का आधार है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। हिन्दू धर्म का मूल आधार है - मोक्ष। हमारे ऋषि-मुनियों ने मोक्ष के कई मार्गों का निर्माण किया है। 
अब विचारणीय यह है कि धर्म के सभी उत्तम गुण हिन्दू धर्म में विद्यमान हैं, हिन्दू धर्म के सञ्चालन हेतु इतने महान ग्रन्थ हैं तो फिर निर्बलता क्यों आ रही है? क्या हिन्दू धर्म इन सबके साथ पाखंड, ढोंग, आडम्बर, रूढ़िवादिता और अंधविस्वास में घिरा नहीं जा रहा? कई धर्मगुरु धर्म की सही शिक्षा देने के स्थान पर, ढोंग और पाखंडों के द्वारा अनुयायियों को मूर्ख बनाते चले जा रहे हैं, जिनके कारण धर्म में आस्था की कमी होती जा रही है और हिन्दू धर्म निर्बलता की ओर बढ़ रहा है। वैसे तो हिन्दू धर्म एक अथाह महासागर है, किन्तु यदि समुद्र में अत्याधिक गाद भर जाय तो नाव के खो जाने का भय तो रहता ही है।


हिन्दू धर्म और ईश्वर

ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है और उसी ने इसे चलाने के लिए धर्म का विधान दिया है। हिन्दू धर्म के अनुसार ईश्वर एक है; वह सूर्य की भांति है और लाखों देवी देवता उसकी किरणों के समान है। उनमें से प्रत्येक किरण प्रकाश देने के योग्य है। ईश्वर अजन्मा है, निराकार है, सर्वशक्तिमान है, दिव्य है, सत्य है, परम है। आत्मा, परमात्मा का अंश है और जीवन का अंत होने पर उसे पुनः परमात्मा में मिल जाना है। अतः मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य है - मोक्ष, अथवा उस ईश्वर की प्राप्ति। ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग भी ईश्वर ने ही निर्धारित किया है, जो वेद, पुराण आदि ग्रंथों में निहित है। हमारे धर्म ग्रंथों में मोक्ष के ये तीन मार्ग हैं - भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग और ज्ञान मार्ग। जीवन ईश्वर के द्वारा दिया एक अथाह सागर है और धर्म मनुष्य को पार कराने का जहाज। मेरे विचार से केवल एक मार्ग अपनाकर ईश्वर तक नहीं पहुंचा जा सकता, अपितु इसके लिए तीनों ही मार्ग - भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग और ज्ञान मार्ग का समय-समय पर उपयोग करना पड़ेगा। कोई एक मार्ग लक्ष्य प्राप्ति हेतु पर्याप्त नहीं होगा। यदि हमें दूर की यात्रा करनी हो और बीच में नदी, समुद्र, जंगल या पर्वत हों तो केवल एक मार्ग से गंतव्य तक नहीं पहुंचा जा सकता, यात्रा बीच में ही स्थगित हो जाएगी। इसी प्रकार जीवन यात्रा में उपरोक्त तीनों ही मार्गों का प्रयोग आवश्यकतानुसार अनिवार्य जान पड़ता है।   

प्रभु की प्राप्ति  के लिए, मार्ग बने हैं तीन। 
भक्ति, ज्ञान और कर्म, हो के चलो तल्लीन। 

ईश्वर को ब्रह्म माना गया है। ब्रह्म सर्वव्यापी, एकमात्र सत्ता, निर्गुण तथा सर्वशक्तिमान है जो अजर, अमर, अनन्त और इस जगत का जन्मदाता, पालनहारा व कल्याणकर्ता है। ब्रह्म सर्वव्यापी है अत: जीवों में भी उसका अंश विद्यमान है जो आत्मा कहलाती है, और मृत्यु के पश्चात् भी समाप्त नहीं होती तथा किसी नवीन देह को धारण कर लेती है। अंतत: मोक्ष प्राप्ति के पश्चात् वह ब्रह्म में लीन हो जाती है। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार, परम धर्म ईश्वर की ओर उन्मुख होना है। धर्म के लगभग सभी विद्वानों का एक ही मत है कि धर्म का उद्देश्य ईश्वर तक पहुँचने का एक मार्ग है। ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे उत्तम मार्ग, भक्ति मार्ग को माना गया है। क्योंकि इस सृष्टि में कुछ भी होना या न होना ईश्वर के हाथ में है, और वह भक्त से सदैव प्रसन्न रहता है। 

श्रीमदभागवत गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने  कहा है -

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥ 
(इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का मैं ही पालन करने वाला पिता हूँ, मैं ही उत्पन्न करने वाली माता हूँ, मैं ही मूल स्रोत दादा हूँ, मैं ही इसे धारण करने वाला हूँ, मैं ही पवित्र करने वाला ओंकार शब्द से जानने योग्य हूँ, मैं ही ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ।)

जनक व जननी जगत का, मैं  ही सृष्टि धारक। 
मैं वेद, ॐ में स्थित, और जग का पालक।  
 
सृष्टि में मनुष्य एक ऐसा प्राणी है, जिसे ईश्वर ने मस्तिष्क, विवेक और ज्ञान दिया है; जिसका उपयोग वह धर्मपूर्वक जीवन यापन में कर सके। यह मानव-जीवन दुर्लभ है, तथा इस जीवन में वह ज्ञान, कर्म, उपासनादि के द्वारा मोक्ष का भी अधिकारी बनता है। धर्म के ज्ञान के लिए सर्वज्ञानमय वेद को स्रोत माना जाता है। जिसमें मानव के लिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का विधान दिया गया है। किसी भी प्राणी को उसके जीवन में जो कुछ मिलता है, वह ईश्वर की कृपा मात्र है। कई बार न्यून परिश्रम से ही मनुष्य बहुत कुछ पा लेता है और कई बार अधिक परिश्रम करके भी थोड़े में संतोष करना पड़ता है। एक ही कक्षा में कई विद्यार्थी पढ़ते हैं किन्तु पढ़ाई के पश्चात् उनके मार्ग एक नहीं रहते। कोई अपने क्षेत्र में बहुत आगे निकल जाता है, कोई नहीं।  

हरि ने दिया मनुष्य को, जीवन है अनमोल।  
धर्म-मार्ग पर चलकर, पा सकता वह मोल।  

गीता में ईश्वर की प्राप्ति के लिए इन्द्रियों को वश में करना अनिवार्य बताया गया है। इन्द्रियां इतनी प्रबल तथा वेगवान हैं कि जो मनुष्य इन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करता है, उस विवेकी मनुष्य के मन को भी बल-पूर्वक हर लेतीं है। इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करते हुए मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, ऎसी आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से स्मरण-शक्ति में भ्रम उत्पन्न होता है, स्मरण-शक्ति में भ्रम हो जाने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य का अधो-पतन हो जाता है। जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ वश में नहीं होती है उस मनुष्य की न तो बुद्धि स्थिर होती है, न मन स्थिर होता है और न ही शान्ति प्राप्त होती है। उस शान्ति-रहित मनुष्य को सुख किस प्रकार संभव है? 

विषय-चिंतन में मनुष्य, हो जाता आसक्त। 
इन्द्रियों को वश करके, प्रभु को पाता भक्त। 

संत तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में कहा है :

एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।।
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं घर देह चरित कृत नाना।
(अर्थात परमेश्वर एक है, जिसकी कोई इच्छा नहीं, जिसका कोई रूप और नाम नहीं, जो अजन्मा है, सच्चिदानंद और परमधाम है और जो सबमें व्यापक और विश्वरूप है, उन्हीं भगवान् ने दिव्य रूप धारण करके नाना प्रकार की लीला की है।)

हिन्दू ग्रंथों के अनुसार ईश्वर सर्वव्याप्त है। वह अदृश्य है, उसका कोई रूप नहीं है। उसे कोई नहीं देख सकता किन्तु वह सबको देख सकता है। उस तक पहुँचने के लिए कई मार्ग बताये गए हैं, निनमें प्रमुख हैं -  भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग और ज्ञान मार्ग। भक्ति मार्ग को सरल माना गया है, इसमें उपासना, आराधना, साधना, मंत्रोच्चार, समर्पण आदि क्रियाओं द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। ज्ञान-मार्ग, भक्ति मार्ग से कठिन है, इसमें आत्मा, परमात्मा और इनके सम्बन्ध को जानना होता है जो बहुत कठिन कार्य है। आत्मा और परमात्मा सम्बन्ध को आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा जाना जा सकता है। कर्म मार्ग यानि कर्म योग में कर्म के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गृहस्थ और कर्मठ व्यक्ति के लिए यह योग सर्वाधिक उपयुक्त है। गीता के अनुसार मनुष्य का जन्म कर्म करने के लिए हुआ है, अतः कर्मों का परित्याग कर देने से उसे परमपद प्राप्त नहीं होता। 

ईश्वर सर्वव्यापी है, उसे किसी स्थल पर, किसी जीव में, किसी वस्तु में, मन्त्रों और शब्दों में, क्रियाओं में कहीं भी प्राप्त किया जा सकता है। इसके दो प्रमुख कारण हैं, एक : मनुष्य जहाँ भी होता है आत्मा को धारण किये रहता है जो परमात्मा का अंश है, और दूसरा : हर जीव, स्थल या वस्तु ईश्वर की ही रचना है जो उससे जुड़ी होती है। 

मन में ईश्वर है सदा, ईश्वर में मन होय ।
मंदिर जाते इसलिए, मन हेरे हर कोय ।  

हिन्दू धर्म में ओम (ॐ ) शब्द को सर्वाधिक पवित्र तथा ईश्वर का वाचक माना जाता है। ओम को सर्वत्र व्याप्त परम ब्रह्म माना गया है। ॐ एक शब्द में ईश्वर की परिभाषा को समेटे हुए है।  आध्यात्मिक जीवन का श्रीगणेश इसी मन्त्र के चिंतन से आरम्भ होता है।माण्डूक्योपनिषद ओम पर लिखी गई  है। ओंकार ध्वनि ‘ॐ’ को दुनिया के सभी मंत्रों का सार कहा गया है। हमारे सभी वेदमंत्रों का उच्चारण भी ओ३म्‌ से ही प्रारंभ होता है, जो ईश्र्वरीय शक्ति की पहचान  है। ॐ (अउम)  शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है- अ, उ, म। 

अ से अनंत, उ से उपास्य, 
म से समझो मोक्ष प्रदाय। 
जो कि ईश्वर है। 

इसी प्रकार गायत्री मन्त्र एक वैदिक मन्त्र है और सभी मन्त्रों का सार है। यह ईश्वर की सबसे संक्षिप्त और सारगर्भित प्रार्थना है।  इस मन्त्र को लगभग सभी धर्मों ने अपने अपने तरीके से अपनाया है। गायत्री मन्त्र इस प्रकार है : 
ॐ भूर्भवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। 
भावार्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाए रखे।


हिन्दू धर्म और कर्म 

सृष्टि का परम तत्व है- कर्म। कर्म पर ही जीवन आधारित है, इसलिए जीवन में कर्म अनिवार्य है। कर्म के बिना कोई नहीं रह सकता। वेदों और गीता में कर्म की महिमा को भली भांति समझाया गया है। मनुष्य मानसिक और बौद्धिक रूप से विकसित होने के कारण अपने जीवन की आवश्यकताओं की आपूर्ति और आत्म-संतुष्टि हेतु कई प्रकार के कर्म करता है। कर्म से भाग्य का निर्माण होता है, ऐसा ग्रंथों में कहा गया है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन एवं कर्म की क्रिया से अपनी नियति स्वयं तय करता है। परमानन्द की खोज में भटकते हुए मनुष्य के लिए, हिन्दू धर्म में भक्तियोग, ज्ञानयोग के अतिरिक्त कर्मयोग का मार्ग अपनाने का उपाय बताया गया है। कर्मयोग सबसे उपयुक्त मार्ग है क्योंकि हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में कर्म से जुड़ा हुआ है। श्रीमद्भगवतगीता के अनुसार कर्म, आत्मा और परमात्मा को एक करने का योग बन जाता है; जब वह निष्काम हो। 

मनुष्य का धर्म है - कर्म करना; और कर्म है - धर्म का अनुपालन। कुछ लोग जीविकोपार्जन के लिए किये गए कार्य को ही कर्म मान लेते हैं किन्तु यह मनुष्य के कर्म का एक अंश मात्र है। धर्म के बिना कर्म अधूरा और महत्वहीन है। कर्म के मानदंड, वेदों और श्रीमदभागवतगीता में निर्दिष्ट हैं, जो कि मनुष्य का धर्म है। मनुष्य के अधिकार में मात्र उसका कर्म है, और परिणाम ईश्वर के हाथ में। कोई भी कार्य, ईश्वर की कृपा के बिना पूरा होना असंभव है; अतः प्रत्येक कार्य में उस परमेश्वर को स्मरण करना और उसका कृतज्ञ होना भी मनुष्य का कर्म है। कर्म करते समय, धर्म का आचरण अपनाना आवश्यक है। 
कर्म करना ही सदैव, होय मनुज के हाथ।  
धर्म निभाए संग जो, सिद्धि उसी के माथ।   
धर्म के आचरण से अभिप्राय, मात्र ईश्वर को स्मरण करना नहीं, अपितु कर्तव्यों का पालन करना भी है। गाय से दूध प्राप्त करने के लिये, गाय पालना हमारा कर्म है, साथ ही उसे खिलाना-पिलाना और उसकी सेवा, स्वच्छता, रक्षा हमारा धर्म भी है। यहाँ धर्म का तात्पर्य कर्तव्य से है। कर्म वो है जो कुछ हम करते हैं, और  कर्तव्य वो है जो हमें करना चाहिए। लूट भी एक कर्म है और दान भी, किन्तु लूट कर्तव्य नहीं है, वह पाप है; पर दान मनुष्य का कर्तव्य है, अतः दान धर्म है। किसी मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का वध पाप और अपराध है, किन्तु युद्ध में संकट में पड़ने पर एक सैनिक द्वारा शत्रु का वध उसका कर्तव्य है। यहाँ कर्म तो दोनों ही हैं, पर एक धर्म है और दूसरा अधर्म। मनुष्य को वही कर्म करना चाहिए जो उसका कर्तव्य हो।
मनुष्य के जीवन का, कर्म है सेतु प्रबल।
निभाता धर्मपूर्वक, कर्म जो वही सफल। 

श्रीमद्भगवतगीता में कहा गया है : 
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
सभी कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं, अहंकार के प्रभाव से मोह-ग्रस्त होकर अज्ञानी मनुष्य स्वयं को कर्ता मानने लगता है। कर्म का फल मनुष्य के हाथ में नहीं है, इसलिए मनुष्य को अपना कर्म करते रहना चाहिए और फल की 'चिंता' ईश्वर पर छोड़ देनी चाहिए। 

होते हैं कर्म संपन्न, प्रकृति गुणानुसार।  
मूढ़ सोचे कर्ता वह, धर शीश अहंकार। 
 
गीता के अनुसार :
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ 
अर्थात : कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। तू फल का कारण होकर या फल की आसक्ति में कर्म न कर, और न ही अकर्म का साथ दे। कर्मफल की आसक्ति से किया गया कर्म ही दुःख या हताशा का कारण बनता है। जय होने पर दर्प होता है, पराजय होने पर हताशा। डॉक्टर बनने के लिए लाखों छात्र प्रवेश परीक्षा देते हैं, किन्तु सफल कुछ ही हो पाते हैं, क्योंकि ईश्वर ने यह कार्य सबके लिए नियत नहीं किया है। कर्म का फल उसके करने के अनुसार ही मिलता है। इसलिए कर्म करते समय, कर्तव्यों (धर्म) का अनुपालन करना भी आवश्यक है।

पुरुषार्थ करो आपुनो,  ना सोचो परिणाम।
अवश्य देगा किये का, प्रतिफल एक दिन राम।
सार्थक करो प्रयास व, प्रभु में हो विश्वास।
चलकर निश्चित आयगी, स्वयं सफलता पास। 

अच्छे, बुरे कर्म क्या होते हैं? और उनका क्या परिणाम होता है?, धर्म हमें इसका ज्ञान देता है। सकाम कर्म या कामनायुक्त कर्म और निष्काम कर्म के पृथक परिणाम या फल होते हैं, पाप और पुण्य। पाप से दुख और पुण्य से सुख मिलता है। इसलिए धर्म हमेशा पुण्य कर्मो की प्रेरणा देता है। धर्मानुसार कर्म से इस जीवन में सुख और मरणोपरांत स्वर्ग मिलता है। जब निष्काम कर्म अर्थात कामना रहित होकर ईश्वर को समर्पित कर्म किया जाए तो मोक्ष मिलता है, क्योंकि निष्काम कर्मों का फल नहीं होता। कामना युक्त कर्म बंधनों से बांधता है और निष्काम कर्म मुक्ति का साधन बनता है। निष्काम कर्म का एक अर्थ यह भी है - कर्म का मोह, वासना और अहंकार से मुक्त होना। 

श्रीमदभागवत गीता में कर्म के विषय में दिए गए निर्देशों का धर्मगुरुओं ने बहुत विवेकपूर्ण और विस्तारपूर्वक व्याख्या किया है। मैं तो संक्षिप्त में बस यही कहना चाहूंगा, पृथ्वी पर जन्मे हर जीव को अपना कर्म करना है, ईश्वर चाहे कुछ भी परिणाम दे। परन्तु अधिकांशतः वह कर्म व कर्म करने की नियति के अनुसार ही परिणाम देता है। एक परीक्षार्थी पढ़ने में जितना परिश्रम करेगा, उसी अनुसार उसे परिणाम मिलेगा। एक कक्षा के सभी विद्यार्थी एक ही अध्यापक से वही पुस्तक पढ़ते हैं, किन्तु अर्जित ज्ञान की मात्रा सबकी पृथक होती है। परिणाम इस पर भी निर्भर करता है कि विद्यार्थी अपने पाठन धर्म का कितना पालन कर रहा है, वह पढ़ने में चैतन्य है कि नहीं, उसका आचरण और परिवेश विद्या अर्जन के अनुकूल है या नहीं, आदि। वे सभी चाहे समान परिश्रम करें, किन्तु सबकी बुद्धि एक समान नहीं है। परिणाम परीक्षा के समय के परिवेश पर भी निर्भर करेगा। परीक्षा के समय परीक्षार्थी का मन कैसा है, हो सकता है जो पढ़ा हो वही प्रश्न-पत्र में आया हो। 

