भोली जनता भी चंगुल में, आ जाती बड़े सहज ही,
३. हिन्दू धर्म की विशालता और उदारता का इसी बात से बोध होता है कि हिन्दुओं के अनगिनत देवी-देवता, अनेक साम्प्रदाय, साम्प्रदायों के भिन्न-भिन्न संस्कार और भिन्न पूजा पद्धति हैं। आदिकाल के देवी देवताओं के अतिरिक्त ग्राम देवता, कुल देवता, स्थानीय देवी-देवताओं आदि का समावेश होता गया और स्थान एवं व्यक्ति विशेष के अनुसार उनकी आराधना होती रही है। यही नहीं अन्धविश्वास के कारण भूत-पिशाचों, झाड़-फूँक, तंत्र-मत्र, टोना-टोटका आदि ने भी बिना किसी अन्तर्विरोध के हिन्दू धर्म में अपना स्थान बना लिया। हिन्दू धर्म में एक ओर देवी-देवताओं की सरल पूजा-अर्चना तो दूसरी ओर भयावह कर्मकाण्डीय अनुष्ठान भी किये जाते हैं; एक ओर भक्ति रस से सराबोर है, तो कहीं नास्तिक भी मिलते हैं। बीच-बीच में कई स्वार्थी पोंगा पंडित भी आते रहे, जिन्होंने अपने ढोंग और पाखण्ड से हिन्दू धर्म के प्रति आस्था को ठेस पहुँचाया। विज्ञान के विकास और हिन्दू समाज के शिक्षित होने के साथ इन बातों को लेकर धर्म में आस्था कम होती गयी। यह सब हिन्दू धर्म की उदारता तथा धार्मिक सहिष्णुता की श्रेष्ठ भावना का ही परिणाम और परिचायक है। उदारवाद के कारण बीच बीच में अनेक कुरीतियां और कुप्रथाएं पनपीं, किन्तु समय-समय पर उनमें सुधार किया जाता रहा। हिन्दू-धर्म में जहाँ हजारों अच्छाइयां थीं तो कई बुराईयां भी पनपीं जिनके कारण हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता का क्षय हुआ। अशिक्षा के कारण बहुत सी कुरीतियां पनपीं, उनमें से बहुत से ठीक कर ली गयीं, किन्तु कुछ कुप्रथाएं अभी भी विद्यमान है। कोई रोक टोक नहीं होने के कारण, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता, पाखंड, जादू टोना, ढोंग, भूत प्रेत, आदि को खूब बढ़ावा मिला।
राजनितिक प्रभाव
तीन टुकड़ों में, तिरंगा टांगने वालों !
खेत न केसरिया, न चेहरा हरा होगा;
सुनो! संप्रदाय, रंगों से आंकने वालों !
हिन्दू धर्म और सामाजिक व्यवस्था
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम् ॥
(यानि सृष्टि के गुणों के आधार पर कर्म को चार वर्णों में मेरे द्वारा रचा गया, इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान।)
गीता के इस श्लोक के अनुसार वर्ण व्यवस्था स्वयं भगवान् द्वारा बनायी गयी है। यह व्यवस्था इसलिए दी गयी जिससे कि समाज के विभिन्न कार्य जैसे शिक्षा, स्वच्छता, रक्षा, कृषि, यातायात, वस्तुओं का उत्पादन और विपणन,आदि सुचारु रूप से चले ताकि मानव जीवन सुविध हो।
ऋग्वेद के मंडल दस, सूक्त १९१ में भगवान् ने कहा है -
समानो मंत्रः समितिः ससानी समानं मनःसह चित्तमेषाम।
समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वृ: समानेन चो हविषा जुहोमि।
अर्थात सबका विचार एक समान हो, परस्पर संगति, मेलजोल एक समान और भेदभाव रहित अंतःकरण एक समान और सबका चित्त एक साथ हो। मैं सबको सम विचारवान बनाता हूँ और एक समान भोजनादि देकर पोषण करता हूँ।
रहो रहित भेद भाव से, रखो विचार समान।
इससे यह स्पष्ट होता है भगवान ने वर्ण व्यवस्था तो दिया है किन्तु ऊंच-नीच का भेद भाव नहीं। ऊंच-नीच तथा विभिन्न जातियों का भेद-भाव मनुष्य द्वारा बनाया गया है। वेदों में सबसे समभाव से मिलने और मिलकर रहने के लिए कहा गया है। वर्ण व्यवस्था समाज की आवश्यकतों के अनुसार बनायी गयी थी, किन्तु आगे चलकर इसका बहुत दुरूपयोग हुआ। समाज ने ही शनैः शनैः वर्ण व्यवस्था को विकृत रूप दे दिया। पहले समाज में ऊंच-नीच की भावना ने हिन्दुओं के उन सामाजिक वर्गों में दूरी बनायी, बाद में राजनितिक कारणों ने। मुग़लों और अंग्रेजों ने अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए हिन्दू जातियों के बीच की खांई को और अधिक चौड़ा किया, तथा अश्पृश्यता जैसे ओछे स्तर तक ले गए। मुगलकाल में हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार किये गए। औरंगजेब ने तो बहुत से हिन्दुओं को मरवा दिया, जिनमें मुख्य रूप से ब्राह्मण थे। शूद्रों में से बहुतों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया गया। हिन्दू धर्म को नष्ट करने के सैकड़ों वर्षों के प्रयासों के बाद भी ब्राह्मणों ने वेद, पुराण व अन्य धर्म-ग्रंथों के प्रसंगों को कंठस्थ करके धर्म को नष्ट होने से बचाये रखा।
विरोध और त्रासदियां झेल कर भी ब्राह्मण वर्ग;
नीतिगत शिक्षा प्रदान, चरित्र निर्माण करता रहा।
सरकार भी अपने कार्यों को कई विभागों में विभक्त करती है, और प्रत्येक विभाग में पदों की भी श्रेणी भी बनाती है, जैसे सचिव, अधिकारी, बाबू, चपरासी आदि, जिनमें अधिकारों व सुविधाओं की असमानता रहती है। वैसे यह विभाजन योग्यता और निपुणता के आधार पर होता है, जन्म या जाति के आधार पर नहीं। शिक्षा और अनुभव के प्रसार होने से, कार्यों की विशेषज्ञता प्राप्त कर ली गयी है। किन्तु निजी क्षेत्र के कार्य अभी भी वंशानुगत ही होते हैं। अशिक्षित व अप्रशिक्षित बच्चे भी अपने कुटुंब के काम को पकड़ लेते हैं। क्या हमारा संविधान भी वही काम नहीं कर रहा है? आरक्षण प्राप्त व्यक्ति चाहे कितना भी संपन्न हो जाय, उसका वंशज उसी प्रकार लाभ लेता रहता है। जबकि कई बार अभावग्रस्त व्यक्ति भी जातिगत विभेद के कारण समुचित संरक्षण नहीं पाता।
यत्र तत्र सर्वत्र खुल गयी, शिक्षा की दुकान।
कहीं चलता ढाबा, कहीं होटल आलीशान।
समझ में नहीं समाती, 'समानता की बात',
कैसी शिक्षा का अधिकार, देता है संविधान।
अनुच्छेद 30 ने एक घातक उदाहरण स्थापित किया है। यह, अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थानों को ‘प्रशासन’ का पूर्ण अधिकार देता है। इसका अर्थ यह है कि सरकार एक अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान के शासी निकाय के गठन और प्रबंधन पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण लागू नहीं कर सकती है। यहाँ तक कि भ्रष्टाचार की स्थिति में भी सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती और प्रभार अपने हाथ में नहीं ले सकती है। जबकि बहुसंख्यक, जो कि भारत में मात्र हिन्दू ही है, की संस्थाओं में सरकार का पूर्ण हस्तक्षेप है। अनुच्छेद 30 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अल्पसंख्यकों के साथ असमान व्यवहार न हो किन्तु वास्तव में, यह गैर-अल्पसंख्यकों (बहुसंख्यक) को अपने संस्थानों को “स्थापित और प्रशासित करने” के अधिकार से वंचित करता है। संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, अनुच्छेद 30 देश को धर्म के आधार पर विभाजित करता है क्योंकि हिंदुओं द्वारा संचालित संस्थानों में सरकारी हस्तक्षेप होता है, जबकि अल्पसंख्यक संस्थान पूर्ण स्वायत्तता का आनंद लेते हैं। एक विश्लेषक ने यहाँ तक कहा है कि शिक्षण संस्थान में कुरान या बाइबिल तो पढ़ाया जा सकता है किन्तु वेद या गीता नहीं। देखा जाय तो भारतीय मुसलमानों के तार अरब देशों से जुड़े हैं, और बहुत सारी बातों में वे वहीं से निर्देश लेते हैं; उनके द्वारा संचालित मदरसों की शिक्षा प्रणाली भारत से नहीं अपितु अरब देशों से मेल खाती है तो फिर ये अल्पसंख्यक कैसे हुए?
