ज्ञान-चक्र का सतत संवेग, ग्रंथों के अमरत्व में।
पापों से किसी को डर नहीं रहा।
छीन झपट, सब चाहते घर भरना,
हड़पने के होड़ में सबर नहीं रहा।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी भी नहीं करना, क्योंकि यदि धर्म मर गया तो हमको भी मार डालेगा।
इस लघु-ग्रन्थ की यात्रा का श्रीगणेश, ऋग्वेद के प्रथम मंडल, प्रथम सूक्तम में दिए हुए ईश्वर की स्तुति के अपने इस हिंदी रूपांतर से करता हूँ:
हे परमेश्वर ! मेरे परमेश्वर !
इस संसार को रचने वाले,
सभी पदार्थों के देने वाले,
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड धरने वाले,
सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व विधाता,
कुछ भी न था, तब तू ही तू था,
समस्त ब्रह्माण्ड तेरी संपत्ति,
सर्वोच्च, सृष्टि में तू ही दाता,
हे परमेश्वर! कृपा हो मुझ पर।
सबको शरण में लेने वाले,
वेदों का ज्ञान देने वाले,
सत्यस्वरूप अद्भुत यश वाले,
स्वयं में सब समा लेने वाले,
सत्पदार्थों में होता जो स्थित,
सब प्रकार के दोषों से रहित,
जिसका भजन सुखकर है नित,
हे परमेश्वर! पाप, विघ्न हर।
सभी ऋतुओं को तू ही धरता,
सर्वसुख व ऐश्वर्य से भरता,
अपने आप स्वयं तू पलता,
सर्वस्वादनशील, जग का पालक;
अंतरिक्ष, ब्रमांड, जगत में व्यापक;
अंग-अंग, तू प्राणों के भीतर;
व्यवस्था, कर्मफल का रक्षक
स्थित तू, सदैव परमपद पर;
सर्वसुखदाता, कष्ट निवारक;
कीर्तिजानक, विघ्नों के हर्ता,
ऋषि, मुनि, देव सब तेरे उपासक;
हे परमेश्वर! तार भवसागर।
हे ज्ञानवान! वायु समान!
ज्ञानियों को देने वाले ज्ञान;
ज्ञान दृष्टि से देखने योग्य,
सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान;
उत्तम पदार्थों से सब शुभ कर,
बल, बुद्धि, भक्ति, ज्ञान से भर,
सफल, सुरक्षित कर, दुःख हर,
हे परमेश्वर! हो सदैव श्रेयष्कर।
हे परमेश्वर ! मेरे परमेश्वर!
अर्थात 'ॐकार' जिसका मूल मंत्र है, पुनर्जन्म
में जिसकी दृढ़ आस्था है, जो गोभक्त है (गौ की सेवा और रक्षा करता है), भारत का गुरु
अथवा श्रेष्ठ है (यानि भारत उसकी बताई राह पर चलता है), तथा हिंसा की जो निंदा
करता है, वह हिन्दू धर्म है। हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा प्रियता है।
हिन्दू-धर्म
करवाता, स्वयं से पहचान।
आत्मदर्शन से मिले, साक्षात् भगवान।
यह देखकर बड़ी बहुत विक्षुब्धि होती है कि कुछ द्वेषी लोग हिंदू-धर्म के पावनतम सरोवर में खर-पतवार फेंककर उसे मलिन करने से भी परहेज नहीं करते। बहुत से लोगों ने धर्म को व्यापार बना लिया है। कई स्वार्थी तत्व पाखंड, मिथ्या और आडम्बर का सहारा लेकर ढोंग और अन्धविश्वास परोसते हैं। आज के वैज्ञानिक युग में भी ऐसे ढोंग करने वालों का बोलबाला है। यहाँ तक कि झूठे प्रचार के द्वारा अनुयायियों को टेलीविजन पर भी पाखंड परोसा जाता है। धन कमाने के लिए जादू, टोना, ढोंग, रूढ़िवादिता आदि का अवलंब लिया जाता है। इन सभी प्रवृत्तियों से धार्मिक आस्था और श्रद्धा का धूमिल होना स्वभाविक है। धर्म के प्रति आस्था में कमी होने से समाज में अपराधों की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
राम, कृष्ण की जन्म भूमि, शिवशंकर का वास।
मद्धम
हुआ प्रभाव अब, दिखता नहीं प्रकाश।
रावण, कंस के वंशज दिखते, यत्र, तत्र, सर्वत्र;
किसका ये अभिशाप; हुआ पावनता का नाश।
समय समय पर, हिन्दू धर्म में पनपी बहुत सी कुरीतियों का निराकरण होता रहा है, यद्यपि धर्म को निर्बल करने वाले कई कारक अभी भी विद्यमान हैं; जैसे पाखंड, अन्धविश्वास, वर्ण व्यवस्था, रूढ़िवादी परम्पराएं, शिक्षा का अभाव, संगठनात्मक निर्बलता, राजीनीति, संवैधानिक असमानता, अंग्रेजी शिक्षा, अन्य धर्मों का आक्रमण इत्यादि। समय समय पर पनपी कुरीतियों को भी धर्म का अंग माना जाने लगा और सम्पूर्ण हिन्दू-धर्म को कलंकित करने का प्रयास किया जाने लगा। जब सृष्टि उत्पन्न हुई तब ये सामाजिक विकार नहीं थे, जब समाज बढ़ा तो साथ ही बुराईयां भी पनपती गयीं। समय समय पर इनमें सुधार भी होते रहे। स्वार्थी और राजनीति प्रेरित तत्वों ने हिन्दू धर्म को मलिन करने का भरपूर प्रयास किया। हमारी पौराणिक कथाएं सीख देने के लिए और चरित्र निर्माण के उद्देश्य से लिखी गयी हैं। समय के अनुसार उनके चरित्र अप्रासंगिक लग सकते हैं, किन्तु उन कथाओं में समाये तत्व हर काल के लिए सत्य हैं। आज सुचारु रूप से मिलती रोटी ने हिन्दुओं के भी मति को भ्रमित कर रखा है; कई बार कुछ लोग इस बात से अनभिज्ञ हो जाते हैं कि लाखों वर्ष से चली आ रही संस्कृति को यहाँ तक लाने के लिए हमारे पूर्वजों ने कितना त्याग किया होगा, और हम जो जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उनके त्याग और मार्गदर्शन का ही परिणाम है।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है :
अवगुन
सिंधु मंदमति कामी। वेद विदूषक परधन स्वामी।
बिप्र
द्रोह पर द्रोह बिशेषा। दम्भ कपट जियै धरैं सुबेषा।
(अर्थात
वे अवगुणों के समुद्र, मंदबुद्धि, कामी, वेदों के निंदक और बलपूर्वक पराये धन के
स्वामी होते हैं। दूसरों से द्रोह तो करते ही हैं, परन्तु ब्राह्मण द्रोह विशेषता
से करते हैं। उनके हृदय में दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे सुन्दर वेश
धारण किये रहते हैं।)
हर जीव का रखता मरम है,
मेरा पावन हिन्दू धरम है।
ब्रह्मा, विष्णु अरु शिव यहाँ हैं।
मानवी गुणों की नींव यहाँ है।
सत्य का है प्रतीक धर्म ये,
प्रभु को प्रिय हर जीव यहाँ है।
वैदिक धर्म, पावन परम है।
ईश्वर की भक्ति और श्रद्धा,
ईश्वर का विनम्र यह वंदन।
वेदों का ज्ञान, सिद्धांत यहाँ,
हिन्दू धर्म को निर्बल और आशक्त करने के लिए जहाँ कई प्रकार के आक्रमण होते आये हैं, जिसमें बाह्य शक्तियों के अतिरिक्त कई आतंरिक स्वार्थी तत्व भी उत्तरदायी हैं। धर्म को निर्बल और रुग्ण करने वाले घटकों को पहचानने की आवश्यकता है, ताकि समय रहते उनको रोका जा सके। वैसे हिन्दू-धर्म एक अत्यंत विशाल महासागर है, जिसका जल कभी समाप्त नहीं होने वाला है; किन्तु उस महासागर में रहने वाले कुछ जीवों का पलायन होने लगेगा तो उसका महत्त्व घट जायेगा। जिस सनातन-धर्म को हमारे पूर्वज, अथक प्रयास करके यहाँ तक लाये हैं, उसे बिखरने रोकने का प्रत्येक हिन्दू का परम कर्तव्य है। उन्हें अपने धर्म के सशक्तिकरण हेतु अपना भरपूर योगदान देना चाहिए। इस सन्दर्भ में निम्न कुछ बिंदुओं पर विचार की आवश्यकता है :
२. अत्याधिक उदारता (विस्तृत चर्चा 'हिन्दू धर्म की उदारता और बिखराव' शीर्षक के अंतर्गत) ।
३. ढोंगियों, पाखंडियों और स्वार्थी तत्वों द्वारा लायी गयीं अनेक कुरीतियां, कुप्रथाएं, ढोंग, पाखंड, अंधविश्वास, टोना-टोटका इत्यादि।
३. ढोंगियों, पाखंडियों और स्वार्थी तत्वों द्वारा लायी गयीं अनेक कुरीतियां, कुप्रथाएं, ढोंग, पाखंड, अंधविश्वास, टोना-टोटका इत्यादि।
४. वैचारिक युद्ध : कई अन्य धर्मों द्वारा हिन्दू धर्म को अपना प्रतिद्वंदी समझना और हिन्दू धर्म पर कुठाराघात करते रहना। ( विस्तार 'अन्य धर्म' शीर्षक के अंतर्गत ) ।
