जज साहब
जज के कमरे से बाहर निकल कर जमुना प्रसाद, न्यायलय के प्रांगण में ही एक पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठ कर बड़बड़ाने लगे : 'बताओ कितने वर्ष हो चुके, इतने साक्ष्य भी प्रस्तुत कर दिया, मगर न्यायालय एक हत्यारे को सजा तक नहीं दे पा रही।'
बगल में बैठा एक व्यक्ति बोला, 'आप जिस अपराधी की बात कर रहे हैं वह बहुत प्रभावशाली है, मंत्रियों तक उसकी पहुँच है, राजनीति में भी दखल रखता है। जज साहब भी क्या करें, आखिर उन्हें भी तो इसी समाज में रहना है। कोई किसी प्रभावशाली व्यक्ति का रिश्तेदार तो कोई खुद का ही। अपराधी तत्व तो सरकार तक से जुड़े हुए हैं। जज साहब को भी अपनी बचानी है।'
जमना प्रसाद भड़क उठे। 'इस तरह का समाज बनने में क्या जज साहब का हाथ नहीं है? अगर निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपराधियों को सजा देते होते तो ऐसा समाज पनपता ही कैसे। प्रभावशाली तो वे तब होते हैं जब गलत और अवैध तरीके से अपना प्रभाव दिखाते हैं, उनके विरुद्ध एक तो शासन कुछ नहीं करना चाहता और कोई शिकायत न्यायलय तक पहुँच भी जाय तो न्याय में इतना बिलंब कि वह महत्वहीन हो जाय, ये समझौता है या न्याय ?'
वह व्यक्ति निःशब्द था।
झूठ का पाठ
साली की राखी
कमला, होली पर जीजा से खूब होली खेली। पिचकारी भर भर कर रंग डालने लगी। प्यारे लाल, आखिर ससुराल जो आये थे। जीजा जी भी साली की ठिठोली का भरपूर आनंद उठा रहे थे। एक बार रंग डाल कर कमला भागने लगी तो जीजा को भी अवसर मिला और हाथ में गुलाल लिए दौड़ पड़े। कमला को पकड़ कर उन्होंने बाँहों में भर लिया और धीरे धीरे मुंह पर गुलाल मलने लगे।
कमला चिल्लाती रही, 'जीजा जी! दूर से। इस तरह नहीं पकड़ो।'
पर, जीजा ने एक न सुनी, 'हे, हे; साली आधी घरवाली' कहते गुलाल मलते रहे।
गुलाल आंख में पड़ गया और कमला पीड़ा से व्यथित हो गयी। कमला की भाभी, उर्मिला सब देख रही थी। उसने तुरंत ही आंख साफ किया और कमला को कमरे में ले गयी। प्यारे लाल यूँ पश्चाताप तो कर रहे थे, फिर भी उर्मिला ने सुना दिया, 'नंदोई जी! आप कह रहे थे, साली आधी घरवाली होती है। एक बात बताना - पति पत्नी के ससुराल के बाकी रिश्ते एक दूसरे के लिए समान्तर होते हैं, जैसे पिताजी, माताजी, भाई साहब आदि, तो बहन को बहन क्यों नहीं ? साली क्यों ?'
प्यारे लाल के पास कोई उत्तर तो था नहीं, और तो और ढिठाई से प्रश्न कर दिया, 'तो क्या साली से राखी बँधवाऊं ?'
'बंधवा लोगे तो बड़प्पन ही बढ़ेगा, छोटे थोड़े ही हो जाओगे, नंदोई जी !'
महंगा लहंगा
'इतना महंगा लहंगा और बस एक बार पहनना है। देखो मालती के लिए लहंगा बनवाया, बस एक बार शादी में पहनी और तबसे धरा ही रखा है। 'बहन जी! सुशीला की शादी में लहंगा चुन्नी मत बनवाना . मालती का संभाल कर रखा है, ले लेना। बिलकुल नया है, बस एक बार ही तो पहनी है। शादी के बाद, ड्राई क्लीनिंग करवाके रख लेंगे। जो पैसे बचेंगे कहीं और काम आ जायेंगे। शादी व्याह में तो दुनिया भर के खर्चे होते हैं। ' मालती की माँ ने सुमित्रा से कहा।
सुमित्रा ने भी हां में हां मिला दिया।
बारात आ गयी थी, जयमाल की तैयारी चल रही थी। दूल्हे राजा मंच पर सजे बैठे थे। सुशीला को उसकी सहेलियां, सुन्दर सी चादर की छाँव में लेकर आ रही थीं। सभी की नजर दुल्हन की सुंदरता पर टिकी थी। सभी की सभी स्त्रियां सुशीला की सुंदरता की प्रशंसा कर रही थीं। कोई उसके मेक-अप की प्रशंसा करता तो कोई कहता कितनी सुन्दर जोड़ी है।
स्त्रियों की भीड़ में मालती की दादी भी थीं। वे एक एक को खोद कर बता रही थी, 'देखो मालती के लहंगे में शुशीला कितनी सुन्दर लग रही है। बहुत मंहगा बनवाया था।'
पड़ोसी तो बस पड़ोसी है
सिंघवी जी को अपने प्रारम्भ से ही अपने पद का बड़ा गरूर था। पदोन्नति के पश्चात वे उप आयुक्त बन चुके थे। उनके बगल वाला फ्लैट कामता का था। कामता, एक सरकारी विभाग में चपरासी के पद पर कार्यरत था। सिंघवी जी के यहां आने वाला उनका कोई मित्र या रिश्तेदार, जब पूछता बगल वाले फ्लैट में कौन रहता है? तो हेय भाव से बोलते, ' है, एक चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी।'
एक बार, उनका सहकर्मी सचदेवा आया तो उससे भी उन्होंने वही बात कही। सचदेवा को यह परिचय अच्छा नहीं लगा और बोल पड़ा, 'सिंघवी जी! पडोसी तो पडोसी होता है, चपरासी या आयुक्त नहीं। आप घर में भी निदेशक ही बने रहते हैं क्या? अरे, जहाँ हैं, वहां हैं। हो सकता है, आपका कोई रिश्तेदार, किसी छोटे पद पर हो, इसका अर्थ यह तो नहीं वह आपके अधीनस्थ हो गया।' मगर सिंघवी जी को इन बातों का कोई अंतर नहीं पड़ता। वे अपनी प्रतिष्ठा के प्रति बड़े सजग रहते और पद का गर्व रखते। ये तो उनकी बदकिस्मती थी आबंटन में उनके पड़ोस वाला फ्लैट चपरासी का निकल गया। वे बहुत ईमानदार थे और उनके ऊपर अपने परिवार का दायित्व इतना था कि वे बड़ा घर नहीं ले सकते थे। उन्होंने एक बार प्राधिकरण में फॉर्म भर दिया और यह फ्लैट निकल आया। वे तो कामता को हेय की दृष्टि से देखते परन्तु कामता उनकी सदैव मदद करता रहता। उनके बच्चों की शादी में उसने, व्यवस्था करवाने, मेहमानों के आवभगत करने में बहुत मदद की, यहाँ तक कि अपने फ्लैट का एक कमरा उनके मेहमानों के लिए खाली कर दिया।
उम्र के साथ सिंघवी जी सेवानिवृत्त हुए। अब विभाग की सभी सुविधाएँ बंद हो गयीं। सभी काम उन्हें स्वयं ही करना होता। बेटे को पढ़ा लिखा कर विवाह कर दिया और वह बहू को लेकर बंगलोर चला गया था। दोनों बेटियां अपने अपने ससुराल चली गयीं। एक बार वे तेज बुखार और शरीर की अकड़न से बहुत पीड़ित हुए। घर पर उनकी पत्नी, रमा के अतिरिक्त कोई नहीं था। रमा को कुछ नहीं सूझ रहा था, वह क्या करे, कहाँ दिखाए। उसने बेटे श्रीकांत को फोन किया तो वह परसों तक आने को बोला। सिंघवी जी के पुराने कार्यालय में फ़ोन किया तो सचदेवा नहीं मिला और सैनी ने मीटिंग में व्यस्त होने की बात कही। रमा बहुत व्यग्र होने लगी। अभी एम्बुलेंस बुलाने के लिए टेलीफोन ही करने जा रही थी कि उनकी बीमारी के बारे में कामता की पत्नी को पता चला। कामता की पत्नी ने जैसे ही कामता को फ़ोन पर बताया, वह छुट्टी लेकर आ गया। कामता ने लक्षण से भांप लिया, वे डेंगू के शिकार हो गए थे। बिना देर किये सिंघवी जी को लेकर सरकारी अस्पताल गया। वहां एक डॉक्टर से उसका परिचय था, इस कारण बिना किसी परेशानी के उनकी अच्छी देख भाल हो गयी। उनका पलेटलेट बहुत गिर गया था और डॉक्टर ने तुरंत पलेटलेट का प्रबंध करने के लिए बोला।
अस्पताल से पलेटलेट लेने के लिए, खून देने की आवश्यकता पड़ गयी। कामता ने अपने बेटे से अनुरोध कर, रक्त दान करवाया। जब तक श्रीकांत बंगलोर से आया सिंघवी जी के स्वास्थ्य में काफी सुधार हो चुका था। श्रीकांत बस अस्पताल से घर लाने की औपचारिकता भर कर पाया। अब वे कामता के बड़े शुक्रगुजार थे। उसके कारण सही समय पर चिकित्सा के अतिरिक्त उनके काफी पैसे भी बच गए। निजी अस्पताल में तो लाख से ऊपर का बिल आता।
अब कामता कभी किसी से कहता, 'मैं सरकार में एक छोटा सा कर्मचारी हूँ ' तो सिंघवी जी तुरन्त टोक देते, 'कौन कहता है, आप छोटे हो। देखो, मैं तो वो भी नहीं हूँ।'
एस० डी० तिवारी