धर्म की शिक्षा में सरकारी भेदभाव नहीं होनी चाहिए। चाहे कोई भी धर्म हो, धर्म की शिक्षा का एक ही प्रारूप हो। यदि सरकार के अंतर्गत धर्म की शिक्षा हो तो सभी धर्मों की शिक्षा का प्रबंध सरकार करे; यदि शिक्षा का सञ्चालन साम्प्रदाय के हाथों में हो तो सभी धर्मों में यही हो। सरकार सभी धर्मों की शिक्षा का व्यय वहन करे। किसी धर्म को पूर्ण रूप से स्वतंत्र और किसी धर्म में सरकारी हस्तक्षेप जैसा भेदभाव नहीं हो। वैसे सभी संस्थाओं में सरकार का हस्तक्षेप होना चाहिए, जिससे कि किसी धर्म दवरा अन्य धर्मों के प्रति घृणा, विद्वेष या वैमनस्यता का पाठ पढ़ाने पर अंकुश रखा जा सके तथा धर्म के नाम पर शोषण और दुरूपयोग न हो सके।
ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किये जायँ जिन्हें स्कूल स्तर की शिक्षा में किसी रूप में धर्म को भी सम्मिलित किया जाय। विज्ञान विषयों के साथ धर्म की शिक्षा भी दी जाय और धर्म की शिक्षा ग्रहण करने वालों को विज्ञान की भी। मंदिरों में पूजा पाठ के लिए शिक्षित पुजारियों की नियुक्ति होनी चाहिए जिससे उन्हें आजीविका का साधन भी मिले। कर्मकाण्ड में पहले से लगे कम पढ़े लिखे ब्राह्मणों व पुजारियों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
धर्म शास्त्र में माध्यमिक स्तर का प्रमाणपत्र या डिप्लोमा, स्नातक और स्नातकोत्तर के समकक्ष की शिक्षा का प्रावधान होना चाहिए और शिक्षित विद्वानों के रोजगार की व्यवस्था होनी चाहिए। जिस प्रकार संस्कृत में मध्यमा, शास्त्री, आचार्य, विशारद आदि की उपाधि का प्रावधान है, उसी प्रकार धर्म शास्त्र के पृथक पाठ्यक्रम बनने चाहिए और पंडिताई, पुरोहिती व कर्मकांड के डिप्लोमा पाठ्यक्रम आरम्भ होना चाहिए। विश्वविद्यालयों से सम्बन्ध स्थापित करके या स्वतंत्र विद्यालयों द्वारा इस प्रकार के पाठ्यक्रम स्थापित किये जा सकते हैं। उन पाठ्यक्रमों में हिन्दू-धर्म क्या है?, धर्म का महत्व, हमारे देवी देवता, हमारे त्यौहार और पर्व, पूजा उपासना का महत्व व प्रकार तथा विधि, धर्म व मानवता, पूजा स्थल, स्वच्छता, प्रार्थना, ईश्वर और प्रमुख देवता, प्रमुख ग्रंथों का परिचय, चरित्र निर्माण, धर्म के प्रति हमारे कर्तव्य, हमारे तीर्थ स्थल, प्रकृति और धर्म, धर्म के तत्व, कर्मकांड, पुरोहिती, ज्योतिष, धार्मिक ग्रंथों की भूमिका, धर्म की रक्षा के उपाय, प्रमुख ग्रन्थ, हिन्दुओं के संस्कार और उनका महत्व, कुप्रथाएं, धर्म और विज्ञान, धर्म और समाज, मुख्य पौराणिक कथाएं, अन्य धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन, शोध के द्वारा साहित्य सृजन, धर्म में अनर्गल समावेशित बातों का अध्ययन और उनका निराकरण, धर्म और व्यक्ति, वेद, वेदांत, अध्यात्म, दर्शन, हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता, शोध साहित्य इत्यादि।
हिन्दू-धर्म और विज्ञान
विज्ञान और धर्म दोनों ही मानव जीवन के सञ्चालन में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। जिस प्रकार हमारे ऋषि, मुनि कंदराओं और गुफाओं में एकांत में रहकर, ब्रह्म की खोज में लगे रहे और मनुष्य को साधना और अनुशासन के द्वारा ब्रह्म तक पहुँचने की मार्ग बताया; वहीं वैज्ञानिकों ने भांति भांति के अनुसन्धान करके मनुष्य की जीवन-यात्रा के उपकरण बनाकर, इस यात्रा का सुगम बनाया। किन्तु आज वैज्ञानिक अविष्कारों के कारण मानव जीवन में जो सुविधाएँ मिल रही हैं, मनुष्य उसी में खोकर, ईश्वर और धर्म दोनों को भूलता जा रहा है। आज भौतिकवाद ने हमारी शांति छीन लिया है। यह इसलिए हो रहा है कि हम जीवन के वास्तविक मूल्यों को पहचान नहीं रहे और कुछ उपकरणों के अधीन होकर अपने को धन्य समझ रहे हैं।
मैं वेदों के ज्ञान के महत्व के विषय में
बात कर रहा था, तभी विज्ञान के एक विद्यार्थी ने मुझसे प्रश्न कर दिया - फिर तो आज
भी गुरुकुल व्यवस्था ही होनी चाहिए और वेद ही पढ़ाया जाना चाहिए। मैंने उससे पूछा, क्या
गुरुकुल व्यवस्था आज नहीं है? जिसे बोर्डिंग स्कूल कहते हो वह क्या है? आई. आई. टी.
या मेडिकल आदि संस्थाओं में रहकर, विद्यार्थी जो विद्या अर्जित करते हैं, वह गुरुकुल
का रूप नहीं है? शोध करने वाले छात्र, छात्रावास में रहकर अपना शोध पूरा करते हैं,
वह गुरुकुल नहीं है? आज के गुरुकुल और तब के गुरुकुल में विषय और सोच का अंतर है। विज्ञान,
आयुर्विज्ञान अथवा इंजीनियरिंग आदि सभी का मूल वेदों में है। सभी विषय वेदों से ही
संस्फुटित हुए हैं, विज्ञान भी। ये वैज्ञानिक अविष्कार एकाएक नहीँ आ गए। आज जो ज्ञान
प्राप्त कर रहे हो, वह हजारों वर्ष की शोध और साधना के पश्चात् इस रूप में उपलब्ध है।
वेद को मात्र मूल रूप में देखना संकीर्ण दृष्टिकोण का परिचायक है;
उसे समग्र रूप से देखना होगा, उस पर खड़े ज्ञान के विशाल पर्वत भी देखो, जिसका शीर्ष
आज का विज्ञान है। इस अंतराल में नए अविष्कारों के साथ, शिक्षा का
व्यवसायीकरण हुआ और गुरुओं के सम्मान का लोप हुआ है। शिक्षा का
व्यवसायीकरण हो जाने के कारण, विद्यालयों को दुकान समझा जाने लगा है। अब मशीनों का
युग है, हो सकता है कुछ काल के पश्चात् विद्यालयों की भी आवश्यकता समाप्त हो
जाय और विद्यार्थी इ-विद्या के रूप में घर पर ही शिक्षा ग्रहण करें। हम लोग
आज जो भोजन कर रहे हैं, वह भी हजारों वर्ष के शोध का परिणाम है।
कितने ही लोग विषाक्त पदार्थ खाकर प्राणों को त्याग दिया होगा, तब हम इस
निश्चय पर पहुंचे होंगे कौन से पदार्थ भोज्य हैं और कौन से नहीं। तुम जिस रूप में
आज विज्ञान के छात्र हो जनमते ही तो नहीं हो गए !