गीता में मोक्ष प्राप्त करने के लिए मनुष्य को निष्काम कर्म करने के लिए कहा गया है। साथ ही मनुष्य के  चार पुरुषार्थ बताये गए हैं - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और जीवन की चार अवस्थाएं भी बताई गयी हैं। जबकि ब्रह्मचर्य ज्ञान अर्जित करने के लिए और गृहस्थ आश्रम आनंदपूर्वक परिवार बसाने के लिए है। तो क्या जन्म लेते ही मनुष्य निष्काम कर्म में लग जायेगा? निष्काम कर्म तो योगी या सन्यासी के वश की बात है। जब कामना ही नहीं रहेगी तो कर्म करने की प्रेरणा कौन देगा? ईश्वर ने मनुष्य को मन और मस्तिष्क भी दे रखा है और मन कामनाओं के पीछे भागता रहता है, इस कारण निष्काम कर्म साधारण मनुष्य के लिए अत्यंत दुष्कर हो जाता है। किसी भी अवस्था में कर्म किया जाय, सत्कर्म ही होना चाहिए। वानप्रस्थ में कुटुंब की अगली पीढ़ी को स्थापित करने के अतिरिक्त सामाजिक व धार्मिक कार्यों में भी ध्यान लगाना चाहिए। जीवन की चौथी अवस्था यानि की सन्यास आश्रम के कर्म निष्काम और ईश्वर को समर्पित हों। सन्यास का तात्पर्य यह नहीं कि वह घर छोड़ कर चला जाय, अपितु सांसारिक मोह माया से विमुख हो। जीवन में जो ज्ञान, धन आदि अर्जित किया है, इस अवधि में उसे समाज को वापस लौटाने का प्रयत्न करे तथा अन्य पुण्य कार्य करे। जैसे डॉक्टर, शिक्षक आदि अपने ज्ञान का उपयोग समाज को शिक्षित करने में लगाए और उससे धन कमाने की लालसा न रखे, धनवान व्यक्ति धन का उपयोग सामाजिक कार्यों के लिए करे। धर्म समाज से बनता है और समाज के लिए बनता है। समाज के लिए किये गए कार्य स्वतः ही धार्मिक भी हैं।

वैसे धरती पर उत्पन्न प्रत्येक जीव, कुछ न कुछ कर्म अवश्य ही करता है। प्रकृति अनिवार्य रूप से सबसे ही कर्म करवाती है। जब कर्म करना अनिवार्य ही है तो क्यों न अपने समय व शक्ति का उपयोग ऐसे कर्म में लगाएं, जो श्रेष्ठतम हो। श्रीमद्भगवद्गीता में जन्मगत तथा अवस्थागत कर्तव्यों का वर्णन है। इसीलिए अपनी सामाजिक अवस्था के अनुरूप, हृदय तथा मन को उन्नत बनाने वाले कार्य करना ही हमारा कर्तव्य है। 

सत्कर्म से ही मिटते, जीवन के संताप। 
कर्म करो ऐसे सदा, जिसमें ना हो पाप।

एक चिकित्सक का धर्म है - सही चिकित्सा करना, शिक्षक का धर्म है - उत्तम शिक्षा देना, अधिवक्ता का धर्म है - न्याय दिलवाना, इंजीनियर का धर्म है - अच्छा निर्माण करना इत्यादि। इन व्यवसायों की शिक्षा में व्यावसायिक ज्ञान के अतिरिक्त धन उपार्जन का ज्ञान तो दिया जाता है, किन्तु धर्म का समुचित ज्ञान नहीं दिया जाता। यहाँ हर व्यवसायी के दो प्रकार के धर्म हो जाते हैं, एक - वह अपने ग्राहक से जो मूल्य लिया है उसके अनुसार उसका समुचित निष्पादन करना; और दूसरा - अपने साधनों और समय का कुछ भाग, अभावग्रस्त व्यक्तियों के लिए निकालना। ईश्वर ने डॉक्टर बनने के योग्य इसलिए नहीं बनाया कि अधिक धन कमा कर बड़ी अट्टालिकाओं में विलासपूर्ण जीवन व्यतीत करें, अपितु इसलिए बनाया कि अधिक से अधिक रोगियों को स्वस्थ करें। तथा रोग या व्यथा इसलिए देता है कि मनुष्य सन्मार्ग पर चलना सीखे और डाक्टरों का सम्मान करे। धन अर्जन और विलासिता की एक सीमा होनी चाहिए। अधिक धन भी जीवन में नकारात्मक प्रभाव देने लगता है। आवश्यकता से अधिक धन होने पर मनुष्य दुष्कर्मों की और अग्रसर होने लगता है और शिथिल हो जाता है, उसकी संतानें अकर्मण्य हो जाती हैं।  धन का सदुपयोग भी, धर्म ही सिखाता है। 

कर्म को होना चाहिए, सदा धर्म से युक्त।
सत्कर्म से हो मनुष्य, पाप बोझ से मुक्त।

भगवान स्वयं को भी धर्म-युक्त कर्म से मुक्त नहीं किया है। गीता के इस श्लोक में कहा है  - 
यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌ ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ 
यदि मैं कर्तव्य समझ कर कर्म न करूँ तो ये सभी लोक भ्रष्ट हो जायेंगे तब मैं अवांछित-सृष्टि की उत्पत्ति का कारण हो जाऊँगा और इस प्रकार समस्त प्राणियों को नष्ट करने वाला बन जाऊँगा।


हिन्दुओं के देवी-देवता  

हिन्दुओं के प्रमुख देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश, श्रीरामचंद्र , श्रीकृष्ण, हनुमान, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, गणेश, यम, नव-ग्रह, वायु, वरुण, अग्नि, कुबेर आदि हैं जो विशेष शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, किन्तु कहते हैं कि हिन्दुओं के तैंतीस कोटि देवी-देवता हैं। अब कोटि का अर्थ करोड़ भी होता है और प्रकार भी। कुछ विद्वानों को ३३ करोड़ की बात अतिशयोक्ति लगती है, और उनका मत है कि ये देवी देवता ३३ कोटि यानि प्रकार के हैं। उनका कहना है कि हिन्दू धर्म को भ्रमित करने के लिए देवी और देवताओं की संख्या ३३ करोड़ बताई जाती है। पुराणों व ग्रंथों में देवताओं की संख्या ३३ कोटि बताई गयी है, करोड़ नहीं। उनका कहना है कि ग्रंथों का अध्ययन करने पर पता चलता है की देवी-देवता ३३ प्रकार  के हैं, जो निम्न हैं -

१२ आदित्य, ८ बसु, ११ रूद्र और इंद्र व प्रजापति को मिलाकर कुल ३३ प्रकार।




धर्म ग्रंथों में ये जो ३३ नाम दिए गए हैं वे इस प्रकार हैं -

१२ आदित्य :  .  अंशुमानअर्यमाइंद्रत्वष्टाधातापर्जन्यपूषाभगमित्र,
                     १०. वरुण११विवस्वान और १२विष्णु।
 बसु :          .  अप (वरुण), ध्रुव (नक्षत्र), सोम (चंद्र), ४. धर (पृथ्वी), अनिलअनल,
                     .  प्रत्यूष  (आदित्यऔर प्रभाष (अंतरिक्ष) इनका नाम वसु इसलिये है कि सब पदार्थ
                          इन्ही में वास करते     
                          है और  ये ही सबके निवास करने के स्थान है 
११ रूद्र :         शम्भूपिनाकीगिरीशस्थाणु५. भर्ग६. भव७. सदाशिवशिवहर,
                      १०शर्वऔर ११कपाली। 
 अश्विनी कुमार : नासत्य और दस्त्र
मेरे विचार से मात्र इन ३३ कोटि या प्रकार में देवी देवताओं की संख्या सीमित नहीं जा सकती। यह तो नहीं कहा जा सकता ३३ करोड़ की संख्या किस आधार पर बताई गयी है, किन्तु हिन्दुओं के देवी-देवताओं की संख्या, असंख्य है। जिनकी गिनती कर पाना असंभव प्राय है। हिन्दुओं के देवी-देवताओं की संख्या ३३ करोड़ होना अतिशयोक्ति हो सकती है;  किन्तु यदि देवताओं की संख्या ३३ करोड़ नहीं तो ३३ प्रकार भी नहीं है, क्योंकि जो ३३ नाम दिए गए हैं कई नामों की पुनरावृत्ति है और कई नाम छूटे भी हैं। कई देवताओं के अनेक अवतार को भी एक ही देवता गिना गया है। उपरोक्त श्रेणियों में अनेक देवता हैं जिनका नाम कहीं नहीं आता जैसे यक्ष, गन्धर्व, गणेश, कार्तिकेय, नंदी, यमराज, कुबेर, रम्भा, उर्वशी, अप्सराएं, सप्तर्षि, दक्ष, कश्यप, नाग, गरुण, वासुकि, वशिष्ठ, कई ग्रह, नक्षत्र इत्यादि।  देवताओं में भी कई जातियां होती हैं जिनकी संख्या हजारों में है। भगवती दुर्गा की ५ प्रधान श्रेणियों में ६४ योगिनियां हैं और हर श्रेणी में ६४ योगिनी।  इनके साथ ५२ भैरव भी होते हैं। सैकड़ों योगिनी, अप्सरा, यक्षिणी, के नाम ग्रंथों में उल्लिखित हैं। इसी प्रकार ४९ प्रकार के मरुद्गण और ५६ प्रकार के विश्वेदेव भी हैं। भगवान् विष्णु  के ही १० अवतार हैं जिनमें राम और कृष्ण भी हैं, जो हमारे लिए पृथक देवता हैं।

करोड़ों देवी-देवता होने का एक प्रमाण यह भी है कि सतयुग में मात्र देवताओं और राक्षसों का ही निवास था। उस युग में ही लाखों देवता रहे होंगे और देवताओं के अनेकानेक अवतार और वंशज भी देवता ही थे। ब्रह्मा के सत्रह मानस पुत्र, शिव के अनेक स्वरुप, दुर्गा के कई रूप, लक्ष्मी व सरस्वती के कई रूप, पृथक देवी-देवता के रूप में जाने जाते हैं। त्रेता, द्वापर, यहाँ तक कि कलियुग में भी अनेक देवताओं का प्राकट्य हुआ। स्वर्ग में रहने वाले सभी लोग देवता ही हैं, अनेकों ऋषि, मुनि व राजा भी देवताओं की श्रेणी में आये। बहुत से तो देवता वेदों की रचना के बाद प्रकट हुए जैसे कुल देवता, ग्राम देवता, स्थान देवता, हमारे अनेक पूर्वज जिन्हें सम्मान वश हिन्दुओं  ने देवताओं की श्रेणी में रखा और उनकी उपासना की। क्षेत्रीय देवता जैसे ब्रह्म बाबा, डीह बाबा, सती माई, बाला जी, उत्तराखंड में तो लगभग हर गांव में उनका ग्राम्य देवता है। इनके अतिरिक्त हिन्दुओं ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी,आकाश, बादल, अग्नि, वायु, जल, पर्वत, नदी, कई पशु पक्षी, जीव, कई वनस्पति व वृक्ष जैसे तुलसी, अन्न, पीपल, केला, वट, कई  वस्तु जैसे रत्न इत्यादि भी देवी-देवताओं में सम्मिलित किया और ये आराध्य रहे। हम वेद, पुराण, रामायण, गीता, गुरुग्रंथसाहिब तथा कई अन्य धर्म ग्रंथों की भी पूजा करते हैं।

कुल मिलाकर जिसपर भी मनुष्य के जीवन की निर्भरता रही, हिन्दुओं ने उसे अपने ऊपर रखा और देवी-देवता  के रूप में पूजा की। इसी प्रकार, मानव जाति से जो भी शक्तिशाली था और उसके जीवन के सञ्चालन अथवा रक्षा हेतु सहायक था, उनकी भी पूजा की जाती रही। हिन्दू अपने गुरु, पूर्वजों व कुल के श्रेष्ठ जनों को भी देवता तुल्य मानता है, जिनकी व्यक्तिगत रूप से पूजा करता है। बहुत से लोगों को अद्वितीय ज्ञान, शक्ति व गुण संपन्न होने के कारण अपने क्षेत्र में महानता व विशिष्टता प्राप्त रही होगी, जिन्हें देवता का स्थान दिया गया होगा। हिन्दू धर्म में ज्ञान, गुण व शक्तियां भी उपास्य हैं, जो ईश्वर की देन हैं। वैसे ३३ कोटि देवी-देवता, ३३ करोड़ हैं या ३३ प्रकार के हैं, यह बड़ी बहस का विषय है। इसका अध्ययन और विश्लेषण हमारे धर्माचार्य करते आ रहे हैं, और ढेर  सारी चर्चा हमारे वेद, पुराण व ग्रंथों में उपलब्ध है। 

मैं यहाँ यह कहना चाहता हूँ कि हिन्दू अलग-अलग देवताओं का उपासक है - कोई राम का उपासक, कोई कृष्ण का उपासक, कोई शिव का उपासक, कोई हनुमान का भक्त, कोई शनि का उपासक, कोई दुर्गा, लक्ष्मी तो सरस्वती का भक्त, कोई सूर्य का उपासक, कोई चंद्र का उपासक इत्यादि इत्यादि। यद्यपि हम अपनी आवश्यकतानुसार अपने इष्ट देव का स्मरण व पूजन करते हैं, क्योंकि कहीं हमें ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है, कहीं आश्रय की, कहीं धन और वैभव की तो कहीं बल की; इत्यादि। परन्तु हमारी पूजा या आराधना की पद्धति में एकरूपता, सरलता  और समरूपता होनी चाहिए। वेदों के अनुसार, इन सभी देवी-देवताओं से ऊपर ईश्वर है और ईश्वर एक ही है जिसकी पूजा अर्चना देवता भी करते हैं, वही सबका प्रार्थनीय तथा पूज्यनीय है। वही सृष्टा है वही सृष्टि भी है। सभी देवी-देवता उसी का अंश हैं और उसी के प्रति नत हैं। हम कह सकते हैं कि ईश्वर एक सूर्य है और अनेक देवी देवता उसकी किरणें।

श्रीमद्भगवतगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है -

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्‌ ॥ 

जो भी मनुष्य श्रद्धा-पूर्वक भक्ति-भाव से अन्य देवी-देवताओं को पूजा करते है, वह भी निश्वित रूप से मेरी ही पूजा करते हैं। हे कुन्तीपुत्र! किन्तु उनका वह पूजा करना अज्ञानता-पूर्ण मेरी प्राप्ति की विधि से अलग त्रुटिपूर्ण होता है।

वेद, वेदांत और उपनिषद एक ही परमतत्व को मानते हैं। हम अपने इष्ट देव या देवी का पूजन अपनी इच्छानुसार करें, किन्तु हमें एक ऐसा नियम बनाना चाहिए कि किसी अन्य देवी देवता की आराधना या उपासना से पूर्व उस 

सम्पूर्ण सृष्टि के हे! कारक,
सब जीव, पदार्थ के उत्पादक;
ब्रह्मा, विष्णु, महेश; हे! जग के
पालक, संचालक, कल्याणक;
श्रीराम व कृष्ण के रूप में
सम्पूर्ण लोकों के हे! धारक;
दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती रूप में,
शक्ति, वैभव, बुद्धि के दायक;
ॐ मन्त्र में स्थिति, हे हरि!,
वेदों के द्वारा ज्ञान प्रदायक;
सुख-दाता, दुःख-विपदा वारक;
संकट-मोचन, भय के हारक;
हे परमेश्वर! कृपा बरसाना,
पाप, दुष्विचार समूल मिटाना,
स्तुति ग्रहण कर, लेना शरण,
दरिद्रता, दारुण दूर भगाना।

परम-ईश्वर को स्मरण करने का एक सर्वमान्य विधान हो। एक ईश्वर को स्मरण करने से हम सभी हिन्दू धर्म के अनुयायी कहीं न कहीं परस्पर जुड़े होंगे। 



हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ

बहुत से लोगों ने हिन्दू धर्म के धार्मिक ग्रंथों में वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, गीता और महाभारत का नाम ही सुना होगा किन्तु हिन्दू धर्म के इतने ग्रन्थ हैं कि इनका नाम भी याद रखना करना किसी साधारण मनुष्य के लिए असंभव है। बहुत से ग्रंथों के नाम मैंने विकिपीडिया से ढूंढ कर लिखे हैं। वैसे तो इन ग्रंथों के विषय में जानकारी कई स्थानों पर मिल जाएगी, यद्यपि इन सबके नाम मैंने एक स्थान पर लाने के उद्देश्य से यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ, ताकि सर्वसाधारण को भी पता चले कि हमारे ऋषि-मुनियों के कितने शोध के पश्चात् हमें इतनी बड़ी धरोहर मिली है और इन ग्रंथों  के द्वारा हमें अपना जीवन जीने का इतना सुन्दर और अद्भुत ज्ञान प्राप्त हुआ है।

महान भारत का अस्तित्व निहित हिंदुत्व में है। 
हिंदुत्व का अस्तित्व धर्म-ग्रंथों के प्रभुत्व में है। 
धर्म-ग्रंथों की प्रभुता है उनके ज्ञान, सम्मान से,   
ज्ञान-चक्र का सतत संवेग, ग्रंथों के अमरत्व में है। 

पृथ्वी पर प्राचीनतम ग्रन्थ वेद है। अन्य सभी ग्रंथों की उत्पत्ति वेदों से ही हुई है। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में इस बात का प्रमाण मिलता है की वेदों के रचनाकार स्वयं भगवान ब्रह्मा हैं, और उन्होंने इन वेदों का ज्ञान तपस्या में लीन अंगिरा, आदित्य, अग्नि और वायु ऋषियों को दिया था। तत्पश्चात पीढ़ी दर पीढ़ी वेदों का ज्ञान चलता रहा। वेदों को ईश्वर की वाणी भी समझा जाता है। वेद में लिखे गए मंत्र, जिन्हें ऋचाएँ कहते हैं, आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व थीं। वेद प्राकृतिक तत्वों की प्रार्थना किए जाने के रहस्य को बताते हैं। नदी, भूमि, पहाड़, समुद्र, बादल, अग्नि, जल, वायु, आकाश और हरे-भरे प्यारे वृक्ष हमारी कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं; अतः इनकी पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है। ये ईश्वर और हमारे बीच सेतु का कार्य करते हैं।

वेदों में हैं मन्त्र भरे, 
जग का जो कल्याण करे। 
पुराणों में निति की बातें, 
जीवन का संताप हरे। 