रैली ने रोकासिंघवी जी को अपने प्रारम्भ से ही अपने पद का बड़ा गरूर था। पदोन्नति के पश्चात वे उप आयुक्त बन चुके थे। उनके बगल वाला फ्लैट कामता का था। कामता, एक सरकारी विभाग में चपरासी के पद पर कार्यरत था। सिंघवी जी के यहां आने वाला उनका कोई मित्र या रिश्तेदार, जब पूछता बगल वाले फ्लैट में कौन रहता है? तो हेय भाव से बोलते, ' है, एक चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी।'
एक बार, उनका सहकर्मी सचदेवा आया तो उससे भी उन्होंने वही बात कही। सचदेवा को यह परिचय अच्छा नहीं लगा और बोल पड़ा, 'सिंघवी जी! पडोसी तो पडोसी होता है, चपरासी या आयुक्त नहीं। आप घर में भी निदेशक ही बने रहते हैं क्या? अरे, जहाँ हैं, वहां हैं। हो सकता है, आपका कोई रिश्तेदार, किसी छोटे पद पर हो, इसका अर्थ यह तो नहीं वह आपके अधीनस्थ हो गया।' मगर सिंघवी जी को इन बातों का कोई अंतर नहीं पड़ता। वे अपनी प्रतिष्ठा के प्रति बड़े सजग रहते और पद का गर्व रखते। ये तो उनकी बदकिस्मती थी आबंटन में उनके पड़ोस वाला फ्लैट चपरासी का निकल गया। वे बहुत ईमानदार थे और उनके ऊपर अपने परिवार का दायित्व इतना था कि वे बड़ा घर नहीं ले सकते थे। उन्होंने एक बार प्राधिकरण में फॉर्म भर दिया और यह फ्लैट निकल आया। वे तो कामता को हेय की दृष्टि से देखते परन्तु कामता उनकी सदैव मदद करता रहता। उनके बच्चों की शादी में उसने, व्यवस्था करवाने, मेहमानों के आवभगत करने में बहुत मदद की, यहाँ तक कि अपने फ्लैट का एक कमरा उनके मेहमानों के लिए खाली कर दिया।
उम्र के साथ सिंघवी जी सेवानिवृत्त हुए। अब विभाग की सभी सुविधाएँ बंद हो गयीं। सभी काम उन्हें स्वयं ही करना होता। बेटे को पढ़ा लिखा कर विवाह कर दिया और वह बहू को लेकर बंगलोर चला गया था। दोनों बेटियां अपने अपने ससुराल चली गयीं। एक बार वे तेज बुखार और शरीर की अकड़न से बहुत पीड़ित हुए। घर पर उनकी पत्नी, रमा के अतिरिक्त कोई नहीं था। रमा को कुछ नहीं सूझ रहा था, वह क्या करे, कहाँ दिखाए। उसने बेटे श्रीकांत को फोन किया तो वह परसों तक आने को बोला। सिंघवी जी के पुराने कार्यालय में फ़ोन किया तो सचदेवा नहीं मिला और सैनी ने मीटिंग में व्यस्त होने की बात कही। रमा बहुत व्यग्र होने लगी। अभी एम्बुलेंस बुलाने के लिए टेलीफोन ही करने जा रही थी कि उनकी बीमारी के बारे में कामता की पत्नी को पता चला। कामता की पत्नी ने जैसे ही कामता को फ़ोन पर बताया, वह छुट्टी लेकर आ गया। कामता ने लक्षण से भांप लिया, वे डेंगू के शिकार हो गए थे। बिना देर किये सिंघवी जी को लेकर सरकारी अस्पताल गया। वहां एक डॉक्टर से उसका परिचय था, इस कारण बिना किसी परेशानी के उनकी अच्छी देख भाल हो गयी। उनका पलेटलेट बहुत गिर गया था और डॉक्टर ने तुरंत पलेटलेट का प्रबंध करने के लिए बोला।
अस्पताल से पलेटलेट लेने के लिए, खून देने की आवश्यकता पड़ गयी। कामता ने अपने बेटे से अनुरोध कर, रक्त दान करवाया। जब तक श्रीकांत बंगलोर से आया सिंघवी जी के स्वास्थ्य में काफी सुधार हो चुका था। श्रीकांत बस अस्पताल से घर लाने की औपचारिकता भर कर पाया। अब वे कामता के बड़े शुक्रगुजार थे। उसके कारण सही समय पर चिकित्सा के अतिरिक्त उनके काफी पैसे भी बच गए। निजी अस्पताल में तो लाख से ऊपर का बिल आता।
अब कामता कभी किसी से कहता, 'मैं सरकार में एक छोटा सा कर्मचारी हूँ ' तो सिंघवी जी तुरन्त टोक देते, 'कौन कहता है, आप छोटे हो। देखो, मैं तो वो भी नहीं हूँ।'
एस० डी० तिवारी
बहुत बड़ी रैली थी। कहने वाले कह रहे थे, पार्टी वालों ने किराये पर भीड़ जुटाया है। दक्ष के पापा को दिल का दौरा पड़ा, एम्बुलेंस में लिये वह रास्ता मिलने की प्रतीक्षा कर रहा था। रैली थी कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एम्बुलेंस का साईरन निरंतर बज रहा था। पर भीड़ के कहाँ कान और कहाँ मस्तिष्क। दक्ष समझ नहीं पा रहा था कि वह इंसानों कि बस्ती में है या किसी जंगल में। आखिर नेता लोग अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिये लोगों को क्यों तंग करते हैं, वो भी लोगों के ही द्वारा। दक्ष एम्बुलेंस से उतर कर अनुरोध करने लगा 'भाई एम्बुलेंस निकल जाने दो, पापा की जान खतरे में है, कहीं अनहोनी न हो जाय।'
रैली के बीच में से आवाज आई, 'शीशा तुड़वाना है क्या ?'
अब उसके पास प्रतीक्षा और ईश्वर से प्रार्थना के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था।
अंतिम अध्याय
मालिनी के घर सहेलियों का मजमा लग गया था। कोई किट्टी पार्टी नहीं थी, बस यूँ ही साथ की पढ़ी कमला और सोनम आ गयी थीं। पड़ोस की मनोरमा भी आ धमकी। मालिनी के पति शहर से कहीं बाहर गए हुए थे। दिन भर बैठ कर चारों ने खूब बातें की, चाय समोसा हुआ। अब बच्चों के स्कूल से आने का समय हो चुका था।
'भाई वाह ! मजा आ गया। बहुत दिनों के बाद, इतनी बात करने का अवसर मिला, जी भर के बातें हो गयीं, फोन पर इतनी बात कहां हो पातीं। अब चलते हैं, तेरे बच्चों के आने का समय हो गया', कमला ने कहा।
'हां, हां' करते सब घर से निकल गयीं। यूँ लग रहा था की अब बातों का अंत हो चुका था, पर जब वे घर की दहलीज पर खड़ी हुईं तो एक-एक करके और बहुत सी बातें याद आने लगीं। दरवाजे पर खड़े खड़े, आधा घंटा निकल गया, लग रहा था कि अभी कितनी सारी बातें बाकी रह गयीं। आज का दिन तो बातों के लिए बहुत कम था। इतने में मालिनी का बेटा स्कूल से आ गया।
'चलो, अब चलती हूँ, अप्पू आ गया। उसे कुछ खाने पीने को दूँ।'
तभी सोनम बोली, 'अरे कांता की बात तो बतानी ही भूल गयी।'
'आज नहीं, फिर कभी। '
'चल फ़ोन पर बात कर लेंगे।'
न्याय
कल्लू और जानी दोनों एक ही अपराध, मोबाइल चुराने में गिरफ्तार हुए थे। कल्लू की तो पहली पेशी में ही जमानत हो गयी, पर जानी अति निर्धन होने के कारण न तो वकील कर पाया, न ही, उसकी कोई जमानत देने वाला था। वह अपने अपराध के लिए नियत सजा का लगभग आधा समय जेल में बिता चुका था। इस बार न्यायलय में पेशी पर उसकी माँ भी आई थी। उसे जो भी वकील मिलता, 'मेरे बेटे को छुडवा दो साहब, पुलिस वालों ने उसे झूठा ही फंसाया है। '
वकील अनसुनी कर आगे बढ़ जाते।
इस बार उसने सोच लिया था, वह अपनी पैरबी खुद करेगी। वह जज के सामने जा धमकी और रोते हुए कहने लगी, 'जज साहब, जानी बेकसूर है। इसे फंसाया गया है। कैद में एक साल के करीब हो गए, अभी तक जमानत भी नहीं हुई। कल्लू के पास पैसा था, छूट गया। मैं वकील नहीं कर सकती, साहब! मेरी गरीबी के कारण, यह जेल में है। '
न्यायलय के सामने समस्या थी बिना जमानत के छोड़ दिया तो वह पुनः अपराध कर सकता है, और पकड़ने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं होगा। फिर भी जज साहब ने कहा, 'मैं तुम्हें सरकारी वकील दिला देता हूँ, जमानती का इंतजाम कर लो। '
'मैं ही जमानत दूंगी साहब, जिनके यहाँ झाड़ू, पोछा, बर्तन करती हूँ, वो तो आने से रहे।'
एस० डी० तिवारी
वी. आई. पी. सीट
ट्रैन के प्रथम श्रेणी के वातानुकूल कोच में सांसद जी की शय्या आरक्षित थी। वे अपने कुप्पे में प्रवेश करते ही उन्हें छोड़ने आये सहायक को निर्देश दे दिए कि ऊपर वाली दोनों शैय्याओं को मोड़ दे और जाकर टिकट निरीक्षक को बुला लाये। टी.टी.इ. के आते ही सांसद ने कहा, 'देखो मैं सोने जा रहा हूँ, इस कुप्पे मे और कोई न आये। किसी का आरक्षण हो तो कहीं एडजस्ट कर देना।'
'एस सर ' कहकर टिकट निरीक्षक द्वितीय वातानुकूल कोच में एक सीट पर बैठ गया और बड़बड़ाने लगा, 'बताओ कितनों को सीट नहीं मिल पाती है और एक व्यक्ति चार सीट घेर कर बैठ गया। इन लोगों ने तो कानून को अपनी जेब में रखा है। संविधान में समानता बस नाम के लिए है?'