विज्ञान है मनुष्य की अनुपम देन,
धर्म को देने वाला स्वयं भगवान है।
विज्ञान नैतिकता का क्षय करता है।
विज्ञान भ्रष्ट आचरण तय करता है।
भौतिक साधनों को उपलब्ध कराता,
धर्म ही परमेश्वर की भक्ति देता है।
धर्म ही कर्म और मर्म सिखलाता,
धर्म अनैतिकता से विरक्ति देता है।
विज्ञान सुविधा के साधन लाता है।
मानवीय गुणों को धर्म सिखाता है।
विज्ञान के बिना जीवन संभव है,
धर्म जीवन पर्यन्त संग निभाता है।
अपराधी पाये दंड, पापी प्रभु का शाप।
भगवान के यहाँ कभी, होता नहीं अंधेर।
बच लो चाहे दंड से, करके तुम व्यभिचार।
पाओगे नित पाप का, आत्मा से दुत्कार।
- (१) राज्य, किसी नागरिक के विरुंद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।
- संविधान का अनुच्छेद २५ धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है तो वहीँ अनुच्छेद २६ धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
- संविधान के अनुच्छेद २५ : अंतःकरण की और धर्म की अबाध रूंप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता -
- (1) लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंत:करण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूंप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार होगा।
- (2) इस अनुच्छेद की कोई बात किसी ऐसी विद्यमान विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या राज्य को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी जो-
- (क) धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निर्बन्धन करती है;
- (ख) सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए या सार्वजनिक प्रकार की हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गों और अनुभागों के लिए खोलने का उपबंध करती है।
- स्पष्टीकरण 1-कृपाण धारण करना और लेकर चलना सिक्ख धर्म के मानने का अंग समझा जाएगा।स्पष्टीकरण 2-खंड (2) के उपखंड (ख) में हिंदुओं के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत सिक्ख, जैन या बौद्ध धर्म के मानने वाले व्यक्तियों के प्रति निर्देश है और हिंदुओं की धार्मिक संस्थाओं के प्रति निर्देश का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा।
- यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यह अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता तो देता है किन्तु राज्य को किसी धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप के विषय में विधि बनाने पर कोई रोक नहीं है। दूसरा इस अनुच्छेद में हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं के प्रति निर्देश सिक्ख, जैन और बौद्ध पर भी लागू होगा किन्तु इस्लाम इसमें सम्मिलित नहीं है।
- अनुच्छेद २६ धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस अनुच्छेद के अनुसार लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए, किसी भी धार्मिक संप्रदाय को धार्मिक प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का, धर्म विषयक कार्यों के प्रबंध करने का, संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का, और संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का, अधिकार होगा।
- अनुच्छेद २८ कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में कुछ अंकुश लगाता है और राज्य-निधि से पोषित किसी शिक्षा संस्था में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबन्ध लगाता है। यह राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य-निधि से सहायता पाने वाली शिक्षा संस्था में किसी व्यक्ति को धार्मिक शिक्षा में भाग लेने के लिए या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के लिए बाध्य करने से भी रोकता है। किन्तु अनुच्छेद ३० के अंतर्गत हिन्दू धर्म के साथ भेद करता है। यह अनुच्छेद, अल्पसंख्यकों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और अधिकार का समर्थन करता है और धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक-वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार देता है। अनुच्छेद ३० यह भी सुनिश्चित करता है कि शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक-वर्ग के प्रबंध में है।
- धर्मनिरपेक्ष संविधान का अनुच्छेद ३० अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थानों को ‘प्रशासन’ का पूर्ण अधिकार देता है, जिनमें सरकार किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकती और न ही प्रभार अपने हाथ में ले सकती है। जबकि बहुसंख्यक, जो कि भारत में मात्र हिन्दू ही है, की संस्थाओं में सरकार का पूर्ण हस्तक्षेप हो सकता है। इस अनुच्छेद के दुरुपयोग और इसकी आड़ में देश को इस्लामीकरण की ओर अग्रसारित करने के प्रयास को रोकने के विषय में कानून मौन प्रतीत होता है। यह भी विडम्बना ही है कि विपुल आय अर्जित करने वाले, कई हिन्दू मंदिरों या संस्थाओं को सरकार ने कानून बनाकर अपने हाथ में ले रखा है, किन्तु हिन्दू धर्म के लिए सरकार का कुछ करना संविधान के धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध हो जाता है।
- भारतीय दंड संहिता की धारा २९५ से २९८ के अनुसार :
- १. किसी उपासना के स्थान को या व्यक्तियों के किसी वर्ग द्वारा पवित्र मानी गई किसी वस्तु को नष्ट, क्षतिग्रस्त या अपवित्र करना या अपमानित करना; २. धार्मिक उपासना या धार्मिक संस्कारों में वैध रूप से लगे हुए किसी समूह में विघ्न डालना; ३. किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से उसकी श्रवणगोचरता में कोई शब्द उच्चारित करना या कोई ध्वनि करना, या कोई संकेत करना, या कोई वस्तु रखना; दंडनीय अपराध हैं।
- भारतीय दंड संहिता की धारा ५०८ के अनुसार, जो कोई किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करता है या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करता है कि यदि वह उसके द्वारा कही बात को न करेगा, दैवी अप्रसाद का भाजन हो जाएगा, या बना दिया जाएगा तो वह दंड का भागी होगा। इसी प्रकार जादू-टोना एवं अंधविश्वासों पर रोक लगाने के लिए कई राज्यों ने अलग कानून बनाये हैं।
- जनप्रतिनिधित्व कानून : उच्चतम न्यायलय ने कहा है कि कोई उम्मीदवार धर्म, भाषा, समुदाय और जाति का प्रयोग चुनाव में वोट माँगने के लिए नहीं करेगा, यदि ऐसा करता है तो ये जनप्रतिनिधित्व कानून के अंतर्गत भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि न केवल प्रत्याशी बल्कि उसके विरोधी उम्मीदवार के धर्म, भाषा, समुदाय और जाति का प्रयोग भी चुनाव में वोट माँगने के लिए नहीं किया जा सकेगा। चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है। धर्म के आधार पर वोट माँगना संविधान की भावना के विरुद्ध है। जनप्रतिनिधियों के क्रिया कलाप भी धर्मनिरपेक्ष आधार पर ही करने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रत्याशी और उसके विरोधी एजेंट की धर्म, जाति और भाषा का प्रयोग वोट माँगने के लिए कदापि नहीं किया जा सकता।
- किन्तु वास्तविकता इससे हट कर है। विगत कई चुनावों में देखा गया है कि धर्म तो क्या अब जातिगत आधार पर भी वोट मांगने में कोई परहेज नहीं। चुनाव के धर्मनिरपेक्ष कानून चाहे बने हों, परन्तु उन्हें लागू करने में सरकार अक्षम दिखती है। राजनितिक नेताओं द्वारा जातिगत विभेद बड़े स्तर पर पैदा कर दिया गया है। कई बार, राजनितिक पार्टियां धर्म के शीर्षस्थ मंच से धर्म के अनुयायियों को उक्त पार्टी को वोट देने की घोषणा करवाते देखे गए हैं। संविधान एक ओर तो धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, दूसरी ओर अल्पसंख्यक और जातिगत प्रावधान हैं। इन प्रावधानों को राजनीतिज्ञ अपने हितों के अनुसार प्रयोग करते रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता की बात केवल हिन्दू राजनीतिज्ञ ही करते हैं। अन्य धर्मों के अधिकतर नेताओं के लिए राजनीति से बढ़कर उनका धर्म है, क्योंकि उनका हित उसी में निहित है।