७. संविधान और विधि : (विस्तृत चर्चा 'हिन्दू धर्म और कानून' शीर्षक के अंतर्गत)।
१३. धार्मिक कार्यक्रम व्यक्तिगत उद्देश्यों को ध्यान में रखकर, जैसे नाम और प्रतिष्ठा के लिए किया जाना। इन कार्यक्रमों का लाभ सम्पूर्ण हिन्दू समाज को नहीं मिल पाना। ('भोज भंडारा' शीर्षक भी देखें) ।
१७. इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया। (विस्तृत चर्चा 'सोसिअल मीडिया' शीर्षक के अंतर्गत) ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम॥
(1) धृति : धृति (धैर्य ) अथवा कठिनाइयों से न घबराना।
(2) क्षमा : शक्ति होते हुए भी दूसरों को अपराधों को भुला देना करना या अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना।
(3) दम : मन को वश में करना हमेशा और संयम से धर्म में लगे रहना ।
(4) अस्तेय : चोरी न करना। मन, वचन और कर्म से किसी भी परपदार्थ या धन का लोभ न करना ।
(5) शौच : तन, मन एवं बुद्धि को पवित्र रखना।
(6) इंद्रिय-निग्रह : इंद्रियों को अपने वश में रखना और वासनाओं से बचना।
(7) धी : सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना और अच्छी बुद्धि धारण करना तथा प्रत्येक कर्म को सोच-विचारकर करना।
(8) विद्या : सत्य व धर्म का ज्ञान ग्रहण करना।
(9) सत्य : सदा सत्य का आचरण करना।
(10) अक्रोध : क्रोध को त्याग कर, शांत बने रहना।
मनु के अनुसार इन दस नियमों का पालन करना धर्म है। यही धर्म के दस लक्षण है। किसी भी व्यक्ति में यदि ये गुण या लक्षण हैं तो वह धार्मिक है। ईश्वर ने अन्य जीवों को कुछ स्वाभाविक ज्ञान दिया है, जिससे उनका जीवन चल सके। उनको कुछ सिखाना या बताना नहीं पड़ता। पशु स्वतः ही चलना, खाना, तैरना आदि सीख जाता है जबकि मनुष्य को ये क्रियाएं सिखानी पड़ती हैं उसे बिना सिखाये न चलना आता है, न बोलना, न तैरना और न ही खाना आदि। ईश्वर ने मनुष्य को विवेक और बुद्धि दी है जिसके कारण उसका धर्म स्वभाविक क्रियाओं से ऊपर मानवता के गुण धारण करना भी है। मनु के अनुसार, धर्म के वे दस गुण हैं, जो मनुस्मृति में उल्लिखित हैं।
- सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है, शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है॥अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है॥सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिए जीतने को कहीं शत्रु ही नहीं है॥
- वास्तव में धर्म श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों, उत्तम कर्तव्यों की समष्टि का नाम है। मानव मात्र की शारीरिक, मानसिक, आत्मिक प्रगति के जो विधि विधान एवं आदेश, उपदेश एवं कर्तव्य हैं वे सब धर्म के अन्तर्गत आते हैं। समय व स्थान के अनुसार धर्म का रूप परिवर्तित हो जाता है। माता, पिता, भाई, पुत्र, गुरु, विद्यार्थी, शिक्षक, नृप, नागरिक के प्रति धर्म कर्तव्यपरक होता है। अहिंसा, सत्य, दया, शिष्टाचार, आचरणपरक धर्म है। जब अपराधी को दण्ड देने की बात कहें तो न्याय धर्म है। जब कहा जाय शौच, संतोष और तप धर्म है तो अध्यात्मपरक धर्म है। इसी प्रकार स्वाध्याय, ईश्वर की उपासना, योग, यज्ञ, प्रार्थना आदि साधनापरक धर्म है। व्यक्ति के अपने जीवन के मूल्यों अथवा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये निर्धारित धर्म, व्यक्तिगत धर्म होता है। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों में ये सब कर्तव्य, बड़े ही सुन्दर ढंग से समाहित हैं। हिन्दू धर्म में वैयक्तिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कर्तव्यों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इन्हीं बातों को मैंने इन पंक्तियों में कहने का प्रयास किया है :
- धर्म तो आचरणपरक है;
- मानव मूल्यों का कनक है;
- नियमों से है ये बंधा हुआ,
- धर्म तो जीवन की सड़क है।
- धर्म, जीवन का दर्शन है;
- सम्यक ज्ञान व चिंतन है;
- परमात्मा की गवेषणा में,
- धर्म, आत्मा का मंथन है।
- मानवता की साधना में है,
- धर्म संयम-अनुपालना में है;
- धर्म, परहित में समाहित,
- ईश्वर की उपासना में है।
- नहीं टीका, ना छत्रों में है;
- धर्म, न रंगीन वस्त्रों में है;
- ना ही किसी आडम्बर में ये,
- धर्म तो वेद-मन्त्रों में है।
- धर्म, पाप के वारण में है;
- नैतिकता के धारण में है;
- सत्पुरुषों के आचरण में,
- धर्म, सत्य के कारण में है।
- धर्म सुखों का आधार है;
- धर्म श्रेष्ठतम व्यवहार है;
- परमात्मा की ओर उन्मुख,
- धर्म ही जीवन का सार है।
- वेदों के अभिमन्त्रण में है;
- ईश्वर के आमंत्रण में है;
- धर्म है मानवता की धुरी,
- धर्म आत्मनियंत्रण में है।
हिन्दू धर्म और ईश्वर
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥
इन्द्रियों को वश करके, प्रभु को पाता भक्त।
एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।।
मंदिर जाते इसलिए, मन हेरे हर कोय ।
ॐ भूर्भवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
भावार्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाए रखे।
हिन्दू धर्म और कर्म
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
सार्थक करो प्रयास व, प्रभु में हो विश्वास।
चलकर निश्चित आयगी, स्वयं सफलता पास।
कर्म करो ऐसे सदा, जिसमें ना हो पाप।
भगवान स्वयं को भी धर्म-युक्त कर्म से मुक्त नहीं किया है। गीता के इस श्लोक में कहा है -
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
हिन्दुओं के देवी-देवता
वर्णों पर
है टिका, भाषाओँ का संसार।
सब धर्मों का वेद ही, उद्भव का आधार।
- शिक्षा - इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है।
- कल्प - वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी चार शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र, और शुल्बसूत्र।
- व्याकरण - इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है।
- निरूक्त - वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है।
- ज्योतिष - इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से अभिप्राय `वेदांग ज्योतिष´ से है।
- छन्द - वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है।
- छः शास्त्र या हिन्दू धर्म के दर्शन -
श्री रामचरितमानस :
महाभारत:
महाभारत हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रन्थ ग्रन्थ है। यह काव्यग्रंथ भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रन्थ है। महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित यह विश्व का सबसे लम्बा ग्रन्थ है। यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है। महाभारत की रोचक कथाएं नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण हैं। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रन्थ भगवतगीता भी सन्निहित है। पूरे महाभारत में लगभग १,१०,००० श्लोक हैं। वेदव्यास जी ने अपने इस अनुपम काव्य में वेदों वेदांगों और उपनिषदों के गुह्यतम रहस्यों का निरुपण किया हैं। टीवी धारावाहिक महाभारत बहुत ही रोचक और लोकप्रिय है।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया वह श्रीमद्भगवतगीता के नाम से प्रसिद्ध है। महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित गीता में वेदों और उपनिषदों का सार है। भागवतगीता में एकेश्वरवाद, कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्ति योग को बहुत सुन्दर ढंग से बताया गया है।