एक यात्री टीटीइ की हां में हां मिलाते हुये बोला, 'यह देश तो भाई, बस वीआईपी लोगों का है। सरकारी साधन इनसे बचे, तभी किसी को मिल पाता है। बड़े सरकारी अस्पताल इन्हीं लोगों के निमित्त, पुलिस का ही देखो, एक बड़ा भाग वीआईपी सुरक्षा में होता है और जनता की सुरक्षा ... '
"क्या करें, सर ? हम लोग तो सरकारी नौकर हैं। "
एस० डी० तिवारी
नोट का क्या करें ?
नोट बंदी की घोषड़ा ने सबको परेशान कर रखा था। जिसे देखो वही बैंकों की कतार में खड़ा।
एक बड़े नेता बहुत चिंता में डूबे थे। वे अपने संकट मोचक बाबा के पास पहुंचे। कभी भी कोई समस्या आती तो समाधान ढूंढने, नेता जी, बाबा के पास जाते। बाबा से उन्होंने अपनी चिंता जताई, विस्तार से बताई।
'बाबा! सरकार ने पांच सौ और हजार का नोट बंद कर दिया, और मेरे पास तो हजार करोड़ से भी अधिक हैं जो मैंने चुनाव के लिए एकत्र कर रखा है। इसे बैंक में भी जमा नहीं कर सकता, क्योंकि यह सब काली कमाई है। और तो और इसमें से कुछ पैसा उम्मीदवारों को टिकेट देने के बदले लिया था। अब आप ही कोई समाधान बताईये, बाबा। मैंने कितना बुद्धि लगाकर और परिश्रम करके यह पैसा एकत्र किया है। अगर आप कोई समाधान नहीं निकालेंगे तो यह कागज हो जायेगा।'
बाबा ने नेता जी से कहा 'वत्स, चिंता मत करो, आखिर तुम्हें यह पैसा चुनाव में ही तो खर्च करना है।उसे अभी खर्च कर दो और समझो कि चुनाव के लिए निवेश किया है। इन रुपयों को निर्धन मतदाताओं के खातों में दो-दो, चार-चार हजार करके जमा करा दो। वे तुम्हारे कृतज्ञ रहेंगे और तुम्हारे लिए मतदान करेंगे।'
'मगर यह मैं बाटूंगा तो मीडिया वालों को पता नहीं चल जायेगा। फिर वे बदनाम करेंगे, नेता जी के पास इतना पैसा कहाँ से आया।'
'हाँ, यह तो मैंने सोचा ही नहीं। कोई बात नहीं, यह काम अपने एजेंटों द्वारा कर लें।'
बाबा के पास पहले से ही उपस्थित एक उद्योगपति भी अपनी उसी तरह की समस्या लिए बैठा था। बाबा ने उसे उपाय बता दिया, 'तुम अपने पैसे को बैंक में डाल दो और अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट से बात करके इस वर्ष अधिक व्यापार और लाभ दिखा देना। लाभ पर कर तो चुकाना पड़ेगा पर तुम्हारा वह पैसा कानूनी हो जायेगा।'
जब दोनों चलने लगे तो बाबा ने कहा 'सौ करोड़ के लगभग तो मेरे पास भी रखे हैं, थोड़ा थोड़ा करके इसे भी उसी में एडजस्ट कर देना। '
- एस० डी० तिवारी
घर का चोर
टेलीविज़न पर, प्रधान मंत्री का राष्ट्र को संबोधन समाप्त ही हुआ था, श्रीदेवी चाय लेकर आयी। चाय, मेज पर रखकर, सोफे पर बैठ गयी।
'ये पांच सौ और हजार का नोट बंद हो गया, अब इनका क्या होगा?'
'हमें क्या चिंता है, हमारे पास कोई काला धन थोड़े ही है कि चिंता करें। ये तो उनके लिये समस्या है जो दो नंबर से कमाई करते हैं और कर नहीं चुकाते। '
'अब वे क्या करेंगे ?' श्रीदेवी ने फिर पूछा।
'करेंगे क्या जो उनकी सही कमाई का होगा, बैंक के खाते में जमा करा देंगे नहीं तो रख के सड़ायेंगे। '
'सुनो जी, एक बात कहनी है। '
'हां, बोलो। '
'बहुत दिनों से एक हार बनवाने की सोच रखी थी। सोची कि तुम्हारे ऊपर एकाएक अधिक भार न पड़े, इसलिए तुम्हारी जेब से चुरा चुरा कर पचास हजार रुपये इकठ्ठे कर रखे हैं। उसका क्या होगा ?'
श्रीकांत जी तिरछी आँखों से देखते हुए, 'हुँ ऊं.. तुमने कभी बताया नहीं, खैर बैंक खुलने दो। वाह प्रधानमंत्री जी, चोर पकड़ने की आपकी योजना की तो अच्छी शुरुआत हुई .. '
- एस० डी० तिवारी
मिट्टी की मिट्टी
मदन पाल का महल जैसा घर था और वह अकूत संपत्ति का स्वामी बन बैठा था । एक कमरा तो समझो कि नोटों से भरा था। नोट बंद होने का समाचार पाकर, पति पत्नी चिंता में डूबे थे। समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्या करें। जीजा जी से भी बात कर लिया, मगर कोई हल नहीं निकला। मदन पाल को पहली बार लगा कि उसके जीजा से भी ऊपर कोई हो सकता है। पहले उसकी बिल्डिंग मैटेरियल की छोटी मोटी दुकान हुआ करती थी, जब जीजा जी मंत्री बन गए तो उसके पौ बारह थे। नदी की सारी रेत मदनपाल की मर्जी से ही निकलती और बिकती जिसे वह मनमाने दाम पर बिकवाता। उसके समक्ष प्रशासन भी पंगु था। वह दिन दूनी, रात चौगुनी उन्नति करने लगा और धन का अम्बार लगा लिया।
उसकी यह स्थिति से उस दूध वाले की कहानी याद आ गयी -
एक दूध वाला नदी पार करके दूध बेचने जाता। ग्राहकों को दूध देने से पहले नदी से उसमें पानी मिला लेता। एक दिन नाव से नदी पार कर रहा था कि उसका दूध का कंडाल पलट गया और सारा दूध पानी में बिखर गया। मल्लाह उसकी करतूत से अवगत था। हंसते हुए बोल पड़ा, 'ले भइया, दूध का दूध, पानी का पानी'।
अब मदन पाल का भी मिट्टी का पैसा मिट्टी हो चुका था। उसे एक ही विकल्प सूझ रहा था कि चुपके से नोटों को नदी में फेंक आये, कहीं ऐसा न हो नोटों के साथ पकड़ा जाये और परेशानी झेलनी पड़े।
एस० डी० तिवारी
पंडिताईन का आम
पंडिताईन को उन्हें विधवा हुए वर्षों बीत चुके थे। वे पचहत्तर पार कर चुकी थीं। निःसंतान होने के कारण अकेले ही जीवन व्यतीत करना पड़ रहा था। उनके पास दो तीन बीघा खेत था और एक आम का पेड़, यही दोनों जीवन का सहारा थे। उस समय वृद्धा पेंशन जैसी कोई चीज नहीं होती थी। खेत को कभी वे बंटाई पर दे देतीं तो कभी गांव के लोग ही उनके खेत की जुताई, बुआई कर देते थे।
यूँ तो गांव में कई लोगों के आम आदि के बाग थे, पर बच्चों को पंडिताईन के पेड़ का ही आम पसंद आता। एक तो उसका सुन्दर स्वाद और ऊपर से छिड़का पंडिताईन के गालियों का मसाला। जब बच्चे ढेला लेकर उनके आम के पेड़ के नीचे एकत्र होते, कोई एक बालक फूटकर, जाके पंडिताईन को बोल आता। वे अपना सोटा लिये, गालियों की बौछार करती चली आतीं। सभी बच्चे खिलखिलाते भाग खड़े होते।
गालियों में ही उन्हें, उनके खानदान का इतिहास पढ़ा देतीं। 'फलां का नाती, फलां का पनाती, ... तुम्हें यही पेड़ मिला है, अपना सब क्या भाड़ में झोंकोगे, आदि, आदि?'