- भारतीय संविधान, बिना धर्म का विचार किए सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है। संविधान का अनुच्छेद 44 के अनुसार 'राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।' जबकि समान नागरिक संहिता के अंतर्गत भारतीय समाज को एकीकृत करने के प्रयासों का राजनीतिज्ञों द्वारा ही विरोध जाता रहा। भारतीय मुसलमानों द्वारा इसे अल्पसंख्यक समूहों की सांस्कृतिक पहचान को क्षीण करने के प्रयत्न के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार भारत में दोहरी विधि प्रणाली विद्यमान है : एक धर्मनिरपेक्ष कानून जो सबके लिए है और भारतीय मुसलमानों के लिए पृथक शरीयत कानून। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना "मुस्लिम पर्सनल लॉ" यानी भारत में शरीयत अनुप्रयोग अधिनियम, सुरक्षा और प्रयोज्यता लागू करने के लिए किया गया।
- भारतीय कानूनों के अनुसार ईश्वर या मंदिर भी एक व्यक्ति है। हमारे कानून में दो प्रकार के व्यक्ति हैं; एक प्राकृतिक रूप से जन्मा और दूसरा विधान द्वारा निर्मित। वैधानिक व्यक्ति में कंपनी के अतिरिक्त ट्रस्ट, मंदिर, देवता, मस्जिद, चर्च इत्यादि भी सम्मिलित हैं। मंदिर में स्थापित देवी देवता की प्रतिमा, वैधानिक व्यक्ति के रूप में वह सभी कार्य कर सकती है, जो एक व्यक्ति वैधानिक रूप से कर सकता है। इसे संपत्ति रखने, देख-भाल करने, क्रय या विक्रय करने इत्यादि के सभी अधिकार उपलब्ध हैं। मंदिर में स्थापित देवता एक वैधानिक व्यक्ति है; और उसके कानूनी अधिकार और अभिलाषाएं उसके प्रतिनिधि या प्रबंधक के द्वारा अभिव्यक्त की जा सकती है। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि देवता भी एक वैधानिक व्यक्ति है और जिस प्रकार किसी अव्यस्क व्यक्ति का संरक्षक उसका अभिभावक होता है, उसी प्रकार मंदिर या उसमें स्थापित देवी देवता का संरक्षक उसका पुजारी या प्रबंधक हो सकता है। उत्तराखंड उच्च न्यायलय ने गंगा, यमुना जैसी नदियों को भी जीवित व्यक्ति के रूप में माना है। भारत में हिंदू देवी-देवताओं को पहली बार सन 1888 में ब्रिटिश काल में वैधानिक व्यक्ति माना गया था। हिंदू देवी-देवताओं को स्कूल, कॉलेज आदि चलाने और ट्रस्ट बनाने का भी कानूनी अधिकार मिला है। इसी प्रकार श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर या धार्मिक स्थलों पर बनी प्रतिमा को दान की गयी संपत्ति उस देवता की संपत्ति मानी जाती है, जिसे धार्मिक स्थल, ट्रस्ट या प्रबंधक उसे संभालता है।
चूकि संविधान लिखने में हिन्दुओं का बाहुल्य था, यह मान लिया गया कि उनका वर्चस्व सदा बना रहेगा और हिन्दुओं के मर्म की उपेक्षा करने में किसी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुमत में होने के पश्चात् भी स्वतंत्रता के बाद से हिन्दू-धर्म को सतत संघर्ष करना पड़ रहा है। अंग्रेजी और पाश्चात्य सभ्यता का वर्चस्व बढ़ता रहा। दूसरे धर्म सशक्त होते रहे। क्योंकि उन्हें संवैधानिक सुरक्षा और प्राथमिकता दी गयी। हिन्दुओं को भी संवैधानिक समानता मिलनी चाहिए और संविधान के अनुच्छेद ४४ का पालन होना चाहिए। शासन द्वारा अल्पसंख्यकों को सुरक्षा तो मिले किन्तु बहुसंख्यकों का तिरष्कार न हो। केंद्रीय हिन्दू संगठन में कानूनी प्रकोष्ठ होना चाहिए जो धर्म से सम्बंधित कानून पर दृष्टि रखे और धर्म की रक्षा हेतु कानूनी मदद करे।
- हिन्दू संगठन और संस्थाएं
- धर्म को एक संस्था के रूप में भी देखा जा सकता है क्योंकि इसका निर्माण समाज ने किया है और बहुत से अनुयायी एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य करते हैं। धार्मिक क्रियाएं समाज से चलती हैं। संगठन के बिना धार्मिक क्रियाएं न तो व्यवस्थित ढंग से चल सकती हैं न ही प्रबंध के सिद्धांत सुचारु रूप से लागू हो सकते हैं। धार्मिक संगठनों में भी समन्वय, निर्देशन, योजना, प्रचार, नियंत्रण, प्रोत्साहन आदि कार्यों की आवश्यकता होती है। संगठन से परस्पर सम्बन्ध और समुचित वातावरण बनता है। संगठन से मनोबल को बढ़ावा, विकास, रचनात्मक विचारधारा, व्यवस्था का निर्माण, साधनों का उपयोग, संचार, सामूहिक प्रभाव आदि का लाभ मिलता है। वैसे तो विभिन्न उद्देश्यों को लिए हुए हिन्दू धर्म से सम्बंधित हजारों संस्थाएं कार्यरत हैं, परन्तु आवश्यकता है एक ऐसी केंद्रीय संस्था की, जो हिन्दू धर्म और समाज को समग्र रूप से साथ लेकर चले। जिससे समय समय पर पूरे हिन्दू संप्रदाय को मार्गदर्शन मिलता रहे।
- हिन्दू धर्म में संगठनात्मक ढांचा और प्रबंध के सिद्धांत लचर ही दिखते हैं। यदि संगठनात्मक ढांचा दिखता है तो केवल क्षेत्रीय और संस्थागत स्तर पर, जो कि हजारों की संख्या में हैं। सभी हिन्दुओं को एक ध्वज के तले रखे, ऐसा कोई संगठन नहीं दिखता। हिन्दू धर्म में बहुत से संगठन, मठ, पीठ, अखाड़े, ट्रस्ट, संस्थाएं आदि हैं जो स्वतंत्र रूप से अपने बनाये नियमों के अनुसार काम करते हैं। कोई ऐसा केंद्रबिंदु नहीं दिखता जहाँ से सबके तार जुड़ते हों। धर्म के सिद्धांत तो सभी के एक हैं पर कार्य प्रणाली एक नहीं। हिन्दू-धर्म, आदि-धर्म होने के कारण बहुत वृहत और विस्तृत भी है। यह धार्मिक ग्रंथों में दिए सिद्धांतों को लेकर आगे बढ़ता रहा। हिन्दू धर्म का कोई निश्चित संरक्षक नहीं रहा है, इस कारण से निर्देशों में एकाकता व एकरूपता नहीं है। धार्मिक ग्रन्थ और देवी देवता तो समान हैं, किन्तु पूजा पद्धति में भिन्नता मिलती है। कोई एक ऐसा संगठन अवश्य होना चाहिए जो सभी हिन्दू संस्थाओं को एक सूत्र में पिरोये रखे, ताकि विभिन्न इकाइयों में पारस्परिक समन्वय बना रहे। कई अन्य धर्मों में ऐसे संगठन देखने को मिलते हैं: जैसे - सिक्ख शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति, द वर्ल्ड फैलोशिप ऑफ बुद्धिस्ट्स, आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (पूरे विश्व में शाखाएं), इस्लामिक सम्मलेन संगठन (जिसे २४ देशों के राष्ट्राध्यक्षों का समर्थन प्राप्त है)। इन धार्मिक संगठनों की इकाईयां एक नियमावली से चलती हैं। एक सार्वभौमिक हिन्दू संगठन भी होना चाहिए जो विश्व में हिन्दुओं को संगठित रखने के अतिरिक्त उनकी हर प्रकार की समस्या का निदान करे, हिन्दू धर्म की शिक्षा का प्रबंध करे और धर्म का प्रचार प्रसार करे।
- अपने पृथक उद्देश्यों जैसे मंदिर निर्माण व प्रबंधन, सामाजिक कार्य, धार्मिक शिक्षा आदि के अंतर्गत बहुत सी संस्थाएं, ट्रस्ट, संगठन, अखाडा, आश्रम, मठ आदि हैं। कुछ प्रमुख संस्थाएं निम्न हैं :
- विश्व हिन्दू परिषद् : हिंदू समाज को मजबूत करने, हिंदू जीवन दर्शन और आध्यात्म की रक्षा, संवर्द्धन और प्रचार करने; तथा विदेशों में रहनेवाले हिंदुओं से तालमेल रखने, हिंदू और हिंदुत्व की रक्षा के लिए उन्हें संगठित करने और मदद करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दू संगठन की स्थापना हुई। आगे यह तय किया गया कि यह गैर-राजनीतिक संगठन होगा और राजनीतिक पार्टी का अधिकारी विश्व हिंदू परिषद का अधिकारी नहीं होगा। इसके अतिरिक्त परिषद् संस्कृत भाषा की शिक्षा व विकास, वेद विद्या का शोध व विकास, संस्कृत में विज्ञान की शिक्षा पर बल, संस्कृत की पुस्तकों का प्रकाशन, शिविर के द्वारा पुरोहिती प्रशिक्षण, दिल्ली में प्रति वर्ष अखिल भारतीय संस्कृत व्यव्हार शिविर का आयोजन, शोध पत्र 'अभिव्यक्ति' का प्रकाशन, संस्कृत कवि सम्मेलन, संस्कृत सेवकों द्वारा संस्कृत की रक्षा की शपथ आदि कार्य भी करता है। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, भारत संस्कृत परिषद् इसकी शाखाएं हैं जो व्याकरण, छंद शास्त्र, साहित्य दर्शन, भाषा शिक्षण आदि का प्रशिक्षण देती हैं। विश्व हिन्दू परिषद् का नारा है : धर्मो रक्षति रक्षतः (अर्थात धर्म के रक्षा से ही हमारी रक्षा है) यह नारा परिषद के प्रतीक चिन्ह का अंग है।
- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ : विश्व हिन्दू परिषद् को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अनुवांशिक अंग माना जाता है। संगठन से ही शक्ति है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उद्देश्य है हिन्दू समुदाय को एकजुट रखना। संगठन भारतीय संस्कृति और चारित्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए तथा आदर्शों को स्थापित करने के कार्य करता है और बहुसंख्यक हिंदू समुदाय को सुदृढ़ करने के लिए हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार करता है। अतः प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है की वह हिन्दू समाज के प्रति समर्पित हो। संगठित हो के बड़े से बड़ा कार्य किया जा सकता है। राष्ट्र का भाग्योदय हिन्दू युवाओं के धर्म और राष्ट्र के प्रति समर्पण से ही होगा, अतः सभी हिन्दुओं के संगठित रहने की आवश्यकता है।राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उद्देश्य धार्मिक न होकर राष्ट्रीय है।
- हिन्दू जनजागृति समिति : एक हिंदूवादी संगठन है जो पूरे विश्व में हिन्दुओ के मानवाधिकारों के लिए कार्य करती है। इस संस्था का कथन है कि वह "सभी हिन्दुओं की सभी बाधाओं को तोड़कर उन्हें एकजुट करने के लिए एक साझा मंच के रूप में खड़ा है"।
- रामकृष्ण मिशन : रामकृष्ण मिशन की स्थापना सन् १८९७ में स्वामी विवेकानंद ने की। इसका मुख्यालय कोलकाता के निकट बेल्लोर में है। इस मिशन की स्थापना के केंद्र में वेदांत दर्शन का प्रचार-प्रसार है। रामकृष्ण मिशन दूसरों की सेवा और परोपकार को मानता है।
- हिन्दू ऐक्य वेदी : भारत के केरल प्रदेश में सक्रिय एक हिन्दू संगठन है। इसका प्रमुख उद्देश्य हिन्दू संगठनों को एकत्र करना है।
भारत सेवाश्रम संघ : एक आध्यात्मिक लोकहितैषी संगठन है। सर्वांगीण राष्ट्रीय उद्धार इसका मुख्य उद्देश्य और संपूर्ण मानवता की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति इसका सामान्य लक्ष्य है। संघ का उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय जीवन का पुनः संगठन और पुनर्निर्माण सार्वलौकिक आदर्शो और सनातन धर्म के सिद्धांतों के आधार पर करना है।
कई धर्मों ने अपना प्रसार हिंसा के सहारे किया। पहले हिन्दुकुश पर्वतमाला,
अफगानिस्तान से लेकर कम्बोडिया तक हिन्दू धर्म का ही वर्चस्व था। कम्बोडिया में
अंकोरवाट मंदिर, जो भगवान विष्णु का मंदिर है, हिन्दुओं का सबसे बड़ा मंदिर है; जिसे बाद में
बौद्धों ने अपने अधीन ले लिया और उसका नाम विष्णु बुद्धा मंदिर रख दिया। अंग्रेजों के शासनकाल में बहुत से हिन्दुओं का ईसाई धर्म में धर्मान्तरण कराया गया। इसी
प्रकार पश्चिम से मुसलमानों ने भी भारत पर कई बार आक्रमण किया और हिन्दुओं को
मृत्यु के घाट उतारा। भारत में मुस्लिम शासकों के अत्याचार ने हिन्दुओं के मन
में इस्लाम के प्रति घोर घृणा भर दी। हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले मुसलमान
शासकों की लम्बी सूची है। चंगेज खान, गजनवी, खिलजी, लोदी, बाबर, हुमायूँ,
नादिरशाह, तैमूर लंग आदि ने कई लाख हिन्दू मरवा दिए; औरंगजेब ने अकेले लाखों हिंदू
मरवाये। इनका धर्म ही लूट और हत्या था। इन्होंने भारतीय हिन्दुओं पर अत्याचार को
ही धर्म समझ लिया। औरंगजेब ने बहुत से हिन्दुओं को या तो मुसलमान बना दिया या मरवा
दिया। हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया कि आर्थिक बोझ से दबकर वे मुसलमान बनें। इन
राजाओं की करतूतों के कारण आक्रमण, अधीनता, अत्याचार और लूट आदि; मुसलमानों के अभिन्न अंग हो गए।
दुनिया में पैदा किया, जीव सभी भगवान।
मिटाये उसकी कृति को, होता वो शैतान।
धर्म के प्रति जो कट्टरपन है,
दिखावा और अक्खड़पन है।
आस्था से अधिक स्वार्थ, ढोंग;
सत्ता हथियाने का प्रयत्न है।
धर्म श्रद्धा और विश्वास से चलता है, धर्म तो ईश्वर के प्रताप
से चलता है। भय और आतंक से कोई भी धर्म कुछ समय तक चाहे चल जाए
किन्तु सनातन नहीं हो सकता। रावण के भय के कारण, उसके अत्याचारों और उसके
राज्य में पनपे कुरीतियों के विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठा सकता था। बड़े से बड़ा विद्वान भी
उसकी अनुमति के बिना संस्कृति में सुधार की बात नहीं कर सकता था, परिणाम स्वरुप उन
सभी का रावण के साथ ही अंत हो गया। विभीषण उन कुरीतियों को दूर करना चाहता था राम
से शक्ति मिलते ही वह अपने कार्य में सफल हो गया।
जैन धर्म : हिन्दू धर्म और जैन धर्म में बहुत सी समानताएं हैं। जैन धर्म के २४ तीर्थंकरों ने मनुष्य के रूप में जन्म लिया। जैन संप्रदाय, जैन धर्म की उत्पत्ति अपने प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव से मानते हैं, जिनका जन्म भी अयोध्या में हुआ। महावीर उनके चौबीसवें तीर्थंकर हैं। जिस प्रकार हिन्दुओं में मोक्ष के छः दर्शन बताये गए हैं जैन धर्म में कर्म से छुटकारा पाने के लिए और निर्वाण के लिए सही विश्वास, सही ज्ञान और सही आचरण बताते हैं, इन्हें त्रि-रत्न कहा जाता है। जैन धर्म को भी मुगलों की प्रसारवादी निति का शिकार होना पड़ा, और उनके कई मंदिर और मठ मुगल काल में तोड़े गए। जैन धर्म के सिद्धांत हिन्दू धर्म से मिलते जुलते हैं। जैन धर्म शांति-प्रिय और अहिंसावादी धर्म है, जो हिन्दुओं का भी सिद्धांत है।
बौद्ध धर्म : बौद्ध, धर्म और कर्म के सिद्धान्तों को मानते हैं। त्रिपिटक बौद्ध धर्म का ग्रन्थ है। बौद्ध धर्म के सिद्धान्त उपनिषदों से ही निकले हैं। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्म सन ५६३ ईसा पूर्व लुम्बिनी नामक वन में हुआ। बोध-गया से ज्ञान प्राप्त कर वे सारनाथ गए और वहां उन्होंने पांच ब्राह्मणों को धर्मोपदेश दिया। धीरे धीरे अनुयायी बढ़ते गए और मगध नरेश बिन्दुसार भी बुद्ध के अनुयायी बन गए। धर्म के प्रचार प्रसार हेतु उन्होंने कई स्थानों का भ्रमण किया। भगवान बुद्ध के अनुसार धर्म जीवन की पवित्रता बनाए रखना और तथ्य-ज्ञान में पूर्णता प्राप्त करना है, साथ ही निर्वाण प्राप्त करना तथा तृष्णा का त्याग करना है। बुद्ध ने दुःख का कारण तृष्णा को माना और बताया तृष्णा के समूल नाश से दुःख-निरोध संभव है। वे सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध थे, उन्होंने ने कहा कि लोगों का मुल्यांकन जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होना चाहिए, कर्म ही प्राणियों को अधम और उत्तम बनता है। किसी भी जाति का व्यक्ति सत्कर्म से मोक्ष का अधिकारी होगा। पहले पूर्व में म्यांमार से लेकर कम्बोडिया तक हिन्दू धर्म ही था। सुर्यवरणम वंश द्वारा बनवाया विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर कम्बोडिआ का अंकोरवाट मंदिर है। कालांतर में बौद्ध अनुयायियों का अधिकार होने के पश्चात्, इसका नाम विष्णु-बुद्धा मंदिर रख दिया गया।
सिक्ख धर्म : सिक्ख धर्म पंद्रहवीं सदी में हिन्दू धर्म की संत परंपरा से निकला एक पंथ है, जिसका आरम्भ गुरु नानक देव जी द्वारा किया गया। गुरुनानक देव का जन्म १४६९ ईसवी में हुआ था। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, जर्जर रूढ़ियों और पाखण्डों को दूर करते हुए; प्रेम, सेवा, परिश्रम, परोपकार और भाई-चारे की दृढ़ नीव पर सिख धर्म की स्थापना की। सिखों के दस सतगुरु माने जाते हैं, इनमें गुरु नानक देव सबसे पहले गुरु हैं। गुरु नानक देव के अतिरिक्त शेष नौ गुरु हैं - गुरु अंगददेव, गुरु अमरदास, गुरु रामदास, गुरु हरगोविंद, गुरु अर्जुनदेव, हरिराइ, गुरु हरकिशन, गुरु तेग बहादुर और दसवें गुरु गुरु गोविन्द सिंह। सिक्ख गुरु उदारवादी दृष्टिकोण रखते थे और सिक्ख धर्म में सभी धर्मों की अच्छाइयों को समाहित किया। उनका मुख्य उपदेश था कि ईश्वर एक है, उसी ने सबको बनाया है। सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं और ईश्वर के लिए सभी समान हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि ईश्वर सत्य है और मनुष्य को अच्छे कार्य करने चाहिए ताकि परमेश्वर के यहाँ उसे लज्जित नहीं होना पड़े। सिक्ख एक ही ईश्वर को मानते हैं जिसे 'एक ओंकार' कहते हैं। सिक्ख धर्म का धार्मिक ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब है, जिसमें गुरुओं के अतिरिक्त सूरदास, शेख फरीद, संत कबीर, रामानंद, परमानन्द, नामदेव, भीखन, रविदास इत्यादि कई महान संतों की वाणी है। सिक्ख धर्म ने मानवतावादी
दो नदियों के संगम की भांति मिल,
मुख्य धारा में क्यों नहीं बहते हो?