चारों वेदों में हिंदू धर्म के प्राचीन रीति रिवाज और परंपराओं का वर्णन मिलता है। आदर्श व्यवहार किस तरह का होना चाहिए इसका वर्णन मिलता है। बुरे कर्मों का फल बुरा होता है और अच्छे कर्मों का फल अच्छा होता है। व्यक्ति को धर्म के अनुसार जीवन जीना चाहिए। बुराइयों से दूर रहना चाहिए। धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष को माना गया है। वेद विश्व के प्रथम ग्रंथ हैं। इन्हें आदि ग्रन्थ भी कहा जाता है।  वेद के आधार पर ही संसार के अन्य धर्म व उनके धर्मग्रंथों की उतपत्ति हुई, जिनमें वेदों के ज्ञान को विभिन्न तरीकों से भिन्न भाषाओँ में प्रस्तुत किया गया। वेद ईश्वर द्वारा ऋषियों को सुनाई गयी वाणी है। वेद में ज्ञान विज्ञान का अथाह भंडार है। इसमें ब्रह्म, देवता, ब्रह्माण्ड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, इतिहास, धार्मिक नियम, प्रथाएं आदि सभी विषयों से सम्बंधित ज्ञान भरा हुआ है। इसमें मानव जाति की हर समस्या का समाधान है। वेद, ज्ञान विज्ञान के स्रोत हैं। वेद, जीवन का विज्ञान है, जीवन की कला सिखाता है। वेद ही जीवन के वास्तविक लक्ष्य को इंगित करता है और ऐसे उपाय बताता है जिससे साधक अपनी जीवन यात्रा सहज रूप तय कर लेता है। वेदों को आदि ग्रन्थ माना गया है। विश्व के सभी ग्रंथों की उत्पत्ति वेदों से ही हुई है। वेद एक अथाह महासागर है; शेष सभी ग्रन्थ, वेदों से संस्फुटित नदियों के समान हैं।
गीता के अध्याय ३ में कहा गया है - 
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌ ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌ ॥ 
कर्म समुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान । इससे सिद्ध होता है की सर्व व्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है ।

वर्णों पर है टिका, भाषाओँ का संसार। 

सब धर्मों का वेद ही, उद्भव का आधार।   


वेद के चार विभाग हैं : ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वेद। और ये चार भाग हैं - संहिता, ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद। वेद में योद्धा, पशुपालक, पुजारी, शिल्पकार, किसान जैसे व्यवसाय के बारे में वर्णन मिलता है।  वेदों में चार प्रकार की जाति व्यवस्था का वर्णन मिलता है- ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र। 

ऋग्वेद : ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है। 
यजुर्वेद : यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रह्माण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान।
सामवेद : साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। 
अथर्वदेव :  इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि की चर्चा है। इसके आठ खण्ड हैं जिनमें भेषज वेद और धातु वेद ये दो नाम मिलते हैं। 

परमात्मा ने सब पदार्थों के नाम और मनुष्य के लिए समस्त कर्मों का विधान वेद में किया। इस प्रकार धर्म मानव के लिए विहित एवं करणीय कर्मों का शाश्वत विधान है, जिसे मानव के लिए परम पिता परमात्मा ने वेद के माध्यम से किया है। वस्तुत: धर्म का मूल कारण ईश्वर है। परमात्मा ने मनुष्य के कल्याण के लिए सर्वज्ञानमय वेद  का ज्ञान दिया, जो धर्म का मूल है। चारों वेदों में मानव के ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विज्ञान के लिए विधि-निषेधपूर्वक उपदेश दिए गए हैं। वेदों में सभी सत्य विद्याएं हैं। वेदों से ही सभी शास्त्रों का उद्भव हुआ है। वेदों का अध्ययन करके ऋषियों ने स्मृतियां, आरण्यक, उपनिषदें, धर्मशास्त्र, दर्शन, शिक्षा, कल्प, योगशास्त्र, आयुर्वेद आदि ज्ञान के ग्रंथों की रचना की। 

गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस में 'वेद' का बार बार वर्णन किया है। वेद के विषय में वर्णन करते हुए, श्री रामचरितमानस में उन्होंने कहा है :
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए।  गनि गुन दोष बेद बिलगाए।।
भले बुरे सभी ब्रह्मा के पैदा किये हुए हैं, पर गुण और दोषों को विचारकर वेदों ने उनको अलग-अलग कर दिया है।  वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा जी की यह सृष्टि गुण-अवगुणों से सनी हुई है।

दुःख सुख पाप पुण्य दिन राती।  साधु असाधु सुजाति कुजाती।।
दानव देव उँच अरु नीचू।  अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू।।
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा।।
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरू मारव महिदेव गवासा।।
सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा।।
अर्थात दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु--असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊंच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन-मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, संपत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गंगा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य; ये सभी पदार्थ ब्रह्मा की सृष्टि हैं। वेद-शास्त्रों ने उनके गुण-दोषों का विभाग कर दिया है।

वेदों के उपवेद : ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

संहिता : हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च धर्मग्रन्थ वेदों का मन्त्र वाला खण्ड 'संहिता' है। ये वैदिक वाङ्मय का पहला हिस्सा है जिसमें काव्य रूप में देवताओं की यज्ञ के लिये स्तुति की गयी है। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है। चार वेद होने की वजह से चार संहिताएँ हैं (हर संहिता की अपनी अलग अलग शाखा है)। 

ब्राह्मण : इस श्रेणी के ग्रन्थ वेद के ही अंग माने जाते हैं। यह वेदों का गद्य में व्याख्या वाला खण्ड है। वेदों के बाद वरीयता में ब्राह्मणग्रन्थों का ही स्थान है। ये दो विभागों में विभक्त है, एक विभाग कर्मकाण्ड-सम्बन्धी है, दूसरा विभाग के ज्ञानकाण्ड-सम्बन्धी। ज्ञानकाण्ड-सम्बन्धी ब्राह्मण ग्रन्थ `उपनिषद्´ कहलाते हैं। प्रत्येक ब्राह्मण ग्रन्थ में एक-न-एक उपनिषद् अवश्य है, किन्तु स्वतन्त्र उपनिषद् ग्रन्थ भी हैं, जो किसी भी ब्राह्मण का भाग नहीं हैं और न `अरण्यकों´ के ही भाग हैं। प्रत्येक ब्राह्मण किसी न किसी वेद से सम्बन्ध रखता है। 

वेदांग : ये छ: वेदांग है।
  1. शिक्षा - इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है।
  2. कल्प - वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी चार शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र, और शुल्बसूत्र। 
  3. व्याकरण - इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है।
  4. निरूक्त - वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है।
  5. ज्योतिष - इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से अभिप्राय `वेदांग ज्योतिष´ से है।
  6. छन्द - वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है।

आरण्यक  : 
वेदों के पश्चात् उनसे सम्बद्ध आरण्यक ग्रन्थ आते हैं। आरण्यकों में वानप्रस्थ-आश्रम के नियमों का वर्णन है।इनमें मुख्य रूप से आत्मविद्या और रहस्यात्मक विषयों के विवरण हैं। वन में रहकर स्वाध्याय और धार्मिक कार्यों में लगे रहने वाले आश्रमवासियों के लिए इन ग्रन्थों का प्रणयन हुआ है। आरण्यक ग्रन्थों में प्राणविद्या की महिमा का विशेष प्रतिपादन किया गया है। इनमें कर्म से ज्ञान की ओर संक्रमण है।  प्रमुख अरण्यक हैं : ऐतरेय, शंखायन, तैत्तिरीय आरण्यक, बृहदारण्यक, तवलकार आरण्यक। 

उपनिषद:
उपनिषद अरण्यकों के अंतिम भाग हैं, इसलिए इन्हें वेदांत भी कहते हैं। वेदों  के आधार पर इनकी रचना हुई। उपनिषदों में ब्रह्मज्ञान का निरूपण किया गया है। उपनिषद भारतीय दार्शनिक चिंतन के मूल आधार हैं और आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। ये ब्रह्मविद्या हैं। वेदों का अध्ययन इतना विशाल और गहरा है जिसका आदि और अंत समझना बहुत कठिन है। वेदों का सार उपनिषद में समाया है और भागवत गीता को भी उपनिषद का सार माना गया है। वेद के संहिता भाग को 'कर्मकाण्ड', आरण्यक भाग को 'उपासना भाग' और उपनिषद भाग को 'ज्ञानकांड' माना गया है। उपनिषदों की कुल संख्या १०८ से १९४ तक बतायी जाती है, किन्तु उनमें प्रमुख १० उपनिषद हैं। हर उपनिषद किसी न किसी वेद से सम्बंधित है। ब्रह्म, जीव और जगत का ज्ञान पाना उपनिषदों की मूल शिक्षा है। सत्रहवीं सदी में दारा शिकोह ने अनेक उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करवाया था।

प्रमुख स्मृतियाँ :  स्मृतियों की रचना वेदों की रचना के बाद, ऋषियों द्वारा स्मृति के आधार पर की गयी। स्मृतियों में सरल कहानियाँ और नैतिक उपदेश हैं। ये अधिक जनग्राह्य तथा समाज के अनुकूल हैं, फिर भी श्रुति की महत्ता इनकी अपेक्षा अत्यधिक मानी गई। ऋषियों ने श्रुति और स्मृति मनुष्य के दो नेत्रों के समान माना। प्रमुख स्मृतियों हैं - मनु, याग्यवल्क्य, पराशर, नारद, अत्रि, विष्णु, हरीत, औषनासी, अंगिरा, उशनस, यम, कात्यायन, उमव्रत, व्यास, दक्ष, गौतम, वशिष्ट, संवर्त, शंख, गार्गेय, देवल, नारद, लिखित, शरतातय और शातातप स्मृति। एन्टॉनी रीड के अनुसार - बर्मा, थाइलैण्ड, कम्बोडिया, जावा-बाली आदि देशों में इन ग्रन्थों को प्राकृतिक नियम देने वाला ग्रन्थ माना जाता था और राजाओं से अपेक्षा की जाती थी कि वे इनके अनुसार आचरण करेंगे। इन ग्रन्थों का अनुवाद किया गया और स्थानीय कानूनों में इनको सम्मिलित कर लिया गया। 

'बाइबल इन इण्डिया' नामक ग्रन्थ में लुइस जैकोलिऑट ने लिखा है : मनुस्मृति ही वह आधारशिला है जिसके ऊपर मिस्र, परसिया, ग्रेसियन और रोमन कानूनी संहिताओं का निर्माण हुआ। आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है।

छः शास्त्र या हिन्दू धर्म के दर्शन -
किसी विषय या पदार्थसमूह से सम्बन्धित क्रमवद्ध ज्ञान शास्त्र कहलाता है। शास्त्र का अर्थ विज्ञान ही है। इस प्रकार हर विषय का ही शास्त्र है जैसे - भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, भूगोलशास्त्र, खगोलशास्त्र, वास्तुशास्त्र, अर्थशास्त्र,  वनस्पतिशास्त्र, धर्मशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, नीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि। किन्तु इनसे भिन्न हिन्दू धर्म में छः शास्त्र हैं जो छः दर्शन के नाम से जाने जाते हैं। इन ६ शास्त्रों के नाम इस प्रकार हैं : १. न्याय शास्त्र, २. वैशेषिक शास्त्र, ३. सांख्य शास्त्र, ४. योग शास्त्र, ५. मीमांसा शास्त्र, ६. वेदांत शास्त्र।  ये ही हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक दर्शन हैं और इनके विषय में अनेक पुस्तकें लिखी गयी हैं। 

रामायण :
रामायण महर्षि बाल्मीकि द्वारा संस्कृत भाषा में लिखित रघुवंशी राजा श्रीरामचंद्र की गाथा है। रामायण को आदि काव्य तथा महर्षि बाल्मीकि को आदि कवि कहा जाता है। इस काव्य ग्रन्थ में पृथ्वी पर राक्षसों विशेषकर रावण का प्रकोप बढ़ जाने के कारण, उनका संहार करने के लिए, भगवान् विष्णु को श्रीराम के रूप में राजा दशरथ के यहाँ जन्म लेना पड़ा।  

श्री रामचरितमानस : 
श्री रामचरितमानस (हिंदी साहित्य) की एक महान कृति है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने सोलहवीं सदी में की। रामचरितमानस की लोकप्रियता अद्वितीय है और हिन्दू धर्म का एक विशेष ग्रन्थ है। तुलसी रामायण भी भगवान् श्रीरामचन्द्र की गाथा है। श्री रामचरितमानस के नायक श्रीराम हैं जो भगवान् विष्णु के अवतार और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं। भारत में इसे तुलसी रामायण के रूप में बहुत से लोगों द्वारा प्रतिदिन पढ़ा और गाया जाता है। कई बार अखंड रामायण का पाठ भी होता है। रामायण मंडलों द्वारा इसे अनेक धुन और लय में गाया जाता है, जो अत्यंत ही रोचक और आनंदित करने वाला होता है। श्रीरामचरितमानस पर आधारित प्रति वर्ष रामलीला का मंचन होता है और कई फिल्मों का निर्माण हो चुका है। तुलसीकृत रामायण पर आधारित टीवी धारावाहिक बहुत लोकप्रिय हुआ।

महाभारत:
महाभारत हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रन्थ ग्रन्थ है।  यह काव्यग्रंथ भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रन्थ है। महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित यह विश्व का सबसे लम्बा ग्रन्थ है। यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है। महाभारत की रोचक कथाएं नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण हैं। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रन्थ भगवतगीता भी सन्निहित है। पूरे महाभारत में लगभग १,१०,००० श्लोक हैं। वेदव्यास जी ने अपने इस अनुपम काव्य में वेदों वेदांगों और उपनिषदों के गुह्यतम रहस्यों का निरुपण किया हैं। टीवी धारावाहिक महाभारत बहुत ही रोचक और लोकप्रिय है। 
श्रीमद्भगवतगीता :
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया वह श्रीमद्भगवतगीता के नाम से प्रसिद्ध है। महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित गीता में वेदों और उपनिषदों का सार है। भागवतगीता में एकेश्वरवादकर्म योगज्ञानयोगभक्ति योग को बहुत सुन्दर ढंग से बताया गया है।

श्रीदुर्गासप्तशती : 
हिन्दुओं का एक धार्मिक ग्रन्थ है जिसमें देवी दुर्गा की महिषासुर नामक राक्षस के ऊपर विजय की कथा का वर्णन है। यह मार्कण्डेय पुराण का अंश है। इसमें ७०० श्लोक होने के कारण इसे 'दुर्गा सप्तशती' कहते हैं। यह देवी माहात्म्य है जिसका नवरात्री के दिनों में पाठ किया जाता है। 
पुराण :
हिन्दू ग्रंथों में अट्ठारह पुराण है, जिनका संक्षिप्त परिचय निम्न है :
(१) ब्रह्मपुराणः-  इसे पुराणों में “महापुराण” भी कहा जाता है। इसमें विस्तार से सृष्टि जन्म, जल की उत्पत्ति, ब्रह्म का आविर्भाव तथा देव-दानव जन्मों के विषय में बताया गया है। इसमें सूर्य और चन्द्र वंशों के विषय में भी वर्णन किया गया है। इसमें ययाति या पुरु के वंश–वर्णन से मानव-विकास के विषय में बताकर राम-कृष्ण कथा भी वर्णित है। इस पुराण में साकार ब्रह्म की उपासना का विधान है। कलियुग का वर्णन भी इस पुराण में विस्तार से उपलब्ध है। 

(२) पद्मपुराणः- चूँकि सृष्टि-रचयिता ब्रह्माजी ने भगवान् नारायण के नाभि-कमल से उत्पन्न होकर सृष्टि-रचना संबंधी ज्ञान का विस्तार किया था, इसलिए इस पुराण को पद्म पुराण की संज्ञा दी गयी है। इस पुराण में भगवान् विष्णु की विस्तृत महिमा के साथ भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के चरित्र, विभिन्न तीर्थों का माहात्म्य, तुलसी-महिमा तथा विभिन्न व्रतों का सुन्दर वर्णन है। 

(३) विष्णुपुराणः- विष्णुपुराण में अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है। श्री विष्णु पुराण में भी इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की सर्वव्यापकता, ध्रुव प्रह्लाद, वेनु, आदि राजाओं के वर्णन एवं उनकी जीवन गाथा, विकास की परम्परा, कृषि, गोरक्षा आदि कार्यों का संचालन, भारत आदि नौ खण्ड मेदिनी, सप्त सागरों का वर्णन है। 

(४) वायुपुराण या शिव पुराण:-  इसमें विशेषकर शिव का वर्णन किया गया है, अतः इस कारण इसे “शिवपुराण” भी कहा जाता है। एक शिवपुराण पृथक् भी है। इस पुराण में शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन है। शिव-महिमा, लीला-कथाओं के अतिरिक्त इसमें पूजा-पद्धति, अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद कथाओं का सुन्दर संयोजन है।

(५) भागवतपुराणः- यह सर्वाधिक प्रचलित पुराण है। कुछ विद्वान् इसे “देवीभागवतपुराण” भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देवी (शक्ति) का विस्तृत वर्णन हैं। भागवतपुराण का प्रचार सबसे अधिक है क्योंकि उसमें भक्ति के माहात्म्य और श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन है। इसमें सबसे बड़ा दशम स्कंध है जिसमें कृष्ण की लीला का विस्तार से वर्णन है। इसी स्कंध के आधार पर शृंगार और भक्तिरस से पूर्ण क

(६) नारद (बृहन्नारदीय) पुराणः- नारद पुराण या 'नारदीय पुराण' स्वयं महर्षि नारद के मुख से कहा गया एक पुराण है। नारदपुराण में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष और छंद-शास्त्रों का विशद वर्णन तथा भगवान की उपासना का विस्तृत वर्णन है। इसके विषय मोक्ष, धर्म, नक्षत्र, एवं कल्प का निरूपण, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, गृहविचार, मन्त्रसिद्धि,, वर्णाश्रम-धर्म, श्राद्ध, प्रायश्चित्त आदि का वर्णन है। 

(७) मार्कण्डेयपुराणः- इसे प्राचीनतम पुराण माना जाता है। इसमें इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि वैदिक देवताओं का वर्णन किया गया है। इसमें ऋग्वेद की भांति अग्नि, इन्द्र, सूर्य आदि देवताओं पर विवेचन है और गृहस्थाश्रम, दिनचर्या, नित्यकर्म आदि की चर्चा है। भगवती की विस्तृत महिमा का परिचय देने वाले इस पुराण में दुर्गासप्तशती की कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चंद्र की कथा, मदालसा-चरित्र , अत्रि-अनुसूया की कथा, दत्तत्रेय-चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओं का विस्तृत वर्णन है। 