वहां तो वे खूब सुना लेती थीं, मगर किसी के घर कभी शिकायत लेकर नहीं जातीं। और तो और जब आम तुड्वातीं तो बच्चों को बुला बुला कर बाँटतीं। उनके मरने के बाद,घर और जायदाद पर मायके के लोगों का अधिकार हो गया। बच्चे भी बड़े और समझदार हो चुके थे।
और वह आम का पेड़, अनेकों वर्ष अकेले उदासी का जीवन बिताता रहा।
हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी
आज विवाह की वर्षगांठ थी, कौतुकी प्रातः ही केशव को समझा रही थी 'तुम बताना नहीं, देखें मम्मी जी और पापा जी को याद है कि नहीं। मम्मी, पापा तो रात बारह बजे ही फ़ोन पर 'हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी' बोल दिए थे।'
कामता प्रसाद और कमला टहलने गए थे, इधर केशव काम पर चला गया। शाम हुई तो कौतुकी ने मम्मी को फ़ोन मिला दिया, 'मम्मी, कैसे हो ?'
'हम लोग ठीक हैं, बेटा! तुम लोग ठीक हो न! और, एनिवर्सरी पर कहीं जा रहे हो या घर पर ही रहना है?'
'अभी पता नहीं, केशव के आने पर देखेंगे ..... मम्मी! देखा, मम्मी जी और पापा जी ने अभी तक 'हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी' तक विश नहीं किया, उन्हें हमारे विवाह की तिथि भी याद नहीं। आप लोग कितना ध्यान रखते हैं।'
तभी कमला ने पुकारा, 'बेटा कौतिकी! देखो, ये पाजेब तुम्हें कैसी लग रही है? और ये जैकेट केशव के लिए। हम प्रतीक्षा कर रहे थे, अपनी शादी की सालगिरह का जब आशीर्वाद लेने आओगी तो साथ ही यह भेंट दे देंगे।'
मन ही मन लजाई कौतुकी पांव छूते हुए, 'अरे! बहुत ही प्यारी है, मम्मी जी, मैं तो समझ रही थी आपको याद नहीं होगा।'
केशव भी काम से लौट आया था। भूल सुधारते हुए मम्मी पापा के चरण स्पर्श किया।
कामता प्रसाद ने पूछा, 'कहीं बाहर चलें या घर पर ही कुछ ...... '
- एस० डी० तिवारी
काले धन का हिसाब
मंगत राम ने हाल ही में एक फ्लैट ख़रीदा। फ्लैट के मालिक ने पहले ही तय कर लिया था कि वह पच्चीस प्रतिशत यानि कि दस लाख रुपये, दो नंबर से लेगा और वो भी नगदी के रूप में, पहले ही। समझौते के अन्तर्गत पच्चीस प्रतिशत की राशि वह नकद ले लिया। अभी वह इस पैसे को ठिकाने भी नहीं लगा पाया कि समाचार आ गया, पांच सौ और हजार के नोट बंद हो गए हैं। उसे तो मनो सांप सूंघ गया, लाखों रुपये का प्रश्न था। पैसा बैंक में जमा करने पर उसे आय का स्रोत बताना पड़ता और काफी राशि टैक्स के रूप में जमा करनी पड़ती। उसने मंगत से कहा कि इस राशि को एक नंबर मान ले और दो नंबर की राशि बाद में दे दे।
मंगत को यह स्वीकार नहीं था, बोला, 'मेरे पास तो यह गाढ़ी कमाई का पैसा है, बैंक से निकाल कर दिया है।
अब तो समझौता के अनुसार जो बकाया राशि है, वही दूंगा।'
'मगर जो नोट तुमने दिया है वो तो बंद हो गए।'
'तो उसमें मेरी क्या गलती है। मैंने तो सही नोट दिए थे, आपके पास आने के बाद ही तो बंद हुए, आप उसी दिन बैंक में डाल देते।'
'अरे, तुम्हें नहीं पता, इसे बाहर ही बाहर निबटाना था। अब तो मुश्किल में फंसा दिया।'
'मेरे खाते में तो आठ लाख पड़े थे, दो लाख किसी से उधार लेना पड़ा, दो दिन बाद देने के लिए बोल रहा था तो आप ही जल्दी कर रहे थे, सौदा हाथ से निकल जायेगा।'
'फिर तो अच्छा ही है, इसे बैंक में वापस डाल दो, तुम्हें क्या परेशानी है। बैंक से ही तो निकाले हैं।'
मंगत ने सोचा, उसके पैसे तो निकल ही चुके हैं क्यों न समझौता कर ले और इसी बहाने कुछ फायदा उठा ले। उसने बोला, 'ठीक है अब दो नंबर वाली राशि में से पांच लाख कम करने होंगे।'
फ्लैट के मालिक ने सोचा, बाजार में अब पैसों की कमी रहेगी और उसका फ्लैट आसानी से इस कीमत पर नहीं बिक पायेगा। उसने मंगत राम से समझौता कर लिया।
खाता गुलजार
धन्ना सेठ ने बिरजू को बुलाया, 'ये लो ढाई लाख रूपया। ' कहते हुए एक एक हजार के नोटों की दो और पांच सौ की एक गड्डी थमा दिया।
'लेकिन सेठ साहब सुना है, ये नोट बंद हो गए हैं। क्या करना है इसका ? '
'हाँ, अपने खाते में जमा करा देना, बैंक में चल रहा है।'
बिरजू के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, सेठ ढाई लाख दे रहा है, आखिर किस बात के। सोचा सम्भवतः उसकी दस वर्ष की कर्मठ सेवा से वह प्रसन्न है और पुरस्कार स्वरुप यह राशि दे रहा है। मगर, अपने भाग्य पर उसे भरोसा नहीं हो रहा था। वह फिर से पूछा -
'किस बात के, साहब?'
'तुम्हारे खाते में कभी पैसा नहीं होता न, लो एक बार उसे गुलजार कर दो।'
बड़ी प्रसन्नता से थामते हुए बिरजू ने पूछा, 'कितने पर हस्ताक्षर करना है? सेठ जी!'
