इतनी अक्ल कहाँ
मोहंती जी, अविनाश के साथ उसके मित्रों के घर जाते तो देखते, सभी के यहाँ बार अवश्य था, जिसमे महँगी स्कॉच और वाइन की बोतलें सजीं होती। मोहंती जी को पीने का शौक नहीं था, मगर लोगों को पीते देख उन्हें कोई चिढ भी नहीं होती। कोई जूस लेकर वे भी साथ बैठ जाते। पार्टी और पीने का क्रम कुछ ज्यादा देखकर, एक दिन वे अविनाश को टोक दिए, 'बेटा थोड़ा कम पिया करो।' अविनाश के एक मित्र ने झट उत्तर दिया, 'अंकल इसी लिए तो यहाँ आये हैं, यहाँ मौका भी है, पैसा भी है, इच्छा अनुसार जिंदगी जिओ। आखिर समय बिताने के लिए और करें भी क्या ? '
'अरे भाई थोड़ा थोड़ा पियोगे तो अधिक समय तक पी सकोगे। जिंदगी में कुल मिलाकर, एक निश्चित मात्रा से अधिक नहीं पी पाओगे। अभी अधिक पिओगे तो जल्दी छोड़ना पड़ेगा। इसके हानिकारक प्रभाव, स्वास्थ्य पर असर डालेगा तो डॉक्टर कम करने को बोलेगा। थोड़ा थोड़ा पिओगे तो ज्यादा दिन तक पी सकोगे। पैसा है तो, इसका अर्थ यह तो नहीं कि विष पीओ ! '
अविनाश का एक अन्य मित्र ने तंज कसा, 'अंकल! इसको अभी इतनी अक्ल कहाँ !'
पूजा का सामान
पंडित जी आसान पर बैठते ही पूछे, 'पूजा का सामान रखने के लिए कोई नया बर्तन?'
ईशा बोली 'नया तो कोई नहीं है, सभी जूठे हैं। नयी थाली इतनी जल्दी कहाँ से आएगी, वह इंडियन शॉप पर ही मिलेगी, और इंडियन शॉप तो यहां से दूर है। आने जाने में काफी समय लग जायेगा।'
योगेश ने पूछा, 'पंडित जी पुराने बर्तन से काम नहीं चलेगा ? अभी कल ही तो पूजा का पूरा किट लाया हूँ। ध्यान रहा होता तो एक थाली भी ले लिया होता।'
योगेश ने पूछा, 'पंडित जी पुराने बर्तन से काम नहीं चलेगा ? अभी कल ही तो पूजा का पूरा किट लाया हूँ। ध्यान रहा होता तो एक थाली भी ले लिया होता।'
'चलो कोई बात नहीं, कोई भी थाली साफ करके दे दो। उसमें थोड़ा गंगा जल छिड़क देंगे, शुद्ध हो जाएगी।'
सोनिया की मम्मी बोल पड़ीं, 'मेरे यहाँ तो कल ही नयी थाली आई है, पहले पता होता तो साथ ले आती।'
सभी लोग युक्ति ढूंढने में लगे हुए थे। क्या करें, कैसे करें। ईशा का चार पांच का बेटा, सबको परेशान देख रहा था। बोला; 'मम्मी! याद है, मनु के यहाँ हम पूजा पर गए थे तो वे लोग थाली में नया कपड़ा रखकर, उसपर पूजा का सामान रखे थे।'
सोनिया की मम्मी बोल पड़ीं, 'मेरे यहाँ तो कल ही नयी थाली आई है, पहले पता होता तो साथ ले आती।'
सभी लोग युक्ति ढूंढने में लगे हुए थे। क्या करें, कैसे करें। ईशा का चार पांच का बेटा, सबको परेशान देख रहा था। बोला; 'मम्मी! याद है, मनु के यहाँ हम पूजा पर गए थे तो वे लोग थाली में नया कपड़ा रखकर, उसपर पूजा का सामान रखे थे।'
मनु की इस बात ने उनकी आँखें खोल दी।
सलीम की माँ, आबिदा को दूसरी बार भी ओमान आये छः माह बीत चुके थे। वह एक बार पहले भी आयी थी, मगर बीच में एक महीने के लिए वापस इंडिया चली गयी थी। तब तक रुबाना मैटरनिटी छुट्टी पर चल रही थी। अब तो आदिल को शिशु सदन भेजने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं था। सलीम ने कहा, 'माँ इंडिया में भी क्या करना है। यहीं रूक जा, वीसा बढ़वा देता हूँ। आदिल थोड़ा और बड़ा हो जाय तो उसे चाइल्ड केयर सेंटर (शिशु सदन) में डाल देंगे, फिर चली जाना। '
वह जल्दी से जल्दी इंडिया वापस आना चाहती थी। वैसे वहां अपने बच्चों के साथ अच्छा लग रहा था लेकिन इंडिया में भी तो सारा कुछ उसे ही देखना था। अपने दोस्त मित्र और रिश्तेदारों से बिछुड़े एक साल हो गया था। बीच में आयी भी तो सबसे नहीं मिल पायी। सलीम के पापा तो तीन महीने में ही वापस चले गए थे।
आदिल को इंडिया ले जाने के नाम पर, रुबाना को लगा कि सांप सूंघ गया। 'नहीं अम्मा वहां घर में रहकर, इसका विकास नहीं हो पायेगा। अब तो चलने लगा है, इसे शिशु सदन भेजेंगे। वहां बच्चों के साथ कुछ सीखेगा।'
'अभी से क्या सीखेगा, सदन में माँ बाप के प्यार से महरूम भी तो रहेगा। अभी तो इसे माँ बाप का प्यार चाहिए। कम से कम ढाई तीन साल तक बच्चे माँ बाप को छोड़ने लायक कहाँ होते हैं।'
'लेकिन मैंने अंजू को देखा, उसके दोनों बच्चे एक साल से चाइल्ड केयर जाना शुरू कर दिए थे, दोनों बड़े स्मार्ट हो गए। वहां बच्चों का साथ पाकर, बच्चे कुछ सीखते हैं और स्मार्ट हो जाते हैं। उल्टा महसूस तो माँ बाप को ही अधिक होता है।'
'ऐसे ही है बेटा, मज़बूरी के आगे कर भी क्या सकते हैं। सलीम तो जन्म के बाद, तीन साल से भी ज्यादा मेरे पास ही रहा, किसी सदन नहीं गया, कौन सा की स्मार्ट नहीं है !'
पार्सल
घंटी बजी, सोनम ने दौड़कर दरवाजा खोला।
'आपका अमेरिका से कूरियर आया है। ये लो यहाँ साइन कर दो। '
सोनम का पार्सल पाकर खुशी का ठिकाना न रहा। वह उसे लेकर अंदर दौड़ी, 'मम्मी! मम्मी! भईया का पार्सल आया है।'
मम्मी ने टॉयलेट से ही बोल दिया, 'वहीँ रैक पर रख दे।'
सोनम बोली, 'मैं खोलने जा रही हूँ, मेरे लिए कुछ भेजा होगा।'
कहते हुए वह पार्सल खोलने लगी। पार्सल खोलते ही सोनम की खुशी फुस्स हो गयी। तब तक उसकी माँ भी आ गयी। बोली; मुझे अनुमान था, यही होगा।'
उसमें निकला बाल देखकर, सोनम पूछी: भईया ने ये बाल क्यों भेजा है? मम्मी !'
'हाँ रख दे। वह कह रहा था, अभी उसके पास छुट्टी नहीं है, फिर दूसरा साल लग जायेगा। चिंटू का बाल है, पूजा करनी है। जब तक वो आएंगे, दूसरा साल लग जायेगा न; फिर एक साल और प्रतीक्षा करनी पड़ जाएगी। अब बाल आ गया, हम पूजा करवा देंगे। '
कूड़ेदान
रूपचंद और चंपा, कल काम से सीधे पार्टी में चले गए थे, और घर देर से आये। इस कारण कूड़ेदान को सड़क की पटरी पर रखना भूल गये। वैसे तो पटरी पर और लोगों का कूड़ेदान रखा होता है, जिसे देखकर याद आ जाता है। पर पता नहीं, वे किस धुन में थे, कूड़ादान रखने का ध्यान नहीं आया। कूड़ा उठाने की गाडी तड़के ही आयी और कूड़ा उठा ले गयी, मगर रूपचंद का कूड़ेदान अपनी जगह ही रखा रह गया।
कूड़ेदान में पड़ा कूड़ा, पहले ही बदबू कर रहा था, अब एक सप्ताह और सहन करना पड़ेगा। और तो और, अब तो कूड़ेदान में इतनी जगह भी नहीं कि पूरे सप्ताह भर का कूड़ा समा सके। अब कर भी क्या सकते थे, गलती का परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा। एक सप्ताह तक और, कूड़ा वैसे ही कूड़ेदान में पड़ा रहा।
पुरे सप्ताह, जैसे ही वे घर से निकलते, बाहर पड़ा कूड़ेदान उन्हें डंसता रहता। वे अतिरिक्त कूड़ा पॉलिथीन के बैग में इकठ्ठा कर के रखते रहे। अगले सप्ताह जिस दिन सुबह कूड़े की गाड़ी आनी थी, पहले वाली रात को अपनी कूड़े की पॉलिथीन को पड़ोसियों के कूड़ेदान में समायोजित किया।
मशीन सी जिंदगी
चाय का कप रखते ही, शालिनी बड़बड़ाने लगी, 'यहाँ क्या जिंदगी है यार। सुबह उठते ही मशीन की तरह लग जाओ। नाश्ता तैयार करो, चिंटू को तैयार करो, फिर खुद तैयार होवो। अपना, रोहन का और चिंटू का टिफ़िन पैक करो। फिर ऑफिस जाते समय चिंटू को शिशु सदन छोडो, शाम को आते हुए ले के आओ। फिर डिनर तैयार करो। फिर अगले दिन की तैयारी शुरू, रोज रोज पिज्जा तो खाया नहीं जाता। वीक एन्ड पर दो दिन मिलते हैं, उसमें भी एक दिन घर और कपड़ों की सफाई में निकल जाता है। फिर घर के घटे बढ़े सामान लाकर रखो। कई बार तो सोचकर परेशान हो जाती हूँ, आखिर हम मशीन हैं या इंसान। '
'क्यों? रोहन मदद नहीं करता ?' मृदुला ने पूछा।
'रोहन हाथ तो बंटाता है, मैं अकेले कहाँ से कर पाती। मगर सब काम जंजीर की कड़ियों की भांति, एक दूसरे से लगे होते हैं; कोई भी काम स्वतंत्र तरीके से नहीं कर सकते। और हर बात का ध्यान तो मुझे ही रखना पड़ता है। मर्दों का तो तुझे पता ही है। अपना इंडिया कितना अच्छा है यार! हर काम के लिए अलग बाई मिल जाती हैं, झाड़ू पोंछा वाली अलग, खाना बनाने के लिए अलग, कपड़े धोने के लिए अलग।"
ये भी तो देखो, हमने क्या प्रणाली बनायीं है; आधे लोग मजे करते हैं, और आधे उनकी सेवा। यहाँ सभी अपना काम करते हैं, कोई किसी का नौकर नहीं। यहाँ सभी अपने काम का उचित पारिश्रमिक पाते हैं, और वहां कामवाली बाई को अपनी मेहनत का पूरा मिलता है क्या?