खंड २
हिन्दू-धर्म की कुछ सूक्तियां और सुविचार
वेद और हिन्दू-धर्म के विभिन्न ग्रंथों से उद्धृत कुछ सूक्तियां, सुविचार और नीतिगत बातें यहाँ दोहों के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये सूक्तियां सम्पूर्ण मानव जाति की अमोल निधि हैं; अमिट और अमर हैं, जो जीवन पर्यन्त हमारा मार्ग दर्शन करती हैं।
१ अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ: अर्थ– अप्रिय किंतु परिणाम में हितकर हो ऐसी बात कहने और सुनने वाले दुर्लभ होते हैं।
प्रेम पूर्वक सब सुनें, चिकनी चुपड़ी बात
अप्रिय सुनना है कठिन, चाहे हित हो साथ
2. 'अतिथि देवो भव' अर्थ– अतिथि देव स्वरूप होता
है।
घर पर आये अतिथि का, करना तुम सत्कार
ना जाने किस रूप में, मिल जाये करतार
4. 'अहिंसा परमो धर्म:।' अर्थ– अहिंसा परम धर्म है।
सभी जीवों की रक्षा, सबसे उत्तम कर्म।
अहिंसा है मनुष्य का, जगत में परम धर्म।
12. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। अर्थ– जननी और जन्मभूमि और
स्वर्ग से भी बड़ी होती है।
माँ और मातृभूमि दो, पृथ्वी पर हैं स्वर्ग।
इनका कृत-कृत्य रहना, मनुज धर्म उत्कर्ष।
7. असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय। अर्थ– मुझे असत् से सत् की ओर ले जायें, अंधकार से प्रकार की ओर ले जायें।
अंधकार हरना सदा, करना नित्य प्रकाश।
असत्य से दूर भगवन!, दिखा सत्य की राह।
6. 'आचार परमो धर्मः।' अर्थ– आचार ही परम धर्म है।
आदमी का परम धर्म, है उत्तम आचार।
मनुष्य का आचार ही, दर्शाता संस्कार।
22. परोपकाराय सतां विभूतय:। अर्थ– सज्जनों की विभूति (ऐश्वर्य) परोपकार के लिए है।
परोपकार के निमित्त, सज्जनों की विभूति।
परमार्थ में दें सहज, स्वार्थ की आहूति।
''ईशावास्यमिदं सर्वं'' अर्थ– संपूर्ण जगत् के कण-कण में ईश्वर व्याप्त है।
विवेक बिना नहीं मिले, ढूंढे भी दिन रात।
ईश्वर का अन्तः में, कण कण में है वास।
स नः पर्षद् अतिद्विषः ईश्वर हमें द्वेषों से पृथक कर दे।
ईश्वर मेरे मन में, भरे सद्भाव पूर।
सप्रेम मैं सबसे मिलूं, द्वेषों से हो दूर।
यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।। जहां परमेश्वर की ज्योति है वहां सदा ही कल्याण है।
जहाँ ईश्वर की कृपा, वहां सदा कल्याण।
हरि की इच्छा के बिना, चले वायु ना प्राण।
स एष एक एकवृदेक एव ।। वह ईश्वर
एक और सचमुच एक ही है।
ईश्वर तो बस एक है, रचने वाला सृष्टि।
वही धूप-प्रकाश करे, होय उसी से वृष्टि।
*10) एको विश्वस्य भुवनस्य राजा ।। वह सब लोकों का एक ही स्वामी है।
सब लोकों का राजा, त्रिभुवन स्वामी एक।
सब कुछ करता है वही, सबकी सोचे नेक।
मा गृधः कस्यस्विद्धनम् अर्थ–
'किसी के भी धन का लोभ मत करो।'
धन पराया देखकर, ना करना तुम लोभ।
मन में तृष्णा बैठकर, देगी अतिशः क्षोभ।
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुख भागभवेत।
प्रभु रखना सबको सुखी, सब हों स्वस्थ निरोग।
दुखी ना होवे कोई, रम्य दिखे हर कोय।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्। र्थ– माता पिता की भली प्रकार से सेवा करनी चाहिये।
माता पिता की सेवा, करना भली प्रकार।
मिलेगी मन की शांति, बदले में उपकार।
9. उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत अर्थ– हे मनुष्य! उठो, जागो और श्रेष्ठ महापुरुषों को पाकर उनके द्वारा परब्रह्म परमेश्वर को जान लो।
उठो मनुष्य ग्रहण करो, श्रेष्ठ-जन सत्संग।
ज्ञान उत्तम प्राप्त कर, सीखो जीवन ढंग।
प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं। तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।
प्रथम आश्रम में विद्या, द्वितीय में ना धन।
तृतीय में न यश अर्जित, चतुर्थ करे क्या जन?
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च। रुग्णस्य चौषधं मित्रं धर्मो मृतं मृतस्य च।
विद्या, मित्र प्रवास की, घर में पत्नी मीत।
रोगी का मित्र औषधि, मृत का धर्म पुनीत।
जीवेम शरद: शतम्। अर्थ– हम सौ वर्ष तक देखने वाले और जीवित रहने वाले हों।
होय न्यूनतम सौ वर्ष, सभी जनों की आयु।
रुचिकर भोजन सुलभ हो, शुद्ध मिले जलवायु।
तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते। अर्थ–
तेजस्वी पुरुषों की आयु नहीं देखी जाती है।
आयु न देखो मनुज की, देखो गुण अरु तेज।
स्वर्ण पुराना हो मगर, रखते लोग सहेज।
31. वसुधैव कुटुंबकम अर्थ– सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार
है।
सम्पूर्ण धरा को समझ, सदा एक परिवार।
जो भी संकट में मिले, करना तुम उपकार।
28. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवताः अर्थ– जिस कुल में स्त्रियां सम्मानित होती हैं, उस कुल
से देवगण प्रसन्न होते हैं।
जिस कुटुम्ब में हो सदा, नारी का सम्मान।
देवी देवता आ स्वयं, होते विराजमान।
30. लोभः पापस्य कारणम् अर्थ– लोभ पाप का कारण
है।
अनेक पाप का कारण, जग में होता लोभ।
व्यग्र रखता मनुष्य को, मन को देता क्षोभ।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महानरिपु:। (नीतिशतकम्)
अर्थ– आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला उसी का
घोर शत्रु है।
शत्रु महान मनुष्य का, आलस को तू मान।
कर्म किये बिन सुख नहीं, शिला लेख तू जान।
वाग्भूषणं भूषणम्। अर्थ– वाणी रूपी भूषण (अलड़्कार)
ही सदा बना रहता है, कभी नष्ट नहीं होता।
उत्तम वाणी जगत में, रत्नों की है खान।
संतृप्त होता श्रोता, बन जाते सब काम।
16. दीर्घसूत्री विनश्यति। अर्थ– प्रत्येक कार्य में अनावश्यक विलंब करने वाला नष्ट होता है।
होय बिगाड़ा काम का, किया जो करके देर।
उस वर्षा से लाभ क्या? सूख गया जब खेत।
17. न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्ष्यते। अर्थ– कम उम्र वाले व्यक्ति भी तप के कारण आदरणीय होते हैं।
न्यून उम्र का व्यक्ति भी, रखता उत्तम ज्ञान।
पाता है संसार में, सदैव समुचित मान।
18. न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य। अर्थ–
मनुष्य कभी धन से तृत्प नहीं हो सकता।
धन से होता है नहीं, मनुष्य कदापि तृप्त।
कराय धन की लालसा, पाप काम में लिप्त।
19. नास्तिको वेदनिन्दकः। अर्थ– वेदों की निन्दा करने
वाला नास्तिक है।
नास्तिक करता निंदा, वेद की कुछ न हानि।
वेद सदियों से तटस्थ, धरे धर्म के प्रान।
20. नास्ति मातृसमो गुरु। अर्थ–
माता के समान कोई गुरु नहीं।
गुरु के बिना ज्ञान मिले, जग में संभव नाहिं।
गुरु न कोई विद्यमान, जग में जननी मांहि।
21. नास्ति विद्या समं चक्षु। अर्थ्–
संसार में ब्रह्मविद्या के समान कोई नेत्र नहीं है।
विद्या सम संसार में, ना है कोई नैन।
ज्ञान भगाये उलझनें, जगमग मन की रैन।
33. विद्या विहीनः पशुः अर्थ– विद्याविहीन मनुष्य पशु के समान है।
मनुज पशु के समान है, विद्या धन से हीन।
हरेक कार्य में सदा, बन के रहता दीन।
34. विभूषणं मौनमपण्डितानाम् अर्थ– मूर्खों का मौन रहना
उनके लिए भूषण (अलड़्ंकार) है।
मूर्ख तभी तक सुन्दर, जब तक राखे मौन।
मुंह खोले ही बताये, परिचय - है वो कौन!