(८) अग्निपुराणः- इसमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है। इसके अतिरिक्त शिवलिंग, दुर्गा, गणेश, सूर्य, प्राणप्रतिष्ठा आदि के अतिरिक्त भूगोल, गणित, फलित-ज्योतिष, विवाह, मृत्यु, शकुनविद्या, वास्तुविद्या, दिनचर्या, नीतिशास्त्र, युद्धविद्या, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, छन्द, काव्य, व्याकरण, कोशनिर्माण आदि नाना विषयों का वर्णन है। इसमें तंत्रदीक्षा का भी विस्तृत प्रकरण है।

(९) भविष्यपुराणः- इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन है। विषय-वस्तु एवं वर्णन-शैली की दृष्टि से यह एक विशेष ग्रंथ है। इसमें धर्म, सदाचार, निति, उपदेश अनेकों आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष, एवं आयुर्वेद के विषयों का संग्रह है। वेताल-विक्रम-संवाद के रूप में इसमें रमणीय कथा-प्रबन्ध है। भविष्य पुराण में भविष्य में होने वाली घटनाओं का वर्णन है। 

(१०) ब्रह्मवैवर्तपुराणः- इस पुराण में जीव की उत्पत्ति के कारण और ब्रह्माजी द्वारा समस्त भू-मंडल, जल-मंडल और वायु-मंडल में विचरण करने वाले जीवों के जन्म और उनके पालन पोषण का सविस्तार वर्णन किया गया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन, श्रीराधा की गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन, विभिन्न देवताओं की महिमा एवं एकरूपता और उनकी साधना-उपासनाका सुन्दर निरूपण किया गया है। 

(११) लिङ्गपुराणः- इसमें शिव की उपासना का वर्णन है। इसमें शिव के २८ अवतारों की कथाएँ दी गईं हैं। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों की कथा, ईशान कल्प के वृत्तान्त सर्वविसर्ग आदि दशा लक्षणों सहित वर्णित है।

(१२) वराहपुराणः- इसमें विष्णु के वाराह-अवतार  की मुख्य कथा के साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दान आदि का विस्तृत वर्णन वर्णन है। पाताललोक से पृथिवी का उद्धार करके वराह ने इस पुराण का प्रवचन किया था। इसमें भगवान नारायणका पूजन-विधान, शिव-पार्वती की कथाएँ, वराह क्षेत्रवर्ती आदित्य तीर्थों की महिमा, मोक्षदायिनी नदियों की उत्पत्ति और माहात्म्य एवं त्रिदेवों की महिमा आदि पर भी विशेष प्रकाश डाला गया है। 

(१३) स्कन्दपुराणः- विभिन्न विषयों के विस्तृत विवेचन की दृष्टि से स्कन्दपुराण सबसे बड़ा पुराण है। भगवान स्कन्द द्वारा कथित होने के कारण इसका नाम 'स्कन्दपुराण' है। इसमें बद्रिकाश्रम, अयोध्या, जगन्नाथपुरी, रामेश्वर, कन्याकुमारी, प्रभास, द्वारका, काशी, कांची आदि तीर्थों की महिमा; गंगा, नर्मदा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों के उद्गम की मनोरथ कथाएँ; रामायण, भागवतादि ग्रन्थों का माहात्म्य, विभिन्न महीनों के व्रत-पर्व का माहात्म्य  तथा शिवरात्रि, सत्यनारायण आदि व्रत-कथाएँ अत्यन्त रोचक शैली में प्रस्तुत की गयी हैं। आज भी इसमें वर्णित विभिन्न व्रत-त्योहारों के दर्शन भारत के घर-घर में किये जा सकते हैं। 

(१४) वामनपुराणः- वामनपुराण में मुख्यरूप से भगवान विष्णु के दिव्य माहात्म्य का व्याख्यान है। विष्णु के वामन अवतार से संबंधित यह दस हजार श्लोकों का पुराण शिवलिंग पूजा, गणेश -स्कन्द आख्यान, शिवपार्वती विवाह आदि विषयों से परिपूर्ण है।  

(१५) कूर्मपुराणः- भगवान कूर्म द्वारा कथित होने के कारण ही इस पुराण का नाम कूर्म पुराण विख्यात हुआ। सत्रह श्लोकों का यह पुराण विष्णु जी ने कूर्म अवतार से राजा इन्द्रद्युम्न को दिया था। इसमें विष्णु और शिव की अभिन्नता कही गयी है।

(१६) मत्स्यपुराणः- इसमें जलप्रलय का वर्णन हैं। इसमें कलियुग के राजाओं की सूची दी गई है। इसमें मन्वंतरों और राजवंशावलियों के अतिरिक्त वर्णाश्रम धर्म का बडे़ विस्तार के साथ वर्णन है और मत्सायवतार की पूरी कथा है।

(१७) गरुडपुराणः- गरूड़ पुराण मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला माना जाता है। इस पुराण के अधिष्ठाता देव भगवान विष्णु हैं। इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्म की महिमा के साथ यज्ञ, दान, तप तीर्थ आदि शुभ कर्मों में सर्व साधारणको प्रवृत्त करने के लिये अनेक लौकिक और पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है।  इस पुराण में श्राद्ध-तर्पण, मुक्ति के उपायों तथा जीव की गति का विस्तृत वर्णन मिलता है। 

(१८) ब्रह्माण्डपुराणः— ब्रह्माण्ड का वर्णन करनेवाले वायु ने व्यास जी को दिये हुए इस बारह हजार श्लोकों के पुराण में विश्व का पौराणिक भूगोल, विश्व खगोल, अध्यात्मरामायण आदि विषय हैं।

आवश्यक नहीं सभी पौराणिक कथाएं हर काल या युग में प्रासंगिक हो किन्तु उनमें जो तत्व समाहित हैं उनकी ओर ध्यान देने की बात है। वो ज्ञान के तत्व हैं जो हमें सत्कर्म और सद्विचार देते हैं, कहानियों का ताना बाना तो उन ज्ञान के तत्वों के सरलता से समझाने के लिए बनाया जाता है।

उप-पुराण : 
उपरोक्त १८ प्रमुख पुराणों के अतिरिक्त अनेक उप-पुराण भी हैं  जिनके नाम हैं : १. आदि पुराण, २. नरसिंह पुराण ३. नन्दिपुराण, ४. शिवधर्म पुराण, ५. आश्चर्य पुराण (दुर्वासा द्वारा कथित,  ६. नारदीय पुराण (नारद द्वारा कथित), ७. कपिल पुराण, ८. मानव पुराण, ९. उशना पुराण (उशनस्), १०. ब्रह्माण्ड पुराण, ११. वरुण पुराण, १२. कालिका पुराण, १३. माहेश्वर पुराण, १४. सब पुराण, १५. सौर पुराण, १६. पाराशर पुराण (पराशरोक्त), १७. मारीच पुराण, १८. भार्गव पुराण, १९. विष्णुधर्म पुराण, २०. बृहद्धर्म पुराण, २१. गणेश पुराण, २२. मुद्गल पुराण, २३. एकाम्र पुराण, २४. दत्त पुराण 

भृगु संहिता :
भृगु संहिता ज्योतिष संबंधी समस्त जानकारी उपलब्ध है। इस संहिता में कुंडली के लग्न के अनुसार बताया गया है व्यक्ति का भाग्योदय कब होगा? इसी प्रकार तंत्र मन्त्र की विद्या का ग्रन्थ रावण सहिंता भी है। वैसे आज के वैज्ञानिक युग में तंत्र मन्त्र का अध्ययन इतना प्रासंगिक नहीं रह गया है।  

हनुमान चालीसा :
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा कृत हनुमान-चालीसा चालीस दोहों का एक अनुपम संग्रह है, जो अत्यंत पावन है और हिन्दुओं में बहुत लोकप्रिय है। बहुत से लोग प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं या सुनते हैं। 

पंचांग :
पंचांग हिन्दू धर्म की एक  वार्षिक पत्रिका है; जिसके १) तिथि, २) वार, ३) नक्षत्र, ४) योग, तथा ५) करण, ये पांच अंग हैं। हिन्दुओं का कैलेंडर  पंचांग पर ही आधारित है तथा दिन, सप्ताह, महीना और वर्ष का क्रम भी इन्ही पर आधारित होता है। इसमें सूरज, चन्द्रमा, तारों, नक्षत्रों, ग्रहों और तारामंडलों की दशा आदि का विवरण होता है जिनकी गति और स्थिति का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।  इनके द्वारा धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति के विषय में अनुमान लगाया जाता है। यह हिन्दुओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। पंचांग के आधार पर ही शुभ मुहुर्त, पर्व, ग्रहण, ग्रहों की दशा आदि ज्ञात किये जाते हैं।    

ज्‍योतिष :
ज्योतिष भी हिन्दू धर्म का एक प्राचीन शास्त्र अथवा विज्ञान है। प्राचीन काल में ग्रह, नक्षत्र और अन्‍य खगोलीय पिण्‍डों का अध्‍ययन करने के विषय को ही ज्‍योतिष कहा गया। वेदों में ग्रहों और नक्षत्रों की चाल के विषय में बहुत स्‍पष्‍ट गणनाएं दी हुई हैं। ग्रहों और नक्षत्रों की चाल पर आधारित फलित भाग की गणना की जाती है। ज्योतिष की हजारों की संख्या में पांडुलिपियां मिलती हैं। हिन्दुओं कोई भी शुभकार्य, किसी पंडित द्वारा पंचांग से शुभ मुहूर्त पूछकर करने की प्रथा है। इसी प्रकार ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों स्थिति के आधार पर जन्मपत्री बनायीं जाती है जिसमें प्राणियों के जीवन में होनेवाली शुभ अथवा अशुभ घटनाओं का आंकलन किया जाता है। 

भारतीय ज्योतिष में वेदाङ्ग ज्योतिष, सिद्धांत ज्योतिष या गणित ज्योतिष, फलित ज्योतिष, अंक ज्योतिष, और खगोल ज्योतिष सम्मिलित हैं। इसी प्रकार वास्तुशास्त्र गृह या भवन निर्माण करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है। वास्तुशास्त्र में घर की दिशा, कक्षों के आकार, प्रकार आदि के बारे में निर्देश हैं, जिससे की घर में सुख, शांति और सम्पन्नता रहे। 

कर्मकाण्ड : कर्मकाण्ड व पूजा पद्धति से संबंधित अनेक पुस्तके हैं जिनमें भिन्न कर्मकाण्ड व उपासना की विधि बताई गयी हैं। ये पुस्तकें कर्मकाण्डी पंडितों व विद्वानों के लिए उपयोगी हैं। 

पंचतंत्र की कथाएं : पंचतंत्र, संस्कृत भाषा में लिखी नीतिगत कथाओं का एक संग्रह है। यह कोई धार्मिक ग्रन्थ नहीं है किन्तु पशु पक्षियों की कहानियों के द्वारा मनुष्य को नैतिकता की शिक्षा देता है। निति की शिक्षा भी धर्म का उद्देश्य होता है। नीति कथाओं में पंचतंत्र का पहला स्थान माना जाता है। २००० ईसा पूर्व रचित यह केवल भारत की ही नहीं अपितु पूरे विश्व की धरोहर है। इन कहानियों का अनुवाद विश्व की लगभग सभी भाषाओँ में किया गया। इसके पांच तंत्र हैं - मित्रभेद (मित्रों में मनमुटाव एवं भेद), मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति (मित्र प्राप्ति एवं उसके लाभ), काकोलुकीयम् (कौवे एवं उल्लुओं की कथा), लब्धप्रणाश (हाथ लगी या लब्ध चीज का हाथ से निकल जाना, अपरीक्षित कारक (जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहें ; हड़बड़ी में कदम न उठायें)।  

उपरोक्त ग्रंथों के अतिरिक्त हिन्दू धर्म में अनेक व्रत कथाओं की पुस्तकें हैं, जैसे सत्यनारायण व्रत कथा, लक्ष्मी व्रत कथा, वैष्णोदेवी व्रत कथा, षष्ठी देवी व्रत कथा, संतोषी माँ व्रत कथा, हरितालिका तीज व्रत कथा, करवाचौथ व्रत कथा, सोमवार, मंगलवार, बुद्धवार, वृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार व्रतकथा इत्यादि और हनुमान चालीसा के पश्चात् कई अन्य देवी देवताओं के चालीसा भी आये जैसे दुर्गा चालीसा, शिव चालीसा, लक्ष्मी चालीसा, गणेश चालीसा, श्रीकृष्ण चालीसा, शनि चालीसा,  सरस्वती चालीसा, सूर्य चालीसा, काली चालीसा आदि। और इनके अतिरिक्त आरती संग्रह, ज्योतिष तथा पूजा पाठ विधि की अनेक पुस्तकें भी हैं। इतने अधिक धार्मिक ग्रंथों का किसी के लिए अध्ययन करना बहुत कठिन है। अध्ययन करने के अतिरिक्त इनके गूढ़ रहस्यों को समझना तो केवल दक्ष विद्वानों के ही वश की बात है। इसीलिए यह इन धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन का कार्य ब्राह्मणों पर छोड़ दिया गया ताकि वे अध्ययन करके इनके रहस्यों को आम जन तक पहुचायें। इन ग्रंथों के आधार पर ही हजारों प्रवचनकारी अपने अपने व्याख्यान देते आ रहे हैं। 
ईसाई धर्म का धार्मिक ग्रन्थ मात्र बाइबिल  है,  इस्लाम का धार्मिक ग्रन्थ केवल कुरान है, सिक्ख धर्म का गुरुग्रन्थ साहिब, बौद्ध धर्म का ग्रंथ है त्रिपिटक। हिन्दू धर्म के सैकड़ों ग्रंथों का एक व्यक्ति के लिए अध्ययन तो दूर, नाम स्मरण करना भी एक कठिन कार्य है। ये ग्रन्थ मुख्यतः आत्मा और ईश्वरीय संबंधों को परिभाषित करते हैं। साथ ही  इन ग्रंथों के द्वारा हिन्दू धर्म के अतिरिक्त सृष्टि के विकास का सम्पूर्ण इतिहास मिलता है।

हिन्दू धर्म और संस्कृति 

संस्कृति जीवन की विधि है। हमारे जीवन, रहन-सहन, प्रथाओं और संस्कारों से ही संस्कृति बनती है। हम जो भोजन करते हैं, जो वस्त्र पहनते हैं, जो भाषा बोलते हैं और जो परम्पराएं निभाते हैं; सब मिलकर ही संस्कृति का निर्माण करते हैं। सरल शब्दों मे हम कह सकते हैं कि संस्कृति उस विधि का प्रतीक है जिस पर आधारित हमारा समाज चलता है। इसमें वे भाव, विचार और संस्कार भी सम्मिलित हैं जो हमें परिवार और समाज से उत्तराधिकार में मिलते हैं। कला, संगीत, नृत्य, साहित्य, वास्तुविज्ञान, शिल्पकला, दर्शन, धर्म और विज्ञान सभी संस्कृति के प्रकट पक्ष हैं। तथापि संस्कृति में रीतिरिवाज, परम्पराएँ, पर्व, रहन सहन और जीवन के विभिन्न पक्षों पर सामाजिक दृष्टिकोण सभी सम्मिलित हैं। इस प्रकार संस्कृति मानव जनित मानसिक पर्यावरण से सम्बंध रखती है, जिसमें सभी अभौतिक उत्पाद एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्रदान किये जाते हैं। 

 
हिन्दू धर्म में पूजा, उपासना : 

पूजा ईश्वर या देवता को प्रसन्न करने, उसका गुणगान करने और उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की विधि है, जो मनुष्य के दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण कार्य है। पूजा, उपासना या आराधना के द्वारा हम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और अपने आचरण के द्वारा उसे प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं ताकि वह हमें सुख-संपन्न और प्रसन्न रखे। ईश्वर या देवता के प्रसन्न होने पर वरदान की प्राप्ति होती है और अप्रसन्न होने पर अभिशाप की। पूजा के द्वारा हम मन तथा आत्मा को शुद्ध और पवित्र करने का प्रयत्न करते हैं। जिस प्रकार व्यायाम व अभ्यास से हम अंगों को पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार पूजा या उपासना से आत्मा व मन को सम्पुष्ट करते है। अपनी सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार संक्षिप्त या सविस्तार पूजा की जाती है। हिन्दुओं में प्रायः देवताओं की मूर्ति या चित्र बनाकर पूजा की प्रथा है किन्तु निराकार रूप में ध्यान करके भी पूजा की जाती है। वैसे मुख्य रूप से पूजा; साधना, उपासना और आराधना के द्वारा ही की जाती है; किन्तु हिन्दू-धर्म में प्रचलित पूजा पद्धति, कई दर्जन हैं। साधना का अर्थ है, लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला कार्य। हिन्दू-धर्म में यह एक आध्यात्मिक क्रिया है, अतः यह परमात्मा की प्राप्ति का साधन-विशेष है। सिद्धि-प्राप्त के लिए पूजा, योग, ध्यान, जप, तप, व्रत आदि को करना ही साधना है। उपासना का अर्थ है - ईश्वर के सम्मुख उपस्थित, समर्पण और नमन। तथा आराधना का अर्थ है - मन को एकाग्र करके ईश्वर की ओर उन्मुख करना यानि अपने ईश के स्वरुप, गुण, महिमा आदि का निरंतर स्मरण करना और जप, मनन, भजन, कीर्तन या पूजन के द्वारा कृपा प्राप्त करने का यत्न करना। पूजा की विभिन्न क्रियाओं के द्वारा मनुष्य, उस अवधि में अपना मन और ध्यान ईश्वर में लगाए रहता है। 

पूजा की मुख्य अवधारणा है - ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भक्ति। पूजा से मन शुद्ध और स्थल पावन हो जाता है। श्रीमद्भगवतगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है - जो लोग मुझमें अपने मन को एकाग्र करके निरंतर मेरी पूजा और भक्ति करते हैं तथा खुद को मुझे समर्पित कर देते हैं, वे मेरे परम भक्त होते हैं। लेकिन जो लोग मन-बुद्धि से परे सर्वव्यापी, निराकार की आराधना करते हैं, वे भी मुझे प्राप्त कर लेते हैं। परम भक्त तो ईश्वर की साधना करता है, जो एक कठिन कार्य है, किन्तु साधारण भक्त अपनी सुविधा के अनुसार एक बार में निम्नोक्त में से किसी एक या एक से अधिक पद्धति के द्वारा पूजा या उपासना कर लेता है। हिन्दू-धर्म एक अनंत वाटिका है और इसकी विभिन्न क्रियाएं रंग बिरंगे पुष्प। पुष्प कोई हो, रंग या गंध कोई हो, पुष्प तो पुष्प ही है तथा पुष्प का अनुपम धर्म है सुगंध और छटा बिखेरना। पूजा स्थल जब सुसज्जित हो जाता है तो अपनी रमणीयता और पावनता से सभी के मन को आकर्षित कर लेता है तथा एक अनुपम और दिव्य वातावरण की अनुभूति कराता है। 