हिन्दुओं का एक धार्मिक ग्रन्थ है जिसमें देवी दुर्गा की महिषासुर नामक राक्षस के ऊपर विजय की कथा का वर्णन है। यह मार्कण्डेय पुराण का अंश है। इसमें ७०० श्लोक होने के कारण इसे 'दुर्गा सप्तशती' कहते हैं। यह देवी माहात्म्य है जिसका नवरात्री के दिनों में पाठ किया जाता है।
उपरोक्त ग्रंथों के अतिरिक्त हिन्दू धर्म में अनेक व्रत कथाओं की पुस्तकें हैं, जैसे सत्यनारायण व्रत कथा, लक्ष्मी व्रत कथा, वैष्णोदेवी व्रत कथा, षष्ठी देवी व्रत कथा, संतोषी माँ व्रत कथा, हरितालिका तीज व्रत कथा, करवाचौथ व्रत कथा, सोमवार, मंगलवार, बुद्धवार, वृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार व्रतकथा इत्यादि और हनुमान चालीसा के पश्चात् कई अन्य देवी देवताओं के चालीसा भी आये जैसे दुर्गा चालीसा, शिव चालीसा, लक्ष्मी चालीसा, गणेश चालीसा, श्रीकृष्ण चालीसा, शनि चालीसा, सरस्वती चालीसा, सूर्य चालीसा, काली चालीसा आदि। और इनके अतिरिक्त आरती संग्रह, ज्योतिष तथा पूजा पाठ विधि की अनेक पुस्तकें भी हैं। इतने अधिक धार्मिक ग्रंथों का किसी के लिए अध्ययन करना बहुत कठिन है। अध्ययन करने के अतिरिक्त इनके गूढ़ रहस्यों को समझना तो केवल दक्ष विद्वानों के ही वश की बात है। इसीलिए यह इन धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन का कार्य ब्राह्मणों पर छोड़ दिया गया ताकि वे अध्ययन करके इनके रहस्यों को आम जन तक पहुचायें। इन ग्रंथों के आधार पर ही हजारों प्रवचनकारी अपने अपने व्याख्यान देते आ रहे हैं।
पूजा ईश्वर या देवता
को प्रसन्न करने, उसका
गुणगान करने और उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की विधि है, जो मनुष्य
के दैनिक जीवन का
एक महत्वपूर्ण कार्य है। पूजा, उपासना या आराधना के द्वारा
हम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और अपने आचरण के
द्वारा उसे प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं ताकि वह हमें सुख-संपन्न
और प्रसन्न रखे। ईश्वर या देवता के प्रसन्न होने पर वरदान की
प्राप्ति होती है और अप्रसन्न होने पर अभिशाप की। पूजा के द्वारा हम मन तथा आत्मा को शुद्ध
और पवित्र करने का प्रयत्न करते हैं। जिस प्रकार व्यायाम व अभ्यास से हम
अंगों को पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार पूजा या उपासना से आत्मा व मन को सम्पुष्ट
करते है। अपनी सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार संक्षिप्त या सविस्तार पूजा
की जाती है। हिन्दुओं में प्रायः देवताओं की मूर्ति या
चित्र बनाकर पूजा की प्रथा है किन्तु निराकार रूप में ध्यान करके
भी पूजा की जाती है। वैसे मुख्य रूप से पूजा; साधना, उपासना और आराधना
के द्वारा ही की जाती है; किन्तु हिन्दू-धर्म में प्रचलित पूजा पद्धति, कई
दर्जन हैं। साधना का अर्थ है, लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला
कार्य। हिन्दू-धर्म में यह एक आध्यात्मिक क्रिया है, अतः
यह परमात्मा की प्राप्ति का साधन-विशेष है। सिद्धि-प्राप्त के
लिए पूजा, योग, ध्यान, जप, तप, व्रत आदि को करना ही साधना है।
उपासना का अर्थ है - ईश्वर के सम्मुख उपस्थित, समर्पण और नमन।
तथा आराधना का अर्थ है - मन को एकाग्र करके ईश्वर की ओर उन्मुख करना
यानि अपने ईश के स्वरुप, गुण, महिमा आदि का निरंतर स्मरण करना और जप,
मनन, भजन, कीर्तन या पूजन के द्वारा कृपा प्राप्त करने का यत्न करना। पूजा की
विभिन्न क्रियाओं के द्वारा मनुष्य, उस अवधि में अपना मन और ध्यान ईश्वर में
लगाए रहता है।
पूजा की मुख्य अवधारणा है - ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भक्ति। पूजा से मन शुद्ध और स्थल पावन हो जाता है। श्रीमद्भगवतगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है - जो लोग मुझमें अपने मन को एकाग्र करके निरंतर मेरी पूजा और भक्ति करते हैं तथा खुद को मुझे समर्पित कर देते हैं, वे मेरे परम भक्त होते हैं। लेकिन जो लोग मन-बुद्धि से परे सर्वव्यापी, निराकार की आराधना करते हैं, वे भी मुझे प्राप्त कर लेते हैं। परम भक्त तो ईश्वर की साधना करता है, जो एक कठिन कार्य है, किन्तु साधारण भक्त अपनी सुविधा के अनुसार एक बार में निम्नोक्त में से किसी एक या एक से अधिक पद्धति के द्वारा पूजा या उपासना कर लेता है। हिन्दू-धर्म एक अनंत वाटिका है और इसकी विभिन्न क्रियाएं रंग बिरंगे पुष्प। पुष्प कोई हो, रंग या गंध कोई हो, पुष्प तो पुष्प ही है तथा पुष्प का अनुपम धर्म है सुगंध और छटा बिखेरना। पूजा स्थल जब सुसज्जित हो जाता है तो अपनी रमणीयता और पावनता से सभी के मन को आकर्षित कर लेता है तथा एक अनुपम और दिव्य वातावरण की अनुभूति कराता है।
हिन्दू-धर्म अनंत वाटिका, रंग विरंगे फूल खिले।
छटायुक्त वातावरण
में, विचरक को हरि मिले।
विविध पूजा पद्धति :
हिन्दू धर्म में जहाँ देवताओं की बहुलता है, वहीं पूजा-पद्धति भी विविधताओं से भरी हुई है। हिन्दुओं में कहावत है : जैसा देवता - वैसा अक्षत; यानि अलग-अलग देवताओं की उपासना की विधि भी भिन्न है। हिन्दुओं के पृथक वर्गों में पूजा अथवा उपासना की पद्धति देवता, समय, सामर्थ्य, सुविधा, स्थान, मान्यताएं आदि के अनुसार भिन्न हैं। हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति की विविधता से हमें लगता है कि यह बिखरा हुआ है, किन्तु यह धर्म के सौंदर्य को चरम पर पहुंचाता है। कोई भी वस्तु, जीव या क्रिया नहीं है, जिसका हिन्दू धर्म में उचित महत्व व सम्मान नहीं हो। क्रियाएं भी चाहे वो व्यक्तिगत हों, सामाजिक या धार्मिक हों; सभी का महत्व हमारे ग्रंथों में वर्णित है। सभी हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ एक ही हैं, प्रमुख देवी देवता एक हैं, धार्मिक क्रियाएं जैसे पूजा, उपासना, आराधना, साधना, प्रार्थना, अनुष्ठान, ध्यान, स्नान, भजन, मनन, स्मरण, कीर्तन, पाठ, जप, तप, व्रत, दान, तीर्थ इत्यादि भी एक हैं। किन्तु कई बार पूजा की पद्धति में भिन्नता दिखती है। पूजा की इस विविधता से लोगों में स्वतंत्रता की अनुभूति होती है। पूजा या उपासना की विधि चाहे कोई भी हो किन्तु उद्देश्य एक ही होता है; ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और अपने आचरण के द्वारा उसे प्रसन्न रखना ताकि वह हमें सुख-संपन्न और प्रसन्न रखे। पूजा की हरेक पद्धति की अपनी ही सुंदरता है और इन सभी का पृथक महत्व है।
पूजन-वंदन से सदा, ईश्वर में जुड़ता मन।
पूजा की विधि
सिखाता, विविध, धर्म सनातन।
मिलता
है पूजा का अधिक और भी लाभ,
करने से
नित निश्चित पद्धति का अनुपालन।
हिन्दुओं में अपनी विधि के अनुसार पूजा की निम्न पद्धतियां प्रचलित हैं :