रद्दी भी नहीं बिकती
चंद्राकर जी को देखकर बड़ा आश्चर्य होता कि सबके गेट पर समाचार पत्र और पत्रिकाएं फेंकी हुई हैं, बहुत से लोग कई दिनों तक उठाते तक नहीं। उठाते भी हैं तो सीधे कूड़ेदान में, पढने का बोझ नहीं लेते । चंद्राकर जी तो अपने घर के आगे जब भी पत्र पत्रिका देखते, उठाकर ले आते और नियमित पढ़ते। उनमें प्रमुख समाचारों के अतिरिक्त, विज्ञापन के द्वारा कई आवश्यक जानकारी भी मिल जाती। मेलबर्न के बाजार में क्या कुछ है, यहाँ तक कि उनकी कीमतें भी, घर बैठे पता लग जाती।
एक बार बेटी दामाद ने कहा, 'क्या कूड़ा उठा ले आते है?'
चंद्राकर जी बोल पड़े, 'यहाँ सब मुफ्त में मिल रहा है, इसलिए कोई मोल नहीं समझता। यही हम लोग इंडिया में पैसे देकर खरीदते हैं। और तो और रद्दी के लिए संभाल कर रख भी लेते हैं। पढ़कर तो देखो इनमें कितनी जानकारी भरी पड़ी है। जब बेटी ने एक पत्रिका उठाई तो चकित रह गयी 'अरे 'मास्टर्स' पर तो कई सामान पर छूट पर मिल रही है। हम अभी कल ही ये सब, कोल्स से महंगा खरीद कर लाये। पहले पता होता तो पचास डॉलर बच जाते। '
व्हिस्की की बोतल
मल्होत्रा जी, बेटे सूरज के यहाँ जब जर्मन गए तो देखा, बैठक में छोटा सा बार बना रखा था। कई ब्रांड के स्कॉच और व्हिस्की खुले शेल्फ में रखे थे। उसके अलावा बियर और कोक के क्रैट अलग।
उन्हें अपना इंडिया का समय याद आ गया, वे घर में व्हिस्की की बोतल छुपा के रखते थे। कभी कभार छुप छुपाकर एकाध पेग ले लेते। यहाँ खुलेआम देखकर भी खोलने की हिम्मत नहीं होती। क्योंकि उन्होंने कभी सूरज के सामने व्हिस्की नहीं लिया था।
एक दिन वे सूरज के दोस्त, राजन के यहां गए। राजन ने गिलास में स्कॉच डालकर बोला, 'अंकल ! पानी या सोडा ?'
मल्होत्रा जी थोड़ा संकुचाये, मगर ध्यान आ गया वे जर्मन में बैठे हैं। बोल दिए, दोनों।
वैसे तो मल्होत्रा जी कम ही लेते थे, मगर उसके बाद, जब भी उनका मन होता, निःसंकोच बोतल खोल लेते।
बच्चा खिलाने गए थे
'और मल्होत्रा जी काफी समय से नजर नहीं आ रहे थे।'
'हां लन्दन चला गया था बेटे बहु के पास। उसके बेटा हुआ है न।'
"अच्छा तो बच्चा खिलाने गए थे। गौड़ जी ने तंज कसते हुए कहा। हां, वैसे कौन पूछता है।"
' कैसे भी पूछें मल्होत्रा जी, पूछते तो हैं। अपने नाती पोतों को खिलाना तो भाग्यशाली लोगों को ही मिल पाता है। और वो तो नाती पोते हैं फ्रांस लन्दन घुमा दिए, वैसे अपने आप विदेश कौन घूम पाता है।"
'कुछ भी हो, हमें तो अपनी जगह ही अच्छी लगती है।"
'मातृभूमि किसे नहीं अच्छी लगती। अब पोता वहां हुआ तो उसकी मातृभूमि वहीँ है। वह भी कभी अपनी मातृभूमि के बारे में यही कहेगा।'
'कुछ भी हो देश के बाहर अनिश्चितता तो बानी रहती है। पता नहीं वो कब क्या कर बैठें।'
'अपने देश में भी कहाँ सुरक्षित हैं, अधिकतर लोगों को काम के चक्कर में दूसरी जगह जाना ही पड़ता है।'
'देखो कभी मराठी गैर मराठियों को भगाते हैं तो कभी असामी। कश्मीर का ही देखो। वहां कम से कम सरकार अपनी जिम्मेदारी समझती तो है।'
गौड़ जी फिर तो चुप ही हो गए। जब वे पढ़ते थे, एक कश्मीरी लड़की से उन्हें प्यार हो गया और वे उसी से विवाह कर लिए। गौड़ जी के सास ससुर श्रीनगर से विस्थापित होकर इन्हीं के यहाँ शरण लिए।
रुपये में बदल के नहीं खरीद पाओगे
रवि प्रकाश अमेरिका घूमने गए थे। जब उनका बेटा, अनंत घर के सामान खरीदने जाता तो उन्हें भी साथ ले जाता। इसी बहाने अनंत की शॉपिंग हो जाती और अपने पिता को घुमाने का भी काम हो जाता। जब भी अनंत कुछ खरीदता, रवि प्रकाश उसे रुपयों में गणना करके बहुत आश्चर्य करते। आलू यहाँ पर डेढ़ डॉलर प्रति किलो यानि लगभग सौ रुपये। सेव पांच डॉलर यानि सवा तीन सौ रुपये प्रति किलो। हम लोग इंडिया में, इस कीमत पर तो बिलकुल भी नहीं खरीदें। बताओ, कितनी मंहगी चीजें हैं।
'परन्तु पापा, नहीं खरीदेंगे तो भूखे भी तो रहेंगे। हर चीज को पैसे में बदल कर देखेंगे तो कुछ भी नहीं खरीद पाएंगे। यहाँ मंहगाई है, तो कमाई भी है।'
'हाँ, कमाई और खर्च दोनों को देख कर, कोई बात नहीं। मैं तो यही सोच रहा था, यदि यहाँ से पैसे बचाकर इंडिया ले जाया जाय तो वहां बहुत कीमत है।'
'लेकिन पापा, जब रहना यहाँ है तो पहले यहाँ की जरूरत पूरी करनी है। फिर भी, इंडिया के लिए भी कुछ न कुछ बच ही जाता है। वहां तो एक हजार डॉलर भी भेज दें तो साठ हजार रुपये हो जायेंगे।'
'हाँ, यही मैं भी सोच रहा था।'
डॉलर भी रूपया ही है
गौड़ जी अमेरिका से लौटकर आये थे। वे गुप्ता जी से सब वृतांत बता रहे थे।
'वहां की मंहगाई देख कर तो मेरे होश उड़ जाते थे। बताओ मकान का किराया चार सौ डॉलर प्रति सप्ताह यानि लगभग पच्चीस हजार रुपये, पुरे महीने का जोड़ें तो एक लाख रुपये। टमाटर चार डॉलर यानि ढाई सौ रुपये प्रति किलो ... '
गुप्ता जी बीच में ही बात काटते हुए बोले, 'अरे, वहां के लिए तो वो रुपया ही है।'
गौड़ जी समझ नहीं पाये, फिर से पूछ बैठे, 'रूपया कैसे ?'