हिन्दू-धर्म अनंत वाटिका, रंग विरंगे फूल खिले। 

छटायुक्त वातावरण में, विचरक को हरि मिले 


विविध पूजा पद्धति :

हिन्दू धर्म में जहाँ देवताओं की बहुलता है, वहीं पूजा-पद्धति भी विविधताओं से भरी हुई है। हिन्दुओं में कहावत है : जैसा देवता - वैसा अक्षत; यानि अलग-अलग देवताओं की उपासना की विधि भी भिन्न है। हिन्दुओं के पृथक वर्गों में पूजा अथवा उपासना की पद्धति देवता, समय, सामर्थ्य, सुविधा, स्थान, मान्यताएं आदि के अनुसार भिन्न हैं। हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति की विविधता से हमें लगता है कि यह बिखरा हुआ है, किन्तु यह धर्म के सौंदर्य को चरम पर पहुंचाता है। कोई भी वस्तु, जीव या क्रिया नहीं है, जिसका हिन्दू धर्म में उचित महत्व व सम्मान नहीं हो। क्रियाएं भी चाहे वो व्यक्तिगत हों, सामाजिक या धार्मिक हों; सभी का महत्व हमारे ग्रंथों में वर्णित है। सभी हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ एक ही हैं, प्रमुख देवी देवता एक हैं, धार्मिक क्रियाएं जैसे पूजा, उपासना, आराधना, साधना, प्रार्थना, अनुष्ठान, ध्यान, स्नान, भजन, मनन, स्मरण, कीर्तन, पाठ, जप, तप, व्रत, दान, तीर्थ इत्यादि भी एक हैं। किन्तु कई बार पूजा की पद्धति में भिन्नता दिखती है। पूजा की इस विविधता से लोगों में स्वतंत्रता की अनुभूति होती है। पूजा या उपासना की विधि चाहे कोई भी हो किन्तु उद्देश्य एक ही होता है; ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और अपने आचरण के द्वारा उसे प्रसन्न रखना ताकि वह हमें सुख-संपन्न और प्रसन्न रखे। पूजा की हरेक पद्धति की अपनी ही सुंदरता है और इन सभी का पृथक महत्व है। 

पूजन-वंदन से सदा, ईश्वर में जुड़ता मन।

पूजा की विधि सिखाता, विविध, धर्म सनातन। 

मिलता है पूजा का अधिक और भी लाभ, 

करने से नित निश्चित पद्धति का अनुपालन।  

हिन्दुओं में अपनी विधि के अनुसार पूजा की निम्न पद्धतियां प्रचलित हैं :


१. धार्मिक अनुष्ठान करना।
२. यज्ञ करना।
३.  व्रत-कथा करना। 
४.  हवन करना या करवाना।  
५.  पाठ या जाप करना।
६.  देवता को स्नान करवाकर तथा भोग लगाकर पूजा । 
७.  गंगा, यमुना, नर्मदा आदि पवित्र नदियों में स्नान।  
८.  मंदिर में हाथ जोड़कर आराधना। 
९.  प्रार्थना या स्तुति करना। 
१०.  देवी या देवता को साष्टांग प्रणाम करके पूजा। 
११.  देवी या देवता पर दूध या जल चढ़ाकर पूजा। 
१२.  देवी या देवता पर फूल या फल चढ़ाकर पूजा। 
१३.  मन्त्रों का उच्चारण या जाप करना।  
१४.  राम नाम या ईष्ट देव का नाम जपना, माला फेरना। 
१५.  मंदिरों में, अनुष्ठानों में या संतों को दान देना। 
१६.  ज्योति जलाकर या दीपक से पूजा। 
१७.  धूपबत्ती, अगरबत्ती या दसांग जलाकर सुगंध के द्वारा पूजा। 
१८.  नारियल फोड़ना। 

१९.  अक्षत, ताम्बूल, या चन्दन चढ़ाकर पूजा। 
२०.  भजन या कीर्तन करना। 
२१.  देवी या देवता के नाम का जयघोष या जयकारा लगाना। 
२२.  घंटी, शंख या अन्य वाद्य बजाकर पूजा। 
२४.  कोई मन्नत मांगना या मनौती करना। 
२५. आचमन करके पूजा। 
२६. अर्ध्य देकर पूजा।  
२७. प्रसाद चढ़ाकर पूजा करना। 
२८. वस्त्र  या सूत्र चढ़ाकर पूजा। 
२९. ध्यान करना या ईश्वर के नाम का मनन करना। 
३०. मंदिरों में जाकर दर्शन करना। 
३१. तीर्थ करना।
३२मंदिर में झुककर माथा टेकना 
३३आरती करना। 
३४. उपरोक्त के अतिरिक्त पूजा के बीच या स्वतंत्र रूप से धूप दसांग या अगरबत्ती जलाकर सुगंध अर्पित करना, तिलक लगाना, कलावा बांधना, फल, फूल मिठाई चढ़ाना, घर में गंगा जल छिड़कना, द्वार पर वंदनवार या तोरण बांधना आदि भी सम्मिलित हैं।

इन सबके अतिरिक्त पूजा की और भी विधियां हो सकती हैं। कोई मंदिर जाकर पूजा करता है तो कोई घर पर ही कर लेता है। कोई उत्सव करके पूजा करता है तो कोई एकांत में ध्यान करता है। कोई १६ सोमवार का व्रत करता है तो कोई १६ शुक्रवार का या फिर शनि, मंगल, रवि व वृहस्पति का। इनके अतिरिक्त त्यौहारों के व्रत और पूजा भी अलग अलग होते हैं। पूजा की कई क्रियाओं का नियम बहुत कठिन है, और कई क्रियाएं अति सरल भी हैं। पूजा की अनेक विधियों में से उपासक अपनी आवश्यकता और सुविधानुसार पूजा-विधि का चयन कर लेता है। इसी प्रकार कोई पंडित से पूजा करवाता है, कोई अपने आप कर लेता है। कोई मंदिर या किसी पूजा स्थल पर जाकर पूजा करता है, कोई घर पर ही कर लेता है। हिन्दुओं के जीवन के हर संस्कार में पूजा का विधान है,चाहे वह संक्षिप्त हो या विधिवत। हर कार्य के आरम्भ करने से पूर्व या तो पूजा या ईश्वर का स्मरण करना आवश्यक होता है। कोई नया उपकरण, नए बर्तन, नए वाहन, नई मशीन, नए अस्त्र, वाद्य यंत्र आदि के आने पर भी उसकी पूजा की जाती है। ग्रंथों का पूजन, भूमि पूजन, गृह पूजन, नई दुल्हन आने पर आरती, बालक होने पर छठ पूजन आदि भी हिन्दुओं की परंपरा है।

पूजा, ईश्वर के प्रति मन में श्रद्धा व समर्पण का भाव लाना है, जिसके द्वारा मन की शांति लाना और अभीष्ट की प्राप्ति हेतु शक्ति जुटाना होता है। जीवन का अंतिम लक्ष्य है, मोक्ष; अतः पूजा का लक्ष्य स्वतः ही वह मार्ग ढूंढना हो जाता है, जो जीवन के उस लक्ष्य तक पहुंचाए। 
हिन्दू धर्म में आराधना व उपासना की ये विविधताएं ही इस धर्म को महान बनाती हैं। ये विविधताएं हिन्दू धर्म के खुले विचार और संकीर्णता से ऊपर होने का परिचायक हैं, जो अन्य किसी धर्म में नहीं मिलती। यह हिन्दुओं के असीमित स्वतंत्रता का भी द्योतक है। चूकि पूजा या आराधना की पद्धति अनुयायी पर थोपा नहीं जाता, उसे वह स्वेच्छा से अपनाता है, ईश्वर में उसकी आस्था अधिक प्रबल होती है। स्वतंत्र मन से उपासना के कारण, भक्त अत्याधिक आनंद का अनुभव करता है।

कुछ अन्य धर्मों में पूजा के नियम इतने दृढ़ हैं कि उन्हें अनुयायियों पर थोपा जाता है और वे नियम से टस से मस नहीं हो सकते। उन्हें यही निर्देश दिया जाता है कि ईश्वर के दर्शन का धर्मगुरुओं द्वारा निर्धारित मार्ग ही मात्र उपाय है। अनुयायियों को धार्मिक स्वतंत्रता बिलकुल भी नहीं होती। कई बार तो उन्हें कट्टरपंथियों के आतंक और प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ता है। कई बार धार्मिक अत्याचार होने पर भी मुंह नहीं खोल पाते। इस प्रकार उनमें ईश्वर के प्रति कितनी आस्था जागृत होती है, कहा नहीं जा सकता, किन्तु धार्मिक एकता अवश्य परिलक्षित होती है। 

किसी भी कार्य के करने में अनुशासन आवश्यक है, मगर कितना? प्रत्येक कार्य में कोई एक निश्चित नियम पर्याप्त नहीं होता, कई बार विवेक का प्रयोग करने की आवश्यकता पड़ती है। गंतव्य तक जाने के यदि कई मार्ग हैं तो वह पथिक के विवेक पर निर्भर करता है, कि वह अपने ज्ञान व सुविधा के अनुसार कौन सा मार्ग चुने। हमारे धर्म के प्रणेताओं को हमारा नमन है, कि उन्होंने धार्मिक और जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु कई सिद्ध मार्गों का उद्भव किया जो सभी वेद और शास्त्रों में वर्णित हैं। हाँ, एक बात और है, कई मार्ग होने के कारण, अपने मार्ग से भटकने की भी संभावना रहती है। सरल या लघु मार्ग की वनस्पति कठिन या दीर्घ मार्ग पकड़ लेने से गंतव्य तक पहुँचने में कठिनाई होती है, जिसके लिए मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है। यह भी आवश्यक है कि मार्गदर्शक अथवा गुरु को मार्ग का सही ज्ञान हो।

मूर्ति पूजा :
हिन्दुओं में देवताओं की मूर्ति की पूजा की परंपरा है। कई अन्य धर्म मूर्ति-पूजा की आलोचना करते हैं, किन्तु  किसी अन्य रूप में वे भी इसे अपनाते हैं। मूर्ति की पूजा कितना अनिवार्य है, इस विषय पर भी कुछ चर्चा करना चाहूंगा। मन को स्थिर होने के लिए आपको एक आधार की आवश्यकता होती है, जिस पर मन को केंद्रित हो सके। वह आधार किसी आकृति, रूप, स्वरुप, गुण या छवि के रूप में हो सकती है। बच्चों को हम क, ख, ग आदि अक्षर सिखाते हैं तो बोलने के साथ उन अक्षरों की आकृति भी दिखाते हैं, जिससे कि अगली बार वह आकृति देखते ही समझ जाता है कि वह अक्षर कौन सा है। इसी प्रकार किसी देवता की मूर्ति को देखकर उस देवता के गुण-समूह और शक्तियों का बिम्ब मन में प्रकट हो जाता है। मूर्ति की पूजा, परम-ब्रह्म की ओर आगे बढ़ने का एक सोपान बन जाती है। यह सही है कि ईश्वर एक अदृश्य शक्ति है, निराकार है, अजन्मा है, अविनाशी है, जिसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है, किन्तु यह भी सत्य है कि वह सर्वत्र है, सर्वगुण संपन्न है, उसके अगणित रूप हैं। हमें उसी निराकार ईश्वर यानि ब्रह्म में मन को लीन करना है। किन्तु उस निराकार और अदृश्य बिंदु यानि ब्रह्म को मन में धारण करना अत्यंत कठिन कार्य है। मन जो सदैव भटकता रहता है, को टिकने के लिए कोई आधार चाहिए। किसी निराकार, अदृश्य लक्ष्य की ओर चलने से आपका विवेक ही आप से अवश्य पूछेगा, कहाँ जा रहे हो? जिस राह पर जा रहे हो उसका उद्गम कहाँ है? कई बार मार्ग में मरीचिका सा प्रतीत होने लगेगा। यदि मनुष्य ने अक्षर और शब्द का उद्गम नहीं किया होता तो, उसे अपने विचार व मन की बात प्रकट करना कितना कठिन हो जाता। अक्षर और उनसे बने शब्द मात्र आकृति होते हैं, उनकी ध्वनि हम अंतःकरण से निकालते हैं। देखकर या सुनकर ही हम शब्दों के अर्थ भी समझ जाते हैं, और उसके अनुसार क्रियाशील भी हो जाते हैं। बोले हुए अक्षर या शब्द का कोई आकार होता है? किन्तु लिखित शब्द का? इसी प्रकार मूर्ति को देखकर हम देवता या ईश्वर के गुण चरित्र और प्रताप का अपने अंतःकरण में अनुभव करने लगते हैं। 

हर व्यक्ति के भीतर उसकी अदृश्य आत्मा है, जो उसी ईश्वर का अंश है; उसका अवलोकन भी वह व्यक्ति स्वयं नहीं कर पाता। बाहरी लोग भी किसी व्यक्ति की पहचान, उसकी आकृति और नाम से ही करते हैं। व्यक्ति के आत्मा की थोड़ी झलक, उसकी कृति और विचारों में मिलती है। यदि रामायण की बातें शब्दों में नहीं आतीं तो महर्षि बाल्मिकी का साक्षात्कार करना असंभव था जबकि ये बातें तब भी उनके अंतःकरण में होतीं। इसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदास का चित्र देखते ही रामचरितमानस समक्ष आ जाता है। ईश्वर ने उन्हें शरीर रुपी आकृति दिया, जिसके द्वारा हम बाल्मीकि व तुलसीदास को पहचानते हैं। किन्तु उनको जानने या पहचानने की जिज्ञासा उनके कृतियों के कारण है। बिजली अदृश्य होती है, किन्तु हम उससे उत्पन्न प्रकाश को देखते हैं या उसके द्वारा हो रहे कार्य को देखते हैं। यदि किसी व्यक्ति को जिसने अपने दादा को नहीं देखा हो और उसे बताया जाय: उसके दादा लम्बे थे, गोरे थे, मोटे थे, भुजायें बलिष्ठ थीं, नाक चपटी थी, माथा चौड़ा था, सिर पर बाल कम थे, आवाज बुलंद थी, बड़ी ऑंखें थीं, दृष्टि स्पष्ट थी, अच्छा गाते थे, बांसुरी बजा लेते थे, प्रतिदिन पूजा करते थे इत्यादि बहुत विस्तार से बताने पर भी मन में उनकी छवि पूरी तरह नहीं उभर पायेगी जो मात्र एक चित्र दिखा देने से समझ में आ जाएगी। एक चित्र हजारों शब्दों पर भारी होता है। 

मूर्ति या देवताओं के चित्र वास्तव में उनके गुणों की आकृति हैं। जैसे शिव जी की वेश भूषा में नीला कंठ, जटा, भभूति, डमरू, त्रिशूल, अर्ध चंद्र, गंगा, कटि में छाला, सर्पों की माला आदि सभी शिव जी के अलग अलग दिव्य गुणों का वर्णन करते हैं। इसी प्रकार राम की धोती, अंगोछा, जनेऊ, जटा, धनुष, तुरीण आदि धारण किये हुए देखने पर आदर्श, मर्यादा, वीरता, धैर्य, क्षमा, धर्म-पालन, भक्त-वत्सल, कृपालु आदि का तत्काल बोध होता है। श्रीकृष्ण को धोती, अंगरखा, बांसुरी, चक्र-सुदर्शन, मुकुट में मोर पंख आदि धरे चित्र देखने पर प्रेम, ज्ञान, कर्म, योग सहित उनके चौसठ गुणों में मन पहुँच जाता है। वैसे तो ये सर्वस्व हैं, सर्वज्ञ हैं, स्वयं भगवान हैं, किन्तु अपने दैविक गुणों के साथ अपनी लीलाओं के लिए अवतरित हुए। यदि एक बून्द महासागर के किसी भी भाग में मिल जाय, अंततः वह महासागर में मिलकर विलीन हो जाती है। बून्द का, यदि एक लहर से भी संपर्क हो जाय तो वह स्वतः ही भीतर खींच ले जायेगी। इसी प्रकार हम किसी भी देवता की उपासना करें, वह परम-ईश्वर की ही उपासना है।    

समक्ष आने पर देवताओं की, मूर्ति अथवा चित्र। 
पढ़ लेते हम सूत्र की भांति, उनके प्रताप पवित्र।        
    
शिव, राम, कृष्ण, दुर्गा आदि की मूर्ति के सामने आते ही, मन उनके दैविक गुणों पर केंद्रित हो जाता है। मूर्ति के सम्मुख ध्यान मग्न होने पर ईश्वर से सीधे साक्षात्कार का आभास होने लगता है। मूर्ति या चित्र देखकर या इष्ट देव का नाम लेकर, अंतःकरण उस देव के चरित्र को स्मरण करने लगता है। निराकार रूप में मन भटकता रहता है और उसे ईश्वर की ओर उन्मुख करना बहुत कठिन हो जाता है। पूरी पृथ्वी किसी ने भी नहीं देखा, किन्तु मानचित्र के द्वारा हम जानते हैं कि कहाँ जल है, कहाँ स्थल है, कहाँ वन है, कहाँ पर्वत है; और अमेरिका, इंग्लैंड या विश्व के किसी भी स्थान का मार्ग ढूंढ लेते हैं। पूर्वजों के चित्र घर में लगाते हैं, जिससे कि स्मरण रहे, हम इनके वंशज हैं। महापुरुषों के चित्र लगाते हैं कि उनके गुणों का हम अनुकरण कर सकें। 

मूर्ति में जो पत्थर देखेगा,  
कहाँ से वह ईश्वर देखेगा। 
मन जुड़े हरि से जिसका,   
कंकड़ में भी शंकर देखेगा। 

स्नान :  हिन्दू धर्म में स्नान का विशेष महत्व है। स्नान से जहाँ तन को स्वच्छता मिलती है, वहीं मन को पावनता भी मिलती है। स्नान से मन प्रसन्न रहता है। किसी भी पूजा या धार्मिक कार्य से पूर्व स्नान आवश्यक है। नित्य स्नान के अतिरिक्त कई शास्त्रोक्त स्नान भी हैं जिनकी विधि, प्रकार और स्थान हमारे ग्रंथों में वर्णित हैं।    