जीवन बड़ा बन जाता, अपनाकर संस्कार।
संस्कारों
में संचित, जीवन की अद्भुत शक्ति।
संस्कारों
से पाता, अभीष्ट गुणों को व्यक्ति।
हिन्दू धर्म और मनोरंजन :
जीवन तभी सार्थक
है, जब आनंदमय हो। आनंद के अभाव में जीवन बोझिल लगने लगता है। सबसे बड़ा आनंद
है - परमेश्वर में डूब जाना। परमेश्वर की भांति परमानन्द भी एक अथाह सागर है,
जिसकी प्राप्ति उस परमेश्वर तक पहुँचने पर ही होती है। उसकी कुछ बूंदें भी
हाथ लगें तो हमें उस परमेश्वर का कृतज्ञ होना चाहिए। हमारे ऋषि, मुनियों और
पूर्वजों ने ऐसा प्रबंध किया हुआ है कि उनके द्वारा स्थापित संस्कारों को निभाते
हुए और कर्मों को करते हुए हमें जीवन-पर्यन्त आनंद की प्राप्ति होती
रहे। हमारे वेद, पुराण, उपनिषद् ज्ञानवर्धक और रोचक कथाओं से भरे हुए हैं। इन
कथाओं को पढ़कर ज्ञान प्राप्ति के साथ मन आनंद से भर जाता है। सुख दुःख का प्रमुख कारण
मन ही है, यदि मन भक्ति भाव और ईश्वरीय विषयों में रंजित हो जाय तो कई प्रकार के
पाप कर्मों से बच जाता है; जो उसे भटकने से और दुःखी होने से बचाये रखता
है।
इसके अतिरिक्त
हमारे ऋषि, मुनियों और पूर्वजों ने हमें कई ऐसी धर्मिक
परम्पराएं और साधन दिया; जो जीवन के आनंद प्रदान करने के साथ,
धर्म को, उसके प्रचार प्रसार और अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने में
अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। उपासना के अतिरिक्त आनंद प्रदान
करने वाले कई अन्य साधन जो हमारे पूर्वजों ने हमें दिया है, उनमें से
कुछ निम्न हैं:
धार्मिक अनुष्ठान उत्सव : अभीष्ट की प्राप्ति के उद्देश्य से
नियमानुसार देवताओं की पूजा करना हिन्दू धर्म का सबसे महत्वपूर्ण विधान है।
शास्त्र विहित व फल के निमित्त देवताओं की वो आराधना ही धार्मिक अनुष्ठान है। ये अनुष्ठान
क्रमबद्ध नियम से किसी विशेष स्थान पर, विशेष विधि से, विशेष मन्त्रों के द्वारा किये
जाते हैं। कई अनुष्ठानों की पूर्णता, सामूहिक भोज के साथ होती है। अनुष्ठानों के स्थल
की सजावट, उनका आयोजन और समाहित विभिन्न क्रियाएं स्थल को पवित्र करने के साथ
अनुष्ठानकर्ता और उसमें संलग्न लोगों के मन को आनंदित भी करती रहती हैं।
इसी प्रकार व्रत, कथा, उपासना आदि कर्ता को कुछ विशेष करने की अनुभूति देते
हैं, और मन को एक अद्वितीय संतुष्टि प्रदान करते हैं।
पौराणिक कथाएं : हमारी पौराणिक कथाएं जहाँ
नीतिगत शिक्षा का माध्यम हैं, वहीँ रोचकता से परिपूर्ण, मनोरंजन का उत्तम
साधन भी हैं। इन कथाओं को पढ़कर या सुनकर, बड़े आनंद की अनुभूति होती है।कई
धर्माचार्य और कथावाचक अपने आकर्षक शैली के कारण पौराणिक कथाएं सुनाकर, अनुयायियों
को आकर्षित करते हैं और उन्हें कथा श्रवण हेतु बांधे रखते हैं।
लीलाएं : प्रत्येक वर्ष श्रीरामलीला
और श्रीकृष्णलीला आदि का मंचन होता है। इन अवसरों पर लोगों में उमंग देखते ही बनता है। इन लीलाओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि वे चरित्र निर्माण की शिक्षा के साथ, दर्शकों का भरपूर मनोरंजन भी करें। इन लीलाओं को देखने के लिए लोग भारी संख्या में एकत्र होते हैं।
काव्य : धार्मिक साहित्य में काव्य
का बड़ा महत्व है। बहुत से धार्मिक ग्रन्थ तो काव्यात्मक शैली में
ही लिखे गए हैं, और कई ग्रंथों पर आधारित खण्डों में काव्य लिखे गए हैं। ये
काव्य रचनाएँ अपने धार्मिक उद्देश्य को तो पूरा करती ही हैं, मन को आनंद देने
का भी कार्य करती हैं। धर्म ग्रंथों की काव्यात्मक शैली में प्रस्तुति, पाठक और
श्रोता दोनों की रूचि को बढाती है। तुलसी रामायण का संगीतमय पाठ श्रोताओं का मन
मुग्ध कर देता है। इन काव्य रचनाओं के श्रव्य कैसेट भी निर्मित किये गए हैं,
जिन्हें लोग अपने घरों में बड़े चाव से सुनते हैं और भाव विभोर होकर आनंद लेते
हैं।
भजन कीर्तन : हिन्दुओं में भजन और कीर्तन
का प्रचलन भी आदि काल से चला आ रहा है। किसी भी कार्य का सामूहिक रूप से करने पर
उसका आनंद और अधिक बढ़ जाता है। भजन, ईश्वर के गुणों को गीत के रूप
में सामूहिक रूप से गाना और कीर्तन, किसी ईश्वर के नाम या मन्त्र का सामूहिक
और संगीतमय जाप है। भक्ति भाव से समूह में गायन और संगीत मन को आनंद से
भर देता है।
मेले : त्यौहारों और अन्य
अवसरों पर, कई बार धार्मिक मेलों का आयोजन होता है। ये मेले जहाँ
मेल-मिलाप और व्यापार को बढ़ावा देते हैं, वहीँ सांस्कृतिक आदान प्रदान का भी
एक उत्तम साधन हैं। अधिकतर मेले किसी त्यौहार या पर्व के अवसर पर लगते हैं। इन मेलों के द्वारा परम्पराओं के गतिमान रहने के अतिरिक्त भरपूर आनंद मिलता है।
तीर्थ यात्रा : तीर्थ यात्रायें, पुण्य
प्राप्ति का उत्तम साधन हैं। देश के विभिन्न भागों में स्थिति प्रमुख
तीर्थ-स्थलों की तीर्थ-यात्राओं के द्वारा देशाटन भी हो जाता है। हिन्दू
धर्म में चार धाम की तीर्थयात्रा को श्रेष्ठतम माना गया है। चूँकि ये चार धाम देश
की चारों दिशाओं में स्थिति हैं, भक्तों को पूरे राष्ट्र के भ्रमण का अवसर मिल
जाता है। इन तीर्थयात्राओं के द्वारा हमें देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों
से मिलने का अवसर प्राप्त होता है और उनके रहन सहन के विषय में पता चलता है। अनुयायी, समूह में गाते बजाते तीर्थ यात्रा पर निकल जाते हैं और उनकी यात्रा की पूरी
अवधि आनंदमय वातावरण में व्यतीत हो जाती है।
प्रवचन : बहुत सी धार्मिक, नैतिक आदि गंभीर विषयों के बारे में अच्छी
तथा विचारपूर्ण बातें, धर्म गुरुओं या विद्वानों द्वारा प्रवचन के रूप में कही जाती
हैं। धर्माचार्य या धर्मगुरु के कहे वचन को हम प्रवचन के रूप में ग्रहण करते हैं। प्रवचनों के द्वारा श्रोता धर्म के विषय
में विचार और कथा आदि सुनकर ज्ञान प्राप्त करता है और उसे आनंद की अनुभूति भी होती है। प्रवचन का प्रचलन सभी धर्मों में है।
गाथाएं : देवी-देवताओं की अनेक
कथाएं गीत के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। लयबद्ध और संगीतबद्ध वो गाथाएं बहुत कर्णप्रिय होती हैं। उन गाथाओं को सुनने और गाने में अति आनंद की अनुभूति होती है।
नृत्य नाटिका : हिन्दुओं में देवी, देवताओं ऋषि,
मुनियों और कई महापुरुषों के जीवन चरित्र को नृत्य नाटिका के रूप में
प्रस्तुत करने का भी प्रचलन है। अनेक धार्मिक उत्सवों में नृत्य-नाटिका के द्वारा
धार्मिक प्रसंगों को प्रस्तुत किया जाता है जो धर्म अनुयायियों को आकर्षित करता
है। इन नृत्य नाटिकाओं का उद्देश्य देवताओं व ऋषि-मुनियों के चरित्र के बारे
में बताना, लोगों को नैतिक कर्तव्यों का बोध कराना और धर्म की संस्कृति और परम्पराओं का प्रसार करना होता है। इन नृत्य नाटिकाएं शिक्षा-परक होने के साथ मनोरंजक भी होती हैं।
सिनेमा : आधुनिक युग में सिनेमा
मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन है। पौराणिक कथाओं पर आधारित कई फ़िल्में बनी हैं। इन
फिल्मों के द्वारा उक्त नीतिपरक कथाएं आम जन तक सरलता से पहुँच जाती हैं। फिल्मों
के द्वारा ईश्वर की चमत्कारी लीलाओं को भी सरलता से प्रस्तुत