'अरे वहां डॉलर में कमाई है तो डॉलर में खर्च कर रहे हैं। उन लोगों के लिए तो वो रुपये जैसा ही है।'
'हाँ खर्च करने के लिए माध्यम के हिसाब से रूपया के जैसा ही है। किन्तु मूल्य के हिसाब से तो रुपये का साथ गुना है। यदि थोड़ा कम खर्च कर के वहां से कोई बचा लाये तो उसी पैसे से इंडिया में ज्यादा कुछ नहीं खरीद लेंगे ! और पैसे के मोल का आंकलन तो उन पैसों से कितना सोना खरीदा जा सकता है, इससे किया जाता है। अगर वहां से कोई सौ डॉलर बचा के लाये, तो इन्डिया में छः हजार रुपये के मूल्य का सामान खरीद सकता है।'
गुप्ता जी की समझ में अब आया।
चालान
राजकुमार, मोहित के घर बिजली का काम करने आया था। काम करते-करते वह बड़बड़ाता रहा। अपनी मुम्बई की तारीफ के पुल बांधे जा रहा था। 'इंडिया में कितनी आजादी है, थोड़ी बहुत गलतियों को तो नजरअंदाज कर दिया जाता है। ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन हो जाय तो रिक्वेस्ट करने पर कई बार पुलिस वाला चालान नहीं करता है। यहाँ तो इतने कड़े अनुशासन में रहना पड़ता है कि क्या बतायें, ड्राइविंग में थोड़ी सी गलती पर इतनी भारी पेनाल्टी। एक बार तो तीन महीने के लिए मेरा ड्राइविंग लाइसेंस ही सस्पेंड हो गया। बिना गाड़ी के काम करना कितना मुश्किल हो गया था, औंजार वगैरह लेकर जाना असंभव ही था। बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। लाल बत्ती या लेन क्रॉस किया कि दो सौ डॉलर फाइन। अब तक इतना फाइन भर चुका हूँ, इतने में एक नयी कार आ जाती।
इस बार फिर लाइसेंस सस्पेंड हुआ तो मैं तो इंडिया ही चला जाऊंगा। इतने पैसे कमा लिए हैं कि अब वहां आसानी से रह सकता हूँ।'
पड़ोसी की चीनी
'चीनी समाप्त हो गयी है। कल सुबह चाय कैसे बनेगी ?' कोमल बोली।
'अरे, लाना ध्यान नहीं रहा। चलो एक दिन बिना चीनी की पी लेंगे।' रजनीश ने कहा।
'मधुर के यहाँ से थोड़ी सी मांग लाती हूँ। पास में ही तो है। '
मधुर का घर बस कोई पचास मीटर की दूरी पर था, पर, राजनीश को चीनी मांगना शान के खिलाफ लग रहा था। मिलियन डॉलर का मकान और चीनी मांगने दूसरे के घर! कुसुम समझाई, 'एक दूसरे से चीज मांगने पर प्यार बढ़ता है, पड़ोस से प्रेम बना कर रखना चाहिए, विदेश में हम्हीं तो एक दूसरे के काम आएंगे। वो भी तो कितनी बार हमसे चीज मांग कर ले जाते हैं। इसमें शर्म की क्या बात! यहाँ किसको किसकी स्थिति का पता नहीं है। कभी इस तरह की मजबूरी आ ही जाती है।'
अगले दिन सुबह ही मधुर आ धमका। मजाक में बोला, 'घर में सामान खत्म हो जाता है, तब तुम्हे याद आता है, आज चीनी लाकर रख देना। '
'चीनी तो मैं रात को ही ले आता, असल बात तो ये थी कि पडोसी के चीनी से चाय की मिठास बढ़ जाती है।'
दोनों ठहाका लगाने लगे।
पड़ोसी चीनी
शम्भू के पड़ोस में एक चीनी परिवार रहता था। मियां बीबी और एक छोटा सा सुंदर सा बच्चा। वे दोनों मियां बीबी, चीनी भाषा के अतिरिक्त, कोई अन्य भाषा नहीं जानते थे। सबसे समीप का पडोसी वही परिवार था। सिडनी जैसे विदेश के शहर किस प्रकार अपना काम चलाते थे कौतुहल का विषय था। वैसे शहर चीनियों की संख्या बहुत थी। संभवतः उन्हें भाषा की जो समस्या थी घर पर ही थी। जहाँ वे काम पर जाते होंगे, वहां उनके सम्प्रदाय के लोग मिल जाते होंगे। वैसे इंसान जहाँ रहता है और वहां की भाषा नहीं जनता तो कम से कम अंग्रेजी तो आनी ही चाहिए वरना वह मूक के सामान है। उन्हें रहते चार वर्ष हो चुके थे मगर उनकी कभी बात नहीं हुई थी। न तो कभी कुछ कह पाते न ही किसी उत्सव में शामिल हो पाते । जन्म दिन पर वहां चीनी ही चीनी दिखते इधर केवल भारतीय। हेलो हाय बस कभी हाथ हिलाकर हो जाता।
एक बार अलमारी का दराज नहीं खुल रहा था, बिली कहीं गया हुआ था, चुन शंभू के यहाँ पेंचकस मांगने आयी। वह इशारे करके समझाने लगी, मगर शम्भू को कुछ समझ, नहीं आ रहा था। फिर इशारे से बुलाकर ले गयी और दराज दिखाई, फिर खोलने का अभिनय करके उसे समझायी। शंभू वापस घर आकर, पिलास और पेंचकस ले गया। फिर दोनों ने मिलकर किसी तरह दर्ज खोला।
शम्भू वापस आकर, कुछ देर तक सोचता रहा, ऐसे पड़ोसी से क्या लाभा कभी जरूरत पड़ी तो संवादहीन, एक दूसरे की मदद भी नहीं कर सकते।
गांव की तरह रहूं
कल्ला जी सपत्नी, पेरिस बेटे के पास गए।
बेटा कहता, 'जरा भी खराब चीज हो फेंक दो। फ्रेश और अच्छा खाओ, सस्ता महंगा मत देखो। आखिर कमा किस लिए रहा हूँ?'
पर उनकी पत्नी कहतीं 'बासी रोटी पड़ी है, सेंक देती हूँ। फेंकी जाएगी, यहाँ सब कुछ कितना महंगा है।'
कल्ला जी, एक से दूसरा टिश्यू पेपर उठाते तो उनकी पत्नी तुरंत टोक देतीं 'क्यों बर्बाद कर रहे हो ? कोई मुफ्त में थोड़े ही आया है !'
कभी कहती, 'वहां तो बस चाय पीते थे, यहाँ रोज रोज जूस चाहिए।'
कभी कहती, 'वहां तो बस चाय पीते थे, यहाँ रोज रोज जूस चाहिए।'
इस तरह की बातें बेचारे कल्ला साहब को अपनी पत्नी से निरंतर सुननी पड़ती।
और तो और कोई महिला अगर स्कर्ट पहने गुजरती, कल्ला जी की नजर उधर मुड़ने से पहले ही जानकी बोल उठती 'इस उम्र में भी तुम्हारी नजर कहाँ कहाँ पहुँच जाती है। '
अंत में कल्ला जी परेशान होकर बोल पड़े, 'बताओ हम घूम रहे हैं लन्दन में और तुम हो कि चाहती हो, अपने गांव की तरह रहूँ। अरे फिर वापस तो जाना ही है।'
'और कुशवाहा जी! सब ठीक? बेटा बहू तो ऑस्ट्रेलिया में ही हैं न? वे कैसे है ?' मिश्रा जी ने पूछा।
'हाँ सब ठीक है। वे वहीँ हैं, अगले महीने आने वाले हैं। '
'मगर एक बात तो है, वहां कमा लो कितना भी, लेकिन काम सब अपने आप करना पड़ता है। अपने बनारस में देखो, घर के सब काम, कामवाली सब कर जाती है। हमारे यहाँ ही देखो, बहू घर पर ही रहती है, फिर भी झाड़ू पोंछा के लिए अलग और कपड़े धोने के लिए अलग कामवाली आती है।'
'तो बहू का समय कैसे बीतता होगा?'
'कुछ अपने बच्चे में, बाकी सास बहू किट्टी पार्टी में चली जाती हैं।'
'इसका अर्थ हुआ कि वे अनुत्पादक काम में लगी रहती हैं। वहां तो बच्चों को इतना समय नहीं मिल पाता।
बेटे बहू दोनों काम पर चले जाते हैं, बस वीकएंड पर ही समय मिल पाता है।'
'वही तो कह रहा हूँ, वहां वे कोल्हू के बैल जैसा पिसते रहो, न कोई जानता न सुनता और यहाँ देखो, रिक्शे पर पैर धरे बैठकर, पान चबाते, बनारस की गलियों में चले जाओ, कहीं भी थूक लो; और तो और, रस्ते में दो चार लोग सलाम भी ठोक देते हैं।'
'मगर मिश्रा जी! अपना काम करने में क्या झिझक? क्या क्या काम नौकर चाकर करेंगे? अब कामवाली कहाँ से कामवाली ढूंढेगी। और एक बात पूछूँ, जो रिक्शा खींचने वाला है, वह भारत का नागरिक है या नहीं?'
मिश्रा जी उत्तर दें उससे पहले ही कुशवाहा जी बोल पड़े: 'यही अंतर है, इस देश में और उस देश में, जो रिक्शा खींच रहा है और जो रिक्शे में बैठा है दोनों के अधिकारों और जीवन स्तर में कोई अंतर नहीं होता, और न ही वहां काम से कोई छोटा बड़ा होता है।'
कबूतरबाज
चार साल जर्मनी के जेल में बिताने के बाद भोला छूट तो गया, मगर उसकी मुसीबत ने साथ नहीं छोड़ा। उसके पास न तो पासपोर्ट था न ही उसका नंबर। अब वापस भी जाय तो कहाँ जाय।
उस समय विदेश में नौकरी का झांसा देकर, एक एजेंट बिना वीसा के ले आया था। पहले वह एक ऐसे देश माल्टा ले गया, जहाँ वीसा की जरुरत नहीं थी, फिर इटली के रास्ते जर्मनी जाना था। किसी तरह सड़क के रास्ते इटली तो पार हो गया, पर जर्मनी में घुसते ही पकड़ा गया और जेल भेज दिया गया। उसके पास बचाव के कोई उपाय नहीं थे। उसके पास पासपोर्ट नहीं होने के कारण उसकी सही पहचान भी नहीं हो पा रही थी। उसे अपने को भारतीय कहने के कारण, जर्मनी सरकार ने भारतीय दूतावास को सूचित तो कर दिया था और दूतावास ने उसकी सूचना विदेश मंत्रालय, दिल्ली को भेज दिया। जब विदेश मंत्रालय ने जाँच शुरू किया तो उसके द्वारा बताये पते पार कोई एजेंट नहीं था। उसने फर्जी पते पर, अपना कार्यालय बनाया था, बंद कर के भाग गया।
जेल से छूटने के बाद भोला भारतीय दूतावास गया। दूतावास ने बिना किसी प्रमाण के उसे भारतीय होने और उसकी मदद करने से मना कर दिया। दूतावास ने कहा, कम से कम पासपोर्ट का नंबर तो बता दे, ताकि वे विदेश मंत्रालय से जाँच कर लें। उसके हिंदी बोलने से दूतावास को विस्वास तो हो रहा था कि वह भारतीय होगा, पर दूतावास कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था। क्या पता वो पाकिस्तानी हो और आतंकवादियों से कोई सम्बन्ध हो। जब कोई हल नहीं निकला तो भोला पता कर के एक गुरूद्वारे में शरण लिया। गुरूद्वारे की मदद से उसने अपने घर इंडिया में खबर भिजवाया। घर पर उसके जेल से छूटने का समाचार मिला, ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। लेकिन पासपोर्ट नंबर मिलने की समस्या ज्यों की त्यों थी। तभी भोला के पिता को याद आया, भोला और सूरज ने पासपोर्ट के लिए एक साथ ही अप्लाई किया था। सूरज से उसके जारी होने की तिथि मिल जाएगी और फिर वो उसकी नक़ल निकलवा लेगा। जब पासपोर्ट की नकल निकल गयी तो सरकार ने भोला के वापस भारत आने का प्रबंध कर दिया। इन चक्करों में उसे दो महीने और देश से बाहर रहना पड़ा।
मकान बिकाऊ है
महेंद्र चौहान का इलाहाबाद में आलीशान मकान था। उनका एक ही बेटा था, सूरज। पढ़ लिखकर इंजीनियर बन गया और अमेरिका चला गया। अमेरिका गया तो वहीँ का होकर रह गया। माँ बाप के कहने से शादी तो आकर इलाहाबाद ही किया, पर बहु को भी अमेरिका ले गया। मम्मी पापा को बुलाता रहा मगर उन्होंने अमेरिका जाने का नाम ही नहीं लिया । उनको यही चिंता सताती थी, चले जायेंगे तो यहाँ घर की देखभाल कौन करेगा।
एक दिन सुदेश जी पधारे, 'कैसे हैं महेंद्र जी? और सूरज ठीक है न?'
