खोपड़ी का लिखा
मदनमोहन अपनी जन्म भूमि छोड़ने को बिल्कुल भी इच्छुक नहीं थे, मगर बेटा मिहिर अमेरिका से पढ़ाई किया और वहीँ पर उसे काम मिल गया। विवाह के बाद, वह मान्यता को भी साथ ले गया। मिहिर ने अमेरिका में अपना घर बना लिया और वहीँ का होकर रह गया। इधर मदनमोहन अब बूढ़े हो चले थे और अकेले जिंदगी बिताने में बड़ी कठिनाई हो रही थी। वैसे मिहिर ने उनका भी अमेरिका का ग्रीन कार्ड बनवा दिया था और वे दो बार वहां हो भी आये थे मगर उन्हें स्थाई रूप से अमेरिका रहना स्वीकार नहीं था। उनकी प्रबल इच्छा थी कि जिस जन्मभूमि ने उन्हें सब कुछ दिया, अपने प्राण भी वहीँ त्यागें और उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित हों।
धीरे धीरे वे पचहत्तर के हो चले। उनकी पत्नी ने एक वर्ष पूर्व, उनका साथ छोड़ दिया। अब वे अस्वस्थ रहने लगे, खाने पीने की दिक्कत रहती थी। कुछ दिन, उनके यहाँ बेटी रहकर, देखभाल की पर उसे अपना भी घर देखना था। अंततः हार के उन्हें, मिहिर के पास जाना ही पड़ा।
मृत्यु तो सबकी निश्चित है। अमेरिका जाने के दो वर्ष पश्चात् ही मदनमोहन को दिल का दौरा पड़ा। मिहिर ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया पर कोई लाभ नहीं मिला। आखिरकर, मदनमोहन को भी संसार छोड़ कर जाना पड़ा, और वह भी अपनी जन्मभूमि से हजारों मील दूर, विदेश में। मरते दम तक, अपनी जन्मभूमि पर ही रहने का मदनमोहन का सपना तो पूरा नहीं हुआ मगर उनकी दूसरी इच्छा कि कम से कम मरने के बाद उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित हों, मिहिर ने भरसक प्रयास किया। मिहिर ने उनके दाह संस्कार का प्रबंध तो वहीँ कर दिया पर अपने पिता की इच्छा मान रखते हुए, अस्थियां लेकर भारत के लिए चल दिया ताकि हरिद्वार जाकर गंगा में प्रवाहित कर सके।
दिल्ली हवाई अड्डे पर आने पर, कस्टम जाँच के लिए उसे अपना सामान खोलना पड़ा। एक पोटली में अस्थियां देखकर कस्टम अधिकारियों ने शंका व्यक्त की।
पूछने पर, मिहिर ने बताया, 'यह, उसके पिता की अस्थियां हैं।'
कस्टम अधिकारी ने इसकी पुष्टि के लिए प्रमाण पत्र मांग दिया। मिहिर को इस तरह के किसी प्रमाणपत्र की जानकारी नहीं थी, इसलिए वह बस अस्थियां लेकर सीधे चला आया था।
मिहिर पहले ही परेशान था ऊपर से कस्टम ने उसपर, और आघात करने वाले प्रश्न दाग दिए, 'हमें क्या पता ये इंसान की अस्थि है! हो सकता है किसी और जंतु की हड्डी हो या फिर ड्रग हो जिसकी तस्करी कर रहे हो!'