'नहीं, नहीं। कोई साइन वोइन नहीं करना है, ले जाओ, जब ये नोटों का भूचाल शांत हो जायेगा तो दो लाख लौटा देना, पचास हजार तुम्हारे। '
बिरजू आश्चर्य चकित था, पचास हजार भी कहाँ के कम। अब तक तो सेठ, दस हजार पर हस्ताक्षर करवा के, छः हजार पगार देता था। इस मंहगाई में वह किसी तरह पेट पालता था और सेठ उसके हक़ का भी पैसा मारकर अपनी तिजोरी में डाल लेता था।
बिरजू समझता तो सब था मगर मज़बूरी मुंह नहीं खोलने देती थी। आज हंसते हुए कह दिया, सेठ जी ! मैं तो दस वर्ष से भी अधिक समय से आपकी सेवा कर रहा हूँ। हर महीने जो अतिरिक्त चार हजार रुपये के लिए दस्तखत करवाते हैं, पांच लाख तो वैसे ही बनते हैं। अब तो आपके लिए यह सब कागज ही है।
धन्ना सेठ डर के मारे कि बिरजू कहीं फूट न पड़े, 'चलो एक लाख रख लेना। '
- एस० डी० तिवारी
दिवाली की मिठाई
जुवैदा मिठाईयों को अपने तीनों बच्चों में बाँट रही थी। बच्चे खुश हो होकर, अपनी पसंद बता रहे थे। तभी सलीम भी आ गया। जुवैदा डब्बा उठाते हुए बोली, 'लो एक उठा लो।' सलीम ने डब्बे से चमचम उठाया और दो बार में घोंट गया।
'मिठाई तो अच्छी है, एक और दिखा।'
'रूको, पहले बच्चों को ले लेने दो।'
'कितना मिला।''ये आधा आधा किलो के चार डिब्बे और श्रीवास्तव जी ने दो सौ नकद देकर बोला, इसकी मिठाई खरीद लेना। पांच घर में काम करती हूँ न।'
तभी छोटा बेटा, अख्तर ने एक सील किया हुआ डब्बा खोल दिया। सलीम इस पर गुस्सा खा गया, ये लोग कोई चीज थोड़ी देर के लिए भी नहीं रहने देते। जरूरी है एक ही दिन में सब खाओ। उसने उसे थप्पड़ मारने के लिए जैसे ही हाथ उठाया, जुवैदा ने हाथ पकड़, झटक दिया। 'ख़बरदार, खाने दो जी भर। तुम तो ईद पर भी चाहते हो कि बस घर पर बनी सेवई और गुलगुलों से ही काम चल जाय। दिवाली की मिठाई इनके भाग से मिली है तो ये जी भर खाएंगे। इन दो सौ का भी, मैं मिठाई ही लाऊंगी। '
एस० डी० तिवारी
पटाखे की चोरी
आशु के तो आज दोनों हाथ में लड्डू था। दिवाली पर पापा छुट्टी आये थे, ढेर सारे पटाखे लाये थे और नए कपड़े भी। वह सबसे बढ़िया वाला पटाखा, छुपा कर रख दिया कि सबसे बाद में, उसे छोड़ेगा और नए कपडे पहन कर, गांव में घूमने चला गया।
जो देखता ' अरे नए कपडे, बड़े अच्छे हैं। '
'पापा जयपुर से लाये हैं ' कहकर, आशु दो चार कदम मटक कर चल लेता।
वापस आने पर फूलझड़ी और पटाखे छोड़ने की बारी थी, वह एक एक कर छोड़ने लगा। शाम हो गयी तो उसे, उस प्रिय पटाखे की याद आयी। वह लेने गया तो पता लगा कि पटाखा वहां से गायब। अब तो रोना-धोना, चिल्लाना प्रारम्भ।
'मेरा पटाखा किसने लिया? भइया ही चुराया होगा। '
आशु का संदेह सही था। उस पटाखे पर बड़े भाई, मनु की दृष्टि पड़ी और वह उसे लेकर अपने मित्रों के साथ छोड़ने कहीं बाहर चला गया। घर में तूफान मचा था। नामजद रिपोर्ट, पर नीलम कुछ नहीं कर पा रही थी।
अँधेरा हो चला था, नीलम फेर में पड़ गयी, आशु को कैसे चुप कराये! अब वह, वो वाला पटाखा कहाँ से लाये! आशु था कि जिद्द पे अड़ गया, मुझे पटाखा लाकर दो।
नीलम का भाग्य अच्छा था, घर से जाते समय मनु का एक पटाखा गिर गया। नीलम ने उसे उठाकर ताक पर रख दिया। उसकी बुद्धि काम की, वहां से उठाकर आशु को देने लगी, 'ये ले।''नहीं, ये वो वाला नहीं है।'
अब तो संकट गहरा गया। 'अरे तुझे नहीं पता, पटाखे वाला आया था, कह रहा था वो वाला अच्छा नहीं था, ये वाला उससे अच्छा है और अधिक आवाज करेगा। वो वाला ले गया और उसके बदले ये दे गया। '
'सच मम्मी ? जयपुर से आया था ?'
'हाँ, हाँ '
बालक का भोला मन और छोटा सा झूठ, आंगन फिर चहक उठा।
- एस० डी० तिवारी
धारावाहिक
जमुना प्रसाद और जान्हवी की अब तक की जिंदगी बड़े प्यार से बीती थी। जमुना प्रसाद सेवानिवृत्त होने के बाद अपना समय घर में ही कुछ लिखने पढ़ने में बिताते और जान्हवी का टेलीविज़न पर धारावाहिक देखने का चस्का था ही। टेलीविज़न धारावाहिक देखने में वह पहले कई बार सब्जी जला चुकी थी।
पहले जहाँ उसे हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई दिखती थी, अब दोष अधिक दिखते हैं। जान्हवी दोनों बहुओं में कई कमियां देखती और वह जमुना प्रसाद से लहराती रहती। जमुना प्रसाद कहते, वे बच्चियां हैं अभी दुनियादारी का अधिक ज्ञान नहीं है, समझा दिया करो। लेकिन जान्हवी धीरे धीरे चिड़चिड़ी होती जा रही थी, कई बार जमुना प्रसाद को भी अच्छी तरह धो देती।
जान्हवी का खाली समय व्यतीत करने का बस एक ही साधन था, टेलीविज़न। अब जमुना प्रसाद कभी बीच में कोई काम कहते तो वह झल्ला सी जाती। उन्होंने उसे समझाया, 'देखो! हम लोग तो टेलीविज़न देखने पर बच्चों को डाँटते थे, टेलीविज़न बंद कर देते थे, परीक्षा के समय केबल कटवा देते थे और अब तुम इतना समय इसी में लगाती हो। एक तो कितना शोर होता है और कई बार काल्पनिक कूटनीति की बातें मन में घर कर जाती हैं।'
'अरे .. इससे पता चलता है, दुनिया में कैसे कैसे लोग हैं, क्या क्या खेल खेलते हैं। ये धारावाहिक देखकर पता चलता है, क्या अच्छा है, क्या बुरा। '
'अरे भाग्यवान! वो तो सही है, पर वर्षों तक के लम्बे धारावाहिकों में बुराइयों की लम्बी कहानी में अच्छाई वाली बात तो बस फ्लैश मात्र बनकर रह जाएगी न। तब तक तो व्यक्ति बुराईओं के विचार में रंग भी जायेगा। वहम उत्पन्न करने वाले बीज मन में पेड़ बन जायेंगे, सास बहू का कूटनीतिक खेल वर्षों तक देखने पर, कभी न कभी मन में बहादुर होने की भावना भी जागृत होगी ..... ।
एस० डी० तिवारी
विवाह के छः महीने बीत चुके थे। सोनम के मम्मी पापा उसके ससुराल आये थे। पूरा परिवार साथ घूमने के लिए निकला और ये हुआ की रात का भोजन बाहर ही किसी रेस्तरां में कर के चलते हैं। घूमने के पश्चात्, सभी लोग यानि की सोनम और उसके मम्मी पापा तथा मानस और उसके मम्मी पापा एक अच्छे रेस्तरां में भोजन करने चले गए। मानस और सोनम ने अपने लिए पिज्जा और कोक मंगाया बाकी लोगों ने रोटी, दाल और सब्जी ही पसंद किया। भोजन परोसने के बाद सोनम ने अपनी सास से पूछा, 'मम्मी जी थोड़ा पिज्जा चखेंगी?'