'हाँ मैं भी ठीक हूँ और सूरज भी, अभी कल ही फ़ोन आया था। रोज रोज कहता है, पापा आओ घूम जाओ। '
'अरे, तुम्हारे अच्छे नसीब हैं, लायक बेटा मिला है; जाओ घूम आओ। सबके नसीब में अमेरिका घूमना कहाँ है !'
'ठीक कह रहे हो सुदेश! पर घर पर कौन रहेगा? देखते हो न आजकल दिन में ही ताला टूट जाता है। '
'अरे महेंद्र भाई इतनी क्यों चिंता करते हो? अब तुम्हारी अवस्था हो चली है, फिर भला कब घूम फिर पाओगे! किसी दोस्त रिश्तेदार को कुछ दिन के लिए घर पर रख लेना। '
'सो तो ठीक है, आज कल किसके पास समय है, और जो एक बार घर में घुस गया निकालना भी कौन सा आसान है ?'
'भाई वो तो तुम समझो, मैं होता तो चूकता नहीं। '
अभी थोड़ा ही समय गुजरा था कि सुदेश को खबर मिली, महेंद्र जी चलते बने। सूरज अमेरिका से सपत्नी आ चुका था। सुदेश जी भी शोक प्रकट करने महेंद्र भाई के घर पहुंचे। किसी से अभी पूछ ही रहे थे कि सूरज कहाँ है, उनकी नजर घर के बाहर टंगी तख्ती पर पड़ी -
'घर बिकाऊ है '
रद्दी
गोयल जी लान में फेंके सभी पम्पलेट और पत्रिकाएं उठा लाते। अधिकतर में सामग्री की दर उनके सेल से सम्बंधित विज्ञापन होते। उनमें एक दो साप्ताहिक पत्रिकाएं भी होतीं, जिनमें क्षेत्रीय समाचार छपे होते। हाथ में लिए वे पत्रिका के पन्ने पलट रहे थे, तभी हर्ष काम से लौटा था। उन्हें मेज पर ढेर सारे कागज़ बटोरे देखा तो बोला, 'पापा ! ये सब रद्दी क्यों बटोर लाते हैं, यहां तो ऐसे ही फेंक जाते हैं और सभी उठाकर सीधे रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं।'
'बेटा, इतनी मेहनत से वे लोग, ये कागज एक एक घर में डाल जाते हैं। इनमें कितनी काम की सूचनाएं होती हैं, सामान के मूल्य घर बैठे पता लग जाता है, जो कुछ खरीदना है पहले ही बजट बना सकते हो। वैसे यहाँ तो रद्दी की कोई कीमत नहीं वरना हम लोग भारत में तो अख़बार की रद्दी भी बेचने के लिए कब तक सम्हाल कर रखते हैं। खैर मुझे इन से काफी जानकारी मिलती है। पढ़कर रद्दी में डाल दूंगा, वैसे तुम लोग भी इन्हें देखा करो तो कोई बुराई नहीं। '
तभी हर्ष की नजर एक विज्ञापन पड़ी 'रेफिजरेटर पर भारी छूट'
उसे उठाकर वह विस्तार से पढ़ने लगा क्योंकि उसे नया फ्रिज खरीदना था।
मुफ्त ले जा
मोनू को डेस्कटॉप कंप्यूटर खरीदे अभी एक वर्ष ही हुआ था और वह लैपटॉप ले आया। अब तो मोर के आगे कौवे की कदर कम होनी ही थी। धीरे धीरे दो वर्ष हो गए और डेस्कटॉप की आवश्यकता एक बार भी नहीं पड़ी।
मोनू सोचने लगा, इस निकाल दें, आखिरकार जगह ही घेरे है। पहले तो यही योजना बनाई कि किसी दोस्त मित्र को दे दिया जाय, कम कम वह नाम लेगा; पर किसी भी मित्र ने कोई रूचि नहीं दिखाई।
उसने हजार डॉलर का खरीदा था इसलिए बाहर सड़क पर रखने में भी दुःख हो रहा था। अब उसने मात्र सौ डॉलर में बेचने के लिए एक डॉट कॉम पर डाल दिया पर महीने भर तक कोई प्रस्ताव नहीं आया।
अब मोनू के पास, पटरी पर रखने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था।
म्युनिसिपल्टी की गाड़ी आई और कूड़ा ले गयी पर वह डेस्कटॉप वहीँ पड़ा रहा। दरअसल ड्राइवर ने देखा कि ठीक ठाक कंप्यूटर लग रहा है, और उसे एक कंप्यूटर की जरूरत थी, सोचा वह अपनी गाड़ी लाएगा और उसे ले जायेगा।
कूड़े वाली गाड़ी जाने के बाद, मोनू जब कंप्यूटर वहीँ पड़ा देखा तो वापस उठा लाया। अब इस पर बच्चे गेम खेलेंगे। शाम को ड्राइवर फिर से अपनी गाड़ी लेकर उधर आया तो कम्प्यूटर वहां नहीं पाकर निराश लौट गया।
धुआं
रंगास्वामी पर्थ बेटी के यहाँ गया थे। घर के आगे पीछे लगे पेड़ पौधों की सफाई हुई थी।
कम से कम, तीन चार बोरा पत्तियां निकल आई थीं।
इतना कूड़ा देखकर रंगास्वामी ने सोचा इन्हें जला दें, और राख को लान में फैला दें ताकि खाद बन जाय।
माचिस लेकर जलाने जा ही रहे थे कि मंजुला की नजर उन पर पड़ गयी।
'पापा माचिस क्या करेंगे ?'
'वो पत्तियां पड़ी हैं,जला दें।'
'पापा! ये पंजाब थोड़े ही है कि खेत में डण्ठल जलाकर पूरे देश में धुंआ फैला दो। जरा भी धुआं उठेगा
फायर वाले आ जायेंगे और पेनल्टी देनी पड़ जाएगी। छोड़ दीजिये कूड़े में चला जायेगा। '
चंद्रकांत और उनकी पत्नी को केपटाउन आये एक सप्ताह हो चुका था। अर्श, दादा-दादी से अब तक घुल मिल चुका था। यह देखने के लिए कि अर्श अकेले दादा दादी के साथ घर रह पाता है कि नहीं , एक दिन उसे शिशु सदन (चाइल्ड केयर) नहीं भेजा। शाम को पता चला कि अर्श दादा दादी के साथ बड़ा खुश था तो सोम और मालती बड़े प्रसन्न हुए। अब वह घर पर रहेगा तो शिशु सदन का काफी खर्च बच जायेगा।
दो दिन की छुट्टी के बाद, सोमवार को मालती ने अर्श को शिशु सदन (चाइल्ड केयर) जाने के लिए तैयार करने लगी और वह रोना शुरू कर दिया। उसे घर पर ही दादा-दादी के साथ अच्छा लग रहा था। उसका शिशु सदन जाने का बिलकुल भी मन नहीं था। चंद्रकांत और उनकी पत्नी का भी मन अर्श के साथ खूब लग रहा था। वे भी चाह रहे थे अर्श घर पर ही रहे तो उसके साथ उनका मन लगा रहेगा, परन्तु डर के मारे सोम मालती से नहीं कह पा रहे थे, कि वे कहीं यह कह बैठें कि शिशु सदन में वह कुछ सीखेगा और घर पर रह कर बिगड़ जायेगा।
जब मालती उसे लेकर चलने को हुई तो अर्श दौड़कर, सोफे पर बैठे दादा की गोदी में आकर बैठ गया।
'नो, आई विल बी विद बाबा' (मैं बाबा के साथ रहूँगा)। मालती उसे खींच कर ले जाना चाही तो वह रोने चिल्लाने लगा। फिर मालती ने सोचा कि अर्श के दादा, दादी को भी गाड़ी में बिठा ले और उसे शिशु सदन छोड़ने के पश्चात् वापस घर छोड़ देगी। सबके साथ चलने को अर्श तैयार हो गया। उसने सोचा शायद कहीं घूमने जा रहे हैं। पर
जब मालती की गाड़ी शिशु सदन के गेट पर रुकी तो वह फिर चिल्लाने लगा -
'नो, नो! नो चाइल्ड केयर!'
पर उसे जबरदस्ती गाड़ी से उतारी और शिशु सदन के वार्डन के सुपुर्द कर दी। ऐसा लग रहा था उसे किसी कैदखाना में छोड़ दिया गया हो। वह चिल्लाते हुए वार्डन से हाथ छुड़ाकर दादा दादी के पास आना चाहता था, पर वार्डन उसे एक चॉकलेट थमाकर खिलौनों की ओर ले गयी।
दृश्य देखकर चंद्रकांत और उनकी पत्नी दोनों की ऑंखें डबडबा आईं।
माल की पार्किंग
भूपेंद्र को मॉल में शॉपिंग करते डेढ़ घंटे से ऊपर हो चुके थे। उसने अपने मम्मी पापा को आइसक्रीम पकड़ाकर, आइसक्रीम पार्लर में कुर्सी पर बैठा दिया और बोला, 'आप लोग तब तक आइसक्रीम खाइये, मैं गाड़ी लगा कर आता हूँ।'
लेकिंग गाड़ी तो ठीक ही स्थान पर लगाया था, फिर लगाने क्यों चला गया। यह प्रश्न शर्मा जी के मन में उठ रहा था। लेकिन जिस बात का पता नहीं, क्यों माथा पच्ची करें। वे चुपचाप अपने आइसक्रीम का आनंद लेने लगे।
थोड़ी ही देर बाद भूपेंद्र आ गया, 'और आइसक्रीम लेंगे पापा ?"