इस बात पर कस्टम अधिकारी और मिहिर में गरम बहस हो गयी। अब तो मिहिर के लाख समझाने पर भी अधिकारी नहीं माना और अस्थियों को जाँच के लिए भेजने पर अड़ गया। अस्थियां जाँच के लिए प्रयोगशाला में भेजने के लिए रख लिया और मिहिर को धमकी दे डाली, 'यदि कोई आपत्तिजनक वस्तु निकली तो कस्टम अधिनियम के अंतर्गत मुक़दमा चलेगा।' मिहिर के पिता की अस्थियां जब्त हो गयी, बेचारा बिना अस्थियों के पैतृक गृह पहुंचा।
इस घटना पर एक कहानी याद आ गयी -
[एक पंडित जी, जो ज्योतिषाचार्य भी थे, कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक खोपड़ी दिखी। पंडित जी, भाग्य की रेखायें भली भांति पढ़ सकते थे। खोपड़ी जीर्ण शीर्ण अवस्था में थी, मगर उसके बचे खुचे भाग पर लिखी रेखाओं को पढ़ कर वे निष्कर्ष निकल लिए। उस पर लिखा था 'अभी कुछ बाकी है। ' पंडित जी को अपनी विद्या जांचने का अच्छा अवसर मिल गया। वे उस खोपड़ी को यह सोचकर, उठा लाये कि देखें अभी क्या बाकी है। खोपड़ी को वे एक वस्त्र में लपेट कर ताख पर रख दिए। एक दिन पंडित जी को कहीं जाना पड़ा, पंडितानी की दृष्टि उस खोपड़ी पर पड़ी। इससे पहले वह कभी कोई खोपड़ी नहीं देखी थी, समझी कि वो कोई खाने की वस्तु है। उसने उसे उठाया और पकाने के लिए ओखली में कूट डाला। जब पंडित जी आये तो देखे वह खोपड़ी गायब है। जब पंडितानी से पूछा तो उसने बताया कि मैंने तो उसे कूट डाला। पंडित जी को समझने में देर नहीं लगी कि क्या बाकी था।]
मिहिर के पैतृक गांव पहुँचने पर, सम्बन्धियों द्वारा निर्णय लिया गया कि तब तक बाकी के संस्कार संपन्न किये जायं। दो चार दिन बाद जब भी अस्थियां मिलेंगी, प्रवाहित कर दिया जायेगा। उसे एक सप्ताह ही रुकना था और इसी समय में चौथा आदि सब करना था। एक सप्ताह तक जाँच रिपोर्ट नहीं आ पायी। अस्थियों को बिना प्रवाहित किये ही,उसे वापस अमेरिका जाना पड़ा।
जाँच रिपोर्ट आने में पंद्रह दिन का समय लग गया। उसने अपने चचेरे भाई को अस्थियां का पता करने और उसे लेने के काम में लगा रखा था। वह स्वयं भी, कस्टम अधिकारियों से फ़ोन पर पूछ ताछ करता रहा। अमेरिका आये उसे एक सप्ताह ही हुए थे कि समाचार मिला, अस्थियों की जाँच पूरी हो गयी है और वह उन्हें ले सकता है। पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए मिहिर संकल्पित था। अगली ही उड़ान से पितृ ऋण से मुक्त होने, वह एक बार फिर से दिल्ली आया। अस्थियां लेने के लिए कस्टम का दरवाजा खटखटाया। उसे अस्थियां मिल गयीं जिसे लेकर वह अपने गांव गया। वहां से चाचा आदि को साथ लेकर हरिद्धार गया और गंगा मईया को समर्पित कर दिया। इस प्रकार मिहिर के पिता की इच्छा व उसके कर्तव्यों का निर्वहन हुआ।
मदनमोहन अपनी जन्म भूमि छोड़ने को बिल्कुल भी इच्छुक नहीं थे, मगर बेटा मिहिर अमेरिका से पढ़ाई किया और वहीँ पर उसे काम मिल गया। विवाह के बाद, वह मान्यता को भी साथ ले गया। मिहिर ने अमेरिका में अपना घर बना लिया और वहीँ का होकर रह गया। इधर मदनमोहन अब बूढ़े हो चले थे और अकेले जिंदगी बिताने में बड़ी कठिनाई हो रही थी। वैसे मिहिर ने उनका भी अमेरिका का ग्रीन कार्ड बनवा दिया था और वे दो बार वहां हो भी आये थे मगर उन्हें स्थाई रूप से अमेरिका रहना स्वीकार नहीं था। उनकी प्रबल इच्छा थी कि जिस जन्मभूमि ने उन्हें सब कुछ दिया, अपने प्राण भी वहीँ त्यागें और उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित हों।
धीरे धीरे वे पचहत्तर के हो चले। उनकी पत्नी ने एक वर्ष पूर्व, उनका साथ छोड़ दिया। अब वे अस्वस्थ रहने लगे, खाने पीने की दिक्कत रहती थी। कुछ दिन, उनके यहाँ बेटी रहकर, देखभाल की पर उसे अपना भी घर देखना था। अंततः हार के उन्हें, मिहिर के पास जाना ही पड़ा।
मृत्यु तो सबकी निश्चित है। अमेरिका जाने के दो वर्ष पश्चात् ही मदनमोहन को दिल का दौरा पड़ा। मिहिर ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया पर कोई लाभ नहीं मिला। आखिरकर, मदनमोहन को भी संसार छोड़ कर जाना पड़ा, और वह भी अपनी जन्मभूमि से हजारों मील दूर, विदेश में। मरते दम तक, अपनी जन्मभूमि पर ही रहने का मदनमोहन का सपना तो पूरा नहीं हुआ मगर उनकी दूसरी इच्छा कि कम से कम मरने के बाद उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित हों, मिहिर ने भरसक प्रयास किया। मिहिर ने उनके दाह संस्कार का प्रबंध तो वहीँ कर दिया पर अपने पिता की इच्छा मान रखते हुए, अस्थियां लेकर भारत के लिए चल दिया ताकि हरिद्वार जाकर गंगा में प्रवाहित कर सके।
दिल्ली हवाई अड्डे पर आने पर, कस्टम जाँच के लिए उसे अपना सामान खोलना पड़ा। एक पोटली में अस्थियां देखकर कस्टम अधिकारियों ने शंका व्यक्त की।
पूछने पर, मिहिर ने बताया, 'यह, उसके पिता की अस्थियां हैं।'
कस्टम अधिकारी ने इसकी पुष्टि के लिए प्रमाण पत्र मांग दिया। मिहिर को इस तरह के किसी प्रमाणपत्र की जानकारी नहीं थी, इसलिए वह बस अस्थियां लेकर सीधे चला आया था।
मिहिर पहले ही परेशान था ऊपर से कस्टम ने उसपर, और आघात करने वाले प्रश्न दाग दिए, 'हमें क्या पता ये इंसान की अस्थि है! हो सकता है किसी और जंतु की हड्डी हो या फिर ड्रग हो जिसकी तस्करी कर रहे हो!'