37. शीलं परम भूषणम्। अर्थ– यह शील बड़ा भारी आभूषण है।
शील और शालीनता, मनुज के अलंकार।
काम बने सर्वत्र ही, पाये वो सत्कार।
50. 'अत्यादर: शंकनीय:।' अर्थ– अत्यधिक आदर किया जाना शड़्कनीय है।
शंका से भरा होता, असीम मृदु व्यवहार।
चापलूस करता नहीं, प्रायोजन साकार।
58. अनतिक्रमणीया नियतिरिति। अर्थ– नियति अतिक्रमणीय होती है अर्थात् होनी नहीं टाला जा सकता।
नियति का जो लेख लिखा, कोय सके ना टाल।
होनी अपने समय पर, होती है हर हाल।
68. काले खलु समारब्धा: फलं बध्नन्ति नीतय:। अर्थ– समय पर आरंभ की गयी नीतियां सफल होती हैं।
आरम्भ किये समय पर, होते कार्य सफल।
ऋतु के गये बोने पर, उपजे न ठीक फसल।
69. क: कं शक्तो रक्षितुं मृत्युकाले। अर्थ–
मृत्यु समीप आ जाने पर कौन किसकी रक्षा कर सकता है।
कौन किसका रक्षक हो, आये मृत्यु समीप।
पेट फटना उसका भी, चिंतित मुक्ता सीप।
71. गरीयषी गुरो: आज्ञा। अर्थ–
गुरुजनों (बड़ों) की आज्ञा महान् होती है अत: प्रत्येक मनुष्य को उसका पालन करना चाहिए।
तात मातु और गुरु की, आज्ञा मानो नित्य।
श्रेष्ठ बनाती है सदा, मनुष्य को यह कृत्य।
72. गुर्वपि विरह दु:खमाशाबन्ध: साहयति। अर्थ– आशा का बन्धन विरह के कठोर दु:ख को भी सहन करा देता है।
सह लेता दुख विरह का, मनुष्य सभी कठोर।
देय बंधन आशा का, सह पाने का जोर।
76. चारित्र्येण विहीन आढ्योपि च दुगर्तो भवति। अर्थ– चरित्रहीन धनवान् भी दुर्दशा को प्राप्त होता है।
चरित्रहीन होय अगर, कितना भी धनवान।
पाता है वह अधोगति, धन होवे निष्काम।
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्। अर्थ– छाया के समान दुर्जनों और सज्जनों की मित्रता होती है।
जब तक पाय प्रकाश को, छाया चलती साथ।
स्वार्थ के कारण धरे, खल सज्जन का हाथ।
धैर्यधना हि साधव:। अर्थ– सज्जन लोगों का धैर्य ही धन होता है।
झंझटों के आने से, घबराये न सज्जन।
धैर्य को बनाता नित, सबसे बड़ा वह धन।
87. न हि सर्व: सर्वं जानाति। अर्थ–
सभी लोग सब कुछ नहीं जानते हैं।
सबको ही होता नहीं, सब बातों का ज्ञान।
कोई जो ज्ञाता मिले, पूछने में न हानि।
बलवता सह को विरोध:। अर्थ– बलशाली के साथा क्या विरोध?
शक्तिशाली से विरोध, गले लगाना फांस।
मुंह पर ही आकर पड़े, थूके जो आकाश।
बहुभाषिण: न श्रद्दधाति लोक:। अर्थ– अधिक बोलने वाले पर लोग श्रद्धा नहीं रखते।
मिले बड़ाई नाहिं कहुँ, बोले अति के बोल।
श्रद्धा से वंचित रहे, खोले पट्टी पोल।
सत्सड़्गति: कथन किं न करोति पुंसाम्। अर्थ– सत्संगति मनुष्यों की कौन-सी भलाई नहीं करती।
ईश्वर के भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है न जीत
सकता है।
सत्संग से होय सदा, मनुष्य का कल्याण।
ईश्वर के भक्तों की, होती कभी न हानि।
1) न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन ।। ऋ०१०/१५२/१
कोई मार नहीं सके, हरि का जो है मीत।
प्रभु की कृपा से कोई, सके उसे न जीत।
14) तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योः ।। अ० १०/८/४४*
आत्मा को जानने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।
जो मनुष्य जगत में, आत्मा को ले जान।
मृत्यु से वो ना डरे, खुद को ले पहचान।
मा प्रगाम पथो वयम् ।। अ० १३/१/५९* सन्मार्ग
से हम विचलित न हों।
धर्म सिखाता है हमें, पथ से ना हों भ्रष्ट।
सन्मार्ग पर यदि चलें, दूर रहें सब कष्ट।
उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति ।। ऋ० १०/११७/१* दानी का दान घटता नहीं।
दानी का घटता नहीं, धन, देने से दान।
उसकी झोली को स्वयं, भरता है भगवान।
त्वं जोतिषा वि तमो ववर्थ ।*(ऋ० १/९१/२२)
अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
हे ईश्वर! अन्तः को, कर दे प्रकाशमान।
फैला दे ज्योति ऐसा, मिटे सभी अज्ञान।
पितेव नः श्रृणुहि हूयमानः ।*(ऋ० १/१०४/९)
पुकारे जाने पर पिता की भाँति हमारी टेर सुनो।
जब भी तुम्हें पुकारूँ, मेरे हे भगवान।
मेरी टेर को सुनना, हरि हे! पिता समान।
यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।*(अथर्व०
७/१८/२) जहाँ परमेश्वर की ज्योति है, वहाँ कल्याण ही है।
ईश्वर की ज्योति जहाँ, होता सब कल्याण।
पथ में लगें पुष्प माहिं, कंटक या पाषाण।
40) मा प्र गाम पथो वयम् ।*(ऋ० १०/५७/१) हम वैदिक
मार्ग से पृथक न हों ।
धर्म-पथ से पृथक न हों, हे प्रभु देना शक्ति।
तनिक नहीं संकोच हो, करूँ तिहारी भक्ति।
45) अघमस्त्वघकृते ।*(अथर्व० १०/१/५) पापी को
दुःख ही मिलता है।
दुख पाता अति घोर है, जो करता है पाप।
धारण करके ही धरम, मिटता सब संताप।
58) हवामहे त्वोपगन्तवा उ -(२०/९६/५)* हे प्रभु ! हम तेरे समीप पहुँचने के लिए पुकार रहे हैं।
भक्त तुझे पुकार रहे, आने खातिर पास।
तू सभी का पालनहारा, पूरी करना आस।
48) उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।*(ऋ०
१०/१३७/१) हे विद्वानो ! गिरे हुओं को ऊपर उठाओ।
गिरे हुये को उठाओ, फिर से तुम विद्वान।
इसी लिए हरि ने दिया, विशेष तुमको ज्ञान।
2) द्यावाभूमी जनयन् देव एकः -(१३/२/२६)* आकाश-भूमि को पैदा करने वाला देव एक ही है।
भू, आकाश का उद्भव, करने वाला एक।
जग का स्वामी देव वो, लिखता सबके लेख।
79) वि द्विषो वि मृधो जहि -(अथर्व० १९/१५/१)*
हमारी द्वेषवृत्तियों और हिंसकवृत्तियों को नष्ट कर।
नष्ट करना तू हे प्रभु, जन की द्वेष प्रवृत्ति।
हिंसा भाव मन न आय, उपजे रति की वृत्ति।
81) मा त्वायतो जरितुः काममूनयोः -(अथर्व० २०/२१/३)*
हे प्रभु ! तेरी चाह वाले मुझ भक्त के मनोरथ को अपूर्ण मत रख।
तुझे चाहते हृदय से, तेरे जो भी भक्त।
उनके मनोरथ हे प्रभु! अपूर्ण कभी न रख।
82) न स्तोतारं निदे करः -(अ० २०/२३/६)* मुझ
स्तोता को निन्दा का पात्र मत कर।
तेरे लिए हे भगवन!, मुझ पे स्तुति मात्र।
विनती - कभी ना मुझको, कर निंदा का पात्र।
107) न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डिता ।।-(ऋ० १/८४/१९)*
हे ईश्वर !तुम्हारे सिवाय सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
तेरे बिन हे ईश्वर! जग में नाहीं कोय।
कर ऐसा उपकार तू, जीवों को सुख होय।
परोपकाराय
सतां विभूतय:।
परोपकार के निमित्त, जन्मे सज्जन
संत।
सज्जनों के प्रताप से, होय पाप का अंत।
मा पुरा जरसो मृथाः ।।-(अथर्व० ५/३०/१७) हे मनुष्य
! तू बुढ़ापे से पहले मत मर।
जी ले जगत में हे नर!, आनंद उमंग भर।
बुढ़ापा से पहले ही, तू नहीं जाना मर।
निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु ।।-(ऋ० ५/२/६)
निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।
दशा निंदक की ऐसी, सबसे निन्दित होय।
महिमा को जो बखाने, जग में पंडित सोय।
मातृ देवो भव। पितृ देवो भव। आचार्य देवो भव। अतिथि देवो भव।
मातु, पिता, गुरु अरु अतिथि, देवता के समान।
उनका जीवन स्वर्ग है, दें इन्हें सम्मान।
परोपकारार्थमिंद शरीरं - मानव शरीर परोपकार के लिए मिला है
शरीर मिला मनुष्य का, करने हेतु उपकार।
स्वयं के लिए जो जिए, जीवन है धिक्कार।
सहसा विंदधीत न क्रियां। अचानक से बिना सोचे समझे कोई काम नहीं करना चाहिए।
सोच समझ कर जो करे, होंय सफल सब काम।
औचक करने से कभी, सुचारु ना परिणाम।
संसर्गजा दोषगुणाः भवन्ति संगती से ही दोष और गुण होते हैं।
संगति से हैं उपजते, मनुष्य में गुण दोष।
क्रिया देखता और का, लेता है वो पोष।
हितं मनोहारी च दुर्लभं वचः भलाई के और मन को अच्छे लगनेवाले वचन कठिनाई से प्राप्त होते हैं।
मनोहारी, हितकारी, दुर्लभ होते वचन।