'नहीं"
'और क्या खाएंगे ?'
'कुछ नहीं। गाड़ी तो ठीक ही लगी थी, फिर दुबारा लगाने क्यों गया था?'
भूपेंद्र ने उन्हें बताया, 'यहाँ दो घंटे तक की पार्किंग निःशुल्क है। उसके बाद, हर दो घंटे का दस डॉलर चुकाना पड़ता है। मैंने एक बार पार्किंग से निकाल कर फिर से लगा दिया। अब दो घंटे और बिना पैसे दिए गाड़ी खड़ी रहेगी, तब तक तो हमारा काम हो ही जायेगा।'
'वाह भई यहाँ भी अपना देशी तिकड़म चलता है। वहां तो लोग हवाई अड्डे किसी को लेने जाते हैं तो पार्किंग के पैसे बचाने के लिए पहले ही सड़क पर गाड़ी खड़ी करके यातायात बाधित करते हैं।'
चाइल्ड केयर देर से
आज एक तो प्रिया ऑफिस से ही देर से निकली, दूसरे ट्रफिक में फंस गयी। बड़ी कोशिश के बाद भी वह छः बजे तक चाइल्ड केयर नहीं पहुँच पायी। जब चाइल्ड केयर पहुंची तो वहां एकदम सन्नाटा पसरा था, न तो कोई स्टाफ न ही कोई बच्चा। जब अंदर घुसी तो देखी, मात्र एक ही कमरे की बत्ती जल रही थी। उस कमरे में ढाई वर्ष की डॉली, नीचे फर्श पर बैठी सिसकियाँ भर रही थी।
'माय मॉम (मेरी माँ)।'
कमरे में एक सुपरवाइजर थी जो कुछ खिलौने लेकर फुसलाने की कोशिश कर रही थी। डॉली को कोई भी खिलौना अच्छा नहीं लग रहा था। उसे तो था कि सभी बच्चों के मम्मी आकर उन्हें ले गयीं। और डॉली की मम्मी को उसकी कोई चिंता ही नहीं थी। उसे मन में यह भी डर सता रहा था कहीं मम्मी आये ही ना और रात भर वहीँ रहना पड़े।
बस थोड़ी देर बाद, कोई सवा छः बजे, जैसे ही डॉली की मम्मी कक्ष में प्रवेश की डॉली के सारे दुःख भाग गयी और वो दौड़ कर मम्मी से चिपट गयी। प्रिया ने उसे गोद उठाया, 'सॉरी डॉल, आयी बिकेम बिट लेट (मुझे थोड़ी देर हो गयी)।'
'सी मॉम, एवरीवन हैज गॉन (देखो, सब चले गए)।'
'हां बेटा, वेरी सॉरी।"
प्रिया गोदी में लिए उसे चूमने लगी, तब तक सुपरवाइजर रजिस्टर लेकर आ गयी, 'मैम! इसमें टाइम डाल कर साइन कर दीजिये।"
'ओ. के.'
डोली को तो राहत मिल गयी थी, पर डोली की माँ की मुसीबत बढ़ गयी। सुपरवाइजर बोली, 'आपको एक्स्ट्रा रुकने का एक घंटे का १२० डॉलर लेट फी देना होगा।' इस सप्ताह घर के कुछ फर्नीचर खरीदने के कारण पहले ही बजट बिगड़ा था, अब १२० डॉलर का और चूना लग गया।
कमाई का क्या करें
विदेश जाने से, कामता की आय तो उम्मीद से भी अधिक बढ़ गयी थी। कहाँ तो यहाँ सात आठ लाख का पैकेज था यानि कि महीने में कट कटाकर पचास हजार ही आते थे, अमेरिका जाकर सीधे एक लाख डॉलर, यानि साठ सत्तर लाख रुपये सालीना। वहां मंहगाई अवश्य थी, कई वस्तुओं की कीमत तो भारत से तीन गुना तक अधिक थी फिर भी खा पीकर काफी पैसे बच जाते थे। कुछ ही महीनों में, कामता के पास सभी आवश्यक वस्तुएं हो गयी थीं। इंडिया में उसके पिता जी संपन्न थे, इसलिए उसे यहाँ भी कोई रूपया पैसा भेजने की आवश्यकता नहीं थी।
उसे अपनी कमाई अपने तरीके से ही उड़ानी थी।
पहले कभी इंडिया में, दोस्तों के साथ शौकिया, बीयर आदि ले लेता था, अब तो उसके पास पैसा था, बढ़िया से बढ़िया स्कॉच मंगाता था। उसका एक मित्र देवदत्त भी स्कॉच का शौक़ीन था। दोनों ने अपने अपने घर में मिनी बार, बना रखा था। अब तो जैसे प्रतियोगिता सी होने लगी थी कि किसके बार में अधिक प्रकार की स्कॉच और व्हिस्की है, तथा कौन सी ज्यादा महँगी है।
देवदत्त, जब भी कामता के यहाँ आता , 'और क्या नया मंगाया है ?'
'ये देख 'हेन्नेसी पैराडिस", एक हजार डॉलर की है यानि पैंसठ हजार रुपये। पीटर फ्रांस गया था, उससे ड्यूटी फ्री शॉप से मंगवाया है।'
'ये ब्रांड तो आज तक नहीं देखा, तो चल आज इसे ही खोलते हैं।'
'आज नहीं, अगले सैटरडे। उसी दिन शीला का बर्थडे है, तभी खोलेंगे। आज के लिए ये है 'मैक्ल्लन', ये भी दो सौ डॉलर का है।'
कमाता, रैक से जैसे ही बोतल निकालता है, अभय का फ़ोन आ जाता है। 'कामता क्या कर रहा है।'
'कुछ नहीं देवदत्त आ गया था, 'मैक्ल्लन' खोलने जा रहा हूँ। तू भी आ जा।'
'यार अभी कल ही तो ड्रिंक लिए है, और कल फिर लेना है इसीलिए तुझे फोन किया है कल घर पर आ जा। ठीक है अभी आता हूँ, बस बीस पच्चीस मिनट।'
थोड़ी देर में अभय भी पहुँच गया। तब तक डाइनिंग टेबल पर सलाद नमकीन आदि लग चुका था। बोतल खुलने के लिए अभय की प्रतीक्षा कर रही थी। आते ही अभय ने बोतल उठाया और मेज पर पड़ी तीनों गिलासों में डाल कर पेग बना दिया। 'और शीला !'
तब तक रसोई से आवाज आयी, 'मैं अपनी वाइन ले रही हूँ।'
पहला सिप लेते ही अभय, 'वाह, ये पहली बार ले रहा हूँ। बिलकुल अलग टेस्ट। कमाल का है, सौ डॉलर से तो ऊपर की ही होगी। '
तभी कामता ने शराब की बोतलें रखे रैक की और ईशारा करते हुए बोला, वो देख 'हेन्नेसी पैराडिस' इसका भी बाप। ये तो दो सौ डॉलर की है।'
अभय अपनी कुर्सी उठकर, उस बोतल को हाथ में लेकर देखने लगा। 'वाह! कितने की है?'
'एक हजार डॉलर।'
'बताओ, हम लोग कितना तो शराब पीने में बर्बाद कर देते हैं।'
कामता बोल पड़ा, कमाते काहे के लिए हैं! आखिर यहाँ इसीलिए तो आये हैं।'
'नहीं यार हर चीज की हद होती है। ज्यादा पीना तो स्वास्थ्य के हानि ही पहुंचाएगी। कभी कभार तो एन्जॉय करने के लिए ठीक है। यह दूध और जूस का विकल्प थोड़े ही हो सकता है।'
'अरे, कुछ नहीं होता डाइट सही तो ये शराब क्या कर लेगी।'
''क्या कर लेगी, तुरंत थोड़े ही पता लगता है। जब बात बिगड़ जाएगी तब पता चलेगा और चिड़िया खेत चुग जाएगी तो पछता कर भी कुछ नहीं होगा। फिर स्वास्थ्य तो खा पीकर ठीक रख लोगे, और बुद्धि व विवेक ...? इसके अलावा बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?"
चोखा बाटी
ओम ड्यूटी से आते ही वंदना से बोला, 'आज चोखा बाटी खाने का मन कर रहा है। चोखा बाटी खाये जमाना हो गया। देखो तो फ्रीज में बैगन ही न !'