किया जा सकता है। फिल्मों के द्वारा प्रस्तुत ये लीलाएं दर्शकों को बहुत आकर्षित
करती हैं।
पवित्र नदियों में स्नान : हिन्दू धर्म
में, पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा है। स्नान के लिए घाट तक जाना,
घाट व नदियों के प्रवाह का दृश्य, स्नान की क्रियाएं व नियम मन को आनंदित करने वाले होते हैं। नदी में स्नान के समय मन वहां के वातावरण में प्रफुल्लित हो जाता है।
संस्कारिक उत्सव : हिन्दुओं के विभिन्न
संस्कार सामूहिक उपस्थिति में होते हैं। संस्कारों के आयोजन और उनकी विभिन्न
क्रियाएं तथा परस्पर ठिठोली आनंदित भी करती रहती हैं।
परिधान व पहनावा :
हमारे
देवी-देवताओं का अलग अलग पहनावा और वेश-भूषा है। देवी-देवताओं के
चित्र या मूर्तियों को हम भिन्न भिन्न प्रकार के पहनावा तथा सज्जा में देखते
हैं। उन देवी देवताओं की वेश-भूषा और अस्त्र-शस्त्र देखकर ही हम
उन्हें पहचान जाते हैं। राजा रामचंद्र धोती और जनेऊ पहने, कटि में
कटिबंध, कन्धों पर अंगरखा, सिर पर मुकुट, गले वैजन्ती माला, धनुष और
तुरीण धारण किये हुए, भुजदंड, कुण्डल और चूड़ा पहने शोभायमान होते हैं, तो
भगवान् श्रीकृष्ण धनुष बाण के स्थान पर, चक्रसुदर्शन और बांसुरी
धरे पृथक हो जाते हैं। इसी प्रकार हनुमान जांघिया और जनेऊ पहने और गदा
धरे, दुर्गा त्रिशूल धरे, लक्ष्मी कमल पर विराजमान, सरस्वती वीणा धरे।
हिन्दुओं में
पूजा के अवसरों पर देवी देवताओं को वस्त्र इत्यादि चढ़ाकर पूजा अर्चना की परंपरा
है। चूकि सब कुछ देने वाला ईश्वर ही है, इसलिए उसे नया वस्त्र चढ़ाया जाता है
ताकि ईश्वर प्रसन्न हो और वस्त्र, आभूषण आदि प्रचुर मात्रा में प्रदान करे।
वैसे तो लोगों
का परिधान या पहनावा क्षेत्र, जलवायु, मौसम, परम्पराएं आदि पर निर्भर
करता है। भारत में भिन्न-भिन्न क्षेत्र का अलग पहनावा है। क्षेत्र और अवसर के
अनुसार, परिधान और वेश भूषा में बहुत भिन्नता है। उत्तर भारत का पुरुषों
का परम्परागत पहनावा धोती-कुर्ता और अंगोछा है और स्त्रियों का
साड़ी ब्लाउज या चोली। वैसे धोती और साड़ी पूरे भारत का ही परिधान है, किन्तु
पहनने का ढंग क्षेत्र के अनुसार भिन्न है। दक्षिण भारत में लुंगी, कमीज और
अंगवस्त्रम प्रचलित है। कई क्षेत्रों में स्त्रियों में घाघरा-चोली और चुनरी
या सलवार-कुर्ती और दुपट्टा का भी प्रचलन है।
अब परिधान का
भी वैश्वीकरण हो चुका है। भारत में भी पहनावा में पाश्चात्य सभ्यता की
झलक दिखती है। गांव हो या नगर, आजकल अधिकतर लोग कमीज-पैंट या टी शर्ट और पैंट
पहने दिखाई देते हैं। लड़कियां भी जींस और टॉप्स पहने दिखती हैं। फैशन के कारण
पारम्परिक पहनावे में बहुत परिवर्तन आ चुका है। फिर भी धार्मिक अनुष्ठान और
संस्कारों में परंपरागत पहनावा को ही प्राथमिकता दी जाती है। विशेष अवसरों और
मांगलिक कार्यों में अब भी धोती कुर्ता पहना जाता है। धार्मिक कार्यों में साफा,
पगड़ी पहनने या सिर पर वस्त्र रखने की परंपरा है जिससे एक सम्मान और संस्कृति
का बोध होता है। विवाह में दोनों पक्ष के लोग साफा बांधते हैं, जिससे उस अवसर की
अलग पहचान होती है और समारोह की छवि बढ़ जाती है। कई स्थानों पर टोपी पहनने की
परंपरा है, और उनकी अपनी अलग बनावट है जैसे हिमाचली टोपी, मणिपुरी टोपी,
नेपाली टोपी आदि।
साधु,
पुजारी व धर्मगुरुओं में गेरुआ वस्त्र पहनने की परम्परा है। पूजा या धार्मिक
अनुष्ठान करवाने वाला व्यक्ति नवीन या स्वच्छ वस्त्र धारण करता है। नए वस्त्र
उपलब्ध नहीं होने पर, धारण किये हुए वस्त्र को मन्त्रों द्वारा पवित्र किया जाता
है। पूजा या अनुष्ठान में पीली अथवा हल्दी लगी श्वेत धोती पहनने का नियम है। अब रंगीन
धोती भी पहनी जाने लगी है, किन्तु पूजा में काली व कोरी सफेद धोती पहनना वर्जित
है।
खान पान, आहार:
ज्ञातव्य है कि
हिन्दू देवी, देवताओं के अतिरिक्त उन सभी जीव, यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुओं की
भी आराधना करता है, जिन पर मनुष्य का जीवन निर्भर है। भोजन किसी भी जीव
के जीने के लिए सबसे आवश्यक पदार्थ है। हिन्दुओं में भोजन आरम्भ करने से
पहले ईश्वर को स्मरण किया जाता है और प्रभु की कृतज्ञता व्यक्त की जाती है कि उसने
वह आहार प्रदान किया। भंडारा से पहले भगवान को भोग लगाया जाता है, उसके
पश्चात् ही खाने के लिए परोसा जाता है। इसी प्रकार नई फसल आने पर अन्न की
पूजा की जाती है, और सबसे पहले देवताओं को अर्पित किया जाता है। जिस क्षेत्र
की जो प्रमुख फसल होती है, फसल तैयार होने पर उस अन्न से बने पकवानों के
द्वारा ईश्वर की पूजा होती है। बुआई के समय भी कुछ विशेष पकवानों के द्वारा
देवताओं की पूजा होती है, और किसान अधिक ऊपज के लिए प्रार्थना करता है।
हमारे विभिन्न
देवताओं को भिन्न प्रकार के व्यंजन प्रिय हैं। धार्मिक अवसरों और पूजा आदि पर
देवताओं को उनके प्रिय व्यंजन चढ़ाये जाते हैं। पूजा आदि में ईश्वर
को आहार अर्पित करके प्रार्थना की जाती है कि वह हमें भी प्रचुर
मात्रा में आहार देता रहे, और भोज्य पदार्थों का कभी भी किसी प्रकार का
अभाव न रहे। भोजन को तीन भागों में बांटा गया है; सात्विक, राजषि और तामसी।
सात्विक और राजषि भोजन ही मनुष्य के लिए उत्तम माना गया है। भोजन के पदार्थों और
प्रथाओं की बहस में अब वैज्ञानिक और आर्थिक कारण भी सम्मिलित हो गए हैं।
जैसा होय मनुष्य का, रहन-सहन, आहार।
उसके अन्तः में उगें, विचार तदानुसार।
इसी प्रकार हिन्दू धर्म में जल के स्रोत, जैसे
– कुंआ, जलाशय व नदियों आदि के पूजन का भी विधान है।
भोज भंडारा
:
हिन्दुओं में
धार्मिक उत्सवों और अनुष्ठानों के मध्य अथवा पश्चात् भोज की परंपरा है। उत्सव
के उपरांत आमंत्रित लोग सामूहिक भोजन करते हैं। भोज उत्सव को विशेष बना देता है।
भोज से पारस्परिक सौहार्द के साथ आनंद और जय की अनुभूति होती है। कई
लोग पुण्य और प्रसिद्धि की आकांक्षा या सामाजिक उद्देश्य से भंडारा
करते हैं। भंडारा में किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। भंडारा स्थल
पर आने वाले हर व्यक्ति को प्रसाद स्वरुप भोजन प्रदान किया जाता है।
पूजा स्थल और तीर्थ यात्रा :
कहने को तो ईश्वर हर स्थान पर विद्यमान है, किन्तु मन हर स्थान पर एकाग्र नहीं हो पाता। मंदिर एक ऐसा पावन स्थल है, जहाँ जाते ही मन और आत्मा शुद्ध हो जाते हैं। मंदिर में जाकर ईश्वर की उपासना अति उत्तम है, यद्यपि भक्त घर पर या अन्यत्र उचित स्थान देखकर, पूजा या अनुष्ठान कर लेते हैं। मंदिर तो सदैव ही पावन रहता है, किसी अन्य स्थान पर पूजा करने के लिए पहले उस स्थान को शुद्ध करना पड़ता है, जो जल छिड़ककर मन्त्रों के द्वारा होता है। कथा इत्यादि के लिए वेदी बनायी जाती है उसमें चौका पूर कर पूजा स्थल बना लिया जाता है।
भारत में बहुत से भव्य और विशाल मंदिर
हैं, जिनका दर्शन विशेष माना जाता है। भारत के चारों दिशाओं में चार धाम,
उत्तर में बद्रीनाथ धाम, दक्षिण में रामेश्वरम, पश्चिम-द्वारकाधीश और पूर्व में
जगन्नाथ पुरी हैं। इनके अतिरिक्त पूरे भारत में फैले १२ ज्योतिर्लिंग, राम