हिन्दुओं की पूजा में प्रयोग होने वाली वस्तुएं धार्मिक कार्यों में काम आने वाली वस्तुएं हैं अनेक प्रकार के फूल, फल, मेवा, अगरबत्ती, धूपबत्ती, दसांग, नया वस्त्र, सूत्र या कलावा, दूध, दही, घी, अक्षत, हल्दी, रोली, कुमकुम (सिंदूर), नैवेद्य (गुड़), शर्करा, दूर्वा, आम का पत्ता (पल्लव), तुलसी, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, वंदनवार, जौ, तिल, हवन सामग्री, दीप, रूई, आटा (पिसान), चन्दन, कलश, जल, दीप व बत्ती, कपूर, मिष्ठान, जल, जनेऊ, शहद, घंटी, आसन (चौकी), मूर्ति, नारियल, पंचामृत, गाय का गोबर, लकड़ी, अग्नि, गंगा-जल, धातु, मुद्रा, प्रसाद इत्यादि। 

पूजा में वाद्य : हिन्दू धर्म में वैदिक काल से ही चारों प्रकार के वाद्य : तार वाद्य, वायु वाद्य, धातु वाद्य और चमड़े के वाद्य प्रचलन में रहे हैं। हिन्दुओं के देवता भी विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते थे। शिव जी का डमरू (चमड़ा), कृष्ण की बांसुरी (वायु), सरस्वती की वीणा (तार), नारद का करताल (धातु) वाद्य था। मंदिरों में और पूजा पाठ के अवसर पर भी विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों का प्रयोग  होता है, जिनमें मुख्य हैं : घंटा, घंटी, शंख, डमरू, वीणा, बांसुरी, ढोल, नगाड़ा, झाल, मजीरा, मृदंग, करताल, चिमटा आदि। सामवेद को संगीत का सबसे पहला ग्रंथ माना जाता है। 

स्वास्तिक : ऋग्वेद में स्वास्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। मंगलकारी प्रतीक चिह्न स्वास्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिह्न अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले हिन्दू धर्म में स्वास्तिक का चिह्न बनाकर उसकी पूजा करने का महत्व है। स्वास्तिक शब्द को ‘सु’ और ‘अस्ति’ का मिश्रण योग माना जाता है, यानि शुभ हो । 

जिस प्रकार स्वास्तिक की चार भुजाओं का महत्व है, हिन्दू धर्म में इन चार का भी महत्व देखिये :
ब्रह्मा के चार मुख 
चार वेद : ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्वेद, सामवेद।  
चार युग : सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग। 
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्न्यास। 
चार प्रतिफल : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- जो जीवन के वांछित उद्देश्य हैं।
चार योग: ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग तथा राजयोग- ये चार योग आत्मा को ब्रह्म से जोड़ने के मार्ग हैं।  
चार धाम: बद्रीनाथ, रामेश्वरम्, जगन्नाथपुरी और द्वारका जो चारों दिशाओं में स्थित हैं। 
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। 

हिन्दुओं के धार्मिक संस्कार

संस्कार ही धर्म को महान बनाते हैं। संस्कारों का मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व है। हिन्दुओं के संस्कारों के अनुपालन से जीवन स्वतः ही बड़ा लगने लगता है। हिन्दू धर्म के संस्कार ही हैं जो हिन्दुओं को एक सूत्र में बांधे हुए है। समूचे भारत में, उत्तर हो या दक्षिण, पूरब  हो या पश्चिम; हिन्दू संस्कारों में समानता मिलती है। ये संस्कार हिन्दुओं को एक रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हिन्दुओं के संस्कार जन्म से भी पूर्व प्रारम्भ हो जाते हैं और जीवन के अंत होने के पश्चात् तक चलते हैं। हिन्दू संस्कार अनमोल जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं। ये संस्कार मनुष्य के जीवन के विभिन्न प्रसंगों को महत्वपूर्ण बना देते हैं, यहां तक कि मनुष्य की मृत्यु तक को महान बना देते हैं।

हर्ष पूर्वक जीने का, सर्वोत्तम आधार।
जीवन बड़ा बन जाता, अपनाकर  संस्कार।

मूलतः संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों से है, जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का योग्य सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके देह, मन और मस्तिष्क को पवित्र करने के लिए किए जाते हैं। इन संस्कारों के द्वारा ईश्वर से प्रार्थना, अर्चना की जाती है कि वह जीवन के उक्त पक्ष को सफल बनाये और जीवन सुखमय करे। संस्कारों के द्वारा मनुष्य, धर्म और मान्यताओं को सरलता से समझता है। हिंदू संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति में अभीष्ट गुणों को जन्म देना भी है।  

संस्कारों में संचित, जीवन की अद्भुत शक्ति।

संस्कारों से पाता, अभीष्ट गुणों को व्यक्ति।


हिन्दू धर्म में कुछ प्रचलित संस्कार निम्न हैं :

पुंसवन संस्कार : यह संस्कार गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास के लिए गर्भिणी का किया जाता है। यह लिए किया जाता है कि स्वस्थ और संस्कारवान् बालक का जन्म हो। 
जातकर्म संस्कार : जन्म के तुरन्त बाद ही जातकर्म संस्कार का विधान है, इन कर्मों में बच्चे को स्नान कराना, मुख आदि साफ़ करना, स्तनपान तथा आयुप्यकरण है। इसके बाद छठे दिन षष्ठी देवी के पूजन का भी विधान है। नामकरण संस्कारनामकरण शिशु के जन्म के दस दिन के बाद किसी शुभ मुहूर्त पर किया जाता है। अपनी पद्धति में उसके तत्त्व को भी नामकरण के साथ समाहित कर लिया गया है। 
अन्नप्राशन संस्कार : छः माह का होने पर बालक को दूध के अतिरिक्त अन्न देना प्रारम्भ किया जाता है, तो वह शुभारम्भ यज्ञीय वातावरण युक्त धर्मानुष्ठान के रूप में होता है। इसी प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है। 
कर्ण-वेध या कान छेदायी : कन्याओं के कान का छेदना भी हिन्दू धर्म का एक संस्कार है।  कन्यायें कानों में आभूषण धारण करके श्रृंगार करती हैं। कहीं कहीं बालकों के भी कान छेदे जाते हैं।  
मुंडन संस्कार: इस संस्कार में शिशु के सिर के बाल पहली बार उतारे जाते हैं। मुण्डन, बालक की आयु के एक वर्ष के भीतर अथवा दो वर्ष पूरा होने पर तीसरे वर्ष में कराया जाता है। 
उपनयन संस्कार : उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है और विद्यारंभ होता है। यह संस्कार जातिगत है, हिन्दू धर्म में ब्राह्मणों के लिए यज्ञोपवीत या जनेऊ धारण करना अनिवार्य है। ब्राह्मणों के अतिरिक्त कई अन्य जातियों में भी जनेऊ धारण करने की प्रथा है। 
विवाह संस्कार प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। युवक और युवती में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाने के बाद वैवाहिक सूत्र में बांध दिया जाता है, जो बड़े धूम धाम और एक विशेष संस्कार के अंतर्गत होता है। 
गृह प्रवेश :  किसी नए घर में प्रवेश करने के लिए उस घर का शुद्धिकरण और पूजा पाठ के द्वारा देवताओं के आमंत्रण की प्रथा है ताकि घर में प्रसन्नता और सम्पन्नता भी प्रवेश करे, तथा बनी रहे।  
वाणप्रस्थ  संस्कार : प्राचीन काल में पारिवारिक उत्तरदायित्व कम होने पर, घर को चलाने के लिए बच्चे समर्थ हो जाते थे तो वृद्धावस्था में पूर्ण रूप से धर्म के कार्यों में जुट जाते थे। एक अवस्था के पश्चात् कई लोग एक संस्कार के अंतर्गत, गुरु-मन्त्र लेकर तीर्थयात्रा आदि पर चले जाते थे। आजकल के वातावरण में साठ वर्ष की आयु होने पर सेवानवृत्त होने के पश्चात् धार्मिक और सामाजिक कार्यों में जुट जाते हैं। 

मृत्यु के पश्चात् भी कई संस्कार किये जाते हैं जैसे -
अंत्येष्टि संस्कार, हिन्दुओं के प्रमुख संस्कारों में से एक है। संस्कार का तात्पर्य हिन्दुओं द्वारा जीवन के विभिन्न चरणों में किये जानेवाले धार्मिक कर्मकाण्ड से है। यह हिंदू मान्यता के अनुसार सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है।
श्राद्ध संस्कार : श्राद्ध हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक सनातन वैदिक संस्कार हैं। जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं,जिनसे गुण व कौशल आदि हमें विरासत में मिलें हैं, उनका हमारे ऊपर भारी ऋण है। उन्होंने हमारे लिए, हमारे जन्म के पूर्व ही व्यवस्था कर दी थी। हमारे वे पूर्वज पूज्यनीय हैं, उन्हें हम श्राद्ध पक्ष में स्मरण कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

ये संस्कार, हिन्दू धर्म की एकता और अखंडता को बनाये रखने में विशेष भूमिका निभाते हैं। विस्तृत जानकारी के लिए संस्कारों से सम्बंधित कई पुस्तकें उपलब्ध हैं।

समय और जीवनशैली में परिवर्तन के साथ कई संस्कारों में भी परिवर्तन आया। कई संस्कारों की महत्ता और अधिक बढ़ गयी, तथा उन्हें धूम-धाम से मनाया जाना लगा; किन्तु उनकी धार्मिक अन्तर्भावना न्यूनतम हो गयी और दिखावा अत्यधिक; जैसे आजकल विवाह आदि में समाज को दिखाने के लिए खूब बढ़ चढ़ कर धन का व्यय किया जाता है। कई संस्कार तो लुप्त भी हो गए जैसे निष्क्रमण संस्कार (शिशु को बाहर निकलना), वेदारम्भ संस्कार, समावर्तन संस्कार (दीक्षांत समारोह जैसा) आदि। उपनयन संस्कार और वानप्रस्थ संस्कार भी अब अधिक महत्वपूर्ण नहीं रहे। समयाभाव और अन्य कठिनाईयों के कारण अंतिम संस्कार भी लघु करके ही किया जाता है। यह हिन्दू धर्म की महानता है या संस्कारों की स्वयं की महानता है कि अधिकतर संस्कार लाखों वर्ष से चले आ रहे हैं। इन संस्कारों में से कइयों का नाम और रूप बदलकर दूसरे धर्मों ने भी अपना लिया है। इनके अतिरिक्त कई पारिवारिक अथवा सामाजिक संस्कार भी हैं जिन्हें मनुष्य अपने परिवार या परिवेश से सीखता है। 

हिन्दू धर्म और मनोरंजन :

 

जीवन तभी सार्थक है, जब आनंदमय हो। आनंद के अभाव में जीवन बोझिल लगने लगता है। सबसे बड़ा आनंद है - परमेश्वर में डूब जाना। परमेश्वर की भांति परमानन्द भी एक अथाह सागर है, जिसकी प्राप्ति उस परमेश्वर तक पहुँचने पर ही होती है। उसकी कुछ बूंदें भी हाथ लगें तो हमें उस परमेश्वर का कृतज्ञ होना चाहिए। हमारे ऋषि, मुनियों और पूर्वजों ने ऐसा प्रबंध किया हुआ है कि उनके द्वारा स्थापित संस्कारों को निभाते हुए और कर्मों को करते हुए हमें जीवन-पर्यन्त आनंद की प्राप्ति होती रहे। हमारे वेद, पुराण, उपनिषद् ज्ञानवर्धक और रोचक कथाओं से भरे हुए हैं। इन कथाओं को पढ़कर ज्ञान प्राप्ति के साथ मन आनंद से भर जाता है। सुख दुःख का प्रमुख कारण मन ही है, यदि मन भक्ति भाव और ईश्वरीय विषयों में रंजित हो जाय तो कई प्रकार के पाप कर्मों से बच जाता है; जो उसे भटकने से और दुःखी होने से बचाये रखता है। 

 

इसके अतिरिक्त हमारे ऋषि, मुनियों और पूर्वजों ने हमें कई ऐसी धर्मिक परम्पराएं और साधन दिया; जो जीवन के आनंद प्रदान करने के साथ, धर्म को, उसके प्रचार प्रसार और अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। उपासना के अतिरिक्त आनंद प्रदान करने वाले कई अन्य साधन जो हमारे पूर्वजों ने हमें दिया है, उनमें से कुछ निम्न हैं:

 

धार्मिक अनुष्ठान उत्सव : अभीष्ट की प्राप्ति के उद्देश्य से नियमानुसार देवताओं की पूजा करना हिन्दू धर्म का सबसे महत्वपूर्ण विधान है। शास्त्र विहित व फल के निमित्त देवताओं की वो आराधना ही धार्मिक अनुष्ठान है। ये अनुष्ठान क्रमबद्ध नियम से किसी विशेष स्थान पर, विशेष विधि से, विशेष मन्त्रों के द्वारा किये जाते हैं। कई अनुष्ठानों की पूर्णता, सामूहिक भोज के साथ होती है। अनुष्ठानों के स्थल की सजावट, उनका आयोजन और समाहित विभिन्न क्रियाएं स्थल को पवित्र करने के साथ अनुष्ठानकर्ता और उसमें संलग्न लोगों के मन को आनंदित भी करती रहती हैं। इसी प्रकार व्रत, कथा, उपासना आदि कर्ता को कुछ विशेष करने की अनुभूति देते हैं, और मन को एक अद्वितीय संतुष्टि प्रदान करते हैं। 

 

पौराणिक कथाएं : हमारी पौराणिक कथाएं जहाँ नीतिगत शिक्षा का माध्यम हैं, वहीँ रोचकता से परिपूर्ण, मनोरंजन का उत्तम साधन भी हैं। इन कथाओं को पढ़कर या सुनकर, बड़े आनंद की अनुभूति होती है।कई धर्माचार्य और कथावाचक अपने आकर्षक शैली के कारण पौराणिक कथाएं सुनाकर, अनुयायियों को आकर्षित करते हैं और उन्हें कथा श्रवण हेतु बांधे रखते हैं।  

 

लीलाएं : प्रत्येक वर्ष श्रीरामलीला और श्रीकृष्णलीला आदि का मंचन होता है। इन अवसरों पर लोगों में उमंग देखते ही बनता है। इन लीलाओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि वे चरित्र निर्माण की शिक्षा के साथ, दर्शकों का भरपूर मनोरंजन भी करें। इन लीलाओं को देखने के लिए लोग भारी संख्या में एकत्र होते हैं। 

 

काव्य : धार्मिक साहित्य में काव्य का बड़ा महत्व है। बहुत से धार्मिक ग्रन्थ तो काव्यात्मक शैली में ही लिखे गए हैं, और कई ग्रंथों पर आधारित खण्डों में काव्य लिखे गए हैं। ये काव्य रचनाएँ अपने धार्मिक उद्देश्य को तो पूरा करती ही हैं, मन को आनंद देने का भी कार्य करती हैं। धर्म ग्रंथों की काव्यात्मक शैली में प्रस्तुति, पाठक और श्रोता दोनों की रूचि को बढाती है। तुलसी रामायण का संगीतमय पाठ श्रोताओं का मन मुग्ध कर देता है। इन काव्य रचनाओं के श्रव्य कैसेट भी निर्मित किये गए हैं, जिन्हें लोग अपने घरों में बड़े चाव से सुनते हैं और भाव विभोर होकर आनंद लेते हैं।

 

भजन कीर्तन : हिन्दुओं में भजन और कीर्तन का प्रचलन भी आदि काल से चला आ रहा है। किसी भी कार्य का सामूहिक रूप से करने पर उसका आनंद और अधिक बढ़ जाता है। भजन, ईश्वर के गुणों को गीत के रूप में सामूहिक रूप से गाना और कीर्तन, किसी ईश्वर के नाम या मन्त्र का सामूहिक और संगीतमय जाप है। भक्ति भाव से समूह में गायन और संगीत मन को आनंद से भर देता है। 

 

मेले :  त्यौहारों और अन्य अवसरों पर, कई बार धार्मिक मेलों का आयोजन होता है। ये मेले जहाँ मेल-मिलाप और व्यापार को बढ़ावा देते हैं, वहीँ सांस्कृतिक आदान प्रदान का भी एक उत्तम साधन हैं। अधिकतर मेले किसी त्यौहार या पर्व के अवसर पर लगते हैं। इन मेलों के द्वारा परम्पराओं के गतिमान रहने के अतिरिक्त भरपूर आनंद मिलता है। 

 

तीर्थ यात्रा : तीर्थ यात्रायें, पुण्य प्राप्ति का उत्तम साधन हैं। देश के विभिन्न भागों में स्थिति प्रमुख तीर्थ-स्थलों की तीर्थ-यात्राओं के द्वारा देशाटन भी हो जाता है। हिन्दू धर्म में चार धाम की तीर्थयात्रा को श्रेष्ठतम माना गया है। चूँकि ये चार धाम देश की चारों दिशाओं में स्थिति हैं, भक्तों को पूरे राष्ट्र के भ्रमण का अवसर मिल जाता है। इन तीर्थयात्राओं के द्वारा हमें देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों से मिलने का अवसर प्राप्त होता है और उनके रहन सहन के विषय में पता चलता है। अनुयायी, समूह में गाते बजाते तीर्थ यात्रा पर निकल जाते हैं और उनकी यात्रा की पूरी अवधि आनंदमय वातावरण में व्यतीत हो जाती है। 

 

प्रवचन : बहुत सी धार्मिक, नैतिक आदि गंभीर विषयों के बारे में अच्छी तथा विचारपूर्ण बातें, धर्म गुरुओं या विद्वानों द्वारा प्रवचन के रूप में कही जाती हैं। धर्माचार्य या धर्मगुरु के कहे वचन को हम प्रवचन  के रूप में ग्रहण करते हैं। प्रवचनों के द्वारा श्रोता धर्म के विषय में विचार और कथा आदि सुनकर ज्ञान प्राप्त करता है और उसे आनंद की अनुभूति भी होती है। प्रवचन का प्रचलन सभी धर्मों में है। 

 

गाथाएं : देवी-देवताओं की अनेक कथाएं गीत के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। लयबद्ध और संगीतबद्ध वो गाथाएं बहुत कर्णप्रिय होती हैं। उन गाथाओं को सुनने और गाने में अति आनंद की अनुभूति होती है। 

 

नृत्य नाटिका : हिन्दुओं में देवी, देवताओं ऋषि, मुनियों और कई महापुरुषों के जीवन चरित्र को नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत करने का भी प्रचलन है। अनेक धार्मिक उत्सवों में नृत्य-नाटिका के द्वारा धार्मिक प्रसंगों को प्रस्तुत किया जाता है जो धर्म अनुयायियों को आकर्षित करता है। इन नृत्य नाटिकाओं का उद्देश्य देवताओं व ऋषि-मुनियों के चरित्र के बारे में बताना, लोगों को नैतिक कर्तव्यों का बोध कराना और धर्म की संस्कृति और परम्पराओं का प्रसार करना होता है। इन नृत्य नाटिकाएं शिक्षा-परक होने के साथ मनोरंजक भी होती हैं।