'नहीं मैं तो रोटी ही खाऊँगी। '
दो तीन कौर खा लेने के बाद सोनम की सास ने रोटी का एक कौर तोडा और सब्जी लगाकर अपना हाथ सोनम की ओर बढ़ाया, 'देख सोनम कितनी स्वादिष्ट सब्जी बनी है। '
सोनम मुंह में कौर दबाकर सिर हिलाई 'हूँउउऊँ'।
'बता तेरा पिज्जा अधिक स्वादिष्ट है या ये रोटी सब्जी।'
सास का प्यार देख, सोनम की मम्मी की आँखों में आंसू छलक आये।
एक दिन की हिंदी
१४ सितंबर
सरकारी कार्यालय के सभी कार्य अंग्रेजी में ही थे। १४ सितंबर को हिंदी दिवस मनाने के लिए, हिंदी के शब्द ढूंढे जा रहे थे, किस किस ने हिंदी में क्या काम किया, क्या कुछ टिपण्णी की है, आदि। हिंदी प्रखंड पिछले एक माह से इसी कार्य में लगा था। निरंतर प्रयास के पश्चात् भी एक भी अधिकारी हिंदी लिखने को तत्पर नहीं होता। होता भी कैसे! अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले ही तो अधिकारी बनते हैं। एक तो उन्हें हिंदी आती ही कम है, दूसरे हिंदी लिखने में, लघुता का अनुभव होता है। वे सोचते हैं कि लोग समझेंगे, इसे अंग्रेजी कम आती है। जो भी आदेश, परिपत्र आदि निकाला जाता, उसका हिंदी अनुवाद बाद में परिचालित किया जाता, जिसका तब तक कोई महत्त्व नहीं रह जाता। या तो कूड़े की टोकरी या किसी फाइल में नत्थी कर दिया जाता।
विद्यापति ने हिंदी माध्यम से पढ़ाई की थी और अपना काम हिंदी में ही करते थे। इसके कारण उन्हें पूरे साल तिरस्कार का भी सामना करना पड़ता। वरिष्ठ अधिकारियों से यहाँ तक सुनना पड़ जाता : ठीक से इंग्लिश नहीं आती, किसने तुम्हें सेलेक्ट कर लिया?' विद्यापति अपमान का घूंट पीकर रह जाते। हिंदी माध्यम से पढ़ाई के कारण उन्हें किसी अच्छे विषय में प्रवेश नहीं मिला, इस कारण हिंदी में एम. ए. कर लिया। उन्हें नौकरी तो मिल गयी पर यह नहीं पता था कि इस देश में अंग्रेजी ही शासन करती रहेगी और हिंदी के कारण सदैव तिरस्कृत रहना पड़ेगा। ग्रेजुएशन करते उनको इसका बोध तो हो चुका था कि देश का संविधान इंग्लैंड से अंग्रेजी पढ़ के आये विद्वानों ने अंग्रेजी में ही लिखा था और इसके कारण हिंदी कभी अपना सिर नहीं उठा पायेगी, परन्तु अब तक देर हो चुकी थी। अब तो उनके पास जो था उसी के आधार पर अपना स्थान बनाना था।
उनका हिंदी का ज्ञान और हिंदी से प्रेम, उत्कृष्ट हिंदी लेखन हेतु सदैव प्रेरित करता रहता। हिंदी साहित्य विशेषतः कवितओं ने उन्हें जीवन में जो रसास्वादन कराया था, उसके कारण यह भाषा उनके मन की गहराईयों तक बसी थी। वैसे वे काम भर अंग्रेजी जानते थे।
सितंबर आते ही सबकी दृष्टि विद्यापति की और घूमी। उनके सहकर्मी टिप्पणी कर जाते: हिंदी दिवस पर तो पुरस्कार विद्यापति को ही मिलना है। कम से कम इस समय उन्हें, स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करना स्वाभाविक ही था। तैयारियां जोरों पर थी। पूरे पखवाड़ा ही हिंदी के प्रचार प्रसार में उत्सव का सा परिवेश था। कार्यालय में हिंदी पखवाड़ा के बैनर और पोस्टर लगा दिए गये थे। कर्मचारी कई बार हिंदी के क्लिष्ट शब्द चुन कर लाते, और अन्य लोगों के उनसे अनभिज्ञ होने पर विनोद करते। १४ सितंबर को तो विद्यापति, बड़े ठाट बाट से कार्यालय आये। उन्हें पूर्ण विश्वास था हिंदी का सर्वोच्च पुरस्कार उन्हें ही मिलेगा। सुबह से ही उन्हें सहकर्मियों से अग्रिम बधाई मिलना आरम्भ हो चुका था। हिंदी दिवस के समारोह के समय आ गया, सब लोग सभागार में एकत्र हुए, अध्यक्ष महोदय ने अंग्रेजी का सहारा लेकर, अपने वाक्य पूरे करते हुए उद्घाटन भाषण दिया और पुरस्कारों की घोषणा हुई। मगर यह क्या! हिंदी प्रेम के कारण एक बार पुनः विद्यापति को निराशा का मुंह देखना पड़ा। इस बार आयोजन समिति ने निर्णय लिया था कि जो लोग हिंदी माध्यम से पढ़े हैं, वे प्रतियोगिताओं से बाहर रहेंगे और पुरस्कार अहिन्दी भाषियों को दिए जायेंगे।
एस० डी० तिवारी
बाबा का प्रवचन
टेलीविजन पर आ रहे, एक कार्यक्रम पर ध्यान गया, जिसमें एक बाबा गेरुआ वस्त्र में, भारी भीड़ के समक्ष प्रवचन कर रहे थे। वे बता रहे थे कि किसी को अपने ऊपर गर्व नहीं करना चाहिए। मनुष्य जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर की इच्छा है, और उसी की कृपा से है, अन्यथा सभी मनुष्य एक जैसे ही हैं। कोई छोटा बड़ा नहीं होता, सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं। मैं भी एक साधारण मानव हूँ, मुझे गुरु तो तुम लोग मानते हो।
अगले ही क्षण बोले, मैं कहीं गया और एक बड़े अधिकारी के यहाँ रुका। लोगों को उस अधिकारी से मिलने के लिए, पहले से समय लेना पड़ता है, घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है। और देखो, मैं उसके घर में रुका हूँ और वह मुझसे नहीं मिल पा रहा है। मुझसे मिलने के लिए वहां भी मेरे भक्त आ गए, और मेरे पूजा पाठ में व्यस्त रहने के कारण, वह अधिकारी तीन घंटे प्रतीक्षा करने के पश्चात् ही मुझसे मिल पाया।
तत्पश्चात मंच पर एक भक्त को खड़ा कर दिया गया जो बाबा की महिमा और उनके चमत्कारों का गुणगान करने लगा।
एस० डी० तिवारी
स्वामीजी के दर्शन
एक बार ट्रैन में यात्रा कर रहा था। सामने वाली बर्थ पर, मेरे एक पुराने परिचित सज्जन विराजमान हुए। एक दूसरे को देख हम दोनों ने आश्चर्य व्यक्त किया। बातचीत आरम्भ हुई तो उन्होंने एक बहुत बड़े स्वामी का नाम लेकर, मुझसे पूछ दिया, आप उनसे मिले हैं। मैंने ना में उत्तर दिया तो वो बोले 'पीछे वाली बर्थ पर ही हैं, चलिए मिलवा देता हूँ। '
वैसे तो मैंने उनसे कह दिया, 'मैं बाबा लोगों और डॉक्टरों से कम ही मिलना पसंद करता हूँ, जाने मन में क्या वहम डाल दें।' चूकि उनका देश भर में नाम था, बड़े बड़े मंत्री उनके शिष्य थे, लोग बहुत प्रयास करके भी उनसे नहीं मिल पाते थे और मुझे इतनी सरलता से यह अवसर मिला है, मिलने की उत्सुकता मन में उठी। कम से कम दोस्त मित्रों से तो कहूंगा कि उन स्वामी से मैं भी मिला हूँ। यह सब विचार करते उनसे कह दिया, 'चलो मिल लेते हैं।' जाकर प्रणाम करते हुए, उनके सामने वाली बर्थ पर बैठ गया । मेरे परिचित ने उन्हें मेरा परिचय बताया, तत्पश्चात स्वामी जी ने मुझसे पूछा :
'कहाँ काम करते हैं?'
मैंने बताया।
'आपके संगठन का चेयरमैन कौन है?'
उन्हें बताया।
'उनसे कहना, वे मुझसे मेरे आश्रम में मिलेंगे। उनकी कोई समस्या होगी तो उसका समाधान हो जायेगा। उनके काम काज में या सरकार की ओर से कोई समस्या होगी तो मैं देख लूंगा। आपकी पदोन्नति कब होनी है?'
'पता नहीं।'
'कोई बात नहीं, वे मिलेंगे तो मैं बोल दूंगा। मेरा आश्रम महरौली में है, अपना विवरण लेकर आ जाना।'
मैंने उनका धन्यवाद किया और अपने स्थान पर लौट आया।
खिलौना
शारदा के दिमाग में पैसे का बड़ा गरूर था, वह समझती थी पैसे से कुछ भी कर सकती है। और हो भी क्यों न, उसके पति की लाखों की मासिक आय थी। घर में महंगे से महंगा सामान था, उसे बस इस बात का शौक था उसके घर में जो कुछ हो, सबसे ऊपर हो। एक दिन शारदा की कामवाली अपने दो साल के नन्हें से बेटे को साथ लेकर आ गयी -
'मेम साहब! आज मेरे घर पर कोई नहीं है, मैं इसे साथ लेकर आ गयी। थोड़ी देर यहीं बैठकर खेलेगा, तब तक मैं काम निबटा लूंगी।'
शारदा का भी तीन साल का बेटा था, वह कामवाली के बेटे के हाथ में खिलौना देखकर, उसे लेने के लिए रोने लगा। कामवाली ने अपने बेटे से लेकर, वह खिलौना उसे देना चाहा तो वह रोने लगा। अब वह बड़े असमंजस में पड़ गयी, आखिर किसे रुलाये। शारदा यह देख कर बोल पड़ी, 'देख! इसके पास लाखों के खिलौने हैं, एक से एक महंगे और स्वचालित। तू ही जाकर देख ले खिलौनों वाला कमरा, पता नहीं दक्ष को इस फोकट के खिलौने में क्या नजर आ रहा है! कितने तो इससे अच्छे खिलौने कूड़े में फेंक दिए।'
काम वाली अपने बेटे का खिलौना पकड़ाते हुए बोली, 'मेम साहब! अभी बच्चा है, इसे पैसे से खेलना नहीं आता। '
- एस० डी० तिवारी
क्लब का चस्का
गुप्ता जी को मेलबर्न आये एक महीने हो चुके थे। वे अपने बेटे के साथ, उसके एक मित्र के यहाँ गए तो, उसके पिता, मलिक साहब से मुलाकात हुई। परस्पर बातचीत में मलिक जी ने गुप्ता जी से पूछा, 'बच्चे तो काम पर चले जाते होंगे, आप क्या करते हैं ?'
