Monday, 5 December 2016

tari par

निर्वासन

चुनाव का समय आ गया था। चुनावी दांव पैंतरों का खेल प्रारम्भ हो चुका था। किसी पार्टी का अध्यक्ष पैसे के बदले चुनाव का टिकट दे रहा था, कोई पार्टी सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध भड़का रही थी तो कोई पार्टी अपने हवाई वादों से मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटी थी। कौशिक जी के पास तो छल, बल सब कुछ था क्योंकि वे सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक होने के साथ मंत्री भी थे। प्रशासनिक अधिकारियों का चरित्र बस सत्ता पक्ष के मंत्रियों को प्रसन्न करने भर में सिमट चुका था। कौशिक जी का अपने क्षेत्र में तो वर्चस्व था ही, मंत्री होने के कारण वे अन्य क्षेत्र से भी विजय को हथिया लेने में सक्षम थे। इसलिये उन्होंने सोच रखा था, अपने गृह क्षेत्र से पुत्र वीरेन्द्र कौशिक को उतारें और स्वयं  किसी अन्य क्षेत्र से चुनाव लड़ें।

उनके गृह क्षेत्र से एक नया नेता सुन्दरलाल लोकप्रिय हो रहा था। वह क्षेत्र के समस्यायों से भली भांति अवगत था और समाधान हेतु यथाशक्ति संघर्षरत था। अधिकारियों को ज्ञापन देकर और समय-समय पर आंदोलनों के द्वारा क्षेत्र की समस्यायों को सरकार तक पहुंचाता रहता था। एक साधारण परिवार से होने के कारण सुन्दरलाल के साथ क्षेत्रीय जनता की सहानुभूति भरपूर थी। मंत्री जी को उसके लोकप्रियता की भनक मिल चुकी थी। इस बार के चुनाव में वह भी प्रत्याशी होने की तैयारी में जुटा था, मंत्री जी को इस बात का भी आभास था। वैसे तो पैसे आदि बंटवा कर मतदाताओं को प्रभावित कर सकने में वे सक्षम थे पर साथ ही डर भी था कि सुंदरलाल  नया लड़का है, कहीं परिवर्तन की आंधी न चल जाये और वीरेंद्र पर भारी पड़े। मंत्री जी कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते थे। यह वीरेंद्र का पहला चुनाव होगा, पहली ही बार हार गया तो उसका राजनितिक करियर बर्बाद हो जायेगा। अब मंत्री जी ने सुन्दर लाल की छवि धूमिल करने और उसे निर्बल बनाने के कार्य में जुट गए और अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए इस आशय का प्रशासन को निर्देश दे दिए । अब क्या था प्रशासन इस कार्य में तत्पर हो गया, सुंदरलाल के एक आंदोलन को रोकने में बल प्रयोग कर लाठी चार्ज करा दिया। कई लोग लहूलुहान हुए और सुन्दर लाल गिरफ्तार।
सुन्दर लाल पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, गेंगस्टर एक्ट और गुंडा एक्ट आदि की कई संगीन धाराएं लगा दी गयीं। मंत्री जी ने सोचा उनका काम हो गया। जिन लोगों पर लाठी चार्ज हुआ है, वे अब सुन्दर लाल का साथ छोड़ देंगे। पर हुआ इसके उलटा, सुन्दर लाल के पक्ष में जनसमर्थन और बढ़ गया। जेल में उससे मिलने हजारों लोग जाने लगे। इस कार्यवाही से मंत्री जी की चिंता और बढ़ गयी। उन्होंने प्रशासन से मिलकर, सबसे भयानक चाल चल दिया। सुन्दरलाल को जिला बदर करवा दिया। सुन्दर लाल के पास बड़ी लड़ाई लड़ने की क्षमता नहीं थी। वह क्षेत्र छोड़कर बहार चला गया और अपना समर्थन एक अन्य नेता मधुसूदन को दे दिया।

वीरेंदर लन्दन से एम बी ए की पढ़ाई पूरी कर चुका था और उसे वहीँ पर नौकरी भी मिल गयी। वह वहां एक गोरी लड़की, ऐना के प्यार में फंस चुका था और किसी भी हाल में उसे छोड़कर इंडिया नहीं आना चाहता था। मंत्री जी को इस बात का पता चला तो वह उस लड़की से वीरेंद्र का विवाह करने के लिए भी तैयार हो गए। मगर ऐना के दिमाग में इंडिया की तस्वीर अच्छी नहीं थी, वह यहाँ की राजनितिक गन्दगी के बारे में समाचार पत्रों में पढ़ चुकी थी और अपने मन ऋणात्मक बिम्ब बना चुकी थी। भारत का मौसम भी उसके अनुकूल नहीं था। वह भारत आने से साफ मना कर दी। वीरेन्द्र भी अपने प्यार को खोना नहीं चाहता था। मंत्री जी ने उसे बुलाने के लिए पूरा जोर लगा लिया मगर परचा दाखिल करने के लिए वीरेन्द्र को नहीं बुला पाए। अब मंत्री जी हाथ मल कर रह गए।  उनकी सारी मेहनत बेकार हो गयी।
दो बिल्लियों की लड़ाई में बन्दर ने लाभ उठा लिया। मधुसूदन विधायक हो गए। सरकार के कार्य कलापों से जनता प्रसन्न नहीं थी, इस बार वास्तव में परिवर्तन की आंधी चली और मंत्री जी को भी चुनाव में पराजय का सामना देखना पड़ा।

मंत्री जी घर में मुंह बनाकर बैठे थे कि वीरेन्द्र का लिखा एक पत्र मिला -
'विधायक जी ! जो दूसरों के लिए कांटे बोता है उसके राह में अपने आप कांटे उग आते हैं। आपने मुझे क्षेत्र से ;निकाला आपके बेटे को स्वतः ही देश निकाला मिल गया। अब तो आप पूरी जिंदगी अकेले ही बसर करेंगे या देश छोड़कर लन्दन में बसेंगे। यद्यपि मेरे लायक कोई काम हो तो निःसंकोच बताईयेगा।'

हार का विषाद कुछ कम होने पर मंत्री जी ने सुंदरलाल को फोन मिलाया -

'सुन्दर! जीत की बधाई। तुम भी मेरे बेटे जैसे हो, राजनीति में कोई व्यक्तिगत शत्रुता थोड़े ही होती है। अभी तुम नए हो, राजनीति के दांव पेंच अधिक नहीं जानते। मुझसे कोई मार्गदर्शन चाहिए होगा तो बता देना। वैसे तुम मेरी पार्टी में आ जाओ तो अच्छा रहेगा, अगले चुनाव में तुम्हें अपनी पार्टी का टिकट दिला दूंगा। '
'जी मंत्री जी, सोचने के लिए समय चाहिए'



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