वंदना फ्रीज खोल निकाल कर दिखती है, 'हाँ एक है।'
'बस ठीक है, बहुत है। आलू उबलने के लिए रख दो। थोड़ा आराम कर लूँ, तो इसे भूनता हूँ।'
'वैसे बाटी का मजा तो अपने इंडिया में ही है, उपले पर सिकी बाटी का क्या स्वाद आता है! उपले पर भुने, बैगन और टमाटर भी बढ़िया स्वाद देते हैं।'
'तो यहाँ पर उपले कहाँ से लाएंगे! और जलाये भी तो धुआं कहाँ छिपाएंगे।'
'चलो कोई नहीं ओवन में ही बना लेंगे। मैं सोच रहा था कौशिक को भी बुला लूँ, उसे भी चोखा बाटी बहुत पसंद है।'
'हाँ फिर थोड़ी देर में कहोगे नितिन को भी बुला लूँ, बृजेश को भी बुला लूँ, नारायण को भी बुला लूँ और धीरे धीरे
तो पूरी पार्टी ही हो जाएगी। पहले ही बता चुकी हूँ, कि एक ही बैगन है बाकी सामान तो अभी देखा भी नहीं।'
'वंदना! तुम्हें पता ही है, अपने इंडियन डिश के सभी देशी भाई दीवाने हैं। कुछ चीजें तो भारतीय रेस्तरां में मिल भी जाती हैं, पर चोखा बाटी कहाँ मिलती है। और भारतीय व्यंजन का आनंद तो अपने देशी लोगों के साथ ही आएगा न। थोड़ी तुम्हारे पकवान की प्रशंसा हो जाएगी, थोड़ी गपशप हो जाएगी। अपने देश की कुछ बातें हो जाएँगी। तुम्हीं सोचो कितनी बढ़िया शाम हो जाएगी। मुझे तो अपने लोगों के साथ देशी खाना खाने में जो मजा आता है, स्कॉच पीने में भी मजा नहीं आता। थोड़ा बहुत कम पड़ जायेगा तो साथ में चावल दाल भी बना लेंगे।'
'तो मैं कहाँ मना कर रही हूँ, बस सामान देख लो।'
'हाँ, बैगन तो काफी बड़ा है, तुम कह रही हो तो बृजेश को, और बुला लेता हूँ।'
वहां पैसे न होने से तरसते यहाँ साधन
रोटी खाऊंगा
कौमुदी परेशान हो चुकी थी, शेरा था कि चुप ही नहीं हो रहा था। आठ बज चुके थे, अभी तक कार्तिक भी ड्यूटी से नहीं आया था। शेरा न तो पिज्जा खा रहा था न ही चाउमीन।
कौमुदी उसे बार बार समझा रही थी, 'बेटा आज पिज्जा खा ले। कल मैं रोटी दाल बना दूंगी, आज सुबह ही आटा समाप्त हो चुका है और इंडियन शॉप यहाँ से दूर है। आज हम भी पिज्जा ही खाएंगे। वैसे अब तो इंडियन शॉप बंद भी हो चुकी होगी। कहाँ आटा मांगने जाएँ।'
'नहीं, मैं चिकन और रोटी खाऊंगा नहीं। रोज रोज पिज्जा और चाउमीन।'
'सही कह रहा है रोज किसी को अमृत भी दो तो ऊब जाता है। यही हम इंडिया में थे और घर में पिज्जा या चाउमीन आता तो टूट कर पड़ते और तुझे यहाँ रोटी अच्छी लग रही है। लेकिन अब मैं करूँ क्या ! ठीक है नहीं मनता है तो थोड़ा रूक, पापा को आ जाने दे मीना के यहाँ से थोड़ा आटा मंगाती हूँ।'
तभी घंटी बजती है। 'देख पापा होंगे।'
शेरा ने दरवाजा खोला और कार्तिक के घर में घुसते ही कौमुदी बोलने लगी, 'देखो शेरा आज रोटी खाने की जिद्द कर रहा है। न पिज्जा खा रहा है, न चाउमीन, देखो पास्ता भी पड़ा है। चिकन तो कल का पड़ा है लेकिन आटा सुबह ही समाप्त हो गया।'
'तो कोई बात नहीं, हम लोग पिज्जा खा लेते हैं। आज मैं एक मीटिंग में चला गया था और मेरा लंच वहीँ हो गया था। उसमें रोटी पड़ी है सेंक के इसे खिला दो।'
कौमुदी के जान में जान आयी।
ताजी रोटी
रविवार क दिन था। मनोज के यहाँ, लंच पर चार मित्र परिवार जुटे थे। बीयर का दौर समाप्त हुआ। लड़के डाइनिंग टेबल (खाने की मेज) पर बैठ गए। सब्जी दाल के डोंगे सजा दिए गए। मंगल एक एक का ढक्कन उठा कर देखने लगा, 'राजमा .. , पालक पनीर .. , भिंडी .. , रायता भी ..., वाह शीतल! भरवा बैगन। खाने का मजा तो शीतल के यहाँ है। क्या क्या वैरायटी बना लेती है। इसे तनिक भी आलस नहीं होता।'
शीतल रसोई से आवाज लगाती है, 'तब तक दाल सब्जी प्लेट में निकालो, मैं गरम गरम रोटियां सेक कर लती हूँ।'
निशा भी रसोई में चली जाती है, 'ला मैं सिकवा देती हूँ।'
'ठीक है। चल मैं बेलती हूँ, तू सेक सेक कर परोसती जा।'
निशा ढेर सारा आटा देखकर परेशान सी हो गयी। 'तू इतनी सारी रोटी बनाएगी। रेडीमेड क्यों नहीं माँगा ली? हम तो जयादा लोग होते हैं तो रेडीमेड ही प्रयोग में लाते हैं। कौन इतनी रोटी सेंके। '
'रेडीमेड तो हमारे यहाँ भी पड़ी है। 'देख फ्रिज में रोटियां भी हैं, पराठे भी हैं और सब्जी भी। लेकिन उसे हम इमरजेंसी में ही प्रयोग करते हैं। अपनी ताज़ी रोटी सब्जी का स्वाद उसमें कहाँ आ पाता है! जब अपने ही खाना है तो थोड़ा मेहनत कर के अच्छा खाने में क्या हर्ज है?'
तब तक माधुरी भी रसोई में आ गयी, 'लेकिन यार इतनी रोटी हमसे तो नहीं बनती।'
'तो छः महीने की बासी रोटी भी खानी पड़ती है। तू ही देख, जिस सब्जी रोटी को साल तक बैक्टीरिया नहीं खाते उसे इंसान को खाना पड़ रहा है।'
ससुरा गया
आज पार्टी चल रही है। सहेलियां आई हुई हैं, वाइन की बोतलें खुली हैं, मोना दौड़ दौड़ कर नग्गेट्स और चिप्स परोस रही है।
कांता ने पूछ ही लिया, 'क्या हुआ मोना, बड़ी खुश लग रही है।'
सुलोचना बोल पड़ी, 'परसों इसके ससुर वापस इंडिया चले गए न !'
'हाँ, उनके बिना घर बड़ा उदास लग रहा था। सोचा तुम लोगों को बुला लें, थोड़ा चहल पहल हो जायेगा।'
कांता फिर बोली, 'उदास लग रहा है कि ख़ुशी में पार्टी कर रही है। थोड़ी देर पहले तो तू अपनी मम्मी से फोन पर कुछ और बातें कर रही थी।'
'तो, तू सुन रही थी क्या ?'
'आवाज तो आ रही थी न ! मैं कान थोड़े ही बंद किये थी।'
फिर सुलोचना की ओर देखकर, 'पता है ये अपनी मम्मी से क्या कह रही थी ! ... कह रही थी ... अरे चले गए, बड़ी राहत हो गयी। उनके चक्कर में बड़ी मुसीबत उठानी पड़ती थी। वो बाहर का कभी खाते नहीं थे। हम लोग कभी बाहर से मंगाते भी तो उनके लिए अलग से रोटी सेकनी पड़ती थी। बुढ़ऊ को पिज्जा आदि पसंद नहीं अत था, उनके रहते मुझे तो बड़ी टेंसन रहती थी। अब जाकर राहत मिली है। अब तीन दिन तक तो मैं कुछ भी नहीं बनाउंगी। बस बाहर का ही खाएंगे।'
मोना बहुत शर्मिंदा हुई। 'अच्छा! सुलोचना तो अपनी खास है, और किसी के सामने मुंह खोली तो बहुत मारूंगी। एक तो छुप के बात सुनती है .... और .... देख बहन! समीर के सामने कभी मत बोल देना।'
'अरे ठीक है, इतनी बच्ची थोड़े ही हूँ।'
लान की घास की घास
करन और सुलभा, इण्डिया से एक महीने बाद लौटे थे। उन्होंने देखा कि लॉन की घास, कटी पड़ी थी। वे सोचे कि घास बढ़ गयी होगी तो पड़ोसी ने काट दी होगी। जब उसके लॉन की ओर देखा तो उसकी खुद की ही बड़ी थी। वह अपनी छोड़ मेरी क्यों काटेगा। शायद आते जाते बढ़ी हुई देख, यतिन ने काट दी होगी।
सुलभा को देखते हुए करन बोला, 'देखो यतिन कितना ख्याल करता है, हमारी अनुपस्थिति में लान की घास काट डाली। अभी तो रात हो गयी है, सुबह चल कर उसको थैंक्स बोल देंगे।'
'लेकिन यतिन क्या इतनी दूर से अपनी मूविंग मशीन ले के आया होगा। हमारी मशीन तो गैराज में बंद थी।'
'तो और कौन इतना करेगा। यहाँ तो वैसे ही कोई दूसरे घर में तांक झांक नहीं करता। चलो, कल सुबह ही पता करेंगे।'
सुबह होते ही यतिन का फोन आ गया, 'और करन इण्डिया से कब लौटे।'
'कल शाम'
'और यात्रा कैसी रही। किस एयरलाइन्स से आये।'
'वही कैथे पैसिफिक, अच्छी थी। ठीक से आ गए। यार मैं आया तो देखा कि लॉन की घास कटी पड़ी थी, तूने तो नहीं काटा! क्योंकि देख रहा हूँ तो पड़ोसी की खुद ही बढ़ी हुई है।'
'अपना लेटर बॉक्स चेक किया, कौंसिल का कोई बिल तो नहीं आया है।'
'नहीं, अभी देखता हूँ।'
करने ने लेटर बॉक्स देखा, घास की कटाई का, कौंसिल का डेढ़ सौ डॉलर का बिल पड़ा था। वैसे उसकी घास सत्तर पचहत्तर डालर में कट जाती।
पीकदान
वर्मा जी को पान खाने की बड़ी तलब लगी। सन्नी से बोले, 'बेटा चल पान के ला। विदेश में ऐसा तो है नहीं कि गली गली में पान की गुमती हो। सन्नी, वर्मा जी को गाड़ी में बिठा कर ले गया। सात आठ किलोमीटर जाकर तो पान की दुकान मिली।
वर्मा जी ने मुंह में पान दबा लिया और दोनों वहीँ बाजार में घूमने लगे। मुंह में दबा तो लिया अब थोड़ी देर में थूकने की जगह ढूंढने लगे। वे चारों और नजर दौड़ाये पर उन्हें कहीं ऐसी जगह नहीं दिख रही थी कि थूक सकें, वर्मा जी के लिए बड़ी समस्या हो गयी।
अब वे सोचने लगे कि किसी माल में चलें वहां वाश बेसिन तो होगा ही। पर, वे डर भी रहे थे कहीं बेसिन पर छींट पड़ गयी और आजकल जगह जगह कैमरे भी लगे होते हैं, पकड़े गए तो अच्छा खासा दंड भरना पड़ेगा।
आखिरकार, वे सन्नी से बोले, 'बेटा थूके कहाँ ?'