इस बात पर कस्टम अधिकारी और मिहिर में गरम बहस हो गयी। अब तो मिहिर के लाख समझाने पर भी अधिकारी नहीं माना और अस्थियों को जाँच के लिए भेजने पर अड़ गया। अस्थियां जाँच के लिए प्रयोगशाला में भेजने के लिए रख लिया और मिहिर को धमकी दे डाली, 'यदि कोई आपत्तिजनक वस्तु निकली तो कस्टम अधिनियम के अंतर्गत मुक़दमा चलेगा।' मिहिर के पिता की अस्थियां जब्त हो गयी, बेचारा बिना अस्थियों के पैतृक गृह पहुंचा।
इस घटना पर एक कहानी याद आ गयी -
[एक पंडित जी, जो ज्योतिषाचार्य भी थे, कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक खोपड़ी दिखी। पंडित जी, भाग्य की रेखायें भली भांति पढ़ सकते थे। खोपड़ी जीर्ण शीर्ण अवस्था में थी, मगर उसके बचे खुचे भाग पर लिखी रेखाओं को पढ़ कर वे निष्कर्ष निकल लिए। उस पर लिखा था 'अभी कुछ बाकी है। ' पंडित जी को अपनी विद्या जांचने का अच्छा अवसर मिल गया। वे उस खोपड़ी को यह सोचकर, उठा लाये कि देखें अभी क्या बाकी है। खोपड़ी को वे एक वस्त्र में लपेट कर ताख पर रख दिए। एक दिन पंडित जी को कहीं जाना पड़ा, पंडितानी की दृष्टि उस खोपड़ी पर पड़ी। इससे पहले वह कभी कोई खोपड़ी नहीं देखी थी, समझी कि वो कोई खाने की वस्तु है। उसने उसे उठाया और पकाने के लिए ओखली में कूट डाला। जब पंडित जी आये तो देखे वह खोपड़ी गायब है। जब पंडितानी से पूछा तो उसने बताया कि मैंने तो उसे कूट डाला। पंडित जी को समझने में देर नहीं लगी कि क्या बाकी था।]
मिहिर के पैतृक गांव पहुँचने पर, सम्बन्धियों द्वारा निर्णय लिया गया कि तब तक बाकी के संस्कार संपन्न किये जायं। दो चार दिन बाद जब भी अस्थियां मिलेंगी, प्रवाहित कर दिया जायेगा। उसे एक सप्ताह ही रुकना था और इसी समय में चौथा आदि सब करना था। एक सप्ताह तक जाँच रिपोर्ट नहीं आ पायी। अस्थियों को बिना प्रवाहित किये ही,उसे वापस अमेरिका जाना पड़ा।
जाँच रिपोर्ट आने में पंद्रह दिन का समय लग गया। उसने अपने चचेरे भाई को अस्थियां का पता करने और उसे लेने के काम में लगा रखा था। वह स्वयं भी, कस्टम अधिकारियों से फ़ोन पर पूछ ताछ करता रहा। अमेरिका आये उसे एक सप्ताह ही हुए थे कि समाचार मिला, अस्थियों की जाँच पूरी हो गयी है और वह उन्हें ले सकता है। पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए मिहिर संकल्पित था। अगली ही उड़ान से पितृ ऋण से मुक्त होने, वह एक बार फिर से दिल्ली आया। अस्थियां लेने के लिए कस्टम का दरवाजा खटखटाया। उसे अस्थियां मिल गयीं जिसे लेकर वह अपने गांव गया। वहां से चाचा आदि को साथ लेकर हरिद्धार गया और गंगा मईया को समर्पित कर दिया। इस प्रकार मिहिर के पिता की इच्छा व उसके कर्तव्यों का निर्वहन हुआ।
No comments:
Post a Comment