'बस थोड़ा बहुत टहल लेता हूँ, बाकी घर पर ही टी.वी. वगैरह देख लिया या सो गए। '
अरे, आप क्लब क्यों नहीं ज्वाइन कर लेते! आपके घर से बस एक किलोमीटर है और नाम मात्र का शुल्क, मुफ्त हौजी होती है, और तो और निशुल्क चाय काफी भी। मैं तो वहीँ चला जाता हूँ, अपने भारत के कई लोग मिल जाते हैं, समय अच्छा कट जाता है।
गुप्ता जी क्लब के सदस्य बन गए। तंबोला में जीतने पर उन्हें कूपन मिल जाता तो क्लब के रेस्तरां में खाने पीने का जुगाड़ हो जाता। उन्हें यहाँ आनंद आने लगा। क्लब में गेमिंग मशीन भी लगी थीं। गुप्ता जी ने सोचा, यहाँ भी भाग्य आजमाएं। उन्होंने मशीन में पैसे डाल बटन दबाना प्रारम्भ किया। आरम्भ में तो कुछ पैसे भी मिल गए, और समय समय पर 'लकी ड्रा'। उन्होंने सोचा कि अच्छा है, यहीं से पैसे मिल जायँ तो छोटे मोटे खर्च के लिए, बेटे से मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। लेकिन बाद में धीरे धीरे, मशीन पैसा खाने लगी।
एक दिन गुप्ता जी ने थोड़ा अधिक साहस दिखा दिया, स्पष्ट है कि हानि भी अधिक होनी थी। आकर जब बेटे से बताया तो वह अबिलम्ब सौ डॉलर का नोट उन्हें पकड़ाने लगा। गुप्ता जी परिपक्व व्यक्ति थे। उन्होंने पहले ही आत्म मंथन कर लिया था, 'कभी मैं बेटे को ऐसी जगहों पर जाने से रोकता था, उसे पैसे देने से मना करता था और आज मैं अपने बेटे के पैसे लेकर जुआ खेलूंगा! मुझ पर धिक्कार है। '
बोले - 'इसकी आवश्यकता नहीं।'
सोच का बोझ
दोनों की एक ही मंजिल थी और एक ही राह से गुजरना था। एक, लोगों को जब मार्ग में देखता तो सशंक हो जाता, बार बार सोचता, न जाने इनमें से कौन क्या समस्या खड़ी कर दे। जो भी मिलता, राह में वाधा उत्पन्न न कर दें, यह सोचकर बचने का प्रयत्न करता।
दूसरा जब लोगों को देखता तो मन में संतोष व्यक्त करता। चलो मैं अकेला नहीं, यदि कोई समस्या हुई तो कोई न कोई आकर मदद कर ही देगा।
दोनों ही बारी बारी से बिना किसी झंझट के गंतव्य तक पहुँच गए।
पहला तो अपनी सोच का बोझ ढोते थक गया था और विश्राम के उपाय ढूंढने लगा। दूसरा स्वयं को हल्का अनुभव करते अपने आगे के काम में जुट गया।
स्पीड लिमिट
सोचते सोचते पियूष की नयी कार आ ही गयी। उसने निश्चय किया था कि कार में सबसे पहले पापा को बिठाकर मंदिर घुमायेगा। वैसे तो एक मंदिर घर के पास भी था परन्तु सोचा जब कार से जाना है तो किसी बड़े मंदिर चलते हैं। पापा भी वहां तक हो आएंगे और वह कार भी कुछ दूर तक चला लेगा।
पापा से जाकर बोला, ' पापा! कार आ गयी, 'चलिये मंदिर होकर आते हैं। '
पियूष पापा को कार की खूबियां बताने लगा। पापा भी उसकी प्रशंसा कर रहे थे। देखते ही देखते, कार हवा से बातें करने लगी।
'देखिये पापा! अस्सी के ऊपर जा रही है। मैं सौ से भी ऊपर की स्पीड में चला लेता हूँ। '
'नहीं बेटा! मुझे तेरी स्पीड नहीं देखनी, तेरी सुरक्षा देखनी है। स्पीड नहीं, स्पीड लिमिट का ध्यान दे।'
काला कौवा - १
इतना बड़ा कौआ और एक नन्हीं सी चिड़िया शोर मचाती उसका पीछा कर रही थी। देखते ही देखते तीन चार चिड़ियाँ और जुट गयीं। कौआ आकर एक मुड़ेर पर बैठा। पीछा करतीं चिड़ियाँ, उस कौए को घात लगाकर चोंच मार रही थीं। कौआ, चुप चाप सब सह रहा था। मैं देख कर चकित था, आखिर कौआ इतना बड़ा होकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है और मार खा रहा है। संभवतः उसके मन का चोर उसे निर्बल बना रहा था। बेचारी चिड़ियाँ थोड़ी देर चिल्लाकर फिर थक हार कर चली गयीं। कौआ निर्लज्ज की भांति वहीँ बैठा रहा।
उनकी भाषा तो समझ नहीं आ रही थी पर दृश्य देख कर मैं यही समझ पा रहा था कि वे चिल्ला रही थीं - 'अंडा चोर! अंडा चोर!'
और उससे निष्प्रभावित् कौआ अपनी अगली योजना में तल्लीन था।
काला कौआ - २
एक कौआ जैसे ही आकर डाल पर बैठा, उस वृक्ष की सभी नन्हीं पक्षियों ने उसे घेर कर शोर मचाना प्रारम्भ कर दिया। पहले तो लगा कि जैसे कोई बड़ा नेता आ गया हो और जनता जनार्दन उसे घेरकर जय जय कर रही हो।पर यह क्या! कई तो उसे चोंच भी मार देती थीं। व्याकुल होकर कौवे को वहां से जाना पड़ा। मेरा तीन वर्ष का नन्हां पौत्र तनय भी यह दृश्य देख रहा था, उसने मुझसे प्रश्न कर दिया, 'दादा जी ! वे चिड़ियाँ कौवे को क्यों भगा दीं ? क्या कौवा काला है, इसलिये ?'
मैं उसका उत्तर देता इससे पहले ही उसकी माँ बोल पड़ी, 'नहीं, उसका काला होना नहीं, उसके मन का काला होना उनमें भय उत्पन्न कर रहा है। वे डर रही हैं, कहीं वह उनके अंडे न चुरा ले।' तनय सोच में पड़ गया।
काला कौवा - ३
एक पेड़ पर, एक कौवा और कुछ चिड़ियां बैठी थीं। कौवे ने देखा, चिड़ियाँ पेड़ से जातीं और एक एक दाना चुन कर लातीं। उसी में से कुछ अपने खातीं, कुछ बच्चों को खिलातीं। कौवा उन्हें देख हंस रहा था, 'तुम लोग एक एक दाना के लिये कितनी मेहनत करती हो। मेरा देखो, एक ही झपट्टे में पूरी रोटी लाता हूं जिसमें से मेरे खाने के बाद भी बच जाता है और नीचे गिरे हुए टुकड़ों में एकाध चिड़ियों का पेट भी भर जाता है। '
यह कहते कौवा अपने भोजन का प्रबंध करने के लिए उड़ चला।
थोड़ी ही दूर पर उसे एक ढाबा दिखा, जहाँ खाना खाकर, एक ग्राहक ढाबेवाले को एक हजार का नोट दे रहा था। दुकानदार छुट्टा न होने की बात कहकर उसे लेने से मना कर रहा था। ग्राहक नोट को उसके ठीहे पर रख, दुकानदार से ले लेने का अनुरोध कर रहा था कि इतने में कौवे ने झपट्टा मारा, और नोट लेकर भाग गया। नोट के लाल रंग से उसे खाने के सामग्री का भ्रम हुआ। जाकर, वह वृक्ष की डाल पर बैठ गया। इस बार चिड़ियों के हंसने की बारी थी -
'देखो, ये कैसा मूर्ख है, रोटी ले आता तो बैठ कर खाता; कागज ले आया। मेहनत करके भी भूखा रहेगा।'
इतने में कौवे के सर पर एक ढेला लगा और नोट मुंह से छूटकर नीचे गिर गया। ढाबे पर काम कर रहा एक लड़का उसे देखते ही ढेला लेकर पीछे दौड़ा था, नोट वापस ले गया।
- एस० डी० तिवारी
बिजूका
पक्षियों ने तंग कर रखा था, वे सूर्योदय होते ही फसल पर आ जाते और दाने चुगने लगते। वे फसल को सुबह ही अधिक क्षति पहुंचाते थे। बिरजू ने छोटू की ड्यूटी लगा दी कि पाठशाला जाने से पहले, वह एक घंटे खेतों में जाकर पक्षी उड़ाएगा। उसके पास ही बुद्धन का भी खेत था। छोटू, बुद्धन को साथ ले लेता और खेत पर पहुंचकर दोनों 'ह्वा रे ह्वा' चिल्लाने लगते। 'ह्वा रे ह्वा' की आवाज सुनकर पक्षी भाग जाते। दूर के पक्षियों को भगाने के लिए उन्होंने ढेलवांस बना लिया। ढेलवांस तो उनके लिए आम का आम, गुठलियों के दाम जैसा सिद्ध हुआ। पक्षी भगाने के अतिरिक्त वे इससे खेल भी लेते और निशाना साधने का अभ्यास करते। यह उनके लिए बड़ा आनंदित करने वाला यन्त्र था और स्वयं का निर्मित। फिर भी जब वे पाठशाला चले जाते तो पक्षी थोड़ा बहुत नुकसान कर ही देते।
तभी छोटू को सूझा कि क्यों न बिजूका या डरावन (पक्षियों को डराने वाला पुतला ) बनाकर खेत में गाड़ दें। इससे रात को सियार आदि भी डरेंगे। यह काम वह अकेले नहीं कर सकता था, अतः बिरजू की मदद लेनी आवश्यक थी। उन्होंने बांस का बिजूका बनाया और खेत में गाड़ दिया। मानव का आकार देने के लिए उसपर एक पुराना कम्बल लपेट दिया गया और एक कमीज पहना दी गयी। बिजूका ने तो बस एक ही दिन अपना कार्य भार निभाया। अगली सुबह जब छोटू खेत में गया तो केवल बांस का डंडा गड़ा था। छोटू घर आकर, दुखी मन से बिरजू को बताया। बिरजू सुनते ही बरस पड़ा, धिक्कार है ऐसे चोरों को, बताओ पुराने वस्त्र तक नहीं छोड़ते। ससुरे डंडा भी क्यों छोड़े !