 

सिनेमा : आधुनिक युग में सिनेमा मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन है। पौराणिक कथाओं पर आधारित कई फ़िल्में बनी हैं। इन फिल्मों के द्वारा उक्त नीतिपरक कथाएं आम जन तक सरलता से पहुँच जाती हैं। फिल्मों के द्वारा ईश्वर की चमत्कारी लीलाओं को भी सरलता से प्रस्तुत किया जा सकता है। फिल्मों के द्वारा प्रस्तुत ये लीलाएं दर्शकों को बहुत आकर्षित करती हैं।

 

पवित्र नदियों में स्नान : हिन्दू धर्म में, पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा है। स्नान के लिए घाट तक जाना, घाट व नदियों के प्रवाह का दृश्य, स्नान की क्रियाएं व नियम मन को आनंदित करने वाले होते हैं। नदी में स्नान के समय मन वहां के वातावरण में प्रफुल्लित हो जाता है।

 

संस्कारिक उत्सव : हिन्दुओं के विभिन्न संस्कार सामूहिक उपस्थिति में होते हैं। संस्कारों के आयोजन और उनकी विभिन्न क्रियाएं तथा परस्पर ठिठोली आनंदित भी करती रहती हैं।

 

परिधान व पहनावा : 

 

हमारे देवी-देवताओं का अलग अलग पहनावा और वेश-भूषा है। देवी-देवताओं के चित्र या मूर्तियों को हम भिन्न भिन्न प्रकार के पहनावा तथा सज्जा में देखते हैं। उन देवी देवताओं की वेश-भूषा और अस्त्र-शस्त्र देखकर ही हम उन्हें पहचान जाते हैं। राजा रामचंद्र धोती और जनेऊ पहने, कटि में कटिबंध, कन्धों पर अंगरखा, सिर पर मुकुट, गले वैजन्ती माला, धनुष और तुरीण धारण किये हुए, भुजदंड, कुण्डल और चूड़ा पहने शोभायमान होते हैं, तो भगवान् श्रीकृष्ण धनुष बाण के स्थान पर, चक्रसुदर्शन और बांसुरी धरे पृथक हो जाते हैं। इसी प्रकार हनुमान जांघिया और जनेऊ पहने और गदा धरे,  दुर्गा त्रिशूल धरे, लक्ष्मी कमल पर विराजमान, सरस्वती वीणा धरे।

 

हिन्दुओं में पूजा के अवसरों पर देवी देवताओं को वस्त्र इत्यादि चढ़ाकर पूजा अर्चना की परंपरा है। चूकि सब कुछ देने वाला ईश्वर ही है, इसलिए उसे नया वस्त्र चढ़ाया जाता है ताकि ईश्वर प्रसन्न हो और वस्त्र, आभूषण  आदि प्रचुर मात्रा में प्रदान करे।

 

वैसे तो लोगों का परिधान या पहनावा क्षेत्र, जलवायु, मौसम, परम्पराएं आदि पर निर्भर करता है। भारत में भिन्न-भिन्न क्षेत्र का अलग पहनावा है। क्षेत्र और अवसर के अनुसार, परिधान और वेश भूषा में बहुत भिन्नता है। उत्तर भारत का पुरुषों का परम्परागत पहनावा धोती-कुर्ता और अंगोछा है और स्त्रियों का साड़ी ब्लाउज या चोली। वैसे धोती और साड़ी पूरे भारत का ही परिधान है, किन्तु पहनने का ढंग क्षेत्र के अनुसार भिन्न है। दक्षिण भारत में लुंगी, कमीज और अंगवस्त्रम प्रचलित है। कई क्षेत्रों में स्त्रियों में घाघरा-चोली और चुनरी या सलवार-कुर्ती और दुपट्टा का भी प्रचलन है।  

 

अब परिधान का भी वैश्वीकरण हो चुका है। भारत में भी पहनावा में पाश्चात्य सभ्यता की झलक दिखती है। गांव हो या नगर, आजकल अधिकतर लोग कमीज-पैंट या टी शर्ट और पैंट पहने दिखाई देते हैं। लड़कियां भी जींस और टॉप्स पहने दिखती हैं। फैशन के कारण पारम्परिक पहनावे में बहुत परिवर्तन आ चुका है। फिर भी धार्मिक अनुष्ठान और संस्कारों में परंपरागत पहनावा को ही प्राथमिकता दी जाती है। विशेष अवसरों और मांगलिक कार्यों में अब भी धोती कुर्ता पहना जाता है। धार्मिक कार्यों में साफा, पगड़ी पहनने या सिर पर वस्त्र रखने की परंपरा है जिससे एक सम्मान और संस्कृति का बोध होता है। विवाह में दोनों पक्ष के लोग साफा बांधते हैं, जिससे उस अवसर की अलग पहचान होती है और समारोह की छवि बढ़ जाती है। कई स्थानों पर टोपी पहनने की परंपरा है, और उनकी अपनी अलग बनावट है जैसे हिमाचली टोपी, मणिपुरी टोपी, नेपाली टोपी आदि।

 

साधु, पुजारी व धर्मगुरुओं में गेरुआ वस्त्र पहनने की परम्परा है। पूजा या धार्मिक अनुष्ठान करवाने वाला व्यक्ति नवीन या स्वच्छ वस्त्र धारण करता है। नए वस्त्र उपलब्ध नहीं होने पर, धारण किये हुए वस्त्र को मन्त्रों द्वारा पवित्र किया जाता है। पूजा या अनुष्ठान में पीली अथवा हल्दी लगी श्वेत धोती पहनने का नियम है। अब रंगीन धोती भी पहनी जाने लगी है, किन्तु पूजा में काली व कोरी सफेद धोती पहनना वर्जित है।

 

खान पान, आहार: 

 

ज्ञातव्य है कि हिन्दू देवी, देवताओं के अतिरिक्त उन सभी जीव, यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुओं की भी आराधना करता है, जिन पर मनुष्य का जीवन निर्भर है। भोजन किसी भी जीव के जीने के लिए सबसे आवश्यक पदार्थ है। हिन्दुओं में भोजन आरम्भ करने से पहले ईश्वर को स्मरण किया जाता है और प्रभु की कृतज्ञता व्यक्त की जाती है कि उसने वह आहार प्रदान किया। भंडारा से पहले भगवान को भोग लगाया जाता है, उसके पश्चात् ही खाने के लिए परोसा जाता है। इसी प्रकार नई फसल आने पर अन्न की पूजा की जाती है, और सबसे पहले देवताओं को अर्पित किया जाता है। जिस क्षेत्र की जो प्रमुख फसल होती है, फसल तैयार होने पर उस अन्न से बने पकवानों के द्वारा ईश्वर की पूजा होती है। बुआई के समय भी कुछ विशेष पकवानों के द्वारा देवताओं की पूजा होती है, और किसान अधिक ऊपज के लिए प्रार्थना करता है।

 

हमारे विभिन्न देवताओं को भिन्न प्रकार के व्यंजन प्रिय हैं। धार्मिक अवसरों और पूजा आदि पर देवताओं को उनके प्रिय व्यंजन चढ़ाये जाते हैं। पूजा आदि में ईश्वर को आहार अर्पित करके प्रार्थना की जाती है कि वह हमें भी प्रचुर मात्रा में आहार देता रहे, और भोज्य पदार्थों का कभी भी किसी प्रकार का अभाव न रहे। भोजन को तीन भागों में बांटा गया है; सात्विक, राजषि और तामसी। सात्विक और राजषि भोजन ही मनुष्य के लिए उत्तम माना गया है। भोजन के पदार्थों और प्रथाओं की बहस में अब वैज्ञानिक और आर्थिक कारण भी सम्मिलित हो गए हैं।

 

जैसा होय मनुष्य का, रहन-सहन, आहार।

उसके अन्तः में उगें, विचार तदानुसार।

 

इसी प्रकार हिन्दू धर्म में जल के स्रोत, जैसे – कुंआ, जलाशय व नदियों आदि के पूजन का भी विधान है।

 

भोज भंडारा :

 

हिन्दुओं में धार्मिक उत्सवों और अनुष्ठानों के मध्य अथवा पश्चात् भोज की परंपरा है। उत्सव के उपरांत आमंत्रित लोग सामूहिक भोजन करते हैं। भोज उत्सव को विशेष बना देता है। भोज से पारस्परिक सौहार्द के साथ आनंद और जय की अनुभूति होती है। कई लोग पुण्य और प्रसिद्धि की आकांक्षा या सामाजिक उद्देश्य से भंडारा करते हैं। भंडारा में किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। भंडारा स्थल पर आने वाले हर व्यक्ति को प्रसाद स्वरुप भोजन प्रदान किया जाता है।

 

पूजा स्थल और तीर्थ यात्रा :   

कहने को तो ईश्वर हर स्थान पर विद्यमान है, किन्तु मन हर स्थान पर एकाग्र नहीं हो पाता। मंदिर एक ऐसा पावन स्थल है, जहाँ जाते ही मन और आत्मा शुद्ध हो जाते हैं। मंदिर में जाकर ईश्वर की उपासना अति उत्तम है, यद्यपि भक्त घर पर या अन्यत्र उचित स्थान देखकर, पूजा या अनुष्ठान कर लेते हैं। मंदिर तो सदैव ही पावन रहता है, किसी अन्य स्थान पर पूजा करने के लिए पहले उस स्थान को शुद्ध करना पड़ता है, जो जल छिड़ककर मन्त्रों के द्वारा होता है। कथा इत्यादि के लिए वेदी बनायी जाती है उसमें चौका पूर कर पूजा स्थल बना लिया जाता है। 

भारत में बहुत से भव्य और विशाल मंदिर हैं, जिनका दर्शन विशेष माना जाता है। भारत के चारों दिशाओं में चार धाम, उत्तर में बद्रीनाथ धाम, दक्षिण में रामेश्वरम, पश्चिम-द्वारकाधीश और पूर्व में जगन्नाथ पुरी हैं। इनके अतिरिक्त पूरे भारत में फैले १२ ज्योतिर्लिंग, राम जन्मभूमि, कृष्ण जन्मभूमि, शक्ति पीठ (जो भिन्न मतानुसार ५२ से १०८ हैं) और अनेक भव्य मंदिर हैं जिनके दर्शन लिए भक्त बड़े उन्माद और उत्साह से इन मंदिरों में जाते हैं। अलग अलग मंदिरों की अपनी अलग महत्ता है। इन मंदिरों के अतिरिक्त कुम्भ मेले, पवित्र नदियों में नहान आदि का भी आयोजन होता रहता है। भक्तगण अधिक से अधिक तीर्थ स्थलों पर जाना चाहते हैं । इस प्रकार पुण्य लाभ के अतिरिक्त भक्तों को देशाटन का भी लाभ मिल जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था का एक उद्देश्य सम्पूर्ण राष्ट्र को एकीकृत करना भी है। इन तीर्थ स्थानों पर कई बार तीर्थयात्री अव्यवस्था और पंडों द्वारा ठगी आदि का शिकार भी हो जाते हैं।

 

भारत में कुछ प्रमुख हिन्दू मंदिर हैं :

दक्षिण भारत : तिरुपति बालाजी मंदिर, श्री रंगनाथमस्वामी मंदिर, श्रीरंगम (तिरुचिरापल्ली), मीनाक्षी अम्मन मंदिर, पद्मनाभस्वामी मंदिर, नटराजा मंदिर, चिदंबरम (तमिल नाडु),  बृहदेश्वर मंदिर, चामुंडेश्वरी मंदिर (मैसूर), त्यागराजस्वामी मंदिर, अन्नामलाई मंदिर, श्रीकृष्ण मंदिर (गुरुवायुर), वीरभद्र मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर (कांची पुरम), श्रीपुरम स्वर्ण मंदिर (वेल्लोर) आदि।

उत्तर भारत : राम जन्म-भूमि (अयोध्या), हनुमान गढ़ी (अयोध्या), कृष्ण जन्म-भूमि, वैष्णो देवी, काशी विश्वनाथ (वाराणसी), खजुराहो, चित्रकूट, बिड़ला मंदिर (दिल्ली), कात्यायिनी मंदिर (दिल्ली), अक्षरधाम मंदिर (दिल्ली), काली घाट मंदिर (कोलकाता), बद्रीनाथ, केदारनाथ, मनसा देवी (हरिद्वार), इस्कान मंदिर, अमरनाथ (बर्फानी बाबा) आदि। इनके अतिरिक्त भी कई महत्वपूर्ण मंदिर हैं। 

 

भारत में लाखों की संख्या में छोटे-बड़े क्षेत्रीय मंदिर भी हैं। इन क्षेत्रीय मंदिरों के द्वारा, भक्तों को अपने निवास के समीप ही पूजा करने का अवसर, सरलता से मिल जाता है तथा इन मंदिरों के द्वारा लाखों पंडितों का उदर-पोषण भी होता है।

 

मंदिरों में मात्र देवताओं की मूर्ति का दर्शन ही हो पाता है। वहां भक्तों को धर्म के विषय में ज्ञान देने की कोई परंपरा नहीं है। किन्तु भक्ति भाव ही बहुत कुछ सिखा देता है। देवताओं की कथाएं पहले से सुन रखी होती हैं इसलिए इन देव-मूर्ति के दर्शन होते ही उक्त देवता की महिमा का स्मरण हो आता है और मन उस महिमा में रम जाता है। मूर्ति एक सूत्र के रूप में कार्य करती है। यहाँ सूत्र का अभिप्राय दोनों ही है एक तो मूर्ति का दर्शन भक्त को उक्त देवता से जोड़ता है और दूसरा विज्ञान में प्रयुक्त पदार्थों के सूत्र की भांति देवता की महिमा का संकेत या सूत्र।

 

त्यौहार, पर्व, उत्सव : 

 

हिन्दुओं में प्रमुख धार्मिक घटनाओं को त्यौहार के रूप में मनाने की प्रथा है। जैसे राम-नवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि, विजयादशमी, नवरात्रि, मकर-संक्रान्ति, होली, दीपावली, छठ, दुर्गा-पूजा, पोंगल, ओणम, गणेश चतुर्थी, बसंत पंचमी इत्यादि। ये सभी पर्व किसी न किसी रूप में हिन्दू देवी देवताओं से सम्बंधित हैं। कई त्यौहार, ऋतुओं के आगमन के स्वागत  में तथा फसल की कटाई के अवसर पर भी मनाये जाते हैं। ये त्यौहार, ईश्वर और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दर्शाने हेतु मनाये जाते हैं। त्यौहारों के अतिरक्त कई अन्य धार्मिक उत्सव जैसे किसी मंदिर का स्थापना दिवस, किसी मनौती के पूरा होने पर यज्ञ इत्यादि भी किये जाते हैं। कुछ ऐसे त्‍यौहार हैं जो पूरे भारत में मनाए जाते हैं और कुछ क्षेत्रीय आधार पर। त्यौहार राष्ट्रीय और सांप्रदायिक एकता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। पर्व, त्यौहार, उत्सवों, धर्मिक अनुष्ठानों के अवसर पर स्वच्छता और पावनता का विशेष ध्यान दिया जाता है, जिसके कारण रोग, व्याधि आदि की रोक-थाम हो जाती है। हिन्दुओं के सभी पर्व, प्रसन्नता और स्फूर्ति देने के साथ कुछ न कुछ सन्देश भी देते हैं; जैसे भक्ति, दान, सौहार्द, जागृति, हर्ष, संगठन, स्वच्छता, रचनात्मकता इत्यादि।  

 

खेल खिलौने :

 

हिन्दू धर्म और संस्कृति पर हमारे खेल खिलौनों का भी प्रभाव दिखता है। इन खिलौनों से बच्चों के मन में धर्म के विषय में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। तीर धनुष, गदा, मुकुट, बांसुरी, डमरू, खड्ग, मूर्तियां  आदि से जहाँ मेले व पर्वों में बच्चों के रुचि बढ़ जाती है वहीं श्रीराम, श्रीकृष्ण, हनुमान, शंकर, दुर्गा आदि देवी देवताओं के आदर्श उनके मन में आते हैं और उन आदर्शों के अनुकरण की प्रेरणा मिलती है। इन प्रकार के खिलौनों और कहानियों से, बच्चों के मन में बचपन से ही धर्म के प्रति आस्था उत्पन्न होती है।

 

 उपकरणों की पूजा :

हमारे कामगार या कारीगर जब नये उपकरण अथवा मशीन लाते हैं तो उसकी पूजा करते हैं। वे ही उपकरण उनके जीविकोपार्जन का साधन  हैं, जिनके प्रति सम्मान व कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए पूजा की जाती है और ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि वह निर्वाध रूप से कार्य में सहायक हो और उपासक को सम्पन्नता प्रदान करे। विश्वकर्मा जयंती के दिन लोग उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। विश्वकर्मा को विश्व का सबसे पहला इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है। इस दिन उद्योगों और फैक्ट्र‍ियों में मशीनों व उपकरणों की पूजा की जाती है। इसी प्रकार नए वाहन लाने पर, चाहे व्यावसायिक प्रयोग के लिए हो या निजी, उसकी भी पूजा की जाती है। 

 

प्रकृति :

हिन्दू धर्म में प्रकृति का विशेष महत्व है। प्रकृति ईश्वर की अनुपम रचना है और मनुष्य का जीवन, प्रकृति पर ही आश्रित है। हिन्दू धर्म में प्रकृति के विभिन्न अवयवों की पूजा, उपासना की पद्धति है, जिसके द्वारा उनके सम्मान और संरक्षण की प्रेरणा मिलती है। प्रकृति के संरक्षण से ही जीवन संभव है। यदि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति की संरक्षा नहीं की होती तो मानव जीवन कभी का समाप्त हो चुका होता। हम कई प्रकार के जंतुओं, वस्तुओं, पक्षियों और वनस्पतियों की पूजा करते हैं। वे सभी किसी न किसी रूप में हमारे जीवन के लिए सहायक हैं। प्रकृति की रक्षा से मनुष्य के मन में संवेदना उत्पन्न होती है। प्रकृति ईश्वर का ही प्रतिरूप है और इसका सम्मान और संरक्षण मनुष्य का धर्म। 

 

प्रकृति है वसुंधरा पर, ईश्वर का प्रतिरूप।

पालती वो जीवों को, वही मिटाती भूख।  

 

योग :

 