'पापा! इसीलिए, यहां लोग पान नहीं खाते। अगर खाया है तो थूकने का प्रबंध खुद ही करना होगा। इंडिया जैसे कहीं भी सड़क पर नहीं थूक सकते।'
सन्नी की गाड़ी में एक पोलेथिन बैग पड़ा था, निकाल कर थमा दिया, 'ये लीजिये कहीं कूड़ेदान दिखेगा तो वहाँ फेंक देंगे।"
कुत्ते का मल
वर्मा जी अपनी श्रीमती, मनोरमा के साथ टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक गोरा अपने कुत्ते को घुमा रहा था।
जैसे ही कुत्ते ने मल किया, उसने अपना पॉलिथीन का दस्ताना पहना और उठाकर एक पॉलीथिन बैग में डाल लिया। यह दृश्य वह अपनी पत्नी को दिखाने लगे।
मनोरमा ने जब यह देखा तो वह आश्चर्य चकित थी, 'यह कुत्ते की टट्टी क्यों उठा रहा है।'
वर्मा जी ने तुरंत ही उनकी शंका का का समाधान कर दिया, 'यहाँ के लोग साफ सफाई का बहुत ध्यान रखते हैं। कहीं पर कूड़ा पड़े हुए तुमने देखा, सभी लोग कूड़ेदान में ही कूड़ा डालते हैं। ये भी इस मल भरे पॉलीथिन को कहीं कूड़ेदान देख कर डाल देगा।'
'फिर तो यहाँ कुत्ता पालना भी बड़ी समस्या है। इतना सब करो तब तो !'
'हां वो तो है ही।'
'फिर, ये सब अपने इंडिया में क्यों नहीं होता। वही इंडियन जब यहाँ आते हैं तो सफाई रखते हैं, लेकिन वहां गन्दगी फैलाने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता।''
'यहां पर डर है न, कोई गन्दगी फैलाएगा तो भारी दंड भरना पड़ेगा। वहां तो गन्दगी भी फैलाएंगे और धौंस भी जमाएंगे। किसी का कोई रिश्तेदार नेता है, तो किसी का अधिकारी। लोगों को अपने कर्तव्यों से अधिक, अपने मित्रों और रिश्तेदारों के पद का गर्व होता है। यहाँ ये सब धौं नहीं चलता बल्कि अपराध में गिना जाता है। हमारे यहाँ भी यदि दंड का डर हो क्यों नहीं सुधरेगा!'
भेद भाव नाम का अन्तर
यहाँ का पहनावा
'शान्ती कल पिकनिक में तू क्या पहन रही है?'
'सोच रही हूँ जींस और टॉप पहन लूँ, सूट तो यहां अच्छा नहीं लगेगा। और तू।'
'मैं तो स्कर्ट और टॉप पहनूंगी, तू भी ले ले मेरे पास कई स्कर्ट पड़े हैं।'
'नहीं मुझे स्कर्ट की आदत नहीं है। स्कूल के बाद तो कभी स्कर्ट पहना ही नहीं। वैसे संध्या यहाँ का पहनावा देख रही हूँ तो इंडिया के उल्टा ही है।'
'वो क्या ?'
'अपने इंडिया में तो मर्द चाहे जैसा पहनें, पर स्त्रियां पूरा तन ढक कर रखती हैं। और यहाँ देखती हूँ तो, औरतें छोटे कपड़े पहनती हैं और मर्द पूरी पैंट पहनते हैं।'
'संध्या हंसने लगती है, यहाँ की औरतें पावरफुल हैं न।'
'हाँ यार, तुझे ही देखती हूँ। जब घर में रहती है पायजामा या लेगी पहनती है ड्यूटी जाती है तो चड्ढी
और फराक पहन कर। मुझे तो यहाँ का पहनावा समझ नहीं आ रहा है।'
'पता है छोटे ड्रेस में लड़कियां बेब लगती हैं, फुल ड्रेस पहनकर तो माँ सी लगने लग जाती हैं। अभी तू नयी आयी है, धीरे धीरे ऐसी ही हो जाएगी। '
'इतना तो कभी नहीं हो पाऊँगी। शादीशुदा स्त्री को बेब बनकर, किसे दिखाना है। यहाँ की लड़कियों का क्या! वो तो खसम बदलती रहती हैं, पर हमने अपने समाज से जो सीखा पढ़ा है, उसकी एकदम से तिलांजलि थोड़े ही दे देंगे।'
'अरे ठीक है यार ! अलग अलग देश की अलग संस्कृति है। इसमें बुरा क्या है ? कहते हैं न, 'जैसा देश वैसा वेश।'
दोगुनी होली
हेमंत और ऋचा अपने दो बच्चों के साथ, दो तीन साल से अकेले होली मानते आ रहे थे। बस अपने घर के लॉन में बच्चों ने इनके ऊपर पिचकारी मार दी और इन्होंने बच्चों को गुलाल मल दिया या फिर आपस में। कुछ और भारतीय परिवार स्टॉकहोम में थे मगर से दूर रहते थे। शाम को किसी स्थान का चयन कर, होली मिलन का कार्यक्रम होता था, कभी आलस हुआ तो जाने की टाल हो जाती।
इस होली पर, सिंगापुर से कुलदीप और कविता भी अपने दो बच्चों के साथ स्वीडन घूमने आये थे। अब तो आठ लोग थे, सुबह होते ही बच्चे पिचकारी लेकर लॉन में निकल पड़े। जब आठ के आठ, प्राणी गुलाल मलकर लॉन में उछाल कूद करते खिलखिलाने लगे तो उधर से गुजरते हुए गोरों का उधर की और देखकर मुस्कराना तय था। मन तो उनका भी ललचाता कि इस तरह के माहौल का वो भी हिस्सा बन जाते, यह पर उनकी संस्कृति नहीं थी। इस बार, हेमंत के बच्चों के होली का आनंद तो दोगुने से भी अधिक था एक तो चार की जगह आठ लोग होली खेल रहे थे दूसरे कई महीनों के बाद बर्फ से छुटकारा मिला था जैसे की फ्रीज से निकल कर आये हों।
हॉर्न पड़ गया
रज्जाक अपने दोस्तों में कई दिनों तक मजाक का पात्र बना रहा। जब भी उसके यहाँ कोई मित्र आता या वे कहीं किसी के घर जाते तो रज्जाक की बीबी सलमा उन्हें बताने से नहीं चुकती, 'पता है पिछले सन्डे को हम जा रहे थे तो इसे हॉर्न पड़ गया।'
जब सलमा ने यह बात मंसूर को बताई तो रज्जाक सफाई देने लग गया, 'अरे गाड़ी चला रहे हैं तो हॉर्न पड़ गया तो कौन सी आफत आ गयी। इंडिया में देखो तो सिग्नल पर भी अभी हरी बत्ती भी नहीं होती कि पीछे वाले हॉर्न पर हॉर्न बजाने लगते हैं।'
'लेकिन यह इंडिया नहीं है बच्चू ! यह न्यूज़ीलैंड है। यहां हॉर्न पड़ने का मतलब गलत ड्राइविंग। क्या गलती किया था।'
'कुछ नहीं मुझे टर्न लेना था और मैंने संकेत नहीं दिया। मेरे पीछे वाली गाड़ी ने हॉर्न दे दिया।'
'यह तो गंभीर गलती है। अगर वह स्पीड में हो और बिना सिग्नल के मोड़ तो कंफ्यूज हो जायेगा। यहाँ खामखाह कोई हॉर्न भी नहीं बजाता और इस तरह की गलती भी नहीं करता।'
पार्किंग
बजाज साहब को हवाई अड्डे से निकलने में कुछ देर हो गयी। बाहर अंकित पहले से ही उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। डैडी के निकलने में देर होने से वह घबराने लगा। वे पहली बार स्विट्ज़रलैंड आये हैं, कहीं कोई परेशानी तो नहीं पड़ गयी। वैसे तो ज़्यूरिख हवाई अड्डे पर ऐसी कोई समस्या नहीं है, बाहर निकलने का सीधा रास्ता है और ऐसा कोई सामान भी नहीं कि कस्टम में कोई समस्या हो। सोच ही रहा था कि बजाज साहब दिख गए। वह झट से बढ़कर, उनकी ट्रॉली पकड़ लिया। पैर छूकर, पूछा, 'क्या हो गया था, इतनी देर क्यों हो गयी ?'