बोले जो वाणी मधुर, श्रद्धा पाता नित जन।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। धर्म का पालन करने वालों की धर्म ही रक्षा करता है।
धर्म को यदि मारोगे, तुमको देगा मार।
धर्म के अनुपालन में, सुख, समृद्धि का सार।
अलसस्य कुतः विद्या अविद्यस्य कुतः धनम। अधनस्य कुतः मित्रम अमित्रस्य कुतः सुखम।
आलसी को विद्या ना, अविद्व निर्धन मांहि।
धन के बिना मित्र नहीं, मित्र बिना सुख नाहिं।
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाध्दनमाप्नोति धनाध्दर्मं ततः सुखम् ।।
विद्या विनम्रता प्रदान करती है ,विनम्रता से मनुष्य योग्यता प्राप्त करता है,अपनी योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से सुख मिलता है।
विद्या देती विनम्रता, विनय सुयोग्य बनाय
संस्कृति संस्कृताश्रिता
संस्कृत भाषा जग में, संस्कृति का आधार।
आदि काल से सजाये, ग्रंथों, मन्त्रों का सार।
कृषितोनास्ति दुर्भिक्षं।
किया परिश्रम किसी का, व्यर्थ कभी ना जाय।
आज नहीं तो कल सही, उत्तम फल ही लाय।
गतशोकं न कुर्वीत भविष्यं नैव चिन्तयेत।
वर्तमानेशु कार्येशु वर्तयन्ति विचक्शनः।
गीता
(२) रत्नं रत्नेन संगच्छते । ( रत्न , रत्न के
साथ जाता है )
शोभा होती रत्न की, सदा रत्न के साथ।
पहने नहीं मणि कोई, सस्ते धागे बांध।
(३) गुणः खलु अनुरागस्य कारणं , न बलात्कारः । केवल गुण ही प्रेम होने का कारण है , बल प्रयोग नहीं )
कदापि न बल के चलते, गुण से उपजे प्यार।
फूल शूल एकहि डाल, बस फूलों का हार।
(५) अपेयेषु तडागेषु बहुतरं उदकं भवति ।
( जिस तालाब का पानी पीने योग्य नहीं होता ,
उसमें बहुत जल भरा होता है । )
धन संचित किया अपार, दान बिना सब व्यर्थ।
जल भरा तालाब बड़ा, पीने के ना अर्थ।
(८) अति सर्वत्र वर्जयेत् । ( अति ( को करने ) से सब जगह बचना चाहिये । )
अति है वर्जित सर्वदा, कुपरिणाम ले आय।
अधिक वृष्टि अनिष्ट करे, बाढ़ नदी में लाय।
(११) अल्पविद्या भयङ्करी. ( अल्पविद्या भयंकर होती है । )
अल्पविद्या ग्रहण किये, घातक ही बन जाय।
चक्रव्यूह में घुस गये, वापस निकल न पाय।
(१२) कुपुत्रेण कुलं नष्टम्. ( कुपुत्र से कुल
नष्ट हो जाता है । )
पैदा हुआ कुपुत्र यदि, होवे कुल का नाश।
हरे पेड़ पर ज्यों चढ़ी, दुष्ट बेल-आकाश।
(१६) मधुरेण समापयेत्. ( मिठास के साथ ( मीठे वचन या मीठा स्वाद ) समाप्त करना चाहिये । )
मधुरता से पूर्ण हो, अंत वार्तालाप।
कथा होय समाप्त जब, बंटता नित्य प्रसाद।
(१९) सत्यं शिवं सुन्दरम्
( सत्य , कल्याणकारी और सुन्दर । ( किसी रचना/कृति
या विचार को परखने की कसौटी ) )
विधाता सृजित कृति सभी, सत्य, शुभ अरु सुन्दर।
अन्तः-चक्षु से देखो, उसे मन में धरकर।
(२०) सा विद्या या विमुक्तये. ( विद्या वह है जो बन्धन-मुक्त करती है । )
बंधनों से भांति अनेक, विद्या करती मुक्त।
संकट से निकलने को, करे ज्ञान से युक्त।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्। न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् ।
सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये ।
सत्य बोलना चाहिए, हर मनुष्य को नित्य।
वाणी मगर मधुर लगे, कदापि नहीं अप्रिय।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा
ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर...
फल की चिंता किये बिन, धरो कर्म पर ध्यान।
जो समझेगा उचित वह, फल देगा भगवान।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि
। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ - 2/22
ज्यूँ पहनते नूतन हम, तज जीर्ण परिधान।
त्याग पुराने देह को, नवीन धरता प्राण।
पास जो कुछ यहीं मिला, सब जायेगा छूट।
साथ जायेगा पीया, सत्कर्मों के घूंट।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। ...
काम, क्रोध व लोभ। यह तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात् अधोगति में ले जान...
काम, क्रोध व लोभ सभी, तीन नरक के द्वार।
ले जाते अधोगति को, कर विवेक का नाश।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।
जब जब होती मही पर, सत्य धर्म की हानि।
धर्म स्थापित करने, प्रकट होय भगवान।
उत्तम वाणी बोलना, सज्जन की पहचान। प्रिय वचन वक्ता की, करे विविध कल्याण। लोभमूलानि पापानि । सभी पाप का मूल लोभ है | |
| लोभ को जानो जग में, सब पापों का मूल। अंततोगत्वा चुभता, बनकर के ये शूल। श्रध्दा ज्ञानं ददाति । नम्रता मानं ददाति । योग्यता स्थानं ददाति । श्रद्धा देती ज्ञान और देय नम्रता मान। योग्यता की महत्ता, दिलाये उच्च स्थान। अपूर्वः कोऽपि कोशोड्यं विद्यते तव भारति । जितना अधिक खर्च होय, बढे विद्या का कोष |
| व्ययतो वृद्धि मायाति क्षयमायाति सञ्चयात् हे सरस्वती ! तेरा खज़ाना सचमुच अद्भुत है; जो खर्च करने से बढ़ता है, और जमा करने से कम होता है तेरा देवि सरस्वती!, अतिशः कोष विचित्र। जितना चाहे व्यय करो, नहिं होता है रिक्त। व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् धनों में है विद्याधन, सबसे बड़ा प्रधान। और अधिक बढ़ता जाय, जितना भी दो दान। स्वभावो दुरतिक्रमः स्वभाव को बदलना सम्भव नहीं होता बदला नहीं जा सकता, जैसा होय स्वभाव। क्षीर पिलाये सर्प को, गरल नहीं विलगाय। प्रीणाति यः सुचरितैः पितरौ स पुत्रः। जो अच्छे कृत्यों से मातापिता को खुश करता है वही पुत्र है अच्छे कृत्यों से रखे, माता पिता प्रसन्न। आदर्श पुत्र है वही, सदाचार संपन्न। अन्तो नास्ति पिपासायाः परम आवश्यक सभी को, संतोष रखना मन। कष्ट देता बहुत भांति, तृष्णा का ना अंत। लोकरझ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः प्रजा को सुखी रखना यही राजा का सनातन धर्म है न्याय व पालन प्रजा का, है राजा का कर्म। सुखपूर्वक सभी रहें, यही सनातन धर्म। |
भार्या दैवकृतः सखा । भार्या दैव से किया हुआ साथी है ।
जीवन-भर जो साथ दे, पत्नी ऐसा मित्र।
स्वयं विधाता तय किया, रखो बसाये चित्त।
यद् धात्रा लिखितं ललाटफ़लके तन्मार्जितुं कः क्षमः । विधाता ने जो ललाट पर लिखा है उसे कौन मिथ्या कर सकता है ?
कोई नहीं मिटा सके, लिखा माथ का लेख।
खींची स्वयं ब्रह्मा की, दिव्य शिला पर रेख।
बह्वाश्र्चर्या हि मेदनी । पृथ्वी अनेक आश्र्चर्यों से भरी हुई है ।
आश्चर्यों से पृथ्वी, भरी अनेक प्रकार।
आकाश सा इसका भी, दुष्कर पाना पार।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः । कोई भी पुरुष अयोग्य नहीं, पर उसे योग्य काम में जोडनेवाला पुरुष दुर्लभ है
होता नहीं कोई जन, इस जग में निष्काम।
ऐसे व्यक्ति दुर्लभ अति, उस लायक दें काम।
नियति में जो है निमित्त, देता यद्यपि मात्र। चराति चरतो भगः । चलेनेवाले का भाग्य चलता है । नियति भरोसे जो पड़ा, मलता रहता हाथ। लक्ष्मीवन्तो न जानन्ति प्रायेण परवेदनाम्। लक्ष्मीवान मनुष्य दूसरों की वेदना नहीं समज सकते । धनवान न समझे जग में, पीड़ धरे जो दीन। लील जाय बड़ी मछली, लघु सागर की मीन। मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति । मन व्याकुल हो तब आँख देखने के बावजूद देख नहीं सकती । ऑंखें देख नहीं सकें, व्याकुल मन जब होय। राह सही सूझे नहीं, भटक जाय हर कोय। विना गोरसं को रसो भोजनानाम् । बिना गोरस भोजन का स्वाद कहाँ ? गोरस बिना मिले नहीं, पौष्टिकता व स्वाद। बच्चों को अति प्रिय लगे, भात दूध के साथ। सर्वस्य लोचनं शास्त्रम् । शास्त्र सबकी आँख है । शास्त्र होते हैं सदा, मनुज जाति की दृष्टि। दर्शाते जीवन डगर, करके पथ प्रदीप्त।
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