जन्मभूमि, कृष्ण जन्मभूमि, शक्ति पीठ (जो भिन्न मतानुसार ५२ से १०८
हैं) और अनेक भव्य मंदिर हैं जिनके दर्शन लिए भक्त बड़े उन्माद और
उत्साह से इन मंदिरों में जाते हैं। अलग अलग मंदिरों की अपनी अलग महत्ता है।
इन मंदिरों के अतिरिक्त कुम्भ मेले, पवित्र नदियों में नहान आदि का भी आयोजन
होता रहता है। भक्तगण अधिक से अधिक तीर्थ स्थलों पर जाना चाहते हैं । इस
प्रकार पुण्य लाभ के अतिरिक्त भक्तों को देशाटन का भी लाभ मिल जाता है। इस प्रकार
की व्यवस्था का एक उद्देश्य सम्पूर्ण राष्ट्र को एकीकृत करना भी है। इन
तीर्थ स्थानों पर कई बार तीर्थयात्री अव्यवस्था और पंडों द्वारा ठगी आदि का शिकार
भी हो जाते हैं।
भारत में कुछ
प्रमुख हिन्दू मंदिर हैं :
दक्षिण भारत
: तिरुपति बालाजी मंदिर, श्री रंगनाथमस्वामी मंदिर, श्रीरंगम
(तिरुचिरापल्ली), मीनाक्षी अम्मन मंदिर, पद्मनाभस्वामी मंदिर, नटराजा मंदिर,
चिदंबरम (तमिल नाडु), बृहदेश्वर मंदिर, चामुंडेश्वरी मंदिर (मैसूर),
त्यागराजस्वामी मंदिर, अन्नामलाई मंदिर, श्रीकृष्ण मंदिर (गुरुवायुर), वीरभद्र
मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर (कांची पुरम), श्रीपुरम स्वर्ण मंदिर
(वेल्लोर) आदि।
उत्तर भारत : राम
जन्म-भूमि (अयोध्या), हनुमान गढ़ी (अयोध्या), कृष्ण जन्म-भूमि, वैष्णो देवी, काशी
विश्वनाथ (वाराणसी), खजुराहो, चित्रकूट, बिड़ला मंदिर (दिल्ली), कात्यायिनी मंदिर
(दिल्ली), अक्षरधाम मंदिर (दिल्ली), काली घाट मंदिर (कोलकाता),
बद्रीनाथ, केदारनाथ, मनसा देवी (हरिद्वार), इस्कान मंदिर, अमरनाथ (बर्फानी बाबा)
आदि। इनके अतिरिक्त भी कई महत्वपूर्ण मंदिर हैं।
भारत में लाखों
की संख्या में छोटे-बड़े क्षेत्रीय मंदिर भी हैं। इन क्षेत्रीय
मंदिरों के द्वारा, भक्तों को अपने निवास के समीप ही पूजा करने का अवसर,
सरलता से मिल जाता है तथा इन मंदिरों के द्वारा लाखों पंडितों का उदर-पोषण भी
होता है।
मंदिरों में
मात्र देवताओं की मूर्ति का दर्शन ही हो पाता है। वहां भक्तों को धर्म के
विषय में ज्ञान देने की कोई परंपरा नहीं है। किन्तु भक्ति भाव ही बहुत कुछ
सिखा देता है। देवताओं की कथाएं पहले से सुन रखी होती हैं इसलिए इन देव-मूर्ति के
दर्शन होते ही उक्त देवता की महिमा का स्मरण हो आता है और मन उस महिमा में रम
जाता है। मूर्ति एक सूत्र के रूप में कार्य करती है। यहाँ सूत्र का अभिप्राय दोनों
ही है एक तो मूर्ति का दर्शन भक्त को उक्त देवता से जोड़ता है और दूसरा विज्ञान में
प्रयुक्त पदार्थों के सूत्र की भांति देवता की महिमा का संकेत या सूत्र।
त्यौहार, पर्व, उत्सव :
हिन्दुओं में
प्रमुख धार्मिक घटनाओं को त्यौहार के रूप में मनाने की प्रथा
है। जैसे राम-नवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि, विजयादशमी,
नवरात्रि, मकर-संक्रान्ति, होली, दीपावली, छठ, दुर्गा-पूजा, पोंगल, ओणम, गणेश
चतुर्थी, बसंत पंचमी इत्यादि। ये सभी पर्व किसी न किसी रूप
में हिन्दू देवी देवताओं से सम्बंधित हैं। कई त्यौहार, ऋतुओं के आगमन के
स्वागत में तथा फसल की कटाई के अवसर पर भी मनाये जाते हैं। ये त्यौहार,
ईश्वर और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दर्शाने हेतु मनाये जाते हैं। त्यौहारों
के अतिरक्त कई अन्य धार्मिक उत्सव जैसे किसी मंदिर का स्थापना दिवस, किसी मनौती के
पूरा होने पर यज्ञ इत्यादि भी किये जाते हैं। कुछ ऐसे त्यौहार हैं जो पूरे भारत में मनाए जाते हैं और कुछ क्षेत्रीय
आधार पर। त्यौहार राष्ट्रीय और सांप्रदायिक एकता के लिए बहुत
महत्वपूर्ण हैं। पर्व, त्यौहार, उत्सवों, धर्मिक अनुष्ठानों
के अवसर पर स्वच्छता और पावनता का विशेष ध्यान दिया जाता है, जिसके कारण रोग,
व्याधि आदि की रोक-थाम हो जाती है। हिन्दुओं के सभी पर्व, प्रसन्नता और
स्फूर्ति देने के साथ कुछ न कुछ सन्देश भी देते हैं; जैसे भक्ति, दान, सौहार्द,
जागृति, हर्ष, संगठन, स्वच्छता, रचनात्मकता इत्यादि।
खेल
खिलौने :
हिन्दू धर्म और
संस्कृति पर हमारे खेल खिलौनों का भी प्रभाव दिखता है। इन खिलौनों से बच्चों के मन
में धर्म के विषय में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। तीर धनुष, गदा, मुकुट,
बांसुरी, डमरू, खड्ग, मूर्तियां आदि से
जहाँ मेले व पर्वों में बच्चों के रुचि बढ़ जाती है वहीं श्रीराम, श्रीकृष्ण,
हनुमान, शंकर, दुर्गा आदि देवी देवताओं के आदर्श उनके मन में आते हैं और उन
आदर्शों के अनुकरण की प्रेरणा मिलती है। इन प्रकार के खिलौनों और कहानियों से,
बच्चों के मन में बचपन से ही धर्म के प्रति आस्था उत्पन्न होती है।
उपकरणों की पूजा :
हमारे कामगार या कारीगर जब नये उपकरण अथवा मशीन लाते हैं तो उसकी पूजा करते हैं। वे ही उपकरण उनके जीविकोपार्जन का साधन हैं, जिनके प्रति सम्मान व कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए पूजा की जाती है और ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि वह निर्वाध रूप से कार्य में सहायक हो और उपासक को सम्पन्नता प्रदान करे। विश्वकर्मा जयंती के दिन लोग उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। विश्वकर्मा को विश्व का सबसे पहला इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है। इस दिन उद्योगों और फैक्ट्रियों में मशीनों व उपकरणों की पूजा की जाती है। इसी प्रकार नए वाहन लाने पर, चाहे व्यावसायिक प्रयोग के लिए हो या निजी, उसकी भी पूजा की जाती है।
प्रकृति :
हिन्दू धर्म में प्रकृति का विशेष महत्व है। प्रकृति ईश्वर की अनुपम रचना है और मनुष्य का जीवन, प्रकृति पर ही आश्रित है। हिन्दू धर्म में प्रकृति के विभिन्न अवयवों की पूजा, उपासना की पद्धति है, जिसके द्वारा उनके सम्मान और संरक्षण की प्रेरणा मिलती है। प्रकृति के संरक्षण से ही जीवन संभव है। यदि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति की संरक्षा नहीं की होती तो मानव जीवन कभी का समाप्त हो चुका होता। हम कई प्रकार के जंतुओं, वस्तुओं, पक्षियों और वनस्पतियों की पूजा करते हैं। वे सभी किसी न किसी रूप में हमारे जीवन के लिए सहायक हैं। प्रकृति की रक्षा से मनुष्य के मन में संवेदना उत्पन्न होती है। प्रकृति ईश्वर का ही प्रतिरूप है और इसका सम्मान और संरक्षण मनुष्य का धर्म।
प्रकृति है वसुंधरा पर, ईश्वर का प्रतिरूप।
पालती वो जीवों को, वही
मिटाती भूख।
योग :
योग हिन्दू
धर्म के छः दर्शनों में से एक है। योग हमें प्राकृतिक तत्वों से शारीरिक और मानसिक
रूप से स्वस्थ और प्रसन्न रहना सिखाता है, और साथ ही आध्यात्मिक उत्थान
की ओर ले जाता है। योग जीवन के विभिन्न मार्ग दर्शाता है जिसके द्वारा मनुष्य
की भौतिक व मानसिक क्षमताओं के अनुसार सर्वोच्च लक्ष्य आत्म-बोध की ओर ले जाता
है। योग - शारीरिक, मानसिक आध्यात्मिक लाभ प्रदान करने के साथ दर्शन का एक
माध्यम भी है। २१ जून को विश्व योग दिवस तो मनाया जाता है, किन्तु
भारत में ही योग का लोप हो रहा है। चूकि योग हिन्दू दर्शनों में से एक है, इसलिए
भारत में विद्यालयों में लागू करने पर अन्य धर्मों द्वारा विरोध होता है, जब