'सामान आने में थोड़ा समय लग गया।'
'आईये चलिए, थोड़ा कदम बढ़ा कर ही चलिए, बस पांच मिनट बचे है फिर पार्किंग के बहुत पैसे देने पड़ जायेंगे।'
दोनों जल्दी जल्दी पार्किंग की ओर बढ़ने लगे। अंकित शीघ्रता करते हुए डिक्की में सामान रखा और गाड़ी निकलने लगा। जब वह एग्जिट पर पहुंचा तो पहले से दो गाड़ियां खड़ी थीं और अंकित को पहले उनके निकलने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी।
जब तक उसका नंबर आया और अपना कार्ड पंच किया तब तक निर्धारित समय से दो सेकंड ऊपर हो गया। अब तो जहाँ उसे दस यूरो देने थे, पचीस यूरो का भुगतान कारन पड़ा। वह बहुत पछताया, बताओ बस दो सेकंड बिलम्ब के कारण उसे पंद्रह यूरो अधिक खर्च करने पड़ रहे हैं। लेकिन अब कर भी क्या सकता था, यहाँ कहें तो किससे, मशीन किसी की सुनती नहीं।
रास्ता भूल गया
केप टाउन से केप नेचर रिज़र्व का कार से केवल एक घंटे का रास्ता था। लेकिन रवि को रास्ता पता नहीं था उसे तो जीपी एस सिस्टम का प्रयोग करके ही जाना था। वह घर पर फ़ोन चार्ज नहीं कर पाया, कुछ ही दूर गया कि फ़ोन की बैटरी का चार्ज समाप्त हो गया। उसकी कार का चार्जर, कल स्वीटी ने निकाल कर अपनी गाडी में लगा लिया था। अब तो बड़ी समस्या हो गयी कि रास्ता कैसे पता करें। अब तो न गूगल मैप उपलब्ध था न किसी मित्र से कोई मदद मिल सकती थी। वैसे सड़क पर जगह जगह मार्ग दर्शन के बोर्ड तो लगे तो थे मगर कहीं देखने में कोई चूक हो गयी तो वहां रास्ता बताने वाला भी कोई नहीं मिलता। और हुआ भी वही, एक जगह साइनेज (मार्ग सूचक) पर उसकी दृष्टि नहीं पड़ी और वह गलत दिशा में मुड़ गया। काफी दूर तक चलने पर भी जब केप नेचर रिज़र्व का कोई बोर्ड नहीं दिखा तो उसे शंका हुई कि वह गलत रास्ते पर चल पड़ा है। अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, ऐसे कहीं सड़क के किनारे गाड़ी रोक कर किसी को हाथ भी नहीं दे सकता था। वहां भारत जिसे तो था नहीं, कहीं भी रोककर रास्ता पूछ लो और एक से पूछो तो बताने के लिए दो तीन लोग आ जाते हैं।
उसे चिंता होने लगी कि गलत रास्ते पर कहीं दूर निकल गया तो उतना फिर वापिस आना पड़ेगा। अब तो उसके पास एक ही रास्ता था कि रह में कोई रेस्टॉरेंट मिले तो वहां रूककर फ़ोन चार्ज करे। थोड़ा और बढ़ा तो आगे मैक्डोनाल्ड का एक रेस्तरां दिख गया। अब उसकी जान में जान आयी। उसने वहां अपनी कार रोकी और फ़ोन चार्ज करने के लिए लगाकर, काफी पीने बैठ गया। काफी पीते हुए उसकी नजर एक भारतीय परिवार पर पड़ी। रवि उठकर गया और उनसे पूछ लिया, 'क्या आप भारतीय हैं ?'
उत्तर हाँ में ही मिला। जब रवि ने उन्हें यह बताया की वह केपटाउन केप नेचर रिज़र्व जा रहा है तो पता चला की वह उलटी दिशा में चालीस किलोमीटर चला आया था। पता चला, वह परिवार भी रिज़र्व ही जा रहा था अब रवि ने उनके पीछे अपनी गाड़ी लगा दिया, वैसे फ़ोन भी थोड़ा चार्ज हो ही गया था।
अकेलापन
यूरोप के किसी देश, जवानी में जाओ तो ठीक। अगर कोई बुढ़ापे में गया तो घर ही काटने को दौड़ता है। उपाध्याय जी को कुछ इसी तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ा। उनके बेटी दामाद तो काम पर चले जाते, ये बेचारे अकेले कभी कोई किताब लेकर बैठ जाते तो कभी टहलने निकल पड़ते।
पास पड़ोस में दोस्त न मित्र, गोरे कभी कभी हेलो हाय तो कर लेते पर उसके आगे कोई बात नहीं होती।
न टीवी, रेडियो भी इन्हीं की भाषा और संस्कृति बोलते हैं। आखिर बेटी दामाद से कितनी बात करें। एक महीने तो किसी तरह काट लिए, अब वे चाहते थे कितनी जल्दी इंडिया वापस चले जाएँ। अपना इंडिया कितना अच्छा है, वहां अकेला रहकर भी अकेला नहीं। आते जाते कितने ही लोग पूछ लेते हैं, दादा कैसे हो।
एक दिन शाम को जब सचिन ड्यूटी से आया तो बोल बैठे, 'बेटा टिकट थोड़ा पहले का करा दो तो ज्यादा पैसे काटेंगे।'
' जो काटेंगे वो तो देख लेंगे। आप अपनी परेशानी बताईये।'
'मैं चाहता हूँ थोड़ा जल्दी वापस चला जाऊं।'
'लेकिन पापा जी, अभी तो एक महीना भी नहीं हुआ, कम से कम दो तीन महीने तो रुकिए।'
'नहीं बेटा, मेरे लिए अपना इंडिया ही ठीक है। यहाँ तो काला पानी लग रहा है। '
'अच्छा रुकिए मैं टीवी में इंडियन चॅनेल लगवा देता हूँ और अगले महीने एक सप्ताह की छुट्टी लेकर पूरा यूरोप घूमने चलेंगे।'
'अब कई बातें सोचकर, उपाध्याय जी अपने निर्धारित समय पर ही लौटे।'
कैंपिंग
विपिन इस बार अपने मम्मी पापा को कैंपिंग का अनुभव करना चाहता था। शुक्रवार की शाम को ही वहां लगाने के लिए टेंट लेकर चल दिया। अकेले बोर न हो, इसलिए तीन चार और मित्रों को भी बोल दिया था और उन्हें सीधे तकपूना बीच पहुंचने के लिए बता दिया था। तकपूना, ऑकलैंड के पास ही था, सभी अपने अपने टेंट लेकर, अँधेरा होने तक पहुँच गए।
तकपूना में ठहरने के लिए समुद्र तट पर तीन प्रकार के साधन थे। पहला तो कैंपिंग मोटर या कारवां लेकर जाओ। उसमें गाड़ी में ही टीवी, फ्रिज आदि से परिपूर्ण, दो लोगों के सोने की वयवस्था थी। वहां जाकर कैंपिंग पार्क में गाड़ी खड़ी करो, और घूम फिर कर आकर उसी में सो जाओ।
दूसरा था लॉज और तीसरा अपना टेंट ले जाओ या वहीँ से किराये पर ले लो। विपिन और नीता ने तीसरा विकल्प चुना। टेंट और मोटर में कैंप करने वालों को मामूली शुल्क देकर, वहां ये सुविधाएँ उपलब्ध थीं -
शौच व स्नान गृह, गैस आपूर्ति के साथ रसोई, कूड़ेदान, दुकान, रेस्तरां आदि।
दिन तो बोटिंग करने, समुद्र में नहाने और लहरों का आनंद लेने में बीत गया। शाम होने पर समुद्र का दृश्य देखने लायक था। विपिन के पापा ने शाम के समय समुद्र के इस तरह का अवलोकन पहले कभी नहीं किया था। सूर्यास्त के समय पूरा समुद्र स्वर्णिम हो गया था, और धीरे धीरे वह स्वर्णिम रंग चांदनी होने लगा और कुछ देर पश्चात् ही आसमान से चाँद झांकने लगा। वहीँ समीप ही बारबेक्यू था, ये लोग चिक्केन और फिश टिक्का ले गए थे भूनना शुरू हो गया। फिर क्या था फोल्डिंग कुर्सी खोल कर खुले रेत में बीयर की बोतलें लेकर सभी बैठ गए। विपिन, नीता और उनके दोस्तों के लिए तो यह कोई खास बात नहीं थी, परन्तु विपिन के पापा, जिन्होंने हमेशा दिल्ली की सड़कें और बाजार ही देखा था, को ऐसा लग रहा था कि किसी और लोक में आ गये हों। शहर के भीड़भाड़ और शोर शराबा से दूर वैसे ही अच्छा लग रहा था ऊपर से चांदनी रात में समुद्र का नजारा बीयर की बोतल के साथ, इस अनुभूति को शब्दों में वर्णन कर पाना कठिन था।
लेकिन बस दो दिन, फिर लौट के आना ही था।
कार में कैद
रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे, अभी पार्टी चल ही रही थी। सुमित, जयंत, मुकेश सभी ए थे पर श्याम नहीं दिखा तो आशु ने पूछ दिया, 'क्या हुआ? श्याम नहीं आया!'
विजय ने बताया, 'नहीं शुक्रवार है न, उसके ऑफिस वालों की भी पार्टी है। बारह बजे तक आ ही जायेगा। जब भी आएगा, यहाँ तुम लोगों से मिलने जरूर आएगा।'
तब तक विजय के फोन की घंटी बजी। वह श्याम का ही फ़ोन था। 'हेलो विजय! तू लॉरेंस रोड आ जा, पुलिस ने पकड़ रखा है। '
'क्यों, क्या हो गया?'
'अरे ब्रेथ रिजल्ट पॉजिटिव निकला है। मैं गाड़ी चला नहीं सकता। बस गाड़ी में बैठा हूँ, ये कह रहे हैं कम से कम तीन घंटे यहीं रहना पड़ेगा। फिर दुबारा चेक करेंगे अगर तब तक नेगेटिव हो गया तभी कार लेकर जाने देंगे। '
'ज्यादा पी ली थी क्या ?'
'नहीं कोई खास ज्यादा नहीं, अब मशीन ने पकड़ ही लिया तो ज्यादा ही समझो। तू जल्दी आ जा, तूझे कार चला कर ले चलनी है। '
'लेकिन मैं भी तीन पेग तो ले चुका हूँ। और सुमित, जयंत, मुकेश सभी ले रहे हैं। देखता हूँ लड़कियों में से किसी ने कुछ नहीं लिया हो तो लेकर अत हूँ। '
विजय ने गरिमा से कहा तो वह भी वाइन पी रही थी। बस अदिति अभी रसोई में व्यस्त थी, अभी वाइन का पहला ही सिप लिया था। उसने कुल्ला किया और चल दी। वे आधे घंटे में श्याम को लेकर आ गए।
आते ही जयंत बोला, 'ले, एक पेग और लगा मूड ठीक हो जायेगा।'
**************
बीमा के बिना
कितना इंडिया में या वहाँ की पालिसी
और नीता
आज मित्र मंडली पहाड़ियों के उन वादियों से सभी लौट आये
बोतल से बाहर
स्कॉच और बीयर की बोतलों का खूब सारा भंडार
पहाड़ियों के पीछे का नजारा देखा
नहीं
बोतल से बाहर भी दुनिया है भाई
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