योग हिन्दू धर्म के छः दर्शनों में से एक है। योग हमें प्राकृतिक तत्वों से शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और प्रसन्न रहना सिखाता है, और साथ ही आध्यात्मिक उत्थान की ओर ले जाता है। योग जीवन के विभिन्न मार्ग दर्शाता है जिसके द्वारा मनुष्य की भौतिक व मानसिक क्षमताओं के अनुसार सर्वोच्च लक्ष्य आत्म-बोध की ओर ले जाता है। योग - शारीरिक, मानसिक आध्यात्मिक लाभ प्रदान करने के साथ दर्शन का एक माध्यम भी है। २१ जून को विश्व योग दिवस तो मनाया जाता है, किन्तु भारत में ही योग का लोप हो रहा है। चूकि योग हिन्दू दर्शनों में से एक है, इसलिए भारत में विद्यालयों में लागू करने पर अन्य धर्मों द्वारा विरोध होता है, जब कि यह सबके लिए उपयोगी है। यह भी एक षड्यंत्र ही है क्योंकि आजकल योग का स्थान पर जिम के द्वारा धन कमाया जा रहा है।

 

आयुर्वेद : 

 

जिस प्रकार वेदों ने मनुष्य को जीवन की पद्धति सिखाया उसी प्रकार रुग्ण होने पर चिकित्सा की पद्धति भी सिखाया और आयुर्वेद को प्रतिपादित किया। हमारे ऋषि-मुनियों ने आयुर्वेद पर निरंतर शोध किया और एक वृहत चिकित्सा पद्धति का विकास किया। आयुर्वेद का ज्ञान, वैसे तो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है, किन्तु यह हिन्दू धर्म-ग्रंथों की देन है, अतः हिन्दू धर्म की एक अनमोल धरोहर है। अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति आ जाने के पश्चात् आयुर्वेद पर कम ध्यान दिया गया और जितना विकास होना चाहिए था उतना नहीं हो पाया। कुछ भारतीय कम्पनियाँ ही आयुर्वेदिक औषधियों के विकास में लगी रहीं। सरकारों की ओर से आयुर्वेद के प्रति उदासीनता ही रखी गयी। आयुर्वेद की परिकल्पना रही है - सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। आयुर्वेद का लाभ प्रत्येक व्यक्ति को मिले ऐसे उपाय किये जाने चाहिए।

आत्मा : 

आत्मा अदृश्य है। मनुष्य द्वारा किये गए कार्यों व सुख दुःख का अनुभव आत्मा को ही होता है। आत्मा ही मनुष्य को प्राण देती है। आत्मा के शरीर छोड़ देने पर जीव, निर्जीव हो जाता है। जीव के कार्य उसके मन, विवेक और देह के द्वारा संपन्न होता है, जिसकी अनुभूति आत्मा को मिलती है। इसीलिए, मनुष्य आत्मा की संतुष्टि के लिए भांति भांति के कर्म करता है। 

हिन्दू धर्म में आत्मा की तीन गति बताई गयी हैं। एक - आत्मा, परमात्मा का एक अंश है; जिसे वह किसी शरीर में प्रवेश कराकर जीवन देता है और भौतिक कार्य कराता है। जीव की मृत्यु के पश्चात् आत्मा किसी अन्य नवीन देह को धारण कर लेती है। दूसरा - मृत्यु के पश्चात् आत्मा उसी ईश्वर में पुनः विलीन होकर मोक्ष को प्राप्त हो जाती है। तीसरा - आत्मा का न तो पुनर्जन्म होता है न ही वो मोक्ष को प्राप्त होती है, इस कारण भटकती रहती है। यह स्थिति बहुत भयानक और दुष्कर है। भटकती आत्मा की  शांति के लिए, हिन्दू धर्म में उपाय भी बताये गए हैं।  

हिन्दू धर्म में समाया, परम ब्रह्म का सत्व।  

ईश, आत्मा, मोक्ष के, सिखलाता है तत्व। 

 

भाषा :

 

संस्कृति और भाषा का सम्बन्ध अटूट है। संसार की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है; और इसे देवताओं की भाषा भी माना जाता है। हिन्दुओं के सभी प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में ही लिखे गए हैं। हमारे वेद, पुराण व आदिकवि महर्षि बाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास की रचनाएँ संस्कृत में ही हैं।  


संजोये हुए संस्कृति को, देवों की भाषा संस्कृत। 

सनातन धर्म-ग्रंथों में हैं, मानवता के नियम संचित। 

 

कालांतर में संस्कृत भाषा से हिंदी और कई अन्य भारतीय भाषाओँ ने जन्म लिया। भाषा ही संस्कृति की संवाहिका है और भाषा ही संस्कृति को वाचाल बनाती है। संस्कृत और उससे जन्मी हिंदी की लिपि देवनागरी है। संस्कृत में लिखे गए सभी धार्मिक ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद है और उनकी शाखाओं के रूप में हिंदी में भी अनेक ग्रन्थ लिखे गए। यही क्रम अन्य भारतीय भाषाओँ में भी हुआ। हिंदी भाषा, भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली, सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा और हिन्दू-धर्म के प्रसार प्रचार का सबसे सशक्त माध्यम बनी। स्वतंत्रता के पश्चात् हिंदी, जिसे राष्ट्र-भाषा होना चाहिए था; कुछ तत्वों के विरोध के कारण, केंद्र सरकार द्वारा राज-भाषा घोषित किया गया। 

सैकड़ों वर्षों से हिंदी पर निरंतर कुठाराघात होता रहा है। भारत पर मुस्लिम शासकों के आक्रमण और अंग्रेजों के शासन के कारण यहाँ उर्दू और अंग्रेजी की पैठ बढ़ती गयी। वैसे इस अवधि में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओँ के बहुत से ग्रन्थ लिखे गए। तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, संत तुकाराम, कबीर, रैदास, रहीम, बिहारी, केशवदास जैसे कवि पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में हुए। स्वतंत्रता के पश्चात् अंग्रेजी पढ़ने पढ़ाने का क्रम आरम्भ हुआ और अंग्रेजी विद्यालयों का बोलबाला रहा। अंग्रेजी पढ़ने का प्रमुख कारण रहा - सत्ता से निकटता बनाये रखना। अंग्रेजी भाषा के प्रसार के कारण पाश्चात्य सभ्यता पनपती रही और हिन्दू संस्कृति का ह्रास होता रहा। अब उर्दू भी देवनागरी लिपि पर आरूढ़ होकर चलने लगी है। बहुत से हिंदी शब्द उर्दू की ओर तो सरक गए हैं, किन्तु उर्दू के कई शब्द हमारे जीवन और संस्कृति में घुल मिल जाने के पश्चात् भी हिंदी के विद्वान हिंदी भाषा में आत्मसात नहीं कर पाए। हिंदी को दोनों ओर से ही हानि हो रही है। एक तो हिंदी के शब्द और संस्कृति लेकर कुछ अन्य भाषाएँ सशक्त हो रही हैं, वहीँ नए विषय जुड़ने के साथ और शताब्दियों तक अन्य भाषाओँ के कई शब्दों के निरंतर प्रयोग के पश्चात् भी हिंदी के आधिकारिक शब्द नहीं बन पाये। कितने ही वैज्ञानिक शब्द हैं जिनके समुचित हिंदी शब्द नहीं हैं।

 

हिंदी का विरोध, हिन्दुओं द्वारा भी होता है। क्षेत्रीय भाषाओँ की महत्ता को दर्शाने के लिए दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध किया जाता है। विश्व में अनेक देश हैं, जहाँ कई, अपितु सैकड़ों भाषा बोली जाती हैं; किन्तु उनकी प्रमुख या राष्ट्र भाषा एक ही होती है। किसी एक भाषा के सर्वव्यापी होने से एकता को बल मिलता है और राष्ट्र सुदृढ़ होता है।

 

हिन्दू राजाओं की भूमिका

 

सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा की गयी। ब्रह्मा के सत्रह मानस पुत्र और एक कन्या थी : मन से - मरीचि, इच्छा से - सनक, सनन्दन, सनातन, और सनतकुमार, नेत्र से - अत्रि, मुख  से - अंगिरस, कान से - पुलस्त्य, नाभि से - पुलह, हाथ से - कृतु, त्वचा से - भृगु, प्राण से - वशिष्ठ, अंगूठा से - दक्ष, छाया से - कर्दभ, गोद से - नारद,  शरीर से - स्वायम्भुव मनु और सतरूपा, ध्यान से - चित्रगुप्त। ये पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेन्द्रियों के प्रतीक थे। ब्रह्मा के १० प्रजापति, चार कुमार, १४ मनु और ११ रूद्र सहित कुल उनसठ पुत्र बताये जाते हैं। 

प्रजापत्य कल्प में ब्रह्मा ने स्वयंभु मनु और स्त्री-रूप में शतरूपा को प्रकट किया। इन दोनों ने दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद, तथा तीन पुत्रियां देवहूति, प्रसूति और आकूति नाम की संतानों को जन्म दिया। फिर आकूति का विवाह रुचि प्रजापति से, देवहूति का विवाह कर्दम और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से कर दिया। दक्ष ने प्रसूति से 24 कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से तेरह का विवाह धर्म से किया, उनके नाम हैं - श्रद्धा, लक्ष्मी, पुष्टि, धृति, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और कृति। ये सभी मानस स्थितियों की प्रतीक हैं। और अन्य कन्याओं में - भृगु से ख्याति का, शिव से सती का, मरीचि से सम्भूति का, अंगिरा से स्मृति का, पुलस्त्य से प्रीति का, पुलह से क्षमा का, कृति से सन्नति का, अत्रि से अनसूया का, वशिष्ट से ऊर्जा का, अग्नि से स्वाहा का तथा पितरों से स्वधा का विवाह किया। आगे आने वाली सृष्टि इन्हीं से विकसित हुई।

 श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र मरीचि का विवाह सम्भूति से हुआ जिनके पुत्र थे कश्यप, कश्यप के पुत्र विवस्वान और विवस्वान के पुत्र थे वैवस्वत मनु; यहीं से सूर्यवंश का आरम्भ हुआ। वैवस्वत मनु के छठे वंशज थे इक्ष्वाकु, जो एक महाप्रतापी राजा हुए; इसलिए सूर्यवंश को इक्ष्वाकु वंश भी कहा जाता है। कहा जाता है, जलप्रलय के बाद जब धरती जलमग्न हो गयी तो वैवस्वत मनु को भगवान विष्णु ने बचाया। वैवस्वत मनु और उनके कुल के लोगों ने फिर से धरती को बसाया। सतयुग में पृथ्वी पर देवताओं का राज था।

इक्ष्वाकु के वंशज मान्धाता के काल से त्रेता युग का आरम्भ हुआ। मान्धाता के वंशज सत्यवादी हरिश्चंद, सगर, दिलीप, भगीरथ, रघु, अज, दशरथ और राम आदि थे। पुराणों में इक्ष्वांकु के पीढ़ी दर पीढ़ी डेढ़ सौ वंशज शासकों का उल्लेख मिलता है। विकीपीडिया में उपलब्ध इक्ष्वाकु की वंशावली में भगवान राम का क्रम बासठवां था। भगवान राम को विष्णु भगवान का अवतार माना जाता है। 

ययाति के एक पुत्र पुरु के नाम से पुरुवंश का आरम्भ हुआ। पुरुवंश में आगे चलकर महाराजा दुष्यंत, भरत और कुरु हुए। दुष्यंत चंद्रवंशी राजा थे। कुरुवंश के वंशज महाराजा प्रतीप के पुत्र थे शांतनु, जहाँ से महाभारत की कथा का आरम्भ होता है। शांतनु के पुत्र थे चित्रांगद और चित्रांगद के पुत्र थे विचित्रवीर्य, जिनके पुत्र थे धृतराष्ट्र और पाण्डु। पाण्डु के पुत्र पांडव हुए और धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव।   द्वापरयुग में प्रमुखतः चन्द्रवंश, यदुवंश, पुरुवंश, कुरुवंश का साम्राज्य रहा। द्वापर युग लगभग ५००० वर्ष ईसा पूर्व से पहले का युग माना जाता है। कहते हैं १८ फरवरी ३१०२ ईसा पूर्व को भागवान श्रीकृष्ण स्वर्ग लोक चले गए और उसके पश्चात् कलियुग का आरम्भ हो गया। गुजरात के उस स्थान पर श्री भालका तीर्थ मंदिर स्थित है। द्वापर युग में विष्णु भगवान का अवतार श्रीकृष्ण के रूप में हुआ।  

सतयुग से द्वापर तक सनातन धर्म के अतिरिक्त, किसी अन्य धर्म का इतिहास नहीं मिलता। सतयुग और त्रेता में कई ऐसे राजा हुए जिनका सातों द्वीपों पर अधिपत्य था। पुराणों के अनुसार धरती पर स्थिति सात द्वीपों में से एक जम्बूद्वीप था जिसपर हिन्दुओं का अधिपत्य था। यह अफगानिस्तान के हिन्दुकुश पर्वतमाला से लेकर अरुणाचल की पर्वतमाला तथा हिमालय की चोटियों से लेकर कन्याकुमारी तक फैला था। द्वापर युग के पश्चात् अनेक प्रतापी राजा हुए, जो महायोद्धा होने के साथ हिन्दू धर्म के रक्षक थे। उन महान सम्राटों ने हिन्दू धर्म को आगे बढ़ाया। लगभग २५०० वर्ष ईसा पूर्व तक उपलब्ध इतिहास के अनुसार प्रमुख राजा या राजवंश इस प्रकार थे : 

कुछ राजवंशों के नाम - मगध राज वंश (२५०० वर्ष ईसा पूर्व), वृहद्रथ वंश (२००० ई० पू०), प्रद्योतवंश (६८२ ई० पू०), हर्यक वंश (५४४ ई० पू०), नन्द वंश (३४५ से ३२२ ई० पू० ), मौर्य वंश (३२२ से १८५ ई० पू०), शुंग वंश (१८५  से ७३ ई० पू०), कण्व वंश (७३ से २८ ईसा पूर्व), सातवाहन वंश (६० ईसा पूर्व से ईसवी २४०) दक्षिण भारत,  गुप्त वंश (ईसवी ३१९ से ४६७), पल्लव वंश (ई० ५७५ से ६००) दक्षिण भारत,  चोल वंश (ई० ८४९ से १०७०) दक्षिण भारत, चोल-चालुक्य वंश (ई० १०७० से १२७९) आदि।

कुछ राजाओं के नाम - चन्द्रगुप्त मौर्य (ईसा पूर्व ३२१ से २९७ ईसा पूर्व) जिनके गुरु चाणक्य थे,  बिन्दुसार (ईसा पूर्व २९७ से २७३), सम्राट अशोक (२६८ से २३२ ईसा पूर्व)  जो कलिंग युद्ध पश्चात् महात्मा बुद्ध की शरण  में चले गये,  समुद्रगुत (ई० ३५० से ३७५), चन्द्रगुप्त द्वितीय (ई० ३७५-४१२ ), स्कंदगुप्त (ई० ४५५ से ४६७), हर्षवर्धन (ई० ५९० से ६४७), राजराज चोल (ई० ९८५-१०१४)  राजा भोज (१०७६ से १०९९), राजेंद्र चोल (ई० १०१२-१०४४)  सम्राट विक्रमादित्य (ई० १०७६ से ११२६), राजा हरिहर (ई० १३५० से १५६५ तक), तथा पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, महाराजा रणजीत सिंह, कृष्णदेव राय इत्यादि।   

 

कलियुग में हिन्दू राजाओं ने कई प्रकार के आक्रमणों से हिन्दू-धर्म की रक्षा की। इन राजाओं ने बड़ी श्रद्धा पूर्वक हिन्दू धर्म  को आगे बढ़ाया। इन्होंने कई राजनितिक युद्ध लड़ने के साथ, हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिए भी युद्ध लड़ा। हिन्दू राजाओं ने अपनी बुद्धिमत्ता और वीरता का प्रदर्शन किया और अनेक आक्रमणों को विफल किया। उन राजाओं ने हिन्दू-धर्म और संस्कृति की रक्षा की तथा धर्म को आगे बढ़ाया। धर्म गुरुओं, पुरोहितों, ब्राह्मणों, साधुओं आदि का सम्मान किया और उन्हें विशेष स्थान दिया। हिन्दू राजा व शासक अनेक धार्मिक व सामाजिक कार्य करते रहे। प्रजा पालन का धर्म निभाने के साथ, समय समय पर यज्ञ और अनुष्ठान करवाए; देवालय, विद्यालय, चिकित्सालय, अनाथालय, जलाशय, ग्रंथालय, गोशाला आदि का निर्माण करवाया; मेले व धार्मिक उत्सवों का आयोजन किया, कवि व लेखकों को धार्मिक रचनाओं के लिए प्रोत्साहन दिया इत्यादि। राजाओं ने अनेक भव्य  मंदिरों का निर्माण  करवाया और उनके रख रखाव पर निरंतर ध्यान दिया। उनके द्वारा हजारों वर्ष पूर्व निर्मित भव्य मंदिर आज भी विद्यमान हैं जो हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थस्थल बने हुए हैं। यद्यपि इस युग में हिन्दू धर्म एक नहीं रह पाया और कई नए धर्मों ने जन्म लिया। पृथक विचारधाराओं और महत्वाकांक्षाओं के फलस्वरूप धर्म की शाखाएं पनपीं और अलग धर्म बनते गए। प्रत्येक धर्म भी भी दो-दो पंथ बने। संभव है, भविष्य में और भी नए धर्म बनें। कई पंथों द्वारा ऐसे असफल प्रयास किये जा चुके हैं।

चौदहवीं शताब्दी से अरब, तुर्क, ईरानी और मुगलों का भारत में प्रवेश होने लगा और सोलहवीं शताब्दी तक मुग़लों का वृहत सम्राज्य हो गया। इस अवधि में भारत को खूब लूटा गया तथा हिन्दू-धर्म को निर्बल करने के लिए भरसक प्रयास किये गए। हिन्दुओं से बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन तक करवाया गया। हिन्दू धर्म ने कभी अपने प्रसार के लिए काम नहीं किया, वह बस लंबवत पीढ़ी दर पीढ़ी धर्म का हस्तांतरण करता रहा। सतरहवीं शताब्दी में ईस्ट इन्डिया कंपनी ने पांव पसार लिया, और धीरे धीरे पूरे भारत पर अंग्रेजों ने अधिपत्य जमा लिया। अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलमानों को आपस में लड़वाया और राज किया। अंग्रेजों के शासन काल में हिन्दुओं के गौरवशाली इतिहास को भी तोड़ा मरोड़ा गया। अंग्रेजों की कुटिल चाल के कारण धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना। स्वतंत्रता से पहले कई सौ वर्ष तक हिन्दुओं को अत्याचार सहन करना पड़ा। स्वतन्त्र भारत में भी धर्म-निरपेक्षता की आड़ में हिन्दू अनुयायियों को सांप्रदायिक कहा जाता रहा।     





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