कि यह सबके लिए उपयोगी है। यह भी एक षड्यंत्र ही है क्योंकि आजकल योग का
स्थान पर जिम के द्वारा धन कमाया जा रहा है।
आयुर्वेद :
जिस प्रकार वेदों ने मनुष्य को जीवन की पद्धति सिखाया उसी प्रकार रुग्ण होने
पर चिकित्सा की पद्धति भी सिखाया और आयुर्वेद को प्रतिपादित किया। हमारे ऋषि-मुनियों
ने आयुर्वेद पर निरंतर शोध किया और एक वृहत चिकित्सा पद्धति का विकास किया।
आयुर्वेद का ज्ञान, वैसे तो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है, किन्तु यह हिन्दू
धर्म-ग्रंथों की देन है, अतः हिन्दू धर्म की एक अनमोल धरोहर है। अंग्रेजी चिकित्सा
पद्धति आ जाने के पश्चात् आयुर्वेद पर कम ध्यान दिया गया और जितना विकास होना
चाहिए था उतना नहीं हो पाया। कुछ भारतीय कम्पनियाँ ही आयुर्वेदिक औषधियों के विकास
में लगी रहीं। सरकारों की ओर से आयुर्वेद के प्रति उदासीनता ही रखी गयी। आयुर्वेद
की परिकल्पना रही है - सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। आयुर्वेद का लाभ
प्रत्येक व्यक्ति को मिले ऐसे उपाय किये जाने चाहिए।
आत्मा :
आत्मा अदृश्य है। मनुष्य द्वारा किये गए कार्यों व सुख दुःख का अनुभव आत्मा को ही होता है। आत्मा ही मनुष्य को प्राण देती है। आत्मा के शरीर छोड़ देने पर जीव, निर्जीव हो जाता है। जीव के कार्य उसके मन, विवेक और देह के द्वारा संपन्न होता है, जिसकी अनुभूति आत्मा को मिलती है। इसीलिए, मनुष्य आत्मा की संतुष्टि के लिए भांति भांति के कर्म करता है।
हिन्दू धर्म में आत्मा की तीन गति बताई गयी हैं। एक - आत्मा, परमात्मा का एक अंश है; जिसे वह किसी शरीर में प्रवेश कराकर जीवन देता है और भौतिक कार्य कराता है। जीव की मृत्यु के पश्चात् आत्मा किसी अन्य नवीन देह को धारण कर लेती है। दूसरा - मृत्यु के पश्चात् आत्मा उसी ईश्वर में पुनः विलीन होकर मोक्ष को प्राप्त हो जाती है। तीसरा - आत्मा का न तो पुनर्जन्म होता है न ही वो मोक्ष को प्राप्त होती है, इस कारण भटकती रहती है। यह स्थिति बहुत भयानक और दुष्कर है। भटकती आत्मा की शांति के लिए, हिन्दू धर्म में उपाय भी बताये गए हैं।
हिन्दू धर्म में समाया, परम ब्रह्म का सत्व।
ईश, आत्मा, मोक्ष के, सिखलाता
है तत्व।
भाषा :
संस्कृति और भाषा
का सम्बन्ध अटूट है। संसार की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है; और इसे देवताओं की
भाषा भी माना जाता है। हिन्दुओं के सभी प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में ही
लिखे गए हैं। हमारे वेद, पुराण व आदिकवि महर्षि बाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास
की रचनाएँ संस्कृत में ही हैं।
संजोये हुए संस्कृति को, देवों की भाषा संस्कृत।
सनातन
धर्म-ग्रंथों में हैं, मानवता के नियम संचित।
कालांतर में
संस्कृत भाषा से हिंदी और कई अन्य भारतीय भाषाओँ ने जन्म लिया। भाषा
ही संस्कृति की संवाहिका है और भाषा ही संस्कृति को वाचाल
बनाती है। संस्कृत और उससे जन्मी हिंदी की लिपि देवनागरी है। संस्कृत
में लिखे गए सभी धार्मिक ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद है और उनकी शाखाओं के रूप
में हिंदी में भी अनेक ग्रन्थ लिखे गए। यही क्रम अन्य भारतीय भाषाओँ में भी हुआ।
हिंदी भाषा, भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली, सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा
और हिन्दू-धर्म के प्रसार प्रचार का सबसे सशक्त माध्यम बनी। स्वतंत्रता
के पश्चात् हिंदी, जिसे राष्ट्र-भाषा होना चाहिए था; कुछ तत्वों के विरोध के
कारण, केंद्र सरकार द्वारा राज-भाषा घोषित किया गया।
सैकड़ों वर्षों से
हिंदी पर निरंतर कुठाराघात होता रहा है। भारत पर मुस्लिम शासकों के आक्रमण और
अंग्रेजों के शासन के कारण यहाँ उर्दू और अंग्रेजी की पैठ बढ़ती गयी। वैसे इस अवधि
में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओँ के बहुत से ग्रन्थ लिखे गए। तुलसीदास, सूरदास,
मीराबाई, संत तुकाराम, कबीर, रैदास, रहीम, बिहारी, केशवदास जैसे कवि पंद्रहवीं और
सोलहवीं शताब्दी में हुए। स्वतंत्रता के पश्चात् अंग्रेजी पढ़ने पढ़ाने का क्रम आरम्भ
हुआ और अंग्रेजी विद्यालयों का बोलबाला रहा। अंग्रेजी पढ़ने का प्रमुख कारण रहा -
सत्ता से निकटता बनाये रखना। अंग्रेजी भाषा के प्रसार के कारण पाश्चात्य सभ्यता
पनपती रही और हिन्दू संस्कृति का ह्रास होता रहा। अब उर्दू भी देवनागरी लिपि पर
आरूढ़ होकर चलने लगी है। बहुत से हिंदी शब्द उर्दू की ओर तो सरक गए हैं, किन्तु
उर्दू के कई शब्द हमारे जीवन और संस्कृति में घुल मिल जाने के पश्चात् भी हिंदी के
विद्वान हिंदी भाषा में आत्मसात नहीं कर पाए। हिंदी को दोनों ओर से ही हानि हो रही
है। एक तो हिंदी के शब्द और संस्कृति लेकर कुछ अन्य भाषाएँ सशक्त हो रही हैं, वहीँ
नए विषय जुड़ने के साथ और शताब्दियों तक अन्य भाषाओँ के कई शब्दों के निरंतर प्रयोग
के पश्चात् भी हिंदी के आधिकारिक शब्द नहीं बन पाये। कितने ही वैज्ञानिक शब्द हैं
जिनके समुचित हिंदी शब्द नहीं हैं।
हिंदी का विरोध,
हिन्दुओं द्वारा भी होता है। क्षेत्रीय भाषाओँ की महत्ता को दर्शाने के लिए दक्षिण
भारत में हिंदी का विरोध किया जाता है। विश्व में अनेक देश हैं, जहाँ कई, अपितु
सैकड़ों भाषा बोली जाती हैं; किन्तु उनकी प्रमुख या राष्ट्र भाषा एक ही होती है।
किसी एक भाषा के सर्वव्यापी होने से एकता को बल मिलता है और राष्ट्र सुदृढ़ होता है।
हिन्दू राजाओं की भूमिका
सृष्टि की
उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा की गयी। ब्रह्मा के सत्रह मानस पुत्र और एक कन्या
थी : मन से - मरीचि, इच्छा से - सनक, सनन्दन, सनातन, और सनतकुमार, नेत्र
से - अत्रि, मुख से - अंगिरस, कान से - पुलस्त्य, नाभि से - पुलह, हाथ से -
कृतु, त्वचा से - भृगु, प्राण से - वशिष्ठ, अंगूठा से - दक्ष, छाया से - कर्दभ,
गोद से - नारद, शरीर से - स्वायम्भुव मनु और सतरूपा, ध्यान से - चित्रगुप्त।
ये पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेन्द्रियों के प्रतीक थे।
ब्रह्मा के १० प्रजापति, चार कुमार, १४ मनु और ११ रूद्र सहित कुल उनसठ
पुत्र बताये जाते हैं।
प्रजापत्य कल्प में ब्रह्मा ने स्वयंभु मनु और स्त्री-रूप में शतरूपा को प्रकट किया। इन दोनों ने दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद, तथा तीन पुत्रियां देवहूति, प्रसूति और आकूति नाम की संतानों को जन्म दिया। फिर आकूति का विवाह रुचि प्रजापति से, देवहूति का विवाह कर्दम और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से कर दिया। दक्ष ने प्रसूति से 24 कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से तेरह का विवाह धर्म से किया, उनके नाम हैं - श्रद्धा, लक्ष्मी, पुष्टि, धृति, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और कृति। ये सभी मानस स्थितियों की प्रतीक हैं। और अन्य कन्याओं में - भृगु से ख्याति का, शिव से सती का, मरीचि से सम्भूति का, अंगिरा से स्मृति का, पुलस्त्य से प्रीति का, पुलह से क्षमा का, कृति से सन्नति का, अत्रि से अनसूया का, वशिष्ट से ऊर्जा का, अग्नि से स्वाहा का तथा पितरों से स्वधा का विवाह किया। आगे आने वाली सृष्टि इन्हीं से विकसित हुई।