तभी छोटू ने बिरजू से एक प्रश्न कर दिया, 'पापा! वह चोर कितना गरीब होगा? इस कड़ाके की सर्दी में बिजूका के पुराने वस्त्र चुराने के लिए मजबूर हुआ।' अब बिरजू इसका उत्तर तो क्या, आगे एक शब्द भी नहीं बोल पाया। आगे का जिम्मा भी छोटू को ही निभाना पड़ा।
मच्छरों से रोजी रोटी
मोहल्ला समिति के कुछ लोग, शिकायत लेकर, नगर निगम के कार्यालय पहुंचे। तीन चार बाबू चाय की चुस्की लेते गपशप कर रहे थे। केलकर जी ने उन्हें बताया 'महोदय! बहुत मच्छर हो गए हैं, नाली खुली रहती है, उसमे कभी कोई छिड़काव तक नहीं होता, जिस कारण और मच्छर पनप रहे हैं।'
उनमें से एक बाबू ने, मुंह में पान दबाये, तबाक से उत्तर दिया, 'अरे ये तो हमारी रोजी रोटी हैं, मच्छर हैं तभी तो हमारी नौकरी है। ये समाप्त हो गए तो हमें कौन पूछेगा?'
केलकर जी बोले, 'श्रीमान जी! आपकी नौकरी मच्छरों की रोकथाम के लिए है या पालने के लिए? मेरी समझ से तो मच्छरों और आप में से एक को ही रहना चाहिए। यदि इन्हें ही रहना है तो आपको नौकरी से हटा देना चाहिए। वैसे कुछ शर्म है तो स्वयं ही छोड़ देनी चाहिए।'
'अरे, मजाक कर रहा था। जाईये, ठेकेदार को छिड़काव के लिए बोल देंगे। '
'रोजी रोटी से मजाक! जनाब मजाक से नहीं, काम से रोटी मिलती है।' कहकर वे चले गए।
राम की शोभा यात्रा
विजयदशमी के दिन, दिल्ली की एक सड़क से गुजर रहा था। रास्ता जाम होने के कारण एक ही स्थान पर आधे घंटे तक रुकना पड़ा, कारण रामलीला की शोभा यात्रा। दशहरा देखने गए बिना ही मुझे श्रीराम की शोभा यात्रा देखने को मिल गयी। जुलुस में सबसे आगे ढोल ताशे वाले, उनके साथ बारात के जैसे नाचते युवक, पीछे ट्रेक्टर ट्राली और टेम्पो का रेला। बीच में दो तीन बैंड बाजा वाले। सबसे आगे वाली ट्राली पर डीजे लगा था जिस पर बहुत ऊँची आवाज में गाना बज रहा था 'बेबी को बेस पसंद है।' उसी पर श्रीराम का परिवार बैठा था।
बेस वाली बात का अपने कॉलेज के समय में एक जोक सुन रखा था, जिसे उस समय अश्लील माना जाता था। अब यह गाना बनकर चौराहों पर बजता है और विजयादशमी की शोभा यात्रा में सुनकर तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
आवाज की तीव्रता से कलेजा तक हिल रहा था। श्रीराम और लक्ष्मण जो डीजे के साथ ही चल रहे थे, सम्भवतः किसी दैविक शक्ति से ही उसे सह रहे थे। मैं तो उनकी इस शक्ति से आश्चर्य चकित था। पीछे वाली ट्रालियों पर; किसी पर रावण का परिवार, किसी पर वानरी सेना, किसी पर राक्षसी सेना, किसी पर रामलीला के आयोजक आदि सवार थे। जुलुस के सबसे पीछे वाले टेम्पो पर लग रहा था, कोई बहुत बड़ा जिम्मेदार समूह बैठा हो क्योंकि कुछ के हाथ में बियर की बोतल भी थी। अपनी जिम्मेदारी के अंतिम छोर पर आकर थकान मिटा रही थी।
शोभा यात्रा के समाप्त होने से पहले गाड़ी आगे बढ़ा पाना असंभव था। कोई और चारा नहीं होने के कारण, गाड़ी में बैठा शोभा यात्रा का आनंद ले रहा था और सोच रहा था कि शायद यही राम राज्य का है।
एस० डी० तिवारी
उसकी कही बात आज तक याद है
दिल की रजिस्ट्री
प्रोड्यूसर साहेब.
१ जन्म कुंडली
2.आनंद-पथ
3.अवतार
4.रीढ़ की हड्डी
5. पैबन्द
6.ताबीज
7.अनुकरण
8.जीवहत्या
9.तीसरा चित्र
10.पीड़ा
1.बीज का अंकुर
2.सोई आत्मा
3.युग का दास
4.बेपेंदी का लोटा
5.शर-संधान
6.निज स्वामित्व
7.दूषित वातावरण
8.ठोस रिश्ता
9.मौन बर्फ
10.पेट का रिश्ता
सार्थक लघुकथा के प्रमुख मानक - तत्व इस प्रकार है :--
१ - कथानक- प्लॉट , कथ्य को कहने के लिये निर्मित पृष्ठभूमि ।
२- शिल्प - क्षण विशेष को कहने के लिये भावों की संरचना ।
३- पंच - कथा का अंत ।
४- कथ्य - पंच में से निकला वह संदेश जो चिंतन को जन्म लें ।
५- लघुकथा भूमिका विहीन विधा है।
६- लघुकथा का अंत ऐसा हो जहाँ से एक नई लघुकथा जन्म लें अर्थात पाठकों को चिंतन के लिये उद्वेलित करें।
७- लघुकथा एक विसंगति पूर्ण क्षण विशेष को संदर्भित करें ।
८- लघुकथा कालखंड दोष से मुक्त हो ।
९- लघुकथा बोधकथा ,नीतिकथा ,प्रेरणात्मक शिक्षाप्रद कथा ना हो ।
१०- लघुकथा के आकार -प्रकार पर पैनी नजर ,क्योंकि शब्दों की मितव्ययिता इस विधा की पहली शर्त है ।
११- लघुकथा एकहरी विधा है ।अतः कई भावों व अनेक पात्रों का उलझाव का बोझ नहीं उठा सकती है।
१२- लघुकथा में कथ्य यानि संदेश का होना अत्यंत आवश्यक है।
१३- लघुकथा महज चुटकुला ना हो ।
१४- लेखन शैली
१५- लेखन का सामाजिक महत्व
२- शिल्प - क्षण विशेष को कहने के लिये भावों की संरचना ।
३- पंच - कथा का अंत ।
४- कथ्य - पंच में से निकला वह संदेश जो चिंतन को जन्म लें ।
५- लघुकथा भूमिका विहीन विधा है।
६- लघुकथा का अंत ऐसा हो जहाँ से एक नई लघुकथा जन्म लें अर्थात पाठकों को चिंतन के लिये उद्वेलित करें।
७- लघुकथा एक विसंगति पूर्ण क्षण विशेष को संदर्भित करें ।
८- लघुकथा कालखंड दोष से मुक्त हो ।
९- लघुकथा बोधकथा ,नीतिकथा ,प्रेरणात्मक शिक्षाप्रद कथा ना हो ।
१०- लघुकथा के आकार -प्रकार पर पैनी नजर ,क्योंकि शब्दों की मितव्ययिता इस विधा की पहली शर्त है ।
११- लघुकथा एकहरी विधा है ।अतः कई भावों व अनेक पात्रों का उलझाव का बोझ नहीं उठा सकती है।
१२- लघुकथा में कथ्य यानि संदेश का होना अत्यंत आवश्यक है।
१३- लघुकथा महज चुटकुला ना हो ।
१४- लेखन शैली
१५- लेखन का सामाजिक महत्व
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