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र मरीचि का विवाह सम्भूति से हुआ जिनके पुत्र थे कश्यप, कश्यप के पुत्र विवस्वान और विवस्वान के पुत्र थे वैवस्वत मनु; यहीं से सूर्यवंश का आरम्भ हुआ। वैवस्वत मनु के छठे वंशज थे इक्ष्वाकु, जो एक महाप्रतापी राजा हुए; इसलिए सूर्यवंश को इक्ष्वाकु वंश भी कहा जाता है। कहा जाता है, जलप्रलय के बाद जब धरती जलमग्न हो गयी तो वैवस्वत मनु को भगवान विष्णु ने बचाया। वैवस्वत मनु और उनके कुल के लोगों ने फिर से धरती को बसाया। सतयुग में पृथ्वी पर देवताओं का राज था।
इक्ष्वाकु के वंशज मान्धाता के काल से त्रेता युग का आरम्भ हुआ। मान्धाता के वंशज सत्यवादी हरिश्चंद, सगर, दिलीप, भगीरथ, रघु, अज, दशरथ और राम आदि थे। पुराणों में इक्ष्वांकु के पीढ़ी दर पीढ़ी डेढ़ सौ वंशज शासकों का उल्लेख मिलता है। विकीपीडिया में उपलब्ध इक्ष्वाकु की वंशावली में भगवान राम का क्रम बासठवां था। भगवान राम को विष्णु भगवान का अवतार माना जाता है।
ययाति के एक पुत्र पुरु के नाम से पुरुवंश का आरम्भ हुआ। पुरुवंश में आगे चलकर महाराजा दुष्यंत, भरत और कुरु हुए। दुष्यंत चंद्रवंशी राजा थे। कुरुवंश के वंशज महाराजा प्रतीप के पुत्र थे शांतनु, जहाँ से महाभारत की कथा का आरम्भ होता है। शांतनु के पुत्र थे चित्रांगद और चित्रांगद के पुत्र थे विचित्रवीर्य, जिनके पुत्र थे धृतराष्ट्र और पाण्डु। पाण्डु के पुत्र पांडव हुए और धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव। द्वापरयुग में प्रमुखतः चन्द्रवंश, यदुवंश, पुरुवंश, कुरुवंश का साम्राज्य रहा। द्वापर युग लगभग ५००० वर्ष ईसा पूर्व से पहले का युग माना जाता है। कहते हैं १८ फरवरी ३१०२ ईसा पूर्व को भागवान श्रीकृष्ण स्वर्ग लोक चले गए और उसके पश्चात् कलियुग का आरम्भ हो गया। गुजरात के उस स्थान पर श्री भालका तीर्थ मंदिर स्थित है। द्वापर युग में विष्णु भगवान का अवतार श्रीकृष्ण के रूप में हुआ।
सतयुग से द्वापर तक सनातन धर्म के अतिरिक्त, किसी अन्य धर्म का इतिहास नहीं मिलता। सतयुग और त्रेता में कई ऐसे राजा हुए जिनका सातों द्वीपों पर अधिपत्य था। पुराणों के अनुसार धरती पर स्थिति सात द्वीपों में से एक जम्बूद्वीप था जिसपर हिन्दुओं का अधिपत्य था। यह अफगानिस्तान के हिन्दुकुश पर्वतमाला से लेकर अरुणाचल की पर्वतमाला तथा हिमालय की चोटियों से लेकर कन्याकुमारी तक फैला था। द्वापर युग के पश्चात् अनेक प्रतापी राजा हुए, जो महायोद्धा होने के साथ हिन्दू धर्म के रक्षक थे। उन महान सम्राटों ने हिन्दू धर्म को आगे बढ़ाया। लगभग २५०० वर्ष ईसा पूर्व तक उपलब्ध इतिहास के अनुसार प्रमुख राजा या राजवंश इस प्रकार थे :
कुछ राजवंशों के नाम - मगध राज वंश (२५०० वर्ष ईसा पूर्व), वृहद्रथ वंश (२००० ई० पू०), प्रद्योतवंश (६८२ ई० पू०), हर्यक वंश (५४४ ई० पू०), नन्द वंश (३४५ से ३२२ ई० पू० ), मौर्य वंश (३२२ से १८५ ई० पू०), शुंग वंश (१८५ से ७३ ई० पू०), कण्व वंश (७३ से २८ ईसा पूर्व), सातवाहन वंश (६० ईसा पूर्व से ईसवी २४०) दक्षिण भारत, गुप्त वंश (ईसवी ३१९ से ४६७), पल्लव वंश (ई० ५७५ से ६००) दक्षिण भारत, चोल वंश (ई० ८४९ से १०७०) दक्षिण भारत, चोल-चालुक्य वंश (ई० १०७० से १२७९) आदि।
कुछ राजाओं के नाम - चन्द्रगुप्त मौर्य (ईसा पूर्व ३२१ से २९७ ईसा पूर्व) जिनके गुरु चाणक्य थे, बिन्दुसार (ईसा पूर्व २९७ से २७३), सम्राट अशोक (२६८ से २३२ ईसा पूर्व) जो कलिंग युद्ध पश्चात् महात्मा बुद्ध की शरण में चले गये, समुद्रगुत (ई० ३५० से ३७५), चन्द्रगुप्त द्वितीय (ई० ३७५-४१२ ), स्कंदगुप्त (ई० ४५५ से ४६७), हर्षवर्धन (ई० ५९० से ६४७), राजराज चोल (ई० ९८५-१०१४) राजा भोज (१०७६ से १०९९), राजेंद्र चोल (ई० १०१२-१०४४) सम्राट विक्रमादित्य (ई० १०७६ से ११२६), राजा हरिहर (ई० १३५० से १५६५ तक), तथा पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, महाराजा रणजीत सिंह, कृष्णदेव राय इत्यादि।
कलियुग
में हिन्दू राजाओं ने कई प्रकार के आक्रमणों से हिन्दू-धर्म की रक्षा की। इन
राजाओं ने बड़ी श्रद्धा पूर्वक हिन्दू धर्म को आगे बढ़ाया। इन्होंने कई
राजनितिक युद्ध लड़ने के साथ, हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिए भी युद्ध
लड़ा। हिन्दू राजाओं ने अपनी बुद्धिमत्ता और वीरता का प्रदर्शन किया
और अनेक आक्रमणों को विफल किया। उन राजाओं ने हिन्दू-धर्म और संस्कृति की रक्षा की
तथा धर्म को आगे बढ़ाया। धर्म गुरुओं, पुरोहितों, ब्राह्मणों, साधुओं आदि का सम्मान
किया और उन्हें विशेष स्थान दिया। हिन्दू राजा व शासक अनेक धार्मिक व
सामाजिक कार्य करते रहे। प्रजा पालन का धर्म निभाने के साथ, समय समय पर यज्ञ और
अनुष्ठान करवाए; देवालय, विद्यालय, चिकित्सालय, अनाथालय, जलाशय, ग्रंथालय, गोशाला आदि
का निर्माण करवाया; मेले व धार्मिक उत्सवों का आयोजन किया, कवि व लेखकों को धार्मिक
रचनाओं के लिए प्रोत्साहन दिया इत्यादि। राजाओं ने अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया और उनके रख रखाव पर निरंतर ध्यान दिया। उनके
द्वारा हजारों वर्ष पूर्व निर्मित भव्य मंदिर आज भी विद्यमान हैं जो हिन्दुओं के प्रमुख
तीर्थस्थल बने हुए हैं। यद्यपि इस युग में हिन्दू धर्म एक नहीं रह पाया और कई नए धर्मों ने जन्म
लिया। पृथक विचारधाराओं और महत्वाकांक्षाओं के फलस्वरूप धर्म की शाखाएं पनपीं
और अलग धर्म बनते गए। प्रत्येक धर्म भी भी दो-दो पंथ बने। संभव है, भविष्य में और भी नए धर्म बनें। कई
पंथों द्वारा ऐसे असफल प्रयास किये जा चुके हैं।
चौदहवीं शताब्दी से अरब, तुर्क, ईरानी और मुगलों का भारत में प्रवेश होने लगा और सोलहवीं शताब्दी तक मुग़लों का वृहत सम्राज्य हो गया। इस अवधि में भारत को खूब लूटा गया तथा हिन्दू-धर्म को निर्बल करने के लिए भरसक प्रयास किये गए। हिन्दुओं से बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन तक करवाया गया। हिन्दू धर्म ने कभी अपने प्रसार के लिए काम नहीं किया, वह बस लंबवत पीढ़ी दर पीढ़ी धर्म का हस्तांतरण करता रहा। सतरहवीं शताब्दी में ईस्ट इन्डिया कंपनी ने पांव पसार लिया, और धीरे धीरे पूरे भारत पर अंग्रेजों ने अधिपत्य जमा लिया। अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलमानों को आपस में लड़वाया और राज किया। अंग्रेजों के शासन काल में हिन्दुओं के गौरवशाली इतिहास को भी तोड़ा मरोड़ा गया। अंग्रेजों की कुटिल चाल के कारण धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना। स्वतंत्रता से पहले कई सौ वर्ष तक हिन्दुओं को अत्याचार सहन करना पड़ा। स्वतन्त्र भारत में भी धर्म-निरपेक्षता की आड़ में हिन्दू अनुयायियों को सांप्रदायिक कहा जाता रहा।
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